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सोमवार, 4 जुलाई 2016

हम्पी का भव्य विरुपाक्ष मंदिर एवं उसका स्थापत्य - दक्षिण यात्रा 10

हम्पी के लैंडमार्क के रुप में यहां के विट्ठल मंदिर का पाषाण गरुड़रथ दिखाया जाता है। यह गरुड़रथ हम्पी की पहचान बन गया है। हम्पी पहुंचने से पहले मैने इस प्राचीन नगर के विस्तार के विषय में सोचा ही नहीं था। मेरी सोच से भी बढ़कर मैने इसे पाया। सबसे पहले हम विरुपाक्ष मंदिर गए। यह मंदिर सतत पूजित है, यहां अभी भी उत्सव एवं पूजा होती है। नगर विन्यास की दृष्टि से देखा जाए तो इसे वर्तमान आधुनिक शहरों की तरह ही बसाया गया है। विजयनगर साम्राज्य की यह राजधानी अपने समय में बहुत ही सुंदर रही होगी। खंडहर बताते हैं इस नगर का रुतबा क्या रहा होगा। यह राजधानी तुंगभद्रा नदी को मध्य में लेकर कई गाँव को मिलाकर बसी हुई है। 
विरुपाक्ष मंदिर का गोपुरम
हेमकुट पर्वत से घिरे पन्द्रहवीं सदी में निर्मित विरुपाक्ष मंदिर के मार्ग के दोनो तरफ़ प्राचीन बाजार के अवशेष दिखाई देते हैं प्रस्तर निर्मित स्तंभों पर छतें अभी तक मौजूद हैं। मार्ग के दोनो ओर दो तल्ला दुकानों की कतारें सुव्यवस्थित हैं। गंगाधर ने बताया कि इन दुकानों पर अतिक्रमण करके लोग निवास कर रहे थे, उन्हें पुरातत्व विभाग ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से हटाया। अन्यथा यह पुरातात्विक धरोहर भी खतरे में थी। ऐसा ही बाजार की बसाहट सिरपुर में देखने मिलती है। यहीं विरुपाक्ष मंदिर का विशाल गोपुरम दिखाई देता है। यह गोपुरम सात तल का है। पहला तल प्रस्तर निर्मित है, इसके बाद सभी तल ईंटों से बनाए गए हैं, जिन पर चूने से लिपाई की गई है। यहां के सभी मंदिर इसी तरह निर्मित हैं। उनकी छत तक प्रस्तर निर्मित है, उसके बाद के निर्माण ईंटों के हैं।
व्यवस्थित प्राचीन बाजार स्थल
गोपुरम से प्रवेश करने पर विशाल प्रांगण है, इसके बांई तरफ़ मंदिर का हाथी बंधा हुआ है, इसके पीछे पाकशाला है। मंदिर के हाथी के साथ उसके दो महावत भी सोए हुए हैं। उन्होने लेटे हुए आवाज दी और हाथी ने हमारे सिर पर सूंड़ रख कर आशीष दिया। मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए जल की व्यवस्था नालियों द्वारा की की गई है। यहां तुंगभद्रा नदी का स्वच्छ जल पाकशाला से होकर प्रवाहित होता है। चावल पसाने के लिए बड़े बड़े प्रस्तर के कुंड हैं और दाल पीसने के बड़े सिल लोढे भी यहां रखे हुए हैं। हांलाकि इनका प्रयोग अब नहीं किया जाता। परन्तु उत्सव के अवसर पर इस पाकशाला में हजारों श्रद्धालुओं का भोजन तैयार होता था।
