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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

झांकी फ़ेसबुकिस्तान की

मेलों की अपनी मौज है, नौटंकी, नाच-गाने, डांस पार्टियाँ, चना-चबेना, बाबा-बाबी, साधु-साधिन, मंदिर-शिवाला, गरम-ठंडा, पुलिस का डंडा आदि की फ़ौज है। साथ ही गुम इंसान की खोज में होती उद्घोषणाएं, मेले को पूर्ण रुप प्रदान कर परवान चढाएं। नदी तट पर जजमानों की जेब खाली कराते पंडे, पंडों की पहचान में लहराते झंडे और चोर-उचक्कों एवं पाकिटमारों की तलाश करते पुलिसिया डंडे, मेले की मौज हैं। धक्का-मुक्की होने से जुतम पैजार होने पर हाथ की सफ़ाई को तैयार युवकों के साथ बुढऊ भी हाथ साफ़ कर लेने का मौका नहीं चूकते। मेला घूमने की साध लिए स्वर्गारोहण को तैयार डुकरिया, टिकुली-फ़ुंदरी सांटे, नैनों से वार कर घायल करती नचनिया का ठुमका पटना को हिलाने के लिए काफ़ी है। मेला मे रेला कराने के लिए एक झुमका गिराना काफ़ी है।

ये मेले तो वर्ष में एक बार नियत तिथि, स्थान एवं समय पर भरते हैं। एक ऐसा आभासी मेला है जिसमें सतत् रेले चलते हैं। जहाँ मेले के सारे रंग दिख जाएगें। जहाँ इंटरनेट कनेक्ट हो जाए, इसे वहीं लगा हुआ पाएगें। इस मेले का नहीं कोई ठौर ठिकाना, कोई अपना है पराया है और बेगाना। यह मेला सोशल मीडिया मेला या आभासी मेला कहलाता है। 24X7 कल्लाक चलता है रुकता नहीं कभी, सबका मन बहलाता है।। कब दिन होता और कब रात होती, पता ही नहीं चलता। इसे मैं फ़ेसबुकवा मेला कहता हूँ, जो रात 2 बजे भी जमता। यहाँ मेलार्थी खा पीकर विचरण करते मिल जाएगें। कुछ तो ऐसे फ़ेसबुकिए हैं कि जिनकी बत्ती सदा हरी रहती है। बासंती सम्मिलन मुद्रा में सदा हरियाए रहते हैं। जहाँ देखी कबूतरी लाईन लगाए रहते हैं। चल छैंया छैंया छैया ये हिन्दी फ़ेसबुक है भगिनी-भैया…

मेले का प्रारंभ सुप्रभात से होता है, एक सज्जन 6 बजे फ़ोटो चेपता है। फ़िर दो लाईनों की कविता पर इठलाता है। तब तक 8 बज जाता है, उनका बेटा आता है। बाप की लगाई फ़ोटुओं पर लाईक चटकाता है, अपना पुत्र धर्म निभाता है। बाप-बेटे बारी-बारी मौज लेते हैं। बहती गंगा में स्नान के साथ कच्छे भी धोते हैं। इसके बाद शुरु होता है अखबारी कतरनों का दौर, काट-काट फ़ैलाते हैं चहूँ ओर। उनको लगता है महत्वपूर्ण खबर गर नहीं फ़ैलाई, फ़ेसबुकिए खबरों से वंचित रह जाएगें, जो अखबार नहीं खरीदते वे खबरें कहां से पाएगें। इन खबरों के बीच एक सज्जन संघियों का आव्हान कर हुए लट्ठम लट्ठा, खफ़ा इस तरह हैं कि लाठी टूटे या लट्ठा-पट्टा। फ़टफ़टिया महाराज झोले से मुंदरी-माला बेचने निकाल रहे हैं। तब तक भविष्य वक्ता भी पूजा पाठ करके अपनी चौकी संभाल रहे हैं। परबतिया भौजी का जागरण पर प्रसिद्ध डिरामा शुरु हो जाता है। बंदर डमरु बजा बजा कर मदारी को नचाता है। बिना टिकिट झांकी में लोटावन साव लोटा धरे नदिया तीर में बैठे हैं, कहते हैं मोह माया संसार त्यागो, ब्रम्ह सत्य बाकी झूठे हैं।

