tourism लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
tourism लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

इहै नगरिया तू देख बबुआ …………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
प्राचीन राजधानी श्रीपुर के अवशेषों को देखने पर्यटक आते हैं, जरा चर्चा वर्तमान सिरपुर गाँव की भी कर ली जाए। प्राचीन राजधानी के वैभव को तो मैने देखा नहीं परन्तु उसके खंडहरों को देखकर उसके वैभव एवं महत्ता को महसूस किया है। वर्तमान में सिरपुर ग्लोब पर 21.40’51.13 उत्तर एवं 82.10’54.07 पूर्व में रायपुर से 81 किलोमीटर की दूरी पर महासमुंद तहसील, जनपद एवं जिलान्तर्गत आता है। इसका थाना क्षेत्र तुमगाँव है। सिरपुर के ढाई किलो मीटर पर नैनी नाला, 7 किलोमीटर पर मखमल्ला एवं खरखर नाला, 8 किलोमीटर पर धसकुड़ नाला एवं 12 किलोमीटर पर सुकलई नाला है। ये नाले महानदी में जाकर मिलते हैं। सुकलई नाला महासमुंद एवं बलौदाबाजार जिले की सीमा रेखा है।
महानदी के तीर सिरपुर एवं रायकेरा  तालाब 
पुष्पा बाई यादव सिरपुर ग्राम पंचायत की सरपंच एवं शंकर ध्रुव उपसरपंच हैं। सेनकपाट एवं खमतराई सिरपुर ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम हैं। 20 वार्डों में विभाजित इस पंचायत में लगभग 1700 मतदाता एवं 200 घर है। जिनमें 50% गोंड़ आदिवासी 30% कवंर एवं अन्य 20% में ब्राह्मण, राजपुत, चंद्राकर (कुर्मी) सतनामी, मोची, नाई, यादव, धीवर, निषाद, गिरी-पुरी आदि निवास करते हैं। यहाँ के 50% निवासी कृषक और 50% सरकारी कर्मचारी हैं।आस-पास के गाँवों का केन्द्र होने के कारण कर्मचारियों ने सिरपुर में निवास करना उपयुक्त समझा। ऐसा कोई घर नहीं है जिसमें किराएदार न बसे हों।
सिरपुर विहंगम दृश्य 
समीप के गाँवों अमलोर, पासिद, सुकुलबाय, लंहगर, बोरिद आदि का मुख्य बाजार सिरपुर ही है। यहाँ धान की खेती के साथ सब्जी का भी व्यवसाय बड़ी मात्रा में होता है। साप्ताहिक बाजार गुरुवार को भरता है जिसमें समीपस्थ गाँवों के निवासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की साप्ताहिक खरीदी खरीदी करते हैं। सिरपुर के मुख्य चौराहे पर 3 होटल हैं जिनमें जलपान की व्यवस्था है। विश्राम गृह के समीप सोनवानी होटल में दोपहर एवं रात का खाना उपलब्ध हो जाता है। ग्रामीण आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए 2 मेडिकल स्टोर्स, 4 किराना दुकान, 3 कपड़ा दुकान, गाड़ी का पंचर बनाने की 2 दुकान, मोटर सायकिल मेकेनिक 2, इलेक्ट्रिकल दुकान 3 मोबाईल शॉप 4 एवं 2 फ़ोटो स्टुडियो, पैट्रोल पंप भी हैं। इस तरह आवश्यकता की समस्त सामग्री एवं सहायता सिरपुर में उपलब्ध है।
सिरपुर का रास्ता 
शैक्षणिक दृष्टि से सिरपुर के निवासियो ने अधिक तरक्की नहीं की है। विद्युत विभाग के इकलौते जुनियर इंजीनियर के अतिरिक्त कोई भी अधिकारी नहीं बन पाया। वन विभाग, पुलिस विभाग, शिक्षा विभाग में कुछ लोग सेवारत हैं। शिक्षा के साधन के रुप में 2 प्राथमिक सहशिक्षा स्कूल, 1 कन्या माध्यमिक शाला, 1 बालक माध्यमिक शाला, 1 सहशिक्षा हायरसेकेंडरी स्कूल, 1 आदिम जाति कल्याण विभाग का आश्रम एवं गुड शेफ़र्ड नामक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी है। अंग्रेजी माध्यम का स्कूल होने का अर्थ है कि सिरपुर के निवासी अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का महत्व समझ रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर उप स्वास्थ्य केंद्र, आर्युवैदिक औषधालय है। यहाँ छोटी-मोटी बीमारी  का ईलाज हो जाता है। गंभीर बीमारी होने पर रायपुर या महासमुंद ही एक मात्र विकल्प है। पशुओं की चिकित्सा एवं कृत्रिम गर्भाधान के लिए पशुचिकित्सालय की व्यवस्थित है। पर्यटकों के लिए सूचना केंद्र है जिससे छत्तीसगढ पर्यटन के होटल, मोटल, एवं रिसोर्ट बुक किए जाते हैं और पर्यटन संबंधी सूचनाएं दी जाती हैं।
महानदी के तीर प्राचीन आश्रम 
सिरपुर में सरकारी कार्यालय के नाम पर ग्रामीण बैंक, सहकारी समिति, पुलिस चौकी, विद्युत सब स्टेशन, लकड़ी डीपो, पटवारी निवास, फ़ारेस्टर का निवास है। इसके अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए महासमुंद जाना पड़ता है। पर्यटकों एवं ग्रामीणों के मनोरंजन की सुविधा के लिए अंग्रेजी एवं देशी शराब के ठेके भी हैं। विडम्बना है कि शराब ठेके गाँव के मध्य में स्थित हैं और पुलिस चौकी गाँव की सीमा के बाहर। यात्रियों के निवास के लिए पीडब्लुडी का एक मात्र विश्राम गृह है। जिसके आरक्षण के लिए महासमुंद उप जिलाधीश या संबंधित विभाग के उच्चाधिकारियों से समपर्क करना पड़ता है। वर्तमान में पर्यटन मंडल द्वारा एक रिसोर्ट का निर्माण कराया जा रहा है। जो कि रिहायश से बाहर है। आवगमन की सुविधा के लिए सड़कों की  हालत बढिया है और स्कूल के खेल मैदान में एक हैलीपैड स्थित है। जिस पर विशिष्ट लोगों के आगमन हेलीकाप्टर उतारा जाता है।
