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रविवार, 21 अप्रैल 2013

भानगढ़ की रत्नावती से एक मुलाकात

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रात का भोजन करने के बाद मेल और फ़ेसबुक चेक किया और बिस्तर के हवाले हो गया। लम्बी यात्रा से थका हुआ होने के कारण पता नहीं कब नींद आ गई। विचित्र सी सुगंध से नींद खुली, आँखें खोल कर देखा तो कमरे में नीली रोशनी वाला बल्ब जल रहा था। कमरे की दीवारें नीली रोशनी से नहाई हुई थी। सुगंध मेरे समीप से ही आ रही थी, एक गहरी सांस लेकर मैने सुगंध को अपने फ़ेफ़ड़ों में भर लिया और आँखें बंद कर ली। सोचा कि घर के ईर्द गिर्द बहुत पेड़ पौधे हैं, हवा के किसी झोंके से चली आई होगी। कुछ देर बाद नथुनों में भरी सुगंध असहनीय होने लगी। मैने कंबल सिर पर ओढ कर नीचे दबा लिया। सभी तरफ़ से सुरक्षित हो गया। अब सुगंध नहीं आएगी सोच कर। धीरे धीरे फ़िर नींद के आगोश में जाने लगा लेकिन सुगंध का आना निरंतर जारी था।

कुछ देर बाद कानों में फ़ुसफ़ुसाहट की आवाज सुनाई देने लगी। मैने धीरे से एक तरफ़ का कंबल हटा कर देखा तो श्रीमती जी और बालक दोनो गहरी नींद में सोए हैं। मैने कंबल सरका लिया। सोने का यत्न करने लगा। फ़ुसफ़ुसाह फ़िर शुरु हो गई, आवाज अपष्ट थी, महिला कि है या पुरुष स्वर है, कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैने अब बाईं तरफ़ से कंबल सरका कर चेहरा उघाड़ा, सामने बड़ी खिड़की थी। खिड़की के पार बिजली की चमक दिखाई देने लगी, बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी। अरे! ये कैसा  मौसम बनने लगा, बेमौसम बरसात होने लगी। रह रह कर बिजली की चमक खिड़की पर पड़ कर वातावरण को और भी रहस्यमय और संदिग्ध बना रही थी। 

नीले बल्ब की मद्धम रोशनी में बिजली की चमक और बादलों की गड़गड़ाहट कहर ढा रही थी। मैंने पुन: चेहरा ढक लिया, लेकिन फ़ुसफ़ुसाहट कम नहीं हुई। सोचने लगा कि ऐसा तो कभी हुआ नहीं, पहले तो खेतों के बीच सुनसान में खाट डाल कर अकेले सो जाया करता था। आज क्या हुआ? अब दिमाग सन्नाने लगा, मैने एक झटके से कंबल फ़ेंका और उठ कर बैठ गया। एक नजर सोए हुए बालक पर डाली और जैसे ही ड्रेसिंग टेबल की ओर मुंह धुमाया तो उसके सामने धवल वस्त्रों में स्टूल पर बैठी एक गौरवर्णा दिखाई दी। नीली रोशनी में वस्त्रों की सफ़ेदी कुछ अधिक ही चमक रही थी। उसकी पीठ मेरी ओर थी। चेहरा ड्रेसिंग टेबल के शीशे की ओर था। जीरो बल्ब के प्रकाश में स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। मैने आँखे फ़ाड़ कर गौर से उसकी तरफ़ देखा। कमरे के सारे दरवाजे और खिड़कियाँ बंद थे। 

ये कौन है जो कमरे में घुस आई है? मैने गरदन घुमाकर श्रीमती की तरफ़ देखा, वह मजे से नींद भांज रही थी। जैसे ही मैने ड्रेसिंग टेबल की तरफ़ गरदन घुमाई, सहसा बिजली जोर से कड़की और कमरे में फ़्लेश लाईट सी रोशनी हुई, उसका चेहरा दिखा, बस देखता ही रह गया। रोंए-रोंए खड़े हो गए, कड़ाके की ठंड में पसीना निकलना शुरु हो गया। बाहर कुत्तों के रोने के स्वर सुनाई देने लगे। कुत्ते एक स्वर में लय बद्ध रुदन कर रहे थे। वह स्टूल पर मूर्तिमान बैठी थी, हिल-डुल भी नहीं रही थी। उसने सिर पर पीली ओढनी डाल रखी थी, स्वर्ण जड़ित कांचली के साथ गोटे दार घाघरा पहन रखा था। हाथों में कोहनियों तक चूड़ियाँ, माथे पर बोरला, कानों में बड़े-बड़े झुमके, नाक में नथ, गले में नौलखा और भुजाओं में बाजुबंद पहने सोने से लदी हुई राजस्थानी वेशभूषा में सौंदर्य के प्रतिमान गढ़ रही थी।

पुन: बिजली कड़की और उसका चेहरा दिखा, चौड़ा माथा, माथे पर झूलती लटें, सुंतवा नाक, भरे-भरे होंठ, बड़ी-बड़ी पैनी आँखें जैसे मुझसे कुछ कहना चाहती हों। मेरी हालत पतली हो रही थी। बिजली चमकने के बाद नीले बल्ब की रोशनी में चेहरा दिखाई नहीं देता था। अब बिजली रह रह कर चमकने लगी, उसने चेहरा मेरी तरफ़ नहीं फ़ेरा, शीशे की तरफ़ मुंह किए ही बैठी रही, वह मुझे शीशे में देख रही थी, मैं उसे। बिजली की चमक के साथ बादल फ़िर जोर से गड़गड़ाए। मैने सारे शरीर की ताकत समेट कर पूछा - तुम कौन हो, यहाँ कैसे और क्यों आई हो? उसके ओंठ हिले, और बोली - भूल गए मुझे। कुछ दिनों पहले तो मुझसे मिलने आए थे, वही हूँ मैं, जिसकी खोज में इतनी दूर से चले आए थे। कितनी प्रतीक्षा की तुम्हारी, मुझे मालूम था एक दिन तुम अवश्य आओगे। हिलते हुए होठों से सिर्फ़ बर्फ़ सा सर्द स्वर निकल रहा था। इधर मैं पसीने से तर-ब-तर हो चुका था।

