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शनिवार, 28 नवंबर 2015

नवकलेवर पूजन एवं दारु खोजन उत्सव - कलिंग यात्रा

मंदिर के बाहर निकलते ही भगवा कपड़ों में वाद्य यंत्र धारण किए गाते बजाते भक्त दिखाई दिए, इनके साथ ही मंदिर के मुख्य पुजारी एवं उनके सहयोग नवीन वस्त्र धारण कर मंदिर परिसर की ओर जुलूस की शक्ल में बढ रहे थे। पूछने पर पता चला कि आज नवकलेवर का उत्सव है,  संयोगवश हम भी इस त्यौहार के साक्षी बन गए। नवकलेवर भगवान की काष्ठ प्रतिमाएं बदलने के उत्सव को कहते हैं। जिस वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार दो आषाढ होते हैं उस वर्ष भगवान की पुरानी प्रतिमाएं बदल कर स्थापित की जाती हैं।

दारू खोज मुहूर्त के लिए जाते हुए दैतापति
इन प्रतिमाओं को बदलने का भी बड़ा कठिन विधि विधान है। हमारे पण्डा जी पुर्णचंद महापात्र ने बताया कि प्रतिमाओं के लिए ऐसे  ही किसी वृक्ष को काटकर नहीं बना दी जाती। इसके लिए विशेष प्रकार की"दारु" (नीम की लकड़ी) का चयन किया जाता है। यह चयन प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही होता है। इस काम में कई पंडित या दैतापति लगते हैं। शास्त्रों के अनुसार, पेड़ के लिए सबसे पहले मुख्य पंडित को सपना आता है, उसके बाद दसियों पंडित उस पेड़ की तलाश में निकलते हैं। प्रतिमा निर्माण के लिए वृक्ष पुराना हो, नदी या तालाब के किनारे हो, शंख, चक्र, गदा, पद्म के चिन्ह हों, पेड़ का कोई हिस्सा टूटा न हो, उसमें कोई कील नहीं ठोकी गई हो, किसी पशु का पंजा न लगा हो तथा पेड़ पर कोई घोंसला न हो। 
कृष्णा किर्तन करते हुए भगत
मुख्य दैतापति को सपना आने के बाद वह वृक्ष के स्थान की ओर संकेत करता है। फ़िर 10 पुजारियों का दल चारों दिशाओं में उस स्थान एवं वृक्ष की खोज करते हैं। इस खोज की समयावधि 45 दिन निश्चित है, इस अवधि में ही "दारु" की खोज अवश्य ही होनी चाहिए। पेड़ को काटने के पहले सारे पंडित दो दिन तक अन्न जल नहीं लेते एवं शास्त्रों के बताए मंगल चिन्ह एवं शर्तें पूर्ण होने पर उस वृक्ष को पूजा करके विधि विधान से प्रतिमाओं के लिए काटा जाता है। यह प्रक्रिया गोपनीय रुप से आधी रात को सम्पन्न की जाती है। उसके पश्चात लकड़ी की प्रतिमाएं बनाई जाती है और स्थापित की जाती है। 
हरे राम हरे कृष्ण, कृष्ण हरे हरे
पण्डा जी ने बताया कि - नव कलेवर का समय 12 या 19 वर्षों में एक बार आता है। हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं में चारों धामों को एक युग का प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार कलियुग का पवित्र धाम जगन्नाथपुरी माना गया है। यह भारत के पूर्व में उड़ीसा राज्य में स्थित है, जिसका पुरातन नाम पुरुषोत्तम पुरी, नीलांचल, शंख और श्रीक्षेत्र भी है। उड़ीसा या उत्कल क्षेत्र के प्रमुख देव भगवान जगन्नाथ हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा राधा और श्रीकृष्ण का युगल स्वरूप है। श्रीकृष्ण, भगवान जगन्नाथ के ही अंश स्वरूप हैं। इसलिए भगवान जगन्नाथ को ही पूर्ण ईश्वर माना गया है।
दैतापति दल लवाजमा के साथ मंदिर की ओर
वैसे तो रथयात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आरंभ होती है। परन्तु इस वर्ष नवकलेवर होने के कारण अधिक आकर्षण रहेगा।  यह यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर 2 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पर समाप्त होती है।जहां भगवान जगन्नाथ सात दिन तक विश्राम करते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन फिर से वापसी यात्रा होती है, जो मुख्य मंदिर पहुंचती है। यह बहुड़ा यात्रा कहलाती है। जगन्नाथ रथयात्रा एक महोत्सव और पर्व के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रथयात्रा के मात्र रथ के शिखर दर्शन से ही व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। स्कन्दपुराण में वर्णन है कि आषाढ़ मास में पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य फल प्राप्त होता है और भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती है।
