कैमरा मानव के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान बनाता जा रहा है, एक समय था कि किसी बड़े शहर में दो चार कैमरे होते थे, वर्तमान में हर आदमी के हाथ में कैमरा है। मानव का व्यक्ति चित्र से लगाव तब से रहा होगा, जिस दिन उसने सबसे पहले पानी में अपनी शक्ल देखी होगी। उसके मन में लम्हों को संजोने की इच्छा प्रगट हुई होगी।
रंग मिले होगें तो रंगों ने उसके जीवन में रंग भरा होगा। जिस तरह प्रकृति ने रंग बिखेर रखे हैं उन्हे समेटने की चाह जगी होगी और फ़िर एक अनगढ़ से चित्र का जन्म हुआ होगा।
रंग सीमित होगें तो भावनाएं असीमित होगीं जिन्हें वह समेट लेना चाहता होगा। पेशे से चित्रकार बनकर बस रंगों से खेलता ही रहा होगा। मेरे मन में रंगों से खेलने की इच्छा बचपन से ही प्रबल थी। जब रंग मिलते थे उनमें खो जाता था। खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी।
अनगढ़ को गढ़ते रहता था। व्यक्तिचित्र असल जैसे नहीं बनते थे। आँख और नाक बनाने में गड़बड़ हो ही जाती थी। मैं चाहता था कि कोई ऐसा सहयोगी यंत्र हो जो सही-सही चित्रण कर दे।
जब यही सोच किसी के दिमाग में आई होगी तो शायद इसे ही सही ढंग से चित्रित करने के लिए कैमरे का जन्म हुआ होगा।
रंग मिले होगें तो रंगों ने उसके जीवन में रंग भरा होगा। जिस तरह प्रकृति ने रंग बिखेर रखे हैं उन्हे समेटने की चाह जगी होगी और फ़िर एक अनगढ़ से चित्र का जन्म हुआ होगा।
रंग सीमित होगें तो भावनाएं असीमित होगीं जिन्हें वह समेट लेना चाहता होगा। पेशे से चित्रकार बनकर बस रंगों से खेलता ही रहा होगा। मेरे मन में रंगों से खेलने की इच्छा बचपन से ही प्रबल थी। जब रंग मिलते थे उनमें खो जाता था। खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी।
अनगढ़ को गढ़ते रहता था। व्यक्तिचित्र असल जैसे नहीं बनते थे। आँख और नाक बनाने में गड़बड़ हो ही जाती थी। मैं चाहता था कि कोई ऐसा सहयोगी यंत्र हो जो सही-सही चित्रण कर दे।
जब यही सोच किसी के दिमाग में आई होगी तो शायद इसे ही सही ढंग से चित्रित करने के लिए कैमरे का जन्म हुआ होगा।
मैने सबसे पहले जीवन में कैमरा बुआ जी की शादी में देखा था। फ़ो्टोग्राफ़र कैमरे में उपर से झांक कर देखता, तब चित्र लेता था। लोग फ़ोटोग्राफ़र के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते रहते।
श्वेत-श्याम चित्रों का जमाना था। उसके बाद मैने कैमरा अपने स्कूल में देखा, जब फ़ोटोग्राफ़र पांचवी कक्षा की परीक्षा के बाद स्मृति के लिए चित्र खींचने आया। उस समय प्रति विद्यार्थी 2 रुपए लिए गए थे चित्र के। बस अपने चित्रों को हम सबको दिखाते घूमते थे। मेरा वह चित्र पानी से खराब हो गया। लेकिन एक मित्र घर में मैने देखा है उसे, समय मिलने पर लेकर आऊंगा।
भाई साब कैमरा लेकर आए थे क्लिक नाम था उसका। उसमें फ़्लैश लाईट नहीं थी, इसलिए धूप में चित्र खींचे जाते थे।
श्वेत-श्याम चित्रों का जमाना था। उसके बाद मैने कैमरा अपने स्कूल में देखा, जब फ़ोटोग्राफ़र पांचवी कक्षा की परीक्षा के बाद स्मृति के लिए चित्र खींचने आया। उस समय प्रति विद्यार्थी 2 रुपए लिए गए थे चित्र के। बस अपने चित्रों को हम सबको दिखाते घूमते थे। मेरा वह चित्र पानी से खराब हो गया। लेकिन एक मित्र घर में मैने देखा है उसे, समय मिलने पर लेकर आऊंगा।
भाई साब कैमरा लेकर आए थे क्लिक नाम था उसका। उसमें फ़्लैश लाईट नहीं थी, इसलिए धूप में चित्र खींचे जाते थे।