मुझे याद नहीं आ रहा तुम कौन हो, मैं तुम्हे जानता ही नहीं तो तुमसे मिलने क्यों जाऊंगा? मैने उससे प्रश्न किया। बिजली फ़िर कड़की, अब बरसात शुरु हो चुकी थी, विंडो कूलर की छत पर टपकती हुई बूंदों से भी स्वर उत्पन्न होने लगा। बूंदों का आघात रह-रह कर स्वर परिवर्तित करने लगा। आज की रात कयामत की रात में बदलते जा रही थी। जीवन में जो कभी घटा नहीं उसे प्रत्यक्ष देख रहा था। उसने शीशे में ही देखते हुए कहा - "मैं रत्नावती हूँ।" चेहरे पर कोई भाव नहीं, कोई सौम्यता नहीं, कोई कोई कोमलता नहीं। ठोस सर्द चेहरा, हल्के से हिलते हुए ओंठों से वह बुदबुदाई और बिजली ऐसे जोर से कड़की कि लगा छत का कांक्रीट तोड़ कर ही भीतर आ जाएगी। लगता था कहीं आस पास ही गिरी है। बिजली के कड़कते ही बिजली भी चली गई। कमरे में घुप्प अंधेरा छा गया।

कमरे में सिर्फ़ हम दो ही थे, एक जीता जागता मनुष्य और दूसरी आभासी दुनिया से आई हुई प्रेतात्मा। सुगंध को पहचान लिया मैने। केवड़े की सुगंध थी। भानगढ़ में आज भी केवड़े की झाड़ियाँ हैं और रानी रत्नावती को केवड़े का ईत्र और सुगंधित तेल बहुत ही पसंद था। सुगंध से प्रमाणित हो गया यह रत्नावती की ही आत्मा है, जो भानगढ़ से मेरे पीछे पीछे चली आई है। बिजली रोशनी हुई और रत्नावती ने कहना शुरु किया - तुम्हारे दिमाग जो चल रहा है मैं सब जानती हूँ। अभिशप्त नगर की महारानी हूँ मैं। नगर के साथ मैं भी अभिशप्त हो गई। तुम्हें सदियों से जानती हूँ। तुम भानगढ़ के राजकवि थे, दरबार में तुम्हारे कवित्त झरोखे की ओट में बैठकर मैने सैकड़ों बार सुने। फ़िर न जाने कहाँ खो गए तुम। बहुत ढूंढा तुम्हें, सदियाँ बीत जाने पर अब मिले हो। तभी तुमसे मिलने चली आई।

मैं और राजकवि! नहीं नहीं, मैं तो एक ब्लॉगर हूँ जो लेखक होने का भ्रम पाल बैठा है। लोग दो-चार टिप्पणियाँ दे जाते हैं और जिन अखबारों को मुफ़्त में अपने पन्ने भरने होते हैं, वे मेरी ब्लॉग की पोस्ट से अपना अखबार भर लेते हैं। इससे लोगों को भी भ्रम हो गया है कि मैं लेखक हूँ - मैने हकलाते हुए कहा। रत्नावती कहने लगी - मैं तुम्हारे से मिलने खास प्रयोजन से आई हूँ, लेखक से अधिक खतरनाक ब्लॉगर होता है। वह बिना तथ्यों की छानबीन किए कुछ भी अनाप-शनाप लिख देता है अपने ब्लॉग़ पर। तुमने देखा होगा कि कई लोगों ने भानगढ़ के नाम से अफ़वाहे उड़ा रखी हैं। एक ने तो यहां तक लिख दिया कि भानगढ़ से जिंदा लौटकर आना ही मुश्किल है और जो लौटकर आया वह पागल हो जाता है।

मैं इसलिए आई हूँ कि तुम भानगढ़ की एवं मेरी कहानी को जाँच परख कर लिखोगे। जिससे लोगों के दिमाग में छाई हुई भ्रांतियाँ समाप्त हो जाएं। सारे भूत प्राण हरण नहीं करते और वो भी भानगढ़ में, कदापि नहीं। आज भी भानगढ़ के भूतों से लेकर जिंदों की भी इतनी हिम्मत नहीं कि वे मेरी हुक्म उदूली कर दें। डरो नहीं, मैं सिर्फ़ तुमसे मिलने आई थी क्योंकि तुम ही भानगढ़ के साथ न्याय कर सकते हो। अन्यथा तो अफ़वाहें इतनी अधिक उड़ा रखी है कि सत्य और असत्य का ही पता नहीं चलता।

तुम्हारे ब्लॉग पर निरंतर मेरी नजर है। वाणी गीत ने कहा था न "आप जैसे यायावार सारे रोमांच की ऐसी तैसी कर देते हैं :)" उन्हे मेरा निमंत्रण देना और कहना कि अपने साथ सारा गढ़ घुमाऊंगी, मान-मनुहार भी करुंगी और रोमांच खत्म नहीं होने दूंगी, ये मेरा पक्का वादा रहा है। अब मैं चलती हूँ, उसके इतना कहते ही फ़िर एक बार जोर से बिजली कड़की और उसके प्रकाश में मैने देखा कि स्टूल खाली था। केवड़े की सुंगध कमरे में बाकी थी। मैं बिस्तर पर बैठे हुए सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहा । इस घटना को मैने किसी को भी नहीं सुनाया ……… आज ब्लॉग पर लिख रहा हूँ।  … इति भानगढ़ पुराण………:)

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

भानगढ के भूतों की सच्चाई

भानगढ़ का राजप्रासाद
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भानगढ़ राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का अभ्यारण के एक छोर पर स्थित है। इतिहास अधिक पुराना नहीं है। 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसका जन्म होता है और 19 वीं शताब्दी में अवसान हो जाता है। इस समय दिल्ली पर मुगलों का शासन था और दिल्ली के तख्त पर अकबर गद्दीनशीं था। आमेर के कछवाहा राजपुत राजा भारमल ने गद्दी संभालने के बाद अकबर के दरबार में प्रवेश पाया और अपनी पुत्री हरखा बाई का विवाह अकबर से करना स्वीकार किया। विवाह के बाद राजपूतों ने इसे छोड़ दिया और हरखा बाई कभी लौट कर आमेर नहीं आई। भारमल के पुत्र राजा भगवंत दास ने संभवत: इस इलाके पर अपनी पकड़ बनाए रखने लिए इस किले का निर्माण 1573 में कराया। भारमल का प्रपौत्र एवं भगवंत दास के पुत्र राजा मानसिंह ने भी अकबर के दरबार में उच्च स्थान प्राप्त किया। 

राजप्रासाद के भग्नावशेष
भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा। राजा भगवंत दास ने यह गढ़ अपने छोटे बेटे माधौ सिंह को दिया। माधौसिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। छत्रसिंह एवं उसके पुत्र 1630 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। विक्रम संवत 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली।इसके साथ ही भानगढ की चमक कम होने लगी। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया और वहीं रहने लगा। यह समय औरंगजेब के शासन का था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसने अपने बाप को नहीं छोड़ा तो इन्हे कहाँ छोड़ता। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान हो गए, जिन्हें मोहम्मद कुलीज एवं मोहम्मद दहलीज के नाम से जाना गया। इन दोनों भाईयों के मुसलमान बनने एवं औरंगजेब की शासन पर पकड़ ढीली होने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन्हे मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को गद्दी दे दी।

