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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

चंद्रभागा के तट पर सांब की अर्क उपासना - कलिंग यात्रा

प्रारंभ से पढ़े…
मारे पास समय कम था और हमें भुवनेश्वर भी पहुंचना था। सूर्य मंदिर की हम एक परिक्रमा पूर्ण कर चुके थे। मेरे द्वारा मंदिर  निरीक्षण की मंदगति को देख कर बिकाश थक चुका था। इसक अहसास भी मुझे था। सूर्यमंदिर की जगती के अतिरिक्त भित्तियों में काम प्रधान प्रतिमाएं जड़ी हुई हैं। आकार में छोटी और बड़ी दोनो तरह की हैं। मैं सभी प्रतिमाओं के चित्र ले रहा था। मंडप का द्वार काले ग्रेनाईट से बहुत ही सुंदर बना है। लता, पुष्प वल्लरियों के साथ अन्य मानवीय चित्र भी अद्भुत हैं। मंडप का द्वार बंद कर दिया गया है। ब्रिटिश पुराविद फ़र्ग्यूसन ने जब 1837 में इस स्थान का भ्रमण किया था तो उस समय मुख्य मंदिर का एक कोना बचा हुआ था, जो अब नहीं है। मंडप के द्वार पर काले ग्रेनाईट के पत्थर पर अंग्रेजी में बंगाल के लेफ़्टिनेंट गर्वनर का आदेश लिखा हुआ है कि इस सुंदर संचरना के भीतरी भाग को बंद कर दिया गया है। आदेश की तारीख 1903 लिखी हुई है। इस मंडप के भीतरी भाग में रेत भर कर द्वार बंद कर दिया गया है।  
बंगाल के लेफ़्टिनेंट गर्वनर का आदेश 
अब जर्जर हुए इस मंडप को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एक बार फ़िर खोलने जा रहा है। इसकी मरम्मत का कार्य शुरु हो गया है। मुख्य मंडप से पत्थर गिरने के कारण इसे बंद कर दिया गया था। 2008 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे खोलने पर विचार करना शुरु किया। पुराविदों के तकनीकी अध्ययन में पता चला कि मुख्य मंडप में भरी गई रेत खिसककर नीचे आ गई है। इसी तरह आठ सौ साल पुराने इस मंदिर की दीवारों के दरारों में भरा गया मसाला भी निकल चुका है और दीवारें खोखली हो गई हैं। मंदिर का गर्भ गृह पहले ही गिर चुका है। वास्तुकार प्रतिमा बोस व इटली के पुरातत्वविद प्रोफेसर कोरोसी से रिपोर्ट तैयार कराई, जिसमें बताया कि मंदिर को संरक्षित कर गिरने से बचाया जा सकता है। संरक्षण कार्य के पश्चात इसे खोला जा सकता है।
सूर्यमंदिर परिसर का हाट
मैं जब चित्र खींच रहा था। तब शार्दूल की छांह में विक्रम भी ऊंघ रहा था। मैने जल्दी जल्दी चित्र खींचने का काम सम्पन्न किया और हम स्मारक से बाहर आ गए। स्मारक के रास्ते में हैंडलूम के सामान की दुकाने लगी हुई हैं, जैसे सभी प्रसिद्ध स्थलों पर होती है। यात्री इनसे कुछ सामान स्मृति के लिए खरीदकर ले जाते हैं। हमने कुछ नहीं खरीदा। अब हमें चंद्रभागा के तट पर जाना था। चंद्रभागा तट की दूरी यहाँ से लगभग 3 किलोमीटर है। बिकाश बाबू दही बड़ा का स्वाद लेने लगे और हमने पान बनवाया। उड़ीसा के पान में चूने की मात्रा थोड़ी अधिक होती है इसलिए चूना लगाने में थोड़ी कंजूसी बरतने के लिए पान वाले को कहना चाहिए, अन्यथा मुंह का भीतरी भाग भोजन करने लायक नहीं रहेगा। बाकी बनारस, इलाहाबाद, छत्तीसगढ़ में चूना एवं कत्था की मात्रा पान में संतुलित रहती है। पान खाकर हमने विकम का धन्यवाद करते हुए उससे विदा ली और 60 रुपए में आटो किराया करके चंद्रभागा तट की ओर चल पड़े।
चन्द्रभागा के तट पर बीजू बाबू
ुचंद्रभागा तट पर समुद्र दूर से ही दिखाई देने लगता है। तट पर सामने बीजू बाबू की विशाल प्रतिमा समुद्र की ओर संकेत करते हुए स्थापित की गई है। प्रतिमा देख कर ऐसा लगता है कि जैसे बीजू बाबू स्वयं ही चंद्रभागा तट का रास्ता बता रहे हों। आजादी के बाद के उड़ीसा में बीजू बाबू का महत्वपूर्ण स्थान है और यहाँ की जनता उन्हें खूब चाहती थी। इसी चाहत का फ़ायदा उठा कर नोबिन बाबू इतने बरसों से राज कर रहे हैं। जबकि उन्हें उड़िया भाषा भी बोलनी नहीं आती। उन्होने मुख्यमंत्री रहते हुए सिर्फ़ बीजू बाबू के पुतले ही प्रत्येक गाँव में लगाए हैं, यही उड़ीसा के विकास में एक महत्वपूर्ण काम हुआ है। लोग पुतलों को देख कर ही वोट दे देते हैं। उन्हे लिए यही अच्छे दिन हैं। बाकी तो जो है सो हैइए है। 
लहरों के साथ थोड़ी मस्ती हो जाए
समुद्र तट पर जलकिलोल करते बहुत सारे नर-नारी, युवा वृद्ध एवं नव विवाहित जोड़े भी दिखाई दिए। आज कल तो हर आदमी के हाथ में कैमरा है। बस खटा खट फ़ोटो खींचने का ही काम हो रहा था। कोई लहरों के साथ फ़ोटो खिंचवा रहा था कोई नई नवेली दुल्हिन के साथ। हम लोग भी कुछ देर समुद्र का आनंद लेते रहे। बड़ी लहरे आती और दूर तक सागर का विस्तार कर भिगो देती। बिकास बाबू फ़ोटू खींच रहे थे और मैं सोच रहा था कि यह वही स्थान है जहाँ आकर अर्क उपासना करने से साम्ब का कोढ दूर हुआ। लोगों को तो यह मालूम ही नहीं है कि यह स्थान पौराणिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है। पर्यटकों को भी इतिहास से अधिक मतलब नहीं रहता। उन्हें तो सिर्फ़ घूमने फ़िरने और खाने पीने से मतलब होता है और यही पर्यटन भी है।
बिकास बाबू चंद्राभागा के जल का आचमन करते हुए
कृष्ण के जांबवती से जन्मे पुत्र सांब अत्यन्त सुंदर थे। कृष्ण की स्त्रियाँ जहाँ स्नान किया करती थीं, वहाँ से नारद जी निकले। उन्होंने देखा कि वहाँ स्त्रियाँ सांब के साथ प्रेमचेष्टा कर रही है। यह देखकर नारद श्रीकृष्ण को वहाँ लिवा लाए। कृष्ण ने जब यह देखा तब उन्होंन उसे कोढ़ी हो जाने का शाप दे दिया। जब सांब ने अपने को इस संबंध में निर्दोष बताया तब कृष्ण ने उन्हें मैत्रये बन (मित्रवन) जाकर अर्क उपासना करने को कहा। यहाँ अर्क शब्द के कई अर्थ होते हैं। अर्क का अर्थ सूर्य, मदार एवं वनस्पति से तैयार औषधि भी होता है। श्राप के अनुसार सांब ने यहाँ रहकर अर्क (मदार) के अर्क (औषधि) का लेपन कर अर्क उपासना ( सूर्य रश्मि स्नान) बारह वर्षों तक किया। इस कठिन चिकित्सा से उसका कोढ ठीक हो गया। 
मछुवारों की बस्ती 
पुराणानुसार सांब की आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया। दूसरे दिन जब वे चंद्रभागा नदी में स्नान करने गए तो उन्हें नदी में कमल पत्र पर सूर्य की एक मूर्ति दिखाई पड़ी। उस मूर्ति को लाकर सांब ने यथाविधि स्थापना की और उसकी पूजा के लिये अठारह शाकद्वीपी ब्राह्मणों को बुलाकर वहाँ बसाया। पुराणों में इस सूर्य मूर्ति का उल्लेख कोणार्क अथवा कोणादित्य के नाम से किया गया है। कहते है कि रथ सप्तमी को सांब ने चंद्रभागा नदी में स्नानकर उक्त मूर्ति प्राप्त की थी। आज भी उस तिथि को वहाँ लोग स्नान और सूर्य की पूजा करने आते हैं और मेला जैसा वातावरण यहाँ दिखाई देता है। एक तरह से चंद्रभागा तट श्रद्धा के कारण पुण्य क्षेत्र माना गया है।
टाईटनिक की उड़ान - चल छैंया छैंया
इस तट से थोड़ा आगे चलकर मछुवारों की बस्ती है, जहाँ रंगबिरंगी सैकड़ों नावें रखी है। एक तरह से मान कर चलें तो यह नावों का अड्डा है। मछुवारे मछली मार कर आने के बाद उसे यहीं सुखाते है और उसे बाजार तक पहुंचाते हैं। हम इस बस्ती की ओर आ गए। कुछ मछुवारे अपने जालों की मरम्मत कर रहे थे और कुछ मदपान कर मस्त थे। यहां के वातावरण में मछली की गंध समाई हुई थी। हमने कुछ चित्र यहां पर लिए। सांझ हो रही थी और अर्करथ अस्ताचल की ओर चल पड़ा था। आसमान में लालिमा छाई हुई थी। हमें भी भुवनेश्वर पहुंचना था। शाम के 7 बजे अंतिम बस भुवनेश्वर की ओर जाती है। सार्वजनिक वाहन से यात्रा करने के लिए व्यक्ति को उसी के समय के हिसाब से चलना पड़ता है। हम बस अड्डे की ओर आ गए और थोड़ी देर में हमें भुवनेश्वर के बस मिल गई।  जारी है आगे पढ़ें……

