शुक्रवार, 1 मई 2015

सूर्यमंदिर का निर्माण : इतिहास की महान परियोजना - कलिंग यात्रा

अभी तक सूर्यमंदिर के अधिष्ठान एवं भित्तियों पर जड़ी प्रतिमाओं पर ही एक नजर डाल रहे थे। अब बारी है मंदिर निर्माण एवं उसकी संरचना की। सूर्य मंदिर निर्माण की योजना साधारण नहीं है। काल के हिसाब से तत्कालीन राज्य के विशाल एवं महत्वाकांक्षी योजना थी। इसके प्रारुप निर्माण पर ही काफ़ी वक्त लगा होगा। प्रधान शिल्पकार बिशु महाराणा ने अपने निर्माण दल के साथ महीनों विचार विमर्श किया होगा तब कहीं जाकर इस योजना का प्रारुप तैयार हुआ होगा। हमने देखा है कि मंदिर की भित्तियों का कोई भी स्थान खाली नहीं है जिस पर शिल्पकार की छेनी के निशान नहीं है। ज्यामितिय आकृतियों के साथ भित्तियों पर विषयाधारित शिल्पांकन महत्वपूर्ण है। प्रतिमाओं में राजा के परिजनों से लेकर उनकी गतिविधियों को स्थान दिया गया है। अपने प्रज्ञानुसार तो बिशु (विष्णु) महाराणा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी होगी।

अगर कल्पना दृश्यांकन करें तो निर्माण स्थल पर मेला लगा रहता होगा। बारह सौ शिल्पकार और उनके सहयोगियों तथा निर्माण सामग्री पूर्तिकर्ताओं को मिलाकर कम से कम पांच हजार की मानव संख्या कार्य में लगी होगी। निर्माण स्थल पर इनकी दिनचर्या से संबंधित सारी वस्तुएं उपलब्ध कराई गई होगीं तथा इनके भोजन के लिए विशाल भोजनालय का भी अस्थायी निर्माण किया गया होगा। शिला निर्माण योजनाबद्ध हो रहा होगा। सैकड़ों लोहार लोहे की पट्टी तैयार कर रहे होगें जिनसे शिलाओं को बांधना है। प्रधान शिल्पी एक-एक निर्माण का स्वयं निरीक्षण कर रहा होगा। राजा के कारनून निर्माण कार्य में लगने वाले धन का संग्रह कर रहे होगें। निर्माण में गजबल एवं अन्य पशुबल के लिए भी चारा जुटाया गया होगा। आखिर एक विशाल स्मारक का निर्माण हो रहा था।

सिंहद्वार की एक प्रतिमा का वजन 28 टन बताया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निर्माण में 40 एवं 50 टन के भी प्रस्तर खंडों का प्रयोग किया गया होगा। इन पत्थरों को पहाड़ से काट कर अलग करने एवं निर्माण स्थल तक लाने में श्रम के साथ धन भी पानी की तरह बहाया होगा। तेरहवी सदी वैसे भी विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी। निर्माण के लिए आधुनिक यत्रों का प्रयोग किया गया होगा। पत्थरों पर कारीगरी करने के लिए जल की आवश्यकता भी होती है। निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले जल की भी व्यवस्था की गई होगी। छेनी हथौड़ी की लयबद्ध तान निर्माण स्थल पर बरसों गुंजती रही होगी और शिल्पकारों का पसीना बह कर चंद्रभागा नदी में मिल कर समुद्र को और भी खारा कर गया होगा। 

