कलिंग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कलिंग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

जगन्नाथ मंदिर का शिल्प एवं इतिहास - कलिंग यात्रा

उड़ीसा राज्य के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित जगन्नाथ मंदिर हिन्दुओं का प्राचीन एवं प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। हिन्दूओं की धार्मिक आस्था एवं कामना रहती है जीवन में एक बार भगवान जगन्नाथ के दर्शन अवश्य करें क्योंकि इसे चार धामों में से एक माना जाता है। वैष्णव परम्परा का यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण को समर्पित है। यहाँ की वार्षिक रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है। इस मंदिर में तीन मुख्य देवता भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा एवं भाई बलभ्रद की पूजा होती है। जगन्नाथ के धार्मिक महत्व के विषय में जन-जन जानता है। फ़िर भी मैं संक्षेप में उल्लेख करना चाहुंगा।
सुभाष चौक पुरी
इस मंदिर का निर्माण कलिंग राजा अनंतवर्मन गंगदेव ने कराया था। मंदिर का जगमोहन एवं विमान भाग इनके शासन काल (1078-11148 ई) में निर्मित हुआ था। फ़िर सन 1147 में राजा अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रुप दिया था। इसका ताम्रपत्रों में उल्लेख बताया जाता है। मंदिर में जगन्नाथ अर्चना सन १५५८ तक होती रही। इस वर्ष काला पहाड़ ने ओडिशा पर हमला किया और मूर्तियां तथा मंदिर के भाग ध्वंस किए और पूजा बंद करा दी तथा विग्रहो को चिलिका झील मे स्थित एक द्वीप मे गुप्त रखा गया। बाद में, रामचंद्र देब के खुर्दा में स्वतंत्र राज्य स्थापित करने पर, मंदिर और इसकी मूर्तियों की पुनर्स्थापना हुई।
मंदिर का विहंगम दृश्य
कलिंग शैली में निर्मित इस मंदिर को हम देखे तो वर्तमान में भी काला पहाड़ द्वारा किए गए विध्वंस के चिन्ह दिखाई देते हैं। मुख्य मंदिर के आमलक एवं जगमोहन की छत को उसके द्वारा तोड़ दिया गया प्रतीत होता है। प्रस्तर निर्मित इस मंदिर के विशाल आमलक एवं जगमोहन की छत का पुनर्निर्माण हुआ है। जो प्रस्तर निर्मित न होकर चूना सुर्खी से बना हुआ है अलग ही दिखाई देता है। राजा ने जगन्नाथ मंदिर का भव्य निर्माण कराया था। इसकी भित्तियों पर अप्सराएं, वादक, भारसाधक, व्यालों के साथ मिथुन मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं। इसकी भव्यता देखते ही बनती है।
चलो चले मुसाफ़िर
मंदिर का विस्तार वृहत क्षेत्र में है, जो लगभग चार लाख वर्ग फ़ुट में विस्तारित है और चारदिवारी से घिरा हुआ कलिंग स्थापत्यकला एवं शिल्प का उदाहरण है तथा यह भारत के भव्यतम स्मारक स्थलों में से एक है। मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है, जिसके शिखर पर विष्णु का श्री सुदर्शन चक्र (आठ आरों का चक्र) मंडित है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है। मंदिर का मुख्य ढांचा एक 214 फ़ुट (65 मी) ऊंचे पाषाण चबूतरे पर बना है। इसके भीतर आंतरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। 
सिंह द्वार पर स्थापित गरुड़ स्तंभ
मंदिर का मुख्य भाग विशाल है। मंदिर की पिरामिडाकार छत और लगे हुए मण्डप, अट्टालिकारूपी मुख्य मंदिर के निकट होते हुए ऊंचे होते गये हैं। यह एक पर्वत को घेरी हुई छोटी पहाड़ियों एवं टीलों के समुह सदृश दिखाई देता है। मुख्य भवन एक बीस फ़ुट (6.1 मी) ऊंची दीवार से घिरा हुआ है तथा दूसरी दीवार मुख्य मंदिर को घेरती है। एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तंभ, मुख्य द्वार के ठीक सामने स्थित है। इसका द्वार दो सिंहों द्वारा रक्षित हैं।
ध्वज एवं चक्र
मंदिर के शिखर पर स्थित चक्र, सुदर्शन चक्र का प्रतीक है और लाल ध्वज भगवान जगन्नाथ का प्रतीक माना जाता है। इस मंदिर से अनेक किंवदन्तियां एवं लोककथाएं जुड़ी हुई हैं। एक कथा के अनुसार भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया।

रथयात्रा मार्ग
उसके बाद राजा विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर समक्ष मूर्ति बनवाने के लिए उपस्थित हुए। विश्वकर्मा जी ने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आई, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर मूर्तिकार ने बताया कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं।
भोग प्रसाद रिक्शा
महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह भगवान जगन्नाथ को मानते थे, उन्होने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर को दिये गये स्वर्ण से कहीं अधिक था। कहते हैं कि उन्होंने अपने अंतिम दिनों में यह वसीयत भी की थी कि विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा, जो विश्व में अब तक सबसे मूल्यवान और सबसे बड़ा हीरा है, इस मंदिर को दान कर दिया जाए। लेकिन यह सम्भव ना हो सका, क्योकि उस समय तक ब्रिटिशों ने पंजाब पर अपना अधिकार करके, उनकी सभी शाही सम्पत्ति जब्त कर ली थी। वर्ना कोहिनूर हीरा, भगवान जगन्नाथ के मुकुट की शान होता।
मंदिर मुख्य प्रवेश द्वार
जगन्नाथ मंदिर की एक खास बात है कि इसमें हिन्दूओं के अतिरित्क अन्य धर्मावलम्बियों का प्रवेश वर्जित है। मुख्यद्वार पर ही इस आशय की चेतावनी लिखी हुई है। भारतीय सिक्ख, जैन एवं बौद्धों के लिए प्रवेश की छूट है, परन्तु उन्हें अपनी भारतीय पहचान दिखानी होती है। मंदिर ने धीरे-धीरे गैर-भारतीय मूल के लेकिन हिन्दू लोगों का मंदिर क्षेत्र में प्रवेश स्वीकार करना आरम्भ किया है। अन्यथा बाली द्वीप के लोगों को भी प्रवेश नहीं दिया जाता था। पूछने पर पण्डा जी ने बताया कि अन्य लोगों को भगवान स्वयं रथयात्रा के दिन मंदिर से बाहर आकर दर्शन देते हैं, इस दिन कोई भी भगवान के दर्शन कर सकता है। यह  रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को होती है, जो तिथियों के अनुसार जून या जुलाई में होती है। जारी है… आगे पढें।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

