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गुरुवार, 31 मई 2012

धरती पर यमराज के एजेंट --- ललित शर्मा

सुबह की सैर पर आज हल्की फ़ुल्की चर्चा ने गंभीर मोड़ ले लिया। बंसी काका कहने लगे - "अब बीमार होने से भी डर लगने लगा है, आम आदमी चाहता है कि बीमार ही न हो। सोचने से क्या होता है? पता नहीं कब धरती के यमराजों (डॉक्टर, दवा विक्रेता और दवा निर्माता) के हत्थे चढ जाए, बच गया तो घर द्वार बेच कर सड़क पर आ जाएगा अन्यथा राम नाम सत्य तो मान ही लो।" बंसी काका की बात पर मुझे भी सोचना पड़ा। अगर राम नाम सत्य हो गया तो परिजनों को दोहरी मार झेलनी पड़ेगी, परिजन की मृत्यू एवं कर्जे के दलदल में फ़ँसने की। धरती के यमराजों का गिरोह उन्हे कहीं का नहीं छोड़ेगा। हर डॉक्टर का अपना बंधा-बंधाया पैथालाजिस्ट है। अगर उसके सजेस्ट किए पैथालाजिस्ट के पास न जा कर किसी दूसरे के पास चले गए तो दोहरा खर्च होगा और डॉक्टर के बताए पैथालाजिस्ट से ही टेस्ट करवाने पड़ेगें । कई डॉक्टरों और पैथालाजिस्टों में इतनी सेटिंग होती है कि डॉक्टर स्वस्थ मरीज को भी बहुत सारी जाँच लिख देता है और पैथालाजिस्ट सैम्पल लेकर बिना जाँच किए ही रिपोर्ट दे देता है कि सारे टेस्ट नार्मल हैं। टेस्ट करने की ज़हमत कौन उठाए, बिना किए ही रिपोर्ट देकर लूट का माल आधा-आधा ईमानदारी से बांट लिया जाता है।

हद तो तब हो गई जब एक नामी गिरामी अस्पताल में मैने 80 साल की महिला रिश्तेदार को भर्ती किया। उम्र का असर उन पर हो रहा था और स्मृति कमजोर होती जा रही थी। उन्हे न्युरोफ़ीजिशियन को दिखाया गया। न्यूरोफ़ीजिशियन ने दूनिया भर के टेस्ट लिख दिए और पर्ची मुझे थमा दी। सभी टेस्ट लगभग 5000 रुपए के थे। मरीज को भर्ती कर लिया गया और मैने एडवांस पेमेंट कर दिया पैथालाजी टेस्ट का भी। दूसरे दिन जब मुझे पैथालाजी टेस्ट का बिल दिया गया तो उसमें 900 रुपए HIV टेस्ट के भी थे। मुझे बड़ी कोफ़्त हुई कि 80 साल की उम्र में भी मरीज का HIV टेस्ट किया जा रहा है। अगर इन्हे HIV होता भी तो इतने साल तक जीना मुश्किल था। इतनी तो कामन सेंस आम आदमी के पास भी है। डॉक्टर को जब इस बारे में पूछा तो उसने कहा कि " बड़ा अस्पताल है, कोई बीमारी छूट न जाए इसलिए सारे टेस्ट कराने पड़ते हैं।" इसे कहते हैं मरीज की जेब पर सरासर डाका, लूट लो इंडिया मिल के। अस्पताल संचालकों से लेकर डॉक्टरों तक की सीधी पहुंच राजनेताओं तक होती है। उनको भी इनसे ईलाज करवाना होता है, इसलिए शिकायत होने पर भी कोई कार्यवाही नहीं होती। एक नर्सिंग होम संचालक एक फ़ोन पर शिकायत करने से छत्तीसगढ के तत्कालीन डीजी स्वयं पहुच गए थे फ़ोर्स लेकर।

गाहे-बगाहे समाचार मिलते ही रहते हैं इन नर्सिंग होम्स की कारगुजारियों के। डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, उसे प्राण दाता मान लिया गया। मरीज अपने प्राण उसके हाथों में सौप देता है। शल्य चिकित्सा से पश्चात पेट में तौलिया, गाज बैंडेज, कैंची या अन्य औजार छोड़ना तो आम बात हो गयी। कुछ डॉक्टर को इतने एक्सपर्ट हैं कि मरीज की नब्ज के साथ उसकी जेब की नब्ज भी भांप लेते है फ़िर वैसा ही ईलाज करते हैं। व्यवसायिकता का रोग इन्हे भी लग गया और सेवा भाव तिरोहित हो गया। जहाँ धर्मार्थ चिकित्सालय है वहाँ पर भी ये नजर नहीं आते। कम्पाउंडर ही दवा-पानी देकर ईलाज कर देता है। किडनी रैकेट के खुलासे के बात डॉक्टरों की हैवानियत की पराकाष्ठा सामने आई है। महाराष्ट्र के बीड़ जिले की परली तहसील के डॉक्टर दम्पत्ति सुदाम मुंडे एवं सरस्वती मुंडे गर्भपात के पश्चात अपने पालतु कुत्तों को कन्या भ्रुण खिला देते थे। जिससे गर्भपात के सबूत का पता ही न चले। डॉक्टरों की अमानवीयता का एक सबसे बड़ा उदाहरण है। अब इन्हे देवता माने या दानव। रायपुर के अस्पतालों में तो कई वाकये हो चुके है कि मरीज की मृत्यू के पश्चात उसका मृत शरीर परिजनों को तब तक नहीं सौंपा गया जब तक उन्होने उनके बिल की रकम जमा नहीं करवा दी।