मंदिर के गज द्वारा ब्लॉगर को आशीष
मंदिर के प्रांगण में दो स्तंभ दिखाई देते हैं, एक स्तंभ लकड़ी का बना हुआ है, दूसरा प्रस्तर निर्मित है। प्रस्तर निर्मित स्तंभ पर राजकीय चिन्ह है तथा लकड़ी का स्तंभ ध्वजा आदि के काम लिया जाता रहा होगा। मंदिर परिसर के सभी स्तंभ प्रतिमाओं एवं लता वल्लरियों से अलंकृत हैं। मंदिर के द्वार पर एक स्तंभ में नंदी अंकित है तथा उसके शीर्ष पर दोनो तरफ़ चाँद एवं सूर्य हैं तथा नीचे के भाग में स्थानीय लिपि में लेख अंकित है। अब यहां की लिपि न जानने के कारण अभिलेख से वंचित रह गए और सर्वे के दफ़्तर में भी जानकारी लेना भूल गए। 
विरुपाक्ष मंदिर का प्रांगण
विरुपाक्ष मंदिर के गर्भगृह के समक्ष विशाल प्रस्तर निर्मित मंडप है, इस मंडप के वितान पर पद्माकंन के साथ रंगों से चित्रकारी की गई है। गर्भगृह में स्वर्णरजत अलंकृति भगवान विरुपाक्ष विराजमान हैं। यहां के पुजारी ने गर्भगृह में ले जाकर मुझसे पूजा करवाई। विरुपाक्ष भगवान के दर्शन करवाए। विरुपाक्ष शिव का ही एक नाम है। विरुपाक्ष का अर्थ सुंदर नेत्रों वाला और भयंकर नेत्रों वाला भी हो सकता है। विरुपाक्ष भगवान के रुप के विषय में आगे चर्चा करेगें। 
भगवान विरुपाक्ष स्वामी हम्पी
गर्भगृह के दांई तरफ़ कक्ष में गोपुरम की विलोम छवि दिखाई देती है। इस कक्ष की भित्ति पर एक छिद्र से प्रकाश आता है और वही प्रकाश भित्ति पर विलोम छवि का निर्माण करता है। ठीक आधुनिक पिन होल कैमरे की छवि जैसे। पन्द्रहवीं सदी के वास्तुकारों को इस तकनीकि का ज्ञान था, यह बड़ी बात है। जबकि कैमरे का अविष्कार को उन्नीसवीं सदी में हुआ था। उसके बाद ही आगे चलकर कैमरा की तकनीक परिष्कृत होती गई और पिन होल कैमरे का जन्म हुआ। लगभग 300 फ़ुट से अधिक दूरी की छवि को एक छिद्र से भित्ति पर दिखाना उस सदी का बहुत बड़ा चमत्कार एवं क्रांतिकारी अविष्कार ही कहा जाएगा और यह तकनीक वर्तमान में भी अपना कार्य कर रही है।
पिन होल से गोपुरम का दृश्य
इस मंदिर के गोपुड़ा का निर्माण राजा कृष्णदेव राय ने करवाया था। दांई तरफ़ स्थिति गोपुरम से बाहर निकलने पर एक काफ़ी बड़ी पुष्करी है। इस पुष्करी का निर्माण पत्थरों से किया गया है। जिसमें चारों तरफ़ पैड़ियां बनी हुई है। धार्मिक कर्मकांड यहां पर सम्पन्न करवाए जाते हैं तथा गोपुरम की छवि पुष्करी के जल में दिखाई देती है। गोपुरम की भित्ति में मंदिर की तरफ़ राजा कृष्णदेव राय की खड़गधारी करबद्ध स्थानक मुद्रा में छवि अंकित की गई और इसके साथ उनका नाम भी खुदा हुआ है। इस तरह किसी राजा की छवि मुझे पहली बार किसी म।द्निर में दिखाई दी जिसके साथ उसका नाम भी अंकित हो। मंदिर निर्माण करवाने वाले राजा की पत्नी सहित छवि तो अनेक स्थानो पर मिलती है।