मंगला माता मंदिर
केशवराय मंदिर में स्थित शिलालेख में संवत १९०२ उत्कीर्ण है। इससे यह सत्यापित होता है कि १६७ वर्ष पूर्व अर्थात अंग्रेजों के आने के बाद तक यह नगर आबाद था| भानगढ़ के उजड़ने के पीछे आक्रमण या दुर्घटना जो भी कारण रहा होगा वह संवत 1902 के पश्चात का है। भानगढ़ उजड़ने के कई कारण किंवदंतियों के माध्यम से जनमानस में प्रचलित हैं। जिसमें सिंधु शेवड़े के प्रतिशोध की कहानी चटखारे लेकर सुनाई जाती है। रानी रत्नावती को सिंधु शेवड़ा पाना चाहता था और उसने तंत्र मंत्र का प्रयोग करके इस नगर को उजाड़ दिया। दूसरी जन श्रुति है कि 1720 में आमेर के राजा जयसिंह ने इसे अपने राज्य में मिला लिया था। मुगलों के दौर में राजस्थान में उनके आक्रमण हुए और भयानक युद्द भी हुए। लेकिन मुगलों का आक्रमण भानगढ़ पर हुआ दिखाई नहीं देता। नगर के भीतर जितने मंदिर हैं सभी सही सलामत हैं। अगर मुसलमानों का आक्रमण हुआ रहता तो मंदिर सलामत नहीं मिलते।

शेवड़ों का धूणा
तीसरी किंवदंती भानगढ़ को जयपुर विस्थापित करने के विषय में सुनाई जाती है। अंग्रेजों के शासन काल में जयपुर के राजाओं ने भानगढ़ नगर को जयपुर विस्थापित किया होगा। इस तर्क पर मैं सहमत हूँ, क्योंकि 18 वीं सदी में मराठों एवं पिंडारियों के आक्रमण के कारण राजपुताना त्रस्त हो गया था। इसलिए सारी शक्ति को एकत्र कर जयपुर में स्थापित करने की दृष्टि से भानगढ़ नगर का विस्थापन संभव है। पूर्ववर्ती राजाओं एवं बादशाहों द्वारा अपनी राजधानी को विस्थापित एवं स्थानांतरित करने के अनेकों उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। इस तरह भानगढ़ के विस्थापन का कारण सामरिक कारण रहा होगा। तब से यह नगर उजड़ गया और यहाँ दुबारा कोई बसने नहीं आने के कारण देख रेख के अभाव में यह नगर खंडहर बन गया होगा। इस इलाके में पानी की कमी थी। जिसके कारण यहाँ अकाल की स्थिति बन जाती थी। कहते हैं कि 1783 में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें भूख प्यास से काफ़ी लोग त्रस्त होकर काल का ग्रास बन गए। अकाल के कारण फ़ैली महामारी से भानगढ़ उजड़ गया। यहाँ के निवासी भानगढ़ छोड़ कर चले गए।

असमाजिक तत्वों की उपस्थिति 
भानगढ़ उजड़ने के बाद यहाँ असामाजिक तत्वों का बसेरा हो गया। वीरान स्थान पर पहाड़ियों के बीच स्थित यह नगर अपराधियों के छिपने के लिए उत्तम था। उनके द्वारा ही यहाँ भूत प्रेतों की कहानियाँ गढ़ी गई होगीं। जिससे कि आस पास के क्षेत्र के लोग भानगढ़ के खंडहरों की तरफ़ न आए और उनकी गतिविधियाँ निर्विघ्न जारी रहें। गड़े धन के प्रति लोगों का लगाव सदैव रहा है। यहाँ पर भी गड़े खजाने की खोज में लोग आते होगें तथा खजाने को प्राप्त करने के लिए नान प्रकार की तांत्रिक क्रियाए करने के कारण भय का वातावरण निर्मित होता होगा। वर्तमान में भी असामाजिक तत्वों की उपस्थिति के चिन्ह भानगढ़ में दिखाई देते हैं। दारु की खाली बोतलें एवं डिस्पोजल गिलास यत्र तत्र बिखरे पड़े है। दिन रात समूचा किला तांत्रिकों एवं बाबाओं के हवाले रहने के कारण यहाँ भय का वातावरण बना रहता है।

चौकीदार से चर्चा
वर्तमान में मोस्ट हंटेड प्लेस (घोर भूतिया स्थान) में पर्यटकों की रुचि बढती जा रही है। चमत्कार एवं भूत प्रेतों से संबंधित कहानियाँ रोमांच पैदा करती हैं और पर्यटक रोमांचकारी स्थानों पर जाकर उस रोमांच को अनुभव करना चाहता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृति होने के कारण वह ऐसे स्थानों पर सत्यता की परख करने लिए पहुंचता है। वर्तमान में पर्यटकों के शौक में बदलाव दिखाई दे रहा है। पूर्व में लोग तीर्थ स्थानों का पर्यटन करते थे तथा वर्तमान में प्राकृतिक दृष्यों के साथ कौतुहल वाले स्थानों पर सैर करने जाते हैं। जैसे हम भी भानगढ़ की सच्चाई की खोज में 15 सौ किलो मीटर की दूरी तय करके पहुंच गए। मुझे भानगढ़ में कोई भी भूतिया आभास  नहीं हुआ। जैसे अन्य स्थानों को देखा वैसा ही यह भी लगा। भूतों की कहानी सिर्फ़ वातावरण में तैरती है। जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।

अनंत से आता प्रकाश
आधुनिक युग में जहाँ तक बिजली पहुंच गई है वहाँ तक के सारे भूत प्रेत अंधेरे क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए हैं। भूत अंधेरे में ही लोगों को दिखाई देते हैं। क्योंकि लोगों की मानसिकता ही वैसी बन गई है। अंधेरा होते ही अज्ञात का भय उत्पन्न हो जाता है और उसे भूत प्रेत दिखाई देने के साथ विचित्र आवाजें भी सुनाई देने लगती हैं। यही स्थिति भानगढ़ की है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ झाड़ियों में जंगली जानवर विचरण करते हैं। किसी पर्यटक के साथ रात को कोई दुर्घटना न हो जाए इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यहाँ दिन ढलने के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगा रखी है। सर्वे के 16 चौकीदार यहाँ कार्य करते हैं, किसी ने भी भूत प्रेतों को यहां पर नहीं देखा। इससे यही सत्यान्वेषण होता है कि व्यक्ति अपने भीरुपन को घर में छोड़ कर आए और उन्मुक्त होकर भानगढ़ के पुरावशेषों की सैर करे तो बहुत आनंद आएगा। ……… आगे पढ़ें

