काश, भगवान ने सिर के पीछे भी आँखे दी होती। दो नहीं तो एक ही से काम चला लेते या उल्लू जैसे 180 डिग्री तक गर्दन घुमा कर पीछे देख लेने की सुविधा दे दी होती तो कितना अच्छा रहता। मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि कभी-कभी पीछे भी देखना जरुरी हो जाता है।
गाड़ियों में तो बैक मिरर और साइड मिरर की सुविधा रहती है जिससे हम पीछे देख लेते हैं, लेकिन जब पैदल चलना होता है तो बड़ी मुस्किल हो जाती है। सड़क पर पीछे भी ध्यान रखना जरुरी हो जाता है। पता नहीं कौन पीछे से आ जाए। क्योंकि वार हमेशा पीछे से ही कारगर होता है।
इसलिए पीछे से वार करने वाले के लिए कहा जाता है कि सामने आकर वार कर, कायरों की तरह पीछे से क्या वार करता है। अरे मैं वार तक कहां पहुंच गया। बात तो कुछ दूसरी ही थी।
वर्तमान में गाड़ियों की संख्या में बहुत ही ज्यादा इजाफ़ा हुआ है। पहले गाँव भर में एक दो गाड़ियाँ होती थी। अब हर एक घर में आदमी पीछे गाड़ियाँ है। जिसका असर यातायात पर पड़ा है।
हाइवे पर पैदल चलना तो बहुत ही मुसीबत भरा है। जहां सर्विस रोड़ नहीं है वहां तो और भी ज्यादा खतरा है। आप मजे से सामने देखते हुए जा रहे हैं और कोई रांग साइड आकर आपकी पीछे से पूंगी बजाकर जा सकता है। ट्रकों पर लिखा रहता है फ़िर मिलेंगे।
लेकिन जब वह पीछे से ठोकर मार जाता है तो वह भी नहीं दिखाई देता कि कौन सी गाड़ी वाला अस्पताल का रास्ता दिखा गया।
सड़को पर ट्रैफ़िक इतना ज्यादा हो गया है कि सुबह का निकला अगर शाम को घर आ जाता है तो समझ लीजिए नया जन्म है।
इसे रात को अच्छे से सेलीब्रेट कीजिए और चैन की नींद लीजिए। न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए। सुबह काम पर जाते हुए सबसे गले लग कर मिल लीजिए, क्या भरोसा फ़िर कब मुलाकात हो और कहाँ हो। फ़िर गाड़ियों की स्पीड इतनी ज्यादा रहती है कि मत पूछिए।
जो नए-नए चूजे अंडा फ़ोड़ कर बाहर निकले हैं वे अपने आप को धूम 2 के हीरो से कम नहीं समझते। जैसे वे सारे करतब सड़क पर ही दिखाने घर से आए हैं। बिना माँ बाप के। हम तो हाथ पैर तुड़वाएंगे ही और तुम्हारी भी टॉंग खूंटी पर तीन महीना लटवाएंगे।
सड़क पर एक बाबा बहुत दिनों से पुलिया पर बैठे दिखाई देते थे। रोज सुबह नियम 10 बजे सड़क की पुलिया पर आकर बैठ जाते थे।
एक दिन मैने पूछ ही लिया –“बाबा आप रोज नित नेम से यहां पुलिया पर आकर बैठ जाते हो और थोड़ी-थोड़ी देर में सामने हाथ हिलाते रहते हो। गाड़ियाँ देखते रहते हो, क्या बात है? किसका इंतजार है?”
बाबा एक गहरी सांस लेकर बोले-“ बेटा मुझे सड़क के इस पार आए दो महीने हो गए। बात ये हैं कि सड़क के उस पार मेरे बेटे का घर है और इस पार मेरी बेटी का। एक दिन मेरी इच्छा अपनी बेटी से मिलने की हो गयी तो बेटा मुझे यहाँ छोड़ गया है।
बेटी अकेली और बीमार है। सोचा कि मिल ही लूं। तब से बेटे का इंतजार कर रहा हूँ कि वो मुझे लेने आए तो सड़क पार करुं और वो देखो जो सामने की बिल्डिंग में जो छत पर बैठी हुई दिख रही है वह मेरी पत्नी है। मैं रोज उसी को देखकर हाथ हिलाता हूँ कि मुझे लेने के लिए लड़के को भेज दे। लेकिन लड़का सुनता ही नहीं है।
एक बार सड़क पार करने की हिम्मत अकेले ही की थी। एक मोटर साइकिल वाले ने टक्कर मार दी मेरी टाँग टूटते-टूटते बची। तब से यहीं बैठ कर सबर कर लेता हूँ, कभी तो उस पार जा पाऊंगा…………….वाह रे ट्रैफ़िक……….…….।