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रविवार, 19 जून 2011

एक मित्र की दुर्घटना में असमय मृत्यु -- ललित शर्मा

नेशनल हाईवे 43 पर बेतरतीब खड़ी ट्रक (परलोकवाहक) ने आज फ़िर एक जान ले ली। सड़क पर हो रही दुर्घटनाओं के विषय में मैं पहले भी लिख चुका हूँ। बड़ी ट्रक वाले सड़क पर कहीं भी ट्रक खड़ी कर देते हैं। इनके पीछे इंडिकेटर, पार्किंग लाईट और रेड़ियम भी लगा नहीं होता, जिसके कारण अंधेरे में ट्रक दिखाई नहीं देता और लोग पीछे से टकरा कर जान दे बैठते हैं। किसी के घर का चिराग असमय ही बुझ जाता है और बाल-बच्चे अनाथ हो जाते हैं। आर टी ओ भी बिना गाड़ी देखे फ़िटनेस दे देता है, उसे तो अपनी दक्षिणा से मतलब। चाहे जान किसी की भी जाए। ऐसी एक गाड़ी से मैं भी टकराकर अपनी एक कार होम कर चुका हूँ और 3 पसलियाँ तुड़वा चुका हूँ।

कल मेरे शिक्षक मित्र हेमसिंग वर्मा जी स्कूल से पढा कर आ रहे थे रास्ते में बरसात हो रही थी जिसके कारण वे रुक-रुक कर घर आ रहे थे। अभनपुर के पास खड़ी एक ट्रक से पीछे से टकरा गए और वहीं उनकी मृत्यु हो गयी। असमय मृत्यु से उनका परिवार और इष्ट-मित्र सदमे में है। अभी तीन-चार दिन पहले ही मैने उन्हे सपत्नीक बाजार आते हुए देखा था और मजाक भी की थी। अब यादे हीं शेष हैं, पता नहीं यह सड़क कितनों की जान लेगी। राजधानी बनने के बाद इस पर ट्रैफ़िक चौगुना बढ चुका है। सुना गया था कि फ़ोर लाईन बनाया जा रहा है लेकिन 6 साल हो गए अभी तक कोई कार्यवाही नहीं देखी। ईश्वर करे और कोई दुर्घटना का शिकार न हो। मित्र हेमसिंग जी को विनम्र श्रद्धांजलि ईश्वर उनके परिजनों को दारुण दु:ख सहने की शक्ति दे।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

शहर में बढता हुआ ट्रैकिक दुर्घटनाओं का बड़ा कारण

काश, भगवान ने सिर के पीछे भी आँखे दी होती। दो नहीं तो एक ही से काम चला लेते या उल्लू जैसे 180 डिग्री तक गर्दन घुमा कर पीछे देख लेने की सुविधा दे दी होती तो कितना अच्छा रहता। मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि कभी-कभी पीछे भी देखना जरुरी हो जाता है।

गाड़ियों में तो बैक मिरर और साइड मिरर की सुविधा रहती है जिससे हम पीछे देख लेते हैं, लेकिन जब पैदल चलना होता है तो बड़ी मुस्किल हो जाती है। सड़क पर पीछे भी ध्यान रखना जरुरी हो जाता है। पता नहीं कौन पीछे से आ जाए। क्योंकि वार हमेशा पीछे से ही कारगर होता है।

इसलिए पीछे से वार करने वाले के लिए कहा जाता है कि सामने आकर वार कर, कायरों की तरह पीछे से क्या वार करता है। अरे मैं वार तक कहां पहुंच गया। बात तो कुछ दूसरी ही थी।

वर्तमान में गाड़ियों की संख्या में बहुत ही ज्यादा इजाफ़ा हुआ है। पहले गाँव भर में एक दो गाड़ियाँ होती थी। अब हर एक घर में आदमी पीछे गाड़ियाँ है। जिसका असर यातायात पर पड़ा है।

हाइवे पर पैदल चलना तो बहुत ही मुसीबत भरा है। जहां सर्विस रोड़ नहीं है वहां तो और भी ज्यादा खतरा है। आप मजे से सामने देखते हुए जा रहे हैं और कोई रांग साइड आकर आपकी पीछे से पूंगी बजाकर जा सकता है। ट्रकों पर लिखा रहता है फ़िर मिलेंगे।

लेकिन जब वह पीछे से ठोकर मार जाता है तो वह भी नहीं दिखाई देता कि कौन सी गाड़ी वाला अस्पताल का रास्ता दिखा गया।

सड़को पर ट्रैफ़िक इतना ज्यादा हो गया है कि सुबह का निकला अगर शाम को घर आ जाता है तो समझ लीजिए नया जन्म है।

इसे रात को अच्छे से सेलीब्रेट कीजिए और चैन की नींद लीजिए। न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए। सुबह काम पर जाते हुए सबसे गले लग कर मिल लीजिए, क्या भरोसा फ़िर कब मुलाकात हो और कहाँ हो। फ़िर गाड़ियों की स्पीड इतनी ज्यादा रहती है कि मत पूछिए।

 जो नए-नए चूजे अंडा फ़ोड़ कर बाहर निकले हैं वे अपने आप को धूम 2 के हीरो से कम नहीं समझते। जैसे वे सारे करतब सड़क पर ही दिखाने घर से आए हैं। बिना माँ बाप के। हम तो हाथ पैर तुड़वाएंगे ही और तुम्हारी भी टॉंग खूंटी पर तीन महीना लटवाएंगे।

सड़क पर एक बाबा बहुत दिनों से पुलिया पर बैठे दिखाई देते थे। रोज सुबह नियम 10 बजे सड़क की पुलिया पर आकर बैठ जाते थे।

एक दिन मैने पूछ ही लिया –“बाबा आप रोज नित नेम से यहां पुलिया पर आकर बैठ जाते हो और थोड़ी-थोड़ी देर में सामने हाथ हिलाते रहते हो। गाड़ियाँ देखते रहते हो, क्या बात है? किसका इंतजार है?”