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सीकर से भानगढ़ की ओर यायावर

सिरपुर की यात्रा में रात्रि विश्राम के दौरान जी टीवी पर फ़ीयर फ़ाईल कार्यक्रम चल रहा था जिसमें शुटिंग के लिए भानगढ़ गई हुई झांसी की रानी धारावाहिक की प्रोडक्शन टीम एवं कलाकारों के साथ बीती घटनाओं की कहानी बताई जा रही थी। वहाँ इनके साथ भूतिया वारदातें हुई, जिसके कारण इनकी टीम को वहाँ से शुटिंग छोड़ कर भागना पड़ा। इससे पहले भी मैने एक दो बार इस जगह के विषय में सुना था,  जिसने इसे डरावना बना रखा है। बस यहीं से भानगढ़ जाने की प्रबल इच्छा हो गई। जैसे तैसे सिरपुर की यात्रा सम्पन्न होने की प्रतीक्षा थी और भानगढ़ की ओर जाना था। इस दौरान रतनसिंह जी से मेरी चर्चा हुई। उन्होने भी भानगढ़ जाने का वादा कर लिया। बस 11 दिसम्बर का यह कार्यक्रम बन गया।
सीकर से जयपुर
10 दिसम्बर 2012 की रात मैं सीकर में था। वहीं से मुझे जयपुर आना था और उधर से रतनसिंह जी दिल्ली से सुबह जयपुर पहुंचने वाले थे। दोनों को सुबह 6-7 बजे जयपुर में मिलना था फ़िर वहाँ से भानगढ़ जाना था। रात को सीकर में मैने लोगों को जयपुर जाने के साधन के विषय में पूछो तो उन्होने बताया कि जहाँ पर मैं ठहरा था उसी बायपास से हर आधे घंटे में जयपुर के लिए बसें मिल जाती है। उनकी कहे अनुसार मैं 3 बजे बायपास पर आ गया। सुबह बहुत अधिक ठंड थी और मैने ठंड का कोई अधिक इंतजाम नहीं किया था। सिर्फ़ एक पतला सा स्वेटर ही ठंड से बचाने का साधन था क्योंकि इस समय भी छत्तीसगढ़ में कोई अधिक ठंड नहीं थी और स्वेटर पहनने की भी आवश्यकता नहीं थी। लेकिन राजस्थान में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बायपास पर प्रतीक्षा करते एक घंटा हो गया लेकिन बस कहीं दिखाई नहीं दी, दूसरा घंटा भी बीत गया, लेकिन बस नहीं आई। अभी भी अंधेरा ही था, कोई चहल पहल नहीं थी। लोग अपने गुदड़ों से बाहर नहीं निकले थे। 
रामगढ़ बांध का हवाई चित्र
6 बजे मुझे एक बस आते हुए दिखाई दी। हाथ देने पर बस वाले ने दूर जाकर रोका और बैठा लिया, कंडेक्टर ने 70 रुपए की टिकिट काटी, जबकि सरकारी बस से सीकर आते हुए मुझे 80 रुपए की टिकिट लेनी पड़ी थी। मैं गाड़ी के बोनट पर बैठ गया क्योंकि सीटें खाली नहीं थी। ड्रायवर की पीछे की लम्बी सीट खाली थी जिसे उसने अन्य सवारियों के लिए खाली रखा था। थोड़ी देर बाद बस रुकी और स्कूल की कुछ मेडमें चढी। तब पता चला कि ड्रायवर ने यह सीट उनके लिए रिजर्व कर रखी थी। हमारे यहाँ भी ड्रायवर सामने वाली लम्बी सीटें मेडमों के लिए ही रिजर्व रखते हैं। उन पर मेडमों का ही अधिकार होता है। छत्तीसगढ़ की यह बीमारी राजस्थान में भी जारी थी, पता नहीं कि यह रोग राजस्थान से छत्तीसगढ़ आया या छत्तीसगढ़ से राजस्थान के ड्रायवर कंडेक्टरों को लगा।   
सूखा पड़ा बांध
बस शनै शनै बढती जा रही थी, रास्ते में तूड़े के भरे ट्रेक्टरों की लाईन लगी थी। आधी सड़क घेर कर ये जयपुर की ओर जा रहे थे। रास्ते में सड़क निर्माण का काम भी चालु था। इससे बस की स्पीड में बाधा आ रही थी। पलसाणा पहुंचने पर रतन सिंह जी शेखावत का फ़ोन आया। मैने उन्हे विलंब होने की जानकारी दी। पलसाना पहुंचते तक थोड़ा प्रकाश हुआ, लगा कि सूर्योदय हो जाएगा। जयपुर में काम करने वाले कुछ लड़के यहाँ से चढ़े, थैली में चाय और डिस्पोजल गिलास साथ लेकर आए थे। इससे यह जाहिर हुआ कि ये दैनिक यात्री हैं और ड्रायवर कंडेक्टर के लिए रोज चाय लेकर आते हैं। रींगस पहुच कर ड्रायवर ने ब्रेक लगाए, "जाओ भई जिसको पाणी पेशाब जाणा हो तो कर लो। बस 5 मिनट रुकेगी।" पाँच मिनट में हाजत वाले सभी निपट लिए। बस अब चौमू की तरफ़ बढ़ रही थी। रतनसिंह जी ने मुझे जयपुर पहुंच कर चौमू पूलिए पर उतरने कहा था। 
कछवाहों की कुलदेवी "जमवाय माता"
चौमू का पत्थर देखते ही पुरानी कहावत याद आ गई। "चौमू का चूतिया, घी बेच 'र तेल खाए"। कही गई होगी किसी वक्त में किसी कहानी को लेकर चौमू के विषय में ये कहावत। लेकिन अब ऐसा नहीं है, चौमू के लोग बहुत होशियार हो गए हैं। अब घी और तेल दोनो बेच देते हैं और मौज लेते हैं। चौमू बायपास से बस निकल गई। यहाँ पर तूड़े वाले ट्रेक्टरों की लाईन लगी हुई थी। जयपुर में प्रवेश करते ही ट्रैफ़िक पुलिस वालों ने बस रोक ली। ड्रायवर ने कंडेक्टर को कहा " ले इब भुगत इस फ़ूफ़्फ़े नै, परसों इसका प्लाई बोर्ड नहीं चढाया बस में, उसी की कसर लिकाड़ेगा"। सिपाही सड़क के बीचों बीच खड़ा रहा। न ड्रायवर उतरा बस से न कंडेक्टर। तीनों एक दूसरे को देखते रहे। सिपाही बोला - आज नही छोड़ूंगा तुम्हें, जीप में बैठा हुआ उसका अफ़सर बोला - छोड़ दे। तब भी उसने नहीं छोड़ा। गाड़ी खड़ी रही। मैने कहा- छोड़ने और न छोड़ने के चक्कर में सवारियों को क्यों फ़ंसा रखा है। छोड़ या पकड़ इसे। थोड़ी देर बाद उसने बस छोड़ दी।
बांध का सूचना पट्ट
रतनसिंह जी चौमू पुलिया पे इंतजार कर रहे थे, उन्होने फ़ोन किया। थोड़ी देर बाद मैं चौमू पुलिया पर पहुंच चुका था। अब बाईक पर उनके साथ घर चले। वहाँ स्नान ध्यान किया। फ़िर गर्मा गरम रोटी खाई। तब तक जयपुर के युवा पत्रकार प्रदीप सिंह जी अपनी कार से आ गए अब हमें भानगढ़ जाना था। हमारे साथ रतन सिंह जी का इटली रिटर्न जिज्ञासु भतीजा भरत सिंह भी साथ था। हम भानगढ़ के लिए जमवा रामगढ़ होते हुए चल पड़े। सबसे पहले हम बांध पर पहुंचे, इस बांध को आमेर के राजाओं ने जयपुर में जलापूर्ति के लिए बनवाया था। बांध का जल संग्रहण क्षेत्र काफ़ी विस्तार लिए हुए है। लेकिन दुर्भाग्य यह स्थान अभी सूखे की चपेट में है। जिस बांध से आस-पास के सैकड़ों गाँवों की प्यास बुझाई जाती थी, वह आज स्वयं प्यासा है। सरकार का इस बांध के संरक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं है। वहीं स्थानीय नेता इस बांध के जल संग्रहण क्षेत्र पर कब्जा करने का मंसूबा पाल रहे हैं।
जमवाय माता का मंदिर
बांध पर जगह जगह चेतावनी लिखी हुई है - शाम 7 बजे के बाद बाँध में नहाना, तैरना और घुमना दंडनीय अपराध है। कितना हास्यास्पद लगता है। जिस बाँध में एक बूंद पानी नहीं वहाँ ऐसी चेतावनी पढकर। खैर हमारा कोई ईरादा नहीं था इस बाँध में तैरकर गोडे फ़ुड़वाने का, इसलिए हम आगे बढ़ गए। कुछ दूर चलने पर कछवाहा शासकों की कुल देवी जमवाय माता का मंदिर है। इसका निर्माण राजा सोढ़देव के पुत्र दुल्हे राय ने करवाया था। कछवाहा वंशजों की कुलदेवी होने के कारण इनकी बहुत मान्यता है। हम मंदिर में पहुंच कर पुजारी से मिलते हैं। उनका कहना है कि इस मंदिर पर हम बोर्ड लगाते हैं तो वन विभाग के अधिकारी उखाड़ देते हैं और कहते हैं कि यह स्थान अभ्यारण में आता है इसलिए यहाँ कोई भी निर्माण नहीं कर सकते। तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल के आर्थिक सहयोग से यहाँ एक छोटी सी धर्मशाला का निर्माण भी हुआ है। राजस्थान सरकार की अकर्मण्यता के चलते इस मंदिर की भूमि को अभ्यारण से ट्रस्ट को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जिससे यहाँ पर श्रद्धालू कुछ निर्माण कर सकें। यहाँ से दर्शन करके हम भानगढ़ की ओर चल पड़े।  आगे पढ़ें .........

