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मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

रेणुका के तट पर यादों की धुंध

तम्बू से बाहर निकला, रेणुका धुंध की चादर ओढ स्थिरता से बह रही थी, सूर्य की किरणें कोहरे की चादर को भेदने का प्रयास कर रही थी। कोहरा भी आज चादर लेकर नहीं, रजाई लेकर आया था और उसने भी ठान लिया था आज तो उसकी ही विजय होगी। बाहर से तम्बू ओस से भीगा हुआ था, पचकौड़ रात को कह रहा था " साहब यहाँ तम्बू मत लगाईए, रात को भालू आते हैं और जंगली सुअर भी।" मैने उसे टालते हुए कह दिया कि मुझे इनसे बचने का मंत्र मालूम है।वो तो अपने गाँव चला गया और मैं रह गया तम्बू में अकेला। अलाव में 3 मोटे लट्ठे लगा दिए थे, दो करदीप जला कर लटका दिए ताकि उनसे ऊष्मा बनी रही।

शीत लहर सी चल रही थी, नदी किनारे की रेत ठंडी हो चुकी थी, ऐसा लगता था कि इग्लू में सोया हूँ। ठंड का असर देख कर स्लीपिंग बैग के भीतर अपना सुलेमानी कोट पहनकर सोया। जब तुम नहीं होती तो कोट से निकली उष्मा तुम्हारे सानिध्य सी राहत देती है मुझे, सीने लगा कर सो जाता हूँ, सीना गर्म रहे तो शिराओं में रक्त जमने का खतरा कम हो जाता है, धमनियाँ उष्मा पाकर सुचारू रुप से कार्य करती हैं। तुम्हारी यादों के इलेक्ट्रोन, प्रोट्रोन, न्यूट्रोन, गॉड पार्टिकल्स जैसे लघु परमाणु  विस्फ़ोट करते रहते हैं। यही तो देह के विद्युत केन्द्र हैं, जो सतत उर्जा बनाए रखते हैं। 

हाँ! एक चीज तो भूल रहा हूँ, जो मय तुमने नयनों से पिलाई थी, सदियाँ बीत गई, उसका असर अभी तक है। महुआ तो बेवफ़ा है, चढता है और उतर जाता है। मगर तुम्हारी वफ़ा की मय जब से मुंह लगी है उतरती ही नहीं है। मय का सागर उमड़ता घुमड़ता है इन नयनों में। पता नहीं कौन सा जादू है, आँखें बंद करते ही भीतर उतर जाता हूँ, चलचित्र सा चलने लगता है। बाहर अंधेरा होते ही भीतर उजाले का विस्फ़ोट हो जाता है। चकाचौंध इतनी अधिक कि प्रकाशमय सतरंगी वलय आसमान में उड़ते दिखाई देते हैं। मन करता है उन वलयों को पकड़ कर तुम्हारे गले का हार बना दूँ। जब तुम आओ तो तुम्हारे साथ-साथ इन्द्रधनुष चले। मैं तो मय पीकर मत्त रहना चाहता हूँ। मुझे ऐसी तंद्रा चाहिए जिससे बाहर आना ही न हो।

नदी किनारे की रेत पर टहलते हुए सोचता हूँ कि पूर्व जन्म में भी कभी मेरा काफ़िला यहीं रुका होगा। आज भी कारवां यहीं ठहरा है, अलाव की राख में दबी चिंगारी को एक बार फ़िर हवा देकर मैने अग्नि प्रज्वलित की है। बनजारा एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव की ओर आगे बढ जाता है परन्तू कभी चूल्हे में या अलाव में पानी डाल कर अग्नि को शीतल नहीं करता। उसकी अग्नि सतत प्रज्वलित रहती है। यही अग्नि उसे अगले पड़ाव तैयार मिलती है, बनजारे की बाट देखते हुए। अग्नि जीवन से लेकर मृत्यू तक साथ निभाती है, इसी आशा में कि फ़िर वह स्वर्णकार आएगा और अपनी फ़ूंक से राख उड़ा कर अग्नि प्रज्जवलित करेगा। राख को राख कर देगा, धूंआ को धूंआ कर देगा, अग्नि को स्वर्णिम बना देगा।

इस वीराने में सिर्फ़ मैं हूँ और तुम हो, साथ है नदी का बहता हुआ जल, किनारे पर सदियों से खड़े वृक्ष मेरी ओर ताक रहे हैं, शायद सोच रहे हैं, आज फ़िर यह मुसाफ़िर अकेला है। कैसा पागल है, घूम फ़िर कर फ़िर यहीं डेरा लगा लेता है। शायद कुछ गाड़ कर गया है यहाँ। उसे ही पुन: पाने की अभिलाषा इसे बारम्बार यहाँ खींच लाती है। हाँ! गाड़ा है मैने, यहाँ जीवन की सुनहरी यादों को। उसकी पैरी की खनखनाहट आज भी मेरे कानों में सुनाई देती है। बस उसी खनखनाहट सुनने चले आता हूँ मैं। कांसे की लघु घंटिकाओं की मघुर ध्वनि मुझे रोमाचिंत कर देती है। उसके स्वागत में रोम-रोम उर्जा से भर जाता है। लगता है कि उन्मुक्त आकाश में विचरण कर रहा हूँ। नर से नारायण हो गया हूँ।