बड़ी-बड़ी दवा कम्पनियाँ कभी भी अपने प्रोडक्ट का विज्ञापन किसी अखबार या टीवी चैनल पर नहीं करती। उनके प्रतिनिधि सीधे डॉक्टर से मिलते है और कम्पनी के प्रोडक्ट की जानकारी देते हैं साथ ही उनकी कम्पनी की दवा लिखने पर गिफ़्ट क्या होगा ये तय हो जाता है। एक वाकया मेरे साथ ही घटा, हिमाचल पहुचने पर ऊंचाई के कारण मुझे कुछ हरारत सी महसूस हुई। डॉक्टर को फ़ोन लगा कर दवाई की सलाह माँगी। उसने सर्दी जुकाम की जो दवाई बताई उसकी 10 टेबलेट की स्ट्रिप लगभग 600 रुपए की आई। बाद में घर आने पर अपने पारिवारिक डॉक्टर से पूछ तो उन्होने बताया कि जो इलाज 10 रुपए की दवाई से हो सकता था उसके लिए 600 रुपए खर्च करने पड़े। आंध्र प्रदेश का ही एक मामला सामने आया है। जिसमें डॉक्टर ने एक गाँव की लगभग 600 महिलाओं की बच्चे दानी निकाल डाली। यह एक लोमहर्षक एवं निंदनीय घटना है। इतना सब होने के बाद भी कभी नहीं सुना गया, किसी डॉक्टर को सजा हुई या उसकी पैक्टिस करने का लायसेंस खारिज किया गया हो। सब कुछ गोल माल है और मैनेज कर लिया जाता है।

सरकारी अस्पतालों में ईलाज के खोखले दावे होते हैं। अधिकतर डॉक्टर सरकारी नौकरी करते है पर अस्पतालों में नहीं जाते, अपनी सेवा निजि चिकित्सालयों एवं नर्सिंग होम्स में देते हैं। वेतन सरकार से लेते है और उपरी कमाई निजि नर्सिंग होम्स से करते हैं। गाँव महिला स्वास्थ्य रक्षण के नाम से नियुक्त मितानिनों का सम्पर्क निजि नर्सिंग होम्स से है। उन्हे मर्ज की गंभीरता एंव ईलाज के हिसाब से कमीशन दिया जाता है। एक मितानिन से चर्चा होने पर उसने बताया कि बच्चा दानी के आपरेशन का मरीज लाने पर 1000 रुपए मिलते हैं। निजि नर्सिंग होम्स की नजर हर जगह बच्चेदानी पर ही टिकी है, इसे निकालना भी आसान है और एक आपरेशन के 20-30 हजार मिल जाते हैं। सारे यमराज मिलकर फ़सल काटने में लगे हुए हैं। एक डॉक्टर मित्र का कहना था कि आप शहर के किसी भी नर्सिंग होम में चले जाईए पेट दर्द की शिकायत लेकर आपका 5-10 हजार तो सिर्फ़ टेस्ट में ही चला जाएगा। भले ही मरीज को कोई गंभीर समस्या न हो, अगर नर्सिंग होम् का बेड खाली है और रुम नहीं लगा है तो मानकर चलिए कि दूसरे मरीज के आते तक आपको ही उसका खर्च और किराया वहन करना है। हाथ आया मुर्गा इतनी आसानी से नहीं छोड़ा जाता। अधिक होगा तो आपरेशन थियेटर में ले जाकर बिना मतलब के ही एक लम्बा चीरा लगा कर सिलाई कर दी जाएगी और मरीज के परिजन समझेगें कि डॉक्टर ने बड़ा आपरेशन किया है, मरीज को बड़ी जद्दोजहद से बचाया है।

एक जमाना था जब डॉक्टर मरीज की नब्ज देख कर ही बीमारी पहचान लेता था और और कड़ुवी पुड़िया और लाल मिक्सचर देकर ईलाज कर दिया करता था। वर्तमान चिकित्सा को व्यावसाय बनाकर मरीजों के साथ खिलवाड़ के सिवा कुछ नहीं हो रहा। मंहगी से मंहगी दवाई लिखना आम बात हो गयी है। बड़ी दवाई कम्पनियों के पैकेज बने हुए हैं और डॉक्टर द्वारा दवाई लिखने एवं बिकने के हिसाब से उसका हिस्सा पहुंचा दिया जाता है। सरकार ने झोला छाप डॉक्टरों के खिलाफ़ अभियान छेड़ रखा है। जबकि गाँव में यही ग्रामीण चिकित्सक ही काम आते हैं। ब्लॉक मुख्यालय के समीप वाले गाँवों के मरीज तो सरकारी अस्पताल एवं निजि चिकित्सालयों तक पहुँच जाते है पर 10-15 किलोमीटर दूर के गाँवों में यही झोला छाप डॉक्टर ईलाज करके मरीजों को राहत दिलाते हैं। अगर झोला छाप डॉक्टर न हों तो ग्रामीण क्षेत्र में मरीजों का ईलाज ही नहीं हो सकता। झोला छाप डॉक्टरों को सरकार द्वारा प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण देकर प्रमाणित करना चाहिए जिससे वे ग्रामीण क्षेत्रों में ईलाज मुहैया करवा सकें। सभी डॉक्टरों को एक ही तुला में नही तोला जा सकता। कुछ डॉक्टर है जो अपना काम ईमानदारी एवं लगन से कर रहे हैं जिनके भरोसे ही डॉक्टरों पर विश्वास कायम है। लेकिन अधिंकाशत: डॉक्टरों ने चिकित्सा को व्यवसाय बना लिया है और धरती पर यमराज के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। बंसी काका का कहना सही है कि अब बीमार होने से भी डर लगने लगा है।