हेलीपेड 
ग्राम विकास एवं पुरासामग्री की चोरी रोकने के लिए सिरपुर प्रवेश द्वार पर नाका लगाया गया है। फ़िर भी मूर्तियाँ चोरी होने की घटना हो चुकी है। नाके में प्रति 4 चक्के एवं उससे बड़ी गाड़ी के आगमन पर 10 रुपए टैक्स लिया जाता है तथा गाड़ी का नम्बर रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इससे पता चल जाता है कि कितनी गाड़ियाँ सिरपुर में प्रतिदिन आ रही  हैं। ग्रामवासी  कहते हैं कि विद्युत व्यवस्था में ही समस्या है। बिजली कब चली जाए और आ जाए इसका पता नहीं चलता। यह भी विडम्बना है कि जितने दिन मैंने सिरपुर में निवास किया कभी बिजली नहीं गयी। पैट्रोल-डीजल भी कभी उपलब्ध रहता है कभी नहीं। उपलब्धता की निरंतरता नहीं  है। ऐसी स्थिति में स्थानीय दुकानदारों से अधिक मूल्य पर खरीदना पड़ता है।
सिरपुर के घोंघा बसंत 
माघ माह की पूर्णमासी को सिरपुर में मेला लगता है तथा तीन दिवसीय शासकीय कार्यक्रम "सिरपुर महोत्सव"  मनाया जाता है। मेले के दौरान सभी जाति समाजों के लोग जुटते हैं और अपनी जातिय समस्याओं का बैठक करके हल निकालते हैं। सिरपुर धर्म की ही  नगरी है। यहाँ वर्तमान में लगभग सभी समाजों के अपने मंदिर एवं धर्मशालाएं हैं। जिनमें पटेल मरार समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कोसरिया यादव समाज का कृष्ण मंदिर एवं दुर्गा मंदिर, कोसरिया पटेल समाज का दुर्गा मंदिर, निषाद समाज का राम जानकी मंदिर, बेलदार समाज का रामजानकी मंदिर, कंवर समाज का रामजानकी मंदिर, धीवर समाज  का रामेश्वर शिव मंदिर, सेन समाज का राधाकृष्ण मंदिर, सतनामी समाज की गुरु घासीदास की गद्दी, झेरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कबीर पंथियों की कबीर कुटी, वैष्णव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, साहू समाज का कर्मा मंदिर, गोंड़ समाज का प्राचीन शिव मंदिर, समलेश्वरी मंदिर एवं 2 जगन्नाथ मंदिर, रविदास मंदिर(मेला स्थल), चंडी मंदिर (गंधेश्वर महादेव मंदिर के समीप) दुर्गा मंदिर (सुरंग टीला से विस्थापित) भी हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय ग्रामदेवता के रुप में  महामाया, शीतला, ठाकुरदेव, सांहड़ादेव भी हैं।
 रायकेरा  तालाब 
सिरपुर में तालाबों की भरमार है, शायद ही कोई ऐसा प्राचीन मंदिर हो जिसके समीप पोखरी या तालाब नहीं है।  निस्तारी के  लिए नित्य उपयोग में आने वाले प्रमुख तालाब रायकेरा बंधवा एवं कमार डेरा तरिया हैं। रायकेरा बंधवा के विषय में जन श्रुति है कि प्राचीन काल में एक साधु था, उसके पास एक गाय थी। साधु ने स्थानीय चरवाहे को गाय चराने के लिए दी। एक दिन साधु ने चरवाहे की सेवा से उसे प्रसन्न होकर एक पत्थर दिया। चरवाहा में पत्थर तो ले लिया पर मन-मन साधु को कोसने लगा कि बरसों की सेवा के दिया तो एक पत्थर। चरवाहे सोचा कि इस पत्थर का क्या किया जाए। उसने रायकेरा तालाब में जाकर पत्थर से अपनी कुल्हाड़ी मांजा और पत्थर तालाब में फ़ेंक दिया। जब चरवाहा घर पहुंचा और कांधे से कुल्हाड़ी उतारी तो देखा वह सोने की हो गयी थी। वहा आश्चर्य चकित रह गया और अपने भाग को कोसने लगा।
महानदी के तीर पर ब्लॉगर मंडली राजीव रंजन, ललित शर्मा एवं आदित्य सिंह
उसने तालाब में जाकर खूब डुबकियाँ लगाई पर वह पत्थर नहीं मिला। यह जानकारी गाँव से प्रारंभ होकर राजा तक पहुंची। राजा के मन में पारस पत्थर प्राप्त करने के लिए लोभ जागृत हो गया। एक पारस पत्थर राजा की दशा सुधार सकता था और उसके सेना समेत राज्य को बना सकता था। यही सोच कर राजा ने चरवाहे को बुलाकर सत्यता की जाँच की। चरवाहे सारी घटना का वर्णन राजा से किया। राजा ने हाथी के पैर में लोहे की जंजीर बांध कर तालाब में घुमाने का आदेश दिया। हाथी सारे दिन तालाब को मथता रहा। शाम को जब उसे तालाब से बाहर निकाला गया तो उस लोहे  की जंजीर की एक कड़ी सोने की हो गयी थी। उसके बाद से किंवदंती चल रही है कि रायकेरा तालाब में पारस पत्थर है। यह वर्तमान सिरपुर है। जारी है … आगे पढे।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

