जन्मदिन की पूर्व संध्या पर सैर के लिए निकला। अंधेरा हो चुका था। सैर के रास्ते में श्मशान पड़ता है। शाम को कभी वहीं एक पुलिया पर बैठ जाता हूँ। अंधेरे मे कुछ काली आकृतियों की हलचल दिखाई देने लगी। 15-20 लोगों का झुंड था। मैने सोचा कि शराबी या जुआड़ी होगें। क्योंकि सबसे मुफ़ीद जगह इन सब कार्यों के लिए श्मशान ही रहती है। नजदीक जाकर देखा तो एक शव किनारे रखा था और चिता सजाई जा रही थी। हिन्दु धर्म में दोनो वक्त मिलने के बाद अन्त्येष्टि क्रिया नहीं करते और मैने आज तक देखी भी नहीं थी। श्मशान घर के समीप होने के कारण रात को गाहे-बगाहे वहीं शरण लेता हुँ। मरघट की शांति अच्छी लगती है, लेकिन लोग उसे भी अशांत किए देते हैं। फ़िर भी मैं कोई एक कोना ढूंढ ही लेता हूँ। लगता है कि अभी कोई चिता के उठकर आएगा और मुझसे बतियाएगा। बरसों बीत गए लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ। अंधेरे में चिता सज गयी और मुखाग्नि दे दी गयी। जो लाए थे उसे वे अंधेरें आग लगा कर जलता छोड़ गए।
कल तक जो घर का मालिक था, जिसके इशारे पर घर चलता था, उसके निष्प्राण होते ही किसी भी परिजन को इतना सब्र नहीं था कि उसे रात भर घर में पनाह दे देते। जिससे उसका अंतिम संस्कार सुबह हो जाता। कल तक जिसे जिगर का टुकड़ा समझते थे, प्यार की कसमें खाई जाती थी। एक झटके में ही वह बेगाना हो जाता है। अपने सभी पराए हो जाते हैं। यही दुनिया है। यही संसार है, लोग जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाते हैं, लेकिन जीवन के बाद की कोई कसम नहीं खाता। यही द्वैत जन्म लेता है, दुनिया मिथ्या लगने लगती है। होने के बाद भी नहीं होती। ब्रह्म सत्य हो जाता है और जगत मिथ्या हो जाता है। जो हमारे सामने घट रहा है वह दृष्टिगोचर नहीं होता। क्योंकि मुर्दे कभी बोलते नहीं है, इसलिए उसके साथ जो चाहे वह कर लो। श्मशान में बैठ कर यही देखते आया हूँ। जीवन से विरक्ति नहीं होती पर सच से सामना हो जाता है, जिससे जीवन में कठोर से कठोर निर्णय लेने की क्षमता बढती है। भावुकता तिरोहित हो जाती है।
श्मशान से घर चला आया। सामने हाईवे पर तारकोल चढाया जा रहा था। पुरानी सड़क कुछ उखड़ गयी थी, उसे नया बनाया जा रहा था। यह लोकनिर्माण विभाग का वार्षिक कार्यक्रम है। थोड़ी देर खड़ा होकर काम करते मजदूरों को देखता रहा। गर्म तारकोल में वे खड़े होकर उससे जमा रहे थे। मशीने लगी हुई थी, एक इंजीनियर गेज लेकर तारकोल की गिट्टियों की मोटाई नाप रहा था और जहां गिट्टियाँ कम थी वहाँ और डलवा रहा था। रोलर उसे समतल करता जा रहा था। घर पहुंचा तो बच्चे मेरे जन्मदिन मनाने की तैयारी की चर्चा कर रहे थे। मै सोच रहा था कि प्रतिवर्ष जन्मदिन मनाने की प्रक्रिया सड़क पर तारकोल चढाने जैसी ही है। प्रतिवर्ष एक परत चढ जाती है समय की। जन्मदिन उसी का उत्सव मनाने की