वाल पर कवियत्रियों द्वारा काव्य पाठ हो, मेला धर्मी टूट के पड़ते है ऐसे, सरकार की किसी योजना के अंतर्गत मुफ़्त शक्कर तेल बंट रहा हो जैसे। दो लाईनों की कविता पर हजारों लाईक और सैकड़ों कमेंट आ जाते हैं। कहीं लाईक के चक्कर में यज्ञोपवीत संस्कार के लिए तैयार बटूक दंड कमंडल धरे रह जाते हैं। कहीं पर मुल्ला मौलवियों के फ़तवे से हलकान परेशान चचा रमजानी दिखाई दे जाते हैं, डबल बेड बेचकर, सिंगल बेड खरीद कर अपनी खाल बचाते हैं। चाट का ठेला तो फ़ुलकी का रेला, तिरछी नजरों से होता बवेला, जूतों की सेल, छुकछुक रेल, बच्चों की धमाचौकड़ी, बूढों के सहारे की लकड़ी, इलाज के लिए सहायता मांगते लोग, मंदिर के चंदा की रसीद और खाटू वाले का बाबा का छप्पन भोग। कहीं अंखियों से गोली मारे और चैटियाते महिला वेष धारी पुरुष तो कहीं वेब कैम की मौज लेते बहन जैसे भाई ( दोनो लिंगों में फ़िट) कहीं होती सगाई तो कहीं होता क्रंदन, दुहाई है दुहाई।

महा साहित्यकारों के दल-दल तो कहीं दबंग नेता जोर सबल, कहीं बवाल, कहीं ख्याल, कहीं ठप्पा, कहीं ठुमरी, कहीं कुरता, कहीं कमरी। कहीं किकणी (लघु घंटिका) की रुनझुन तो कोई कोने से ताक रहा गुमसुम। कोई आत्ममुग्ध, कोई गंगा स्नानी शुद्ध, कोई बुद्ध, जेल से कमेंट करता निरुद्ध। गोंसईया को गरियाती गोंसाईन तो कहीं बनी-ठनी पतुरिया, हवा में उड़ता लहरिया। जीव जुड़ावन गोठ तो कहीं मुंग के संग मोठ। विमोचित होते कविता संग्रह, तो कहीं बिकते विग्रह, कहीं रुठे हुए ग्रह तो कहीं साठी सुंदरियों का सुमधुर नयनाग्रह। कहीं जवानी के चित्र लगाए आत्ममुग्ध बूढे-बूढिया कहीं डायमंड फ़ेसियल कराए कौंवे तो कहीं उड़ती चिड़िया। सरकार को गरियाती नौजवानी तो कहीं टपकता आँखों से पानी। कोई चढा टंकी पर तो कोई फ़िदा है मंकनी पर। कोने में खड़ी डंकनी की ढेंचू-ढेंचू तो किसी वाल पोस्ट हो जाती टिप्पणी खेंचू-खेंचू।  

रामखिलावन के बाबू जहाँ कहीं भी चले आओ, हम बड़का पुल पर तोहार इंतजार करित हैं, अरे नुनवा हम कितना देर से खोज रहे हैं, जल्दी पुलिस चौकी के पास चले आओ, तोहार माई बहुत रो रही हैं …… पल पल में खोया-पाया उद्घोषणा होती है जारी, भैया की खोज में व्याकूल है नारी। कहीं दादी की खोज में पतोहू तो कहीं नाती खोजता बिसाहू। पुलिस भी मौके पर बनती है सहाय। जिसका खो गया अपना, होता वो असहाय। बेटे-बेटी की होती है खोया पाया में एन्ट्री, एक ही जगह सिमट जाता है सारा कंट्री। आँखों ही आँखों होते हैं इशारे, चल भाग चले पूरब की ओर कहते लिव इन रिलेशन को तैयार बेचारे। लंठ पति की होती बेलनटाईन पिटाई, कहीं उघड़ते अंतर संबंधों पर होती क्राई। कहीं उबला चना तो कहीं भेजा फ़्राई। यही फ़ेसबुकिया मेला है भाई। बहनापा ओढे दिखाई देते हैं कुछ नर, ये नारी सानिध्य में सुकून पाते हैं, पत्नी संग लायसेंसी फ़ोटो लगाते हैं, विवाहित होने का चर्चा फ़ैलाते हैं फ़िर मजे से मौज लेते हैं ये नर, घोड़े के भेष में फ़िरते हैं खर। ये फ़ेसबुकिया मेला है बस तू निरंतर चर निरंतर चर। 