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' -- ललित शर्मा

जीभ गई स्वाद गया, आँख गयी संसार गया। संसार को देखने के लिए आँखों की जरुरत है। जिसकी आँखें नहीं उसे लाचारी का जीवन जीते देखा है, वह कहीं न कहीं कि्सी और पर आश्रित होकर जीवन बिताता है। किसी की आँखे जन्म से ही नहीं होती, वह संतोष कर लेता है कि ईश्वर को यही मंजूर था, जिसकी आँखे थी और किसी की लापरवाही से उसकी रोशनी चली गयी तो उसका जीवन कंटकाकीर्ण हो जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ छत्तीसगढ के बालोद नेत्र शिविर में। ज्ञात हो कि छत्तीसगढ स्वास्थ्य संचनालय द्वारा 1 सितम्बर से 30 सितम्बर तक प्रदेश स्तर पर "नेत्र ज्योति मेले" का आयोजन किया गया था। यह मेला सभी ब्लॉक मुख्यालयों पर आयोजित था। नेत्र शिविर में मरीजों की नेत्र जाँच से लेकर मोतियाबिंद का आपरेशन भी किया गया। एक नेत्र चिकित्सक मित्र को फ़ोन लगाया तो उसने कहा कि "अभी सीजन है, लूवाई (फ़सल कटाई) चल रही है।" कहने का तात्पर्य यह था कि वह आँखों के आपरेशन में व्यस्त है।

नगर के धर्मादा संस्थाओं एवं शासकीय सहयोग से नेत्र शिविर का आयोजन होता है। जिसमें गरीब तबके लोग आँखों का इलाज कराने आते हैं। उनके पास निजी अस्पतालों में जाकर इलाज कराने के लिए धन नहीं होता। इसलिए नेत्र शिविर से लाभ उठाते हैं। बालोद के नेत्र शिविर में चिकित्सकों  की लापरवाही से लगभग 40 मरीजों की आँख की रोशनी चली गयी। उनकी आँख में संक्रमण होकर मवाद भर गया। अब बिगड़ी हुई आँख का कहीं इलाज संभव नहीं है। इसका दुखदाई पहलू यह है कि शासन इस आँख फ़ोड़ू काँड को गंभीरता से नहीं ले रहा है। लापरवाह चिकित्सकों को बचाने की कोशिश उच्च स्तर पर जारी हैं। गरीब का हर जगह मरण है। तीन चार डॉक्टर मिल कर दो दिवसीय शिविर में 300 से अधिक आँखों का आपरेशन कर डालते हैं। तो इसे लुवाई की संज्ञा देने में कोई बुराई नहीं है। संक्रमित शल्य उपकरण जब एक आँख से दूसरी आँख में लगेगें तो उसका दुष्परिणाम सामने आएगा ही।

डॉक्टरों को सरकार ने प्राईवेट पैक्टिस करने का अधिकार दे रखा है, अधिकांश डॉक्टरों ने अपने परिजनों के नाम से निजी नर्सिंग होम खोल रखे हैं और सरकारी नौकरी करते हुए धड़ल्ले से निजी पैक्टिस जारी है। सरकारी अस्पताल को खाला का घर समझ रखा है, जब मनचाहे आओ और जाओ। तनखा तो पक ही जाएगी। कुछ डॉक्टर मंत्रियों के चहेते हैं, हमेशा शहर में ही पदस्थ रहना चाहते हैं। उच्चाधिकारियों के नोटिस और मेमो का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। "सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का होए"। एक उच्चाधिकारी ने कहा कि - मास्टर और डॉक्टर का ट्रांसफ़र करना सबसे कठिन होता है। क्योंकि इनके संबंध किसी न किसी नेता या उच्चाधिकारी से होते हैं। इन पर हाथ डालते ही तुरंत उनकी पैरवी आ जाती है। इसलिए इन्हे न छेड़ें तो ही ठीक है।

