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शनिवार, 6 जनवरी 2018

हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर और मौर्य सम्राट

पंख झाड़ चुका मोर, यह चित्र मध्य नवम्बर माह में पुष्कर राजस्थान के पास अजयपाल के मंदिर के समीप का है। इस समय मोर अपने सारे पंख झाड़ चुका था और नए पंख निकल रहे थे। 

वैसे वर्ष में एक बार अगस्त माह के आस पास मोर अपने सारे पंख झाड़ देता है और ग्रीष्म काल आते तक उसके सारे पंख पुन: आ जाते हैं। मोरनियों को रिझाते समय नृत्य के दौरान भी इसके पंख टूट जाते हैं।

प्राचीन काल से ही लोक के लिए मोर महत्वपूर्ण पक्षी है, चंद्रगुप्त का साम्राज्य का चिन्ह ही मोर था और इसलिए वे मौर्य कहलाए। चंद्रगुप्त के सिक्कों पर मोर चिन्ह का अंकन होता था। वैसे मोर को तंत्र से अधिक जोड़ा गया है। धन समृद्धि के लिए मोर पंख को घर में रखना बताया गया। पौराणिक ग्रंथों में देवताओं ने मोर को विशेष स्थान दिया। 

इन्द्र देव का मोरपंख के सिंहासन पर बैठना, कृष्ण का अपने मुकुट पर मोरपंख को स्थान देना, यहां तक पौराणिक काल में महर्षियों द्वारा इसी मोरपंख की कलम बनाकर बड़े-बड़े ग्रंथ लिखना आदि कुछ ऐसे मुख्य उदाहरण हैं, जो #मोरपंख की उपयोगिता का स्वत: बखान करते हैं।

बौद्धधर्म के अनुसार मोर अपनी पूंछ फैलाकर अपने सारे पंखों को खोल देता है, इसलिए उसके पंख खुलेपन अर्थात जहां विचारों की कमी ना हो, व्यक्तियों के दिल में हर किसी के लिए प्रेम और सानिध्य हो, जैसे हालातों को दर्शाते हैं। 

ईसाई धर्म में मोर के पंख, अमरता, पुनर्जीवन और अध्यात्मिक शिक्षा से संबंध रखते हैं। इस्लाम धर्म में मोर के खूबसूरत पंख जन्नत के दरवाजे के बाहर अद्भुत शाही बगीचे का प्रतीक माने जाते हैं। 

तांत्रिक क्रियाओं में भी मोर पंख का उपयोग होता है, मोरपंखी से झाड़ा देकर नकारात्मक शक्तियों को दूर किया जाता है, सुख समृद्दि एवं #वशीकरण में मोर पंख को उपयोगी माना गया है। 

दिगम्बर जैन साधु मोर पंख का चंवर अपने साथ रखते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मोर के माध्यम से देवताओं ने संध्या नाम के असुर का वध किया था। 

पक्षी शास्त्र में मोर और गरुड़ के पंखों का विशेष महत्व बताया गया है। कहते हैं कि सही विधि से मोर पंख को घर में स्थापित किया जाए तो वास्तु दोष दूर होते हैं और कुंडली के सभी नौ ग्रहों के दोष भी शांत होते हैं। अपने गुण एवं विशेषताओं के कारण मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी भी है।

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

राजा जी नेशनल पार्क का वन मुर्गा

वन मुर्गा जंगल सफ़ारी के दौरान कई बार दिखाई देता है, परन्तु आहट सुनकर जल्दी ही झाड़ियों में गायब हो जाता है। राजा जी नेशनल पार्क चिल्ला रेंज में दिखाई दिया और इसने फ़ोटो लेने का भरपूर अवसर भी दिया। अपने रंगों के प्रभाव के कारण यह बहुत सुंदर दिखाई देता है। वन मुर्गी धूसर रंग की होती है, इसलिए अधिक प्रभावशाली दिखाई नहीं देती। 

विकिपीडिया कहता है कि यह पक्षी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, चीन, म्यानमार, लाओस, कम्बोडिया, वियतनाम, थाइलैंड, इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया, फ़िलीपीन्स तथा तिमोर का मूल आवासी है। यह समुद्र तल से लेकर 5000 फ़ीट (1524 मीटर) तक की ऊँचाई में पाया जाता है तथा शीतकाल में 3000 फ़ीट (914 मीटर) से ऊपर देखने को नहीं मिलता है। इसे बाँस के वन पसंद हैं लेकिन यह घने वनों और झाड़ के क्षेत्रों में भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

यह पक्षी वैसे तो खेतों से अनाज खाना पसन्द करता है लेकिन मौका मिलने पर कीट-पतंगे खाने से भी परहेज़ नहीं करता है। फ़सल कटने का मौसम न हो या यह जंगल में बहुत अन्दर हो तो इसके आहार में बीज, घास, नई कोपलें और कलियाँ भी शामिल होते हैं। प्रजनन काल जनवरी से जुलाई तक चल सकता है। अमूमन मुर्गी 4 से 6 अण्डे देती हैं लेकिन किसी-किसी घोंसले में 11 अण्डे भी पाये गये हैं। घोंसला सुविधा के अनुसार ज़मीन में बनाया जाता है।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