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सूर्य मंदिर कोणार्क के विध्वंस की कथाएं - कलिंग यात्रा

प्रारंभ से पढ़े…… जब इतिहास के पन्नों पर समय की गर्द जमा हो जाती है तो सत्यता भी प्रभावित होती है। तब बहुत सारी किंवदन्तियाँ, मिथक, कहानियां एवं गल्प कथाएं उसका स्थान लेकर सत्य को ढक कर भ्रमित कर देती हैं। यही स्थिति कोणार्क की भी है। इसके विध्वंस के पार्श्व में कई तरह के मिथक एवं लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। इनके बीच सत्यान्वेषण करना कठिन एवं दूरुह कार्य है। लिखित अभिलेख एवं प्रमाण मिलने पर सत्यता सामने आ जाती है, परन्तु प्रमाण न होने के कारण सिर्फ़ कयास ही लगाए जा सकते हैं या जनश्रुतियों एवं लोकमान्यताओं पर ही आधारित रहना होता है।

चुम्बक पत्थर - विध्वंस के पीछे जनश्रुति है कि सूर्य मंदिर के शिखर पर एक चुम्बक पत्थर लगा था, इसके प्रभाव से समुद्र से गुजरने वाले सागरपोत इस ओर खींचे चले आते थे जिससे उन्हें भारी क्षति होती थी और उनके दिशा निरुपण यंत्र चुम्बक के प्रभाव में आने के कारण भ्रमित हो जाते थे। जिससे दिशा भ्रम हो जाता था। इसलिए मुस्लिम नाविक इसे निकाल ले गए। केन्द्रीय शिला के स्थान पर यह चुम्बक प्रयुक्त होता था, इसे निकालने के कारण मंदिर की भित्तियों का संतुलन बिगड़ गया और दीवारे गिर पड़ी। इस घटना कोई आधार नहीं मिलता न कोई लिखित अभिलेख। सबसे पहले प्रश्च यह उठता है कि शिखर की टनों वजनी शिला को आवेशित कर चुम्बक किस तरह बनाया गया होगा? आठ सौ वर्षों पूर्व इतने बड़े चुम्बक बनाने का उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इससे प्रतीत होता है कि चुम्बकीय पत्थर की कहानी कपोल कल्पित है।

वास्तु दोष - कई वास्तु शास्त्री मानते हैं कि मंदिर निर्माण परिकल्पना में वास्तु दोष था। यह भवन वास्तु के नियमों के विपरीत तैयार हुआ था। वास्तु शास्त्री तर्क देते हैं कि - मंदिर का निर्माण रथ आकृति होने से पूर्व, दिशा, एवं आग्नेय एवं ईशान कोण खंडित हो गए। पूर्व से देखने पर पता लगता है, कि ईशान एवं आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य एवं नैऋर्त्य कोणों की ओर बढ़ गया है। प्रधान मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने नृत्यशाला है, जिससे पूर्वी द्वार अवरोधित होने के कारण अनुपयोगी सिद्ध होता है। नैऋर्त्य कोण में छायादेवी के मंदिर की नींव प्रधानालय से अपेक्षाकृत नीची है। उससे नैऋर्त्य भाग में मायादेवी का मंदिर और नीचा है। आग्नेय क्षेत्र में विशाल कुआं स्थित है। दक्षिण एवं पूर्व दिशाओं में विशाल द्वार हैं, जिस कारण मंदिर का वैभव एवं ख्याति क्षीण हो गई हैं। मै मानता हूं कि सूर्यमंदिर के पतन में कोई वास्तु दोष कार्य नहीं कर रहा था। यह मानव के दिमाग की उपज मात्र है। बिसु महाराणा उत्तम दर्जे का वास्तुकार था, उसके कार्य पर संदेश नहीं किया जा सकता।

राजा की अकाल मृत्यू - यह कई इतिहासकारों का मत है, कि कोणार्क मंदिर के निर्माणकर्ता, राजा लांगूल नृसिंहदेव की अकाल मृत्यु के कारण, मंदिर का निर्माण कार्य खटाई में पड़ गया। इसके परिणामस्वरूप, अधूरा ढांचा ध्वस्त हो गया। लेकिन इस मत को एतिहासिक आंकड़ों का समर्थन नहीं मिलता है। पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार और कुछ १२७८ ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने १२८२ तक शासन किया। कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण १२५३ से १२६० ई. के बीच हुआ था। अतएव मंदिर के अपूर्ण निर्माण का इसके ध्वस्त होने का कारण होना तर्कसंगत नहीं है। ऐतिहासिक प्रमाणों की दृष्टि से यह दावा भी खारिज हो जाता है।

शिल्पकार की मृत्यू - जन श्रुति है कि इस मंदिर में कभी पूजा नहीं हुई, एक दंतकथा प्रचलित है कि संपूर्ण प्रकार के निर्माण हो जाने पर शिखर के निर्माण की एक समस्या उठ खड़ी हुई। कोई भी स्थपति उसे पूरा कर न सका तब मुख्य स्थपति के धर्मपाद नामक 12 वर्षीय पुत्र ने यह साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया। उसके बाद उसने यह सोचकर कि उसके इस कार्य से सारे स्थपतियों की अपकीर्ति होगी और राजा उनसे नाराज हो जाएगा, उसने उस शिखर से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस मौत के पश्चात इस मंदिर में न प्राण प्रतिष्ठा हुई और न कोई पूजा हो सकी। इसलिए देख रेख के अभाव में मंदिर ढहते गया।

एक कथा के अनुसार, गंग वंश के राजा नृसिंह देव प्रथम ने अपने वंश का वर्चस्व सिद्ध करने हेतु, राजसी घोषणा से मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बारह सौ वास्तुकारों और कारीगरों की सेना ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और ऊर्जा से परिपूर्ण कला से बारह वर्षों की अथक मेहनत से इसका निर्माण किया। राजा ने पहले ही अपने राज्य के बारह वर्षों की कर-प्राप्ति के बराबर धन व्यय कर दिया था। लेकिन निर्माण की पूर्णता कहीं दिखायी नहीं दे रही थी। तब राजा ने एक निश्चित तिथि तक कार्य पूर्ण करने का कड़ा आदेश दिया। 

बिसु महाराणा के पर्यवेक्षण में, इस वास्तुकारों की टीम ने पहले ही अपना पूरा कौशल लगा रखा था। तब बिसु महाराणा का बारह वर्षीय पुत्र, धर्म पाद आगे आया। उसने तब तक के निर्माण का गहन निरीक्षण किया, हालांकि उसे मंदिर निर्माण का व्यवहारिक ज्ञान नहीं था, परन्तु उसने मंदिर स्थापत्य के शास्त्रों का पूर्ण अध्ययन किया हुआ था। उसने मंदिर के अंतिम केन्द्रीय शिला को लगाने की समस्या सुझाव का प्रस्ताव दिया। उसने यह करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। लेकिन इसके तुरन्त बाद ही इस विलक्षण प्रतिभावान का शव सागर तट पर मिला। कहते हैं, कि धर्मपाद ने अपनी जाति के हितार्थ अपनी जान तक दे दी। सूर्य मंदिर से हम चंद्रभागा के तट की ओर चल पड़े ………   आगे पढ़े जारी है………

बुधवार, 23 सितंबर 2015

काला पहाड़: सूर्य मंदिर विध्वंस का मुख्य किरदार - कलिंग यात्रा

काला पहाड़ - मंदिर के विध्वंस के कारण के रुप में एक कहानी काला पहाड़ की भी सुनाई देती है। काला पहाड़ मुस्लिम आक्रांता था और उसने मंदिर पर आक्रमण करके इसकी कुंजी शिला को निकाल दिया जिसके कारण मंदिर ढह गया। इतिहास बताता है कि भारत में विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटपाट की दृष्टि से बहुत हमले किए और लूट कर चले गए। परन्तु मुगलों ने आने के बाद जाने का नाम नहीं लिया। वे शासन करने लिए अपना लश्कर बढ़ाने लगे। लूट पाट एवं नरसंहार करते हुए उनका लश्कर काश्मीर की तरफ़ बढ़ा तो कौतुहल वश कई युवा छुप कर लश्कर देखने आए जहाँ फ़ौज डेरा डाल कर आराम कर रही थी। लड़कों के सामने एक सिपाही आ गया तो उन्होने से सिपाही से पूछा कि बहुत अच्छी महक आ रही है, क्या पक रहा है? सिपाही ने कहा कि अब तुम हिन्दू नहीं रहे क्योंकि पक रहे गौमांस को तुमने पसंद कर लिया।

यह बात आग की तरह फैली और जब वह लड़का गाँव पंहुचा तब पंचायत हुई । और पंचायत ने उसे अलग कर दिया । क्योकि उसने गाय के मांस की तारीफ की । क्षमा याचना का भी असर नही हुआ पंडितो ने भी उसे धर्म से अलग किया । हर धर्म अधिकारी से गुहार यहाँ तक बनारस तक से उस युवक को निराशा मिली । वह युवक क्रोधित हुआ और उसने अपमान का बदला लेने के लिए हिंदू धर्म को छोड़ कर मुस्लिम धर्म अपनाया । और बदला लेने के लिए हिन्दुओं का संहार किया । किद्व्नती है उसने अस्सी किलो जनेऊ काटे और वह काला पहाड़ के नाम से जाना गया ।  

