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रविवार, 27 सितंबर 2015

सैर कर गाफ़िल जहां कि जिन्दगानी फ़िर कहाँ ……

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 27 सितम्बर 1980 से विश्व पर्यटन दिवस मनाने की शुरुआत की थी। इस दिन 1970 में विश्व पर्यटन संगठन का संविधान स्वीकार किया गया था। इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रतिवर्ष विश्व पर्यटन दिवस की विषय वस्तु तय करती है। विश्व पर्यटन दिवस मनाने का उद्देश्य पर्यटन एवं उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं आर्थिक मूल्यों के प्रति विश्व समुदाय को जागरुक करना है साथ इसका मुख्य उद्देश्य पर्यटन को बढावा देना और पर्यटन के द्वारा अपने देश की आय को बढाना है। पिछले दो दशकों में पर्यटन के प्रति लोग जागरुक होते दिखाई दे रहे हैं और पर्यटन के लिए देश दुनिया की सैर भी करने लगे हैं। एक तरह से देखा जाए तो पर्यटन धनी लोगों का ही शौक रहा है, परन्तु वर्तमान में मध्यम वर्गीय लोग एवं परिवार भी पर्यटन के प्रति आकर्षित हुए हैं।

मनोरंजन एवं फ़ुरसत के क्षणों का आनंद उठाने से की गई यात्रा को पर्यटन कहा जाता है तथा पर्यटक उन्हें कहा गया है जो मनोरंजन के लिए यात्राएं करते हैं और कहीं स्थाई रुप से निवास नहीं बनाते एवं इस यात्रा के दौरान कहीं कमाई का पेशा नहीं करते। फ़कत जेब में धन राशि लेकर आते हैं और आनंद एवं मनोरंजन के लिए खर्च करते हैं। वर्तमान में विश्व में कई ऐसे देश हैं जिनकी अर्थ व्यवस्था सिर्फ़ पर्यटन पर ही निर्भर है। मलेशिया, फ़िलिपिंस, सिंगापुर, मयामी इत्यादि स्थान पर्यटकों के भरोसे ही आबाद हैं। वर्तमान में पर्यटन एक बड़े उद्योग के रुप में उभर कर सामने आया है। यही एक मात्र ऐसा व्यवसाय है जहाँ एक रुपए लगाने पर सौ गुनी आमदनी होती है। 

संयुक्त राष्ट्र संघ को पर्यटन दिवस के साथ वर्ष में किसी एक दिन को घुमक्कड़ दिवस भी धोषित करना चाहिए। मैं ठहरा विशुद्ध घुमक्कड़ जो देश दर्शन कर ज्ञानार्जन करने के लिए यात्राएं करता है। मेरा मानना है कि सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण से यात्राएँ महत्वपूर्ण हैं, प्रत्येक यात्री अपनी यात्रा से कुछ न कुछ शिक्षा अवश्य ग्रहण करता है तथा अपने अनुभवों को समाज तक पहुंचाता है। सभी यात्री अपने विवेकानुसार यात्राओं से ज्ञान पाते हैं। जो जितना अधिक संवेदनशील होगा वो उतना अधिक ज्ञान पाता है। भ्रमण शब्द में भ्रम भी समाविष्ट है। मैंने यह पाया है एक जिज्ञासु व्यक्ति द्वारा भ्रमण करने से भ्रम दूर होता है और उसकी सोच का दायरा विस्तृत होता है। सोच-समझ विकसित होने पर परिपक्वता आती है। किताबी ज्ञान के अतिरिक्त यात्राएँ ज्ञान प्राप्ति का सरल एवं सहज साधन हैं।

जिज्ञासु यात्री जब यात्रा पर चलता है तो बहुत सारी सुनी हुई बातें, देखी हुई चीजें एवं स्थानों के विषय में जानकारी एकत्र करता है। जिससे अनुभव पाकर जीवन को सहज बनाने के प्रति अग्रसर होता है। यात्राएँ तो सभी करते हैं पर यात्राओं को संजोने के लिए दृष्टि की आवश्यकता होती है। हम किसी स्थान के विषय में किताबों में लिखी हुई बातों से अधिक उस स्थान पर स्वयं जाकर देखने से अधिक समझ पाते हैं। अगर चीनी यात्री व्हेनसांग का यात्रा वृत्तांत नहीं होता तो हमें अपने इतिहास के विषय में बहुत सारी जानकारी नहीं मिलती। उसने यात्राओं के दौरान देखे-सीखे को अपने यात्रा लेख के माध्यम से संजोया। शताब्दियों उपरांत आज भी उसका लाभ विश्व को मिल रहा है।

एक सैलानी हूँ मैं, मन से तन से कर्म से और स्वभाव से भी। कहा जाए तो "अहर्निश यात्रामहे" की सुक्ति चरितार्थ होती है। तीर्थाटन करने बजाए मुझे देशाटन करना पसंद है। भारत भूमि पर ऐतिहासिक गौरव के चिन्ह पग-पग पर मिलने के साथ ही अद्भुत अकल्पनीय प्राकृतिक सुंदरता के दर्शन होते हैं। इस देश में 12 महीनों के दौरान हमें सारे मौसम मिल जाते हैं तो 12 कोस पर भाषा के साथ सांस्कृतिक बदलाव भी दिखाई देने लगता है। मैं अपने आप को पर्यटक की जगह घुमक्कड़ मानता हूँ, जिसे यायावर कहा जाता है। कभी भी, कहीं भी, किसी भी वक्त, किसी भी मौसम में बस घुमक्कड़ी हो जाए। जीवन भी चलने का ही नाम है, अगर ठहर गए तो कहते हैं कि जीवन यात्रा सम्पन्न हो गयी। जिसकी जीवन यात्रा सम्पन्न हो गई, उसकी यात्रा पर पूर्ण विराम लग जाता है। इसलिए जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक इस संसार को देखो। ईश्वर की बनाई इस अनुपम दुनिया को जानो, मेरा यही मानना है।

वर्तमान में घुमक्कड़ी के स्थान पर पर्यटन को अत्यधिक बढावा मिल रहा है। क्योंकि इससे नगद आमदनी होती है। इस अत्यधिक आमदनी को देखते हुए पर्यटन उद्योग में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी कूद पड़ी है। उनके पांच सितारा होटल बड़े पर्यटन स्थलों पर दिखाई देते हैं। पर्यटन का सीधा-सीधा अर्थ है कि जेब में पैसा होना चाहिए फ़िर आनंद करने लिए सारे सुख उपलब्ध होते हैं। वर्तमान में पर्यटन का यही स्वरुप सामने आया है। जो अपराधों को भी जन्म दे रहा है। विश्व में कई पर्यटन स्थल सिर्फ़ खाने-पीने जुए सट्टे एवं वेश्यवृत्ति के लिए बदनाम हैं। इससे सांस्कृतिक प्रदूषण भी फ़ैल रहा है। जहाँ धन आएगा वहाँ ये सब विकृतियाँ भी स्वत: पैदा हो जाती है। पर्यटन के साथ इस प्रदूषण के नियंत्रण करने का भी यत्न करना आवश्यक हो गया है। इसलिए सर्वश्रेष्ठ घुमक्क्डी को ही मानना चाहिए। 