बुधवार, 18 जुलाई 2012

जादू-टोने रहस्यमय संसार : छत्तीसगढ़

जादू-टोना-टोनही शब्द ही भय उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होता है। बचपन से सुनते आए हैं कि तंत्र-मंत्र से प्राप्त शक्ति द्वारा किसी का भी अहित किया जा सकता है। अहित करने वाला टोनहा-टोनही कहलाता है। इन तंत्र मंत्र की शक्ति के दुष्प्रभाव से बचाने या उसे निष्प्रभावी करने कार्य बैगा या तांत्रिक के जिम्मे होता है। गॉड पार्टिकल ढूंढने का दावा करने वाला समाज भी इन गैबी ताकतों के होने से इनकार नहीं करता। तंत्र मंत्र समाज के मानस में इतने गहरे बैठ चुका है कि अंधेरा होते ही अज्ञात भय के कारण रस्सी भी सांप दिखाई देने लगती है। ग्रामीण अंचल में आज भी किसी को बुखार हो जाए तो वह डॉक्टर के पास जाने की बजाए सबसे पहले बैगा-गुनिया या तांत्रिक से ही सम्पर्क करता है और उसी के ईलाज पर विश्वास करता है। फ़िर चाहे प्राण ही क्यों न निकल जाएं, अंतिम समय में उसके परिजन ही उसे डॉक्टर के पास ईलाज के लिए पहुंचाते हैं या सीधे श्मशान जाता है।

बचपन में सुनी गई टोनही जनित घटनाएं और कहानियाँ कोमल मन मस्तिष्क पर स्थाई असर डालती हैं, जिससे व्यक्ति जीवन भर नहीं उबर पाता। लोग कहते हैं कि अनपढ ही गैबी ताकतों पर विश्वास करते हैं, लेकिन मैने पढे लिखे उच्चपदों पर बैठे व्यक्तियों को भी तंत्र-मंत्र-तांत्रिकों, बैगा गुनियों के चंगुल फ़ंसे देखा है। तंत्र मंत्र का असर होता है कि नहीं? टोनही-टोनहा होता है कि नहीं? इस सत्यता को जानने का मैने बहुत प्रयास किया। लेकिन जानकार लोग इसे गुप्त ही रखना चाहते हैं। गोपनीयता की शपथ या गुरु बनाए बिना बताना नहीं चाहते। अगर किसी प्रक्रिया से आप जान भी गए या सीख भी गए तो आपको भी इसे गुप्त रखने की शर्तों का पालन करना होगा, अन्यथा मंत्रों की शक्तियाँ निष्प्रभावी होने का भय बताया जाता है। दीक्षा के वक्त शपथ दिलाते हुए गुरु यह बात अपने शिष्य के कान में अवश्य डालते हैं। 