आगे चल कर इस काला पहाड़ नामक आक्रांता ने मंदिर तोड़ने प्रारंभ कर दिए। 1568 ई. में उसने उड़ीसा पर चढ़ाई की और वहाँ के राजा को पराजित किया तथा बाद में पुरी के जगन्नाथ मन्दिर को लूटा। इसके बाद उसने राजा नर नारायण के भाई चिला राय की कोच सेना को हराया। आसाम में वह तेजपुर तक चढ़ गया और गौहाटी के निकट कामाख्या मन्दिर को नष्ट कर दिया। 1583 ई. में वह राजमहल के निकट नौसैनिक लड़ाई में बादशाह अकबर की फ़ौजों से हार गया और मारा गया। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मदन पंजी बताते हैं, कि कालापहाड़ ने उड़ीसा पर हमला किया। कोणार्क मंदिर सहित उसने अधिकांश हिन्दू मंदिरों की प्रतिमाएं भी ध्वस्त की। हालांकि कोणार्क मंदिर की २०-२५ फीट मोटी दीवारों को तोड़ना असम्भव था, उसने किसी प्रकार से दधिनौति (मेहराब की शिला) को हिलाने का प्रयोजन कर लिया, जो कि इस मंदिर के गिरने का कारण बना। दधिनौति के हटने के कारण ही मंदिर धीरे-धीरे गिरने लगा और मंदिर की छत से भारी पत्थर गिरने से छत भी ध्वस्त हो गयी। 

इसके बाद १५६८ में उड़ीसा मुस्लिम नियंत्रण में आ गया। तब भी हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के निरंतर प्रयास होते रहे। इस समय पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पंडों ने भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति को श्रीमंदिर से हटाकर किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया। इसी प्रकार, कोणार्क के सूर्य मंदिर के पंडों ने प्रधान देवता की मूर्ति को हटा कर, वर्षों तक रेत में दबा कर छिपाये रखा। बाद में, यह मूर्ति पुरी भेज दी गयी और वहां जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित, इंद्र के मंदिर में रख दी गयी। अन्य लोगों के अनुसार, यहां की पूजा मूर्तियां अभी भी खोजी जानी बाकी हैं। लेकिन कई लोगों का कहना है, कि सूर्य देव की मूर्ति, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है, वही कोणार्क की प्रधान पूज्य मूर्ति है।

फिर भी कोणार्क में, सूर्य वंदना मंदिर से मूर्ति के हटने के बाद से बंद हो गयी। इस कारण कोणार्क में तीर्थयात्रियों का आना जाना बंद हो गया। कोणार्क का पत्तन (बंदरगाह) भी डाकुओं के हमले के कारण, बंद हो गया। कोणार्क सूर्य वंदना के समान ही वाणिज्यिक गतिविधियों हेतु भी एक कीर्तिवान नगर था, परन्तु इन गतिविधियों के बन्द हो जाने के कारण, यह एकदम निर्वासित हो चला और वर्षों तक एक गहन जंगल से ढंक गया। सन १६२६ में, खुर्दा के राजा, नृसिंह देव, सुपुत्र श्री पुरुषोत्तम देव, सूर्यदेव की मूर्ति को दो अन्य सूर्य और चन्द्र की मूर्तियों सहित पुरी ले गये। अब वे पुरी के मंदिर के प्रांगण में मिलती हैं। पुरी के मदल पंजी के इतिहास से ज्ञात होता है, कि सन १०२८ में, राजा नॄसिंहदेव ने कोणार्क के सभी मंदिरों के नाप-जोख का आदेश दिया था। मापन के समय, सूर्य मंदिर अपनी आमलक शिला तक अस्तित्व में था, यानि कि लगभग २०० फीट ऊंचा। 

कालापहाड़ ने केवल उसका कलश, बल्कि पद्म-ध्वजा, कमल-किरीट और ऊपरी भाग भी ध्वंस किये थे। पहले बताये अनुसार, मुखशाला के सामने, एक बड़ा प्रस्तर खण्ड – नवग्रह पाट, होता था। खुर्दा के तत्कालीन राजा ने वह खण्ड हटवा दिया, साथ ही कोणार्क से कई शिल्प कृत पाषाण भी ले गया। और पुरी के मंदिर के निर्माण में उनका प्रयोग किया था। मराठा काल में, पुरी के मंदिर की चहारदीवारी के निर्माण में कोणार्क के पत्थर प्रयोग किये गये थे। यह भी बताया जाता है, कि नट मंदिर के सभी भाग, सबसे लम्बे काल तक, अपनी मूल अवस्था में रहे हैं। और इन्हें मराठा काल में जान बूझ कर अनुपयोगी भाग समझ कर तोड़ा गया। सन १७७९ में एक मराठा साधू ने कोणार्क के अरुण स्तंभ को हटा कर पुरी के सिंहद्वार के सामने स्थापित करवा दिया। अठ्ठारहवीं शताब्दी के अन्त तक, कोणार्क ने अपना, सारा वैभव खो दिया और एक जंगल में बदल गया। इसके साथ ही मंदिर का क्षेत्र भी जंगल बन गया, जहां जंगली जानवर और डाकुओं के अड्डे थे। यहां स्थानीय लोग भी दिन के प्रकाश तक में जाने से डरते थे। इस तरह सूर्य मंदिर के विध्वंस की कथाएं सामने आती हैं।  जारी है, आगे पढ़े …

शुक्रवार, 1 मई 2015

सूर्यमंदिर का निर्माण : इतिहास की महान परियोजना - कलिंग यात्रा

अभी तक सूर्यमंदिर के अधिष्ठान एवं भित्तियों पर जड़ी प्रतिमाओं पर ही एक नजर डाल रहे थे। अब बारी है मंदिर निर्माण एवं उसकी संरचना की। सूर्य मंदिर निर्माण की योजना साधारण नहीं है। काल के हिसाब से तत्कालीन राज्य के विशाल एवं महत्वाकांक्षी योजना थी। इसके प्रारुप निर्माण पर ही काफ़ी वक्त लगा होगा। प्रधान शिल्पकार बिशु महाराणा ने अपने निर्माण दल के साथ महीनों विचार विमर्श किया होगा तब कहीं जाकर इस योजना का प्रारुप तैयार हुआ होगा। हमने देखा है कि मंदिर की भित्तियों का कोई भी स्थान खाली नहीं है जिस पर शिल्पकार की छेनी के निशान नहीं है। ज्यामितिय आकृतियों के साथ भित्तियों पर विषयाधारित शिल्पांकन महत्वपूर्ण है। प्रतिमाओं में राजा के परिजनों से लेकर उनकी गतिविधियों को स्थान दिया गया है। अपने प्रज्ञानुसार तो बिशु (विष्णु) महाराणा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी होगी।

अगर कल्पना दृश्यांकन करें तो निर्माण स्थल पर मेला लगा रहता होगा। बारह सौ शिल्पकार और उनके सहयोगियों तथा निर्माण सामग्री पूर्तिकर्ताओं को मिलाकर कम से कम पांच हजार की मानव संख्या कार्य में लगी होगी। निर्माण स्थल पर इनकी दिनचर्या से संबंधित सारी वस्तुएं उपलब्ध कराई गई होगीं तथा इनके भोजन के लिए विशाल भोजनालय का भी अस्थायी निर्माण किया गया होगा। शिला निर्माण योजनाबद्ध हो रहा होगा। सैकड़ों लोहार लोहे की पट्टी तैयार कर रहे होगें जिनसे शिलाओं को बांधना है। प्रधान शिल्पी एक-एक निर्माण का स्वयं निरीक्षण कर रहा होगा। राजा के कारनून निर्माण कार्य में लगने वाले धन का संग्रह कर रहे होगें। निर्माण में गजबल एवं अन्य पशुबल के लिए भी चारा जुटाया गया होगा। आखिर एक विशाल स्मारक का निर्माण हो रहा था।

सिंहद्वार की एक प्रतिमा का वजन 28 टन बताया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निर्माण में 40 एवं 50 टन के भी प्रस्तर खंडों का प्रयोग किया गया होगा। इन पत्थरों को पहाड़ से काट कर अलग करने एवं निर्माण स्थल तक लाने में श्रम के साथ धन भी पानी की तरह बहाया होगा। तेरहवी सदी वैसे भी विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी। निर्माण के लिए आधुनिक यत्रों का प्रयोग किया गया होगा। पत्थरों पर कारीगरी करने के लिए जल की आवश्यकता भी होती है। निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले जल की भी व्यवस्था की गई होगी। छेनी हथौड़ी की लयबद्ध तान निर्माण स्थल पर बरसों गुंजती रही होगी और शिल्पकारों का पसीना बह कर चंद्रभागा नदी में मिल कर समुद्र को और भी खारा कर गया होगा। 

कलिंग की अपनी विशिष्ट शैली है, जिसमें कोणीय अट्टालिका पर मंडप की तरह छतरी ढ़ंकी होती है। यह मंदिर भी  उड़ीसा के अन्य मंदिरों जैसा ही है। मुख्य गर्भ गृह की ऊंचाई 229 फ़ुट मापी गई है। गर्भ गृह के साथ नाट्यशाला 128 फ़ुट ऊंची है। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फ़ुट X 50 फ़ुट का है। यह मंदिर पुर्व एंव पश्चिम दिशा में बना है। निर्माण में प्रयुक्त प्रत्येक शिला को लोहे की पट्टियों (क्लैंप) से बांधा गया है। शिलाओं को स्थापित करने में कहीं पर भी अन्य लेपन (चूना या अन्य) का प्रयोग नहीं किया गया। मंदिर के समस्त निर्माण को योजनानुसार एक दूसरे पत्थर के साथ लौह बंधन में ही बांधा गया है। इसका उदाहरण हमें मंदिर में कई स्थानों पर मिलता है।

मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहीं दूरस्थ स्थान से लाए गए होगें। खैर अबुल फ़जल कुछ भी कहे पर मंदिर निर्माण के साथ नरसिंह देव का ही नाम जुड़ा हुआ है।. पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ 1278 ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने 1282 तक शासन किया. कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के बीच हुआ था।

इतिहास की कहानी प्रमाणों के अभाव में अनुमान पर ही गति प्राप्त करती है। इस मंदिर के निर्माण से लेकर विध्वंस तक अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। कोई भी सदा के लिए साक्षी नहीं हो सकता। एक कालखंड तक ही जीवित साक्ष्य मिल पाते हैं। कहते हैं कि मंदिर में पूजा नहीं हो सकी। यह मंदिर बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही रह गया। अगर मुख्य गर्भ गृह में प्रतिमा की स्थापना हो जाती तो पूजा भी अनिवार्य रुप से शुरु हो जाती। पूजा न होने के पीछे भी कई कहानियाँ सामने आती हैं। सर्व प्रथम तो कहा जाता है कि मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के पुत्र की मृत्यु मंदिर निर्माण के समय हो गई थी। इसे अपशुगन मान कर आगे का कार्य पूर्ण नहीं हो सका। एक अन्य किंवदन्ति कहती है कि मंदिर निर्माण के दौरान ही राजा की अकाल मृत्यु हो गई। इसलिए निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका। खैर उस काल में जो भी हुआ हो परन्तु कोणार्क के रुप में दुनिया को एक अद्भुत कृति प्राप्त हो गई। जो वर्तमान में भी विद्यमान है।

मंदिर के विध्वंस के विषय में भी कई किंवदन्तियां सुनाई देती हैं। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण में वास्तु दोष था इसलिए मंदिर में पूजा न हो सकी और कालांतर में ध्वस्त हो गया। अब तथाकथित वास्तु शास्त्रियों को भी अपना उल्लू सीधा करने का साधन मिल गया। सबसे बड़ा वास्तुकार और वास्तुशास्त्री तो बिशु महाराणा था जिसने राजा की परिकल्पना को साकार किया। इतनी बड़ी योजना पर कार्य करने वाला वास्तुकार और शिल्पकार इतना मुर्ख नहीं होगा कि उसे वास्तु ग्रंथों का ज्ञान ही न हो और राजा भी इतना मुर्ख नहीं होगा कि जो अनाड़ी व्यक्ति के हाथों में अपने जीवन की सबसे भव्य एवं महत्वपूर्ण परियोजना को किसी ऐरे गैरे के हाथों में बर्बाद करने के लिए दे दे। आज व्यक्ति छोटा सा दो कमरों का मकान बनाता है तो वह खर्च करने से पहले किसी वास्तुकार से नक्शा बनवा कर उसकी देख रेख में कार्य शुरु करता है। जारी है आगे पढ़े…

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

दक्षिण अफ़्रीका देशों से कलिंग के सम्बंध - कलिंग यात्रा


जो राजा प्रजा वत्सल होता है वही राज्य में लोकप्रिय होता है और प्रजा उसे पिता तुल्य मानती है। उसके एक संकेत पर धन जन न्यौछावर हो जाता है। राज्य की व्यवस्था संचालन के लिए धन एवं सैनिक दोनो की आवश्यकता होती है। अगर राजा की कराधान व्यवस्था प्रजा अनुकूल है तो उसे प्रजा के प्रेम के साथ धन भी सहजता से उपलब्ध होता था। लूट पाट कर प्रजा का खून चूसने वाला राज्य अधिक दिनों तक स्थाई नहीं रहता। वर्तमान में भी यही दिखाई देता है। कोणार्क की भित्तियो पर राजकाज को भी स्थान दिया है। राज सभा की गतिविधियों का चित्रण करते हुए तत्कालीन शासक को अपने दरबारियों से मंत्रणा करते हुए दिखाया गया है। शांतिकाल एवं युद्ध काल की राज सभा स्पष्ट दिखाई देती है।  
युद्ध पूर्व मंत्रणा
प्रतिमा संकेतों से ज्ञात होता है कि राजा नृसिंह देव के शासन काल में उन्हें राज्य रक्षा के लिए युद्ध भी लड़ने पड़े। एक चित्र में दिखाया गया है कि सिंहासनारुढ़ नृप अपने राज सभासदों एवं दरबारियों से मंत्रणा कर रहा है। सभी उसकी आज्ञा का पालन करने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। साथ ही दरबार के बाहर अश्व एवं गज सेना तैयार है कि युद्ध मंत्रणा और रणनीति पर चर्चा सम्पन्न होते ही सेना युद्ध के लिए कूच कर जाएगी। एक अन्य प्रतिमा में अश्वारुढ़ राजा को शीश विहीन दिखाया गया है। इससे ज्ञात होता है कि किसी भीषण युद्ध में राजा ने अभूतपूर्व युद्ध कौशल का परिचय देते हुए शत्रु सेना को आतंकित कर प्राण त्याग दिए, प्राणोसर्ग पर्यंत भी उसका धड़ युद्ध करते रहा। युद्ध में अश्व गतिमान दिखाई दे रहा है। शीश कटने के बाद युद्ध करने की कई किवदंतियाँ समाज में प्रचलित हैं। इसका सीधा अर्थ राजा के द्वारा भीषण युद्ध रचाने से लगाया जाता है।
मंत्रणोपरांत युद्ध के लिए प्रयाण
किसी भी राज्य के विकास के लिए शांति का काल महत्वपूर्ण होता है। शांति काल में राज्य चतुर्दिक उन्नति करता है। प्रजा हितों के लिए शासन नयी योजनाएं बनाता है और उन्हें लागु भी करता है। सड़क, बावड़ी, कुंओं, मंदिरों, सरोवरों एवं भवनों का निर्माण होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा प्रजा के मनोरंजन की व्यवस्था भी होती है। युद्धकाल न होने से प्रजा पर अतिरिक्त करों का भार भी नहीं लादा जाता। जिसके कारण राज्य में खुशहाली का वातावरण होता है। कला एवं कलाकारों को भी प्रश्रय मिलता है और उन्हें उचित जीविकोपार्जन हेतु मानदेय के साथ सम्मान भी मिलता है। इस चित्र में राजा शांतिकाल में अपने विश्वस्त परिजनों एवं अनुचरों से चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। यह सब शांति काल में ही संभव है।
शीश विहीन योद्धा रण में गतिमान अश्वारुढ़
एक अन्य प्रतिमा से राजा के विषय में एक नई जानकारी मिलती है। यह तो सभी जानते हैं कि शांति काल में राजाओं का प्रमुख मनोरंजन का साधन आखेट होता था और आखेट के लिए वनों में दूर-दूर तक जाकर शिविर लगाए जाते थे। आखेट हेतु राजा समस्त लाव लश्कर के साथ जाता था। इस प्रतिमा चित्र में दिखाया गया है कि राजा हाथी पर हौदे में सवार होकर हाथ में धनुष लेकर आखेट के लिए वन में है और हाथी गतिमान है। उसके सामने कई लोग दिखाई दे रहे हैं जो हाथ उठाकर राजा से कुछ कह रहे हैं या उसका स्वागत कर रहे हैं इसके साथ शिकार हेतु हांका करने की आज्ञा मांग रहे हैं। शिकार के लिए हांका करना महत्वपूर्ण एवं श्रम साध्य कार्य होता था।
शांतिकाल की मंत्रणा, संभवत: मंदिर निर्माण पर विचार विमर्श
इनके साथ एक जिराफ़ भी दिखाई दे रहा है। जाहिर है जिराफ़ भारत में तो पाया नहीं जाता। जिराफ़ दक्षिण अफ़्रीका के वनों में सोमालिया तक पाया जाता है। इससे यह जानकारी मिलती है कि कलिंग का राजनीयिक संबंध दक्षिण अफ़्रीका से था तथा कलिंग के राजा आखेट हेतु अफ़्रीका के वनों तक जाते थे। बीसवीं सदी में सरगुजा महाराज रामानुजशरण सिंह देव द्वारा अफ़्रीका के वनों में शिकार करने का उल्लेख है तथा वे विश्व के तीसरे बड़े शिकारी माने जाते हैं। उन्होने 1100 शेरो का शिकार किया था। यह आंकड़ा उनके नाम से गिनीज बुक में भी दर्ज है। इससे इस धारणा को बल मिलता है कि कलिंग राजा भी आखेट के लिए अफ़्रीका के वनों तक जाते थे। ऐसे राजा को प्रतापी राजा ही कहा जाएगा।
अफ़्रीका के वनों में नृप हाथी एवं जिराफ़
तत्कालीन जनजीवन की झांकी दिखाते हुए कुछ प्रतिमाएं भी बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। इस प्रतिमा में एक व्यक्ति ने हाथ में छूरी धारण कर रखी है और दूसरे हाथ में कुत्ते की एक टांग पकड़ कर उल्टा लटका रखा है। शायद शिल्पकार इस चित्र में मनो विनोद प्रदर्शित करना चाहता है। जब राजा गजारुढ़ होकर शेर और जिराफ़ का शिकार कर सकता है तो एक आम आदमी कुत्ते का शिकार क्यों नहीं कर सकता। एक वानर स्तंभ पर चढ़ कर उसके इस कार्य को विस्फ़ारित आंखो से देख रहा है। कुत्ता भी मुंह फ़ाड़ कर कांय कांय कर रहा है आखिर जान उसको भी प्यारी है। एक बात और हो सकती है, हो सकता है उस समय लोग कुत्ते का मांस खाते हों, वैसे उत्त्तर पूर्व में आज भी कुत्ते का मांस बड़े चाव से खाया जाता है। 
स्वान संहार का दृश्य
अन्य प्रतिमा में एक दंपत्ति अपने बच्चे के साथ जीवन यापन के लिए पलायन कर रहा है और थकने पर मार्ग में वृक्ष ने नीचे कुछ पल के लिए ठहर गया है। परम्परागत उड़िया परिवार दिखाई दे रहा है। पुरुष ने भी जूड़ा बना रखा है, कमर पर पोटली धारण कर रखी है, एक हाथ में धारित खड़ग कांधे पर है, दूसरा हाथ पीछे छुपा हुआ है, स्त्री ने सिर पर समान की पेटिका रखी हुई है और कमर पे बच्चे को बैठाकर स्तनपान करवा रही है। सिर पर रखा कुंदे वाला बक्सा वर्तमान में भी प्रचलन में दिखाई देता है। स्त्री के गले में हार और मंगलसूत्र दिखाई दे रहा है। जिसका बड़ा सा पैंडल स्तन मध्य में झूल रहा है। उड़ीसा से आज भी लोग जीवन यापन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन करते हैं, यह पलायन तब से आज तक सतत जारी है। शिल्पकार ने इस दृष्य को इतना अधिक जीवंत बनाया है कि जैसे यह आज ही मेरे समक्ष घट रहा हो। 
जीवन यापन के लिए पलायन करते दंपत्ति
इस तरह कोणार्क भी भित्तियों पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं इतिहास की परतें लगातार खोलती हैं अगर आपके पास समय है तो वे तत्काल आपके साथ संवाद करने को तत्पर हैं। बस समझना आपको है कि वे क्या कह रही हैं। भित्तियों पर इतने सारे विषयोन को स्थान दिया गया है कि अनुसंधान करने में ही बरसों लग जाएगें। कोणार्क का शिल्पांकन एक खुली किताब की तरह है, आईए और पढ़ते जाइए, इतिहास के सागर में गोता लगाते जाईए आपको सारे रत्न मिल जाएगें और सबसे कीमती रत्न संतोष रत्न मिलेगा। जिसे प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। राज नृसिंह देव भी भव्य मंदिर का निर्माण कर युगों युगों तक के लिए अपनी कीर्ति स्थापना कर संतोषानंद पाना चाहता था। आगे पढ़ेगें मंदिर के निर्माण एवं पतन की कहानी। जारी है आगे पढ़ें……॥ 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

