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शनिवार, 1 सितंबर 2012

इति श्री रतनपुर यात्रा ----------- ललित शर्मा

किरारी गोढी शिव मंदिर की चामुंडा प्रतिमा
पाली पहुंचते पहुंचते बरसात होने लगी थी। पंकज सुबह से बरसात के बालहठ में लगा था आखिर उपरवाले ने अर्जी स्वीकार ही कर ली। रतनपुर से दो चार किलोमीटर आगे निकलने पर लैपटॉप के नेट ने नेटवर्क पकड़ लिया। बस बात बन गयी, दिन भर का अपडेट देखने का काम चलता रहा, साथ ही वेरना भी। चलती गाड़ी में जब फ़ेसबुक खोला जाए तो कमेंट करने में समस्या होती है, इसलिए माकूल कमेंट ढूंढ कर कापी पेस्ट करना पड़ता है। कभी-कभी चूक भी हो जाती है, कहीं का सामान कहीं और पहुंच जाता है। दिन भर की हाहाकार मेहनत के बाद अब एक नींद सुकून की चाहिए। अब एक नयी समस्या खड़ी हो गयी, दाढ के मसूडे में दर्द शुरु हो गया। लगा कि फ़िर वहीं कसाई के पास जाना पड़ेगा, जिसने एक बार पहले भी 1500 का फ़टका लगाया था। बिलासपुर पहुंच कर पहला काम एक  दर्द  निवारक टेबलेट लेने का किया। फ़ौरी तौर पर उससे कुछ राहत मिल गयी।

शिवमंदिर का पार्श्व भाग
हमारे घर पहुंचने तक खाना बन चुका था। खाना खाकर पंकज तो चले गया अपने दौलतखाने और हम अरविंद झा जी के गपियाते रहे। सुबह जाने की प्लागिंग करने लगे। बिलासपुर से सुबह साढे छ: बजे लोकल गाड़ी रायपुर को जाती है। उसी से जाने का मन बनाया। रात को मच्छरों के हमले से बचने के लिए पूरी व्यवस्था की गयी थी। पलंग के चारों तरफ़ कछूवा चल रहा था। तब भी मच्छरों का आतंक जारी था। उलटते-पलटते आँख लग गयी, सुबह छ: बजे का अलार्म सुनकर आँख खुली। हाथ मुंह धोकर हम स्टेशन पहुंच गए। वहाँ पहुच कर सोचा कि बिल्हा के पास का देवकिरारी का भग्न मंदिर भी देख लिया जाए। इसलिए सिर्फ़ बिल्हा तक की ही 3 रुपए की टिकिट ली। मुसाफ़िरी की दृष्टि से रेल्वे ही सबसे सस्ता साधन है। इससे सस्ता साधन भारत में और कोई दूसरा नहीं अधिक सस्ता चाहिए तो फ़िर 11 नम्बर की सवारी करनी पड़ेगी।

सप्तरथी सूर्य
ट्रेन में बैठते ही बरसात शुरु हो गयी। मुसलाधार बरसात होने लगी, अब बिना छतरी और रेनकोट के समस्या होने वाली थी। हमने बिल्हा में भाई साहब को बता दिया कि पुशपुल से आ रहे हैं, उनको भी उसी ट्रेन से रायपुर जाना था। बिल्हा स्टेशन पर वे रेनकोट धारण किए हुए मिले, लेकिन स्टेशन तक बाईक लेकर नहीं आए। गजब कर दिया, क्या करें अब बरसते पानी में घर तक पैदल ही जाना पड़ा। बिल्हा के पास के गाँव मोहभट्ठा में आज सावन सोमवारी का भंडारा था। भाभी जिद करने लगी कि मोहभट्ठा प्रसाद लेने जाना है। पर भगवान को मंजूर हो तब न, एक बार घर से निकले तो बरसात होने लगी, वापस आना पड़ा। अब जाने का मन नहीं हुआ। दोपहर बाद बरसात थमी तो बिल्हा से लगभग 5-6 किलोमीटर पर किरारी गोढी नामक गाँव गए। वहीं पर प्राचीन शिव मंदिर है।

