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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

इतिहास की खोई हुई कुंजी है शंख लिपि

विचारों को व्यक्त करने का माध्यम वाणी है, यह वाणी विभिन्न भाषाओं के माध्यम से संसार में प्रकट होती है। इन भाषाओं को दीर्घावधि तक स्थाई रुप से सुरक्षित रखने एवं एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का कार्य लिपि करती है।  कहा जाए तो भाषा को जीवंत रखने के लिए हम जिन प्रतीक चिन्हों का प्रयोग करते हैं, उन्हे लिपि कहते हैं। हम गुहा चित्रों, भग्नावशेषों, समाधियो, मंदिरो, मृदाभांडों, मुद्राओं के साथ शिलालेखो, चट्टान लेखों, ताम्रलेखों, भित्ति चित्रों, ताड़पत्रों, भोजपत्रों, कागजो एवं कपड़ों पर अंकित मनुष्य की सतत भाषाई एवं लिपिय  प्रगति देख सकते हैं।  इन सबको तत्कालीन मानव जीवन का साक्षात इतिहास कहा जा सकता है। 
उदयगिरि मध्यप्रदेश 

सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ साथ भाषा एवं लेखनकला का विकास भी होता रहा। प्रारंभ में लिखने के साधन गुफाओं की दीवारें, र्इंट, पत्थर, मृद्पात्र एवं शिलापट्ट आदि थे। देश, काल एवं परिस्थिति अनुसार ये साधन बदलते गये और लिपि एवं भाषा परिस्कृत होती गई।विचारों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा एवं लिपि प्रथम साधन है। लिपि के अभाव में अनेक भाषाएँ उत्पन्न होकर नष्ट हो गई । आज उनका नामो निशान तक नहीं रहा। लिपियाँ भी समाप्त हो गई, वे भी इससे अछूती नहीं रही। ललितविस्तर आदि प्राचीन ग्रंथों में तत्कालीन प्रचलित लगभग चौंसठ लिपियों का नामोल्लेख मिलता है, लेकिन आज उसमें में अधिकांश लिपियाँ अथवा उनमें लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है।
शंख लिपि उदयगिरि 

कुछ प्राचीन लिपियाँ आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं। उनमें लिखित अभिलेख आज तक नहीं पढ़े जा सके हैं। आज हम देखते हैं कि भारत में बहुधा प्राचीन स्थालों, पर्वतों एवं गुफाओं में टंकित ‘शंख लिपि’ के सुन्दर अभिलेख प्राप्त होते हैं इनको भी आज तक नहीं पढ़ा जा सका है। इस लिपि के अक्षरों की आकृति शंख के आकार की है। प्रत्येक अक्षर इस प्रकार लिखा गया है कि उससे शंखाकृति उभरकर सामने दिखाई पड़ती है। इसलिए इसे शंखलिपि कहा जाने लगा।
शंखलिपि सरगुजा सीता लेखनी पहाड़ 

जब भी मैं प्राचीन स्थलों पर शंख लिपि को देखता हूं तो मन जिज्ञासा से भर उठता है, कि प्राचीन काल का मनुष्य इस लेख के माध्यम से आने वाले पीढी को क्या सूचना एवं संदेश देना चाहता था। परन्तु लिपि की जानकारी की अभाव में यह रहस्य स्थाई हो गया है। विद्वान गवेषक इन लेखों को पढने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अभी तक योग्य सफलता नहीं मिल सकी है। आज भी विविध सिक्कों, मृद्पात्रों एवं मुहरों पर लिखित ऐसी कई लिपियाँ और भाषाएँ हमारे संग्रहालयों में विद्यमान हैं जो एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। समय को प्रतीक्षा है इन पहेलियों के सुलझने की। जब इनमें कैद इतिहास बाहर निकल कर सामने आएगा और नई जानकारियाँ मिलेगी।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

हिन्दी भाषा कब बनेगी भारत भाल की बिन्दी

यह विदित है कि हमारी मातृभाषा हिन्दी है, सभी जानते हैं लेकिन कुछ नही मानते। भारत की आम सम्पर्क भाषा हिन्दी ही है। सरकारी कार्यालयों में काम काज अभी भी अंग्रेजी में होता है। क्योंकि अंग्रेजी पढे लिखे समझदार लोगों एवं अभिजात्य वर्ग की भाषा है। जो अंग्रेजी में बात करता है वह बहुत ही पढा लि्खा समझा जाता है।