दम लगा कर है जोर
रथयात्रा के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा- तीनों के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं। ये लकड़ी वजन  में भी अन्य लकडिय़ों की तुलना में हल्की होती है और इसे आसानी से खींचा जा सकता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और यह अन्य रथों से आकार में बड़ा भी होता है। यह रथ यात्रा में बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ के कई नाम हैं जैसे- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि। इस रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। इस रथ के सारथी का नाम दारुक है। 
रथयात्रा मार्ग से आता हुआ दल
भगवान जगन्नाथ के रथ पर हनुमानजी और नरसिंह भगवान का प्रतीक होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ पर सुदर्शन स्तंभ भी होता है। यह स्तंभ रथ की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ हैं। रथ की ध्वजा यानि झंडा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है। इसके 16 पहिए होते हैं व ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है। इसमें लगभग 1100 मीटर कपड़ा रथ को ढंकने के लिए उपयोग में लाया जाता है।
उत्सव में सम्मिलित 
बलरामजी के रथ का नाम तालध्वज है। इनके रथ पर महादेवजी का प्रतीक होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। यह 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है, जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। सुभद्राजी के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा जाता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथ का ध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है।
बिकाश बाबू की मौज
भगवान जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा के रथों पर जो घोड़ों की कृतियां मढ़ी जाती हैं, उसमें भी अंतर होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ पर मढ़े घोड़ों का रंग सफेद, सुभद्राजी के रथ पर कॉफी कलर का, जबकि बलरामजी के रथ पर मढ़े गए घोड़ों का रंग नीला होता है। रथयात्रा में तीनों रथों के शिखरों के रंग भी अलग-अलग होते हैं। बलरामजी के रथ का शिखर लाल-पीला, सुभद्राजी के रथ का शिखर लाल और ग्रे रंग का, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ के शिखर का रंग लाल और हरा होता है। पण्डा जी की बातें हमने मोबाईल फ़ोन में सुरक्षित कर ली।
लाईव टेलीकास्ट
जब इस महत्वपूर्ण पर्व पर हम पुरी में उपस्थित थे तो सोचा कि उसकी फ़ोटोग्राफ़ी भी अच्छे से होनी चाहिए। मीडिया वालों का लाईव प्रसारण चल रहा था। हम कोई तीन चार मंजिल का भवन ढूंढ रहे थे जिसकी छत से चित्र लिए जा सकें। तभी एक भवन की छत पर छतरी लगाई कुछ कैमरामेन दिखाई दिए तो हम वहीं पहुंच गए और उस भवन से लगातार कुछ अच्छे चित्र लिए। छत पर काफ़ी समय व्यतीत किया। उसके बाद नीचे आकर वाद्यको समेंत सभी के खूब चित्र लिए। बिकास बाबू ने वाद्यों की धुन पर खूब नृत्य किया और थोड़ा बहुत मजा हमने भी लिया। इस तरह हमारी हमने भगवान जगन्नाथ के दर्शन लाभ प्राप्त किए।