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

तिब्बत से निर्वासन की टीस बाकी है आज तक ………

मैनपाट पर पहुचने पर एक स्थान पर दूर से ही हवा में लहराती हुई रंग बिरंगी पताकाएं दिखाई देने लगी। लगभग 12 बजने को थे। पताकाओं लिखे तिब्बती बौद्ध प्रार्थना मंत्र हवा के माध्यम से प्रसारित हो रहे थे। बस मुझे तो इस गाँव में पहुंचना है। साथियों को चेता दिया मैने। छत्तीसगढ अंचल में बनने वाले कवेलू और मिट्टी के घरों को चटक भड़कीले रंगो से पोता गया था। दूर से ही देखने से पता चल जाता है कि यह कोई तिब्बती बस्ती है। जब मैं धर्मशाला गया था तब वहाँ से लौटते हुए बस में एक तिब्बती सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर से मुलाकात हुई थी। रास्ते में धर्मशाला से खजियार तक मेरी उनसे तिब्बत के विषय पर चर्चा हुई। जिससे तिब्बतियों के विषय में भरपूर जानकारी मिली।
मोनेस्ट्री की दीवार पर तिब्बती भाषा
इस तिब्बतियों की बस्ती को कमलेश्वरपुर कह्ते हैं एवं शरणार्थियों की बसाहट के हिसाब से इसे कैम्प नम्बर 2 नाम दिया गया है। यहाँ प्रार्थना करने के लिए छोटा मठ भी है। मंदिर परिसर में मैने छोटे मनौती स्तूपों से लेकर एक दीवार पर निर्मित सहस्त्र बुद्ध प्रतिमाएं भी देखी। मैनपाट में तिब्बतियों के 7 कैम्प हैं। प्रत्येक कैम्प का एक मुखिया है और सभी 7 कैम्पों  का एक प्रधान मुखिया है। यहाँ से निर्वासित तिब्बती सरकार का एक सांसद चुना जाता है। शरणार्थी होने के कारण ये भारत के निर्वाचन में मतदान नहीं कर सकते। भारत में इनकी  कई पीढियाँ हो चुकी है फ़िर भी इन्होने बांग्लादेशियों  जैसे भारत की नागरिकता के लिए कोई आवेदन नहीं किया है। इनकी आशा अभी तक लगी हुई है कि चीन से तिब्बत को आजादी मिलने के बाद अपने वतन को वापस चले जाएगें।
तिब्बतियों के गाँव की सुनसान गली
इस कैम्प में मेरी मुलाकात तिब्बतियों के बुजुर्ग लोतेन से होती है। मैं गलियों में घुमते हुए उनके घर के पास पहुचता हूँ। टीन शेड का सुंदर मकान में बड़ा सा आंगन है। आँगन के भीतर एक मचान पर खाल में भुसा भरा हुआ बछड़ा रखा है। एक अरसे के बाद यह दृश्य देखने मिला। शावक की मौत होने पर भैंस या गाय दूध देना बंद कर देती  हैं। इसलिए उस शावक की खाल में भूसा भरवा कर उसके समक्ष रखने से भैंस और गाय दूध देने लगती हैं। इस बछड़े के पुतले का उपयोग इसी प्रयोजन से किया जाता है। एक मचान पर मक्का के भुट्टे सुखाने के लिए लटकाए हुए थे। आँगन में धान सुखाया हुआ था जिसे दो मजदूर बोरों में भरकर घर के भीतर रख रहे थे। इससे जाहिर होता है कि तिब्बती खेती करने में भी माहिर हैं।
सरसों की फ़सल एवं हवा में तैरती मंत्र पताकाएं
तिब्बतियों का यह गाँव सुनसान दिख रहा था। सिर्फ़ कुछ बुजुर्ग एवं कुछ बच्चे ही दिखाई दे रहे थे। मुझे देखकर लोतेन की  पत्नी कुर्सियाँ लेकर आती है और 1942 में तिब्बत के खम्नांचिन में जन्मे लोतेन मेरे पास आकर बैठ जाते हैं। उनसे चर्चा प्रारंभ होती है। वे बताते हैं कि तिब्बत 1961 में निर्वासित होने के बाद सबसे पहले वे नेपाल के मोनकोट में आए। उसके पश्चात 1963 में नेपाल से भारत में प्रवेश किया। इनके परिवार ने नेपाल से भारत में पैदल ही प्रवेश किया। तब भारत सरकार ने इन्हे शरणार्थी मान कर भारत में शरण दी। ठंडे प्रदेशों में रहने के कारण तिब्बतियों की भारत की गर्म जलवायु रास नहीं आई। जिससे कईयों की मृत्यु हो गयी। दलाई लामा के प्रयास से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भारत के प्रदेशों में ठंडे स्थान की खोज करवा कर वह स्थान इनके रहने के लिए आबंटित किए।
सहस्त्र बुद्ध 
उनमें से एक स्थान छत्तीसगढ का मैनपाट भी था। मैनपाट में तिब्बतियों की बसाहट 1965 में हुई। एक परिवार के 7 सदस्यों के हिसाब से इन्हे जीवन यापन के लिए 5 एकड़ भूमि दी गयी। मकान बनाकर देने के साथ 3 साल तक फ़्री राशन दिया गया। लोतेन भारत सरकार का आभार व्यक्त करते हैं। वे बताते हैं कि इन्होने ने यहाँ आलू, मक्का, टाऊ आदि की कम पानी की खपत वाली फ़सलें लगाना प्रारंभ किया। जिससे जीवन यापन होने लगा। साथ ही कालीन एवं स्वेटर का निर्माण का परम्परागत व्यवसाय भी प्रारंभ किया गया। महिलाएं हाथ से स्वेटर बनाकर अम्बिकापुर में बेचकर आती थी। अब हाथ की बनी मोटी स्वेटर को कोई पहनता नहीं है। इसलिए लुधियाना से मशीन की बनी हुई स्वेटर लाई जाती है। अभी गाँव के सारे जवान स्त्री पुरुष स्वेटर बेचने के लिए छत्तीसगढ एवं मध्य प्रदेश के अन्य शहरों में गए हुए हैं।
बौद्ध मठ  की पीठिका
लोतेन की उत्त्मार्ध चाय बनाकर ले आती हैं। चीनी बड़े-बड़े मग चाय के भरे हुए थे। एक कप चाय पीना कठिन था। लेकिन उनके आग्रह को देखते हुए चाय पीनी पड़ी। उन्होने बताया कि सारे कैम्पों मे। लगभग ढाई हजार तिब्बती निवास करते हैं। यहाँ पर परम्परागत तिब्बती औषधियों से युक्त अस्पताल भी है। जिसमें धर्मशाला से तिब्बती डॉक्टर आकर ईलाज करते  हैं। कैम्प नम्बर 1 में मुख्य मठ है जहाँ लामा निवास करते हैं। मुख्य धार्मिक कर्मकांड वहीं सम्पन्न कराए जाते हैं। उन्होने मुझे अपना और पत्नी का पासपोर्ट दिखाया जिसमें उनका  नाम पता एवं उम्र के साथ नेपाल के रास्ते पैदल भारत आने का विवरण दर्ज है। यह भारतीय पासपोर्ट इन्हे भारत का शरणार्थी होने का जिक्र करते हुए जारी किया गया।
लोतेन के साथ यायावर 
मै लोतेन से चर्चा कर रहा था और राहुल, पंकज एवं विष्णु वहाँ से गायब हो चुके थे। शायद मेरी और लोतेन की चर्चा उन्हे निरर्थक लगी होगी। क्योंकि यह चर्चा उनके कोई काम की नहीं थी। ये निर्वासित लोग बड़ी मेहनत के बाद परदेश में अपने जीवन की गाड़ी को पटरी पर लेकर आए हैं। एक बात गौर करने योग्य है। 50 बरस बाद भी इन लोगों ने अपनी भाषा, कर्मकांड, संस्कृति को नहीं छोड़ा है। मैनपाट में तिब्बतियों के लिए केन्द्रीय स्कुल है, जहाँ पढाई 8 वीं तक होती है इसके पश्चात आगे की कक्षाओं की पढाई के लिए हिमाचल प्रदेश स्थित धर्मशाला जाना पड़ता है। मैनपाट स्थित तिब्बतियों का संबंध इनकी निर्वासित सरकार के साथ सतत बना रहता है। उनके निर्देशों के अलावा भारत सरकार के कानूनों का पालन करते हैं। अपनी मिट्टी से उजड़ने का दर्द इनके मन को कचोटता है। दर्द इनकी आँखों में स्पष्ट झलकता है। भले ही यहाँ जन्म लेने वाली इनकी अगली पीढी ने तिब्बत नहीं देखा पर जंतर मंतर तक तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए इनकी आवाज गुंजती  है।
इहै है सिक्छा कर्मी परतापपुर के
लोतेन से विदा लेकर बाहर गली में निकला तो ये चारों गायब थे। गलियों में दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिए। मै पैदल ही पैदल मोनेस्ट्री तक आ गया। वहाँ लगी मूर्तियों को निहारने लगा। थोड़ा समय व्यतीत होने पर आगे बढा तो एक चौराहा दिखाई दिया। जहाँ सायकिल की दुकान पर कुछ तिब्बती युवा महफ़िल जमाए हुए थे। समीप ही आदिमजाति कल्याण विभाग का छात्रावास था। छात्रावास के मैदान में बड़ी बड़ी घास उगी हुई थी। वातावरण में ठंडक होने के कारण शिक्षक ने अपनी कुर्सी मैदान में ही डाल रखी थी। बच्चे सब खेल रहे थे। मैंने आश्रम परिसर में प्रवेश किया और शिक्षक के पास पहुंचा। उसने मेरे आगमन पर कोई ध्यान नहीं दिया। टेबल पर रखे रजिस्टर में कुछ लिखता रहा। चर्चा करने पर पता चला कि एक शिक्षा कर्मी है और प्रतापपुर से यहाँ पढाने के लिए आता है। इतनी देर में पंकज का फ़ोन आ गया कि वे गरम समोसे बनवा कर ला रहे हैं। थोड़ी देर में आ पहुंचे और हम टाईगर प्वांईट की ओर चल पड़े।

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बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

सिरपुर के बाजार की यादगार सैर ......Sirpur Chhattisgarh...... ललित शर्मा

राजमहल से महानदी का दृश्य 
प्राम्भ से पढ़ें 
विश्रामगृह से हम सिरपुर के ढाई हजार वर्ष पुराने मुख्य व्यापार केंद्र के लिए चल पड़े। बाजार में पहुँचते ही दुकानदारों-ग्राहकों का शोर सुनाई देने लगा। लोग-बाग़ हमे कौतुहल से देख रहे थे कि  किस नए ग्रह के प्राणी यहाँ आ टपके। ले जाइये ले जाइये 5 सेर धान में 1 सेर गुड ले जाइये। दीवाली छुट का भरपूर लाभ उठाइए। कपड़ों की दुकानों पर भीड़ नजर आ रही थी। रंग बिरंगे कपडे दुकानों की परछी में लटके हुए थे। चिमटा, चकला, बेलन ले लो, भिन्डी-भिन्डी दो सेर में पांच सेर,दो सेर में पांच सेर। बैगन का भाव कम हो गया है 1 सेर में 5 सेर लो, रस्ते का माल सस्ते में, रेलम-पेल मची थी। नाई, धोबी, मोची, सौन्दर्य प्रसाधन, मिठाई, सब्जी, पुस्तकों इत्यादि की दुकाने देखते हुए हम थोडा आगे बढे ही थे कि तीन मूंछ वाले पगड़ीधारियों ने घोड़ों पर आकर हमें आ घेरा। एक ने कडकती आवाज में मूंछे तान कर राजीव पर सवाल दागना शुरू कर दिया ........ कहाँ से आए हो, श्रीपुर में नए दिख रहे हो। मुसाफिरी दर्ज करवाई कि नहीं? मैं लेखक हूँ, कुछ माह पहले ही मेरी पुस्तक "आमचो बस्तर" आई है, जिसका विमोचन दिल्ली में मुख्यमंत्री ने किया है। आप मुझे नहीं पहचानते क्या? ...... राजीव ने भी प्रत्युत्तर में प्रश्न दाग दिया।

