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सोमवार, 12 सितंबर 2011

रेडियो का जादू --- ललित शर्मा

रेडियो ही रेडियो - खरीद लो जितने चाहो 
रेडियो नाम सुनते ही कानों में सुरीली मधुर आवाज गूंज जाती है, यह तन्हाई का वह साथी है जो उदास नहीं होने देता. मैं इसे स्वस्थ मनोरंजन का सर्वोत्तम साधन मानता हूँ. रेडियो एक ऐसा यंत्र है जिसका इस्तेमाल करते हुए हम अपना काम भी कर सकते हैं. यह आदमी को बुद्धू बक्से जैसे निठल्ला दर्शक नहीं बनाता, बल्कि  काम करने की भी पूरी स्वतंत्रता देता है. इसकी पहुँच धरती से लेकर अन्तरिक्ष तक है. चाहे सीमाओं की रक्षा  करता सिपाही हो या खेत में हल चलाता किसान हो सभी के मनोरंजन का एक मात्र सर्वसुलभ साधन है. रेडियो के इन दीवानों मैं भी शामिल हूँ. देर रात घर कार से लौटते समय मुझे मनपसन्द गीत सुनाते हुए यह किसी और ही दुनिया में ले जाता है. एक-दो बार तो हादसा होते-होते रह गया. ह्रदय स्पर्शी गीत और नगमे अंतर्मन की गहराइयों में उतर जाते हैं. मुझे यह पता नहीं रहता कि गीतकार, संगीतकार, गायक कौन है? इतना जानता हूँ रेडियो सुन रहा है.

छत्तीसगढ़ के परमपरागत वाद्य 
जब बचपन में रेडियो सुनते थे तो लगता था कि इसके भीतर लोग घुस कर बैठे हैं. वही आपस में बात कर रहे हैं, गीत गा रहे हैं, समाचार सुना रहे हैं. फिर सोचता था कि आदमी तो बड़ा होता है और रेडियो छोटा, तो फिर इसके भीतर वे समाते कैसे होंगे? जब इस सवाल का जवाब मुझे नहीं मिला. तब एक दिन मैंने पेचकस से रेडियो खोल दिया, उसके भीतर से कुछ बल्ब और तार निकले. लेकिन बोलने वाला आदमी नहीं मिला. रेडियो का सत्यानाश करने के कारण डांट भी खानी पड़ी. इसके रहस्य से तब वाकिफ हुआ जब हमारे घर में टेपरिकार्डर आया. बड़ी चकरी पर रील लगी होती थी और जो माइक से बोलते थे वह हु-ब-हु सुनाई देता था. यह एक बड़ा चमत्कार था. स्वयं की आवाज सुनना अद्भुत  था. तब अंदाजा लगा कि टेप रिकार्डर से रिकार्ड करके कोई रेडियो में बोलता है.तब रेडियो का आकर्षण सर चढ़ कर बोल रहा था.

मरफ़ी रेडियो का विज्ञापन 1966
हमारे यहाँ एक चौकीदार था. उसे ५ रूपये रोज का मेहनताना मिलता था. उसके मन में बरसों से तमन्ना थी कि उसके पास भी एक ट्रांजिस्टर होता. उसने रूपये बचाकर पुराना मरफ़ी ट्रांजिस्टर १७५ रूपये में ख़रीदा. उस समय रेडियो खरीदना सम्पत्ति खरीदने जैसा ही समझा जाता था. चौकीदार के ट्रांजिस्टर खरीदने की बाकायदा रसीद लिखी गई " अमुक व्यक्ति ने अमुक व्यक्ति से एक अदद मरफ़ी कम्पनी निर्मित दो बैंड, तीन बड़े सेल का ट्रांजिस्टर ख़रीदा है, जिसकी लायसेंस फीस ७ रुपये सालाना है. दो गवाहों की मौजूदगी में १७५ रूपये नगद प्राप्त किए ......... रसीद, सनद रहे वक्त जरुरत पर काम आवे........ सही ...  क्रेता - विक्रेता दो गवाह....... और १० पैसे की रसीदी टिकिट....... उसके बाद ट्रांजिस्टर चौकीदार के शरीर का एक अंग बन गया. कंधे पर लटका ही रहता. २४ घंटे का साथी. स्थानीय रिले केंद्र से ३६ गढ़ी गीत बजते  " काबर रिसा गे दामाद बाबु दुलरू, भांटा के भरता पाताल के चटनी." और इसका आन्नद हम सब लेते. खेत जोतते समय भी किसान हल के जुड़े में रेडियो लटका कर सुनते रहते थे. भले ही कार्यक्रम कुछ भी आ रहा हो. आवाज आनी चाहिए जिससे उसका ध्यान काम में लगे रहे.

