सायकिल चलाना सीखने के बाद अब मेरे पंख लग गए थे. कुछ महीनों बाद सायकिल मैं अच्छे से चला सकता था। कभी छोटे भाई को बैठा कर चलाने का प्रयास भी कर लिया करता था।
स्कूल में सबको पता चल गया कि मैं अब सायकिल चलाना सीख गया हूँ, लेकिन मैंने कभी सायकिल सड़क पर नहीं चलाई थी।
हमारे घर के सामने से रायपुर से विशाखापत्तनम नेशनल हाईवे गुजरता है उसपे वाहनों का आवागमन अधिक है, जिसके कारण सड़क पर सायकिल चलाने की अनुमति नहीं मिली थी।
स्कूल में सबको पता चल गया कि मैं अब सायकिल चलाना सीख गया हूँ, लेकिन मैंने कभी सायकिल सड़क पर नहीं चलाई थी।
हमारे घर के सामने से रायपुर से विशाखापत्तनम नेशनल हाईवे गुजरता है उसपे वाहनों का आवागमन अधिक है, जिसके कारण सड़क पर सायकिल चलाने की अनुमति नहीं मिली थी।
| अभनपुर का बस स्टैंड तिराहा |
मैं सायकिल लेकर सड़क पर पहुंचा और चलानी शुरू की। बस स्टैंड तक सही सलामत पहुँच गया. जैसे ही वापस हो रहा था एक आदमी सामने आ गया,
बहुत कोशिश की मेरे से ब्रेक नहीं लगा दोनों टकरा गए। सायकिल के हैंडिल से उस आदमी की छाती में लगी मैं भी गिर गया।
आदमी छाती पकड़ कर बैठ गया। दोनों उठे एक दुसरे को देखा तो मुझे वो पहचान गया और बोला "सायकिल घर में चलाए करो", मैं घर आ गया।
| मेरा स्कूल |
व्यवस्था हुई कि एक नौकर सायकिल पर लेकर जायेगा और परीक्षा होते तक खड़ा रहेगा, फिर वही वापस लेकर आएगा। लेकिन मैं स्वयं सायकिल लेकर जाना चाहता।
यह प्रस्ताव मैंने दादी को सुनाया और कहा कि मेरी बात पापा जी तक पहुंचा दी जाए। दादी ने मेरी तरफ से वकालत की और उनकी दलीलें काम आई।
इस तरह से मुझ पर पहली बार विश्वास करके पूरे घर वालों ने सायकिल बाहर ले जाने की छूट दी। एक तरह से जिम्मेदारी का परमिट दिया।
मैं सायकिल लेकर शान से स्कुल गया और मेरे मन में एक जिम्मेदारी का अहसास उस दिन पहली बार हुआ। अब अपने आपको,
सायकिल को, सड़क पर चलने वालों को एवं बड़ी गाड़ियों से खुद को बचाना मेरी जिम्मेदारी थी.
जिस विश्वास के साथ मुझे सायकिल दी गई थी उसे भी टूटने से बचाना था अर्थात सायकिल चलाना चौतरफ़ा जिम्मेदारी थी।
इसलिए मेरे लिए वह सिर्फ लौहे सायकिल ही नहीं एक जिम्मेदारी भी थी जिसे निभाकर घर के लोगों का विश्वास अर्जित करना और बनाए भी रखना था.
मैं सायकिल लेकर शान से स्कुल गया और मेरे मन में एक जिम्मेदारी का अहसास उस दिन पहली बार हुआ। अब अपने आपको,
सायकिल को, सड़क पर चलने वालों को एवं बड़ी गाड़ियों से खुद को बचाना मेरी जिम्मेदारी थी.
जिस विश्वास के साथ मुझे सायकिल दी गई थी उसे भी टूटने से बचाना था अर्थात सायकिल चलाना चौतरफ़ा जिम्मेदारी थी।
इसलिए मेरे लिए वह सिर्फ लौहे सायकिल ही नहीं एक जिम्मेदारी भी थी जिसे निभाकर घर के लोगों का विश्वास अर्जित करना और बनाए भी रखना था.