प्रक्रिया मात्र है। ताकि यह ज्ञात रखा जा सके कि कितना समय बाकी है, जिसमे सफ़र तय करना है। सोचते सोचते मुझे नींद आने लगती है अंग-प्रत्यंग शिथिल होने लगते हैं। जन्मदिन की पूर्व रात्रि में एक भरपूर नींद लेना चाहता हूँ जैसी शमशान मे ले रहा था चिता में लेटा हुआ मुर्दा। क्योंकि सुबह फ़िर जन्म लेना है और तबियत तरोताजा रहनी चाहिए। जिससे तारकोल की एक परत चढाने में आसानी हो।
आप सोच रहे होगें कि जन्मदिन जैसे शुभ अवसर पर मैं मुर्दो और श्मशान की बातें क्यों कर रहा हूँ? यह इसलिए की जन्म होने के बाद रास्ता वहीं जाकर खत्म होता है, चाहे पगडंडी से चल कर जाओ या राजमार्ग से होकर जाओ। पहुंचना वहीं है। कितने दिनों तक तुम शतुरमुर्ग की तरह रेत में गरदन धंसा कर धोखा दे पाओगे। जो अपने पैरों से चल कर वहां पहुंचता है वह सौभाग्यशाली ही होगा। लेकिन यह शायद किसी नसीब वाले के ही खाते में जाता होगा। वरना दुनिया इतने अनचाहे और अनजाने पाप कराती है कि अपने पैरों पर श्मशान चलकर जान संभव नहीं है। एक कदम उस मार्ग की ओर बढाने की तैयारी करनी है। इस तैयारी में सभी शामिल हैं। चिंतन करते हुए नींद आ जाती है। सहसा मुझे कोई झिंझोड़ कर गहरी नींद से जगाता है। नींद में दीदे फ़ाड़ कर देखता हूं तो 4-5 चेहरे दिखाई देते हैं और पापा हैप्पी बर्थ डे सुनाई देता है। रात के 12 बज चुके हैं और मुझे नींद से जगाकर पत्नी और बेटे-बेटियाँ जन्मदिन का उपहार देते हैं। कितना प्रेम करते है वे मेरे से। उनका यह अंदाज अभिभूत कर जाता है। यहाँ पर आने पर जगत मिथ्या नहीं लगता। सब सच हो जाता है। वास्तविक हो जाता है। मैं उपहार सिरहाने रख कर फ़िर सो जाता हूँ।
सुबह उठकर सैर के लिए जाता हूँ रास्ते में वही श्मशान आता है, रात को जलाई गयी चिता की राख पड़ी है। माटी का चोला माटी में समा गया। जहां से आया था वहीं चला गया। इसने भी न जाने कितने जन्मदिन मनाए होगें? न जाने इसकी माँ ने कितनी बलैयां ली होगीं? न जाने पत्नी बच्चों, भाईयों बहनों ने कितना चाहा होगा? जीवन रहते तक का ही साथ रहा था, सबने जीवन तक का वादा निभाया, अब रक्षाबंधन पर बहन राखी लिए फ़िरती रहेगी, भैया की कलाई होती तो बांधती। पत्नी भी तड़पती होगी, बिना किसी सहारे के बच्चों के पालन के लिए जीजिविषा से लड़ती होगी। यही दुनियादारी है, जो दुनिया में रहने तक ही जारी है। यही जीवन है जिसकी आखरी मंजिल श्मशान ही है। यहाँ की भरपुर चिरनिद्रा के पश्चात व्यक्ति को किसी न किसी रुप में पृथ्वी पर पुन: आना है तरोताजा होकर। जन्म लेना है, शतायु होने का आशीर्वाद पाकर शतायु होने की कामना करनी है। बस सफ़र यहीं तक का है, हमसफ़र भी यहीं लाकर छोड़ जाते हैं। जन्मदिन मनता रहता है जयंती के रुप में और अंतिम सफ़र मनता है पुण्यतिथि के रुप में। हम भी बढ चले हैं मंजिल की ओर एक कदम और्…………।












