शनिवार, 17 जुलाई 2010

दरभंगा के आम, नीतिश का शासन

कुछ दिनों पहले अपने गांव (मधुबनी के पास) अरविंद झा जी गए थे। जाने से पहले मुझे भी साथ चलने का निमंत्रण दिया था। लेकिन कुछ व्यस्तता की वजह से मैं उनके साथ जा नहीं पाया।

वैसे जाने की इच्छा भी है, मेरे कुछ पूराने साथी लोग आज विधायक केबिनेट मंत्री बन चुके हैं, उनके चुनाव के बाद से वहां नहीं जा पाया हूँ। बिहार वैसे अच्छी जगह है,अगर आप सही सलामत घर पहुंच जाओ तो।

नहीं तो कुछ इलाके ऐसे हैं जहाँ कोई गारंटी नहीं कब आपकी तश्वीर में फ़ूलों की माला लटक जाए। जो वहां का बाशिंदा है वह अगर एक बार अपने घर से बाहर निकल जाता है किसी काम के सिलसिले में तो फ़िर वहीं बस जाता है जाकर।

अगर गाँव में उसके माँ-बाप जिंदा है तो छठ का त्यौहार मनाने जरुर जाता है, अगर नहीं है तो जहाँ रहता है वहीं मना लिया जाता है। 

मेरे गाँव में भी कई परिवार आकर बसे हूए हैं। ऐसे हालात थे वहाँ के। नीतिश जी के शासन में बहुत कुछ गुणात्मक विकास हुआ है और प्रशासन में सुधार हुआ है। सार्वाजनिक समस्याओं का  भी निराकरण होने लगा है।

विकास के काम करना बहुत ही कठिन है, इसमें भी राजनीति हो जाती है। बिहार में 15 वर्षों तक लालू प्रसाद की सरकार रही है। लेकिन इन 15 वर्षों में मैने देखा कि नकारात्मक विकास के अलावा कुछ नहीं हुआ।

बिहार से लोगों का पलायन जारी रहा। जातिगत वैमनस्यता चरम स्तर पर थी। कहीं सड़क नहीं कहीं बिजली नहीं, तो लोग रहे तो कैसे रहें। खेती की जमी्नों पर दबंगों का कब्जा।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस बिहार को एक बहुत बड़े शिक्षा के केन्द्र के नाम से विश्व में जाना जाता था, सम्मान के साथ नाम लिया जाता था।

लेकिन लालु प्रसाद के कुशासन में वहाँ से बहु्त से लोगों ने दूसरे राज्यों की ओर पलायन किया।सन् 2002 मे दिल्ली के मालवणकर हाल में एक सम्मेलन में अपनी पीड़ा बताते हुए वशिष्ठनारायण सिंह (दादा) तत्कालीन राज्यसभा सदस्य ने कहा था कि "दिल्ली के लोग कहते हैं कि बिहार की गंदगी दिल्ली के चारों तरफ़ आकर फ़ैल गयी है।

जिस बिहार को एक शि्क्षा और संस्कृति के केन्द्र के रुप में पह्चाना जाता था। वहां की पह्चान अब गरीबी भुखमरी और बाहुबलियों के नाम से हो रही है।" ला्लु के राज में बात इस हद तक पहुंच गयी थी।मैने बिहार को उस स्थिति में देखा था, जब विकास के नाम पर नकारात्मकता हावी थी।

जिस दिन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत जी का स्वर्गवास हुआ, उस दिन पटना में गंगा नदी में बाढ आई हुयी थी। टीवी चैनल वाले लालु जी का इंटरव्यु ले रहे थे।

उन्होने बाढ से पटना निवासियों की परेशानी पर कहा कि "लोग रुपया पैसा खर्च करके गंगा जाते हैं नहाने के लिए और यहां गंगा घर आ गयी है तो हाय तौबा मचा रहे हैं।"

इस तरह 15 वर्षों मे की गयी नकारात्मक्ता को 5 वर्षों मे सकारात्मक्ता बदल कर नीतिश जी ने दिखा दिया। आज बिहार में प्राथमिक तौर पर जो काम होने थे वे हो रहे हैं। सड़क, बिजली,पानी की सुवि्धा उपलब्ध कराई जा रही है।