रिक्शे पर सवार राजा और राणा
सूर्य देवता अस्ताचल की ओर जा रहे थे, हम मंदिर से निकल कर रिक्शे में सवार होकर समुद्र तट पर पहुंच गए। शाम की समय यहां की रौनक ही अलग होती है। पुरी होटल से चलते हुए स्वर्गद्वार के आगे तक हमने पैदल भ्रमण किया। फ़िर चना चबेना लेकर समुद्र के किनारे एक स्थान पर आसन जमा कर बैठ गए। ठंडी हवा में आंखे बंद कर समुद्र की गर्जना सुनने का अलौकिक आनंद आया। यह आनंद गुंगे के गुड़ जैसा है। छेना मिठाई बेचने वाला भी वहीं आ गया। बिकास बाबू ने सभी प्रकार की मिठाईयों का आनंद लिया क्योंकि जब हम समुद्र की गर्जना सुनने का आनंद ले रहे हैं तो वे मिष्टी आनंदाधिकारी है। दस बजे तक हमने समुद्र के किनारे वक्त गुजार दिया। उसके बाद एक होटल से भोजन कर अगली सुबह चिल्का झील भ्रमण की तैयारी करते हुए झपक लिए। जारी है, आगे पढें।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

महोदधि स्नान से उपजा ज्ञान - कलिंग यात्रा

हम धूप होने से पहले पुरी पहुंचना चाहते थे, इसलिए सुबह जल्दी उठकर पुरी जाने के लिए तैयार हो गई। पुरी जाने वाली बस सांतरापुर से ही जाती हैं, हमने सड़क पर पहुंचकर आठ बजे पुरी की बस में चढ गए। बस ने हमें लगभग डेढ घंटे में पुरी पहुंचा दिया। बस स्टैंण्ड पहुंच कर हमें पहले होटल पकड़ना था। एक ऑटो वाला तैयार हो गया पचास रुपए में समुद्र तट तक होटल पहुंचाने के लिए। पहले उसने अपनी पहचान के होटल लॉज दिखाए, पर हमें पसंद नहीं आए। बिकास बाबू वहीं पास के एक होटल का पता रखे हुए थे शायद अजंता होटल जैसा नाम था। वह पाँच सौ रुपए में रुम देने के लिए तैयार हुआ। हमने एक रुम लिया और समुद्र तट पर पहुंच गए जलक्रीड़ा करने के लिए। 
महोदधि: विहंगम दृष्टि
मौसम अच्छा था और हवा भी मंद चल रही थी जिससे समुद्र में लहरें छोटी ही थी। मेरे मन में समुद्र में तैरने की इच्छा थी, पर विकाश बाबू उसके खिलाफ़ थे, वे छेना गाजा, छेना पोड़ा तलाश रहे थे। समुद्र के किनारे छतरियों के साथ कुर्सियां भी लगी हुई थी। यहाँ बैठकर समुद्र के नजारे लिए जा सकते थे। पूछने पर पता चला कि एक घंटे का किराया बीस रुपए है। हमने एक जगह कुर्सियां खाली देख कर कब्जा जमाया और सामान रख दिया। बिकास बाबू कैमरा संभाल स्थान ग्रहण कर लिए और हम समुद्र में उतर गए। किनारे पर काफ़ी संख्या में पर्यटक जलक्रीड़ा कर रहे थे। 
ऊंट खरीदने के लिए मोलभाव करते बिकाश शर्मा
तालाब, पोखर, नदी के तैरने वालों का घुटने भर पानी से मन नहीं भरता। इसलिए हम और आगे चले गए। बिकाश बाबू कैमरे से फ़ोटो खींच रहे थे। आगे चलकर जब कंधे भर पानी आ गया तब लहरों पर खेलने लगे, बड़ा ही आनंद आ रहा था। महोदधि की महाजलराशि मन को तरंगित कर रही थी और लहरों के साथ लयबद्ध खेल जारी था। तभी अचानक एक बड़ी लहर आई और उसने हमें दबोच लिया। हम पानी के भीतर पैर मार रहे थे पर थाह नहीं मिल रही थी। सांस भर गया, बड़ी मुस्किल से पानी से बाहर आए और जल्दी जल्दी हाथ पैर मार कर किनारे आ गए। एक झटके में ही ज्ञान की प्राप्ति हो गई। समुद्र में तीन लहरें दिखाई देती है, किनारे की पहली लहर बुलाती है, दूसरी मध्य की लहर खिलाती है और तीसरी लहर डुबाती है, अब सबक सीख लिए कि कभी तीसरी लहर से खेला नहीं करना है।
महोदधि स्नान एवं क्रीड़ा
किनारे पर पहुंचने के बाद छतरी तले कुर्सी पर दम साधने बैठ गए। हमारी कुर्सियों के मालिक का नाम एम दिलीप था। समुद्र का आनंद लेते हुए उनसे बातचीत प्रारंभ हुई। दिलीप लाईफ़ गार्ड है, छत्रछाया देने के साथ समंदर में डूबने वालों की जान बचाने का काम भी करते हैं। कुछ लोग लहरों से खेलते हुए गहराई में चले जाते हैं इन पर दिलीप की निगाहें लगी रहती है और डूबने का संकेत मिलते ही यह समंदर में छलांग लगा देते है और उन्हें बचा कर ले आते हैं। इसकी एवज में बख्शीश के  सौ पचास रुपए मिल जाते हैं साथ ही छतरी से भी दोपहर तक 100-200 कमा लेते हैं। दोपहर के बाद समंदर में मछली मारने चला जाते हैं। 
ऊंट खरीदते ही बिजनेश शुरु
मच्छंदर कुल के इसके पूर्वज आन्ध्र प्रदेश से आए थे, तेलगु भाषी है। दोपहर को कुछ पैसे मिलने के बाद 30 रुपए गिलास  के हिसाब से बिक रही गुड़ की देशी दारु का मजा लेते हैं। कहते है कि- अंग्रेजी दारु महंगी मिलती है और उसमें मजा नहीं आता तथा ताड़ी जल्दी उतर जाती है। इनने सिर पर टोपी लगा रखी है, उस पर लाईफ़ गार्ड लिख रखा है। लाईफ़ गार्ड का लायसेंस सरकार देती है पर इसके एवज में कुछ भी मानदेय नहीं मिलता। लाईफ़ गार्ड का कार्य इन्हें वालेन्टरी करना पड़ता है। जो कुछ कमाई होती है वह छत्रछाया से होती है। 
लाईफ़ गार्ड दिलीप एवं लेखक
दिलीप कहते है कि समंदर का खारा पानी मनुष्य की चमड़ी को नुकसान पहुंचाता है। आप एक घंटा समुद्र में रहेगें तो यह रंग को काला कर देता है। इसका प्रमाण भी मुझे मिला, समुद्र का पानी आंखो में जलन पैदा करता है और दो घंटे नहाने पर चमड़ी का रंग भी बदल जाता है। अगर एक हफ़्ते समंदर में स्नान किया जाए तो रंग काला हो जाएगा। जाहिर है समंदर भी प्रदूषण का शिकार हो रहा है। अधिक खारापन एसिड का काम कर रहा है। दोपहर हो गई थी, समुद्र तट भी धीरे धीरे पर्यटकों से रिक्त हो रहा था। दिलीप अपनी छतरी उखाड़ कर मछली मारने चला गया और हम नहाने के लिए होटल चले आए। जारी है… आगे पढें।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