तीवरदेव बौद्ध महाविहार ......Sirpur Chhattisgarh........... ललित शर्मा

भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध 
प्राम्भ से पढ़ें 
तीवरदेव महाविहार सिरपुर का प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, दक्षिण कोसल में उत्खनन से प्राप्त अब तक का बड़ा विहार है, इसका उत्खनन 2002-2003 में अरुण कुमार शर्मा ने किया था। उत्खनन के दौरान उपलब्ध प्रमाणों एवं उपलब्ध अभिलेखों से इस महाविहार को महाशिवगुप्त तीवरदेव के शासनकाल में छठी शताब्दी के मध्य में निर्मित माना जाता है। बौद्ध विहार में प्रवेश करने पर बहुत ही सुन्दर अलंकृत प्रवेश द्वार दिखाई देता है। प्रवेशद्वार का शिल्प अद्भुत है, शिल्पकार ने विभिन्न विषयों पर अपनी छेनी चलाई है। मगर और बन्दर की  पंचतंत्र की कथा के साथ बिल से निकल कर सांप का मेंढक को पकड़ना, पुष्प पर बैठी हुई मधुमक्खी का अंकन, चाक पर बर्तन बनता हुआ कुम्हार, प्रेमासक्त चुम्बन आलिंगनरत युगल का अंकन आकर्षक है।

तीवरदेव विहार की प्रतिमा 
प्रवेशद्वार की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है। शिल्पांकन महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि यहाँ पशु मैथुन का दृश्य है, इसमें हाथियों को मैथुन मुद्रा में दिखाया गया है। विशिष्ट इसलिए भी है की बौद्ध विहारों में इस तरह के शिल्पांकन का अभाव रहता है। प्रणयरत  युगल मूर्तियाँ विशेष आकर्षण का केंद्र है। भीतर प्रवेश करने पर 16 अलंकृत स्तम्भ दिखाई देते हैं, इन पर ध्यान मुद्रा में बुद्ध, सिंह, मोर, चक्र आदि का मनोहर शिल्पांकन है। गर्भ गृह के पश्चिम में भूमि स्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त रत्न संभव तथा पद्मपाणि की प्रतिमाएं भी प्राप्त हुयी हैं। जल निकासी के लिए भूमिगत नालियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। इससे  होता है कि जल निकासी की व्यवस्था वास्तुकारों ने उत्तम बनायीं थी।