सम्राट अशोक से एक मुलाकात - कलिंग यात्रा

भुवनेश्वर एक ऐसा नगर है जहाँ हम कोई भी सड़क पकड़ कर किसी भी तरफ़ निकल जाएं दर्शनीय एवं पुरातत्वीय स्मारकों के दर्शन हो जाएगें। अब हम धौली जा रहे थे, जो भुवनेश्वर से लगभग किमी की दूरी पर है। चलते मेरे ध्यान में ध्यान में नहीं था कि यह महत्वपूर्ण स्थान है और इसके बिना मेरी भुवनेश्वर यात्रा अधुरी रह जाएगी। यह एक टेकरी/ डूंगरी पर स्थित है। ऑटो वाले ने डूंगरी से थोड़ी दूर पर ही उतार दिया। पैड़ियों से ऊपर जाने पर  स्तूपनुमा इमारत दिखाई दी। यह नई बनी प्रतीत हो रही थी। इसकी चारों दिशाओं में बुद्ध को विभिन्न आसनों में दिखाया गया है। पहली प्रतिमा धम्म परिवर्तन मुद्रा, दूसरी प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा, तीसरी प्रतिमा गणिका द्वारा खीर प्रदान करते हुए, चौथी प्रतिमा अभय मुद्रा, पांचवी प्रतिमा निर्वाण मुद्रा में स्थापित की गई है। इस स्तूप का निर्माण बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा कराया गया है। बड़ी संख्या में लोग इस स्थान का भ्रमण करने आते हैं।
धौली स्तूप भुवनेश्वर 
धूप सिर पर चढ रही थी और भूख का समय भी हो गया था। शरीर की उर्जा चूक रही थी। इसलिए हमने लौटने की योजना बना ली। जल्दी ही ऑटो तक पहुंच गए। पहाड़ी से उतरते समय बांए तरफ़ एक स्थान को फ़ेंसिग से घेरा गया देख कर मैने ऑटो रुकवा लिया। उतरने पर देखा कि वहाँ पुरातत्व सर्वेक्षण का सूचना फ़लक लगा हुआ है अर्थात यह स्थान महत्वपूर्ण है इसे देखना जरुरी है। पता चला कि यहाँ सम्राट अशोक का शिलालेख है। बस इतना जानना था कि शरीर में चूकी हुई उर्जा पुन: आ गई और हम टेकरी पर चढ गए। यहाँ एक चट्टान को काटकर हाथी का शिरोभाग निर्मित किया गया है और इसी चट्टान पर एक बड़ा शिलालेख अंकित है। शिलालेख को कांच से ढक दिया गया है जिससे फ़ोटो स्पष्ट नहीं ली जा सकती। 
अशोक शिलालेख धौली 
यह शिलालेख सवा दो हजार वर्ष पूर्व  मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक द्वारा अंकित करवाया गया था। उसके कुल ३३ अभिलेखों में से यह एक प्राप्त अभिलेख हुआ हैं। इसे ब्राह्मी शिलालेख अशोक ने स्तंभों, चट्टानों और गुफ़ाओं की दीवारों में अपने २६९ ईसापूर्व से २३१ ईसापूर्व चलने वाले शासनकाल में खुदवाया था। अशोक के शिलालेख आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं। इस ब्राह्मी शिलालेख को 1837 में लेफ़्टिनेंट मार्कम किट्टो द्वारा ढूंढा गया था। इस शिलालेख में अशोक के चौदह अनुशासनों में से 11 को लिपिबद्ध किया गया है। कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ, उसने जनसाधारण पर अपनी सहृदयता की छाप छोड़ने के उद्देश्य से इस आदेश का प्रचार करवाया। इसमें लिखा है कि - 
कांच से घिरा हुआ शिलालेख 
1 - किसी पशु का वध न किया जाए और राजकीय पाकशाला एवं मनोरंजन उत्सव न किए जाएं। 
2 - मनुष्यों एवं पशुओं के चिकित्सालय खुलवाए जाएं एवं उसमें औषधि की व्यवस्था की जाए। मनुष्यों एवं पशुओं की सुविधा के लिए मार्ग में छायादार वृक्ष लगवाए जाएं एवं राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था कुंए खुदवा कर की जाए। 
3 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि प्रति पांच वर्ष पश्चात धर्म प्रचार के लिए जाएं। 
4 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि व्यवहार के सनातन नियमों यथा नैतिकता एवं दया का सर्वत्र प्रचार किया जाए। 
5 - धर्ममहामात्रों की नियुक्ति एवं धर्म एवं नैतिकता का प्रचार प्रसार किया जाए। 
6 - राजकीय पदाधिकारियों को स्पष्ट आदेश है कि सर्वलोकहितकारी कुछ भी प्रशासनिक सुझाव एवं सूचना मुझे प्रत्येक स्थान एवं समय पर दें।
7- सभी जाति एवं धर्मों के लोग सभी स्थानों पर रह सकें क्योंकि वे आत्म संयम एवं हृदय की पवित्रता चाहते हैं।
8-राज्याभिषेक के दसवें वर्ष अशोक सम्बोधि (बोध गया) की यात्रा कर धर्म यात्राओं का प्रारंभ किया जाए। ब्राह्मणों एवं श्रमणों का दर्शन एवं गरीबों के नैतिक कल्याण का प्रचार किया जाए।
9- दास तथा अनुचरों के प्रति शिष्टाचार का पालन करें, जानवरों के प्रति उदारता एवं ब्राह्मणो तथा श्रमणों के प्रति उचित व्यवहार करने का आदेश दिया गया।
10- अशोक ने घोषणा कि यश एवं कीर्ति के लिए नैतिकता होनी चाहिए।
11- धर्म प्रचारार्थ अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर शिलाओं पर धम्म लिपिबद्ध कराया जिसमें धर्म संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाओं का वर्णन है।
राजा एवं राणा  सम्मुख 
एक अन्य पृथक शिलालेख ;में अशोक तोशाली के महामत्तों को आदेश देता है कि सभी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान के लिए इच्छा करता हूं कि इहलोक एवं परलोक में उनकी सुख समृद्धि हो,उसी प्रकार सम्पूर्ण प्रजा के लिए मेरी यही इच्छा है। बिना उचित कारण के किसी को शारीरिक दंड, ईर्ष्या, क्रोध आदि दुर्गुणों से रहित निष्पक्ष मार्ग का अनुशरण करने का आदेश देता हूँ। तोशाली के महामात्रों को आदेश है कि सीमांत राज्यों के लोगों के हित - कल्याण को ध्यान में रखा जाए एवं उनपर अनुग्रह की नीति अपनाई जाए। -  इस तरह सम्राट अशोक से भेंट हो गई शिलालेख के माध्यम से, अब हम धौली से चलकर भुवनेश्वर अपने डेरे में पहुंच गए। जारी है आगे पढें…॥