पुष्करणी एवं गोपुरम
विरुपाक्ष मंदिर तो यह अपनी तरह अनोखा मंदिर है। पन्द्रहवी शताब्दी में निर्मित इस मंदिर की पुर्व दिशा में विशाल नंदी विराजमान है, दक्षिण दिशा में में गणेश जी विशाल प्रतिमा है। इसके साथ  ही द्वार पर तीन मुखी नंदी भी स्थापित है। तीन मुखी नंदी मैने पहली बार देखा। यहां विष्णु के नृसिंह अवतार की विशाल प्रतिमा है। विरुपाक्ष मंदिर तल से शिखर तक पचास मीटर ऊंचा है। इस प्रांगण में विरुपाक्ष मंदिर से भी प्राचीन कई छोटे छोटे मंदिर है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में राजा कृष्णदेव राय ने अपने अभिशेक के समय गोपुड़ा का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को पंपापति नाम से भी जाना जाता है। अर्थात इस नगर का प्राचीन नाम पंपा था एवं इसके मालिक पंपापति अर्थात विरुपाक्ष भगवान हैं।
विरुपाक्ष मंदिर का मंडप एवं गर्भगृह 
प्रत्येक प्रसिद्ध स्थान के कुछ न कुछ किंवदन्तियां भी जुड़ी रहती हैं। इसके साथ किंवदंती है कि भगवान विष्णु ने इस जगह को अपने रहने के लिए कुछ अधिक ही बड़ा समझा और अपने घर वापस लौट गए। विरुपाक्ष मन्दिर में भूमिगत शिव मन्दिर भी है। मन्दिर का बड़ा हिस्सा पानी के अन्दर समाहित है, इसलिए वहाँ कोई नहीं जा सकता। बाहर के हिस्से के मुक़ाबले मन्दिर के इस हिस्से का तापमान बहुत कम रहता है। हालांकि हम्पी एक प्राचीन शहर है और इसका जिक्र रामायण में भी किया गया है और इतिहासकारों के अनुसार इसे किष्किन्धा के नाम से बुलाया जाता था, वास्तव में 13वीं से 16वीं सदी तक यह शहर विजयनगर राजाओं की राजधानी के रुप में समृद्ध हुआ।
राजा कृष्णदेव राय की प्रतिमा
विरूपाक्ष नाम भी वेद प्रसिद्ध है। महानारायाण उपनिषद् विरूपाक्ष को बार–बार प्रणाम करती है– विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नम:। विषमणि विविधशक्तीफीन्यक्षीणि विलक्षणानि वाक्षाणि। हर! हेमकूटशैले लिंगे व्यक्तोSस्यतो विरूपाक्ष:।। अर्थात् हे हर! आपके लोचंन विषम है, आप विविध शक्तियों वाले हैं, आपकी इन्द्रियाँ विलक्षण है और आप हेमकूट पर्वत पर विरूपाक्ष लिंग रूप से स्थापित हैं अतएव आप विरूपाक्ष कहे जाते हैं। वस्तुत: हमारी इन्द्रियाँ विषय को देखती हैं और शिव की इन्द्रियाँ चेतन को देखकर मानो विषय को नंगा कर देती हैं इसलिए उन्हें विरूपाक्ष कहा जाता है। …… विरुपाक्ष मंदिर दर्शन कर हम विट्ठल मंदिर की ओर चल दिए। जारी है … आगे पढें।