पैरों तले का रेत कसमसाकर मुझे वास्तविकता का बोध कराता है, रेत के कसमसाने की ध्वनि मुझे सुनाई दे रही है। परन्तु मधुर लघु घंटिकाओं की ध्वनि के बीच यह ध्वनि मंद हो गई। कदम आगे बढाते ही जूते रेत में धंस कर उसे रौंद रहे हैं। जूतों के तले  से होता हुआ अहसास मस्तिष्क की शिराओं तक पहुंच कर झनझना रहा है।  रेत के नीचे बहती हुई नदी इशारा कर रही है कि जम कर कदम रखो वरना बह जाओगे। न जाने तुम्हारे जैसे कितने बह गए इस बहते हुए जल में। मुझे डर नहीं है बह जाने का। अगर बह जाऊंगा तो कहीं न कहीं किनारा मिल गया जाएगा। फ़िर जीवन की डोर भी इतनी कमजोर नहीं होती। नदी के साथ साथ चलती है। पकड़ ही लूंगा उसे किसी घाट पर।

चिड़ियाँ चहचहाने लगी, धुंध और भी गहरी होती जा रही थी। सूरज की किरणें जितनी ताकत लगा रही थीं, उससे अधिक धुंध पसरती जा रही थी। चिड़ियों की चहचहाट का मधुर संगीत मुझे प्रकृति के साथ जोड़ रहा है। बीच-बीच कौंवे की कर्कश कांव कांव मधुर वीणा के संगीत के बीच ड्रमर द्वारा ड्रम ठोकने का अहसास करा रही हैं। दोनों की जुगलबंदी चल रही है। चिड़ियों की चहचहाट के साथ कौंवे की काँव काँव बढते जाती है। लगता है आज संगीत का मुकाबला ये जीत ही लेगें। हठधर्मिता है इनकी। कहाँ चिड़ियों का मधुर गान और कहाँ कौंवों की कर्कश ध्वनि। चलना चाहिए अब मुझे यहाँ से, जुगलबंदी छोड़ कर नदी किनारे से तम्बू की ओर लौट आता हूँ।

अलाव की बिखरी हुई लकड़ियों को समेट कर उन्हें थोड़ी सी हवा देता हूँ, हवा मिलते ही भभक कर ज्वाला आसमान की तरफ़ लपकती है। आज इन ज्वालाओं को भी आसमान से निपटने दिया जाए। उसे अपने आसमान होने पर बहुत घमंड है। ये ज्वालाएं उसके घमंड की जमी हुई बर्फ़ को भी पिघलाने की ताकत रखती हैं। अलाव के पास रखी शिला पर बैठ जाता हूँ। जैसे यह विक्रमादित्य का बत्तीस पुतलियों वाला सिंहासन हो। सिहांसनारुढ आसमान से टक्कर लेती ज्वालाओं का खेल देखने वाले सिर्फ़ तीन ही हैं, मैं हूँ, तुम हो और सामने वृक्ष पर बैठी काली चिड़िया है और सदियों पुरानी वही कहानी है जो बनजारे छोड़ चले।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

निठल्लाई: साधो सहज समाधि भली

घुमक्कड़ी और लेखन का सिलसिला ही टूट गया, 4 महीने हो गए, जब से दिल्ली में चोट खाई तब दना-दन चोटें जारी हैं, एक ठीक होती है दूसरी लग जाती है। इनसे उबरने की कोशिश जारी है फ़िल्में देख-देख कर साधो सहज समाधि भली। जितनी फ़िल्में सारे जीवन में नहीं देखी, उतनी एक महीने में देखी। नेट और यू ट्यूब का अच्छे से दोहन किया। थोड़ा बहुत समय फ़िल्मों के बीच मिलता है वह फ़ेसबुक की भेंट चढ जाता है। घुमक्कड़ी से हासिल उर्जा जीवन की गाड़ी को आगे बढाती है। घुमक्कड़ी रुक जाती है तो लगता है कि दुनिया ठहर गई, सांसों का स्पन्दन भी सुनाई नहीं देता। चलती है धीरे-धीरे जीवित होने का अहसास कराते हुए। 

बरसात की झड़ी जारी है। बरसती बूंदों के बीच फ़सल हरिया रही है तो रुपया पीला पड़ते हुए मरणासन्न है, औंधे मुंह गिर रहा है धरा पर। जिसके पास धरा है वह भी धरे-धरे धराशाई हो रहा है और जिसके पास नहीं धरा वह तो नंगा ही खड़ा है, क्या खाए और क्या खिलाए। देश की अर्थ व्यवस्था धराशाई हो रही है और नेताओं के खजाने में अकूत संपत्ति जमा होती जा रही है। जिसे गिनने वाला कोई नहीं। बोरों में भरे हुए नोट गिनने का समय इनके पास कहाँ है? भरे के भरे बोरों का इस्तेमाल ही जाता है। 