राजमहल के राजकुमार द्वय 
हम नहीं जानते किसी "आमचो बस्तर" और मुख्यमंत्री को। हमारे राज्य में तो सिर्फ राजा और प्रधानमंत्री होता है, समझे। बात न बनाओ, अपना परिचय पत्र दिखाओ, नहीं तो सड़ा दूंगा कारागार में। प्रहरियों की धमकी सुनकर प्रभात सिंह ने मोबाईल निकाल लिया, मैं समझ गया था कि अरुण शर्मा जी को फोनिया रहे हैं, दो तीन बार प्रयास करने के बाद फोन नहीं लगा ....... मोबाईल का टावर भी संकट के समय धोखा देता है। प्रहरियों का सवाल जवाब सुनकर आदित्य सिंह को गुस्सा चढ़ गया। वे भी राज परिवार से सम्बन्ध रखते हैं और प्रहरियों की बदतमीजी से क्रोध आना स्वाभाविक ही था। तुम लोगों की खाल खिंचवा कर भूसा भरवा दूंगा। मेरा भी नाम कुँवर आदित्य सिंह है। जाकर तुम्हारे कोतवाल को बता देना। मेरे मेहमानों की पूछताछ करने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? ...... कहकर आदित्य सिंह ने अपनी खड्ग खींच ली।

 बाजार में ब्लॉगर 
ये लो हो गया पंगा। जहाँ जाओ वहीँ कुछ न कुछ हो जाता है। हम कहाँ बाजार घुमने आए थे और यहाँ तलवार बाजी शुरू हो गयी। मैंने बीच बचाव करते हुए कहा- सुनो हवलदार साहेब ! काहे फालतू मगजमारी करते हो, दो-चार रुपए पकड़ो चाय-पानी के लिए और अपने रास्ते लगो। हवलदार के चहरे पर चमक आ गयी दो-चार रूपये का नाम सुनकर। कोने में ले जा कर मैंने उसे 5 रुपए दिए और कहा - ये रखो 5 रुपए और इन दोनों प्रहरियों को हमारी सुरक्षा में लगा दो, बाजार में दादा लोगों का बहुत खतरा है। हवलदार ने कुटिल नागरी मुस्कान फेंकते हुए कहा- हम तो आपकी मूछों की कदर करते है। जब तक आप श्रीपुर में रहेगे, दोनों  प्रहरी आपकी सेवा में रहेगें, अन्य कोई सेवा हो तो कलदार के साथ संदेसा भेजिएगा, सेवा में हाजिर हो जाऊंगा। जरुर- जरुर, तुम कलदार की चिंता मत करना, जितना चाहिए उतना मिलेगा पर कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। अब दो प्रहरियों की सुरक्षा में हम बाजार भ्रमण करने लगे, एक प्रहरी भाला लेकर अगुवाई और दूसरा खड्ग लेकर पिछुवाई कर रहा था।

बाट जोहती युवतियाँ 
राजीव ने कहा कि किसी मूर्तियों कि दुकान में ले चलो, मुझे वहां अपनी उपन्यास की नायिका के आभूषणों चयन करना है। प्रहरी मुख्य मार्ग से उत्तर दिशा में चलकर एक दुकान से सामने खड़े हो गए। दुकान भव्य और दुमंजली थी। सामने मोटे कपडे की परछी में कुछ कारीगर मूर्तियों को झाड- पोंछ रहे थे। बड़ी सी मारवाड़ी पगड़ी बांधे अधेड़ श्रेष्ठी गद्दी पर बैठा हुआ था, पास ही बैठा मुनीम तख्ती पर हिसाब लिख रहा था।  प्रहरी के साथ हमें देख कर बाहर निकला और हाथ जोड़ कर नमस्कार किया तथा  प्रहरी को बोला - क्या गलती हो गयी हवलदार साहब जो आपको यहाँ तक आना पड़ा, किसी से कहलवा दिया होता तो मैं स्वयं चौकी में हाजिर हो जाता। गलती कुछ नहीं हुयी है, हमारे राज्य में वीआईपी मेहमान आए हैं इसलिए इनके साथ हमें आना पड़ा। आप इन्हें मूर्ति दिखाइए। श्रेष्ठी ने तत्परता से हमे आसन दिया और परिचारक को कहा कि - छोटी श्रेष्ठनी से बढ़िया गुलाब वाली लस्सी बनवा कर लाओ।

दर्जी को नाप जोख के साथ कपडे देते हुए 
हम मूर्तियाँ देखने लगे, राजीव ने एक मूर्ति उठाई, उसके अलंकरण प्रभावशाली थे। मूर्ति एकाध हाथ लम्बाई की रही होगी। आभूषणों से किसी अप्सरा की प्रतिमा मालूम हो रही थी। माथे पर टीका, कानों में खिनवा, नाक में फुल्ली, माथे पर टिकुली, गले में लछमी हार, जुड़े में खोपा फुंदरा, कलाइयों में बघमुही, अंगुलियों में मुंदरी,   भुजाओं में नागमोरी, कमर में करधन, पैरों में कटहर तोड़ा, पैर की अँगुलियों में कोतरी पहने अप्सरा वस्त्राभूषण से कोसल प्रदेश की कोई अनिन्द्य सुंदरी दिख रही थी। प्रभात सिंह ने एक प्रतिमा हाथ में लेकर बताया कि यह बौद्धों की देवी हारिति हैं, महिषासुरमर्दनी, अम्रिका, तारा, चामुंडा, गौरी के साथ अन्य यक्ष एवं यक्षणियों प्रतिमाएं भी उपलब्ध थी। राजीव को अप्सरा की ही प्रतिमा पसंद आई। श्रेष्ठी ध्यान से देख रहा था जैसे ही उसे लगा कि प्रतिमा पसंद आ गयी और ग्राहक फंस गया है, उसने तुरंत हांक लगाई ........ अरे! अभी तक लस्सी नहीं लाया कितनी देर हो गई, जल्दी ला।

केश कर्तनालय 
परदे के पीछे से आवाज आई ......अभी लाया। थोड़ी देर में परदा हिला ...... नौकर एक बड़े सागर में लस्सी भरकर लाया, साथ में मिटटी के भिगाए हुए कुल्हड़ भी। कुल्हड़ों में सबको लस्सी दी गयी, आ हा लस्सी में गुलाब की सुवास के साथ गुड के मिठास के कहने ही क्या हैं, आ हा की ध्वनि सुनकर पर्दा हिला, रूपसी का चेहरा दिखा, समझ गया कि यही छोटी श्रेष्ठनी है, लस्सी की तारीफ सुनने झांक रही है,...... बहुत ही जायकेदार लस्सी बनी है देवी ........धन्य हो तुम - मेरे ऐसा कहते ही श्रेष्ठी ने परदे की तरफ देखा और चिल्लाया - कितनी बार कहा है तुमसे की ग्राहकों के सामने न आया करो, चलो यहाँ से। परदा धीरे से हिला और श्रेष्ठनी शायद चली गयी। कम उम्र की ही लगी, तभी श्रेष्ठी को अधिक चिंता थी ग्राहकों की। दाम बताइए, बहुत विलम्ब हो गया है हमे। अभी तीवरदेव विहार भी जाना है। सारा समय बाजार में ही व्यतीत हो जायेगा तो रात का खाना तुम खिलाने से रहे- आदित्य सिंह ने कहा।

चरण पादुका चिकित्सालय 
इस मूर्ति के दाम 80 खंडी धान है-श्रेष्ठी ने कहा। राजीव ने कहा- हम परदेशी कहाँ धान-वान लेकर घूमेंगे। रुपए बताओ कितने लोगे? मुनीम ने हिसाब लगा कर बताया की 4 रुपए लगेंगे। ये तो मौज हो गयी, 4 रुपए देकर मूर्ति अपने झोले के हवाले की और जैसे ही मैं जाने के लिए मुड़ा गवाक्ष से झांक रही श्रेष्ठनी पर दृष्टि पड़ ही गयी। चलो रे भाई अभी तो यहाँ से, फिर कभी आयेगे, अपना दाना-पानी लिखा है लगता है श्रेष्ठनी के हाथ का। मैंने श्रेष्ठी से पूछ ही लिया कि ये मूर्तियाँ यहीं तैयार होती हैं क्या? नहीं! मैं इन्हें शिल्पकारों से खरीदता हूँ और इसके बदले उन्हें कच्चा माल देता हूँ। शिल्पकारों के घर चौराहे के समीप है। वहां तीन-तीन मंजिल के जो घर दिखाई देंगे वाही शिल्पकारों के है। प्रथम तल में कारखाना है और ऊपर निवास। हमने श्रेष्ठी से विदा ली, प्रहरी ऊँघ रहे थे। हमारे दुकान से निकलते ही सजग हो गए। हम नदी की तरफ चल पड़े।