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

चंद्रभागा के तट पर सांब की अर्क उपासना - कलिंग यात्रा

प्रारंभ से पढ़े…
मारे पास समय कम था और हमें भुवनेश्वर भी पहुंचना था। सूर्य मंदिर की हम एक परिक्रमा पूर्ण कर चुके थे। मेरे द्वारा मंदिर  निरीक्षण की मंदगति को देख कर बिकाश थक चुका था। इसक अहसास भी मुझे था। सूर्यमंदिर की जगती के अतिरिक्त भित्तियों में काम प्रधान प्रतिमाएं जड़ी हुई हैं। आकार में छोटी और बड़ी दोनो तरह की हैं। मैं सभी प्रतिमाओं के चित्र ले रहा था। मंडप का द्वार काले ग्रेनाईट से बहुत ही सुंदर बना है। लता, पुष्प वल्लरियों के साथ अन्य मानवीय चित्र भी अद्भुत हैं। मंडप का द्वार बंद कर दिया गया है। ब्रिटिश पुराविद फ़र्ग्यूसन ने जब 1837 में इस स्थान का भ्रमण किया था तो उस समय मुख्य मंदिर का एक कोना बचा हुआ था, जो अब नहीं है। मंडप के द्वार पर काले ग्रेनाईट के पत्थर पर अंग्रेजी में बंगाल के लेफ़्टिनेंट गर्वनर का आदेश लिखा हुआ है कि इस सुंदर संचरना के भीतरी भाग को बंद कर दिया गया है। आदेश की तारीख 1903 लिखी हुई है। इस मंडप के भीतरी भाग में रेत भर कर द्वार बंद कर दिया गया है।  
बंगाल के लेफ़्टिनेंट गर्वनर का आदेश 
अब जर्जर हुए इस मंडप को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एक बार फ़िर खोलने जा रहा है। इसकी मरम्मत का कार्य शुरु हो गया है। मुख्य मंडप से पत्थर गिरने के कारण इसे बंद कर दिया गया था। 2008 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे खोलने पर विचार करना शुरु किया। पुराविदों के तकनीकी अध्ययन में पता चला कि मुख्य मंडप में भरी गई रेत खिसककर नीचे आ गई है। इसी तरह आठ सौ साल पुराने इस मंदिर की दीवारों के दरारों में भरा गया मसाला भी निकल चुका है और दीवारें खोखली हो गई हैं। मंदिर का गर्भ गृह पहले ही गिर चुका है। वास्तुकार प्रतिमा बोस व इटली के पुरातत्वविद प्रोफेसर कोरोसी से रिपोर्ट तैयार कराई, जिसमें बताया कि मंदिर को संरक्षित कर गिरने से बचाया जा सकता है। संरक्षण कार्य के पश्चात इसे खोला जा सकता है।
सूर्यमंदिर परिसर का हाट
मैं जब चित्र खींच रहा था। तब शार्दूल की छांह में विक्रम भी ऊंघ रहा था। मैने जल्दी जल्दी चित्र खींचने का काम सम्पन्न किया और हम स्मारक से बाहर आ गए। स्मारक के रास्ते में हैंडलूम के सामान की दुकाने लगी हुई हैं, जैसे सभी प्रसिद्ध स्थलों पर होती है। यात्री इनसे कुछ सामान स्मृति के लिए खरीदकर ले जाते हैं। हमने कुछ नहीं खरीदा। अब हमें चंद्रभागा के तट पर जाना था। चंद्रभागा तट की दूरी यहाँ से लगभग 3 किलोमीटर है। बिकाश बाबू दही बड़ा का स्वाद लेने लगे और हमने पान बनवाया। उड़ीसा के पान में चूने की मात्रा थोड़ी अधिक होती है इसलिए चूना लगाने में थोड़ी कंजूसी बरतने के लिए पान वाले को कहना चाहिए, अन्यथा मुंह का भीतरी भाग भोजन करने लायक नहीं रहेगा। बाकी बनारस, इलाहाबाद, छत्तीसगढ़ में चूना एवं कत्था की मात्रा पान में संतुलित रहती है। पान खाकर हमने विकम का धन्यवाद करते हुए उससे विदा ली और 60 रुपए में आटो किराया करके चंद्रभागा तट की ओर चल पड़े।
चन्द्रभागा के तट पर बीजू बाबू
ुचंद्रभागा तट पर समुद्र दूर से ही दिखाई देने लगता है। तट पर सामने बीजू बाबू की विशाल प्रतिमा समुद्र की ओर संकेत करते हुए स्थापित की गई है। प्रतिमा देख कर ऐसा लगता है कि जैसे बीजू बाबू स्वयं ही चंद्रभागा तट का रास्ता बता रहे हों। आजादी के बाद के उड़ीसा में बीजू बाबू का महत्वपूर्ण स्थान है और यहाँ की जनता उन्हें खूब चाहती थी। इसी चाहत का फ़ायदा उठा कर नोबिन बाबू इतने बरसों से राज कर रहे हैं। जबकि उन्हें उड़िया भाषा भी बोलनी नहीं आती। उन्होने मुख्यमंत्री रहते हुए सिर्फ़ बीजू बाबू के पुतले ही प्रत्येक गाँव में लगाए हैं, यही उड़ीसा के विकास में एक महत्वपूर्ण काम हुआ है। लोग पुतलों को देख कर ही वोट दे देते हैं। उन्हे लिए यही अच्छे दिन हैं। बाकी तो जो है सो हैइए है। 
लहरों के साथ थोड़ी मस्ती हो जाए
समुद्र तट पर जलकिलोल करते बहुत सारे नर-नारी, युवा वृद्ध एवं नव विवाहित जोड़े भी दिखाई दिए। आज कल तो हर आदमी के हाथ में कैमरा है। बस खटा खट फ़ोटो खींचने का ही काम हो रहा था। कोई लहरों के साथ फ़ोटो खिंचवा रहा था कोई नई नवेली दुल्हिन के साथ। हम लोग भी कुछ देर समुद्र का आनंद लेते रहे। बड़ी लहरे आती और दूर तक सागर का विस्तार कर भिगो देती। बिकास बाबू फ़ोटू खींच रहे थे और मैं सोच रहा था कि यह वही स्थान है जहाँ आकर अर्क उपासना करने से साम्ब का कोढ दूर हुआ। लोगों को तो यह मालूम ही नहीं है कि यह स्थान पौराणिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है। पर्यटकों को भी इतिहास से अधिक मतलब नहीं रहता। उन्हें तो सिर्फ़ घूमने फ़िरने और खाने पीने से मतलब होता है और यही पर्यटन भी है।
बिकास बाबू चंद्राभागा के जल का आचमन करते हुए
कृष्ण के जांबवती से जन्मे पुत्र सांब अत्यन्त सुंदर थे। कृष्ण की स्त्रियाँ जहाँ स्नान किया करती थीं, वहाँ से नारद जी निकले। उन्होंने देखा कि वहाँ स्त्रियाँ सांब के साथ प्रेमचेष्टा कर रही है। यह देखकर नारद श्रीकृष्ण को वहाँ लिवा लाए। कृष्ण ने जब यह देखा तब उन्होंन उसे कोढ़ी हो जाने का शाप दे दिया। जब सांब ने अपने को इस संबंध में निर्दोष बताया तब कृष्ण ने उन्हें मैत्रये बन (मित्रवन) जाकर अर्क उपासना करने को कहा। यहाँ अर्क शब्द के कई अर्थ होते हैं। अर्क का अर्थ सूर्य, मदार एवं वनस्पति से तैयार औषधि भी होता है। श्राप के अनुसार सांब ने यहाँ रहकर अर्क (मदार) के अर्क (औषधि) का लेपन कर अर्क उपासना ( सूर्य रश्मि स्नान) बारह वर्षों तक किया। इस कठिन चिकित्सा से उसका कोढ ठीक हो गया। 
मछुवारों की बस्ती 
पुराणानुसार सांब की आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया। दूसरे दिन जब वे चंद्रभागा नदी में स्नान करने गए तो उन्हें नदी में कमल पत्र पर सूर्य की एक मूर्ति दिखाई पड़ी। उस मूर्ति को लाकर सांब ने यथाविधि स्थापना की और उसकी पूजा के लिये अठारह शाकद्वीपी ब्राह्मणों को बुलाकर वहाँ बसाया। पुराणों में इस सूर्य मूर्ति का उल्लेख कोणार्क अथवा कोणादित्य के नाम से किया गया है। कहते है कि रथ सप्तमी को सांब ने चंद्रभागा नदी में स्नानकर उक्त मूर्ति प्राप्त की थी। आज भी उस तिथि को वहाँ लोग स्नान और सूर्य की पूजा करने आते हैं और मेला जैसा वातावरण यहाँ दिखाई देता है। एक तरह से चंद्रभागा तट श्रद्धा के कारण पुण्य क्षेत्र माना गया है।
टाईटनिक की उड़ान - चल छैंया छैंया
इस तट से थोड़ा आगे चलकर मछुवारों की बस्ती है, जहाँ रंगबिरंगी सैकड़ों नावें रखी है। एक तरह से मान कर चलें तो यह नावों का अड्डा है। मछुवारे मछली मार कर आने के बाद उसे यहीं सुखाते है और उसे बाजार तक पहुंचाते हैं। हम इस बस्ती की ओर आ गए। कुछ मछुवारे अपने जालों की मरम्मत कर रहे थे और कुछ मदपान कर मस्त थे। यहां के वातावरण में मछली की गंध समाई हुई थी। हमने कुछ चित्र यहां पर लिए। सांझ हो रही थी और अर्करथ अस्ताचल की ओर चल पड़ा था। आसमान में लालिमा छाई हुई थी। हमें भी भुवनेश्वर पहुंचना था। शाम के 7 बजे अंतिम बस भुवनेश्वर की ओर जाती है। सार्वजनिक वाहन से यात्रा करने के लिए व्यक्ति को उसी के समय के हिसाब से चलना पड़ता है। हम बस अड्डे की ओर आ गए और थोड़ी देर में हमें भुवनेश्वर के बस मिल गई।  जारी है आगे पढ़ें……

शुक्रवार, 1 मई 2015

सूर्यमंदिर का निर्माण : इतिहास की महान परियोजना - कलिंग यात्रा

अभी तक सूर्यमंदिर के अधिष्ठान एवं भित्तियों पर जड़ी प्रतिमाओं पर ही एक नजर डाल रहे थे। अब बारी है मंदिर निर्माण एवं उसकी संरचना की। सूर्य मंदिर निर्माण की योजना साधारण नहीं है। काल के हिसाब से तत्कालीन राज्य के विशाल एवं महत्वाकांक्षी योजना थी। इसके प्रारुप निर्माण पर ही काफ़ी वक्त लगा होगा। प्रधान शिल्पकार बिशु महाराणा ने अपने निर्माण दल के साथ महीनों विचार विमर्श किया होगा तब कहीं जाकर इस योजना का प्रारुप तैयार हुआ होगा। हमने देखा है कि मंदिर की भित्तियों का कोई भी स्थान खाली नहीं है जिस पर शिल्पकार की छेनी के निशान नहीं है। ज्यामितिय आकृतियों के साथ भित्तियों पर विषयाधारित शिल्पांकन महत्वपूर्ण है। प्रतिमाओं में राजा के परिजनों से लेकर उनकी गतिविधियों को स्थान दिया गया है। अपने प्रज्ञानुसार तो बिशु (विष्णु) महाराणा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी होगी।

अगर कल्पना दृश्यांकन करें तो निर्माण स्थल पर मेला लगा रहता होगा। बारह सौ शिल्पकार और उनके सहयोगियों तथा निर्माण सामग्री पूर्तिकर्ताओं को मिलाकर कम से कम पांच हजार की मानव संख्या कार्य में लगी होगी। निर्माण स्थल पर इनकी दिनचर्या से संबंधित सारी वस्तुएं उपलब्ध कराई गई होगीं तथा इनके भोजन के लिए विशाल भोजनालय का भी अस्थायी निर्माण किया गया होगा। शिला निर्माण योजनाबद्ध हो रहा होगा। सैकड़ों लोहार लोहे की पट्टी तैयार कर रहे होगें जिनसे शिलाओं को बांधना है। प्रधान शिल्पी एक-एक निर्माण का स्वयं निरीक्षण कर रहा होगा। राजा के कारनून निर्माण कार्य में लगने वाले धन का संग्रह कर रहे होगें। निर्माण में गजबल एवं अन्य पशुबल के लिए भी चारा जुटाया गया होगा। आखिर एक विशाल स्मारक का निर्माण हो रहा था।