बाबा एक गहरी सांस लेकर बोले-“ बेटा मुझे सड़क के इस पार आए दो महीने हो गए। बात ये हैं कि सड़क के उस पार मेरे बेटे का घर है और इस पार मेरी बेटी का। एक दिन मेरी इच्छा अपनी बेटी से मिलने की हो गयी तो बेटा मुझे यहाँ छोड़ गया है।

बेटी अकेली और बीमार है। सोचा कि मिल ही लूं। तब से बेटे का इंतजार कर रहा हूँ कि वो मुझे लेने आए तो सड़क पार करुं और वो देखो जो सामने की बिल्डिंग में जो छत पर बैठी हुई दिख रही है वह मेरी पत्नी है। मैं रोज उसी को देखकर हाथ हिलाता हूँ कि मुझे लेने के लिए लड़के को भेज दे। लेकिन लड़का सुनता ही नहीं है।

एक बार सड़क पार करने की हिम्मत अकेले ही की थी। एक मोटर साइकिल वाले ने टक्कर मार दी मेरी टाँग टूटते-टूटते बची। तब से यहीं बैठ कर सबर कर लेता हूँ, कभी तो उस पार जा पाऊंगा…………….वाह रे ट्रैफ़िक……….…….।

मंगलवार, 18 मई 2010

सड़क दुर्घटना से कोई सबक नहीं लेता

सड़क दुर्घटनाओं से कोई सबक नहीं लेता, हुआ यूं कि हम गए थे ताऊ शेखावाटी जी से मिलने, शाम को लगभग 5 बजे थे। 

घर से कोई 4 किलोमीटर निकले  होगें कि सामने हाई वे पर अचानक एक टाटा का छोटा हाथी सड़क पर लहराते हुए हमारी गाड़ी की तरफ़ आया, हमने सोचा कि आज फ़िर काम हो गया। एक एक्सीडेंट और झेलना पड़ेगा। 
सड़क दुर्घटना

इतने में ही उसके दांए तरफ़ के दोनो चक्के हवा में उठ गये और वह लहराता हुआ हमारी विपरीत दिशा में चला गया। सड़क के किनारे पेड़ों के बीच उसने दो पलटी खाई।

हमने तुरंत गाड़ी रोकी और दौड़ कर उनकी तरफ़ गए तो एक लड़का तो गाड़ी से बाहर आ गया था तथा दुसरा निकलने की प्रयास कर रहा था। उसे सहारा देकर निकाला, दोनो को किसी प्रकार की उपरी चोट नहीं आई थी और डर के मारे थर-थर कांप रहे थे।

मैने मोबाईल से उनके मालिक को दुर्घटना की सूचना दी और दो फ़ोटो लेकर निकल पड़ा रायपुर की ओर...................
सड़क दुर्घटना

राजकुमार सोनी दिल के भी बहुत अच्छे आदमी हैं रात उन्होने एक अपनी नई विधा का परि्चय दिया और कुछ गाने गाए।

हमने भी दुर्घटना को भूल कर गानों का आनंद लिया। "न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए" बस इसी अंदाज में गाने सुने, 
सड़क दुर्घटना

जब से उन्होने गाना गाया है तभी से उनके घर के बाहर भीड़ लगी है, वंस मोर वंस मोर के नारे लग रहे हैं, भीड़ को संभालने के लिए पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ी,

हमको वहां से निकलने में ही रात के एक बज गए, स्काच का सूरुर अपने यौवन पर था, हम तो निकल लिए और सोनी जी फ़ंस गए।

अब उनकी क्या हालत है यह तो हमने पूछा नही? समय मिलते ही पूछेंगे तब तक आप उनके गाए गीतों का आनंद लि्जिए,

हमने मोबाइल से उनके दो गाने रिकार्ड किए हैं , रिकार्डिंग अच्छी नही है ....... फ़िर भी आनंद लि्या जा सकता हैं


आ री निंदिया आ जा तू (राजकुमार सोनी)




रंग और नूर की बारात किसे पेश करुं

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

सड़क दुर्घटनाओं में अकाल युवा मौतें



मैं अपनी बाईक से शाम को घर आ रहा था। 

आज कल हमारी सड़क पर ट्रैफिक कुछ ज्यादा हो गया है। 

पहले इतना नहीं था और दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं। कुछ ना कुछ रोज घटित होता रहता है। 
सड़क दुर्घटना

मैं अपनी साईड में था सामने से दो मोटर सायकिलें भी आ रही थी। उनके पीछे एक ट्रक था। 

अचानक ट्रक ने पीछे वाली मोटरसायकिल को टक्कर मारी, वह साईड पटरी पर गिर गया. 

आवाज सुन कर उसके आगे वाली मोटर सायकिल वाले लोग रुके, 

पलक झपकते ही उस गिरे हुए सवार के पास पहुंचे तब तक उस ट्रक वाले ने उनकी मोटर सायकिल पर अपनी ट्रक चढ़ा दी, 
सड़क दुर्घटना

जिससे मोटर सायकिल चकना चूर हो गयी. मैं रुका और उस पहले सवार को अस्पताल पहुचाने के लिए थाने में फोन किया। 

ट्रक का ड्राईवर तुरंत ट्रक छोड़ कर रफू चक्कर हो गया। अगर वे बाईक सवार रुकते नहीं तो वे भी दुर्घटना के शिकार हो जाते, 

इसे ही कहते हैं "जाको राखे सांईया मार सके ना कोय" इस दुर्घटना से सम्बंधित चित्रों को भी आप देखिये।