मिठाई खाई-खजानी की दुकान 
महानदी किनारे पर बहुत सारी छोटी डोंगिया एवं बड़ी नौकाएँ खड़ी थी, नौकाओं से यात्री उतर रहे थे, मालवाहक नौकाओं से सामान उतारा जा रहा था। खूब रेलम पेल मची थी। सडक के किनारे कुछ बौद्ध भिक्षु बैठ कर मन्त्र जाप वाली चकरी फिरा रहे थे। एक जगह भीड़ लगी थी, कुछ लम्बे चोगे पहने सिर पर कपडे को रस्सी से बांधे लोग दिखाई दिए। ऐसी  पोशाक को अरब के देशों में पहनी जाती हे, ये सिरपुर में क्या कर हैं? पास ही डोंगी में बोरियां लाद रहे मजदूर ने बताया कि अरबी लोग यहाँ से चावल इत्यादि लेकर जाते हैं, ये चावल के व्यापारी हैं। अपनी नौकाओं में नमक, खजूर का गुड इत्यादि भरकर लाते हैं। मजदूर से बातें हो रही थी, इसी बीच घंटा बजने की ध्वनि सुनाई दी। प्रहरी ने बताया कि श्रीपुर में प्रति पहर घंटा बजा कर समय की सूचना दी जाती है। यह व्यवस्था राज्य शासन की तरफ से है। सूरज के घोड़े पश्चिम की तरफ दौड़ रहे थे, राजीव ने 2-2 रुपए प्रहरियों को भेंट किए और उन्हें जाने को कहा। देखो कोई भी जमाना हो कलदारों की मधुर खनक कौन नहीं सुनना चाहेगा, 9 रूपए में मौज हो गई न - मित्रों से कहा। काका बड़ा न भैया-सबसे बड़ा रुपैया ......... प्रत्येक काल में मानव का सच्चा साथी।
कम्पनी वाली बाई और हिरामन 
बाजार में रौनक लगी हुयी थी, इक्के वाले, घोड़े वाले, रथ वाले, गाड़ीवान बाजार के बीच में बने पड़ाव में डेरा डाले चोंगी धूक रहे थे। फुरसतिया निठाल्लाई चल रही थी, इन्हें देख कर मुझे फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी तीसरी कसम के पात्र हिरामन का स्मरण हो आया पर कम्पनी वाली बाई नहीं दिखी। हम तीसरी कसम की चर्चा कर ही रहे थे तभी दो सजी-धजी युवतियां एक चाकर के साथ प्रगट  हुयी। उन्हें देखते ही सभी लोगों ने झुण्ड लगा दिया। आखिर एक रथवान से किराया तय हो गया। मैंने प्रभात सिंह से इनके विषय में पूछा तो उसने बताया कि ये किसबिन डेरा की सवारी है। शाम के वक्त वहाँ खूब रौनक रहती है। नाच-गान मनोरंजन के साधन तो मन बहलाने के लिए हर युग में होते हैं। किसबिन डेरा यहाँ से लगभग 10 मील की दुरी पर है। हमारा भी ज्ञानवर्धन हुआ। सफ़र में एकाध ज्ञानी भी रहना आवश्यक होता है, बहुत सारी समस्याओं का हल एवं जिज्ञासाओं का समाधान स्वमेव निकल आता है। किसबिन डेरा फिर कभी चलेंगे आदित्य सिंह ने आश्वासन दिया। मेरा दिल-ओ-दिमाग गुलाब की लस्सी से तर हो चुका था। रह-रह कर होठों पर लस्सी की मिठास आ रही थी।

परम्परागत शिल्पकार - लोहार 
चौराहे के समीप ही भव्य तीन तल्ला भवन था, जिसके प्रथम तल में कारखाना चल रहा था। घनो एवं हथोडों की लयबद्ध ध्वनि वातावरण में मधुरता घोल रही थी। पसीने से तरबतर लोहा गलाने की 4 भट्ठियों पर कारीगर कार्यरत थे। कुछ कारीगर सामने परछी में छोटी भट्ठी में औजार बना रहे थे। हल के फाल, सुमेला, धूरी, असकुड, रांपा, कुदाली, गैंती, हंसिया, चिमटा, चाकू, छूरी, तलवार, भाला, तीर, बघनखा, शिरस्त्राण, कवच, जंजीरें इत्यादि सामानों का ढेर लगा था। परछी के सामने ही बड़ा सा पानी का हौद था, जिसमे लोहे के सामान को गर्म करके पजाया (टेम्पर) दिया जा रहा था। उन्होंने बताया कि तलवार को कई पानी दिया जाता है फिर कई बार पीट कर स्वरूप में लाया जाता है। ऊपर वाले तल पर युद्ध सामग्री का भंडार था। सैनिक सामान यही पर मिलता है, कई सैनिक दिखाई दिए जो स्वयं के लिए उपयुक्त हथियारों की तलाश में आए थे। आयुध भंडार में मुझे आश्चर्यचकित करने वाली चीज दिखाई दी। मुख्य कारीगर से पूछने पर उसने बताया कि इसे शतघ्नी कहते हैं।इसका अविष्कार हमारे कारखाने में हुआ है, युद्ध के लिए बहुत ही संहारक एवं प्रहारक आयुध है। राजीव ने कहा कि यह तो वर्तमान ज़माने की तोप है। इतिहासकार कहते हैं कि तोप का अविष्कार अरब देशों में हुआ। पर यह तो शतघ्नी के रूप में श्रीपुर में दिखाई दे रही है।

परम्परागत शिल्पकार - तमेर (ताम्रकार)
चौक के परली तरफ बहुत सारे हंडे, थाली, कटोरे, कचोले, बटलोही, इत्यादि एक दुकान में रखे हुए थे। यहाँ बर्तन बनाने के कारखाना चल रहा था। दो तमेर तांबे की चादर को पीट कर बढ़ा रहे थे, हथोड़े की मार से गर्म चादर फैलते जा रही थी। फिर उसे लोहे के दो बेलनो के बीच दबाव गुजारा गया। फिर उसे "गेज" से नाप कर देखा गया। कारीगर ने बताया कि इस पर राजाओं की प्रशस्तियाँ लिखी जाती हैं, राजाज्ञा भी इन्ही ताम्रपत्रों पर टंकित होती है। हम ताम्रपत्र बनाने के साथ इस पर अंकन भी करते हैं। बहुत काम बाकी है, फिर कभी अवकाश मिलने पर चर्चा करेंगे कह कर तमेर ने हम निठल्लों से पीछा छुड़ाया। प्रभात सिंह ने बताया कि महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रपत्र और मुहरें यहीं तैयार होती हैं। वह नंदी के साथ गज लक्ष्मी के चित्र वाली बड़ी मुहर यही बनी थी। तभी तमेर बड़े ठसके में था, सीधे राजा के ही सम्पर्क में रहने से इतनी  ठसक तो बनती है।

प्राचीन युद्ध कला का प्रदर्शन 
बाजार से नगर की और लौटते हुए रास्ते में दो बरगद के वृक्ष दिखाई दिए, यहाँ भिक्षुओं की रेलमपेल मची थी। कुछ वृक्ष के नीचे ध्यान लगाये निर्वाण की मुद्रा में बैठे थे। कषाय वस्त्रों में घुटे हुए सिर सूरज की पश्चिमामुख आभा से दमक रहे थे। एक तरफ युवा बौद्ध साधू युद्ध विद्या का प्रदर्शन कर रहे थे। प्रभात सिंह ने बताया कि इस वृक्ष की कलम बोधगया से लाकर किसी भिक्षु ने इस स्थान पर लगाई थी। तब से यह पवित्र वृक्ष बौद्धों की श्रद्धा एवं आस्था का केंद्र बना हुआ है। अन्य प्रदेशों से आने वाले बौद्ध इस वृक्ष का दर्शन करना नहीं भूलते। वृक्ष के समीप ही कुछ चित्रकारों की दुकाने सजी थी। वे बरगद के पत्तों पर भगवान बुद्ध का चित्र बनाकर बेच रहे थे। मैंने प्रभात सिंह से कहा कि भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति तो पीपल के वृक्ष के नीचे हुयी थी और यहाँ बरगद का वृक्ष बता रहे हैं। सर ! बरगद हो या पीपल हैं तो एक ही प्रजाति के, दोनों की ही मान्यता हिन्दू धर्म शास्त्रों में एक जैसी ही है। बरगद की छाँव में भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है। धर्म और आस्था बहस का विषय नहीं, मान्यता का है ..... राजीव ने फुलझड़ी छोड़ी।

पंच कर्म - आयुर्वैदिक चिकित्सा 
पास ही बड़े से घर के बाहर बड़ी-बड़ी खरल रखी थी, उनमे कुछ लोग जड़ी-बूटी खरल कर रहे थे। प्रथम दृष्टया ही लग गया कि यह भैषेजिक केंद्र है। मरीजों की भीड़ थी, कुछ विदेशी भी दिखाई दे रहे थे। हम भी कौतुहलवश जा पहुचे। तो वहां के प्रहरी ने बताया कि यहाँ रसकर्म, पंचकर्म, आर्युवैदिक स्नान, शल्य क्रिया द्वारा रोगों का शमन किया जाता है। यहाँ के भैषजाचार्य अत्याधुनिक पद्धति से समस्त रोगों की चिकित्सा करते हैं। विदेशियों के विषय में पूछने पर बताया कि अरबदेश, इजिप्त, मेसोपोटामिया, बाली, जावा, सुमात्रा इत्यादि से रोगी आकर चिकित्सा लाभ लेते हैं तथा चिकित्सा पद्धति का अध्ययन भी करते हैं, यहाँ के स्नातक विदेशो में अपनी सेवाए दे रहे हैं। मैंने राजीव से चित्र लेने कहा तो उसके कैमरे की बैटरी ने धोखा दे दिया। मुझे अत्यधिक खेद हुआ, अन्यथा सभी चित्र आपको देखने मिलते। टहलते हुए बाजार क्षेत्र से हम अपनी कार तक पहुच गए। अब यहाँ से हमें तीवरदेव विहार जाना था। जारी है .......... आगे पढ़ें .........