सिंहद्वार की एक प्रतिमा का वजन 28 टन बताया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निर्माण में 40 एवं 50 टन के भी प्रस्तर खंडों का प्रयोग किया गया होगा। इन पत्थरों को पहाड़ से काट कर अलग करने एवं निर्माण स्थल तक लाने में श्रम के साथ धन भी पानी की तरह बहाया होगा। तेरहवी सदी वैसे भी विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी। निर्माण के लिए आधुनिक यत्रों का प्रयोग किया गया होगा। पत्थरों पर कारीगरी करने के लिए जल की आवश्यकता भी होती है। निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले जल की भी व्यवस्था की गई होगी। छेनी हथौड़ी की लयबद्ध तान निर्माण स्थल पर बरसों गुंजती रही होगी और शिल्पकारों का पसीना बह कर चंद्रभागा नदी में मिल कर समुद्र को और भी खारा कर गया होगा। 

कलिंग की अपनी विशिष्ट शैली है, जिसमें कोणीय अट्टालिका पर मंडप की तरह छतरी ढ़ंकी होती है। यह मंदिर भी  उड़ीसा के अन्य मंदिरों जैसा ही है। मुख्य गर्भ गृह की ऊंचाई 229 फ़ुट मापी गई है। गर्भ गृह के साथ नाट्यशाला 128 फ़ुट ऊंची है। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फ़ुट X 50 फ़ुट का है। यह मंदिर पुर्व एंव पश्चिम दिशा में बना है। निर्माण में प्रयुक्त प्रत्येक शिला को लोहे की पट्टियों (क्लैंप) से बांधा गया है। शिलाओं को स्थापित करने में कहीं पर भी अन्य लेपन (चूना या अन्य) का प्रयोग नहीं किया गया। मंदिर के समस्त निर्माण को योजनानुसार एक दूसरे पत्थर के साथ लौह बंधन में ही बांधा गया है। इसका उदाहरण हमें मंदिर में कई स्थानों पर मिलता है।

मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहीं दूरस्थ स्थान से लाए गए होगें। खैर अबुल फ़जल कुछ भी कहे पर मंदिर निर्माण के साथ नरसिंह देव का ही नाम जुड़ा हुआ है।. पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ 1278 ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने 1282 तक शासन किया. कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के बीच हुआ था।

इतिहास की कहानी प्रमाणों के अभाव में अनुमान पर ही गति प्राप्त करती है। इस मंदिर के निर्माण से लेकर विध्वंस तक अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। कोई भी सदा के लिए साक्षी नहीं हो सकता। एक कालखंड तक ही जीवित साक्ष्य मिल पाते हैं। कहते हैं कि मंदिर में पूजा नहीं हो सकी। यह मंदिर बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही रह गया। अगर मुख्य गर्भ गृह में प्रतिमा की स्थापना हो जाती तो पूजा भी अनिवार्य रुप से शुरु हो जाती। पूजा न होने के पीछे भी कई कहानियाँ सामने आती हैं। सर्व प्रथम तो कहा जाता है कि मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के पुत्र की मृत्यु मंदिर निर्माण के समय हो गई थी। इसे अपशुगन मान कर आगे का कार्य पूर्ण नहीं हो सका। एक अन्य किंवदन्ति कहती है कि मंदिर निर्माण के दौरान ही राजा की अकाल मृत्यु हो गई। इसलिए निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका। खैर उस काल में जो भी हुआ हो परन्तु कोणार्क के रुप में दुनिया को एक अद्भुत कृति प्राप्त हो गई। जो वर्तमान में भी विद्यमान है।

मंदिर के विध्वंस के विषय में भी कई किंवदन्तियां सुनाई देती हैं। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण में वास्तु दोष था इसलिए मंदिर में पूजा न हो सकी और कालांतर में ध्वस्त हो गया। अब तथाकथित वास्तु शास्त्रियों को भी अपना उल्लू सीधा करने का साधन मिल गया। सबसे बड़ा वास्तुकार और वास्तुशास्त्री तो बिशु महाराणा था जिसने राजा की परिकल्पना को साकार किया। इतनी बड़ी योजना पर कार्य करने वाला वास्तुकार और शिल्पकार इतना मुर्ख नहीं होगा कि उसे वास्तु ग्रंथों का ज्ञान ही न हो और राजा भी इतना मुर्ख नहीं होगा कि जो अनाड़ी व्यक्ति के हाथों में अपने जीवन की सबसे भव्य एवं महत्वपूर्ण परियोजना को किसी ऐरे गैरे के हाथों में बर्बाद करने के लिए दे दे। आज व्यक्ति छोटा सा दो कमरों का मकान बनाता है तो वह खर्च करने से पहले किसी वास्तुकार से नक्शा बनवा कर उसकी देख रेख में कार्य शुरु करता है। जारी है आगे पढ़े…