लापरवाही से 40 गरीब मरीजों की आँख की रोशनी चली गई, इसके लिए अभी जिम्मेदारी तय नहीं हुई है। लापरवाही से इलाज करके किसी का अंग-भंग कर देना बड़ा अपराध है। मरीज डॉक्टर पर विश्वास करके अपनी जान उसके हाथ में सहर्ष सौंप देता है। प्राण बचाने वाला भगवान समझ कर उसकी वंदना भी करता है। पर पैसे की पीछे भागते डॉक्टरों ने लोगों का यह भ्रम तोड़ दिया। अब इन्हे भगवान समझने वाला जमाना चला गया। एक हाथ दे और एक हाथ ले। लापरवाही का आचरण करने वाले इन चिकित्सकों पर भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अंग-भंग का अपराध दर्ज कर इन्हे जेल भेजा जाना चाहिए और प्रभावितों को उचित मुआवजा इनके वेतन से दिया जाना चाहिए। जिससे अन्य लापरवाह डॉक्टरों को सबक मिल सके। भविष्य में लापरवाही के प्रति सचेत रहें।

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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

"माल प्रैक्टिस" का जमाना ------- ललित शर्मा

कहावत है कि अस्पताल, थाना, कचहरी व्यक्ति अपनी खुशी से नहीं जाता। मजबूरी में ही जाना पड़ता है। व्यक्ति को जीवन में चिकित्सकों से पाला पड़ता ही है, शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा मिले जिसे डॉक्टर के पास न जाना पड़ा हो,चिकित्सा को विश्वास का पेशा माना गया है और चिकित्सक को भगवान। मरीज अपने प्राण चिकित्सक के हाथ में सहर्ष सौंप देता है। समाज में यह पेशा प्रतिष्ठा का माना जाता है, अगर हम किसी भी व्यक्ति से पूछे तो सबसे पहले वह अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है। उसके पश्चात अन्य पेशे के विषय में सोचता है। पहले और वर्तमान के चिकित्सकों की कार्य प्रणाली में अत्यधिक बदलाव देखा जा रहा है।

पहले डॉक्टरी के पेशे को सेवा भाव के से किया जाता था, डॉक्टरों का कार्य मरीज की सेवा सुश्रुषा करके स्वास्थ्य प्रदान करना था। वर्तमान में चिकित्सा का पेशा व्यावसायिकता की पराकाष्ठा पर पहुंच चुका हैं। इनकी कारगुजारियाँ और स्थिति यह है कि अब मरीज मजबूरी में ही इनके पास जाना चाहता है तथा एक बार किसी नर्सिंग होम या अस्पताल में भर्ती हुए तो समझ लो सारा बैंक बैलेंस खत्म। ॠण लेकर ही इनकी जेब भरनी पड़ेगी। ऐसा नहीं है कि मैं सभी चिकित्सक समाज को एक तुला पर ही तौल रहा हूँ, कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो पूर्वजों से मिले उत्तम संस्कार के द्वारा मानवीय मूल्यों को समझ कर पेशे की पवित्रता कायम रखे हुए हैं।

एक डॉक्टर मित्र से इस विषय पर चर्चा हो रही थी, तो उन्होने कहा कि अब डॉक्टर "माल प्रैक्टिस" पर उतर आए हैं। इनसे ही मुझे प्रैक्टिस के नए तरीके के विषय में पता चला। साथ ही "माल प्रैक्टिस" क्या होती है, इस विषय में भी। मानवता को दरकिनार कर लूटने में लगे हुए हैं। एक मित्र ने बताया कि उनकी पत्नी को बच्चा होने वाला था, नर्सिंग होम लेकर गए, वहाँ डॉक्टर ने सभी पैथालाजिकल, सोनोग्राफ़ी एवं अन्य टेस्ट कराए। उसके पश्चात पेशेंट को अकेले में समझाया गया की पेट में बच्चे ने गंदा पानी पी लिया है और पॉटी कर सकता है, जिससे जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा है। इसलिए सिजेरियन आपरेशन तुरंत करना पड़ेगा। 20,000 रुपए जमा करवा दीजिए। मित्र ने रुपए जमा कराए और ऑपरेशन के फ़ार्म पर हस्ताक्षर कर दिए। थोड़ी देर बाद बिना ऑपरेशन के ही उनकी पत्नी ने बच्चे को जन्म दे दिया। जच्चा-बच्चा दोनो स्वस्थ्य थे। ईश्वर ने डॉक्टर के षड़यंत्र को विफ़ल कर दिया।

वर्तमान में अतिरिक्त कमाई के लालच में 90% जच्चाओं के सिजेरियन ऑपरेशन कर दिए जाते हैं,"माल प्रैक्टिस" जोरों पर है। बच्चे के जन्म लेने के तीसरे-चौथे दिन उसकी त्वचा हल्की पीली दिखाई देती है। तब उसे तुरंत पीलिया बता कर नीले प्रकाश में रख दिया है। जहाँ 1000 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक प्रतिदिन का चार्ज वसूला जाता है। जच्चा और बच्चा दोनो से "माल पैक्टिस" चालु है। "माल प्रैक्टिस" करने वाले डॉक्टरों ने चिकित्सा जैसे पावन पेशे को बदनाम कर दिया। अस्पताल जाने के नाम पर जेब और रुह दोनो काँप जाती है। प्राण बचे न बचे पर अस्पताल का चार्ज ले ही लिया जाता है। किडनी एवं शरीर के अन्य अंग चोरी से निकालने के समाचार मिलते ही रहते हैं।