गर्भ गृह
यह शिव मंदिर 12 शताब्दी में रतनपुर के कलचुरी राजाओं द्वारा निर्मित है। प्रस्तर निर्मित इस मंदिर का गर्भगृह एवं जंघा का कुछ भाग ही बचा है, बाकी काल की मार से बच न सका। पश्चिमाभिमुख इस मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है। जिसमें मूल जलहरी स्थापित है पर मंडप पूर्णत: नष्ट हो गया है। मूल संरचना के तल विन्यास में मंडप, अंतराल तथा गर्भगृह मुख्य अंग रहे हैं। उर्ध्व विन्यास पंचरथ प्रकार का है, अधिष्ठान भाग पर खुर, कुंभ, कलश संयोजित हैं। अवशिष्ट जंघा पर उर्ध्वक्रम में द्विस्तरीय देव प्रतिमाएं सयोजित हैं। अवशिष्ट जंघा पर शिव के विभिन्न स्वरुप, दिग्पाल, सुर-सुंदरियाँ, मिथुन युगल तथा अन्य अलंकार दिखाई देते हैं। य मंदिर कलचुरी कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट एवं अनुपम उदाहरण है। इस मंदिर की पूर्व दिशा का दीवाल ही बची है।

यायावर
मंदिर के अवशेष रखे हुए हैं। जिनमें विभिन्न मूर्तियां भी हैं। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। घनघोर बादल छाने के कारण बरसात होने के आसार बने हुए थे। मैने जल्दबाजी में ही कुछ चित्र लिए और बि्ल्हा आ गया। अब मेरी ट्रेन रायपुर के लिए 5 बजे थी। बिल्हा से रायपुर 18 रुपए की टिकिट ली। 5 बजे शाम को भी बिलासपुर से रायपुर पुशपुल जाती है। लोकल होने के कारण एक्सप्रेस और मेल गाड़ियों से भी जल्दी रायपुर पहुंचा देती है। रास्ते में शिवनाथ नदी जल से लबालब भरी उफ़नते हुए बह रही थी। एक दो चित्र लेते हुए आगे बढे। लोकल गाड़ी ने शाम को 7 बजे रायपुर पहुंचा दिया। घर पहुंचते तक नौ बज चुके थे। इस तरह एक और पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहरों की यात्रा निर्विघन सम्पन्न हो गयी।

रविवार, 26 सितंबर 2010

तेरे जैसा प्यार कहाँ-कितनी प्यारी है तू बहना-----------ललित शर्मा

बिल्हा स्टेशन में रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तभी मेरी निगाह बच्चों पर पड़ी। पास ही उनके माँ बाप किसी बात पर तू तू - मैं मैं कर रहे थे। शायद बच्चों की माँ रुमाल में बंधे कुछ रुपए कहीं गिरा आई थी। इसलिए उनमें तकरार हो रहा था। मजदूर परिवार के लिए 100-200 रुपए भी गुमना तकलीफ़ देह हो जाता है। लेकिन दोनो बच्चों का ध्यान उनकी तरफ़ नहीं था। दोनो बहन और भाई आपस में मशगुल थे। बहन अपने छोटे भाई बार-बार स्नेह से दुलार रही थी। मैं भी खड़ा हुआ देख रहा है। बचपन कितना निश्छल होता है, बहन छोटे भाई को बार-बार स्नेह से चूम रही थी। बहन बड़ी होने का फ़ायदा यह है कि लड़के को माँ और बहन दोनो का प्यार मिलता है। 
गाँव में लड़कियाँ बचपन से बच्चों को खिलाने की अभ्यस्त हो जाती हैं। माँ जब खेतों में काम पर चली जाती है तो छोटे भाई-बहनों की रेख-देख की जिम्मेदारी उस पर ही जाती है। 9-10 साल की बच्चियाँ भात-साग रांधना सीख जाती हैं। निंदाई-रोपाई के समय तो स्कूल से भी छुट्टी करके घर परिवार की देख भाल करनी पड़ती है। जिम्मेदारी निभाना बचपन से ही आ जाता है, खेलकूद की उमर में घर गृहस्थी संभालने का पाठ पढना पड़ जाता है। ऐसे ही जब भाई-बहन को देखा तो  मेरे से रहा नहीं गया, मैने चुपचाप उनकी तश्वीर अपने मोबाईल कैमरे में कैद कर ली। आप भी देखिए।