सूर्य मंदिर की मिथुन प्रतिमाएं - कलिंग यात्रा


कलाओं का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से किया गया है। कलाओं की गणना में सबसे अधिक प्रसिद्ध संख्या चौसठ है। शुक्र नीति एंव तंत्र ग्रंथों में कलाओं की संख्या चौसठ ही दी गई है। ललित विस्तार में पुरुषकला के रुप में छियासी नाम गिनाए गए हैं और कामकला के रुप में चौसठ नाम। वात्सायन से लेकर अन्य आचार्यों ने भी कलाओं की संख्या चौसठ ही गिनी है। कला शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ॠग्वेद में ही मिलता है - यथा कलां यथा यथा शफ़म् यथा ॠणं संनयामसि। आचार्य वात्सायन कहते हैं - जिस क्रिया से, जिस कौशल से कामनियाँ प्रसन्न हों, वशीभूत हो जाएं, वही कला है।" नागरिक के लिए वात्सायन चौसंठ कामकलाओं में शिक्षित होने बात कहते हैं। वात्सायन कहते हैं कि - कामकला की शिक्षा प्राप्त करने के बाद चतुर्वण को दान, वीरता, व्यवसाय एवं श्रमादि द्वारा धनार्जन करना चाहिए और इसके उपरांत ही विवाह करना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि कामकला का चित्रण शैक्षणिक दृष्टिकोण से किया जाता था। 
नायिका - शाल भंजिका
कामकला एक ऐसा विषय है जिस पर सार्वजनिक चर्चा करना वर्तमान में असभ्यता माना जाता है। पर गुह्य संभाषण करना हर स्त्री पुरुष चाहता है क्योंकि विषय ही रसदार है। मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है। भोजन क्षुधा के अतिरिक्त मनुष्य को संसर्ग क्षुधा ही सताती है। कई वर्षों पूर्व डिस्कवरी चैनल पर महाद्वीपों का डोंगी से सफ़र करने वाले व्यक्ति से सफ़र सम्पन्न होने के उपरांत पत्रकार ने पूछा - आप छ: महीने से एकल डोंगी का समुद्र में सफ़र कर रहे हैं, घर पहुंचने के पश्चात वह पहला काम बताईए जिसे आप प्राथमिकता में प्रथम रख कर करना चाहेंगे। उसने जवाब दिया - घर पहुंचने पर मैं सबसे पहले एकांत वातावरण में अपनी पत्नी के साथ चर्मसुख का आनंद उठाना चाहुंगा। यह घटना याद आने का कारण कोणार्क की भित्तियों में उत्कीर्ण कामकेलि की विभिन्न मुद्राएं हैं, जिन्हें सार्वजनिक रुप से प्रदर्शित किया गया है।
नायिक - शुक सारिका
विदेशी पर्यटक मिथुन प्रतिमाओं को आश्चर्य मिश्रित भावों से देखते हैं कि भारत में यौन शिक्षा प्राचीन काल से ही चली आ रही है और इसे सार्वजनिक तौर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वरना पाश्चात्य देशों में भारत के विषय में सिर्फ़ यही धारणा है कि यह जादू टोने, साधू संतों एवं सांपो का देश है। इससे सीधा अर्थ लगा लिया जाता है असभ्य है और सभ्यता का ठेका तो पाश्चात्य देशों के पास है। वात्सायन कहते हैं पति-पत्नी को धार्मिक और सामाजिक नियमों की शिक्षा  कामसूत्र के द्वारा मिलती है। जो दम्पति कामशास्त्र के मुताबिक अपना जीवन व्यतीत  करते है उनका जीवन यौन-दृष्टि के पूरी तरह सुखी होता है। ऐसे दम्पति अपनी पूरी जिंदगी एक-दूसरे के साथ संतुष्ट रहकर बिताते हैं। कामसूत्र द्वारा ऐसी बहुत सी  विधियां बताई जाती है जो स्त्री और पुरुष को आपस में ऐसे मिला देती है जैसे कि दूध में पानी।
 नायिका-पुत्र वल्लभा
भारतीय दर्शन में उपदेश किया गया है कि मनुष्य को जीवन काल में पुरुषार्थ चतुष्टय को धारण करना चाहिए। धर्म अर्थ काम मोक्ष द्वारा ही जीवन सुखमय और आनंददायक होकर अंतिम मंजिल को प्राप्त करता है। इसमें काम का महत्व धर्माचरण के इतना ही पवित्र रखा गया है। जिस प्रकार आहार त्याग देने या पौष्टिक पदार्थों के न खाने से शरीर सूख कर कांटा हो जाता है, इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, क्षुधा-पिपासा शरीर को सोखने लगती है, उसी प्रकार काम निरोध से भी हानि होती है, अनेक शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ पकड़ लेती हैं। ऐसी स्थिति में सारांश यह निकलता है कि बलात निर्यंत्रण या अतिशय भोग ये दोनो ही उपाय हानिकर हैं। इनकी उपाय पूर्वक चिकित्सा करनी चाहिए। वात्सायन कहते हैं कि इन्हें इस प्रकार प्राप्त करें कि एक पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थ का बाधक न बने।
नायिका मुग्धा
प्राचीनकाल में अभिजात्य नागरजनों एवं साहित रसिकों तथा विलासप्रियों के लिए नायिका रसानुभूति का माध्यम एवं मनोरंजन का कलापूर्ण साधन भी रहा है। भित्ति प्रतिमाओं में शिल्पकारों ने नायिका यथा, गणिका, शुक सारिका, आंजना, शाल भंजिका, रमणिका, अभिसारिका, मुग्धा एवं अन्य को भित्तियों में स्थान दिया है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नायिकाओं को ही स्थान दिया जाता था, समाज में नायक भी होते थे, भरत ने नायक के चार भेद किए हैं- धीरललित, धीरप्रशान्त, धीरोदात्त, धीरोद्धत। ये भेद नाटक के नायक के हैं। "अग्निपुराण" में इनके अतिरिक्त चार और भेदों का उल्लेख है : अनुकूल, दर्क्षिण, शठ, धृष्ठ। ये भेद स्पष्ट ही शृंगार रस के आलंबन विभाव के हैं। मनोरंजन की दृष्टि से इनका चित्रण भी मंदिरों की भित्तियों पर किए जाने की परम्परा रही है।  
नायक - धीरललित
मंदिरों में उत्कीर्ण मैथुन प्रतिमाओं के द्वारा हमारे पूर्वज कुछ गूढ़ संदेश आने वाली पीढ़ी के लिए संकेत के तौर पर देकर गए हैं। यह भोग विलास का कोरा प्रदर्शन नहीं है। स्त्री-पुरुष संयोग को प्रतिमाओं में प्रदर्शित करते हुए यह भी दर्शाया गया है कि "अङादङात सम्भवसि हृदयादधि जायसे। आत्मा वै पुत्रानामासि सजीव शरद: शतम्॥ (निरुक्त निघंटु कांड 3/1/4) तू मेरे अंग प्रत्यंग से प्राप्त हुआ  है, तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ है और मेरा ही पुत्र संज्ञक स्वरुप है। ऐसा तू सौ वर्षों तक जीवित रह।" मानव शरीर को अमरावती कहा गया। इसे अमरावती कहने का कारण है कि शरीर के द्वारा नए शरीर की उत्तप्त्ति होती है, इस शरीर द्वारा सतत उत्पन्न होक मानव युगों युगों तक जीवित रहता है। इस दृष्टि से परम्परागत शरीर नष्ट नहीं होता। इसलिए अप्रमत्त होकर इसकी रक्षा करनी चाहिए। यही संसार का अंतिम सत्य है,  जो जहाँ से शुरु होता है वहीं समाप्त भी होता है। जारी है… आगे पढ़ें। 