सिजेरियन ऑपरेशन के बाद अब महिलाओं की बच्चे दानी निकालने का काम जोरों पर चल रहा है। किसी महिला को कमर के नीचे थोड़ा सा भी दर्द हुआ तो समझ लो बच्चे दानी निकलवाने की सलाह डॉक्टर तुरंत दे देते हैं। 25-30 साल की महिलाओं की बच्चे दानी बेधड़क निकाली जा रही है। भले ही फ़िर उस महिला को जीवन भर भुगतना पड़े। गर्भाशय निकालने के इस दुष्कृत्य में ग्रामीण स्वास्थ्य रक्षकों के रुप में तैनात "मितानिन" मुख्य तौर पर सम्मिलित हैं। निजी नर्सिंग होम संचालकों ने इन्हे मोबाईल बांट रखे हैं, साथ ही गर्भाशय आपरेशन के प्रत्येक मरीज पर 1000 से 2000 रुपए का का कमीशन तय है। कुछ दिनों पूर्व समाचार था कि मृत शरीर को वेंटिलेटर पर रख कर हजारों रुपए वसूल लिए गए। डॉक्टर का कहना था कि मशीनों का चार्ज तो लेना ही पड़ेगा। मरीज चाहे बचे या न बचे। इस पेशे से संवेदनाएं समाप्त होती जा रही हैं। गरीब आदमी का तो मरण ही है। सरकार ने चिकित्सा बीमा योजना शुरु की है इसमें भी ये घोटाला करने से बाज नहीं आ रहे। मरीज के चिकित्सा बीमा की राशि को ध्यान में रख कर बिल बनाया जाता है। एक ही झटके में उसका सारा बीमा बैलेंस खाली कर दिया जाता है।

सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा नागरिकों को भी जागरुक होने की आवश्यकता है। अगर मरीज को उपभोक्ता के तौर पर देखा जा रहा है तो इन डॉक्टरों से दुकानदार जैसा ही व्यवहार होना चाहिए तथा सजा निश्चित की जानी चाहिए। चिकित्सकीय लापरवाही से हुई मौत पर हत्या का अपराध दर्ज होना चाहिए। लापरवाही के कारण कभी किसी के पेट में कैंची, गॉज बैंडेज या तौलिया छोड़ने जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी। इनकी लापरवाही की सजा तो मरीज को ही भुगतनी पड़ती है।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

दांत का दर्द में लूट डॉक्टर की

दांत में अचानक दर्द हो गया, मैं रात की बस से जगदलपुर से आ रहा था. बस में लेटे-लेटे दर्द से व्याकुल हुआ तो आखिर में बैग में पड़ी एक दर्द निवारक दवाई लेनी ही पड़ गई, सोचा थोडा दर्द कम हो जायेगा. लेकिन दवाई लेने के बाद भी दर्द कम नहीं हुआ.

जैसे-तैसे रात कटी. सुबह घर पहुंचा. सोचा कि अब डॉक्टर को दांत दिखाना चाहिए, नहीं तो दर्द के मारे बुरा हाल हो जायेगा. ये सोच कर मैंने दांत के डॉक्टर की तलाश की, वैसे तो शहर में सैकड़ों डॉक्टर हैं, पर मैं थोडा विश्वास का डॉक्टर चाहता था. एक बार पहले भी एक दांत निकलवाया था.

मैं पता करके डॉक्टर के पास पहुंचा, तो हमारे विख्यात चित्रकार डी.डी. सोनी जी मिल गए, वो बोले कहाँ ?

 डॉक्टर के पास जाते हो? मैं एक मंजन बताता हूँ, उसे लगाओ और दांत की सारी बीमारी ठीक हो जाएगी. मैंने उनकी बात की तरफ ध्यान ही नही दिया और क्लिनिक में घुस गया।


एक बहुत सुन्दर सुसज्जित केबिन, जिसमे कंप्यूटर आदि लगा कर सजाया गया था, डॉक्टर ने मेरा दांत देखा, और कहा कि आपका जो दांत निकला हुआ है. उसे फिर से लगाना पड़ेगा कई दांत दिखाए और नाप देने को कहा.

मैंने कहा कि अभी मै बाहर दौरे पर जा रहा हूँ, आने के बाद नाप दे दूंगा. पहले इस दर्द का इलाज करो, पेन किलर से भी ठीक नहीं हो रहा है. उसने कहा कि आप 1000 रूपये जमा करवा दो, मैंने 1000 रूपये जमा कर दिये, उसने कहा कि आपके दांतों की सफाई करने पड़ेगी,फिर दर्द ठीक हो जायेगा.