रायपुर से घर लौटते हुए रास्ते में डूमरतराई के समीप गोलगप्पे का ठेला लगा देखा तो कंट्रोल नहीं हुआ। चलो गोल गप्पे खा लिए जाएं। गोल गप्पे में भरने के लिए मुझे अपनी पसंद का मसाला चाहिए। जिसमें प्याज होना जरुरी है। गोलगप्पे वाले कहा कि - महाराज प्याज नहीं है। मैने एक लड़के को 10 रुपए देकर प्याज लेने भेजा। वह 10 रुपए में एक ही प्याज लेकर आया। देख माथा खराब हो गया। प्याज की एक-एक परत एक-एक रुपए हो गई। जिसके पास हराम का धन है उसे क्या फ़र्क पड़ने वाला है। एक बार कुर्सी पर बैठते ही सात पुश्तों का जमा कर लेते हैं और गोवा में जाकर आयटम सांग करते हैं। यहाँ जांगर तोड़ कमाने के बाद भी कुछ नहीं बचता।

सबसे अधिक त्रासदी तो अब मध्यमवर्ग भुगतने वाला है। अभी तक किसानों के द्वारा ही आत्महत्या करने की खबरें मिलती थी। अब अर्थ व्यवस्था का यही हाल रहा तो मध्यमवर्ग से भी समाचार आने प्रारंभ हो जाएगें। खाद्य सुरक्षा बिल लोकसभा में पास हो गया। वोटों की राजनीति के कारण मुफ़्त बांटने की परम्परा शुरु हो गई। सत्तारुढ पार्टियाँ वोट बैंक बनाने के उद्देश्य से जनता की गाढी कमाई को दोनों हाथों से मुफ़्त बांट रही है। जिसका भार मध्यम वर्ग को झेलना है। उच्च वर्ग को टैक्स चुरा कर काला धन बनाने में लगा हुआ है। मध्यम वर्ग को ही प्रत्येक स्थान पर अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष कर देना पड़ता है। मुफ़्त का माल मिलने से कामचोरी बढते जाएगी। अगर खाना मुफ़्त में मिल जाएगा तो कमाने कौन जाएगा?

जो पैसा संसाधनों के विकास में लगना चाहिए वह मुफ़्तखोरी की भेंट चढता जा रहा है। लगाए जाओ तुम्हारे बाप का है, तुमने तो कमाया नहीं है जो खर्च करने में जान निकलेगी। इधर चीन बार बार सीमाएं लांघ जाता है। भारतीय सैनिकों के खाना-पानी मांगता है। मांगने की बीमारी प्रत्येक जगह है। अब तो म्यांमार के सैनिक भी मांगने भारतीय सीमा में घुसे चले आ रहे हैं। सोचता हूँ खाद्य सुरक्षा लागु होने के बाद देश में कहीं पर भी भिखारी नहीं दिखाई देगें। क्योंकि जब सरकार भरपेट में मुफ़्त में भोजन देगी और निराश्रित पेंशन इत्यादि मिल रही होती तो भीख मांगने की आवश्यकता ही खत्म हो जाएगी। हर हाथ को काम की जगह नारा होना चाहिए "हर पेट को खाना"। 

कई स्थानों से संगोष्ठियों के निमंत्रण आ रहे हैं। कई तो एक ही दिन पड़ रहे हैं, ऐसे में अलग-अलग स्थानों पर एक ही तारीख को उपलब्ध हो पाना असंभव है। रविन्द्र प्रभात जी भी काठमांडू में कार्यक्रम कर रहे हैं। परिकल्पना की टीम ने नेपाल में सम्मान देने की घोषणा की है। उन्हें समारोह की सफ़लता के लिए मेरी शुभकामनाएं। बरसात खत्म हो तो कुछ यात्राएं की जाएं। भोपाल में "मीडिया चौपाल" का इस वर्ष पुन: आयोजन हो रहा है। अनिल सौमित्र जी का निमंत्रण आया हुआ है। उम्मीद है कि नेपाल नहीं सही तो भोपाल जाना हो सकता है तथा उसके साथ ही आस-पास के स्थानों की घुमक्कड़ी करने का इरादा है।

दो बरस हो गए, पांडीचेरी गए। वहाँ काफ़ी मित्र हैं जो इंतजार करते हैं। भाषा अवश्य समस्या बनती है पर भावों से काम चल जाता है। नागमणि दूभाषिए की भूमिका निभा लेती हैं। एक बार पुन: पांडीचेरी जाने का मन बन रहा है। मित्र वी तंगम का फ़ोन आया था कि दो बरस हो गए पांडीचेरी आए। वैसे अभी पांडीचेरी का मौसम अच्छा होगा। समुद्र ठाठें मार रहा होगा और लहरें सिंहगर्जना कर रही होगी। रात के समय समुद्र किनारे आँख बंद कर बैठने पर लहरों का स्वर किसी दूसरी दुनिया में ले जाता है तथा बड़ा ही अलौकिक एवं अद्भुत अनुभव होता है। इसके साथ किनारे पर स्थित "ली कैफ़े" की काफ़ी और "शंकरा" के चखने का तो कोई तोड़ ही नहीं है। अभी तो जयपुर की दाल-बाटी-चूरमा का योग बन रहा है। फ़िर जोधपुर के मिर्ची भजिए का। बाकी बाद में देखा जाएगा।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