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

पर्यावरण प्रदूषण एवं प्राचीन चिकित्सा पद्धति - कलिंग यात्रा


चलते-चलते एक-एक पाषाण प्रतिमा के रुकता हूँ और वह मुझे कुछ न कुछ कहती है। जिसे सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ और वह मुझे ही कह सकती है। विक्रमादित्य के सिंहासन की पुतलियों की तरह सभी प्रतिमाएं बोलती हैं। सदियों पुराने राज अपने मुंह से ही खोलती हैं। न विक्रम सुन पा रहा है न बिकाश। इन्हें सुन कर और समझ कर भी क्या करना  है पाषाण की भाषा। पाषाणों की भाषा की इतनी समझ तो नहीं है, क्योंकि मैने किसी इस भाषा का किसी गुरुकुल में अध्ययन नहीं किया है और न ही किसी कुल ॠषि के उनके कुलगोत्र का होने का प्रमाण पत्र पाया है। बस प्रेम है इनसे और प्रकृति कहती है कि प्रेम की भाषा समझने के लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं। 
बोलती पुतलियाँ
एक प्रतिमा के समक्ष ठिठक जाता हूँ, उसने बहुत कुछ राज अपने में संजो रखे हैं, देखते ही बोलने लगती है। प्रतिमा में मैथुन रत पुरुष स्त्री को प्रकट किया गया है। लोग मुंह फ़ाड़े कामसुत्र के आसनों को देख रहे हैं। कुछ नवयुवकों की फ़ौज भी इन्हें देख कर आनंदित है। एक युवक मोबाईल पर किसी से बतिया रहा है - "अरे तुमको आना था हमारे साथ, क्या जोरदार सेक्सी पोज हैं यहाँ। सालों ने सारी ब्लू फ़िल्म ही उतार कर रख दी है मंदिर की दीवार पर। बहुत ही गजब है, उस जमाने के लोग कितने सेक्सी थे। तुम रहते तो और मजा आता।" वर्तमान युवाओं की सोच देख मैं स्तब्ध हूँ, जिस प्रतिमा में इन्हें ब्लू फ़िल्म दिखाई दे रही है, वह प्रतिमा उस काल महत्वपूर्ण राज खोल रही है। 
कोणार्क की मिथुन प्रतिमा
चलो उन्होने जो देखा वो मैने बता दिया और अब मुझसे प्रतिमा ने क्या कहा यह बताता हूँ। प्रतिमा कहती है कि रात्रि काल में मच्छरों एवं कीटों की संख्या बढ़ जाती है। इसलिए रात्रि शयन मच्छरदानी (मसहरी) लगा कर करना पड़ता है। आदमी दिन भर का थका हारा घर लौटता है और चर्मसुख के वक्त यदि मच्छर परेशान हलाकान करें तो आनंद में व्यवधान पैदा हो जाता है। इसलिए मच्छरदानी का सहारा लिया जा रहा है। प्रतिमा में चारपाई पर युगल मिथुन रत हैं और चारपाई पर मच्छरदानी लगी है। मच्छरदानी के उपर से चूहे दौड़ रहे हैं। इससे स्पष्ट हो रहा है कि उस काल में भी प्रदूषण के कारण मच्छर थे और आमजन मच्छरों से हलाकान था। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग कर रहा था। साथ ही चूहों से भी बचाव हो रहा था।
रात्रिकाल में मच्छरदानी का प्रयोग
ऐसी बहुत सी मिथुन प्रतिमाएं कोणार्क की भीत्तियों पर उत्कीर्ण की गई हैं। मिथुन प्रतिमाओ के साथ रतिज रोगों के विषय में भी प्रतिमाएं बताती हैं। रतिज रोगों के विषय में चरक ने सहिंता में विस्तार से बताया है और उनकी चिकित्सा विधि का भी वर्णन किया है। चित्र में दिखाई गई प्रतिमा में यह पुरुष लिंग में हुए व्रणो से परेशान है। चिकित्सक ने लिंग में दवा का लेपन कर उसे एक यंत्र से बांध दिया है। जिसे उस व्यक्ति ने हाथ में लटका रखा है। वस्त्र के घर्षण से व्रणों से मवाद निकल चिपक जाता है और असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता है। इसलिए चिकित्सक ने उसे वस्त्र से अलग कर दिया है। आधुनिक चिकित्सा में भी मुत्र नली में कैथेटर डाल कर मरीज के हाथ में पकड़ा दिया जाता है। इससे ज्ञात होता है कि इस काल में एस टी डी जैसे रतिज रोग भी थे।
यौनरोग चिकित्सा 
एक अन्य प्रतिमा में खड़ी हुई महिला की योनि को स्वान चाट रहा है। कुछ लोग इसे एनिमल सेक्स कह रहे थे। एनिमल सेक्स में स्वान लिंग से मैथुन दिखाया जाता है, न कि चाटते हुए। इसे देखने के पश्चात मुझे अपना ग्रामीण बचपन याद आता है, जब गांव में चिकित्सक नहीं होते थे और किसी के फ़ोड़े में मवाद भर जाता था तो वह कुत्ते से चटवा लेता था। कुछ दिनो के बाद वह फ़ोड़ा ठीक हो जाता है। इसी तरह स्त्री रतिज रोग में गनोरिया इत्यादि का संक्रमण कष्टदायक होता है। इसकी चिकित्सा स्वान से चटवा कर की जा रही है। एक अन्य चित्र में योनि में धुंआ लगाया जा रहा है। यह भी स्त्री रतिज रोग की एक चिकित्सा है। जड़ी बूटियों की धूनी देने से रोग का शमन होता था। वर्तमान में भी अजवाईन आदि की धुंआ दी जाती है।
दो पत्नियों से दुखी सन्यास की ओर प्रस्तुत अधेड़
यह उत्श्रृंखल समाज के लिए एक संदेश भी है कि अत्यधिक मैथुन से विभिन्न व्याधियों का शिकार होना पड़ता है और उनकी चिकित्सा किस तरह की जाती है, इसको भी प्रतिमाओं में दर्शाया गया है। एक प्रतिमा में घुटे हुए शीष का एक अधेड़ व्यक्ति कांधे पर लाठी में पोटली लटका कर कोपीन धारण किए वन गमन को तत्पर दिखाई दे रहा है और एक स्त्री उसका मार्ग रोक रही है। पीछे खड़ी स्त्री ने भी उसको पकड़ रखा है। इस प्रतिमा में घरेलू समस्या दिखाई दे रही है। दो बीबियों की रार से हलकान होकर पुरुष सन्यास लेकर वन जा रहा है और उसे छोटी और बड़ी दोनो बीबियाँ रोक रही है। तत्कालीन समाज की झांकी कोणार्क की भित्तियों में सुरक्षित है। काल के थपेड़े भी उसे नष्ट नहीं कर पाए और जानकारियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढी को स्थानांतरित हो रही हैं। जारी है आगे पढ़ें……।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