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

दक्षिण अफ़्रीका देशों से कलिंग के सम्बंध - कलिंग यात्रा


जो राजा प्रजा वत्सल होता है वही राज्य में लोकप्रिय होता है और प्रजा उसे पिता तुल्य मानती है। उसके एक संकेत पर धन जन न्यौछावर हो जाता है। राज्य की व्यवस्था संचालन के लिए धन एवं सैनिक दोनो की आवश्यकता होती है। अगर राजा की कराधान व्यवस्था प्रजा अनुकूल है तो उसे प्रजा के प्रेम के साथ धन भी सहजता से उपलब्ध होता था। लूट पाट कर प्रजा का खून चूसने वाला राज्य अधिक दिनों तक स्थाई नहीं रहता। वर्तमान में भी यही दिखाई देता है। कोणार्क की भित्तियो पर राजकाज को भी स्थान दिया है। राज सभा की गतिविधियों का चित्रण करते हुए तत्कालीन शासक को अपने दरबारियों से मंत्रणा करते हुए दिखाया गया है। शांतिकाल एवं युद्ध काल की राज सभा स्पष्ट दिखाई देती है।  
युद्ध पूर्व मंत्रणा
प्रतिमा संकेतों से ज्ञात होता है कि राजा नृसिंह देव के शासन काल में उन्हें राज्य रक्षा के लिए युद्ध भी लड़ने पड़े। एक चित्र में दिखाया गया है कि सिंहासनारुढ़ नृप अपने राज सभासदों एवं दरबारियों से मंत्रणा कर रहा है। सभी उसकी आज्ञा का पालन करने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। साथ ही दरबार के बाहर अश्व एवं गज सेना तैयार है कि युद्ध मंत्रणा और रणनीति पर चर्चा सम्पन्न होते ही सेना युद्ध के लिए कूच कर जाएगी। एक अन्य प्रतिमा में अश्वारुढ़ राजा को शीश विहीन दिखाया गया है। इससे ज्ञात होता है कि किसी भीषण युद्ध में राजा ने अभूतपूर्व युद्ध कौशल का परिचय देते हुए शत्रु सेना को आतंकित कर प्राण त्याग दिए, प्राणोसर्ग पर्यंत भी उसका धड़ युद्ध करते रहा। युद्ध में अश्व गतिमान दिखाई दे रहा है। शीश कटने के बाद युद्ध करने की कई किवदंतियाँ समाज में प्रचलित हैं। इसका सीधा अर्थ राजा के द्वारा भीषण युद्ध रचाने से लगाया जाता है।
मंत्रणोपरांत युद्ध के लिए प्रयाण
किसी भी राज्य के विकास के लिए शांति का काल महत्वपूर्ण होता है। शांति काल में राज्य चतुर्दिक उन्नति करता है। प्रजा हितों के लिए शासन नयी योजनाएं बनाता है और उन्हें लागु भी करता है। सड़क, बावड़ी, कुंओं, मंदिरों, सरोवरों एवं भवनों का निर्माण होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा प्रजा के मनोरंजन की व्यवस्था भी होती है। युद्धकाल न होने से प्रजा पर अतिरिक्त करों का भार भी नहीं लादा जाता। जिसके कारण राज्य में खुशहाली का वातावरण होता है। कला एवं कलाकारों को भी प्रश्रय मिलता है और उन्हें उचित जीविकोपार्जन हेतु मानदेय के साथ सम्मान भी मिलता है। इस चित्र में राजा शांतिकाल में अपने विश्वस्त परिजनों एवं अनुचरों से चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। यह सब शांति काल में ही संभव है।
शीश विहीन योद्धा रण में गतिमान अश्वारुढ़
एक अन्य प्रतिमा से राजा के विषय में एक नई जानकारी मिलती है। यह तो सभी जानते हैं कि शांति काल में राजाओं का प्रमुख मनोरंजन का साधन आखेट होता था और आखेट के लिए वनों में दूर-दूर तक जाकर शिविर लगाए जाते थे। आखेट हेतु राजा समस्त लाव लश्कर के साथ जाता था। इस प्रतिमा चित्र में दिखाया गया है कि राजा हाथी पर हौदे में सवार होकर हाथ में धनुष लेकर आखेट के लिए वन में है और हाथी गतिमान है। उसके सामने कई लोग दिखाई दे रहे हैं जो हाथ उठाकर राजा से कुछ कह रहे हैं या उसका स्वागत कर रहे हैं इसके साथ शिकार हेतु हांका करने की आज्ञा मांग रहे हैं। शिकार के लिए हांका करना महत्वपूर्ण एवं श्रम साध्य कार्य होता था।
शांतिकाल की मंत्रणा, संभवत: मंदिर निर्माण पर विचार विमर्श
इनके साथ एक जिराफ़ भी दिखाई दे रहा है। जाहिर है जिराफ़ भारत में तो पाया नहीं जाता। जिराफ़ दक्षिण अफ़्रीका के वनों में सोमालिया तक पाया जाता है। इससे यह जानकारी मिलती है कि कलिंग का राजनीयिक संबंध दक्षिण अफ़्रीका से था तथा कलिंग के राजा आखेट हेतु अफ़्रीका के वनों तक जाते थे। बीसवीं सदी में सरगुजा महाराज रामानुजशरण सिंह देव द्वारा अफ़्रीका के वनों में शिकार करने का उल्लेख है तथा वे विश्व के तीसरे बड़े शिकारी माने जाते हैं। उन्होने 1100 शेरो का शिकार किया था। यह आंकड़ा उनके नाम से गिनीज बुक में भी दर्ज है। इससे इस धारणा को बल मिलता है कि कलिंग राजा भी आखेट के लिए अफ़्रीका के वनों तक जाते थे। ऐसे राजा को प्रतापी राजा ही कहा जाएगा।
अफ़्रीका के वनों में नृप हाथी एवं जिराफ़
तत्कालीन जनजीवन की झांकी दिखाते हुए कुछ प्रतिमाएं भी बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। इस प्रतिमा में एक व्यक्ति ने हाथ में छूरी धारण कर रखी है और दूसरे हाथ में कुत्ते की एक टांग पकड़ कर उल्टा लटका रखा है। शायद शिल्पकार इस चित्र में मनो विनोद प्रदर्शित करना चाहता है। जब राजा गजारुढ़ होकर शेर और जिराफ़ का शिकार कर सकता है तो एक आम आदमी कुत्ते का शिकार क्यों नहीं कर सकता। एक वानर स्तंभ पर चढ़ कर उसके इस कार्य को विस्फ़ारित आंखो से देख रहा है। कुत्ता भी मुंह फ़ाड़ कर कांय कांय कर रहा है आखिर जान उसको भी प्यारी है। एक बात और हो सकती है, हो सकता है उस समय लोग कुत्ते का मांस खाते हों, वैसे उत्त्तर पूर्व में आज भी कुत्ते का मांस बड़े चाव से खाया जाता है। 
स्वान संहार का दृश्य
अन्य प्रतिमा में एक दंपत्ति अपने बच्चे के साथ जीवन यापन के लिए पलायन कर रहा है और थकने पर मार्ग में वृक्ष ने नीचे कुछ पल के लिए ठहर गया है। परम्परागत उड़िया परिवार दिखाई दे रहा है। पुरुष ने भी जूड़ा बना रखा है, कमर पर पोटली धारण कर रखी है, एक हाथ में धारित खड़ग कांधे पर है, दूसरा हाथ पीछे छुपा हुआ है, स्त्री ने सिर पर समान की पेटिका रखी हुई है और कमर पे बच्चे को बैठाकर स्तनपान करवा रही है। सिर पर रखा कुंदे वाला बक्सा वर्तमान में भी प्रचलन में दिखाई देता है। स्त्री के गले में हार और मंगलसूत्र दिखाई दे रहा है। जिसका बड़ा सा पैंडल स्तन मध्य में झूल रहा है। उड़ीसा से आज भी लोग जीवन यापन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन करते हैं, यह पलायन तब से आज तक सतत जारी है। शिल्पकार ने इस दृष्य को इतना अधिक जीवंत बनाया है कि जैसे यह आज ही मेरे समक्ष घट रहा हो। 
जीवन यापन के लिए पलायन करते दंपत्ति
इस तरह कोणार्क भी भित्तियों पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं इतिहास की परतें लगातार खोलती हैं अगर आपके पास समय है तो वे तत्काल आपके साथ संवाद करने को तत्पर हैं। बस समझना आपको है कि वे क्या कह रही हैं। भित्तियों पर इतने सारे विषयोन को स्थान दिया गया है कि अनुसंधान करने में ही बरसों लग जाएगें। कोणार्क का शिल्पांकन एक खुली किताब की तरह है, आईए और पढ़ते जाइए, इतिहास के सागर में गोता लगाते जाईए आपको सारे रत्न मिल जाएगें और सबसे कीमती रत्न संतोष रत्न मिलेगा। जिसे प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। राज नृसिंह देव भी भव्य मंदिर का निर्माण कर युगों युगों तक के लिए अपनी कीर्ति स्थापना कर संतोषानंद पाना चाहता था। आगे पढ़ेगें मंदिर के निर्माण एवं पतन की कहानी। जारी है आगे पढ़ें……॥ 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