रामटेकरी (मनसर-महाराष्ट्र) ------------ ललित शर्मा

प्रारंभ से पढें
पृथ्वीसेन द्वितीय के बाद प्रवरपुर पर बौद्धों का कब्जा हो गया। पैलेस को बौद्ध विहार का रुप दे दिया गया। पैलेस के चारों ओर छोटी छोटी कुटिया बना दी गयी। जिसमें बौद्ध साधू निवास करने लगे। बौद्ध धर्म से संबंधित शिक्षाएं दी जाने लगी। बौद्ध धर्म की धार्मिक शिक्षाओं का केन्द्र बन गया। कहते हैं कि यहाँ बोधिसत्व नागार्जुन ने कुछ समय निवास किया था। इसी किंवदंती के सहारे बौद्धों ने जापान की सहायता से यहाँ पर उत्खनन करवाया। लेकिन उत्खनित इतिहास तो बहुत दूर तक जाता है। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। वाकटक राजाओं का इतिहास एवं उनका महल भी निकल आया।
प्रवरपुर पैलेस पर विध्वंस के चिन्ह, अग्निदाह एवं भूकम्प का प्रमाण

महल पर आज भी भूकंप के द्वारा विनाश के चिन्ह एवं नल राजाओं द्वारा जलाए जाने के चिन्ह दिखाई देते हैं। वीराने में प्रवरपुर का पैलेस अपने विध्वंस की गाथा स्वयं कहता है। बस इसे देखने एवं सुनने के लिए नजर होनी चाहिए। भग्नावेश से जाहिर होता है कि कभी यह स्थान भी अपनी बुलंदी पर रहा होगा। जहाँ बैठ कर राजा लोगों की किस्मत खरीदता होगा। प्रजा की किस्मत का लेखा-जोखा करता होगा। पर काल से आज तक कोई नहीं बच पाया। चाहे वह कितना ही बड़ा एवं कीर्तिवान क्यों न रहा हो। काल ने सबको धराशायी कर दिया। उससे बड़ा पहलवान ब्रह्माण्ड में दूसरा कोई नहीं। इसलिए कहते हैं "द्वितीयोनास्ति"।
प्रवरपुर पैलेस के  शिखर से दृश्यावलोकन

राजा प्रवरसेन की नगरी मनसर (प्रवरपुर) से जब हम रामटेक (रामटेकरी) की ओर बढे तो सूरज आग बरसा रहा था। प्यास बहुत जोरों से लग रही थी। मनसर पैलेस में हमारे अलावा कोई दूसरा पर्यटक नहीं था। मनसर देखने का आनंद अद्भुत था, इसी आनंद ने हमें भीषण गर्मी को झेलने लायक बना दिया। अन्यथा सड़क पर कोई दिखाई नहीं देता था। गर्मी में सब अपने एसी और कुलर चालु करके घरों के भीतर कैद थे। भूख भी जोरों की लग रही थी। सड़क के किनारे एक होटल देख कर गाड़ी रोकी गयी। पर वहाँ कोई त्यौहार होने के कारण रसोईया नहीं था। हम आगे बढ गए। महाराष्ट्र में लगभग हर होटल और ढाबे में परमिट बार है। गरमी के मौसम को देख कर पुराने दिनों  की याद आ गयी।
हिडिम्बा टेकरी पर श्री सत्येन्द्र शर्मा एवं संध्या शर्मा जी

जब दो ठंडी बीयर उदरस्थ कर गर्मी कम कर ली जाती थी। शरीर लू के थपेड़े झेलने लायक हो जाता है। फ़िर तो आग में से भी निकला जा सकता था। लेकिन समय को देखते हुए अब हमें राजा बेटा बनना ही पड़ गया। ललक तो कभी-कभी जोर मार देती है। पर आत्मबल रोक लेता है। ललचाई नजरों से देखते रहे ठंडी बीयर लोगों को पीते हुए। हाय रे हमारी किस्मत! ये न थी हमारी किस्मत, विसाले बीयर होता…… :) जिल्ले इलाही ने सर पर शमशीर लटका रखी थी। जहाँ भी होटल के भीतर जाता था। शर्मा जी पीछे आ जाते थे। आखिर हमने ईरादा त्याग दिया और एक होटल में भोजन करने पहुंच गए। 
प्रवरपुर पैलेस में दो ब्लॉगर

सुबह से लगभग 10 लीटर पानी पी चुका था। एक लीटर पानी एक बार में अंदर हो जाता और आधे घंटे में भाप बनकर उड़ जाता है। गर्मी के मारे बुरा हाल था। भोजन करके हम रामटेक के मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। रामटेकरी में प्रवेश द्वार के पहले मोटरसायकिल एवं कार स्टैंड बना हुआ है। जहाँ गाड़ी खड़ी करने पर दस रुपए प्रति वाहन की दर से वसुला जाता है। हमने यहां अपनी बाईक खड़ी की। सामने ही ओ3म के आकार का कालीदास स्मारक बना हुआ है। मंदिर के मार्ग में यहाँ भी बंदरों की सेना से सामना हुआ। रास्ते के दोनो तरफ़ पूजा के सामान एवं चना चबेना की दुकानें लगी हुई हैं।
राम टेकरी के प्रवेश द्वार पर मजार