शासन को कुशासन को सुशासन में बदलने का नीतिश जी ने बखुबी किया है और प्रशासन की लगाम मजबुती से थाम कर उसे सही रास्ते पर लाए हैं। बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधारना आसान काम नहीं है। अब मीडिया में भी अपहरण, डकैती, हत्या, जाति संघर्ष के समाचारों में कमी आई है।

इससे पता चलता है कि प्रशासनिक सुधार से बिहार विकास की ओर उन्मुख होकर अपने खोये हुए मान को पाने की दिशा में एक बार फ़िर से उठ खड़ा हुआ है।

ये क्या हुआ? जाना था जापान पहुंच गए चीन-सुकु सुकु। बात अरविंद जी से प्रारंभ हुई थी और नीतिश जी के शासन तक पहुच गयी। कभी अपनी बिहार यात्रा के विषय में फ़ुरसत से लिखुंगा।

अरविंद भाई जब यहां वापस आने लगे तो माताजी ने उनके झोले कुछ आम डाल दिए थे, जि्से वे लेकर आए थे।अब मुझे कहने लगे आप जल्दी आईए नहीं तो आम खत्म हो जाएंगे। मैने उन्हे टालते-टालते एक हफ़्ता निकlल दिया।

उन्होने मुझे फ़िर याद दिलाया कि अगर आम खत्म हो गए तो उनकी जिम्मेदारी नहीं है, इसे आप अल्टीमेटम ही समझिए। हमने सोचा कि 20 आम में से 18बचे है, कहीं अमानत में खयानत न हो जाए, बस इसके बाद 150 किलोमीटर की यात्रा करके उनके पास बिलासपुर पहुंच गए।

जाते ही सबसे पहले आमों पर धावा बोला। सिर्फ़ दो ही बचे थे। मधुबनी दरभंगा के मालदा आम। आम के स्वाद के साथ माँ का स्नेह भी मिठास को बढा रहा था।

उसके बाद उदय भाई को फ़ोन लगाया गया। वे भी पहुंच गए और महफ़िल जम गयी। रात के 11बजे हम रेल्वे स्टेशन पर तफ़री करने के लिए पहुंचे, वहां बाहर ही बैठकर चर्चा होने लगी, आगे की यात्रा के कार्यक्रम बनने लगे।

अभी हमें बाबा धाम (बैजनाथ धाम) जाना है। प्रतिवर्ष जाते हैं 110 किलोमीटर पैदल यात्रा करते हैं बहुत आनंद आता है इस यात्रा में। प्रकृति के सानिध्य में नदी पहाड़ जंगल पार करके सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर को जाते हुए कांवड़िए थकते भी नहीं है।

बोल बम का नारा है बाबा एक सहारा है। हम भी उनके साथ हो लेते हैं। अब चर्चा करते हुए 12 बज चुके थे। बरसात होने लगी। हमने उदय भाई से विदा ली, वे चल पड़े अपने घर और हम भी अपने डेरा की ओर...........।

23 टिप्‍पणियां:

  1. मधुबनी दरभंगा के मालदा आम- हाय!! क्या दिला दिया.

    देवघर तो हम भी हर बार जाते है. हमारा श्री श्री ठाकुर अनुकुल जी महाराज का राधा स्वामी सत्संग वहीं है.

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  2. ये आम के सामने बैठा हुआ चेहरा कुछ जाना-पहचाना लग रहा है.
    लग रहा है कि यह आदमी तुम्हारे-हमारे साथ एक बार कहीं गया था
    खैर.. पूरी पोस्ट पढकर लग रहा है कि एक बार फिर कहीं किसी यात्रा पर निकला जाए
    प्रोग्राम बनाते है
    बनेगा तभी निकलेंगे
    नहीं बना तो भी कोशिश करेंगे कि चल कहीं दूर निकल जाएं..गाना गाने की.

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  3. बहुत बढिया, काश हमने पहले ब्लागिंग शुरु की होती तो शायद हम भी आप के साथ होते!