भये प्रकट कृपाला दीनदयाला - कलिंग यात्रा

लगभग एक बज गया था और भूख जोरों की लगी थी, ऑटो वाले को उसकी दक्षिणा देकर विदा किया, भला आदमी था, उसका व्यवहार अच्छा लगा वरना कल सुबह वाले ने लूटने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी। होटल पहुंच कर सात्विक भोजन दालमा भात खाया और रुम पर आराम करने पहुंच गए। संझा का कार्यक्रम भुवनेश्वर का बाजार देखने और शहर घूमने का था। हर शहर की अपनी अलहदा तासीर होती है, उससे भी रुबरु होना जरुरी रहता है। 

शाम ऑटो पकड़ कर बाजार की तरफ़ निकले। आज रामनवमी थी, रास्ते में राममंदिर के समीप उतर गए। मंदिर के समक्ष बहुत भीड़ थी। अगर भीतर जाते तो फ़िर वही, जूते चप्पल की रखवाली, मोबाईल जमा करना इत्यादि प्रक्रिया से गुजरना पड़ता। हमने सड़क पर खड़े खड़े ही मर्यादा पुरुषोत्तम को जन्मदिन की शुभकामनाएं दे दी और उन्होने स्वीकार भी कर ली। सोचा होगा कि घुमक्कड़ हैं ये लोग, क्या भरोसा दूबारा आएगे कि नहीं। इसलिए स्वीकार कर लेने में ही भलाई है, इस घटना के साक्ष्य के रुप में हमने एक सेल्फ़ी भी खींच ली।