बेर को कूट कर बनाया गया "बोरकुट" बड़ी मात्रा में बिक रहा था। हमने 10 रुपए की एक थैली ली। जिसका स्वाद बढिया था। पहले जब घर में बेर सुखाते थे तो उनका मुठिया बनाया जाता था। जो खाई-खजानी के रुप में बच्चों का मन बहलाता था। अब वो दिन नहीं रहे। यहाँ बोरकुट देख कर उन दिनों की याद आ गयी। जब गाँव से दरोगा की डोकरी बोईर का मुठिया बनाकर लाती थी और हम उसका इंतजार करते थे। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप एक कब्र है जिसपर चादर चढाई हुई थी। यह कब्र किसकी थी और यहाँ क्यों मौजूद है? इसके विषय में कोई माकूल जानकारी नहीं मिली।
रामटेकरी के प्रवेश द्वार पर हेयर कटिंग सेलुन

मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नाई ने सिट डाउन ओपन हेयर कंटिंग सेलून खोल रखा है। जब हम पहुंचे तो वह एक व्यक्ति की दाढी मुड़ रहा था। मंदिर के प्रथम दरवाजे पर भैरव और शिरपुर दरवाजा लिखा है। इस मंदिर को यहाँ गढ मंदिर कहा जाता है। बलुआ पत्थर से निर्मित मंदिर में कोई विशेष कारीगरी एवं अलंकरण नहीं दिखाई दिया। जैसा भोरमदेव, नकटा मंदिर जांजगीर में दिखाई देता है। गढ मंदिर के चारों तरफ़ परकोटा बना हुआ है। मुख्यमंदिर बीच में बना है। जहां फ़ोटो खींचने की मनाही है, लिखा था। मैने एक कोशिश की, पर पुजारी ने रोक दिया।
गर्मी से बेहाल भगवान के लिए वाताकूलन की व्यवस्था

मंदिर के भीतर एसी लगा हुआ है। भगवान भी गर्मी से बेहाल थे, तभी गर्मी से राहत दिलाने के लिए एसी का प्रबंध किया गया था। दिन भर की घुमक्कड़ी के कारन थकान हो गयी थी। मैने वहीं मंदिर के फ़र्श पर एक नींद लेने का विचार बनाया और सो गया। भोजन के नशे ने साथ दिया और एक घंटे की अच्छी नींद आई। जब नींद को आना हो तो मखमल के गद्दे की जरुरत नहीं पड़ती। कठोर चट्टान पर भी आ जाती है। एक घंटे के बाद जब नींद खुली तो तबियत एकदम फ़्रेश हो चुकी थी। बैटरी रिचार्ज हो चुकी थी। 
भोंसला राजाओ द्वारा निर्मित प्रवेश द्वार

मंदिर से बाहर आने पर सामने विशालकाय वराह देव की मूर्ती दिखाई दी। वराह देव की इतनी बड़ी मूर्ति मैने और कहीं दूसरी जगह नहीं देखी। वाकटक राजा धर्माभिमानी एवं सहिष्णु वृत्ति के थे, रुद्रसेन द्वितीय की पट्टरानी प्रभावती सम्राट चंद्रगुप्त की बेटी थी। प्रभावती गुप्त वैष्णव पंथ की अनुयायी थी। इसके पुत्र और पौत्रों ने रामगिरि पर नृसिंह, त्रिविक्रम, वराह तथा गुप्तराम आदि मंदिरों का निर्माण कराया। देवगिरि के यादव राजाओं ने यहाँ राम-लक्ष्मण मंदिरों का निर्माण किया।
विष्णुअवतार वराह देव मंदिर

कहते हैं महानुभाव पंथ के निर्माता चक्रधर स्वामी  ने यहां धर्मोपदेश किया। एक नजर पुन: गढ मंदिर पर डाल कर हमने वराह एवं नृसिंह मंदिर देखा। संध्या जी ने कालीदास स्मारक देखने की इच्छा जाहिर की। कालिदास स्मारक का निर्माण महाराष्ट्र सरकार द्वारा पर्यटन को बढावा देने के उद्देश्य से किया गया है। इसके साथ कहीं कोई प्राचीन कथानक जुड़ा हुआ नहीं है। नव निर्माण सुंदर है लेकिन देख-रेख के अभाव में खंडहर होने की आशंका है। स्मारक के मैदान की दूब सूख चुकी है। जिसके कारण यह उजड़े हुए चमन के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने सोचा था कि कालिदास से संबंधिक कुछ जानकारियाँ यहाँ पर प्राप्त होगी पर ऐसा कुछ नहीं था।
राम लक्ष्मण मंदिर

रामगिरि की पहाड़ियों बीच एक झील है। जो सड़क से बहुत ही सुंदर दिखाई देती है। इसे अबांळा तालाब कहा जाता है। इस तालाब की गणना स्थानीय प्रवित्र तीर्थ के रुप में की जाती है। इस तालाब का जीर्णोद्धार एवं इसके किनारे मंदिरों का निर्माण भोसलें राजाओं ने किया था। तालाब के चारों तरफ़ बने हुए मंदिर माला में गुंथे हुए मनकों की तरह सुंदर दिखाई देते हैं। तालाब के चारों तरफ़ बस्ती बसी हुई है। यहाँ पंडों के स्थाई निवास है। विभिन्न जातियों ने अपने समाज की सुविधा की दृष्टि से धर्मशालाएं एवं ठहरने का स्थान बना रखा है।
कालिदास स्मारक पर सूर्यास्त का विहंगम दृश्य