सूर्य मंदिर की मिथुन प्रतिमाएं - कलिंग यात्रा


कलाओं का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से किया गया है। कलाओं की गणना में सबसे अधिक प्रसिद्ध संख्या चौसठ है। शुक्र नीति एंव तंत्र ग्रंथों में कलाओं की संख्या चौसठ ही दी गई है। ललित विस्तार में पुरुषकला के रुप में छियासी नाम गिनाए गए हैं और कामकला के रुप में चौसठ नाम। वात्सायन से लेकर अन्य आचार्यों ने भी कलाओं की संख्या चौसठ ही गिनी है। कला शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ॠग्वेद में ही मिलता है - यथा कलां यथा यथा शफ़म् यथा ॠणं संनयामसि। आचार्य वात्सायन कहते हैं - जिस क्रिया से, जिस कौशल से कामनियाँ प्रसन्न हों, वशीभूत हो जाएं, वही कला है।" नागरिक के लिए वात्सायन चौसंठ कामकलाओं में शिक्षित होने बात कहते हैं। वात्सायन कहते हैं कि - कामकला की शिक्षा प्राप्त करने के बाद चतुर्वण को दान, वीरता, व्यवसाय एवं श्रमादि द्वारा धनार्जन करना चाहिए और इसके उपरांत ही विवाह करना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि कामकला का चित्रण शैक्षणिक दृष्टिकोण से किया जाता था। 
नायिका - शाल भंजिका
कामकला एक ऐसा विषय है जिस पर सार्वजनिक चर्चा करना वर्तमान में असभ्यता माना जाता है। पर गुह्य संभाषण करना हर स्त्री पुरुष चाहता है क्योंकि विषय ही रसदार है। मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है। भोजन क्षुधा के अतिरिक्त मनुष्य को संसर्ग क्षुधा ही सताती है। कई वर्षों पूर्व डिस्कवरी चैनल पर महाद्वीपों का डोंगी से सफ़र करने वाले व्यक्ति से सफ़र सम्पन्न होने के उपरांत पत्रकार ने पूछा - आप छ: महीने से एकल डोंगी का समुद्र में सफ़र कर रहे हैं, घर पहुंचने के पश्चात वह पहला काम बताईए जिसे आप प्राथमिकता में प्रथम रख कर करना चाहेंगे। उसने जवाब दिया - घर पहुंचने पर मैं सबसे पहले एकांत वातावरण में अपनी पत्नी के साथ चर्मसुख का आनंद उठाना चाहुंगा। यह घटना याद आने का कारण कोणार्क की भित्तियों में उत्कीर्ण कामकेलि की विभिन्न मुद्राएं हैं, जिन्हें सार्वजनिक रुप से प्रदर्शित किया गया है।
नायिक - शुक सारिका
विदेशी पर्यटक मिथुन प्रतिमाओं को आश्चर्य मिश्रित भावों से देखते हैं कि भारत में यौन शिक्षा प्राचीन काल से ही चली आ रही है और इसे सार्वजनिक तौर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वरना पाश्चात्य देशों में भारत के विषय में सिर्फ़ यही धारणा है कि यह जादू टोने, साधू संतों एवं सांपो का देश है। इससे सीधा अर्थ लगा लिया जाता है असभ्य है और सभ्यता का ठेका तो पाश्चात्य देशों के पास है। वात्सायन कहते हैं पति-पत्नी को धार्मिक और सामाजिक नियमों की शिक्षा  कामसूत्र के द्वारा मिलती है। जो दम्पति कामशास्त्र के मुताबिक अपना जीवन व्यतीत  करते है उनका जीवन यौन-दृष्टि के पूरी तरह सुखी होता है। ऐसे दम्पति अपनी पूरी जिंदगी एक-दूसरे के साथ संतुष्ट रहकर बिताते हैं। कामसूत्र द्वारा ऐसी बहुत सी  विधियां बताई जाती है जो स्त्री और पुरुष को आपस में ऐसे मिला देती है जैसे कि दूध में पानी।
 नायिका-पुत्र वल्लभा
भारतीय दर्शन में उपदेश किया गया है कि मनुष्य को जीवन काल में पुरुषार्थ चतुष्टय को धारण करना चाहिए। धर्म अर्थ काम मोक्ष द्वारा ही जीवन सुखमय और आनंददायक होकर अंतिम मंजिल को प्राप्त करता है। इसमें काम का महत्व धर्माचरण के इतना ही पवित्र रखा गया है। जिस प्रकार आहार त्याग देने या पौष्टिक पदार्थों के न खाने से शरीर सूख कर कांटा हो जाता है, इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, क्षुधा-पिपासा शरीर को सोखने लगती है, उसी प्रकार काम निरोध से भी हानि होती है, अनेक शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ पकड़ लेती हैं। ऐसी स्थिति में सारांश यह निकलता है कि बलात निर्यंत्रण या अतिशय भोग ये दोनो ही उपाय हानिकर हैं। इनकी उपाय पूर्वक चिकित्सा करनी चाहिए। वात्सायन कहते हैं कि इन्हें इस प्रकार प्राप्त करें कि एक पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थ का बाधक न बने।
नायिका मुग्धा
प्राचीनकाल में अभिजात्य नागरजनों एवं साहित रसिकों तथा विलासप्रियों के लिए नायिका रसानुभूति का माध्यम एवं मनोरंजन का कलापूर्ण साधन भी रहा है। भित्ति प्रतिमाओं में शिल्पकारों ने नायिका यथा, गणिका, शुक सारिका, आंजना, शाल भंजिका, रमणिका, अभिसारिका, मुग्धा एवं अन्य को भित्तियों में स्थान दिया है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नायिकाओं को ही स्थान दिया जाता था, समाज में नायक भी होते थे, भरत ने नायक के चार भेद किए हैं- धीरललित, धीरप्रशान्त, धीरोदात्त, धीरोद्धत। ये भेद नाटक के नायक के हैं। "अग्निपुराण" में इनके अतिरिक्त चार और भेदों का उल्लेख है : अनुकूल, दर्क्षिण, शठ, धृष्ठ। ये भेद स्पष्ट ही शृंगार रस के आलंबन विभाव के हैं। मनोरंजन की दृष्टि से इनका चित्रण भी मंदिरों की भित्तियों पर किए जाने की परम्परा रही है।  
नायक - धीरललित
मंदिरों में उत्कीर्ण मैथुन प्रतिमाओं के द्वारा हमारे पूर्वज कुछ गूढ़ संदेश आने वाली पीढ़ी के लिए संकेत के तौर पर देकर गए हैं। यह भोग विलास का कोरा प्रदर्शन नहीं है। स्त्री-पुरुष संयोग को प्रतिमाओं में प्रदर्शित करते हुए यह भी दर्शाया गया है कि "अङादङात सम्भवसि हृदयादधि जायसे। आत्मा वै पुत्रानामासि सजीव शरद: शतम्॥ (निरुक्त निघंटु कांड 3/1/4) तू मेरे अंग प्रत्यंग से प्राप्त हुआ  है, तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ है और मेरा ही पुत्र संज्ञक स्वरुप है। ऐसा तू सौ वर्षों तक जीवित रह।" मानव शरीर को अमरावती कहा गया। इसे अमरावती कहने का कारण है कि शरीर के द्वारा नए शरीर की उत्तप्त्ति होती है, इस शरीर द्वारा सतत उत्पन्न होक मानव युगों युगों तक जीवित रहता है। इस दृष्टि से परम्परागत शरीर नष्ट नहीं होता। इसलिए अप्रमत्त होकर इसकी रक्षा करनी चाहिए। यही संसार का अंतिम सत्य है,  जो जहाँ से शुरु होता है वहीं समाप्त भी होता है। जारी है… आगे पढ़ें। 

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

पर्यावरण प्रदूषण एवं प्राचीन चिकित्सा पद्धति - कलिंग यात्रा


चलते-चलते एक-एक पाषाण प्रतिमा के रुकता हूँ और वह मुझे कुछ न कुछ कहती है। जिसे सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ और वह मुझे ही कह सकती है। विक्रमादित्य के सिंहासन की पुतलियों की तरह सभी प्रतिमाएं बोलती हैं। सदियों पुराने राज अपने मुंह से ही खोलती हैं। न विक्रम सुन पा रहा है न बिकाश। इन्हें सुन कर और समझ कर भी क्या करना  है पाषाण की भाषा। पाषाणों की भाषा की इतनी समझ तो नहीं है, क्योंकि मैने किसी इस भाषा का किसी गुरुकुल में अध्ययन नहीं किया है और न ही किसी कुल ॠषि के उनके कुलगोत्र का होने का प्रमाण पत्र पाया है। बस प्रेम है इनसे और प्रकृति कहती है कि प्रेम की भाषा समझने के लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं। 
बोलती पुतलियाँ
एक प्रतिमा के समक्ष ठिठक जाता हूँ, उसने बहुत कुछ राज अपने में संजो रखे हैं, देखते ही बोलने लगती है। प्रतिमा में मैथुन रत पुरुष स्त्री को प्रकट किया गया है। लोग मुंह फ़ाड़े कामसुत्र के आसनों को देख रहे हैं। कुछ नवयुवकों की फ़ौज भी इन्हें देख कर आनंदित है। एक युवक मोबाईल पर किसी से बतिया रहा है - "अरे तुमको आना था हमारे साथ, क्या जोरदार सेक्सी पोज हैं यहाँ। सालों ने सारी ब्लू फ़िल्म ही उतार कर रख दी है मंदिर की दीवार पर। बहुत ही गजब है, उस जमाने के लोग कितने सेक्सी थे। तुम रहते तो और मजा आता।" वर्तमान युवाओं की सोच देख मैं स्तब्ध हूँ, जिस प्रतिमा में इन्हें ब्लू फ़िल्म दिखाई दे रही है, वह प्रतिमा उस काल महत्वपूर्ण राज खोल रही है। 
कोणार्क की मिथुन प्रतिमा
चलो उन्होने जो देखा वो मैने बता दिया और अब मुझसे प्रतिमा ने क्या कहा यह बताता हूँ। प्रतिमा कहती है कि रात्रि काल में मच्छरों एवं कीटों की संख्या बढ़ जाती है। इसलिए रात्रि शयन मच्छरदानी (मसहरी) लगा कर करना पड़ता है। आदमी दिन भर का थका हारा घर लौटता है और चर्मसुख के वक्त यदि मच्छर परेशान हलाकान करें तो आनंद में व्यवधान पैदा हो जाता है। इसलिए मच्छरदानी का सहारा लिया जा रहा है। प्रतिमा में चारपाई पर युगल मिथुन रत हैं और चारपाई पर मच्छरदानी लगी है। मच्छरदानी के उपर से चूहे दौड़ रहे हैं। इससे स्पष्ट हो रहा है कि उस काल में भी प्रदूषण के कारण मच्छर थे और आमजन मच्छरों से हलाकान था। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग कर रहा था। साथ ही चूहों से भी बचाव हो रहा था।
रात्रिकाल में मच्छरदानी का प्रयोग
ऐसी बहुत सी मिथुन प्रतिमाएं कोणार्क की भीत्तियों पर उत्कीर्ण की गई हैं। मिथुन प्रतिमाओ के साथ रतिज रोगों के विषय में भी प्रतिमाएं बताती हैं। रतिज रोगों के विषय में चरक ने सहिंता में विस्तार से बताया है और उनकी चिकित्सा विधि का भी वर्णन किया है। चित्र में दिखाई गई प्रतिमा में यह पुरुष लिंग में हुए व्रणो से परेशान है। चिकित्सक ने लिंग में दवा का लेपन कर उसे एक यंत्र से बांध दिया है। जिसे उस व्यक्ति ने हाथ में लटका रखा है। वस्त्र के घर्षण से व्रणों से मवाद निकल चिपक जाता है और असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता है। इसलिए चिकित्सक ने उसे वस्त्र से अलग कर दिया है। आधुनिक चिकित्सा में भी मुत्र नली में कैथेटर डाल कर मरीज के हाथ में पकड़ा दिया जाता है। इससे ज्ञात होता है कि इस काल में एस टी डी जैसे रतिज रोग भी थे।
यौनरोग चिकित्सा 
एक अन्य प्रतिमा में खड़ी हुई महिला की योनि को स्वान चाट रहा है। कुछ लोग इसे एनिमल सेक्स कह रहे थे। एनिमल सेक्स में स्वान लिंग से मैथुन दिखाया जाता है, न कि चाटते हुए। इसे देखने के पश्चात मुझे अपना ग्रामीण बचपन याद आता है, जब गांव में चिकित्सक नहीं होते थे और किसी के फ़ोड़े में मवाद भर जाता था तो वह कुत्ते से चटवा लेता था। कुछ दिनो के बाद वह फ़ोड़ा ठीक हो जाता है। इसी तरह स्त्री रतिज रोग में गनोरिया इत्यादि का संक्रमण कष्टदायक होता है। इसकी चिकित्सा स्वान से चटवा कर की जा रही है। एक अन्य चित्र में योनि में धुंआ लगाया जा रहा है। यह भी स्त्री रतिज रोग की एक चिकित्सा है। जड़ी बूटियों की धूनी देने से रोग का शमन होता था। वर्तमान में भी अजवाईन आदि की धुंआ दी जाती है।
दो पत्नियों से दुखी सन्यास की ओर प्रस्तुत अधेड़
यह उत्श्रृंखल समाज के लिए एक संदेश भी है कि अत्यधिक मैथुन से विभिन्न व्याधियों का शिकार होना पड़ता है और उनकी चिकित्सा किस तरह की जाती है, इसको भी प्रतिमाओं में दर्शाया गया है। एक प्रतिमा में घुटे हुए शीष का एक अधेड़ व्यक्ति कांधे पर लाठी में पोटली लटका कर कोपीन धारण किए वन गमन को तत्पर दिखाई दे रहा है और एक स्त्री उसका मार्ग रोक रही है। पीछे खड़ी स्त्री ने भी उसको पकड़ रखा है। इस प्रतिमा में घरेलू समस्या दिखाई दे रही है। दो बीबियों की रार से हलकान होकर पुरुष सन्यास लेकर वन जा रहा है और उसे छोटी और बड़ी दोनो बीबियाँ रोक रही है। तत्कालीन समाज की झांकी कोणार्क की भित्तियों में सुरक्षित है। काल के थपेड़े भी उसे नष्ट नहीं कर पाए और जानकारियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढी को स्थानांतरित हो रही हैं। जारी है आगे पढ़ें……।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