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  4. @राजकुमार सोनी

    हां,मुझे भी यह चेहरा कुछ जाना पहचाना लग रहा है।
    वैसे आपने कब, कहाँ और क्यों देखा था।
    वैसे भी आपको अब नेताओं वाला महारोग(भुलने का)लग गया है।:)

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  5. @उठा पटक

    आप सही समय में आए हैं,अब मुलाकात हो्ती रहेगी।

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  6. भाई असली मजा तो आप के साथ है ..
    ब्लोगिंग भी और .. आम सी नीमन जिन्दगी भी ..

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  7. बहुत ही सुन्दर यात्रा वृतांत ,यह बात पूरी तरह सही है की बिहार का विकास हुआ है लेकिन गरीबों की स्थिति बद से बदतर ही हुई है , जिसके बारे में नितीश जी को सोचने की जरूरत है ,इतना तो कडुआ सच है की RJD या कांग्रेस के शासन से नितीश जी का शासन बेहतर है बस जरूरत जमीनी स्तर पर निगरानी व्यवस्था को दुरुस्त करने की जिसमे नितीश जी भी लालू प्रसाद जी की तरह लापरवाही दिखा रहें हैं जिसका फायदा भ्रष्ट व दलाल उठा रहें हैं और गरीबों के हक़ का पैसा दलाल खा रहें है |

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  8. बिहारी की सब से बड़ी समस्या है कि यहाँ आर्थिक स्तर में बहुत बड़ा अंतर है... जहाँ एक वर्ग इतना गरीब है कि उसको दो जून की रोटी के लिए भी बाहर जाना होता है .. एक वर्ग बहुत दबंग और धनाड्य भी है.. और सामाजिक वैमनस्यता ने भी अभी बिहार का साथ नहीं छोड़ा है ...
    दो आम खाने के लिए १५० किलोमीटर ... यही तो स्नेह है ..

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  9. माफ करें ... ऊपर टिप्पाणी में बिहारी की जगह बिहार पढ़ें

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  10. बहुत बढिया, काश हम भी आप के साथ होते!

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  11. काफी दिनों बाद इस बार हमलोगों ने भी दरभंगा के अपने घर के मालदा आम खाए .. बिहार में सिर्फ दरभंगा के आम ही स्‍पेशल नहीं .. पटना का केला और मुजफ्फरपुर की लीची भी है .. पर आश्‍चर्य कि फल का इतना उत्‍पादन होने के बाद भी एक भी जैम , जेली बनाने की फैक्‍ट्री इधर नहीं .. यह बिहार सरकार की व्‍यवस्‍था का पोल खोल ही देता है .. जिसे लालू जी केन्‍द्र सरकार का सौतेला रवैया कहकर अबतक टालते रहें .. नीतिश कुमार के शासनकाल में बिहार में जो परिवर्तन आया है .. वह स्‍पष्‍टत: दिखाई देता है !!

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  12. ललित भाई, आम अपनी कमजोरी है, उसपर से आपने मालदा के बारे में बताकर मुँह में पानी ला दिया। अबइसका क्या करें?
    --------
    व्यायाम और सेक्स का आपसी सम्बंध?
    अब प्रिंटर मानव अंगों का भी निर्माण करेगा।

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  13. काश ये प्लेट में रखे आम उठा कर खा सकती ..............
    "बिहार वैसे अच्छी जगह है अगर आप सही सलामत पहुँच जाओ तो" ये लाइन ही बिहार का पूरा चित्रण कर रही है ! मैं दिल्ली में रहती हूँ और ये भी सही है आज दिल्ली का हर आदमी यहीं कहता है की बिहार के लोगो ने दिल्ली गन्दी कर दी लेकिन यहाँ मेरे विचार थोडा उलट है हाँ, ये सही है की दिल्ली को गन्दा करने में इनका भी योगदान रहा है लेकिन ये भी सच है की आज दिल्ली में सबसे ज्यादा बिहार के लोग ही आ कर काम कर रहे है ! दिल्ली के मजदुर तबके में सबसे ज्यादा लोग बिहार के ही मिलेंगे जिन की मेहनत से दिल्ली में ऊँची इमारते खड़ी हो रही है ! वैसे कई बार शीला दीक्षित इन बिहार को लोगो पर अपनी नज़रे टेडी कर चुकी है लेकिन ये भी सब जानते है की अगर बिहार से आए हुए ये सभी मजदुर दिल्ली से रवाना हो गए तो दिल्ली की आधी रफ़्तार रुक जाएगी !
    बिहार हमेशा से अपनी शिक्षा के लिए मशहूर रहा है वहाँ की प्रतिव्यक्ति आय इतनी कम है की उन्हें अपना गुजारा चलाना भी मुश्किल होता है ! अब तो बस यहीं दुआ है की बिहार दबंग लोगो से मुक्त हो कर अपनी पहचान फिर से बना सके फिर से कोई तथागत आए और बिहार का नाम चमकाए !