मृत्योपरांत यहाँ कर्मकांड एवं पिंडदान किए जाते हैं। भोजन भट्ट पंडे यहीं  मिल जाते हैं, बस उन्हे नगद दे दीजिए फ़िर सारी व्यवस्था यहीं हो जाती है। इस तालाब में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा प्रवेश द्वार है। मेरे कैमरे की बैटरी चुक गयी थी। आज दिन भर में बहुत अधिक चित्र ले लिए थे। इसलिए इस स्थान के सीमित ही चित्र मिले। अबांळा तालाब से जब हम वापस हो रहे थे तो सूर्यास्त हो रहा था। पहाड़ियों के बीच से अस्ताचल की ओर जाता सूरज कह रहा था कि - मैने तुम्हे बहुत तपा दिया। पता नहीं तुम किस मिट्टी के बने हो जो अभी तक घुमक्कड़ी कर रहे है। मै तो थक गया, अब चलता हूँ आराम करने। तुम जो चाहे करो तुम्हारी मर्जी, पर आज की लड़ाई तुम जीत चुके हो।    
अंबाळा तालब के घाट पर ब्लॉगर

हमने रामगिरि तीर्थ से विदा ली और चल पड़े नागपुर की ओर सपाटे से। क्योंकि जितनी दूर आ गए, उतनी दूर हमें लौटना भी था। मनसर एवं रामटेक की यात्रा शर्मा दंपत्ति के साथ आनंदायी रही। वापसी में कामठी की रेल्वे क्रांसिग के पास से मैं साथियों से आगे निकल गया। तभी मेरा मोबाईल बजा, शर्मा जी कह रहे थे कि वापस लौट आओ। उनकी गाड़ी बंद हो गयी थी। वापस लौटने पर देखा कि उनकी गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही है। वे पास ही मिस्त्री ढूंढने गए, हम वहीं खड़े रहे।
पहाड़ी से अंबाळा तालब का दृश्य

बाईक में पिस्टन प्रेसर ही नहीं बना रहा था। जिससे किक लगे और वह स्टार्ट हो। मिस्त्री ने मगजमारी कर ली। अब लगा कि बाईक यहीं मिस्त्री के पास ही छोड़ कर जाना पड़ेगा। चलो एक बार धक्का मारकर चालु करने का प्रयास कर लिया जाए। धक्का मारने पर बाईक स्टार्ट हो गयी। एक बारगी चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। रात के नौ बज रहे थे। घर पहुंचने की भी जल्दी थी। बाईक ने फ़िर साथ नहीं छोड़ा। घर पहुचा कर ही दम लिया। इस तरह महाराष्ट्र के मनसर एवं रामटेक के प्राचीन स्थल की सैर निर्विघ्न सम्पन्न हुई।    ( यात्रा-सम्पन्न)

शुक्रवार, 15 जून 2012

रामगढ: सुतनुका देवदासी और देवदीन रुपदक्ष ------------ ललित शर्मा

रामगढ में लगे सरकारी स्टाल
रामगढ छत्तीसगढ के एतिहासिक स्थलों में सबसे प्राचीन है, यह अम्बिकापुर से 50 किलोमीटर दूरी पर समुद्र तल से 3202 फ़ुट की ऊंचाई पर है। रामगढ की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर, भित्तिचित्रों एवं गुफ़ाओं से सम्पन्न होने के कारण इस स्थान पर प्राचीन भारतीय संस्कृति का परिचय मिलता है। यहाँ सात परकोटों के भग्नावेश हैं। रामगढ पहाड़ी पर स्थित सीता बेंगरा गुफ़ा के समीप ही रामगढ महोत्सव का स्थायी मंच बनाया गया। इस मंच पर ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन होना है। मंच के समीप से ही बना हुआ कांक्रीट का रास्ता सीता बेंगरा गुफ़ा तक जाता है जिसे प्राचीन नाट्य शाला कहते हैं। कार्यक्रम प्रारंभ होने में विलंब था तब हमने तय किया गुफ़ा देख कर आया जाए। जंगल में महोत्सव स्थल पर शासन की ग्रामोन्मुख एवं विकासोन्मुख जानकारियाँ देने के लिए सभी विभागों के स्टाल लगे हुए थे। जिसमें पांम्पलेट फ़ोल्डर के साथ जानकारियाँ दी जा रही थी। समीप ही मेले जैसे उत्सव था, खाई-खजानी (मेले के चटर-पटर मिष्ठान) के साथ घरेलु उपयोग में आने वाली वस्तुओं की दुकाने सजी हुई थी। वनवासी मेले एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने आए हुए थे। पहाड़ के पास कोई बसाहट नहीं है, दुरस्थ वनवासी मेले में शिरकत करने करमा नाच करने अपने मांदर, ढोल के साथ साज श्रृंगार करके बाजे गाजे के साथ अतिथियों का स्वागत करने के लिए आए हुए हैं।