विहार की ईंटों की दीवारें 
इस विहार के उत्त्खन्न के दौरान मेरा सिरपुर दौरा हुआ था। तब नहीं लगता था कि यह इतना विशाल होगा। यह भी आभास नहीं था कि कभी मुझे इस पर लिखना भी होगा। प्रस्तर के स्तम्भ देख रेख के आभाव में खंडित हो रहे है। बंदरों की उछल कूद के कारण एक स्तम्भ तो दो भागों में बंटा दिखाई दिया। भारतीय पुरातत्व संरक्षण के पास बड़ा अमला है, उन्हें इसका रासायनिक संरक्षण करना चाहिए। यह विहार 902 वर्ग मीटर के परिक्षेत्र में बना हुआ है। इस स्थान पर अन्य विहार के साथ बौद्ध भिक्षुणी विहार भी स्थित है। कहते हैं कि जब वज्रयान संप्रदाय का उद्भव हुआ तब से भिक्षुणियों को भी पृथक विहार बना कर विहार संकुल में उनके रहने की व्यवस्था की गयी। उत्खनन में वज्रयान का प्रतीक धातु का वज्र भी प्राप्त हुआ है।

विहार का विस्तार 
अरुण कुमार शर्मा कहते हैं कि इस विहार के कक्षों को कालांतर में पूजाकक्षों में परिवर्तित कर दिया गया लगता है. इस परिवर्तन के बाद इस विहार का दक्षिण दिशा में विस्तार किया गया है। अनेक नवीन कक्षों का निर्माण किया गया, पूर्व की अपेक्षा एक बड़े मंडप का भी निर्माण किया गया तभा चारों ओर 36 मी लम्बा और 1.5 मी चौड़ा गलियारा है। इस विहार में सीढियाँ भी मिली हैं, जिससे उत्खननकर्ता अनुमान लगते हैं की यह विहार दो मंजिला रहा होगा। मेरा अनुमान है की यह विहार बहुमंजिला भी हो सकता है, क्योंकि व्हेनसांग ने 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के सिरपुर में निवास करने का जिक्र किया है। उनके रहने की व्यवस्था करने के लिए इस विहार को अन्य विहारों की अपेक्षा विशाल और प्रमुख बनाया गया होगा।

मुख्य द्वार पर कुम्हार की मूर्ति 
यह विहार कसडोल जाने वाले मार्ग पर सिरपुर चौराहे से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। राजीव  और मैंने यहाँ चित्र लिए। मेरे कानों में बौद्ध धर्म के मन्त्रों की गूंज हो रही थी। "ॐ मणि पद्मे हूँ" के बीज मंत्र का जाप हो रहा है, जाप की ध्वनि से सारा वातावरण गुंजायमान है। कषाय वस्त्रों में बालक, युवा बौद्ध भिक्षु बुद्ध सरीखे दिखाई दे रहे हैं। शुद्धो असि, बुद्धो असि, निरंजनो असि, के दर्शन यही हो रहे हैं। तीवरदेव महाविहार के मुख्यद्वार से निकलते हुए सोचा रहा था कि अनीश्वरवादी बुद्ध को कितनी सफाई से हिन्दूधर्म में अवतार घोषित कर समाविष्ट कर लिया गया। परन्तु ये तो तय है कि बौद्ध धर्म की स्थापना के पूर्व बुद्ध हिन्दू ही थे। भारत में यह ऐसा अवतार हुआ जिसके सिद्धांतों को देश से अधिक विदेशों में माना और समझा गया। तीवरदेव विहार से हम नागार्जुन के विहार और राजमहल के अवलोकनार्थ चल पड़े। ......... जारी है ........ आगे पढ़ें ........