सावधान: अब हाथियों ने राजधानी देख ली है।

हाथियों ने अब राजधानी का रास्ता देख लिया गजदल दो बार राजधानी रायपुर के समीप पहुंच चुका है, यह हाथियों एवं मानवों दोनों के लिए शुभ संकेत नहीं है। हालिया तौर पर हाथियों को वन विभाग ने जंगल की ओर खदेड़ दिया, परन्तु जो रास्ता हाथियों ने देख लिया है, उस पर वे फ़िर लौटेंगे। अभी तक तो सरगुजा अंचल, जशपुर, कोरबा एवं सिरपुर क्षेत्र के ग्रामीण हाथियों के उत्पात से परेशान हैं तथा हाथी एवं मानव संघर्ष में एक दूसरे को जान गंवानी पड़ रही है। अब यही स्थिति राजधानी रायपुर में भी बनने के आसार दिख रहे हैं।
 फ़ोटो सांकेतिक है, यह मेरे द्वारा राजा जी पार्क हरिद्वार के चिल्ला रेंज में ली गई थी
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात हाथियों की समस्या के निदान के लिए तत्कालीन अजीत जोगी सरकार ने असम से हाथी प्रशिक्षक पार्वती बरुआ को छत्तीसगढ बुलाया था, जिसके द्वारा हाथियों को साधकर हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष को कम किया जाता। परन्तु इस कार्य में एक हाथी मौत के कारण विधानसभा में प्रश्न उठने के बाद इस कार्य को बंद कर दिया गया। हाथियों के हमले से आम ग्रामीणों की जान लगातार जा रही तथा इस संघर्ष में कोई कमी नहीं आई है। फ़सलों का नुकसान को आम बात है, पर हाथियों के दल के सामने अचानक कोई मनुष्य पड़ जाता है तो उसे हाथी पटक कर मार डालते हैं।
ऐसा नहीं है कि हाथियों के दल कहीं दूसरे स्थान से अचानक छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर गए और उत्पात मचा रहे हैं। यहाँ इनकी बसाहट प्राचीनकाल से ही रही है। सरगुजा अंचल के हाथियों को ऐरावत के सदृश उत्तम माना गया है। पहले के राजा महाराजा इन्हें प्रशिक्षित करके अपने काम में लेते थे तथा अन्य राजाओं को भी भेंट करने के उल्लेख मिलते हैं। हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष तो तब भी आमना सामना होने पर रहा होगा, पर इस हद तक नहीं क्योंकि उनके पर्यावास क्षेत्र में मानव का कोई सीधा दखल नहीं था, वे स्वच्छंद विचरण करते थे। कालांतर में मानव द्वारा हाथियों के पर्यावास क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने के परिणाम को ही अब भुगतना पड़ रहा है।
अभी तक हाथी और मानव संघर्ष के कारण राजधानी से दूर सरगुजा, प्रतापपुर, सूरजपुर, जशपुर, कोरबा, बार नवापारा क्षेत्र से से ही धन-जन हानि के समाचार आते थे। तब राजधानी के लोगों को पता नहीं चलता था कि हाथियों की समस्या क्या है और हाथी प्रभावित अंचल के लोग किस तरह भय के वातावरण में अपनी राज गुजारते हैं, किस तरह उनकी फ़सल को हाथी नुकसान पहुंचाते हैं, किस तरह उनके घर फ़ोड़ कर बेघर कर डालते हैं। अब हाथियों ने राजधानी के समीप अपनी आमद दे दी तो उनके पहुंचने की धमक ही होश उड़ाने के लिए काफ़ी है।
हाथियों का शहरी क्षेत्र में पहुंचना अनायास नहीं है। इसके लिए मानव ही जिम्मेदार है। सरकारों की अदूरदर्शी नीतियों के कारण अंधाधुंध कटते जंगल एवं खनिज निकालने के लिए खदानें खुलने के कारण हाथियों के प्राकृतिक रहवास क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ जिम्मेदार है। जंगल कटने एवं जल के प्राकृतिक स्रोत सूखने के कारण हाथियों के सामने भोजन पानी की समस्या खड़ी हो गई है तथा हाथियों के रहवास क्षेत्र में मानवीय दखल बढ़ने एवं उसके नष्ट होने के कारण अब हाथियों को भोजन-पानी के लिए शहरी क्षेत्र की ओर रुख करना पड़ रहा था। जिससे हाथी एवं मानव के बीच संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है। 
राजधानी के आस पास हाथियों के पहुंचने की आशंका साल भर पहले से ही जताई जा रही थी। वन्य प्रेमी श्री प्राण चड्ढा ने गत वर्ष अपनी अप्रेल 2016 की ब्लॉग पोस्ट में संकेत दिया था कि "सरहदी इलाके से बढ़ते हुए एक हाथी रुद्री-[धमतरी] के इलाके की रेकी कर आया है।" इस एक वर्ष में ही हाथियों ने अपनी उपस्थिति राजधानी में दे दी। हाथियों के राजधानी में पहुंचने से सरकार की नींद खुलनी चाहिए, क्योंकि मामला अब सुदूर अंचल का नहीं रहा, जो राजधानी चैन की नींद ले सके। शीघ्र ही कोई योजना बनाकर हाथी संकट निदान करना आवश्यक है। खतरा अब सिर पर मंडरा रहा है, वो दिन दूर नहीं जब राजधानी के लोगों को अपनी जानमाल की सुरक्षा के लिए रतजगा करना पड़ेगा। इसलिए चैन से सोना है तो जाग जाइए वरना बहुत देर हो जाएगी।