बिकाश ने कहा कि यहाँ के मॉल देखे जाएं, मैं भी तैयार हो गया। सड़क पार करके ग्यारह नम्बर की गाड़ी पर सवार होकर मॉल पहुंच गए। घूम फ़िर कर एक कपड़े की दुकान में घुस गए। ऑफ़र चल रहा था, एक के साथ एक फ़्री का। बिकाश कहने लगा कि पतलून ले लो। अब हम पतलून पसंद करने लगे। खूब मगज मारी करने के बाद एक नाप की दो पतलून नहीं मिली। जो पसंद आती थी उसकी जोड़ी नहीं मिलती थी। थक हार कर बाहर आ गए, अब फ़्री के ऑफ़र में तो यही होना है। 

एक जगह निकोन कम्पनी का काऊंटर लगा था। कई दिनों से सोच रहा था कि एक एस एल आर कैमरा लेना है। परन्तु लेंस आदि के भाव देख कर हिम्मत ही नहीं होती थी। सोचा कि आज मोल भाव जम जाए तो ले लिया जाए। उसकी दुकान में पहुंच कर कई कैमरे देखे, पर जमे नहीं। क्योंकि वहाँ डिजिटल कैमरों की रेंज अधिक थी और वह मैं 30X जूम का वह कैमरा तो हाथ में लेकर घूम रहा था। खैर यहाँ से भी बैरंग लौट आए। 

अब मार्केट में घूमते फ़िरते उड़ीसा हैंडलूम की कई दुकाने दिखाई दी। मन आया कि कोई साड़ी खरीद ली जाए उड़िया पैटर्न की मालकिन के लिए। वैसे हमने जीवन में कभी कोई साड़ी नहीं खरीदी थी। यह सब खरीदने का काम मालकिन का ही है, हमारे बस का नही। दुकान वाले ने सूती की बहुत सारी साड़ियां दिखाई, पर समझ नहीं आया क्या लें और क्या न लें। बिकाश बाबू कुछ कुछ मामलों में हमारे जैसे ही हैं। आखिर वाट्सअप काम आया। हमने साड़ियों की फ़ोटो खींच कर वाट्सअप पर भेज दी, उसकी दुकान में नेट कुछ धीमा चल रहा था। फ़ोटो आदान प्रदान एवं स्वीकृति में ही आधा घंटा लग गया। आखिर एक साड़ी पैक करवा कर नोट दिए और बाहर आ गए। चलो कुछ तो खरीदा, वरना यहां से भी हाथ हिलाते निकलते।

इस इलाके के आस-पास स्ट्रीट फ़ूड की बहुत सारे ठेले हैं, सब जगहों के स्ट्रीट फ़ुड की अपनी विशेषता होती है। हमने गोलगप्पे का आनंद लिया, बाकी पकोड़े वकोड़े मकोड़े तो हमको जमते नहीं है। वैसे भी सफ़र में सबसे अच्छा और बिना मिलावट का खाना दो ही मानता हूँ, पहला केला, दूसरा अंडा और तीसरा नारियल पानी। तीनों ही हाईजेनिक हैं, कोई मिलावट नहीं और दुनिया में सब जगह मिलते हैं अगर वहाँ भाषा भी नहीं आती तो लोग इशारे से समझ जाते हैं और काम बन जाता है। अब यहाँ से ऑटो पकड़ कर फ़िर अपने मोहल्ले सांतरापुर पहुंच गए। 

हम जिस होटल में भोजन करते थे वह पहले तल्ले पर था और नीचे मिठाईयों की दुकान। जिसमें तरह-तरह की मिठाईयाँ सजी हुई थी। बिकाश बाबू मिठाईयों के दास है और हम उदास। मिठाईयाँ देख कर इनके गाल फ़ड़कने लगते हैं। भोजन करके मिठाईयों की दुकान में घुस गए और लगे छेने की मिठाईयां झाड़ने। आखिर जोर कर हमको छेने की बिना शक्कर की मिठाई खिला ही दी। वैसे भी उड़ीसा की छेने की मिठाईयों का कोई जवाब नहीं, छेना गाजा, छेना पोड़ा और भी न जाने क्या क्या। बिकाश बाबू ने बहुत सारी मिठाईयों का स्वाद चखा, हम देखते रहे। मिठाईयाँ खाकर रुम में पहुंच गए क्यों कि कल सुबह जगन्नाथ पुरी जाने की तैयारी करनी थी। दो दिन पुरी के नाम हैं…… जारी है, आगे पढें…। 