उसने कुर्सी पर बिठा कर दांत की सफाई कर दी और लग-भग 500 रूपये की गोली दवाई पेस्ट इत्यादि लिख दिया. हमारी दुबारा मिलने की तारीख भी तय हो गई, जब दांत का नाप देना था. उसने कहा कि जब आप दुबारा आओगे तो आपके दांत की सफाई एक बार और कर दूंगा, उसका चार्ज नहीं लगेगा।


मैं केरल के दौरे पर चला गया, कुछ दिन तो दर्द ठीक रहा, वापसी में एक दिन फिर शुरू हो गया, मैं फिर से उस डॉक्टर के पास गया. तो उसने एक दांत की कीमत 800 से 2000 तक बताई, और एक दांत के लिए तीन दांत लगाने पड़ेंगे. मैं अब समझ चुका था कि ये डॉक्टर "माल प्रैक्टिस" पर उतर आया है.

मैंने कहा आप दांत की सफाई कर दो. तो उसने देख कर कहा कि अब सफाई की जरुरत नहीं है. अभी कुछ दिन पहले तो की थी. मैंने कहा अब मेरा हिसाब कर दो, जो मैंने 1000 रूपये जमा करवाए हैं. देखो उसमे से कितने रूपये बचे हैं ?

मुझे वापस कर दो. मुझे नए दांत नहीं लगवाने. तो डॉक्टर बोला वो तो हो गए दांत सफाई के, येल्लो गयी भैंस पानी में, दिन दहाड़े डाका पड़ गया। जिन दांतों की सफाई 60 रूपये में करवाई थी. उसके एक हजार रूपये. मैं अपना बैग उठा कर चुपचाप चला आया,

आते ही मैंने डी.डी. सोनी के बताये हुए 40 रूपये के मंजन को मंगवाया और उसका इस्तेमाल किया, तब से आज तक दांत में दर्द नहीं हुआ है.

सारे डॉक्टर लूटेरे नही हैं, पर कुछ डॉक्टर तो ऐसे हैं जो मर्ज से पहले मरीज को ही ठिकाने लगाने का काम करते हैं, बेख़ौफ़ हो कर. लेकिन कुछ हैं जिन्होंने इस पेशे को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

हमारे एक डॉक्टर मित्र हैं, उन्होने दिव्य दृष्टि पाई है। बिना किसी एक्स रे के ही जान जाते हैं कि मरीज जेब में कितने रुपए लेकर आया है और कितने रुपयों तक का इलाज झेल जाएगा। उसके बाद उसका मुंडन शुरु कर देते हैं। किसी ने सही कहा है:-

इनको  क्या  काम  है मुरव्वत से 
ये  अपने  रुख  से  मुंह  ना मोड़ेंगे 
फरिस्ते  शायद  जान  छोड़ भी दें
पर डॉक्टर अपनी फ़ीस ना छोड़ेंगे

शनिवार, 24 जुलाई 2010

अस्पतालों की माल प्रेक्टिस पर लगाम कौन लगाए?

कल अस्पताल के चक्कर लगाते रहे, भतीजी को कुछ सर्दी की तकलीफ़ थी। इसलिए सुबह जल्दी भागना पड़ा। डॉक्टर को दिखाए, उसने 2800/ के पैथालाजिकल टेस्ट लिख दिए 200 रुपए ओपीडी की फ़ीस बनी। उसको सिर्फ़ मौसमी तकलीफ़ थी।

टेस्ट की रिपोर्ट आने के बाद 300 की दवाई ली गयी। अब देखिए 3000/ का टेस्ट और 300 की दवाई। डॉक्टर फ़िजिकली कुछ भी एक्जामिन नहीं करना चाहते। वर्तमान में मेडिकल कालेजों में यह कैसी पढाई हो रही है? पहले के डॉक्टर तो सिर्फ़ आँख, जीभ, सांस और नाड़ी देखकर ही बता दे्ते थे कि मरीज को कौन सी बीमारी है?

 और 5 रुपए की दवाई में सब ठीक कर देते थे। आँखे देख कर पीलिया पहचान लेते थे। टाईफ़ाईड, मलेरिया, उच्चरक्तचाप, प्रमेह इत्यादि जान लेते थे और कारगर इलाज के साथ दवाईयाँ भी दे देते थे।

आज तो सेकंड और थर्ड ओपिनियन की जरुरत पड़ती है और उसके साथ उनकी ओपिनियन की फ़ीस भी जुड़ जाती है। दूभ्भर को दो असाढ। डॉक्टर का काम आसान हो गया है, पहले पूरे टेस्ट करवा लो और फ़िर दवाई लिख दो। स्वयं तो कु्छ भी दिमाग पर जोर डालने की आवश्यकता नहीं है। बीमारी की पहचान करने की आवश्यकता नहीं है।

मरीज किसी और बीमारी के इलाज के लिए भर्ती होता है और उसकी मौत किसी दूसरी बीमारी से होती है। लापरवाहियाँ होती है जिससे मरीज की जान भी चली जाती है।

मित्र ने एक दिन सुबह-सुबह फ़ोन किया और बताया कि वे अपने बड़े भाई को पैर में दर्द के इलाज के लिए रायपुर के बड़े अस्पताल में लेकर आए हैं। मैं सुबह 10 बजे अस्पताल पहुंचा उनका इलाज हड्डी वाले डॉक्टर कर रहें। उनसे अस्पताल में मिल कर निकला।