शनिवार, 31 जुलाई 2010

क्या भविष्य दिखाने वाले कैमरे भी आ सकते हैं?

कैमरा मानव के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान बनाता जा रहा है, एक समय था कि किसी बड़े शहर में दो चार कैमरे होते थे, वर्तमान में हर आदमी के हाथ में कैमरा है। मानव का व्यक्ति चित्र से लगाव तब से रहा होगा, जिस दिन उसने सबसे पहले पानी में अपनी शक्ल देखी होगी। उसके मन में लम्हों को संजोने की इच्छा प्रगट हुई होगी।

रंग मिले होगें तो रंगों ने उसके जीवन में रंग भरा होगा। जिस तरह प्रकृति ने रंग बिखेर रखे हैं उन्हे समेटने की चाह जगी होगी और फ़िर एक अनगढ़ से चित्र का जन्म हुआ होगा।

रंग सीमित होगें तो भावनाएं असीमित होगीं जिन्हें वह समेट लेना चाहता होगा। पेशे से चित्रकार बनकर बस रंगों से खेलता ही रहा होगा। मेरे मन में रंगों से खेलने की इच्छा बचपन से ही प्रबल थी। जब रंग मिलते थे उनमें खो जाता था। खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी।

अनगढ़ को गढ़ते रहता था। व्यक्तिचित्र असल जैसे नहीं बनते थे। आँख और नाक बनाने में गड़बड़ हो ही जाती थी। मैं चाहता था कि कोई ऐसा सहयोगी यंत्र हो जो सही-सही चित्रण कर दे।

जब यही सोच किसी के दिमाग में आई होगी तो शायद इसे ही सही ढंग से चित्रित करने के लिए कैमरे का जन्म हुआ होगा।

मैने सबसे पहले जीवन में कैमरा बुआ जी की शादी में देखा था। फ़ो्टोग्राफ़र कैमरे में उपर से झांक कर देखता, तब चित्र लेता था। लोग फ़ोटोग्राफ़र के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते रहते।

श्वेत-श्याम चित्रों का जमाना था। उसके बाद मैने कैमरा अपने स्कूल में देखा, जब फ़ोटोग्राफ़र पांचवी कक्षा की परीक्षा के बाद स्मृति के लिए चित्र खींचने आया। उस समय प्रति विद्यार्थी 2 रुपए लिए गए थे चित्र के। बस अपने चित्रों को हम सबको दिखाते घूमते थे। मेरा वह चित्र पानी से खराब हो गया। लेकिन एक मित्र घर में मैने देखा है उसे, समय मिलने पर लेकर आऊंगा।

भाई साब कैमरा लेकर आए थे क्लिक नाम था उसका। उसमें फ़्लैश लाईट नहीं थी, इसलिए धूप में चित्र खींचे जाते थे।

उस समय से ही कैमरा मेरे हाथ में रहा है। लेकिन बहुत मंहगा शौक था। क्लिक में 12 चित्र खींचे जाते थे। इंदु का रोल 18 रुपए का और बोरो का रोल 20 रुपए का आता था, मैं बोरो का ही रोल लेता था।

गारंटी नहीं थी कि सारे 12 चित्र ही आ जाएं, कभी बटन दब जाता तो 8-10 चित्र ही मान कर चलता था। मेरे द्वारा खींचे गए उस समय कि सभी चित्र घर बदलते समय पुराने घर में ही रह गए और नए बाशिंदों ने उन्हें ठिकाने लगा दिया।

बड़ी तकलीफ़ होती है, आज भी सोचकर कि मेरे चित्र किसी के ईर्ष्या की भेंट चढ गए। अगर मुझे लौटा दिए जाते तो क्या बिगड़ता उनका? शायद यही देश के बंटवारे के समय भी हुआ होगा।

इसके बाद क्लिक 4 आया। इस कैमरे के साथ फ़्लेश लगाने की सुविधा थी। पेंसिल सेल लगाने से फ़्लैश काम करता था। इसका एक फ़ायदा यह भी था कि लोगों पर सिर्फ़ फ़्लेश चमका कर बेवकूफ़ बनाया जा सकता था।

इस सुविधा का हम बहुत मजा लेते थे। कोई अगर चित्र खिंचाने के लिए पीछे पड़ जाता था तो हम सिर्फ़ फ़्लैश चमका देते थे। वह भी खुश और हम भी खुश कि एक स्नेप बच गया।

कुछ दिनों बाद इस कैमरे के लिए कलर  फ़िल्म भी आने लगी। बस इसके साथ कैमरे की दुनिया में क्रांति की शुरुवात हो गयी। रंगीन चित्र आने लगे इसे 120 (वन-ट्वेन्टी) का रोल कहते थे। यह भी 12 चित्र ही खींचता था। कलर रोल बहुत मंहगा था। दो तीन रोल ही लाया था।

उस समय कलर रोल की धुलाई रायपुर में नहीं नागपुर में होती थी। वहीं कलर लैब था। 10 दिनों में चित्र बनकर आते, रायपुर में स्टुडियो वाले रोल सकेल कर नागपुर बस से भेजते थे।