उस समय से ही कैमरा मेरे हाथ में रहा है। लेकिन बहुत मंहगा शौक था। क्लिक में 12 चित्र खींचे जाते थे। इंदु का रोल 18 रुपए का और बोरो का रोल 20 रुपए का आता था, मैं बोरो का ही रोल लेता था।
गारंटी नहीं थी कि सारे 12 चित्र ही आ जाएं, कभी बटन दब जाता तो 8-10 चित्र ही मान कर चलता था। मेरे द्वारा खींचे गए उस समय कि सभी चित्र घर बदलते समय पुराने घर में ही रह गए और नए बाशिंदों ने उन्हें ठिकाने लगा दिया।
बड़ी तकलीफ़ होती है, आज भी सोचकर कि मेरे चित्र किसी के ईर्ष्या की भेंट चढ गए। अगर मुझे लौटा दिए जाते तो क्या बिगड़ता उनका? शायद यही देश के बंटवारे के समय भी हुआ होगा।
गारंटी नहीं थी कि सारे 12 चित्र ही आ जाएं, कभी बटन दब जाता तो 8-10 चित्र ही मान कर चलता था। मेरे द्वारा खींचे गए उस समय कि सभी चित्र घर बदलते समय पुराने घर में ही रह गए और नए बाशिंदों ने उन्हें ठिकाने लगा दिया।
बड़ी तकलीफ़ होती है, आज भी सोचकर कि मेरे चित्र किसी के ईर्ष्या की भेंट चढ गए। अगर मुझे लौटा दिए जाते तो क्या बिगड़ता उनका? शायद यही देश के बंटवारे के समय भी हुआ होगा।
इसके बाद क्लिक 4 आया। इस कैमरे के साथ फ़्लेश लगाने की सुविधा थी। पेंसिल सेल लगाने से फ़्लैश काम करता था। इसका एक फ़ायदा यह भी था कि लोगों पर सिर्फ़ फ़्लेश चमका कर बेवकूफ़ बनाया जा सकता था।
इस सुविधा का हम बहुत मजा लेते थे। कोई अगर चित्र खिंचाने के लिए पीछे पड़ जाता था तो हम सिर्फ़ फ़्लैश चमका देते थे। वह भी खुश और हम भी खुश कि एक स्नेप बच गया।
कुछ दिनों बाद इस कैमरे के लिए कलर फ़िल्म भी आने लगी। बस इसके साथ कैमरे की दुनिया में क्रांति की शुरुवात हो गयी। रंगीन चित्र आने लगे इसे 120 (वन-ट्वेन्टी) का रोल कहते थे। यह भी 12 चित्र ही खींचता था। कलर रोल बहुत मंहगा था। दो तीन रोल ही लाया था।
उस समय कलर रोल की धुलाई रायपुर में नहीं नागपुर में होती थी। वहीं कलर लैब था। 10 दिनों में चित्र बनकर आते, रायपुर में स्टुडियो वाले रोल सकेल कर नागपुर बस से भेजते थे।
इस सुविधा का हम बहुत मजा लेते थे। कोई अगर चित्र खिंचाने के लिए पीछे पड़ जाता था तो हम सिर्फ़ फ़्लैश चमका देते थे। वह भी खुश और हम भी खुश कि एक स्नेप बच गया।
कुछ दिनों बाद इस कैमरे के लिए कलर फ़िल्म भी आने लगी। बस इसके साथ कैमरे की दुनिया में क्रांति की शुरुवात हो गयी। रंगीन चित्र आने लगे इसे 120 (वन-ट्वेन्टी) का रोल कहते थे। यह भी 12 चित्र ही खींचता था। कलर रोल बहुत मंहगा था। दो तीन रोल ही लाया था।
उस समय कलर रोल की धुलाई रायपुर में नहीं नागपुर में होती थी। वहीं कलर लैब था। 10 दिनों में चित्र बनकर आते, रायपुर में स्टुडियो वाले रोल सकेल कर नागपुर बस से भेजते थे।
इसके बाद 35 एम.एम. का कैमरा आ गया। यह बहुत अच्छा था उपयोग करने में। रंगीन चित्र और श्वेत-श्याम दोनो ही खींचता था। जितना पैसा आपके पास है उतने का रोल डलवा लो। 36-40 चित्र खींचने की गारंटी थी।
रोल लगाने की कुशलता पर निर्भर करता था कि आप रोल लगाने के लिए रोल कितना बाहर खींचते हैं। अगर रोल को ज्यादा बाहर निकाल लिया तो चित्रों की संख्या कम हो जाती थी।
इसके बाद आया एक स्लिम कैमरा,जो कि बहुत छोटा था। इसे 110 (वन-टेन) नाम दिया गया था। इसमें फ़्लेश लगा हुआ था। 24 फ़ोटो खींचता था। इस कैमरे का मैने बहुत उपयोग किया। दिखने में भी अच्छा था। लेकिन इसके लैंस में दम नही था। चित्रों में उतनी गहराई नहीं आती थी जितनी 35 एम एम के कैमरे में आती थी।