रविवार, 22 नवंबर 2015

शिल्पकला का आदर्श लिंगराज मंदिर एवं मुक्तेश्वर मंदिर समूह

परशुरामेश्वर मंदिर से आगे बढने पर एक अन्य मंदिरों का समूह है, जो मुक्तेश्वर मंदिर समूह कहलाता है। यहां परमेश्वर एवं मुक्तेश्वर 950 ईस्वीं के लगभग का निर्मित मंदिर है। यहां का स्थापत्य बेजोड़ है। इसका शिखर 35 फुट ऊंचा है तथा यहां का तोरणद्वार अलंकरण भी अत्यंत दर्शनीय है। परमेश्‍वर मन्दिर अभी सुरक्षित अवस्‍था में है। यह मन्दिर इस क्षेत्र के पुराने मन्दिरों में सबसे आकर्षक है। इसमें आकर्षक चित्रकारी भी की गई है। एक चित्र में एक नर्त्तकी और एक संगीतज्ञ को बहुत अच्‍छे ढंग से दर्शाया गया है। इस मन्दिर के गर्भगृह में एक शिवलिंग है। यह शिवलिंग अपने बाद के लिंगराज मन्दिर के शिवलिंग की अपेक्षा ज्‍यादा चमकीला है।  
मुक्तेश्वर मंदिर समूह 
मुक्‍तेश्‍वर मन्दिर में नागर शैली और कलिंग वास्तुकला का अद्भूत मेल देखा जा सकता है। मुक्‍तेश्‍वर मन्दिर में नक़्क़ाशी का बेहतरीन काम किया गया है। इस मन्दिर में की गई चित्रकारी काफी अच्‍छी अवस्‍था में है। एक चित्र में कृशकाय साधुओं तथा दौड़ते बंदरों के समूह को दर्शाया गया है। एक अन्‍य चित्र में पंचतंत्र की कहानी को दर्शाया गया है। इस मन्दिर के दरवाज़े आर्क शैली में बने हुए हैं। इस मन्दिर के खंभे पर भी नक़्क़ाशी की गई है। इस मन्दिर का तोरण मगरमच्‍छ के सिर जैसे आकार का बना हुआ है। इस मन्दिर के दायीं तरफ एक छोटा सा कुआं है इसे मरीची कुंड के नाम से भी जाना जाता है।
मुक्तेश्वर मंदिर पुजारी एवं लेखक 
थोड़ी देर हमने इस मंदिर समूह परिसर में व्यतीत किए। शिल्प की दृष्टि से भी यह अनूठे हैं। इसके बाद हम यहाँ से लिंगराज मंदिर की ओर चल पड़े, जिस रास्ते से आए उसी रास्ते से चलकर लिंगराज मंदिर पहुंचे। लिंगराज मंदिर में उत्सव के कारण कुछ अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्था दिखाई दे रही थी।  यहाँ मोबाईल कैमरे इत्यादि फ़ोटोखींचक साधन वर्जित हैं, आप बाहर से फ़ोटो ले सकते हैं, परन्तु भीतरी चित्र नहीं ले सकते। वैसे यह मंदिर भारतीय पुरातत्व के संरक्षण में है। परन्तु मुझे मित्रों ने कहा था कि यहाँ पंडों की ही चलती है, इसलिए फ़ोटो खींचने के नाम पर वाद-विवाद करना ठीक नहीं है। हमने कैमरा-मोबाईल और खड़ाऊ ऑटो रिक्शा में ही छोड़ दिए और मंदिर में प्रवेश किया। 
त्रिभंगी शालभंजिका मुक्तेश्वर 
मंदिर परिसर में पहुंचते ही पन्डा जी आ गए, हमने विनम्रता पूर्वक उनसे हाथ जोड़ लिए और आगे बढ गए। मंदिर में भोग का समय हो गया था और पाकशाला से मृदापात्रों में भोजन आने लगा। जिसे शिवलिंग के ईर्द-गिर्द वर्तुलाकार रखा जा रहा था। भारत में भगवान शिव कई रुपों में पूजे जाते हैं, भुवनेश्वर में शिवजी लिंगराज के नाम से पूजित हैं। रोचक तथ्य यह है कि लिंगराज मंदिर का प्रांगण 180 फीट है और कलश की ऊंचाई 40(8x5) मीटर है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा 8 फीट ऊंची है और यह जिस पीठिका पर स्थापित है वह जगह भी धरती से 8 फीट ऊंचाई पर है। मंदिर प्रांगण में भी 8 देवताओं के मंदिर हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार को सिंहद्वार के नाम से जाना जाता है। इसके एक ओर त्रिशूल तो दूसरी ओर सुदर्शन चक्र है। मुख्य मंदिर में शिव के अलावा विष्णु भी शालिग्राम के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