अंग्रेजी में की गई गिटपिट उसे आम आदमी से अलग बनाती है। गोरे अंग्रेज चले गए लेकिन काले अंग्रेज बना गए। जो अभी तक अंग्रेजी को सर पर ढोए चले जा रहे हैं। मेरा अंग्रेजी से कोई बैर नहीं है, आज यह विश्व की सम्पर्क भाषा के रुप में काम कर रही है।

पिछले दिनों चीन में हुए ऑलम्पिक के दौरान चीनियों को भी अंग्रेजी सीखनी पड़ी थी। लेकिन मेरा यह कहना है कि भारत में तो हिन्दी का प्रयोग होना चाहिए।

जब मै दक्षिण भारत जाता हुँ तो वहाँ हिन्दी भाषी को बहुत ही कठिनाई का सामना करना पड़ता है। कोई हिन्दी बोलने को तैयार ही नही है। कई अधिकारी मैने ऐसे देखे जो सेवानिवृत्त हो गए लेकिन उन्हे हिन्दी सीखने की कभी कोशिश ही नही की।

बिना हिन्दी बोले ही उन्होने अपनी सेवा पूरी कर ली। आजादी के 62 वर्षों के बाद भी हम हिन्दी को सर्वग्राह्य और सर्वमान्य भाषा के रुप में स्थापित नही कर पाए। ये कैसी विडम्बना है कि भारत में ही हिन्दी दोयम दर्जे की भाषा बनी हुयी  है। 

भारत विविधताओं से भरा देश हैं। यहां के लोगों की मातृ भाषा (माँ बोली) अलग हो सकती है लेकिन सम्पर्क भाषा के रुप में हिन्दी को भी अपना स्थान मिलना चाहिए। क्योंकि मातृ भाषा का सीधा सम्बंध जीवन से है।

मातृभाषा से ही व्यक्ति अपने विचारों का संप्रेषण कर सकता है। अपनी बात कह और समझ सकता है। लेकिन दैनिक जीवन में हम विदेशी भाषा का उपयोग कर अपने आप को समाज में प्रतिष्ठित करने में लगे हुए हैं।

हिन्दी भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का जबरन प्रयोग कर अपने को शिक्षित बताने का प्रयास करते हैं, इसी प्रक्रिया में कभी-कभी उपहास का भी पात्र बनना पड़ता है।
हमारे एक मित्र हैं जो अंग्रेजी उनके सामने बोलते हैं जिनको बेचारों को अंग्रेजी नही आती। मसलन किसान, मजदुर, देहाती गंवई गांव के लोग । जब उनके सामने अंग्रेजी बोलते हैं तो वे बेचारे उनके मुंह को ताकते रहते रहते है कि गुरुजी बहुत पढा लि्खा है। इन पर मित्र का रुवाब चल ही जाता है।

लेकिन एक बार लंदन से कोई एन जी ओ गांव में आया तो मुझे भी बुलाया गया। तब पता चला कि गुरुजी की अंग्रेजी कितनी शुद्ध है?

भई थोड़ी बहुत तो हमारे को भी समझ में आती है। उस दिन उनकी पोल खुली कि सारी अंग्रेजी ही गलत बोलते हैं।

ऐसे कई उदाहरण सामने आते हैं। एक दिन मैने उनसे कहा कि भैया क्या हिन्दी बोलने में शर्म आती है? जहां जरुरत हो वहां तो कम से कम हिंदी बोल लिए करो।

ऐसा नही है कि सरकार हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए कुछ नही कर रही है। प्रतिवर्ष सरकारी खर्चों पर विदेशों में हिन्दी भाषा प्रचार सम्मेलन रखे जाते हैं। जिसमें कुछ चाटुकार किस्म के तथाकथित हिन्दी विद्वान अपनी उपस्थिति सरकारी खर्च पर देते रहते हैं। बस वही शक्ल हर जगह देखने मिल जाती है।

हिन्दी के मानस पुत्र जो माने जाते हैं और जो बेचारे कलम घिस घिस के हिन्दी की सेवा कर रहे हैं उन्हे कोई सेवक मानने को तैयार ही नही है।

कुछ हमारे साहित्यकार तो एकदम सरकारी साहित्यकार हैं जब भी कोई सरकारी सरकारी कार्यक्रम होता है वही गिनी चुनी मूर्तियां नजर आती हैं। अगर कोई नए लोग चले जाते हैं तो पुछने को ही राजी नही कि भैया तुम कौन हो? पुछ देंगे तो कु्र्सी खाली करनी पड़ेगी।