संझा को खुल गई फ़ेसबुकिया क्लास, विज्ञान पढाते मास्टर जी बच्चों को, कोई ज्ञानी समझाता गूढ़ ज्ञान अकल के कच्चों को। कोई ले घिस कर चंदन माथे पर सांट रहा कोई समाजवाद और साम्यवाद पर लेक्क्चर छांट रहा। कोई धर्म के नाम पर ज्ञान बांट रहा कोई लिए लकुटिया डांट रहा। किसी का हुआ है नवा-नवा बियाह, आ भैया तू भी फ़ोटो लगा। फ़ेसबुक पर हो रही है मुंह दिखाई। दुल्हनिया सकुची शरमाई। संग है भतार, चच्चा बब्बा, साथ दिख रहा सिंगार का डब्बा। कोई गुल बिजली पर निरंतर मामा की जय बुलाता है, कोई लिंक चेप-चेप जबरिया पढ़वाता है। कोई मचाए हुए टैगा टैगी, कोई टैग हटा रहा खा के मैगी। भैंगे-भैंगी की जो आँख घूमती रहती है। वह फ़ेसबुकिया मेले में ही आकर ठहरती है। शेर और बकरी दोनों एक ही घाट पर पानी पीते हैं, समाजवादी, गांधीवादी, साम्यवादी, पूंजीवादी मंसूबे यहाँ जीते हैं। जासूसी एजेन्सियाँ भी यहाँ ऐंठी हैं, भगोड़ों को ढूंढने दूरबीन लगाकर बैठी हैं। बहुत हो गया मेले का ठाठ, चलते-चलते घुटने दर्द से भर आए। ये फ़ेसबुक है भाए ये फ़ेसबुक है भाए………

बुधवार, 14 मार्च 2012

और मिसाईलें धरी रह गयी ------------ ललित शर्मा

भोर में ही घोड़े की टापों जैसे फ़ोन घनघनाने लगा, आँखे मलकर कोसते हुए फ़ोन उठाया तो परम फ़ेसबुक सखा की आवाज आई, "भैया फ़ेसबुक बंद है क्या? रात को तो बंद किया था तब तो चालु था…अब पता नहीं क्या हुआ, देखता हूँ -  मैने कहा। नेट चालु करके फ़ेसबुक खोला तो बंद मिला। बंद है यार यहाँ भी नहीं खुल रहा…। अब क्या किया जाए वह बोला…। आराम करो और क्या है……इतना कहकर मैने फ़ोन काट दिया। इधर नेट शुरु होते ही दनादन चैट पर लोग आने लगे, फ़ेसबुक बंद होने का समाचार अभनपुर से अमेरिका तक, मोकामा से मास्को तक……जरवाय से जर्मनी तक…… बिलासपुर से बुर्किनाफ़ासो तक आग की तरह फ़ैल चुका था। फ़ोन पर फ़ोन बजने लगे……। सारे फ़ेसबुकियों को लग रहा था कि फ़ेसबुक बंद हो जाएगा तो क्या करेंगे? चचा भी खांसते-खंखारते अपने कमरे से मेरे पास चले आए……और सवाल दागा… फ़ेसबुक नहीं खुल रहा है भतीजे, जरा देख लो मेरे कम्पयुटर में तो कोई खराबी नहीं है? कम्पयुटर में कोई खराबी नहीं है चचा……फ़ेसबुक ने ही अपनी दुकान बढा ली……। चचा माथे पर हाथ रख कर चिंतामग्न हो गए……