शिवोपासक 
लिंगराज मंदिर भगवान त्रिभुवनेश्वर को समर्पित है, इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1090-1104 में बना, किंतु इसके कुछ हिस्से 1400 वर्ष से भी ज्यादा पुराने हैं। इस मंदिर का वर्णन छठी शताब्दी के लेखों में भी आता है। लिंगराज मन्दिर, भुवनेश्वर का मुख्य मन्दिर है, इसे ययाति केशरी ने 617-657 ई. में बनवाया था तथा इसके बाद अपनी राजधानी को जाजपुर से भुवनेश्वर स्थानांतरित किया। धार्मिक कथा है कि लिट्टी तथा वसा नाम के दो भयंकर राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहीं पर किया था। संग्राम के बाद उन्हें प्यास लगी, तो शिवजी ने कूप बनाकर सभी पवित्र नदियों को योगदान के लिए बुलाया। ययाति केशरी द्वारा बिन्दूसागर सरोवर एवं उसके निकट ही लिंगराज के विशालकाय मन्दिर निर्माण के पश्चात कई शताब्दियों से भुवनेश्वर पूर्वोत्तर भारत में शैवसम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र रहा है। 
कंदुक क्रीड़ारत अप्सरा 
यह जगत प्रसिद्ध मन्दिर उत्तरी भारत के मन्दिरों में रचना सौंदर्य तथा शोभा और अलंकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। लिंगराज का विशाल मन्दिर अपनी अनुपम स्थात्यकला के लिए भी प्रसिद्ध है। मन्दिर में प्रत्येक शिला पर कारीगरी और मूर्तिकला का चमत्कार है। इस मन्दिर का शिखर भारतीय मन्दिरों के शिखरों के विकास क्रम में प्रारम्भिक अवस्था का शिखर माना जाता है। यह नीचे तो प्रायः सीधा तथा समकोण है किन्तु ऊपर पहुँचकर धीरे-धीरे वक्र होता चला गया है और शीर्ष पर प्रायः वर्तुल दिखाई देता है। इसका शीर्ष चालुक्य मन्दिरों के शिखरों पर बने छोटे गुम्बदों की भाँति नहीं है। 
मकर द्वार मुक्तेश्वर 
मन्दिर की पार्श्व-भित्तियों पर अत्यधिक सुन्दर नक़्क़ाशी की हुई है। यहाँ तक कि मन्दिर के प्रत्येक पाषाण पर कोई न कोई अलंकरण उत्कीर्ण है। जगह-जगह मानवाकृतियों तथा पशु-पक्षियों से सम्बद्ध सुन्दर मूर्तिकारी भी प्रदर्शित है। सर्वांग रूप से देखने पर मन्दिर चारों ओर से स्थूल व लम्बी पुष्पमालाएँ या फूलों के मोटे गजरे पहने हुए जान पड़ता है। गणेश, कार्तिकेय तथा गौरी के तीन छोटे मन्दिर भी मुख्य मन्दिर के विमान से संलग्न हैं। गौरीमन्दिर में पार्वती की काले पत्थर की बनी प्रतिमा है। मन्दिर के चतुर्दिक गज सिंहों की उकेरी हुई मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं।
लिंगराज मंदिर (गूगल से साभार)
गर्भग्रह के अलावा जगमोहन तथा भोगमण्डप में सुन्दर सिंहमूर्तियों के साथ देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएँ हैं। यहाँ की पूजा पद्धति के अनुसार सर्वप्रथम बिन्दुसरोवर में स्नान किया जाता है, फिर क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किए जाते हैं, जिनका निर्माणकाल नवीं से दसवीं सदी का रहा है।। गणेश पूजा के बाद गोपालनीदेवी, फिर शिवजी के वाहन नंदी की पूजा के बाद लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान में प्रवेश किया जाता है। जहाँ आठ फ़ीट चौड़ा तथा क़रीब एक फ़ीट ऊँचा ग्रेनाइट पत्थर का स्वयंभू लिंग स्थित है। लिंगराज मंदिर के दर्शन के पश्चात बिकास बाबू ने धौलिगिरि पहाड़ चलने की योजना बना ली और हम वहां चल पड़े। जारी है……आगे पढें।