सोमवार, 27 अगस्त 2012

चैतुरगढ: मैं कहता हौं आँखन की देखी -- ललित शर्मा

पंकज सिंह
पाली शिवमंदिर में चैतुरगढ जाने वाली सड़क की स्थिति की पूछताछ करने पर संतोष त्रिपाठी ने कहा कि सड़क की स्थिति तो खराब है। बरसात होने के कारण सड़क जगह-जगह से कट गयी है। चैतुरगढ में पहाड़ी पर चलभाष भी काम नहीं करता। वहां केन्द्रीय पुरातत्व विभाग का जो कर्मचारी है उसे जब भी बात करनी होती है तो नीचे आकर सम्पर्क करता है। अभी उससे सम्पर्क भी नहीं हो पाएगा, अन्यथा मार्ग की दशा का पता कर लेते। चैतुरगढ जाने की योजना पर पानी फ़िरते दिखाई दे रहा था। अगर रास्ता ही खराब है तो जाने से तेल फ़ूंकने के अलावा कुछ हासिल नहीं होने वाला। हम आपस में विमर्श करने लगे कि क्या करें, क्या न करें? जाएं की नहीं? तभी संतोष ने कहा कि जाईए, विलम्ब न करें। माता का नाम लेकर आगे बढिए, दर्शन होना लिखा है तो होकर ही रहेगा। उनकी बात हमें जंच गयी और हम अविलंब आगे बढ गए।

रफ़्तार में जंगल
पाली से चैतुरगढ लगभग 30 किलोमीटर है। 22 किलोमीटर कोलतार की सड़क पर चलने के बाद 8 किलोमीटर कच्ची सड़क पर चलना पड़ता है। अब हमने तय ही कर लिया जाने का तो जो होगा वह देखा जाएगा। झा जी की खुमारी अभी तक उतरी नहीं थी। सुबह से ही अलसाए पड़े थे, दोपहर के भोजन के बाद खुमारी द्विगुणित हो गयी। कार चल रही थी और मैने कैमरा साध लिया, जंगल का रास्ता है कब क्या दृश्य देखने मिल जाए और उसे कैद करने का अरमान अधूरा रह जाए। इसलिए हथियार हमेशा हाथ में लेकर सजग रहने की आवश्यकता थी। जंगल के रास्ते पर चलना सुखदायी रहता है। अधिक ट्रैफ़िक भी नहीं रहता और प्राकृतिक छटाएं मन को शांति देती हैं। शहरवासी प्रकृति के निकट आकर सुकून पाता है। प्रकृति से जुड़ाव महसूस करता है। हमारे साथ चलते साल के वृक्षों के बीच से लहराती बलखाती सड़क इठला रही थी। नालों में बहता बरसाती जल अपने जीवित होने को प्रमाणित कर रहा था। वातावरण में ठंडक देख कर पंकज एसी बंद कर देता है।

जंगल में रफ़्तार
FM रेडियो की तरंगे यहाँ पर मिल रही थी, चैनल बदल-बदल कर हम पुराने गीत ढूंढ रहे थे। तभी एक चैनल ने बजाया, सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया होतो हर कोई बांचे, भाग न बांचै कोय। सजनवा बैरी हो गए हमार। वाह! प्रकृति के साथ संगीत की ताल और लय मिल जाना रोमांचित कर जाता है। कहाँ सजनवा और कहाँ सजनी? कोयलिया की कूक भी सुनाई देने लगी। सोचने लगा कि अभी कौन से आम बौराए हैं जो कोयलिया कूक रही है। विहंग को कौन बांध पाया है? वे कोई मानव नहीं? किसी प्रांत के एपीएल, बीपीएल कार्डधारी लाभार्थी नागरिक नहीं। जो किसी के बंधन में बंध कर परतंत्र हो जाएगें। इनका तो जीवन स्वतंत्र है। स्वतंत्र जन्मे और स्वतंत्र मरें। परतंत्रता तो इन्हे पल की नहीं सुहाती। न ही सीमा पार करने के लिए किसी सरकार के अनुज्ञा-पत्र की दरकार होती है। जब चाहें तब पंख फ़ड़फ़ड़ाए और उड़ जाते हैं। जब मन में आए तो गाने लगते हैं। काश! विहंग सा जीवन ही क्षण भर को मिल जाए तो मन करता है पूरा एक जीवन ही जी लूं।

जा रे मेरा संदे्शा ले जारे
नदी-नाले, पहाड़, वन, समुद्र में ऐसा आकर्षण है कि जो मुझे हमेशा अपनी ओर खींचते हैं। मन गोह बनकर यहां चिपक जाता है, छोड़ना ही नहीं चाहता इन्हें। बस यहीं एक कुटिया हो जाए और रम जाएं। भौतिकता से उबने पर आध्यात्म जागृत होता है। चिंतन चलते रहता और हाथ में कैमरा धरे-धरे ही भीतर उतर जाता हूँ। न सड़क दिखाई देती है और न सहयात्री। सहसा तंद्रा टूटती है, रेड़ियो पर गाना बजते-बजते प्रहसन सुनाई देने लगता है। पंकज एसी को फ़िर से चालु कर देता है। हल्की सी उमस होने लगी। पहाड़ों पर घटांए उमड़ने-घुमड़ने लगी। घटाटोप अंधकार छाने लगा। वृक्षों के तनों पर, जंगल में पड़ी हुई सूखी लकड़ियों पर हरी काई जमी हुई है। यहाँ तक की मील के पत्थरों को भी काई ने ढक लिया है। मील के पत्थर अब मंजिल का पता नहीं देते। इससे अहसास होता है कि जंगल में बारिश लगातार हो रही है और महीनों से धूप नहीं निकली है। अन्यथा मील के पत्थरों पर काई नहीं जमती।

लकड़ी की घंटी
पहले वनों में जंगली जानवर दिन में ही दिखाई दे जाते थे। अब रात में भी नहीं दिखते। मानव ने वनों का बेतहाशा नुकसान किया। वनों की समाप्ति पर जानवरों का प्राकृतिक रहवास खत्म हो गया। इससे साथ-साथ जानवर भी खत्म होने के कगार पर हैं। जंगली वृक्षों एवं वनस्पतियों की एवं वनचरों की कई प्रजातियाँ तो विलुप्त ही हो गयी। एक दिन ऐसा आएगा जब वन भी दिखाई नहीं देगें। फ़िर कभी अगले जन्म में मेरे जैसा कोई यायावर यहाँ आएगा तो जो कुछ मैने यहाँ देखा है उसे वह दिखाई नहीं देने वाला। गोधूलि वेला होने को है, वनों में चरने गए पालतु पशु लौट रहे हैं। गायों के गले में बंधी काठ की घंटियों से मधुर स्वर लहरियां निकल रही हैं। साथ में चरवाहा भी कमर में बांसुरी खोंसे हुए सिर पर खुमरी ओढे पीछे-पीछे चला आ रहा है। न चरवाहे के पास घड़ी है न गायों के पास। समय की जानकारी देने के लिए सिर पर सूरज भी नहीं। इनकी जैविक घड़ी ही घर लौटने का समय बताती है और ये सब घर को लौट चलते हैं।

चैतुरगढ का मार्ग
हमें पक्की सड़क पर चलते हुए एक तिराहा दिखाई दिया। जहाँ से दांए तरफ़ कच्चा रास्ता जाता है। वहीं पर एक सूचना फ़लक लगा है जिस पर लिखा है, चैतुरगढ दूरी 8 किलोमीटर। हम सही रास्ते पर थे। तिराहे पर एक किराने की दुकान है, जहाँ युवा दुकानदार अपनी मोटर सायकिल में पैट्रोल डाल रहा था। वहीं पर एक बाबा अपनी पोती के साथ खड़े थे। मैने उनसे आगे के रास्ते की दशा पूछी तो कहने लगे की गाड़ी जा सकती है। रास्ता को खराब दिख रहा था, परन्तु हमें चैतुरगढ जाने की जिद थी। आगे बढने पर सड़क पर बड़े-बड़े बोल्डर पड़े दिखे और साथ में गड्ढे भी।

बाबा और नातिन
कमांडर जीप दिखाई दी। ड्रायवर ने बताया कि उनकी जीप ही बड़ी कठिनाई से निकल कर आ रही है। आपकी वेरना तो नहीं जा सकती। हाँ जहाँ तक कार जाए वहां तक आप चले जाईए और वहाँ से आप पैदल जा सकते हैं। कई लोग गाड़ी खड़ी करके पैदल जा रहे हैं। अधिक रात होने पर भालुओं का खतरा है। हमने ठान लिया कि जहाँ तक कार जाएगी वहाँ तक जाएगें, फ़िर आगे पैदल जा सकते हैं। लेकिन चैतुरगढ आज जाना ही है।हम उबड़-खाबड़ रास्ते पर नयी-नवेली कमसिन नाजुक वेरना के साथ जोर-जबरदस्ती करते हुए अपनी जिद में आगे बढ गए। दो किलोमीटर चलने के बाद आसमान में एक बार फ़िर से अंधेरा छा गया। लगने लगा कि जम कर बरसात होगी।