राजा नृसिंह देव का संकल्प : कोणार्क - कलिंग यात्रा

प्रारंभ से पढ़े … कहाँ से आए हो सर? वट वृक्ष की छाया में मेरे संग एक बड़ी शिला पर बैठते हुए विक्रम ने पूछा। मैने कहा - दक्षिण कोसल से। स्वागत है आपका, माता कौशल्या के देश से पधारे हैं आप, कुछ जल ग्रहण कीजिए। आज वातावरण में उमस कुछ अधिक है। विक्रम के माथे पर श्वेद कण झिलमिला रहे थे, जैसे मुक्तालड़ी धारण कर रखी हो, यह सुपारी का असर था, सुपारी खाते ही उसकी गर्म तासीर का अहसास हो जाता है। 
विक्रम और बेताल
विक्रम कहने लगा - आप सामने जो मंदिर देख रहे हैं न, उसमें अभी पूजा नहीं होती। इसे राजा नरसिंह देव ने बनवाया था अपनी माता के आदेश पर। माता की इच्छा पूर्ति करना प्रत्येक पुत्र का कर्तव्य होता है। राजा ने भी इसे पूर्ण करने के लिए सारे देश से कुशल कारीगरों को आमंत्रित किया और उनसे सलाह मशविरा कर मंदिर निर्माण के लिए इस स्थान का चयन किया। इस मंदिर का निर्माण 1200 कारीगरों ने 12 वर्ष में पूर्ण किया और मुझे सत्रह वर्ष हो गए इस स्थान पर सेवा देते हुए।
कोणार्क के सूर्य मंदिर का नाट्य मंडप एवं जगमोहन
इसके साथ ही विक्रम मंदिर से जुड़ी किवदन्तियाँ और मिथक भी सुनाने लगा। किसी स्थान के महिमा मंडन में किंवदन्तियां एवं मिथक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम कलिंग की उस भूमि पर थे जहाँ पहुंच कर अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया था। इतना कत्ले आम हुआ था कि धरा भी रक्त से नहा गई थी। विधवाओं एवं उनके बच्चों का विलाप देख कर अशोक का पाषाण हृदय पिघल गया। यह वह भूमि है जिसमें फ़ौलादों को भी पिघलाने की ताकत है। यह बिना संकल्प शक्ति के नहीं होता। कलिंग की दृढ़ संकल्प शक्ति के प्रमाण के रुप में समक्ष खड़ा हुआ स्मारक देख रहे थे। विकास बाबू फ़ोटो खींचने में लगे थे। 
बिकाश शर्मा कोणार्क परिसर में
कहानी आगे बढ़ रही थी। विक्रम कह रहा था कि पहले इस स्थान पर दल-दल था और इसमें जल भरा हुआ था। मंदिर बनाने के लिए शिल्पकार को पहले इस दल-दल को भरना था। बिसु महाराणा इस निर्माण कार्य का मुख्य शिल्पी था। कहते हैं कि तीन वर्ष तक लगातार इस स्थान को मिट्टी से भरने की कोशिश की गई। मिट्टी बहने के कारण श्रम एवं धन व्यर्थ जा रहा था। राजा एवं मंत्री सभी चिंतित हो गए। राजा ने मंत्री को बुला कर गड्ढे को भरने के लिए अन्य कोई उपाय सोचने कहा। एक दिन मंत्री जंगल के रास्ते जा रहा था, उसे प्यास लगी तो वह रास्ते में स्थित एक भगवती मंदिर में रुक गया। 
कोणार्क सूर्य मंदिर का प्रवेश द्वार
वहाँ एक बुढिया रहती थी। बुढ़िया से उसने खाना और पानी मांगा। बुढिया ने खीर बनाई थी, वह गर्म खीर उसने मंत्री को खाने को दी। मंत्री ने खीर की थाली के बीच में हाथ डाला तो उसकी अंगुलियाँ जल गई। बुढ़िया ने कहा कि मंदिर का गड़ढा भरने में भी तुम लोग यही गलती कर रहे हो। किनारे से खीर खाओगे तो ठंडी हो जाएगी और हाथ भी नहीं जलेगा। इसी तरह इस गड़ढे को किनारे से भरोगे तो गड़ढा भी भर जाएगा और मंदिर भी तय समय सीमा में बन जाएगा।
नाट्य मंडप
बुढ़िया से ज्ञान लेकर मंत्री कोणार्क आया और उसने बुढ़िया के द्वारा बताए उपाय का अनुशरण किया। इससे गडढा भर गया और मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया। इस मंदिर के निर्माण के लिए योजना बद्ध रुप से कार्य हुआ। पत्थर लाए गए और मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। हम चलते जा रहे थे और विक्रम कहते जा रहा था। 
स्वागत द्वार पर सिंह 
राजतंत्र में निर्णय लेने के सम्पूर्ण अधिकार राजा के हाथ में होते हैं और दंड विधान का पालन भी कड़ाई से किया जाता था। बारह सौ शिल्पी मंदिर निर्माण का कार्य कर रहे थे। राजा लांगुल नरसिंह देव मंदिर को मुर्त रुप लेते देख रहा था। उसने खजाने का मुंह खोल दिया। चाहे कितना भी धन लग जाए लेकिन मंदिर का निर्माण होकर रहेगा। हम मंदिर के नाट्य मंडप के समक्ष पहुंच गए, वहां प्रहरी के रुप में विशाल विकराल सिंह हमारा स्वागत कर रहे थे। जारी है आगे पढ़े………