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

नाट मंडप में नृत्य करती अप्सराएं - कलिंग यात्रा


हम चलते-चलते मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंच गए। मुख्य द्वार पर पुरातत्व विभाग के सुरक्षा कर्मी तैनात हैं, जो आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की टिकिट की जाँच करते हैं। इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों से 10 रुपए प्रति व्यक्ति शुल्क लिया जाता है। उंचे अधिष्ठान पर मंदिर तीन भागों में विभक्त है। 

पहले नाट मंडप है, जिसके प्रवेश द्वार पर दो विशाल सिंह हाथियों पर आक्रमण करते दिखाई देते हैं। हाथियों से विशाल विकराल सिंहों का निर्माण किया गया है। दोनो हाथियों ने सुंड से एक-एक व्यकित को दबोच रखा है और हाथियों को सिंह ने। 

भूतल से सिंह प्रतिमाओं की उंचाई 9.2 फ़ुट है। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। 28 टन की 8.4 फ़ुट लंबी 4.9 फ़ुट चौड़ी हैं। सिंह अलंकरण से युक्त हैं। नाट मंडप तक पहुंचने के लिए भूतल से 18 पैड़ियों का निर्माण किया गया है। यहाँ से प्रवेश करने पर सामने जगमोहन दिखाई देता है। नाट मंडप मुख्य मंदिर से पृथक अधिष्ठान पर पूर्व दिशा में निर्मित है। 

मंडप को तीन भागों में बांटा गया है। इस मंडप की पश्चिम दिशा में जगमोहन एवं गर्भगृह है। कहते हैं कि इन तीनों भागों से सूर्य की किरणें जगमोहन में प्रदेश कर गर्भ गृह में स्थापित सूर्य की प्रतिमा को आलोकित करती थी। यही प्राचीन शिल्प का चमत्कार है। 

इनको बारह महीनों के क्रम में बांटा गया है और प्रत्येक 4 महीने एक हिस्से से सूर्य की किरणें मंदिर में प्रवेश करती थी। नाट मंडप में वाद्यकों, विद्याधरों, अप्सराओं एवं गंधर्वों का शिल्पांकन किया गया है। स्तंभो एवं भित्तियों पर इन्हें स्थान दिया गया है।

मंडप को सुंदर लता वल्लरियों से सजाया गया है। स्तंभों में सिंह व्याल को प्रमुखता दी गई है। उड़ीसा क्षेत्र में परम्परागत रुप से बजाए जाने वाले वाद्य भी यहाँ दिखाई देते हैं। तत्कालीन संगीत संस्कृति की झलक इस स्थान पर दिखाई देती है। 

नाट मंडप के अधिष्ठान की ऊंचाई लगभग 10 फ़ुट है एवं नाट मंडप की ऊंचाई 128 फ़ुट बताई जाती है। इस मंडप में पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सरंक्षण का किया कार्य स्पष्ट दिखाई देता है। हम जब नाट मंडप में पहुचे तो पर्यटकों की संख्या अच्छी खासी दिखाई दी। इस स्थान पर उड़ीसा सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति विभाग द्वारा सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। आगे पढ़े जारी है……