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  14. आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर भी है...

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

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  15. आपकी पोस्ट ने बिहार की छवि को सुधार दिया है...यदि हमारे नेता सच ही विकास करना चाहें तो देश की काया पलट हो सकती है...और सामने आम रख खूब ललचा रहे हैं सबको...

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  16. "जिस बिहार को एक शि्क्षा और संस्कृति के केन्द्र के रुप में पह्चाना जाता था।"

    आपका कथन बिल्कुल सत्य है। प्राचीनकाल में बिहार मगध के नाम से जाना जाता था और इसी क्षेत्र के वैशाली राज्य ने संसार को प्रथम गणतंत्र दिया! शताब्दियों तक अपनी गरिमा बिखेरने वाले मगध की
    आज की ऐसी स्थिति सोचनीय है।

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  17. ''aam'' k bahane ''khaas'' lalit-charcha ho gai. ye aam bahut pahale dekhe the, swaad kaa door se param-aanand bhi le liya.

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  18. चलिए कुछ बातें और बताता चलूं ...रपट पक्की है कि इस बार लगभग पचास सालों में सबसे अधिक आम पेडों पर आए हैं ...इतने कि लोग बाग दिन रात वही खा पचा रहे हैं ।

    लालू नीतिश सरकार का फ़र्क न सिर्फ़ दिख रहा है बल्कि महसूस भी हो रहा है , मगर विकास की राह अभी बहुत ही कठिन और दूर है ,

    पोस्ट को वर्ष की कुछ बेहतरीन पोस्टों के लिए सहेज रहा हूं ...अरविंद जी और श्याम जी के साथ तिकडी बना कर बैठक बढिया रही आपकी

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  19. आप ने जान बूझ कर तीन बार दो आमो की फ़ोटू दी, अब जिन्हे नही मिलते वो तो ललचायेगे ही ना, मुझे तो बहुत सुंदर ओर मीठे लगे यह आम, बाकी आप ने बिहार के बारे मै लिखा तो जेसा लालू था, जेसे उस के विचार थे उस ने बिहार को वेसा ही बना दिया, अब बिहार वासियो को चाहिये कि इसे दोबारा कभी ना आने दे,साफ़ सुधरे लोगो को ही आगे लाये जो बिहार को फ़िर से उसी शान से आगे बढा सके, जेसे नीतिश कुमार जी है,

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  20. अकेले जाके आम खाये बुरी बात !

    अपनी पहली फोटो में बेचारे आम(निपटाए जाने वाले थे इसलिए बेचारे) मालिक की तरफ मुंह किये हैं बाद में डर कर आपके कैमरे की तरफ :)

    और ये मालिक महोदय घुटनों से वी शेप बना कर आपको आमों पर निशाना साधने में मदद क्यों कर रहे हैं :)

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  21. lalit bhai aapne bahut badhiya post daalaa hai. ek chhoti si saamaanya mulaakaat ko itane satyapurn our rochaak dhang se lalit sharma hi rakh sakate hain...is post ko main behatrin poston me se ek maanataa hun....bihar ki sthiti ko khol kar rakh diya hai.. laajabaab ..tippaniya padhakar logon ke muh se jo paani girate dekh rahaa hun to lagta hai dher saaraa aam laanaa chaahiye thaa. age koshish karungaa...

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