हमें तो उस समय लैंस के नम्बर का भी पता नहीं था। कैमरा भाई कैमरा, बस फ़ोटो खीचो और मजे लो। कुल मिलाकर दूर के चित्र तो कपड़ों से पहचाने जाते, कि यह फ़लाना है और यह ढेकाना है।
रोल लगाने की कुशलता पर निर्भर करता था कि आप रोल लगाने के लिए रोल कितना बाहर खींचते हैं। अगर रोल को ज्यादा बाहर निकाल लिया तो चित्रों की संख्या कम हो जाती थी।
इसके बाद आया एक स्लिम कैमरा,जो कि बहुत छोटा था। इसे 110 (वन-टेन) नाम दिया गया था। इसमें फ़्लेश लगा हुआ था। 24 फ़ोटो खींचता था। इस कैमरे का मैने बहुत उपयोग किया। दिखने में भी अच्छा था। लेकिन इसके लैंस में दम नही था। चित्रों में उतनी गहराई नहीं आती थी जितनी 35 एम एम के कैमरे में आती थी।
हमें तो उस समय लैंस के नम्बर का भी पता नहीं था। कैमरा भाई कैमरा, बस फ़ोटो खीचो और मजे लो। कुल मिलाकर दूर के चित्र तो कपड़ों से पहचाने जाते, कि यह फ़लाना है और यह ढेकाना है।
फ़िर हमने खरीदा याशिका का कैमरा, इसमें सेल्फ़ टाईमर था, सामने रखो और टाईम सेट करके खड़े हो जाओ। अपने आप ही चित्र खींच देता था, एक खूबी और थी इसमें कि चित्र खींचने के बाद रोल स्वत: सरक जाता था, इसे घूमाने की जरुरत नहीं पड़ती थी।
बड़ा अद्भुत था यह। नहीं तो फ़ोटोग्राफ़र चित्र में कहां आ पाता है। इस कैमरे ने फ़ोटोग्राफ़र को स्वयं का चित्र लेने की सुविधा दी, जिसे आजकल "सेल्फ़ी" कहा जाता है। यह कैमरा अभी तक मेरे पास है, एक दिन उदय ने इसे गिरा दिया। जिससे उसकी मोटर में कुछ खराबी आ गयी। मैने इसे रखा है यादगार के तौर पर, दो कैमरे कबाड़ की भेंट चढ गए।
श्रीमती जी ने मेरे पीछे से घूरे में ठिकाने लगा दिया कि फ़ालतु कबाड़ सकेल रखा है। आगरा में एक फ़ोटोग्राफ़र ने मुझे बताया कि रोल वाले कैमरे के चित्र 15 मेगा पिक्सल के होते हैं। उसका यह फ़ंडा मेरी समझ में नही आया।
बड़ा अद्भुत था यह। नहीं तो फ़ोटोग्राफ़र चित्र में कहां आ पाता है। इस कैमरे ने फ़ोटोग्राफ़र को स्वयं का चित्र लेने की सुविधा दी, जिसे आजकल "सेल्फ़ी" कहा जाता है। यह कैमरा अभी तक मेरे पास है, एक दिन उदय ने इसे गिरा दिया। जिससे उसकी मोटर में कुछ खराबी आ गयी। मैने इसे रखा है यादगार के तौर पर, दो कैमरे कबाड़ की भेंट चढ गए।
श्रीमती जी ने मेरे पीछे से घूरे में ठिकाने लगा दिया कि फ़ालतु कबाड़ सकेल रखा है। आगरा में एक फ़ोटोग्राफ़र ने मुझे बताया कि रोल वाले कैमरे के चित्र 15 मेगा पिक्सल के होते हैं। उसका यह फ़ंडा मेरी समझ में नही आया।
इसके बाद आ चुका है नए जमाने का कैमरा। इसमें कोई झंझट नहीं, रोल की जरुरत नहीं, जितना चाहो उतना फ़ोटो लेते जाओ। इसने तो फ़ोटो स्टुडियो और कलरलैब वालों की दुकानदारी ही चौपट कर दी। अब हर आदमी के हाथ में कैमरा है।स्टुडियों वालो का सबसे ज्यादा नुकसान तो मोबाईल कैमरे ने कि्या है। स्टिल, आडियो, वीडियो सब ले लेता है। एक छोटी सी चिप में हजारों चित्र रख लिजिए। जब चाहे तब इस्तेमाल किजिए।
पुराने कैमरों का जमाना चला गया। रंगीन चित्र होते हैं लेकिन जो मजा ब्लेक एन्ड व्हाईट चित्रों का है वह रंगीन में कहां? इन कैमरों के माध्यम से हम अपनी स्मृतियों को संजोकर रखते हैं। चित्र देखकर उन बीते हुए पलों को याद करते हैं।
कैमरा सिर्फ़ वर्तमान ही दिखाता है उसका चित्रण करता है, हो सकता कि अब आगे ऐसा कैमरा आ जाए जो भविष्य भी बता दे?
फ़ोटो:- गुगल से साभार