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

शिल्पियों का पराक्रम और कपार फ़ोड़ गर्मी - कलिंग यात्रा

विक्रम, विक्रम दास। हाँ उसने अपना नाम विक्रम ही बताया था। वाह! कितना सुंदर नाम है, विक्रम। लगा कि अर्कसाल में पहुंच कर साक्षात विष्णु ही प्रकट हो गए हैं हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए। पान चबाते हुए हाथों से भंगिमा बना कर जब विक्रम मुझसे अपनी बात कह रहे थे तो लग रहा था कि कोई बहुत बड़ा पुराशास्त्री मुझ नासमझ को समझा रहा हो। सच तो यही था, उस स्थान से मैं अपरिचित था, अस्तु नासमझी भी थी। अर्करथ सिर पर पहुंच चुका था, उसकी रश्मियाँ सीधे ही हमला कर कपार फ़ोड़े दे रही थी। श्वेद बिंदू चूह कर आँखों टपकने लगे। नमकीन जल जलन पैदा कर रहा था। रुमाल निकाल कर चेहरे को पोंछा और बोतल से जल निकाल कुछ छींटे मारे, तब विक्रम से पराक्रम से परिचित होने लायक उर्जा आई। विकम, कोणार्क स्मारक का शासकीय रक्षक है और वही अब हमारा गाईड बन गया था। 
विक्रम दास 
कोणार्क परिसर में ही एक विशाल वट वृक्ष है, जिसकी जड़ों ने सैकड़ों नए वट तैयार कर लिए, मूल वृक्ष लगभग गायब ही हो चुका है। इसकी उम्र देख कर लगता था कि यह कोणार्क के निर्माण एवं पतन का साक्षी है। कुछ देर के लिए हम इसकी छाया में बैठ गए और बिकास बाबू कैमरे से धड़ाधड़ चित्र लेने लगे। दोपहर के दो बज रहे थे और यह समय किसी स्थान पर भ्रमण के लिए उपयुक्त नहीं था। उपयुक्त न होने पर भ्रमण तो कर सकते थे, परन्तु प्रकाश संयोजन अनुकूल न होने से फ़ोटोग्राफ़ी के समस्या उत्पन्न हो जाती है। फ़ोटोग्राफ़ी के लिए सुबह एवं शाम का समय ही सर्वथा उपयुक्त होता है। प्रकृति अपनी लय ताल पर चलती है और आदित्य राजा को कौन रका है? कौन थाम सका है उनके अश्वों की लगाम। त्रिभुवन में ऐसा कोई न हुआ फ़िर हम तो क्षुद्र मानव है, जिन्हें जन्म से ही हर उस वस्तु के आगे सिर झुका कर चलना सिखाया है जो उसकी पहुंच के बाहर है। 
भुबनेश्वर स्टेशन 
प्रारंभ से ही विलंब हो गया था। हमारी ट्रेन सुबह साढे सात बजे भुवनेश्वर स्थानक पर पहुच चुकी थी और हमें गेस्ट हाऊस के आरक्षण के विषय में बता दिया गया था, साथ ही संबंधित अधिकारी का मोबाईल नम्बर भी दे दिया गया था। उनसे हमने ट्रेन में सवार होते ही पता पूछ लिया था और निश्चिंत हो गए थे। कलिंग भ्रमण का कार्यक्रम हमारा अन्य कार्यक्रमों की तरह अचानक ही बना था। बिकाश ने साप्ताहिक छुट्टी ले रखी थी और मैं भी कहीं जाने के मुड में था। मैं चाहता था कि 2-3 हजार किलोमीटर का बाईक से ही सफ़र किया जाए। पर बिकाश इसके लिए तैयार नहीं हुआ। तो हमने ट्रेन से ही पुरी जाने की सोची। रायपुर से शाम सवा पाँच बजे दुर्ग - पुरी इंतरसिटी एक्सप्रेस पुरी के लिए प्रस्थान करती है। हमने सोचा कि ट्रेन में ही स्लीपर का आरक्षण मिल जाएगा इसलिए सामान्य टिकिट लेकर टीटी से सम्पर्क किया। पता चला कि स्लीपर में एक भी सीट खाली नहीं है। तो हमें वातानुकूलित बोगी की ओर जाना पड़ा। वहां सीट खाली मिल गई और अतिरिक्त 17 सौ रुपए की चपत भी लग गई।
भुबनेश्वर शहर 
भुवनेश्वर पहुंचने पर हमने 4 दिन बाद का आरक्षण पहले करा लिया। उसके बाद आटो वालों से सम्पर्क कर पता बताया तो कोई सामतापुर, कोई सामतारायपुर कोइ सांतरापुर कहता था। अब इसके ही फ़ेर में हम पड़ गए। मुझे पता चला था कि लिंगराज मंदिर के समीप ही यह गेस्ट हाऊस है। एक बंदा 70 रुपए में वहाँ तक जाने को तैयार हुआ और खुद न जाकर उसने दूसरा आटो वाला हमारे लिए भेज दिया। हमने लिंग राज मंदिर पहुंच कर पता पूछा तो पुलिसवाली ने दूसरी जगह बता दिया। अब आटो वाला कहने लगा कि वहाँ ले जाने का डबल किराया लुंगा। जबकि वह मुस्किल से 2 किलोमीटर ही आया होगा। मुझे ऐसा लगने लगा कि हिन्दीभाषी होने और उड़िया न समझने के कारण लूटना चाहता है। घड़ी का कांटा सरकते जा रहा था और हमें विलंब हो रहा था। पुलिस वाली के बताए स्थान पर भी वह गेस्ट हाऊस नहीं मिला। तो फ़िर उस अधिकारी को फ़ोन लगाया जिससे कल बात हुई तो पता चला कि वह सांतरापुर है। फ़िर हम सांतरापुर गेस्ट हाऊस पहुंच और आटो वाले पंडे का पूजन कर सुबह सुबह 150 की दक्षिणा देनी पड़ी।
भूभनेश्वर में ऑटो की सवारी 
नहाते-धोते नाश्ता करते 11 बज गए, अब हमने तय किया कि पहले कोणार्क चला जाए। हमें बताया गया कि सांतरापुर से थोड़ी दूर कल्पना चौराहे से कोणार्क के लिए बस मिल जाएगी। साढ़े ग्यारह बजे हमें एक ठसाठस भरी हुई बस मिली और उसमें हम चढ़ गए। उड़ीसा में बसों का किराया हमारे प्रदेश की अपेक्षा काफ़ी कम है। लगभग 65 किलोमीटर के सफ़र के लिए हम दोनो से 70 रुपए किराया लिया गया तो आश्चार्य हुआ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट इतना सस्ता है, वैसे बंगाल में भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट बहुत सस्ता है। हमारे छत्तीसगढ़ में दुगना और तिगुना किराया है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट वालों ने तो लूट मचा रखी है। खैर बिकाश बाबू के अथक प्रयासों के माध्यम से हमें बैठने लिए सीट मिल गई और लगभग डेढ बजे हम कोणार्क पहुंच गए।  कोणार्क के मेडिकल चौक पर बस ने हमें उतार दिया और वहाँ से पैदल-पैदल हम मंदिर तक पहुंच गए। मंदिर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों से प्रति वयस्क 10 रुपए शुल्क लिया जाता है। मैने 2 टिकिट खरीद ली और उससे पुरातत्व के आफ़िस का पता पूछा तो एक गार्ड हमें आफ़िस तक पहुंचा आया।
नवग्रह शिला कोणार्क 
कोणार्क के कंजरवेटर आफ़िसर महापात्रा भुवनेश्वर गए हुए थे और हमें मंदिर भ्रमण कराने की जिम्मेदारी विक्रम पर डाल दी गई। यह वही विक्रम है जिसका जिक्र मैने पहले किया है। भूख तो लगने लगी थी पर सोचा कि पहले मंदिर भ्रमण भ्रमण किया जाए। कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर। जिसके चित्र ही हम देखते आए थे, भारत में दूर-दूर तक खूब भ्रमण किया परन्तु पड़ोसी राज्य उड़ीसा के इन प्रसिद्ध समारकों तक पहुंच न सका। आज वह समय आ ही गया था। जब सूर्य मंदिर को अपनी आखों से देखुंगा। वट वृक्ष की राह में एक बड़ा ग्रेनाईट का तराशी हुई शिला पड़ी है। जिसकी लम्बाई लगभग बीस फ़ुट होगी एवं चौड़ाई और ऊंचाई 3X3 फ़ुट। इसके विषय में पूछने पर विक्रम ने बताया कि इस शिला में नवग्रह का निर्माण किया गया था। जिसे काट कर जगन्नाथ मंदिर में लगा दिया गया। इस शिला को देखने से ही मंदिर निर्माण करने वाले शिल्पियों के पराक्रम की एक झांकी दिखाई दे गई। जारी है, आगे पढ़ें।