गाँव में बिजली नहीं थी, घर के सामने तालाब में कोई रोशनी जलती थी तो बुजुर्ग कहते कि "वो दे, रक्सा बरत हे। (वह देख रक्सा [कुंवारा भूत] जल रहा है) हम भी मान लेते थे और रात के वक्त बोईर तरिया की तरफ़ नहीं जाते थे। तालाब के पार पर बहुत सारे बेर के वृक्ष थे जिसके कारण उसे बोईर तरिया कहते हैं। बेर के वृक्ष में परेतिन का वास बताया जाता है और ईमली में प्रेत का। रामगोपाल बैगाई करता है और मैं उसके साथ इन विषयों पर चर्चा करता था। वह टोनहीं के एक से एक किस्से बताता और किस्सा सुनते और चर्चा करते सुकवा (भोर के समय दिखने वाला चमकीला तारा) उग जाता था। तब कहीं जाकर हमारी बातें खत्म होती थी। नागपंचमी के दिन वह दक्षिणा लेकर अपने गुरु से भेंट करने अवश्य जाता था। तंत्र मंत्र सीखने के लिए गुरु बनाने एवं शिष्यों द्वारा अपने गुरु का मानदान करने एवं गुरु द्वारा पाठ-पीढा (उत्तराधिकार) सौंपने का ग्रामीण अंचल में यही दिन माना जाता है।

कहते हैं टोनही का मंत्र ढाई अक्षर का होता है। टोनही जब सभी मंत्र सिद्ध कर लेती है वह सोधे हो जाती है अर्थात टोनही से बड़ा पद प्राप्त कर लेती है। टोनही नकारात्मक शक्तियों की स्वामिनी होती है, मान्यता है कि वह जो चाहे वह कर सकती है। जन मानस में प्रचलित है कि टोनही अपनी शक्तियों से किसी को मार सकती है, अपंग कर सकती है, बीमार कर सकती है। शरीर को कमजोर कर सकती है, घर से वस्तुएं गायब कर सकती है, गाय भैंस से लेकर लईकोरी स्त्री के स्तनों का दूध सुखा सकती है, पागल कर सकती है, फ़सल को उजाड़ सकती है, शारीरिक नुकसान कर सकती है। इसलिए आदमी अपने अनिष्ट की आशंका से भयभीत रहता है और हमेशा ही इससे बचना चाहता है। रामगोपाल बताता है कि तंत्र मंत्र सीखने के लिए हरेली अमावस एवं दीवाली की रात महत्वपूर्ण होती हैं। 

अमावस की रात जादू-टोना सीखने वाले महिलाएं मध्य रात्रि को गाँव या नगर के बाहर सुनसान स्थान मरघट में एकत्र होती हैं, मुख्य टोनही के मार्गदर्शन में नग्न होकर शौच करती हैं, अपने-अपने मल से दीपक बनाती हैं। उसके बाद सोधे (मुख्य टोनहीं) उन्हे एक जड़ी देती है जिसे मुंह में रखने से लार बनती हैं, फ़िर इस लार को दीपक में डालते हैं जिससे आग निकलती है, दीपक से आग निरंतर निकलते रहती है और टोनही सीखने वाली महिला बाल खुले करके अपने सिर को उपर नीचे झुकाती है (सिर उपर नीचे झुकाने को झूपना कहते हैं)। बलि के रुप में नींबू काटा जाता है, सोधे यहीं पर सीखने वालियों को मंत्र याद करवाती है तथा उन्हे ईष्ट देव को निर्धारित जीवों की बलि देने का संकल्प दिलाती है। जिन साधिकाओं को मंत्र याद हो जाता है उन्हे गुरुपूर्णिमा को "चलानी पाठ" दिया जाता है। उन्हे शिक्षा दी जाती है कि किस मंत्र का प्रयोग कैसे करना है।   

सवाल पर गंभीर मुद्रा
तारक बैगा से भी टोनही के विषय में चर्चा हुई, वे कहते हैं कि सोधे होने के बाद टोनही के पास ऐसी शक्तियाँ आ जाती हैं जिससे वह इच्छित प्राप्ति कर सकती है। इन कार्यों के लिए उसके पास गण होते हैं जिन्हे बीर कहते हैं। इन बीरों को मटिया और मसान कहा जाता है। चटिया बीर को टोनही मारण कर्म के लिए उपयोग में लाती है। चटपट काम करके लौटने के कारण इसे चटिया कहा जाता है। जब टोनही इसे भेजती है तो यह चिन्हित को मार कर ही वापस आता है। इस पर किसी बैगा, गुनिया, तांत्रिक के मंत्रों का कोई असर नहीं होता। टोनही का मटिया बीर चिन्हित को शारीरिक और आर्थिक नुकसान पहुंचाता है। गांवों में मान्यता है कि यह जहाँ भी जाता है वहां की वस्तुएं स्वत: ही गायब होने लगती हैं। घर में खाने-रांधने का सामान भी नहीं छोड़ता। पूरा घर ही खाली कर देता है। चटिया-मटिया के रहने का स्थान जानवरों का कोठा बताया जाता है तथा ये कद में छोटे होते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं सिर्फ़ उन्हे ही दिखाई देते हैं अन्य किसी को दिखाई नहीं देते। इनके द्वारा गायब की हुई वस्तुओं का पता नहीं चलता।

मेरे सवाल पर मुस्काते हुए बैगा
कहते हैं कि टोनही आत्माओं से भी बात करती है। उनका आह्वान कर उनसे जानकारी भी ले सकती है। टोनही अपनी शक्ति बढाने के लिए मसान भी साधती है, मसान दो तरह के होते हैं, तेलिया मसान और मरी मसान। टोनही मसान की सवारी करती है। किसी इंसान पर सवार होने के बाद बैगा की झाड़-फ़ूंक के दौरान मसान ही प्रभावित के मुख से बैगा को जवाब देता है। टोनही अपनी नजर से किसी के जीवन को प्रभावित कर सकती है। टोनही का बीर मटिया काले रंग, उल्टे पैर का बौना भूत होता है, यह अपने साथ सदा कांवड़ और टोकरी रखता है। मटिया अपनी कांवड़ से दुनिया भर की चीजें ढो सकता है। चटिया-मटिया जोड़े में रहते हैं। जिसके घर में मटिया रहता है उसे मालामाल कर देता है, अगर उस घर में इसका सम्मान नहीं होता तो उसका सर्वनाश भी कर देता है। मैने एक सम्पन्न व्यक्ति के घर में मटिया का असर देखा था। वे अपने घर में खाने-पीने का सामान, रुपया पैसा, धन धान्य नहीं रखते थे। खाना पकाने का सामान रोज खरीदते थे। अधिक सामान रखने पर मटिया उसे गायब कर देता था। 