इसके बाद 35 एम.एम. का कैमरा आ गया। यह बहुत अच्छा था उपयोग करने में। रंगीन चित्र और श्वेत-श्याम दोनो ही खींचता था। जितना पैसा आपके पास है उतने का रोल डलवा लो। 36-40 चित्र खींचने की गारंटी थी।

रोल लगाने की कुशलता पर निर्भर करता था कि आप रोल लगाने के लिए रोल कितना बाहर खींचते हैं। अगर रोल को ज्यादा बाहर निकाल लिया तो चित्रों की संख्या कम हो जाती थी।

इसके बाद आया एक स्लिम कैमरा,जो कि बहुत छोटा था। इसे 110 (वन-टेन) नाम दिया गया था। इसमें फ़्लेश लगा हुआ था। 24 फ़ोटो खींचता था। इस कैमरे का मैने बहुत उपयोग किया। दिखने में भी अच्छा था। लेकिन इसके लैंस में दम नही था। चित्रों में उतनी गहराई नहीं आती थी जितनी 35 एम एम के कैमरे में आती थी।

हमें तो उस समय लैंस के नम्बर का भी पता नहीं था। कैमरा भाई कैमरा, बस फ़ोटो खीचो और मजे लो। कुल मिलाकर दूर के चित्र तो कपड़ों से पहचाने जाते, कि यह फ़लाना है और यह ढेकाना है।

फ़िर हमने खरीदा याशिका का कैमरा, इसमें सेल्फ़ टाईमर था, सामने रखो और टाईम सेट करके खड़े हो जाओ। अपने आप ही चित्र खींच देता था, एक खूबी और थी इसमें कि चित्र खींचने के बाद रोल स्वत: सरक जाता था, इसे घूमाने की जरुरत नहीं पड़ती थी।

बड़ा अद्भुत था यह। नहीं तो फ़ोटोग्राफ़र चित्र में कहां आ पाता है। इस कैमरे ने फ़ोटोग्राफ़र को स्वयं का चित्र लेने की सुविधा दी, जिसे आजकल "सेल्फ़ी" कहा जाता है। यह कैमरा अभी तक मेरे पास है, एक दिन उदय ने इसे गिरा दिया। जिससे उसकी मोटर में कुछ खराबी आ गयी। मैने इसे रखा है यादगार के तौर पर, दो कैमरे कबाड़ की भेंट चढ गए।

श्रीमती जी ने मेरे पीछे से घूरे में ठिकाने लगा दिया कि फ़ालतु कबाड़ सकेल रखा है। आगरा में एक फ़ोटोग्राफ़र ने मुझे बताया कि रोल वाले कैमरे के चित्र 15 मेगा पिक्सल के होते हैं। उसका यह फ़ंडा मेरी समझ में नही आया।

इसके बाद आ चुका है नए जमाने का कैमरा। इसमें कोई झंझट नहीं, रोल की जरुरत नहीं, जितना चाहो उतना फ़ोटो लेते जाओ। इसने तो फ़ोटो स्टुडियो और कलरलैब वालों की दुकानदारी ही चौपट कर दी। अब हर आदमी के हाथ में कैमरा है।

स्टुडियों वालो का सबसे ज्यादा नुकसान तो मोबाईल कैमरे ने कि्या है। स्टिल, आडियो, वीडियो सब ले लेता है। एक छोटी सी चिप में हजारों चित्र रख लिजिए। जब चाहे तब इस्तेमाल किजिए।

पुराने कैमरों का जमाना चला गया। रंगीन चित्र होते हैं लेकिन जो मजा ब्लेक एन्ड व्हाईट चित्रों का है वह रंगीन में कहां? इन कैमरों के माध्यम से हम अपनी स्मृतियों को संजोकर रखते हैं। चित्र देखकर उन बीते हुए पलों को याद करते हैं।

कैमरा सिर्फ़ वर्तमान ही दिखाता है उसका चित्रण करता है, हो सकता कि अब आगे ऐसा कैमरा आ जाए जो भविष्य भी बता दे?

 फ़ोटो:- गुगल से साभार