फ़ोन फ़िर बजने लगा……वही सवाल……अरे मैने क्या ठेका ले रखा है फ़ेसबुक का, या कोई मेरी हिस्सेदारी है उसमें……पूछो जकर बकर बर्ग से……फ़ेसबुक बंद किया उसने और आफ़त मेरे गले पड़ रही है……एक तो सुबह ही नींद से उठा दिया। चचा कहने लगे कि बहुत बुरा हुआ, तुम्हे क्या पता है कितने करोड़ लोग बेरोजगार हो जाएगें? कितने लोग आत्महत्या कर लेगें। कितनों की गर्लफ़्रेंड उड़नतश्तरी पर बैठ कर निकल लेगीं। कितनों की खड़ी फ़सल खराब हो जाएगी……मैने भी खेत में मक्का और सुरजमुखी बो रखे है। सब बरबाद हो जाएगें, पानी नहीं मिलने से……ह्म्म……चचा फ़ेसबुकिया खेती की बात कर रहे थे। जैसे देश की खाद्यान्न समस्या के समाधान में फ़ेसबुक का ही बड़ा हाथ है। धरती पर बोए अन्न से तो इनका पेट नहीं भरता… चले अब फ़ेसबुकिया खेती से पेट भरने…। इधर फ़ेसबुक बंद होने के समाचार गुगल वाले नाच रहे थे…… फ़ेसबुकिया ग्राहक अब गुगल प्लस की ओर दिखाई देने शुरु हो गए। वहाँ किसी ने लिखा कि - फ़ेसबुक का बंद होना घोर अन्याय है। सरकार को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए……। सरकार की कार्यवाही का तो पता नहीं, पर हमने एक मेल जरुर कर दी जकर बकर बर्ग को………

घंटे भर में तो ऐसा लगा कि जैसे आपातकाल लग गया हो………नेट पर आन्दोलन की खबरें आने लगी, बच्चे, युवा, बुजुर्ग, नर,नारी, किन्नर सभी आन्दोलन में शरीक होते दिखाई दिए, विपक्ष चिल्लाने लगा कि - सरकार अकर्मण्यता से फ़ेसबुक बंद हुआ है। करोड़ों बेरोजगार हो गए……इससे देश में अराजकता फ़ैल जाएगी। करोड़ों फ़ेसबुकिए कम से कम अपने लाईक और कमेंट के चक्कर में पड़े थे…। इन्हे फ़ेसबुकिया बेरोजगारी भत्ता दिया जाना चाहिए……बड़े से लेकर छुटभैइए नेता सभी अपनी रोटी सेंकने लग गए…… फ़ेसबुकियों के समर्थन में विपक्ष खड़ा होकर बयान बाजी कर रहा था……तो मोमबत्ती ब्रिग्रेड को भी काम मिल गया। सारे एक जुट होकर चौक चौराहों पर बिहाने बिहाने मोमबत्तियाँ जलाने लगे……कुछ यूवा लाल गुलाब बांट कर गेट वेल सून करने लगे…… अन्ना के आन्दोलन से बड़ा आन्दोलन देश में दिखाई देने लगा। इतना बड़ा आन्दोलन तो भ्रष्टाचार और सुशासन में मुद्दे पर कभी नही हुआ। कुछ नेता इस स्वस्फ़ूर्त आन्दोलन बता कर जेपी आन्दोलन से तुलना कर रहे थे……।

भैंस की सानी और दूध से समय मिलते ही ताई ने फ़ेसबुक खोला तो बंद मिला………प्लस पर जाने पर समाचार मिला कि फ़ेसबुक बंद हो गया है, ड्योढी पर आकर चिल्लाने लगी… किस मुए का काम है जो इसे बंद कर दिया…… अरे काम के बाद थोड़ी फ़ुरसत मिलती थी तो यार दोस्तों से मन-तन की बतिया लेते थे……अब इनसे यह भी सहन नहीं होता… सिर पर घास का भरोटा (गट्ठर) लिए चुन्नू की माँ ने सुन लिया…… उसने वहीं पर घास का गट्ठर फ़ेंक कर दहाड़ मारी………अरे किसको आग लग गयी जिसने फ़ेसबुक बंद कर दिया…… नासपीटों से आधी आबादी की खुशी नहीं देखी जाती…… एक महिला बिल तो पास नहीं कर सके, उपर से फ़ेसबुक भी बंद कर दिया। बस फ़िर क्या था आधी आबादी उखड़ गयी और आन्दोलन की राह पर चल पड़ी। सड़क पर उतरे फ़ेसबुकियों को देख कर सरकार हिल गयी, प्रधानमंत्री की कुर्सी डांवाडोल होने लगी, सरकार की सहयोगी पार्टियों ने अल्टीमेटम दे दिया कि इस समस्या का समाधान तुरंत निकाला जाए अन्यथा हम अपना समर्थन वापस ले लेगें। प्रधानमंत्री ने सुरक्षा परिषद एवं केबिनेट की आपात बैठक बुलाई और विचार विमर्श होने लगा।