बचका मल का सम्मान करते  हुए अशोक बजाज 
बोवाई का समय होता तो मै भी जेटकिंग कम्पनी का छोटा दो बैंड का ट्रांजिस्टर लेकर खेत की मेड पर बैठता और बनिहारों के काम को देखता रहता. कहते हैं......खेती अपन सेती. अगर खेती की तरफ मालिक ध्यान नहीं देगा तो बनिहार- नौकर कमा के नहीं देने वाले. बुद्धू बक्से ने रेडियो का चलन कम कर दिया, लेकिन पूरी तरह चलन से बाहर नहीं कर पाया. रेडियो को हम जेब में डाल कर कहीं भी ले जा सकते थे, लेकिन टी.वी को नहीं. इसीलिए ग्रामीण अंचल में रेडियो लोकप्रिय हुआ और कालांतर में समाज सुधार एवं सूचनाओं के प्रचार -प्रसार का एक सशक्त माध्यम भी बना. चाहे किसान भाइयों कार्यक्रम हो, बच्चों, युवाओं, महिलाओं, एवं फौजी भाइयों का कार्यक्रम हो, सभी में लोकप्रियता हासिल की. चिट्ठी-पत्री के माध्यम से लोग जुड़ने लगे. पत्र भेजने वाले श्रोताओं के कारण भाटापारा को झुमरी तलैया भी कहा जाने लगा. श्रोताओं के पत्र फरमाईशी कार्यक्रमों में पढ़े जाने लगे. सभी वर्ग के श्रोता रेडियो के साथ जुड़ गए. चाहे स्थानीय कार्यक्रम हो या विविध भारती के कार्य्रक्रम. सभी ने श्रोताओं का सम्मान एवं प्यार पाया.

श्रोताओं की मांग पर शेख हुसैन गीत गाते हुए 
२० अगस्त को रेडियो श्रोता दिवस मनाया जाता है. गत वर्ष एवं वर्तमान में मुझे इस कार्यक्रम में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. यह एक ऐसा दिन है, जब आकाशवाणी के उद्घोषक एवं श्रोता एक दुसरे से मिलते हैं. उद्घोषक भी चाहते हैं कि वे उनसे मिले जिनके पत्र वे अपने कार्यक्रमों में पढ़ते हैं और श्रोता भी चाहते हैं कि उस उद्घोषक से रु-ब-रु हों जिसकी आवाज वे रेडियो के माध्यम से सुनते हैं. श्रोता दिवस पर दोनों का भाव पूर्ण मिलन देखने मिलता है. इस वर्ष रेडियो श्रोता दिवस का कार्यक्रम रेडियो के प्रसिद्द श्रोता "बचकामल" की नगरी भाठापारा में आयोजित हुआ. जनकपुरी होने के कारण अशोक भाई के साथ मै भी इस कार्यक्रम का साक्षी बना. जिसमे रेडियो श्रोताओं के साथ-साथ उद्घोषको का भी सम्मान किया गया. ३६ गढ़ी गीतों के गायक एवं गीतकार शेख हुसैन जी को सुना. उम्र के ढलान पर भी उनकी आवाज में वही जुम्बिस एवं दम है जो आज से ३० बरस पूर्व हुआ करता था. उन्होंने "गुल गुल भजिया खा ले, बटकी मा बासी अऊ चुटकी मा नून, चल जाबो खल्लारी मेला वो" आदि गीत गाकर मन मोह लिया.