नाले से लौटते हुए
सुबह के झगड़े और शाम की बारिश का पता नहीं कब तक चले? 4 किलोमीटर जाने पर एक छोटा नाला दिखाई दिया, वहीं पर कार रोकनी पड़ी। पंकज और अरविंद गाड़ी निकालने का रास्ता देखने लगे और मैं फ़ोटो लेने लगा। वहीं पास के साल वृक्ष पर सुंदर आर्किड लगे थे। दोनो अभियंताओं नें आकर निर्णय दिया कि कार वहाँ से आगे नहीं निकल सकती। फ़ावड़ा होता तो एक बार रास्ता बनाया जा सकता था। बरसात होने लगी थी, हमने भारी मन से लौटने का फ़ैसला किया। इतनी दूर आने के बाद भी चैतुरगढ के एतिहासिक स्थल को न देख पाने हमें खेद रहेगा। लेकिन हिम्मत नहीं हारी थी। तिराहे पर वापस आकर दुकानदार से उसकी बाईक मांगने का इरादा बनाकर हम तिराहे की तरफ़ लौट गए। आगे पढें……

शनिवार, 28 जुलाई 2012

गड़ा खजाना मिला मुझे ------------------- ललित शर्मा

मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
रती के कोने-कोने में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं,छत्तीसगढ भी इससे अछूता नहीं है। यहां पग-पग पर पुरावशेष मिल जाते हैं। धरती की कोख में खजाने गड़े हुए हैं, हम यह किस्से कहानियों में सुनते आए हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजाओं के खजाने सुरक्षित रखने की दृष्टि से धरती में या गिरि कंदराओं में छिपाए जाते थे। पृथ्वी में गड़े पुरावशेष भी किसी गड़े हुए खजाने से कम नहीं है। जब यह खजाना बाहर आता है तो अपने काल के सारे किस्से उगल देते हैं।

चौरस मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
ऐसा ही एक पुरातात्विक खजाना उगलने को तैयार है 21N05 81E46 अक्षांश-देशांश पर जिला रायपुर छत्तीसगढ के अभनपुर जनपद एवं नगर पंचायत का राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर बसा हुआ ग्राम बड़े उरला। इस गांव को लगभग200-250 वर्ष पूर्व बोधवा गौंटिया द्वारा बसाया था। इनके परिवार के 40-45 घर अभी भी यहाँ निवास करते हैं। इनके वंशज 60 वर्षिय हृदय लाल गिलहरे (गुरुजी) सेवानिवृत व्याख्याता है। ग्रामाधारित विषयों पर हमेशा इनसे चर्चा होते रहती है। उन्होने बताया कि उरला गाँव कुल रकबा (छोटे उरला एवं बड़े उरला) 1800 एकड़ का है। इनके पूर्वजों ने गाँव में ईशान कोण में दर्री तालब एवं पूर्व में बंधवा तालाब बनवाया था।


हृदयलाल गिलहरे(गुरुजी) पार्श्व में ठाकुर देव

शासकों द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से बनाए जाने वाले दुर्गों (किलों) में गिरि दुर्ग, जल दुर्ग एवं धूलि दुर्ग (मडफ़ोर्ट) प्रमुख हैं। 26 जुलाई 2012 को गुरुजी से हसदा के मडफ़ोर्ट के विषय में चर्चा हो रही थी, तो वे मुझे गाँव के पूर्व में स्थित डीह (टीला) दिखाने ले आए। शाम के समय मैंने यहाँ की संरचना देखी। देखते ही अहसास हो गया कि यह एक मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) है। मुझे गांव की पूर्व दिशा में मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) के अवशेष के साथ पुरातात्विक प्रमाणो की जानकारी मिली। इस स्थान पर मैं बचपन से जाता रहा हूँ। यहाँ पर सैकड़ों साल पुराना विशाल पीपल का वृक्ष हुआ करता था।

डीह पर स्थापित ठाकुर देव
जिसकी गोलाई लगभग 30 फ़ुट रही होगी। गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि यह वृक्ष कितना पुराना है यह किसी को नहीं पता। इस स्थान को देखने पर पता चलता है कि यहां चारों तरफ़ लगभग 15 फ़ुट चौड़ी एवं 20 फ़ुट गहरी खाई है। इस मडफ़ोर्ट के पूर्व एवं पश्चिम के द्वार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उत्तर-दक्षिण के द्वार गुगल इमेज से दिखाई देते हैं। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण ग्रामवासी इसे "डीह" ( टीला या ऊंचा स्थान) कहते हैं। डीह के आग्नेय कोण में पीपल के वृक्ष के नीचे सर्वमान्य प्रमुख ग्राम देवता ठाकुर देव का स्थान है। यहाँ सदियों से किसान अक्ति (अक्षय तृतीया) को दोना में धान चढाते हैं और पूजा अर्चना करके खेती-किसानी की शुरुआत करते हैं।

पूर्व दिशा में मड फ़ोर्ट की खाई
डीह की पूर्व दिशा में किसान के खेत में एक गड्ढा है जिसमें बरसात होने के कारण पानी भरा हुआ है। गुरुजी कहते हैं कि यह सुरंग हैं, जब कोई सगा मेहमान गाँव में आता था उनके दादा उसे यह सुरंग दिखाने के लिए लाते थे। सुरंग के पास लेट्राईट में खोदे हुए 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे हैं। ऐसे ही गड्ढे बावड़ी के पास भी बने हुए हैं। सुरंग से लगभग 700 फ़ुट की दूरी पर एक 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी है। जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। बड़े उरला के प्रवेश में 1942 में गिरधारी कहार (तत्कालीन गौंटिया) द्वारा बनाया गया पंचमुखी शिवालय भी है। गाँव के ईशान कोण में दर्री तालाब के किनारे शीतला मंदिर है और डीह के ईशान कोण में सतबहनिया देवी है। डीह के पश्चिम एवं गांव के पूर्व में सांहड़ा देव है। डीह के पूर्व में भैंसासुर है। किसानों के आधिपत्य में होने के कारण डीह की मिट्टी खुदाई कर किसान अपने खेतों में डालते थे। यहाँ की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण खेतों में दो-तीन वर्ष तक गोबर खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती। उपजाऊ भूरी मिट्टी होने के कारण किसानों ने डीह के आधे हिस्से की खुदाई करके अपने खेतों में पहुचा डाली। बताते हैं कि डीह को खोदने पर मानवोपयोगी घर-गृहस्थी के उपकरण प्राप्त होते हैं। जिनमें मिट्टी के पके लाल बर्तन, दीया, खाना पकाने के बर्तन, धान कूटने का मूसल, मसाला पीसने का सिल-लोढा इत्यादि प्राप्त हुए हैं।

सुरंग का मुहाना और पार्श्व में डीह
मडफ़ोर्ट के पूर्वी द्वार से लगभग 150 मीटर पर स्थित सुरंग का उपयोग सुरक्षा के लिए किया जाता रहा होगा। सुरंग का एक ही मुहाना दिखाई देता है। दुसरा मुहाना कहाँ पर है और कहाँ तक जाता है इसका कोई पता नहीं। डीह के आसपास की मिट्टी से बाहर निकले हुए कठोर लेट्राईट पत्थर दिखाई देते हैं तथा सुरंग भी लेट्राईट में खोद कर बनाई गयी है। अगर सुरंग की सफ़ाई की जाए तो पता चल सकता है कि इसका दूसरा मुहाना कहाँ पर है। या फ़िर यह सुरंग न होकर कोई खोह होगी जिसमें युद्ध के समय या आपातकाल में गढीदार या सैनिक छिपते रहे होगें। 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे सैनिकों के छिपने के लिए बनाए गए होगें। इन गड्ढों को तीन फ़ुट की तश्तरीनुमा प्लेट से ढका जा सकता है। इसके भीतर आराम से बैठकर एक व्यक्ति तीर इत्यादि जैसे अस्त्र चला सकता है। युद्ध की स्थिति में आस-पास का सघन वन भी सैनिकों के छिपने में सहायक होता होगा। उपर्युक्त संरचनाओं को देखने से प्रतीत होता है कि यह व्यवस्था सामरिक उपयोग को ध्यान में रख कर की गयी होगी।

कोल्हान नाला का उद्गम
यहाँ का निवासी होने के कारण इलाके की भौगौलिक स्थिति से मैं पूरी तरह परिचित हूँ। बड़े उरला में मात्र 3 तालाब हैं जिसमें बंधवा तरिया, दर्री तरिया का निर्माण बोधवा गौंटिया के परिजनों द्वारा एवं बोईर तरिया का निर्माण राहत कार्य के दौरान हुआ है। यहाँ मडफ़ोर्ट में रहने वालों के लिए पानी की क्या व्यवस्था रही होगी? क्योंकि जहाँ निस्तारी के लिए पानी का साधन न हो वहाँ कोई निवास नहीं करता। यह विचार करने पर मडफ़ोर्ट के पूर्व में स्थित कोल्हान नाला याद आता है। यहाँ से कोल्हान नाला एक फ़र्लांग ही होगा। बेलडीह, गिरोला, अभनपुर, नायकबांधा, बड़े उरला का बरसात का पानी एकत्र होकर नाले का निर्माण करता है। यह नाला खरोरा के पास जाकर छोटी नदी का रुप धारण कर लेता है। इसका पाट काफ़ी चौड़ा हो जाता है। अनुमान है कि कोल्हान नाला समीप होने के कारण यहां के निवासियों को निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध होता रहा होगा। सुरंग के समीप मिलने वाले 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे झरिया के काम आते होगें। साथ ही 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी भी निस्तारी के लिए मिलने वाले जल का प्रमाण है। कोल्हान नाला गिरोला और बड़े उरला के बीच से प्रवाहित होता है। वर्तमान में नाले पर किसानों नें अतिक्रमण करके खेत बना लिए गए हैं। नाला कहीं दिखाई नहीं देता। मैदानों का पानी खेतों के भीतर से ही प्रवाहित होता है।