थोड़ी देर बाद सरकार के प्रवक्ता ने प्रेस कांफ़्रेस बुलाकर पत्रकारों को बताया कि - सरकार फ़ेसबुक को वापस लाने का पुरजोर प्रयास कर रही है, जकर बकर बर्ग बाथरुम में है, उसके बाहर आते ही कुछ समाधान निकल आएगा………तभी प्रवक्ता के ने फ़ोन पर कुछ बात की और बोला - फ़ेसबुक बंद होने में विदेशी शक्तियों का हाथ है…… अभी फ़ोन से जानकारी मिली है कि अफ़रा तफ़री की स्थिति को देखते हुए मौके का फ़ायदा उठाने के लिए पाकिस्तान ने काश्मीर की तरफ़ कुछ मिसाईलें तैनात कर दी है। देश के सामने भयंकर समस्या खड़ी हो गयी है… संकट की इस घड़ी में समस्त देशवासियों से अपील की जाती है कि धैर्य बनाएं और हमारी सेनाएं दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब देगीं, काश्मीर को अपने हाथ से नहीं जाने देगें। एक प्रेस कांफ़्रेस में ही मुद्दा बदल गया, सारे देश में देश भक्त्ति के गाने बजने लगे…… लोग सड़कों पर नारे लगाने लगे…… जो हमसे टकराएगा…… मिट्टी में मिल जाएगा, दूध मांगोगे तो खीर देगें, काश्मीर मांगोगे तो चीर देगें। हमारी सेनाओं ने भी अग्नि और पृथ्वी मिसाईलें इस्लामाबाद और करांची को निशाने पर लेकर तैनात कर दी…… मॉक ड्रिल करके देख ली गयी……।

दो परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र आमने सामने थे, अमेरिका की इन घटनाओं पर खास नजर थी…… क्योंकि दुनिया का नम्बरदार तो वही है, कहीं भी टाँग फ़ंसाने का विशेषाधिकार उसी के पास है। उसने कहा कि हम फ़ेसबुक चालु कराने का प्रयत्न करते हैं, तब तक युद्ध स्थगित रखा जाए और पाकिस्तान धैर्य रखे तो उसे विशेष इमदाद दी जाएगी। इधर सेनाएं आमने-सामने थी। लोग फ़ेसबुक को भूल कर दो देशों के बीच बढ रहे तनाव पर नजर रख रहे थे। लाला जी दुकान बंद करके गोदाम में ताला लगा कर बैठ गए। युद्ध के समय डबल कमाई के मंसुबे बांधने लगे। लोग अपने घरों में महीने भर का राशन जमा करने के जुगाड़ में थे। अमेरिका को पाकिस्तान ने धमकी दी कि इमदाद फ़ौरी तौर पर जारी नहीं की तो वह गौरी को छोड़ देगा। अमेरिका में सीनेट की बैठक के बाद निर्णय लिया गया कि दोनो देशों के प्रधानमंत्रियों की व्हाईट हाऊस में शिखर वार्ता करवाई जाए… शायद समस्या का  कुछ हल निकले…… शिखर वार्ता प्रारंभ हुई…… पाकिस्तान अड़ा रहा इमदाद पर और हमारे प्रधानमंत्री अड़े रहे पाक अधिकृत काश्मीर पर………वार्ता जो्र शोर से शुरु थी…… तभी अमेरिकी राष्ट्रपति के पीए ने आकर उसके कान में चुपके से बताया कि "सर फ़ेसबुक शुरु हो गया है"…………   खबर लगते ही फ़ेसबुकिए अपने काम में लग चुके थे…… और मिसाईलें धरी की धरी रह गयी…