कविता और कांति लाल बरलोटा  गपियाते हुए 
दो विशेष श्रोताओं से मेरी मुलाकात हुयी, जिनका उल्लेख किये बिना मेरी लेख अधुरा ही मानुगा. इनसे मिलकर मुझे प्रसन्नता हुयी. मन की आँखों से देखने वाले लोग निर्मल होते हैं. कांतिलाल बरलोटा प्रज्ञा चक्षु हैं साथ ही विकलांगता देकर नियति ने साथ क्रूर व्यवहार किया है. कांति लाल जी हमारे साथ रायपुर से ही भाठापारा गए थे. इन्होने शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद दुर्गा कालेज रायपुर से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की, कमलादेवी संगीत महाविद्यालय से गायन में एम. ए. किया एवं खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से गीतांजली का कोर्स किया. रास्ते मैंने इनसे कुछ बंदिशें भी सुनी. तबियत ख़राब होने के पश्चात भी इनका श्रोता सम्मेलन में उपस्थित होना रेडियो के प्रति अनुराग प्रदर्शित करता है. १९९४ से कांतिलाल विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दे कर ऋषि परम्परा को आगे बढा रहे हैं.

प्रज्ञा चक्षु कविता देशमुख से कार्यक्रम स्थल पर मेरी मुलाकात कांति लाल ने करायी. कविता खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से गायन में स्नातकोत्तर उपाधि ले रही हैं. किसी की भी आवाज एक बार सुनकर उसकी हु-ब-हु नक़ल करके उसे चौंका देती है. कार्यक्रम के दौरान दोनों मेरे समीप ही बैठे थे. मेरा ध्यान इनकी बातों की ओर था. दोनों आपस में तय कर रहे थे कि ललित अंकल को फोन करके कब और कैसे चौंकाना है और मौज लेनी है. मुझे चौंकाने के मनसूबे बांधे जा रहे थे और मैं इनकी निश्छल बातें सुनकर मन ही मन मुदित हो रहा था. ईश्वर ने कुछ कमी की तो उसकी भरपाई कही और से कर दी. इन्हें जीवन जीने का मार्ग दे दिया. मुझे इनसे मिलकर अच्छा लगा ऐसे ही व्यक्तित्व किसी और की भी प्रेरणा बनते हैं. कार्यक्रम के कुछ दिनों के बाद कविता ने मुझे फोन करके चौंका ही दिया. बोली - "मै आकाशवाणी रायपुर से बोल रही हूँ, आपका कार्यक्रम आकाशवाणी में तय हो गया है, जल्दी ही रिकार्डिंग की तारीख बता दी जाएगी". काफी देर बाद मुझे इसकी आवाज समझ में आई और खूब ठहाके लगाये.

उद्घोषकगण आकाशवाणी रायपुर -बिलासपुर - चित्र-साभार संज्ञा जी 
ऍफ़.एम के आने से आज रेडियों ने पुन: टेप रिकार्डर, केसेट , सी.डी. प्लेयर सभी को पीछे छोड़ दिया. रेडियो सुनने वाले श्रोताओं की संख्या फिर बढ़ रहती है. इसी की परिणिति रेडियो श्रोता संघ के कार्यक्रम रूप में देखने मिली. कार्यक्रम के माध्यम से सभी श्रोताओं और उद्घोषकों का वार्षिक मिलन एक स्थान पर होना रेडियो के प्रचार-प्रसार लिए नव जीवन है.  वैसे रेडियो अभी भी सरकार के नियंत्रण में है, जो सरकार चाहती है वही बोलता है, अगर आकाशवाणी को स्वायतता दे दी जाये तो लोग खबरों के लिए बी.बी.सी. की ओर नहीं जायेंगे. फिर भी हमें गर्व है कि रेडियो के कार्यक्रम को हम सपरिवार सुनकर सकते हैं, यह अभी सांस्कृतिक प्रदुषण फ़ैलाने के सामाजिक अपराध  से कोसों दूर है. श्रोता सम्मलेन में आकाशवाणी रायपुर के अधिकारी यादराम पटेल, समीर शुक्ल, उद्घोषक  दीपक हटवार, श्याम वर्मा, के.परेश, बिलासपुर से हरीशचन्द्र वाद्यकार, राजू भैया,उमेश  तिवारी, एवं शोभनाथ साहू  अंबिकापुर का स्मृति चिन्ह देकर अशोक बजाज एवं शिवरतन शर्मा के हाथों  सम्मान किया गया. कार्यक्रम में ब्लॉगर संज्ञा टंडन नहीं पहुच पाई.  कमल लखानी रायपुर , डॉ. प्रदीप जैन सिमगा. रतन जैन रायपुर, सहित लगभग २०० श्रोता कार्यक्रम में उपथित थे.   