खोजकर्ता ब्लॉ. ललित शर्मा पार्श्व में मडफ़ोर्ट का पूर्वी द्वार
बचपन में रामगोपाल साहू के साथ सायकिल पर इसी रास्ते से उसके गाँव गिरोला जाता था। उरला एवं गिरोला के बीच कई सौ एकड़ का भाटा (उंचाई लिए बंजर भूमि) पड़ता था। तब रामगोपाल बताता था कि उसके सियान कहते थे कि पहले उनका गाँव यहीं भाटा में बसता था। गाँव में दैवीय प्रकोप के कारण धूकी(वर्षा जनित बीमारी) से कई लोग मर गए, तब इस स्थान को छोड़कर कुछ ग्रामवासी एक किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ़ छोटे उरला जाकर बस गए और कुछ पूर्व की ओर जाकर बस गए, उस बसाहटा को गिरोला नाम दिया। शायद बीमारी के थक हार कर गिरते पड़ते उस स्थान पर पहुंचने के कारण गाँव का नाम गिरोला प्रचलन में आया हो। जहाँ से ग्रामवासियों ने सपरिवार पलायन करके नया गाँव बसाया उस पुराने गाँव का नाम "बगबुड़ा" है। अभी यह गाँव राजस्व रिकार्ड में वीरान गाँव के नाम से दर्ज है। ऐसे वीरान गाँव छत्तीसगढ अंचल में बहुत हैं। गिरोला से लगा हुआ बड़ा तालाब है, जिससे ग्रामवासियों की निस्तारी होती है। वर्तमान में इस भाटा में नवभारत एक्सप्लोसिव कम्पनी की बारुद फ़ैक्टरी लगी हुई है। 

वन देवी कर्राबाघिन उरला एवं गातापार की सीमा में
गिरोला, बड़े उरला, बेलडीह के मैदानों में तेंदू पत्ता की भरमार है। ग्रामवासी बीड़ी बनाने के लिए गर्मी के दिनों में यहीं से तेंदू के पत्तों की तोड़ाई करते हैं। रायपुर-राजिम के  तीर्थ यात्रियों वाले पुराने रास्ते पर बड़े उरला से लगभग एक कोस पर वन देवी कर्राबाघिन का स्थान है तथा गांव के खार (खेतों) में भैंसासुर भी विराजमान है। भैंसासुर वन देवता है, त्यौहारों के विशेष अवसरों भैंसासुर का मान-दान किया जाता है। वनदेवी कर्राबाघिन वन के प्रवेश द्वार पर होती हैं। वन में प्रवेश करने के पूर्व उनकी पूजा अर्चना करके कुशलता की प्रार्थना की जाती है है। विशेष कर वीरान गाँव का "बगबुड़ा" नाम ध्यान आकृष्ट कराता है। बग=बाघ और बुड़ा=डूबना या दिखाई न देना। याने इतना सघन वन कि बाघ दिखाई न दे। साथ ही डीह पर खाद जैसी उपजाऊ मिट्टी का मिलने यह प्रतीत होता है कि यह स्थान वीरान होने पर यहाँ के वृक्ष सड़ कर कम्पोस्ट खाद में बदल गए। भैंसासुर, बगमुड़ा, वनदेवी कर्रा बाघिन, डीह से उपजाऊ मिट्टी का प्राप्त होना आदि सूत्रों को जोड़ने पर लगता है कि इस स्थान पर सैकड़ों वर्षों पूर्व सघन वन रहा होगा।

पश्चिम दिशा में मडफ़ोर्ट की खाई
बुजुर्ग ग्रामवासी बताते थे कि राष्ट्रीय राजमार्ग 30 बनने के पूर्व रायपुर से राजिम जाने वाले तीर्थ यात्री इस मार्ग से ही राजिम जाते थे तथा यह मार्ग राजिम से आगे जाने वाले यात्रियों के काम भी आता होगा। प्राचीन काल में शासक और श्रेष्ठिजन पथिकों के विश्राम एवं जल की आवश्यकता को देखते हुए मार्ग पर कुंए और सराय बनवाते थे। जहाँ यात्री जल ग्रहण कर अपनी प्यास बुझा सकें और आवश्यकता पडने पर कुछ देर विश्राम कर सकें। इस मार्ग पर कुंआ भी है जिसका अवशेष मात्र ही दिखाई देता है। इस मार्ग का सर्वे किया जाए तो अन्य स्थानों पर भी कुंए के अवशेष मिल सकते हैं, जिससे इस प्राचीन मार्ग की प्रमाणिकता सिद्ध होगी। अभी तक मैने जितने भी मडफ़ोर्ट देखे हैं वे सभी गोलाई लिए हुए हैं। बड़े उरला में प्राप्त मडफ़ोर्ट चौरस (स्क्वेयर) होना इसे विशिष्ट बनाता है, चौरस मडफ़ोर्ट मुझे पहली बार देखने मिला। इस मडफ़ोर्ट को किसने बनाया? इसमें कौन और किस काल में निवास करता था? किस राजा की यह गढी थी? इसका इतिहास क्या है? आदि प्रश्न मेरे जेहन में घुम रहे हैं। बड़े उरला के इस मडफ़ोर्ट के प्राप्त होने के बाद इन सब प्रश्नों के उत्तर ढूढना पुरातत्ववेत्ताओं एवं इतिहास के अध्येताओं का कार्य है। जिससे देश-दुनिया को यहाँ के इतिहास की जानकारी मिलेगी तथा इतिहास में नवीन कड़ियाँ जुड़ेगीं।


शुक्रवार, 15 जून 2012

रामगढ: सुतनुका देवदासी और देवदीन रुपदक्ष ------------ ललित शर्मा

रामगढ में लगे सरकारी स्टाल
रामगढ छत्तीसगढ के एतिहासिक स्थलों में सबसे प्राचीन है, यह अम्बिकापुर से 50 किलोमीटर दूरी पर समुद्र तल से 3202 फ़ुट की ऊंचाई पर है। रामगढ की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर, भित्तिचित्रों एवं गुफ़ाओं से सम्पन्न होने के कारण इस स्थान पर प्राचीन भारतीय संस्कृति का परिचय मिलता है। यहाँ सात परकोटों के भग्नावेश हैं। रामगढ पहाड़ी पर स्थित सीता बेंगरा गुफ़ा के समीप ही रामगढ महोत्सव का स्थायी मंच बनाया गया। इस मंच पर ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन होना है। मंच के समीप से ही बना हुआ कांक्रीट का रास्ता सीता बेंगरा गुफ़ा तक जाता है जिसे प्राचीन नाट्य शाला कहते हैं। कार्यक्रम प्रारंभ होने में विलंब था तब हमने तय किया गुफ़ा देख कर आया जाए। जंगल में महोत्सव स्थल पर शासन की ग्रामोन्मुख एवं विकासोन्मुख जानकारियाँ देने के लिए सभी विभागों के स्टाल लगे हुए थे। जिसमें पांम्पलेट फ़ोल्डर के साथ जानकारियाँ दी जा रही थी। समीप ही मेले जैसे उत्सव था, खाई-खजानी (मेले के चटर-पटर मिष्ठान) के साथ घरेलु उपयोग में आने वाली वस्तुओं की दुकाने सजी हुई थी। वनवासी मेले एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने आए हुए थे। पहाड़ के पास कोई बसाहट नहीं है, दुरस्थ वनवासी मेले में शिरकत करने करमा नाच करने अपने मांदर, ढोल के साथ साज श्रृंगार करके बाजे गाजे के साथ अतिथियों का स्वागत करने के लिए आए हुए हैं।

जोगीमारा गुफ़ा  में सुतनुका और देवद्त्त की कथा कहता शिलालेख
हम सीता बेंगरा गुफ़ा में पहुचे। सीता बेंगरा नाम सीता जी से संबंधित होने के कारण पड़ा। पहाड़ में ऊंचाई पर खोद कर इसे बनाया गया है। सामने मुख्य नाटय मंच है तथा दांयी तरफ़ जोगी मारा गुफ़ा है जिसमें हजारों साल पुराने शैल चित्र हैं। जो समय की मार से अछूते नहीं रहे। धीरे-धीरे इनका क्षरण हो रहा है। लाल रंग से निर्मित कुछ शैल चित्र अभी भी स्पष्ट हैं। जोगीमारा गुफ़ा में मौर्य ब्राह्मी लिपि में शिलालेख अंकित है, जिसे राहुल भैया ने पढ कर सुनाया। जिससे सुतनुका तथा उसके प्रेमी देवदीन के विषय में पता चलता है। जोगीमारा गुफ़ा की उत्तरी दीवाल पर पाँच पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं - पहली पंक्ति-शुतनुक नम। दूसरी पंक्ति-देवदार्शक्यि। तीसरी पंक्ति-शुतनुक नम देवदार्शक्यि। चौथी पंक्ति-तंकमयिथ वलन शेये। पांचवी पंक्ति-देवदिने नम। लुपदखे। अर्थात सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में),सुतनुका नाम की देवदासी को प्रेमासक्त किया। वरुण के उपासक(बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रुपदक्ष ने। जोगीमारा गुफ़ा की नायिका सुतनुका है। जोगीमारा की गुफ़ाएं प्राचीनतम नाट्यशाला और कवि-सम्मेलन के मंच के रुप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