शहर आने के बाद कई काम हो जाते हैं उन्हे भी कर लिया जाए। थोड़ी देर बाद मित्र का फ़ोन आया कि उनके बड़े भाई को ब्रेन हेमरेज हो गया है और वे कोमा में चले गए हैं। डॉक्टर आपरेशन करना चाहते हैं तुरंत ही ब्लड की आवश्यकता है।

मैने कहा तुम काम शुरु करवाओ मैं ब्लड का इंतजाम करता हूँ। मैने तत्काल मित्रों को फ़ोन कर तीन बोतल ब्लड का इंतजाम किया और अस्पताल पहुंचा।शाम 4 बजे आपरेशन शुरु हुआ जो रात नौ बजे तक चलता रहा।

मित्र ने बताया कि रात को उनके भाई ने कुछ धुंधला दिखने की शिकायत की थी नर्स से। डॉक्टर घर चले गए थे, उनसे फ़ोन करके नर्स ने पूछा तो डॉक्टर ने फ़ोन पर कह दिया कि नींद की गोली दे दो। मैं सुबह आकर देखता हूं।

तब तक उन्हे ब्रेन हैमरेज हो चुका था। हो सकता था कि रात को ही उन्हे संभाल लि्या जाता तो बच जाते शायद। 2लाख रुपए का बिल भी बना और मर्ज के साथ मरीज भी चला गया। मैने रात को ही प्राईवेट एम्बुलेंस करके उनके शव को अम्बिकापुर भि्जवाया। अब बताईए कि किसकी लापरवाही थी।

एक स्वामी जी हैं आर्य समाजी, बड़े गुरुकुल के संचालक। एक बार उन्हे गर्मी के दौरान अटैक आ गया और उन्हे इसी अस्पताल में भर्ती किया गया। मेरे पास फ़ोन आया तब तक वो कोमा में जा चुके थे। अस्पताल पहुंच कर उन्हे दे्खा तो मुझे लगा कि बच नहीं पाएगें। मैने ईश्वर से प्रार्थना की और बाहर निकल आया।

वीआईपी थे इसलिए दिल्ली से भी उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही थी। शहर के सारे नामी डॉक्टर लगे हुए थे। वे दो महीने तक कोमा में रहे। उसके बाद उनके गुरुजी आए जो उस समय शतायु हो चुके थे। नामी आर्युवेदाचार्य थे, उन्होने डॉक्टरों से कहा कि आप दो माह से चिकित्सा कर रहे हैं क्या कोमा से वापस आने की आशा है?

डॉक्टरों ने अनिश्चितता जाहिर की। स्वामी जी ने कहा कि आप आहार नली को छोड़ कर आक्सीजन समेत सब हटा लें। अब मुझे अपनी चिकित्सा करने दें।

उसके बाद उन्होने सबको बाहर निकाल कर कमरे का दरवाजा बंद किया। अपने साथ लाई हुई औषधियां दी। तीसरे दिन मरीज को होश आ चुका था और उसके बाद से आज तक सतत काम कर रहे हैं।

वर्तमान में इलाज बहुत मंहगा हो गया है, अगर किसी गरीब के घर में कोई बीमार हो गया तो उसे अपना घर-द्वार बेचना ही पड़ता है।

कहने को तो सरकारी अस्पताल हैं लेकिन वे हमेशा दवाईयों एवं स्टाफ़ की कमी से जूझते रहते हैं। फ़िर वहां मरीज का भगवान ही मालिक है। अगर आप वहां से सही सलामत वापस आ गए तो भगवान को धन्यवाद दिजिए।

अभी कल ही पिथौरा(छ ग) का एक प्रकरण सामने आया है कि प्रसव के दौरान महिला डॉक्टर ने गर्भनाल की जगह बच्चे का हाथ ही काट डाला। फ़िर उस हाथ को टांके लगा कर जोड़ दिया और उसके परिजनों से कह दिया कि बच्चे की मौत हो गयी है।

बच्चे को एक ट्रे में डालकर पटक दिया। जब बच्चे की दादी ने अचानक उसमें हरकत देखी तो इस मामले का खुलासा हुआ। हंगामा होने पर उस डॉक्टर के खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज करके गिरफ़्तार किया और फ़िर थाने से ही 10,000 के मुचलके पर छोड़ दिया।

कितनी बड़ी लापरवाही है जन्म से ही बच्चे का अंग भंग कर दिया और अपनी गलती छिपाने के लिए मृत भी घोषित कर दिया।

कब सुधरेगी हमारी चिकित्सा व्यवस्था? क्या आज ईलाज कराना एक आम आदमी के बस की बात है? दवाइयों के मूल्य पर कोई नियंत्रण नहीं है। पैसे देकर भी असली दवाई मिलने की कोई गारंटी नहीं।

ऐसे में लुट-पिट कर मरने से अच्छा है कि हाराकिरी कर ली जाए। कम से कम बच्चों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ तो नहीं पड़ेगा। इलाज के लिए जमा पूंजी भी गंवाई और जान भी नहीं बची।

पहले जहां 10 पैसे की आनंदकर टिकिया से सरदर्द का इलाज हो जाता था। आज उसके लिए 100 रुपए की टेबलेट खानी पड़ रही है। कहां जा रही है हमारी चिकित्सा व्यवस्था?