तेरहवीं सदी में नारी क्रांति : कलिंग यात्रा


अन्य चक्रों में भी पूर्व चक्रों में उत्कीर्ण प्रतिमाओं की पुनरावृत्ति की गई है। कुछ वर्षों पूर्व 20 रुपए के लाल नोट पर एक चक्र को प्रकाशित किया जाता रहा है। मंदिर की भीत्ति में उत्कीर्ण प्रतिमाओं को देखते हैं तो लगता है कि मेला लगा हुआ है, विषय भिन्नता के साथ सामाजिक समरसता का संगम यहाँ दिखाई देता है। यह मंदिर कलिंग स्थापत्य एवं मूर्ति शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रतिमाओं में स्त्री एवं पुरुष का केश विन्यास लगभग एक सा ही दिखाई देता है। अगर स्तन और उन्नत पुष्ट नितंब न हो तो पुरुष प्रतिमा भी स्त्री प्रतिमा जैसी दिखाई देती है। बिकाश को कई बार पुरुष प्रतिमा में स्त्री दिखाई दी। असल में कलिंग क्षेत्र में पुरुष भी बालों का जूड़ा बनाते हैं और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मैने चिल्का की यात्रा में बिकाश को दिखाया। तेरहवीं शताब्दी से लेकर अभी तक ग्रामीण अंचल में स्त्री पुरुषों के केश विन्यास में अधिक बदलाव नहीं आया है।
पुरुष केश विन्यास
कोणार्क, जैसा की शब्द से ही प्रतिध्वनित होता है कि यहाँ कोण की बात हो रही है। चंद्रभागा नदीं यहाँ से लगभग डेढ मील की दूरी पर समुद्र में मिलती है और वहाँ पर एक कोण बनता है। इस कोण के बनने के कारण इस स्थान का नाम कोणार्क प्रचलित होकर कालांतर रुढ़ हो गया और सूर्य मंदिर भी कोणार्क के नाम स्थापित हो गया। हमने देखा है कि तटीय क्षेत्र में निवास करने वाले लोग कम वस्त्र धारण करते हैं या खुले वस्त्र धारण करते हैं। समुद्र किनारे की उमस भरी खारे पानी से व्याप्त आद्र वायू देह पर चिपचिपापन पैदा करती है। पशीने के कारण वस्त्र देह से चिपकने लगते हैं। इसलिए समुद्र तटीय लोग उपरी बदन खुला एवं कमर पर कटि वस्त्र के साथ कांधे पर उत्तरीय धारण करते हैं। प्रतिमाओं में इसका चित्रण बखुबी किया गया है। कोणार्क के गाईड पर्यटकों को कटिवस्त्र के स्थान स्कर्ट बताकर गुमराह करते हैं। 
कटि वस्त्र
प्राचीन काल में चमड़े की जूतियों का अविष्कार हो गया था। परन्तु शिल्पकार देवी देवताओं एवं अन्य प्रतिमाओं को जूते चप्पल धारण किए नहीं प्रदर्शित करते। सभी प्रतिमाओं को नंगे पैर ही दिखाया जाता है। रमण करती नायिका की ऊंचाई बढ़ाने के लिए उसे नायक के पंजो पर खड़ा कर दिया जाता है, जिससे उसकी ऊंचाई बढ़ जाए और सौंदर्य अलंकरण में वृद्धि हो। देव प्रतिमाओं में सिर्फ़ सूर्य को ही पिंडलियों तक का बूट या जूता धारण किए हुए दिखाया जाता है। कापालिकों, साधुओं, यति जतियों के पैर भी नंगे दिखाए जाते हैं। सूर्य के अतिरिक्त किसी अन्य देवता या मनुष्य को चरण पादूका धारण किए हुए चित्रित नहीं किया जाता। वैसे आज भी धार्मिक स्थलों में जूते-चप्पल धारण कर प्रवेश करना वर्जित है। प्राचीन काल में नंगे सिर मंदिरों में प्रवेश नहीं किया जाता था। आज भी ग्रामीण अंचल में ठाकुर देव के समक्ष सिर पर पागा या रुमाल रख कर ही जाने की परम्परा देखी है।
सूर्य द्वारा लांग बूट धारण
एक प्रतिमा में स्त्री को ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण किए प्रदर्शित किया गया है। जबकि खड़ाऊ वानप्रस्थ या सन्यास धारण किए हुए पुरुष ही धारण करते हैं। सन्यासी एवं गृहस्थ के दोनों एक लिए पृथक पृथक खड़ाऊ का निर्माण होता था। गृहस्थ के लिए काष्ठ पर सामने कपड़े या चमड़े की पट्टी लगा दी जाती थी और सन्यासी के लिए अंगुठे एवं अंगुली के बीच फ़ंसने वाली काष्ठ कील होती थी। इसके निर्माण के पीछे का विज्ञान बताया जाता है कि अंगुठे एवं तर्जनी के मध्य की नस का संबंध मनुष्य की कामेंद्री से होता है। काष्ठ कील वाली खड़ाऊं पहनने से उस नस पर हमेशा दवाब बना रहता है जो कामोत्तेजना को मंद करता है और साधु-सन्यासी में काम विकार का उद्वेग पैदा नहीं होता। 
स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी का खड़ाऊ धारण करना
तेरहवीं सदी में स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण करना क्रांतिकारी ही माना जाएगा। अभी तक तो पुरुषों द्वारा ही खड़ाऊ धारण की जाती थी। पाश्चात्य युरोप के देशों में भी सोलहवीं सदी तक स्त्रियों द्वारा ऊंची एड़ी के जूते धारण करने की शुरुवात भी नहीं हुई थी। इससे एक बात तो निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों को इस सदी तक पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त थे तथा पुरुष उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते थे। राजा लांगुल नृसिंह देव ने अपने खजाने से सूर्य मंदिर निर्माण करने का आदेश स्वमाता से ही पाया था और उसने मंदिर निर्माण पर अमल भी किया। प्रतिमाओं से एक बात और निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों परदा नहीं करती थी। किसी भी प्रतिमा में परदा या घुंघट दिखाई नहीं देता। 
राज नृसिंह देव उनकी माता जी
अप्सराओं, गणिकाओं एवं नायिकाओं ने कोई परदा या घूंघट नहीं रखा है। एक प्रतिमा में राजा नृसिंह देव की माता ने सिर पर पल्लू धारण कर रखा है। यह राजकुल की गरिमा का प्रतीक भी है। स्त्रियों को कार्य की स्वतंत्रता थी प्रतिमाओं में कहीं पर उत्श्रृंखलता दिखाई नहीं देती। स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण करने के कुछ कारणों पर विचार किया जा सकता है। पहला - उच्च घराने की होने के कारण फ़ैशन परस्ती मानी जा सकती है। दूसरा - कामेंद्री को शिथिल कर सन्यास धारण करने का अभ्यास भी हो सकता है। तीसरा - पुरुष समाज के समक्ष स्त्री अधिकार के लिए चुनौती भी माना जा सकता है। जिससे पुरुष समाज इसे मान्यता दे। स्त्री द्वारा खड़ाऊ धारण करने के कार्य को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह एक नारी क्रांति का सूत्रपात माना जा सकता है। जारी है आगे पढ़ें……।

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

रथचक्र में कालचक्र : कलिंग यात्रा


विशाल रथ के विशाल पहिए, हाँ भई विशाल्र रथ को खींचने के लिए विशाल पहियों की योजना की आवश्यकता थी। अधिष्ठान की ऊंचाई को ध्यान में रख कर पहियों की ऊंचाई भी तय की गई थी। प्रत्येक पहिया तीन मीटर का है अर्थात नौ फ़ुट नौ इंच ऊंचाई होगी। पहिए भी साधारण नहीं है, किसी भी गहने को महीनता से निर्मित करने में एक स्वर्णकार जितना श्रम करता है, उससे अधिक श्रम एवं अलंकरण प्रत्येक पहिए में बिसु (विष्णु) महाराणा के कारीगरों ने किया है। धातु पर कार्य करने अपेक्षा शिलाओं पर कार्य करना अत्यधिक कठिन है। शिलाओं पर जो भी कार्य होता है वह पूर्णता की ओर ही बढ़ता है। एक छेनी गलत चल जाने पर सुधार की गुंजाईश नहीं रहती। फ़िर वह दोष सहस्त्राब्दियों तक के लिए स्थाई हो जाता है।

मैं चक्र का निरीक्षण कर रहा था और बिकाश का ध्यान चक्र के साथ फ़ोटो लेने में था। यह वही स्थान है जहाँ अधिकतम पर्यटक एक चित्र जरुर लेते हैं। बिकाश मेरे सुक्ष्म निरीक्षण में व्यवधान उत्पन्न कर रहा था। कहते हैं "लौंडों की दोस्ती, जी का जंजाल"। बस कुछ ऐसा ही मामला था। उसकी रुचि कोणार्क के सतही दर्शन में थी और मेरी इच्छा गहन अध्ययन करने में। बस अपनी आंखो से देख कर समझने पर विश्वास है। जो देखा उसके विषय में मंतव्य अपनी मंत्रणा के हिसाब से देता हूँ। बिकाश की ईच्छा पूर्ण करनी पड़ी। वर्तमान में एक नई समस्या का सामना भी करना पड़ रहा है। कैमरे से फ़ोटो खींचने के साथ वही दृश्य मोबाईल से भी खींचना पड़ता है। एक ही दृश्य को दो-दो बार कैद करना पड़ता है। डिजिटल युग ने फ़ालतु के काम बढ़ा दिए। 

सूर्य रथ समस्त चक्र (पहियों) की परिकल्पना एक जैसी है। प्रत्येक में 8 आरे है और इन आरों के मध्य इतने ही लघु आरे भी हैं। अगर थोड़ा सा दिमाग लगाए और खोपड़ी खुजाएं तो निर्माणकर्ता ने प्रत्येक पहिए को 24 घंटे का बनाया और इस 24 घंटे को 8 बड़े एवं 8 छोटे आरों में विभक्त किया है। अब बड़े आरे 24 घंटे को आठ भागों में विभक्त करते हैं तो प्रत्येक आरा मध्य के हिस्से तीन घंटे आते हैं। इसी तरह छोटे आरे मध्य के हिस्से नब्बे मिनट आते हैं। इन नब्बे मिनटों को पाठे के 30 लघु गोलकों  में बांटा गया है इस तरह प्रत्येक लघुगोलक के हिस्से तीन मिनट आते हैं और लघु गोलक पर पड़ने वाली छाया को तीन हिस्से में बाटने पर एक मिनट का समय होता है। जो घंटे की प्रथम इकाई है। यह सूर्य घड़ी न्यूनतम इकाई मिनट तक का समय बता सकती है।  इससे तय होता है कि यह एक सूर्य घड़ी है। जो सूर्य की परछांई के हिसाब से समय बताती है। 

सूर्य रथ के इन चक्रों में जीवन स्पंदित होता है, जिस तरह हम वर्तमान के चलचित्र देखते हैं और उसमें जीवन से संबंधित सभी कारक एवं कारण दिखाई देते हैं, उसी तरह इन चक्रों में उत्कीर्ण वृक्ष, वल्लरियाँ, वन चर, जल चर, थलचर, नभचर एवं मानवों के साथ देवताओं को स्थान दिया गया है। प्रतीत होता है स्वर्ग यहीं उतर आया है। प्रथम चक्र में अवतारों को स्थान दिया है। सूर्योदय के समय व्यक्ति की दिनचर्या में ईश्वर स्तुति उपासना प्रमुख कार्य होता है, जो देवताओं के स्मरण के बगैर संभव नहीं है। जिस तरह लौकिक परम्परा में गणपति का प्रथम स्थान है, उसी तरह शिल्पकार भी छेनी और हथौड़ी उठाता है तो सर्वप्रथम स्वमान्य, कुलमान्य ईष्टदेव का स्मरण कर कार्य को प्रारंभ करता है। 