सीता बेंगरा नाट्य शाला का विहंगम दृश्य
हम जोगीमारा गुफ़ा से सीता बेंगरा गुफ़ा में चढते हैं। आज मेला होने के कारण काफ़ी ग्रामवासी पर्यटक आए हुए हैं। गुफ़ा में राम दरबार की मूर्तियां सजा दी गयी हैं। यहां एक पुजारीनुमा बैगा बैठा है जो मुर्तियों सहारे कुछ आमदनी की आस लगाए हुए है। गुफ़ा के भीतर दोनो तरफ़ कक्ष बने हुए हैं जो सामने से दिखाई नहीं देते। मुझे बताया गया कि नाटक करने वाले कलाकार यहीं पर बैठ कर सजते थे और अपनी पात्र की प्रस्तुतिकरण की प्रतीक्षा करते थे। विद्वानों का कहना है कि भारतीय नाट्य के इस आदिमंच के आधार पर ही भरतमुनि ने गुफ़ाकृति नाट्यमंच की व्यवस्था दी होगी- कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यामण्डप:। सीता बेंगरा गुफ़ा पत्थरों में ही गैलरीनुमा काट कर बनाई गयी है। यह 44.5 फ़ुट लम्बी एवं 15 फ़ुट चौड़ी है। दीवारें सीधी तथा प्रवेशद्वार गोलाकार है। इस द्वार की ऊंचाई 6 फ़ुट है जो भीतर जाकर 4 फ़ुट ही रह जाती हैं। नाट्यशाला को प्रतिध्वनि रहित करने के लिए दीवारों को छेद दिया है। प्रवेश द्वार के समीप खम्बे गाड़ने के लिए छेद बनाए हैं तथा एक ओर श्रीराम के चरण चिन्ह अंकित हैं। कहते हैं कि ये चरण चिन्ह महाकवि कालीदास के समय भी विद्यमान थे। मेघदूत में रामगिरि पर सिद्धांगनाओं(अप्सराओं) की उपस्थिति तथा उसके रघुपतिपदों से अंकित होने का उल्लेख भी मिलता है।

सीता बेंगरा में शिलालेखा
पिछले दिनों मै रामटेक की यात्रा पर गया था, वहां भी कहा गया कि कालीदास ने मेघदूत की रचना यहीं रामटेकरी पर की थी। विद्वानों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रो वी वी मिराशी द्वारा रामटेक(नागपुर) में रखे गए दो लकड़ी के खड़ाऊं आदि के आधार पर उसे रामगढ बनाने का प्रयास किया था। पर 1906 में पूना से प्रकाशित श्री वी के परांजपे के शोधपरक व्यापक सर्वेक्षण के "ए फ़्रेश लाईन ऑफ़ मेघदूत" द्वारा अब यह सिद्ध हो गया कि रामगढ(सरगुजा) ही श्रीराम की वनवास स्थली एवं मेघदूत का प्रेरणास्रोत रामगिरी है। इस पर्वत के शिखर की बनावट आज भी वप्रक्रीड़ा करते हाथी जैसे है। सीता गुफ़ा के प्रवेश द्वार के उत्तरी हिस्से में तीन फ़ुट आठ इंच लम्बी दो पंक्तियाँ(जिसमें 2.5 इंच अस्पष्ट) उत्कीर्ण हैं। जो किसी राष्ट्र स्तरीय कवि सम्मेलन का प्रथम प्रमाण कही जा सकती हैं। "आदिपयंति हृदयं सभाव्वगरु कवयो ये रातयं… दुले वसंतिया! हासावानुभूते कुदस्पीतं एव अलगेति। अर्थात हृदय को आलोकित करते हैं, स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में… वासंती दूर है। संवेदित क्षणों में कुन्द पुष्पों की मोटी माला को ही आलिंगित करता है।" इस पंक्ति का मैने छाया चित्र लिया। 

सीताबेंगरा नाट्य शाला के समक्ष लेखक
गुफ़ा को भीतर से अच्छे से देखा तथा वहां बैठ कर अहसास किया कि उस जमाने में जब यहां नाटक खेले जाते होगें तो यहां से पहाड़ी के नीचे का दृश्य कैसा दिखाई देता होगा? पात्रों के संवाद बोलने के समय उनकी आवाज कहां तक जाती होगी? गुफ़ा तक जाने के लिए पहाड़ियों को काटकर पैड़ियाँ बनाई गयी हैं। नाट्यशाला(सीता बेंगरा) में प्रवेश करने के लिए दोनो तरफ़ पैड़ियाँ बनी हुई हैं। प्रवेश द्वार से नीचे पत्थर को सीधी रेखा में काटकर 3-4 इंच चौड़ी दो नालियाँ जैसी बनी हुई है। शायद यहीं पर नाटक करने के लिए मंच बनाया जाता होगा। कालीदास के मेघदूत का यक्ष इसी जोगीमारा गुफ़ा में रहता था जहां उसने प्रिया को प्रेम का पावन संदेश दिया था यही के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कालीदास ने मेघदूत में किया है। यहीं पर जल का कुंड है। वनौषधियाँ, कंदमूल फ़ल भी इस स्थान पर प्रचूर मात्रा में मिलते हैं। गुफ़ा के सामने शासन द्वारा मंच बनाकर इसके प्राकृतिक सौंदर्य को समाप्त कर दिया गया है। सीमेंट से बना यह मंच मखमल में टाट का पैबंद नजर आता है। पर्यटकों की सीधी पहुंच गुफ़ा तक होने के कारण इसका भी क्षरण हो रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो इसका प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त हो सकता है।

180 फ़ुट लम्बी सुरंग"हाथी पोल"
गुफ़ा के नीचे पहाड़ी में हाथी पोल नामक सुरंग है। इसकी लंबाई 180 फ़ुट है। पहाड़ी उस पार के निवासी इस गुफ़ा सुरंग के रास्ते सीता बेंगरा तक आते हैं। यह सुरंग इतनी ऊंची है कि इसमें हाथी आसानी से पार हो जाते हैं। इसीलिए इसे हाथी खोल या हाथी पोल कहा जाता है। हम सीता बेंगरा गुफ़ा से नीचे उतर कर हाथी पोल सुरंग में पहुचे, यहाँ सामने खड़े होने पर सुरंग से दूसरे सिरे आता हुआ प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है। सुरंग के भीतर प्रवेश करने पर जानी पहचानी गंध आती है। यह गंध सभी पुरातात्विक स्थलों पर मिलती है। दिमाग भन्ना जाता है, इस गंध से मुझे प्राचीन जगह की पहचान होती है। यह गंध चमगादड़ के मल-मुत्र की है। जहाँ भी गुफ़ाओं या पुरानी इमारतों में अंधेरा रहता है चमगादड़ उसे अपना आदर्श बसेरा समझ कर निवास कर लेते हैं। सुरंग में पहाड़ी से कई जगह पानी रिस रहा है, आए हुए लोग इस पानी को पी रहे हैं। कुछ लोग धूप से बचने के लिए सुरंग में नींद ले रहे है, एक महिला और उसकी बेटी पत्थरों का चुल्हा बनाकर भोजन बना रही है और खाने के लिए ताजा पत्तों की पत्तल का निर्माण हो रहा है। इससे प्रतीत होता है कि आदिम अवस्था में मनुष्य इन कंदराओं में ऐसे ही गुजर बसर करता होगा।

रामगढ पहाड़ी का दृश्य
महाकवि  कालिदास का रामगिरि और सीतबेंगरा से गहरा नाता है। यह पुरातात्विक प्रमाण और कालिदास द्वारा रचित मेघदूत से मिलते हैं। हम कालिदास से तो मिले नहीं पर उनके द्वारा रचित मेघदूत के छंद और यक्ष-प्रिया की प्रेम कथा अभी तक रामगढ के वनों में पहाड़ियों में गुंज रही है। आज भी मधुमक्खियों के छत्तों से उत्तम मकरंद झर रहा है। महुआ के वृक्ष फ़ल फ़ूल रहे हैं, सरई (साल) के वन गर्व से सिर उठाकर आकाश की ऊंचाई से होड़ लगा रहे हैं। गजराज आज भी अपनी उपस्थिति इस अंचल में बनाए हुए हैं। यहां के हाथी इंद्र के एरावत से कम नहीं है। डील-डौल और कद में उतने ही मजबूत है। आषाढ के प्रथम दिन वर्षा का आगमन नहीं हुआ है। बदला है तो सिर्फ़ प्रकृति का चक्र बदला है। मानसून के आगमन की तिथि पीछे रह गयी। वही मांदर की थाप वनवासियों का नाच हो रहा है। जो रामगढ की गौरव गाथा गा रहे हैं उल्लासित होकर। रामगढ से लौट आया पर मेरा मन उन्हीं कंदराओं में अटका हुआ है जहाँ भगवान श्रीराम के चरण पड़े थे, सीता माता ने निवास किया था। महाकवि कालीदास ने मेघदूत रचा था, जहाँ सुतनुका देवदासी और रुपदक्ष (मेकअप मेन) श्रेष्ठी देवदीन का प्रेम हुआ था। फ़िर कभी लौट कर आऊंगा रामगढ यक्ष बनकर प्रिया से मिलने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस में।