बैगा कहते हैं कि मसान की आँखें अंधेरे में लाल बल्ब जैसे चमकती हैं यह कुत्ते के रुप में मसान निर्जन इलाके में या घर पर भी रहता है। एक बार रक्सा ने इनकी भैंसा गाड़ी को पलटा दिया था। यह रक्सा आग के गोले की तरह दिखाई देता है और यह गोला उपर उठते दिखाई देता है जिसमें विस्फ़ोट होता है। कहते हैं कि जो कुंवारा मरता है वह रक्सा बनता है। अकाल मृत्यु वाले लोग परेत-परेतिन बनते हैं तथा अपनी आयु पूर्ण होने तक भटकते रहते हैं, टोनही इन्हे साध लेती है। जनश्रुति है कि परेत बेर के पेड़ में रहता है। जिस स्त्री की प्रसव के दौरान मृत्यु हो जाती है वह परेतिन बनती है। इसलिए परेतिन अपने बच्चे के साथ ही दिखाई देती है। कहते हैं कि हाट-बाजार में परेत-परेतिन अपना सामान खरीदने आते हैं। लेकिन लोग उन्हे पहचान नहीं पाते। कहते हैं कि परेतिन किसी भी रुप में आकर संबंध बना लेती है, बैगा कहते हैं रास्ते में कहीं परेतिन नजर आ जाए तो डरकर अपनी राह नहीं छोड़नी चाहिए, प्ररेतिन अपना भयानक रुप दिखा कर रास्ते से हटाने की कोशिश करती है, राहगीर के रास्ता छोड़ते ही वह परेतिन का शिकार हो जाता है। कहते हैं कि परेतिन के बाल पकड़ लिए जाएं और उसकी साड़ी बांस के खोल में भर कर रखने से जब तक उसे साड़ी नहीं मिलती वह मानव रुप में ही रहती है।

तारक बैगा
मिरचुक झालर के बल्ब जैसा जलता बुझता है, टोनही तीया (तीज नहावन) के दिन परेत जगाती है। जागने पर परेत टोनही का गुलाम हो जाता है और उसी के लिए काम करता है। टोनही के लिए हरेली अमावस एवं दीवाली की अमावस की रात महत्वपूर्ण होती है। इन दोनों रातों की साधना में इन्हे सम्मिलित होना अत्यावश्यक है। बैगा कहते हैं कि तीन साल तक लगातार अमावस साधना में न आने पर वह सभी मंत्र स्वत; ही भूल जाती है। शनिचरहा से भी लोग भय खाते हैं, जिस व्यक्ति का जन्म शनिवार को होता है उसकी नजर बिना तंत्र मंत्र सीखे ही लग जाती है। पुरुष टोनहा हो्ता है, टोनही एवं टोनहा मंत्र सीखने की प्रक्रिया एक जैसी ही है। रामगोपाल कहता था कि अगर कहीं टोनही-टोनहा या भूत परेत नजर आए तो पेशाब से गोल बना कर उसमें बैठ जाएं और बाहर न निकलें। हानि पहुचाने वाली शक्तियां उस गोले के भीतर प्रवेश नहीं करती। इससे बचाव हो जाता है। कहते हैं जिस घर की औरत टोनही बन जाती है उसके घर वालों को ही पता नहीं चलता कि वह टोनही या सोधे हो गई है। आधी रात को अपने घर वालों को जड़ी सुंघाकर बेहोश कर देती है और अपना मंत्र सिद्ध करने के लिए चली जाती है।

डिस्क्लैमर: पोस्ट लिखने उद्देश्य टोना-टोटका एवं टोनही के रहस्यमयी गुप्त दुनिया से परिचय कराना है। समाज में इस विषय को लेकर बहुत सारी बातें चलती रहती हैं। लोग मनोरंजन की दृष्टि से भी भूत-प्रेत की कहानियाँ गढते हैं और चौक-चौराहों पर बैठ कर समय व्यतीत करने की दृष्टि से चर्चा करते हैं। जब सदियों से ये मान्यताएं चली आ रही हैं तो इसके पीछे अवश्य ही कोई सच भी होगा। जिज्ञासु होने के बाद भी मुझे अभी तक टोनही इत्यादि का साक्षात्कार नहीं हुआ है। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसे घट चुकी हैं जिन्हे नकारने या स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूँ। उन घटनाओं को सिर्फ़ अपने मन का भ्रम या संयोग मानकर  दरकिनार करते आया हूं। 

शनिवार, 14 जुलाई 2012

सावन में सवनाही तिहार


सवनाही देवी का स्थान गाँव के सियार में
रथयात्रा के बाद सावन माह से छत्तीसगढ अंचल में त्यौहारों की झड़ी लग जाती है। छत्तीसगढ के लगभग सभी त्यौहार कृषि कर्म से जुड़े हुए हैं। सावन के महीने में वर्तमान में कांवरियों का जोर रहता है।प्रत्येक सोमवार को कांवरिये श्रद्धानुसार नदियों का जल लाकर समीस्थ शिवमंदिरों में अर्पित करने हैं। जिससे सावन भर पूजा-पाठ की चहल पहल रहती है। सावन के महीनें टोना-टोटका एवं जादू मंतर का भी जोर रहता है। नए जादू-टोना सीखने वाले इस महीने में गुरु बनाकर शिक्षा ग्रहण करते हैं तो गुरु अपने सिद्ध मंत्रों का प्रयोग कर उसको जाँचते भी हैं। मान्यता है भोले बाबा को सुर-असुर दोनो प्रिय हैं। इसलिए सावन के महीने में दोनो शक्तियाँ प्रबल रहती हैं और साधना करने पर शीघ्र फ़ल मिलता है। ग्रामीण अंचल के लोग टोना-टोटका को मानते हैं और इसके दुष्प्रभाव से डरे रहते हैं। जादू टोना से गाँव के जान-माल की रक्षा के लिए गाँव के देवता की पूजा की जाती है। उसे होम-धूप देकर प्रसन्न किया जाता है और उससे विनती की जाती है कि गाँव में किसी तरह रोग-शोक, बीमारी और विघ्न बाधा न आए।

नीम की लकड़ी की गाड़ी
सवनाही तिहार परम्परा पर गाँव के इतवारी बैगा  ने  बताया कि गाँव के देवी देवताओं की पूजा के लिए प्रत्येक गाँव में एक बैगा नियुक्त किया जाता है। बैगा की नियुक्ति गुरु-शिष्य परम्परा की गद्दी के हिसाब से तय होती है। जिस तरह किसी अखाड़े का महंत अपने किसी शिष्य को योग्य मानकर अपना उत्तराधिकारी बनाता है ठीक उसी तरह वृद्ध बैगा भी अपने किसी योग्य शिष्य को ही पाठ-पीढा देता है।(उत्तराधिकारी बनाता है) जिसे ग्रामवासी मान्यता देते हैं। त्यौहारों एवं झाड़-फ़ूंक करने पर बैगा को उचित मान-दान दिया जाता है। जिससे उसका निर्वहन होता है। बैगा के हाथों में ही सभी ग्रामीण त्यौहार मनाने की जिम्मेदारी होती है। इसी तरह आषाढ के अंतिम सप्ताह या सावन के प्रथम सप्ताह में आने वाले प्रथम रविवार को "सवनाही तिहार" मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। इस त्यौहार को मनाने के पीछे उद्देश्य है कि जादू-टोना हारी-बीमारी से गाँव के जन, गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ एवं अन्य पालतू जीव जंतुओं की हानि न हो। गाँव में चेचक, हैजा जैसी बीमारियां प्रवेश न करें। सभी सानंद रहें।