NH-30 सड़क गंगा की सैर

गुरुवार, 23 जून 2011

संरक्षण कार्य पूर्ण - मदकू द्वीप से लौटकर - ललित शर्मा

11 मई को मदकू द्वीप की यात्रा की थी और इस पर मदकू द्वीप! प्राचीन एतिहासिक स्थल --भाग -1 तथा मदकू द्वीप की यात्रा और ऐतिहासिक तथ्यों से परिचय एवं चित्रों में मदकू द्वीप की सैर नामक तीन पोस्ट भी लगाई थी। ठीक एक महीने बाद 10 जून को मेरा पुन: मदकू द्वीप जाना हुआ। वहाँ पुरातत्वविद् अरुणकुमार शर्मा जी एवं उत्खनन निर्देशक प्रभात सिंह से मुलाकात हुई। संरक्षण एवं पुनर्संरचना का कार्य पूर्णता पर है। पिछली भेंट में शर्मा जी ने बताया थाकि उत्खनन स्थल की बारिश एवं धूप से सूरक्षा के लिए डोम बनाने का कार्य प्रारंभ होने वाला है। अब उन्होने कहा कि डोम बनाने का कार्य लालफ़ीताशाही की भेंट चढ गया। बरसात आने वाली है और कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है। उत्खनन स्थल पर पानी भी भर सकता है, जिससे पुरातात्विक सामग्री को नुकसान हो सकता है।
पश्चिम मुखी बड़े मंदिर के सामने हम लोग
अरुण शर्मा जी ने बताया कि यहाँ के मंदिरों को कई राजाओं ने अपने शासन काल में बनवाया है। यह मंदिर एक कतार में सीढी दार बने हैं, मुख्य मंदिर से इनकी उंचाई कम होते चली गयी। इसका कारण यह है कि राजा अपने पुर्वजों का सम्मान करते हुए उनके बनाए मंदिर से कम उंचाई में अगला मंदिर बनवाते थे। इससे मंदिर एक श्रृंखला में सीढी दार बने हैं। मंदिरों के निर्माण में पुर्वजों का सम्मान रखने की अद्भूत परम्परा की मुझे नयी जानकारी मिली। नहीं तो दो भाईयों में विवाद होने पर निर्माण की उंचाई बढते ही जाती है। कुछ दिन पहले संस्कृति मंत्री ने स्थल  का निरीक्षण किया था और अधिकारियों को किसी भी मद से डोम बनाने के लिए निर्देश दिया था। देखते हैं अब कब तक यहाँ डोम का निर्माण होता है।
 
संरक्षण एवं पुनर्संरचना
पिछली बार मैं जिस रास्ते से गया था, वह रास्ता अब बंद हो चुका है। मैं बड़ी मुस्किल से मदकू द्वीप पहुंचा। सड़क एवं पुलिया निर्माण के कारण कड़ार और कोतमी वाला मार्ग अवरुद्ध है। एक बरसात के बाद तो वहां से चक्के की गाड़ी निकलना संभव नहीं।  मुझे इस रास्ते से जाने में अधिक समय और कठिनाई का सामना करना पड़ा। 5 किलो मीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ा। वापसी में मदकूद्वीप के पश्चिम वाला एनीकेट बन गया है। उसी रास्ते से मदकू गाँव और खोलवा होते हुए आया। पक्की सड़क है, अब जाना है तो यही मार्ग श्रेष्ठ है। अगर एनीकट पर शिवनाथ का पानी नहीं चढा हो तो चार चक्के की गाड़ी आराम से पार हो सकती है। अब मैने मदकू द्वीप जाने के सभी रास्ते देख लिए। कुछ चित्र पुनर्संरचना के भी लिए। आपके लिए प्रस्तूत हैं।

वो देखिए उधर भी कुछ मिला है- अरुण शर्मा जी
संरक्षण कार्य प्रारंभ है
जलेश्वर महादेव का मंदिर-युगल मंदिर में से एक
मंदिर के बगल से उत्खनन स्थल का चित्र
प्राचीन यज्ञशाला के अवशेष

उत्खनन में प्राप्त 4 फ़ीट उंचाई का शिवलिंग
उत्खनन में प्राप्त एक मुर्ति