जब तक हम कटिबद्ध होकर निस्वार्थ भाव से हिन्दी की सेवा के लिए पुरे समर्पण के साथ आगे नहीं आएंगे तब तक हिन्दी का यही हाल रहेगा।

अब तथाकथित हिन्दी दां लोगों से मुक्ति पाने का समय आ गया है। नए लोगों को आगे आना चाहिए। लेकि्न चाटुकारिता और गोड़ लागी, पाय लागी इस हद तक हो गयी है कि इससे मुक्त होना असम्भव तो नहीं पर कठिन जरुरी है।

हिन्दी को आगे बढाने प्रयास होते रहने चाहिए, मार्ग अवश्य ही कंटकाकीर्ण है लेकिन ईमानदारी से किया गया प्रयास अवश्य ही सफ़ल होगा, ऐसा मेरा मानना है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

हिन्दी भाषा हमारा गौरव

हम सब ने हिन्दी दिवस मनाया, बड़ी गरमा-गरम बहस हिन्दी के प्रसार प्रसार के लिए चली. कल हिन्दी ब्लॉगों में लगभग सभी ने हिन्दी राग अलापा, एक दिन हिन्दी के पक्ष में नारा लगा के कर्तव्य की इति श्री कर ली. बहती गंगा में हाथ धो लिए।

हिन्दी के लिए शहीद होने वालो की सूची में अपना नाम लिखा लिया. कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने सबको चर्चा करते देख "लोग क्या कहेंगे मेरे बारे में" सोचकर चार लाइन लिख दी. उनमे मैं भी शामिल हूँ. 

मै नया-नया इस ब्लॉगरी मायावी जाल से जुड़ा हूँ. यहाँ के क्या रस्मो रिवाज हैं. कौन वरिष्ठ है, कौन गरिष्ठ है, कौन उत्तिष्ठ है, कौन वशिष्ठ है, मुझे नही मालूम, लेकिन अपनी बात कहने का अधिकार सबको है. क्या एक दिन हिन्दी-हिन्दी कह कर चिल्लाने से हिन्दी का प्रचार हो जाएगा? 

भाई हम तो सुबह से हिन्दी में चालू होते हैं, तो सोने के बाद भी हिन्दी ही चलती रहती है.सपने में भी वार्तालाप हिन्दी में ही होता है. किसी को गालियाँ देनी होती है तभी अंग्रेजी बोलते है। :)

मैं विगत कई वर्षों से दक्षिण भारत की यात्रा कर रहा हूँ, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा परेशानी पुद्दुचेरी और तमिलनाडू में होती है.  

लगता है मै किसी ऐसे टापू पर आ गया हूँ जहाँ कोई मेरी भाषा भी समझने वाला नही है ,कोई मुझे सुनने को तैयार नही, मैं जरुर उनके मुंह की तरफ़ देखता था कि ये क्या बोल रहे हैं? समझने की कोशिश करता था. 

आज़ादी के ६३ बरसों के बाद भी जो हिन्दी सुनने समझने को तैयार नहीं है. उनको हिन्दी के लिए कैसे मनाया जाएगा? 

ये चिंतन विषय है. हम उनसे अपनी भाषा छोड़ने नही कहते हैं पर सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी अनिवार्य होनी चाहिए, 

पुद्दुचेरी में एक बार मुझे शिल्पकारों के कार्यक्रम की अध्यक्षता करने जाना था। अपने एक मित्र जो तीन पीढियों से हिन्दी भाषी क्षेत्र में रह रहे हैं उनको अपने खर्चे पर साथ लेकर गया कि मुझे अनुवाद करके वहां के लोगों की बात समझायेंगे, लेकिन वहां की तमिल से उनकी भी हवा निकल गई, मेरा प्रयास निरर्थक रहा. 

उनको साथ ले जाने का भी मुझे लाभ नही मिल पाया, केरल, कर्नाटक में अधिक परेशानी नही है. वहां पर लोग हिन्दी समझते हैं और बोलते भी हैं।

हिन्दी एक अविरल प्रवाहित महानदी मन्दाकिनी है जो सदियों से जनमानस को सिंचित करती आई है, प्राणवायु के रूप में हमारे शरीरों में साक्षात् समाहित है।


इसलिए हमें प्रत्येक साँस को ही हिन्दी दिवस समझना चाहिए।