सवनाही पुतरी का बंधन
सवनाही तिहार मनाने के लिए पहला रविवार ही निश्चित किया जाता है। गाँव का कोटवार इसकी सूचना हाँका करके समस्त ग्रामवासियों को देता है। इस दिन गाँव में सभी कार्य बंद रहते हैं। गाँव का निवासी यदि कहीं गाँव से बाहर भी काम करने जाता है तो उस दिन उसे भी छुट्टी करनी पड़ती है। खेतों में कोई हल नहीं जोतता, कोई बैलागाड़ी नहीं फ़ांदता। सभी के लिए यह अनिवार्य छुट्टी का दिन होता है। अगर कोई इस आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके दंड की व्यवस्था भी है। दंड खिलाने-पिलाने से लेकर आर्थिक भी हो सकता है। इतवारी के दिन सिर्फ़ गाँव के चौकीदार को काम करने की छूट रहती है। सवनाही तिहार मनाने के लिए गाँव में बरार (चंदा) किया जाता है। जिससे पूजा पाठ का सामान खरीदा जाता है और बैगा की दान-दक्षिणा दी जाती है। सवनाही पूजा करने बाद ही गाँव में इतवारी छुट्टी मनाने की परम्परा है। जो 5-7 इतवार तक मानी जाती है। अधिकतर गांवों में पाँच इतवार ही छुट्टी की जाती है।

सवनाही पूजा
शनिवार की रात में बैगा के साथ प्रमुख किसान गाँव के समस्त देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। इस रात बैगा के साथ जाने वाले समस्त लोग रात भर घर नहीं जाते और सोते भी नहीं। गाँव के किसी सार्वजनिक स्थान (मंदिर, देवाला, स्कूल) में रात काट देते हैं। फ़िर रविवार को पहाती (सुबह) होते ही चरवाहे गाँव के सभी मवेशियों को को चारागन में इकट्ठा कर देते हैं, उसके बाद मवेशियों के मालिक अपने घर से पलाश के पत्ते में कोड़हा (धान का चिकना भूसा) से बनी हुई अंगाकर रोटी के साथ कुछ द्रव्य लाकर राऊत और बैगा को देते हैं। जिसे लेकर बैगा और राऊत मवेशियों के साथ गाँव की पूर्व दिशा में सरहद (सियार) पर जाते हैं। वहाँ स्थित सवनाही देवी की पूजा की जाती है। पूजा के लिए एक जोड़ा नारियल, सिंदूर, नींबू, श्रृंगार का सामान, काले, सफ़ेद, लाल झंडे, टुकनी, सुपली, चूड़ी, रिबन, फ़ीता के साथ काली मुर्गी एवं कहीं-कहीं दारु का इस्तेमाल भी किया जाता है। पूजा के लिए नीम की लकड़ी की छोटी सी गाड़ी बनाई जाती है। जिसे लाल,काले और सफ़ेद ध्वजाओं से सजाया जाता है।

गाँव के सियार में सवनाही 
बैगा अपने साथ लाया हुआ पूजा का सामान देवी को अर्पित करता है और समस्त ग्राम देवी-देवताओं का स्मरण कर गाँव की कुशलता की प्रार्थना करता है। इसके बाद देवी की सात बार परिक्रमा करके कोड़हा की रोटी का देवी को भोग लगाकर सियार के उस पार रख देता है। इसके पश्चात काली मुर्गी के सिर पर सिंदूर लगा कर उसे सियार के उस पार भुत-प्रेत-रक्सा की भेंट के लिए छोड़ दिया जाता है। फ़िर बैगा वहां से चल पड़ता है, इस समय उपस्थित लोगों के लिए पीछे मुड़ कर देखना वर्जित होता है। ऐसी मान्यता है कि पीछे मुड़ कर देखने से सवनाही देवी नाराज होकर सभी भूत-प्रेतों को सियार (सरहद) पर ही छोड़ कर चली जाती है। सभी जानवरों को वापस गाँव में लाया जाता है। नारियल फ़ोड़ कर प्रसाद बांटा जाता है, यह प्रसाद सिर्फ़ उन्हे ही दिया जाता है जो बैगा के साथ पूजा-पाठ में सम्मिलित रहते हैं। भोग लगाने के बाद बची हुई कोड़हा की रोटी को मवेशियों को खिलाया जाता है।

सवनाही पुतरी
सवनाही तिहार के दिन लोग घरों में गाय के गोबर से हाथ की 4 अंगुलियों द्वारा घर के दरवाजे पर आदिम आकृति बनाई जाती है। जो कहीं मनुष्याकृति होती है तो कहीं शेर इत्यादि बनाने की परम्परा है। इन आकृतियों से जोड़ कर चार अंगु्लियों की गोबर की रेखा घर के चारों तरफ़ बनाई जाती है। जैसे गोबर की रेखा से घर को चारों तरफ़ से बांध दिया गया हो। इस बंधने का उद्देश्य यही है कि कोई भूत प्रेत या गैबी शक्ति घर के निवासियों को परेशान न करे। अगर गैबी ताकतें आती भी हैं तो बंधन होने से घर में प्रवेश नहीं कर पाएगीं जिससे परिवार हानि से बचा रहेगा। यह टोटका गाँव के कच्चे पक्के घरों में दिखाई देता है। घरों के बाहर गोबर की लकीरें खींची हुई दिखाई देती है। वर्तमान युग में भले ही यह कार्य आदिम लगता हो, लेकिन गाँव में अभी तक प्रचलित है और ग्रामवासियों को संतुष्टि देता है। जिससे वे साल भर अपना कृषि कार्य निर्बाध होकर करते हैं। लगभग छत्तीसगढ के सभी जिलों में यह त्यौहार मनाया  जाता है।

(सुबह की सैर के दौरान गाँव के सियार (सीमा) पर सवनाही पूजा की हुई दिखाई दी। सोचा कि एक पोस्ट ही लिख दी जाए सवनाही पर, जिससे छत्तीसगढ की संस्कृति से पाठक परिचित होगें)