कलिंग की अपनी विशिष्ट शैली है, जिसमें कोणीय अट्टालिका पर मंडप की तरह छतरी ढ़ंकी होती है। यह मंदिर भी  उड़ीसा के अन्य मंदिरों जैसा ही है। मुख्य गर्भ गृह की ऊंचाई 229 फ़ुट मापी गई है। गर्भ गृह के साथ नाट्यशाला 128 फ़ुट ऊंची है। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फ़ुट X 50 फ़ुट का है। यह मंदिर पुर्व एंव पश्चिम दिशा में बना है। निर्माण में प्रयुक्त प्रत्येक शिला को लोहे की पट्टियों (क्लैंप) से बांधा गया है। शिलाओं को स्थापित करने में कहीं पर भी अन्य लेपन (चूना या अन्य) का प्रयोग नहीं किया गया। मंदिर के समस्त निर्माण को योजनानुसार एक दूसरे पत्थर के साथ लौह बंधन में ही बांधा गया है। इसका उदाहरण हमें मंदिर में कई स्थानों पर मिलता है।

मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहीं दूरस्थ स्थान से लाए गए होगें। खैर अबुल फ़जल कुछ भी कहे पर मंदिर निर्माण के साथ नरसिंह देव का ही नाम जुड़ा हुआ है।. पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ 1278 ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने 1282 तक शासन किया. कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के बीच हुआ था।

इतिहास की कहानी प्रमाणों के अभाव में अनुमान पर ही गति प्राप्त करती है। इस मंदिर के निर्माण से लेकर विध्वंस तक अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। कोई भी सदा के लिए साक्षी नहीं हो सकता। एक कालखंड तक ही जीवित साक्ष्य मिल पाते हैं। कहते हैं कि मंदिर में पूजा नहीं हो सकी। यह मंदिर बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही रह गया। अगर मुख्य गर्भ गृह में प्रतिमा की स्थापना हो जाती तो पूजा भी अनिवार्य रुप से शुरु हो जाती। पूजा न होने के पीछे भी कई कहानियाँ सामने आती हैं। सर्व प्रथम तो कहा जाता है कि मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के पुत्र की मृत्यु मंदिर निर्माण के समय हो गई थी। इसे अपशुगन मान कर आगे का कार्य पूर्ण नहीं हो सका। एक अन्य किंवदन्ति कहती है कि मंदिर निर्माण के दौरान ही राजा की अकाल मृत्यु हो गई। इसलिए निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका। खैर उस काल में जो भी हुआ हो परन्तु कोणार्क के रुप में दुनिया को एक अद्भुत कृति प्राप्त हो गई। जो वर्तमान में भी विद्यमान है।

मंदिर के विध्वंस के विषय में भी कई किंवदन्तियां सुनाई देती हैं। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण में वास्तु दोष था इसलिए मंदिर में पूजा न हो सकी और कालांतर में ध्वस्त हो गया। अब तथाकथित वास्तु शास्त्रियों को भी अपना उल्लू सीधा करने का साधन मिल गया। सबसे बड़ा वास्तुकार और वास्तुशास्त्री तो बिशु महाराणा था जिसने राजा की परिकल्पना को साकार किया। इतनी बड़ी योजना पर कार्य करने वाला वास्तुकार और शिल्पकार इतना मुर्ख नहीं होगा कि उसे वास्तु ग्रंथों का ज्ञान ही न हो और राजा भी इतना मुर्ख नहीं होगा कि जो अनाड़ी व्यक्ति के हाथों में अपने जीवन की सबसे भव्य एवं महत्वपूर्ण परियोजना को किसी ऐरे गैरे के हाथों में बर्बाद करने के लिए दे दे। आज व्यक्ति छोटा सा दो कमरों का मकान बनाता है तो वह खर्च करने से पहले किसी वास्तुकार से नक्शा बनवा कर उसकी देख रेख में कार्य शुरु करता है। जारी है आगे पढ़े…

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ललित जी आपने तो कोणार्क मंदिर के बांध काम का पूरा दृष्य खडा कर दिया। धेखा तो मैने भी है कोणार्क बहुत साल (46) पहले । आपका वृतांत पढ कर यादें ही ताज़ा नही हुई बल्कि कुछ नई जानकारियां भी मिलीं। बधाई।

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  2. धेखा की जगह देखा पढें।

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