गुरुवार, 25 मार्च 2010

मंहगी दवाई, मंहगा इलाज-कौन पोंछे गरीबों के आंसु?

सुबह अस्पताल पहुँचा एक मित्र का हाल-चाल पूछने तो देखा कि अस्पताल के गेट पर सुखवंतिन खड़ी-खड़ी रो रही थी। मै उसे पूर्व से परिचित था, वह गांव की रहने वाली थी। मैने उसे रोने और अस्पताल आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि उसके पति का एक्सीडेंट हो गया है,

शाम को छुट्टी होने पर सायकिल से घर आ रहा था तो किसी मेम साहब ने कार से उसे टक्कर मार दी और फ़रार हो गयी। इधर उसे पुलिस वालों ने लाकर सरकारी अस्पताल मे भर्ती कर दिया। उसके दोनो पैर टुट गए थे। डॉक्टरों ने तत्काल आपरेशन की जरुरत बताई तथा 15 हजार का खर्चा बताया।

सुखवंतिन ने तुरंत गहने बेच कर कर्ज लेकर पैसे उपलब्ध कराए। उसका आपरेशन हो गया लेकिन अब दवाई के पैसे नही थे। उसने किसी से पैसे मांगे थे तो वह लेकर नहीं आया था।

अब यह एक बहुत बड़ी समस्या थी, इलाज के साथ दवाईयाँ भी मंहगी हो गयी, एक कमाते खाते आदमी पर अचानक विपत्ति आ जाए तो वह क्या करे? किसके पास जाए?

सरकारी अस्पतालों का रवैया तो कभी सुधरने वाला नही है। हमेशा सामान एवं दवाइयों की कमी का रोना रोते रहते हैं। निजी अस्पताल तो मरीज की मौत के बाद बिना पैसे लिए लाश नही देते, मुर्दे को ही ग्लुकोश चढाते रहते हैं,

इस विषय पर कई जगह हंगामा भी हो चुका है। दवाओं की कीमते बेलगाम हो गयी हैं, सभी का कमीशन दवाई कम्पनियों से बंधा हुआ हैं। 50 पैसे की गोली 10 रुपये में बेची जा रही है, दवाई कम्पनियों, रिटेल काउंटरो एव डॉक्टरों का गिरोह दोनो हाथों से मरीजों को लूट रहा है।

औसतन 2000 रुपये प्रतिमाह कमाने वाले परिवार को लगभग 300 से 400 रुपये बीमारी पर खर्च करने पड़ रहें हैं। बाकी बची हुई कसर नकली दवाएं पूरी कर रही हैं।

स्वास्थ्य पर कमाई का ज्यादा हिस्सा खर्च होने के कारण गरीबी और बढती ही जा रही है। योजना आयोग की रिपोर्ट (2009) में बताया गया है कि ग्रामीण भारत के जो लोग गरीबी रेखा के नी्चे आ रहे हैं उसमे आधे लोगों  के लिए इसका बड़ा कारण स्वास्थ्य पर खर्च है

अनुमान है कि वर्ष 2004-2005 में इस कारण लगभग 3करोड़ 90लाख लोग गरीबी की चपेट में आ गए। अब ये आंकड़े तो पुराने हैं आज के हालात का आप अंदाजा लगा सकते हैं।एक अध्ययन के अनुसार 1987-88 में इलाज करवाने के लिए 60%लोग सरकारी अस्पतालों में जाते थे। पर अब 40%लोग ही सरकारी अस्पतालों में जा रहे हैं।

जब कोई प्राईवेट डॉक्टर नही मिलता तभी हम सरकारी अस्पताल का रुख करते हैं। स्पष्ट है कि सरकारी अस्पताल और निजी अस्पताल दोनों में इलाज मंहगा हुआ है।

दवा कम्पनियों ने कीमतों में तेजी से वृद्धि की है। इन कीमतों पर तो सरकार का नियंत्रण समाप्त हो गया है। बड़ी कम्पनियों की मनमानी बढ गयी है।

हमारे देश में दवाईयों की कीमतों पर नियंत्रण करने के लिए एक आदेश 1995में जारी किया गया था। उस समय इसकी आलो्चना भी हुई थी कि यह अधुरा है अनेक जरुरी दवाएं इसकी दायरे में नहीं आती। इसकी बजाय दुसरा आदेश लाने पर विचार हुआ लेकिन 15वर्षों के बाद भी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण करने वाला आदेश लाया नही जा सका है।

इससे स्पस्ट है कि दवाई कम्पनियों का सरकार पर कितना दबाव है। सरकारी तंत्र की इच्छा शक्ति में कमी के कारण गरीब पिस रहे हैं बीमारी और मंहगाई के दो पाटों के बीच।

पता नही कितनी सुखवंतिन अस्पतालों के गेट के पास खड़ी अपने दुर्भाग्य को रो रही हैं। अपने सुहाग को बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रही हैं लेकिन नक्कार खाने में तूती की आवाज कौन सुनता है?

सिक्कों की खनक के सामने उसके करुण रुदन की कोई कीमत नही। मानवता मरते जा रही है, बाजारीकरण सब लील गया है और छोड़ गया है गरीबों को भगवान भरोसे मरने के लिए.............।