जोगीमारा गुफ़ा  में सुतनुका और देवद्त्त की कथा कहता शिलालेख
हम सीता बेंगरा गुफ़ा में पहुचे। सीता बेंगरा नाम सीता जी से संबंधित होने के कारण पड़ा। पहाड़ में ऊंचाई पर खोद कर इसे बनाया गया है। सामने मुख्य नाटय मंच है तथा दांयी तरफ़ जोगी मारा गुफ़ा है जिसमें हजारों साल पुराने शैल चित्र हैं। जो समय की मार से अछूते नहीं रहे। धीरे-धीरे इनका क्षरण हो रहा है। लाल रंग से निर्मित कुछ शैल चित्र अभी भी स्पष्ट हैं। जोगीमारा गुफ़ा में मौर्य ब्राह्मी लिपि में शिलालेख अंकित है, जिसे राहुल भैया ने पढ कर सुनाया। जिससे सुतनुका तथा उसके प्रेमी देवदीन के विषय में पता चलता है। जोगीमारा गुफ़ा की उत्तरी दीवाल पर पाँच पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं - पहली पंक्ति-शुतनुक नम। दूसरी पंक्ति-देवदार्शक्यि। तीसरी पंक्ति-शुतनुक नम देवदार्शक्यि। चौथी पंक्ति-तंकमयिथ वलन शेये। पांचवी पंक्ति-देवदिने नम। लुपदखे। अर्थात सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में),सुतनुका नाम की देवदासी को प्रेमासक्त किया। वरुण के उपासक(बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रुपदक्ष ने। जोगीमारा गुफ़ा की नायिका सुतनुका है। जोगीमारा की गुफ़ाएं प्राचीनतम नाट्यशाला और कवि-सम्मेलन के मंच के रुप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

सीता बेंगरा नाट्य शाला का विहंगम दृश्य
हम जोगीमारा गुफ़ा से सीता बेंगरा गुफ़ा में चढते हैं। आज मेला होने के कारण काफ़ी ग्रामवासी पर्यटक आए हुए हैं। गुफ़ा में राम दरबार की मूर्तियां सजा दी गयी हैं। यहां एक पुजारीनुमा बैगा बैठा है जो मुर्तियों सहारे कुछ आमदनी की आस लगाए हुए है। गुफ़ा के भीतर दोनो तरफ़ कक्ष बने हुए हैं जो सामने से दिखाई नहीं देते। मुझे बताया गया कि नाटक करने वाले कलाकार यहीं पर बैठ कर सजते थे और अपनी पात्र की प्रस्तुतिकरण की प्रतीक्षा करते थे। विद्वानों का कहना है कि भारतीय नाट्य के इस आदिमंच के आधार पर ही भरतमुनि ने गुफ़ाकृति नाट्यमंच की व्यवस्था दी होगी- कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यामण्डप:। सीता बेंगरा गुफ़ा पत्थरों में ही गैलरीनुमा काट कर बनाई गयी है। यह 44.5 फ़ुट लम्बी एवं 15 फ़ुट चौड़ी है। दीवारें सीधी तथा प्रवेशद्वार गोलाकार है। इस द्वार की ऊंचाई 6 फ़ुट है जो भीतर जाकर 4 फ़ुट ही रह जाती हैं। नाट्यशाला को प्रतिध्वनि रहित करने के लिए दीवारों को छेद दिया है। प्रवेश द्वार के समीप खम्बे गाड़ने के लिए छेद बनाए हैं तथा एक ओर श्रीराम के चरण चिन्ह अंकित हैं। कहते हैं कि ये चरण चिन्ह महाकवि कालीदास के समय भी विद्यमान थे। मेघदूत में रामगिरि पर सिद्धांगनाओं(अप्सराओं) की उपस्थिति तथा उसके रघुपतिपदों से अंकित होने का उल्लेख भी मिलता है।

सीता बेंगरा में शिलालेखा
पिछले दिनों मै रामटेक की यात्रा पर गया था, वहां भी कहा गया कि कालीदास ने मेघदूत की रचना यहीं रामटेकरी पर की थी। विद्वानों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रो वी वी मिराशी द्वारा रामटेक(नागपुर) में रखे गए दो लकड़ी के खड़ाऊं आदि के आधार पर उसे रामगढ बनाने का प्रयास किया था। पर 1906 में पूना से प्रकाशित श्री वी के परांजपे के शोधपरक व्यापक सर्वेक्षण के "ए फ़्रेश लाईन ऑफ़ मेघदूत" द्वारा अब यह सिद्ध हो गया कि रामगढ(सरगुजा) ही श्रीराम की वनवास स्थली एवं मेघदूत का प्रेरणास्रोत रामगिरी है। इस पर्वत के शिखर की बनावट आज भी वप्रक्रीड़ा करते हाथी जैसे है। सीता गुफ़ा के प्रवेश द्वार के उत्तरी हिस्से में तीन फ़ुट आठ इंच लम्बी दो पंक्तियाँ(जिसमें 2.5 इंच अस्पष्ट) उत्कीर्ण हैं। जो किसी राष्ट्र स्तरीय कवि सम्मेलन का प्रथम प्रमाण कही जा सकती हैं। "आदिपयंति हृदयं सभाव्वगरु कवयो ये रातयं… दुले वसंतिया! हासावानुभूते कुदस्पीतं एव अलगेति। अर्थात हृदय को आलोकित करते हैं, स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में… वासंती दूर है। संवेदित क्षणों में कुन्द पुष्पों की मोटी माला को ही आलिंगित करता है।" इस पंक्ति का मैने छाया चित्र लिया। 