चक्र के प्रत्येक भाग को महीनता से अलंकृत किया गया है, अलंकरण देख कर ऐसा लगता है कि शिल्पकार दत्तचित्त होकर प्रस्तर पर आभुषणों का निर्माण कर रहा हो। चक्र की धूरी पर अलंकृत कील अत्यधिक महत्वपूर्ण है, भले ही इसका निर्माण अलंकरण की दृष्टि से किया है परन्तु इस पर रथ संचालन का समस्त भार है। सूर्य रथ का चालक अरुण रथ हांकने से पहले एक दृष्टि तो अवश्य धूरी की कील पर डालता ही होगा। धूरी पर पद्मांकन किया गया है जो इसके सौंदर्य में वृद्धि कर रही है। चक्र के पार्श्व में गज, नर, वानर, सिंह इत्यादि को उत्कीर्ण किया गया है। जैसे की सम्पूर्ण वनांचल ही अर्क रथ का स्वागत करने चला आया हो। 

अगले चक्र में सांझ का वर्णन दिखाई दे रहा था। सांझ के समय सूर्य अस्ताचल को जाता है और दिन भर के कार्य सम्पादन के पश्चात मनुष्य को आलस घेर लेता है और वह रात की प्रतीक्षा करता है, या फ़िर सांझ ढ़लते ही दिवस भर से नायिका प्रियतम की प्रतीक्षा में उकता कर उबासियाँ और अंगड़ाईयाँ लेते हुए द्वार आहट को सुनने के लिए व्यग्र रहती है। इन भावों का प्रभावोत्पादक ढ़ंग से इस चक्र आठों आरों पर चित्रण किया गया है। किसी चित्र में नायिका आ उत्तरीय हवा से उड़कर उसके पुष्ट सौंदर्य को प्रदर्शित कर रहा है तो कहीं वह चौकी पर बैठी हुई व्यग्रता से प्रतीक्षारत दिखाई देती है।  … जारी है, आगे पढ़ें……।

रविवार, 19 अप्रैल 2015

कोणार्क का अठपहरिया : कलिंग यात्रा


हमारे समक्ष दो-दो सूर्य रथ थे। एक धरा पर समक्ष और दूसरा आकाश से सिर पर तप रहा था। जहाँ पाषाण होते हैं, वहां सर्दी-गर्मी में सहज ही वृद्धि हो जाती है। सूर्य की दो पत्नियाँ हैं, पहली प्रभा और दूसरी छाया। प्रभा तो सूर्य के साथ रथ पर सवार थी और छाया जो शीतलता देती है, वह कहीं निद्रालीन हो गई, क्योंकि सूर्य मंदिर मंदिर में छाया दिखाई नहीं दे रही थी। छाया देवी ही मातृरुप वत्सल हैं, जो सूर्य के कोप से जन की रक्षा करती हैं। सूर्य का हृदय पिता के समान कठोर है तो छाया का हृदय माता भगवती के जैसा स्नेहील और ममत्व भरा। हम चूक गए उनका स्नेह पाने से। खैर दिन ढलने लगेगा तो छाया देवी पुन: सक्रीय हो जाएगी अपना आंचल फ़ैला कर और सूर्य के कोप से कुछ राहत मिलेगी।
नाट मंडप एवं जगमोहन (भोग मंडप)
हमारे द्वारा नाट मंडप की पैड़ियाँ उतरने के बाद समक्ष विशाल जगमोहन दिखाई देता है। कलिंग निर्माण शैली में मंदिरों में मंडप के स्थान पर जगमोहन निर्मित करने की परम्परा है। नाट मंडप एवं जगमोहन के मध्य प्रांगन में अरुण स्तंभ लगा हुआ था। इस स्तंभ पर गरुड़ विराजमान हैं। विक्रम कहता है कि इस अरुण स्तंभ को मराठा शासन के समय एक मराठा साधू उखाड़ कर ले गया और उसे 21 मील दूर पुरी के जगन्नाथ मंदिर के समक्ष स्थापित कर दिया। दरअसल यह मंदिर भग्न हो चुका था और इस स्थान पर घनघोर प्राकृतिक जंगल बन गया तथा यह स्थान चोर डकैतों की शरण भी हो गया। इसलिए इस मंदिर की सामग्री का उपयोग पुरी के जगन्नाथ मंदिर में किया गया।
अरुण स्तंभ पुरी : कहते हैं इसे कोणार्क से लाया गया
हमारे सामने सूर्य विशाल रथ खड़ा है, जिसमें एक तरफ़ तीन एवं दूसरी तरफ़ चार अश्व जुते हैं। अश्वों के अगले पैर हवा में है अर्थात अर्करथ वायू की गति से उड़ता जा रहा है। यह समय चक्र का प्रतीक है, समय भी तीव्र गति से उड़ रहा है। सप्ताश्व सप्ताह के सातों दिनों के प्रतीक हैं। समय चक्र और सूर्य रथ की गति, दोनो समान है। मैं सूर्य मंदिर निर्माता शिल्पकारों की कुशलता पर मुग्ध था। इस विशाल संरचना के निर्माण के लिए उन्होने सटीक योजना बनाई थी। निर्माण कार्य में प्राचीन काल से गोली, गुनिया, लेबल, सूत नामक चार उपकरणों का प्रयोग किया जाता है, जो दिखने में तो साधारण है, पर इनके बिना किसी भी निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती है। भले ही वर्तमान में इंजीनियरिंग कीर्तिमान गढ़ रही हो पर इन साधारण से उपकरणों का प्रयोग आज भी छोटे से लेकर बड़े निर्माण में होता है।
अर्क रथ एवं उसमें जुते अश्व
खड़ी भींत की सीधाई नापने के लिए धागे में धातू की गोली लटका कर भींत की सिधाई नापी जाती है। गुनिया कोण नापने के काम आता है। वास्तु शास्त्र में इस उपकरण का अत्यधिक महत्व है। मयमत्तम कहता है कि किसी भी भवन के कोण 90 अंश के ही होने चाहिए, न्यून या अधिक होने पर वास्तु दोष उत्पन्न हो जाता है। लेबल नामक उपकरण तल को सम (बराबर) करता है तथा सूत या धागा अन्य भिन्न कार्यों में प्रयोग होता है। इससे गुनिए से लेकर गोलाई बनाने के लिए प्रकार का कार्य भी लिया जाता है। खैर इन उपकरणों से आगे बढ़ें तो देखते हैं कि निर्माण छोटी से लेकर बड़े प्रस्तर खंडो का प्रयोग हुआ है। जो लेट्राईट, खंडोलाईट एवं क्लोराईट के हैं। समय की मार से लेट्राईट खंड जल्दी ही तबाह हो जाते हैं। वैसे भी इस इलाके में भवन निर्माण में वर्तमान में भी लेट्राईट के खंडो का प्रयोग होता दिखाई देता है।
समय चक्र (अठप्रहरी)
भोग मंडप (जगमोहन) एवं देऊल (गर्भ गृह) एक ही जगती (अधिष्ठान) पर निर्मित हैं। भूतल से अधिष्ठान तक पहुंचने के लिए 14 पैड़ियों का निर्माण किया गया है, ये जीर्णोद्धार होने के कारण कम ज्यादा भी हो सकती हैं और भोग मंडप के मुख्य द्वार तक पहुंचने के लिए जगती पर 7 पैड़ियों का निर्माण हुआ है। जगती में दोनो ओर बारह-बारह, कुल 24 चक्रों का निर्माण किया गया है। इन चक्रों को हम आभुषण मान सकते हैं। प्रत्येक चक्र स्वयं में बहुत ही मनमोहक अलंकरण है। हम दर्शन कार्य जगती के बाईं तरफ़ से प्रारंभ करते हैं। जगती के नीचे गजथर निर्मित है, जिसमें विभिन्न मुद्राओं में हाथियों का सजीव चित्रण किया गया है। इन हाथियों की संख्या लगभग दो हजार होगी। 
बहुत कुछ खास है कोणार्क में
गजथर के उपर की पंक्ति में प्रतिमाएं निर्मित की गई है, जिनमें देवी-देवता, नर, किन्नर, गंधर्व, अप्सराएं, भिन्न भिन्न भाव भंगिमा युक्त नारी चित्रण मनमोहक है। हम देखें तो सारा संसार ही सूर्य रथ पर विद्यमान है। तत्कालीन समाज की एक झांकी यहाँ उत्कीर्ण है, ऐसा लगता है कि समय का रथ यहीं आकर ठहर गया और लोगों को कहता है कि आओ देखो, जानो हमारे सामाजिक क्रिया कलापों को,  हमारे रहन सहन को और हमारी निर्माण क्षमता के समक्ष नतमस्तक हो जाओ। सूर्यरथ के सप्ताश्व सप्ताह के सातों दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 24 चक्र वर्ष के 24 पक्षों का। सूर्य रथ का कैलेंडर प्राचीन भारतीय पंचाग की गणना के हिसाब से चल रहा है। न यहाँ आगस्टस है और न जुलियस सीजर, है तो सिर्फ़ राजा विक्रम और काल चक्र………। जारी है, आगे पढ़ें……