सीताबेंगरा नाट्य शाला के समक्ष लेखक
गुफ़ा को भीतर से अच्छे से देखा तथा वहां बैठ कर अहसास किया कि उस जमाने में जब यहां नाटक खेले जाते होगें तो यहां से पहाड़ी के नीचे का दृश्य कैसा दिखाई देता होगा? पात्रों के संवाद बोलने के समय उनकी आवाज कहां तक जाती होगी? गुफ़ा तक जाने के लिए पहाड़ियों को काटकर पैड़ियाँ बनाई गयी हैं। नाट्यशाला(सीता बेंगरा) में प्रवेश करने के लिए दोनो तरफ़ पैड़ियाँ बनी हुई हैं। प्रवेश द्वार से नीचे पत्थर को सीधी रेखा में काटकर 3-4 इंच चौड़ी दो नालियाँ जैसी बनी हुई है। शायद यहीं पर नाटक करने के लिए मंच बनाया जाता होगा। कालीदास के मेघदूत का यक्ष इसी जोगीमारा गुफ़ा में रहता था जहां उसने प्रिया को प्रेम का पावन संदेश दिया था यही के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कालीदास ने मेघदूत में किया है। यहीं पर जल का कुंड है। वनौषधियाँ, कंदमूल फ़ल भी इस स्थान पर प्रचूर मात्रा में मिलते हैं। गुफ़ा के सामने शासन द्वारा मंच बनाकर इसके प्राकृतिक सौंदर्य को समाप्त कर दिया गया है। सीमेंट से बना यह मंच मखमल में टाट का पैबंद नजर आता है। पर्यटकों की सीधी पहुंच गुफ़ा तक होने के कारण इसका भी क्षरण हो रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो इसका प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त हो सकता है।

180 फ़ुट लम्बी सुरंग"हाथी पोल"
गुफ़ा के नीचे पहाड़ी में हाथी पोल नामक सुरंग है। इसकी लंबाई 180 फ़ुट है। पहाड़ी उस पार के निवासी इस गुफ़ा सुरंग के रास्ते सीता बेंगरा तक आते हैं। यह सुरंग इतनी ऊंची है कि इसमें हाथी आसानी से पार हो जाते हैं। इसीलिए इसे हाथी खोल या हाथी पोल कहा जाता है। हम सीता बेंगरा गुफ़ा से नीचे उतर कर हाथी पोल सुरंग में पहुचे, यहाँ सामने खड़े होने पर सुरंग से दूसरे सिरे आता हुआ प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है। सुरंग के भीतर प्रवेश करने पर जानी पहचानी गंध आती है। यह गंध सभी पुरातात्विक स्थलों पर मिलती है। दिमाग भन्ना जाता है, इस गंध से मुझे प्राचीन जगह की पहचान होती है। यह गंध चमगादड़ के मल-मुत्र की है। जहाँ भी गुफ़ाओं या पुरानी इमारतों में अंधेरा रहता है चमगादड़ उसे अपना आदर्श बसेरा समझ कर निवास कर लेते हैं। सुरंग में पहाड़ी से कई जगह पानी रिस रहा है, आए हुए लोग इस पानी को पी रहे हैं। कुछ लोग धूप से बचने के लिए सुरंग में नींद ले रहे है, एक महिला और उसकी बेटी पत्थरों का चुल्हा बनाकर भोजन बना रही है और खाने के लिए ताजा पत्तों की पत्तल का निर्माण हो रहा है। इससे प्रतीत होता है कि आदिम अवस्था में मनुष्य इन कंदराओं में ऐसे ही गुजर बसर करता होगा।

रामगढ पहाड़ी का दृश्य
महाकवि  कालिदास का रामगिरि और सीतबेंगरा से गहरा नाता है। यह पुरातात्विक प्रमाण और कालिदास द्वारा रचित मेघदूत से मिलते हैं। हम कालिदास से तो मिले नहीं पर उनके द्वारा रचित मेघदूत के छंद और यक्ष-प्रिया की प्रेम कथा अभी तक रामगढ के वनों में पहाड़ियों में गुंज रही है। आज भी मधुमक्खियों के छत्तों से उत्तम मकरंद झर रहा है। महुआ के वृक्ष फ़ल फ़ूल रहे हैं, सरई (साल) के वन गर्व से सिर उठाकर आकाश की ऊंचाई से होड़ लगा रहे हैं। गजराज आज भी अपनी उपस्थिति इस अंचल में बनाए हुए हैं। यहां के हाथी इंद्र के एरावत से कम नहीं है। डील-डौल और कद में उतने ही मजबूत है। आषाढ के प्रथम दिन वर्षा का आगमन नहीं हुआ है। बदला है तो सिर्फ़ प्रकृति का चक्र बदला है। मानसून के आगमन की तिथि पीछे रह गयी। वही मांदर की थाप वनवासियों का नाच हो रहा है। जो रामगढ की गौरव गाथा गा रहे हैं उल्लासित होकर। रामगढ से लौट आया पर मेरा मन उन्हीं कंदराओं में अटका हुआ है जहाँ भगवान श्रीराम के चरण पड़े थे, सीता माता ने निवास किया था। महाकवि कालीदास ने मेघदूत रचा था, जहाँ सुतनुका देवदासी और रुपदक्ष (मेकअप मेन) श्रेष्ठी देवदीन का प्रेम हुआ था। फ़िर कभी लौट कर आऊंगा रामगढ यक्ष बनकर प्रिया से मिलने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस में।