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

सिरपुर के शिल्पकार .....Sirpur Chhattisgarh......ललित शर्मा

लक्ष्मण  मंदिर 
प्रारंभ से पढ़ें 
धार्मिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भारत में तीर्थाटन की परम्परा सहस्त्राब्दियों से रही है। परन्तु समय के साथ लोगों की रुचि एवं विचारधारा में परिवर्तन हो रहा है। काम से ऊबने पर मन मस्तिष्क को तरोताजा करने के लिए लोग प्राचीन पुरातात्विक एवं प्राकृतिक स्थलों के सपरिवार दर्शन करके मानसिक थकान दूर करते हैं। साथ ही उन्हें देश दुनिया के विषय में जानकारी भी मिल जाती है। जब भी अपनी प्राचीन धरोहरों को देखते हैं तो हमें उनके निर्माताओं पर गर्व होता है कि उन्होने सहस्त्राब्दियों पूर्व ऐसे निर्माण किए या कराए जिससे आने वाली पीढ़ी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करे। प्राचीन शिल्पियों ने भवन निर्माण सामग्री की गुणवत्ता के विषय में कोई समझौता नहीं किया, तभी हमें हजारों वर्ष पुरानी संरचनाए देखने मिल जाती हैं। प्राचीन भवन निर्माण, नगर विन्यास, मुर्ति शिल्प की उत्कृष्टता एवं भव्यता के नाम पर पाण्डुवंशीय शासकों की राजधानी श्रीपुर (सिरपुर) का स्मरण होता है। जब भी सिरपुर जाता हूँ कुछ न कुछ नया देखने मिलता है। अद्भुत शहर है, इसका तिलस्म मुझे अपनी ओर खींचता है, प्रतीत होता है कि पिछले जन्म का कोई नाता है इस नगर से।

उत्खनन में प्राप्त लौह, कांसा, प्रस्तर की मूर्तियाँ एवं उपकरण 
सिरपुर को बनाने बसाने वाले अज्ञात शिल्पियों के प्रति मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। अन्य स्थलों पर दृष्टिपात करने से वहाँ के भवन, मंदिर,मूर्तियों पर निर्माण करने वाले शिल्पियों के नाम नही मिलते।  संसार को अद्वितीय रचना देने के बाद भी शिल्पियों के हाथ काटे जाने की कहानी सामने आती हैं। धम्मपाद के बोधिराज कुमारवत्थु पृष्ठ ४१० में एक कारीगर का हाल इस प्रकार लिखा है कि बोधिराज कुमार ने एक महल बनवाया, बनाने वाले कारीगर ने उसे बड़ा ही विचित्र बनाया। बोधिराज ने सोचा कि यह कारीगर कहीं दूसरे स्थान पर ऐसा महल न बना दे, इसलिए इसके हाथ कटवा देना चाहिए। राजा ने यह बात अपने सलाहकार से भी कह दी, सलाहकार ने यह खबर कारीगर तक पहुँचा दी। कारीगर ने अपनी पत्नी को संदेश भेजा कि वह घर-द्वार मालमत्ता बेच कर एक दिन महल देखने का निवेदन करे। स्त्री ने यही किया, राजा से अनुमति लेकर महल देखने गई, कारीगर उसे एक कोठरी में ले गया और स्त्री तथा प्राण बचाने हेतू लड़कों समेत गरुड़ यंत्र पर चढ़कर भाग गया।

तीवरदेव विहार का मूर्ति शिल्प 
आज हम देखते है तो सिरपुर एक छोटा सा गाँव है, पर ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व इसे दक्षिण कोसल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन प्रतापी राजा हुए, उन्होनें ५७ वर्ष तक शासन किया, यह काल दक्षिण कोसल के लिए स्वर्णिम काल था। वास्तुकला एवं सांस्कृतिक समृद्धि उत्कर्ष पर थी। मंदिरों भवनों के साथ सरोवरों का निर्माण हुआ। कारीगरी के अनुपम नमुने यत्र तत्र परिलक्षित होते हैं। ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर का शिल्प मन मोह लेता है। मगध के राजा सूर्य वर्मन की पुत्री, महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा ने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में इसका निर्माण कराया था। इस मंदिर का निर्माण काल 650 ईस्वी के लगभग माना जाता है। 7 फिट ऊँची जगती पर निर्मित इस मंदिर के मुख्य द्वार पर दशावतार, कृष्ण लीला, अलंकारिक प्रतीक, मिथुन दृश्य एवं द्वारपालों का अंकन है। तीवरदेव विहार में उत्कीर्ण मूर्तियों का शिल्प देखते ही बनता है। शिल्पकार ने बहुत ही बारीकी से शास्त्रीय अंकन किया है। जातक कथाओं का भी अंकन प्रभावोत्पादक है। मूर्ति शिल्प में वस्त्रों का अंकन महीन कारीगरी से हुआ है। ऐसा ही मनमोहक शिल्प आनंदप्रभ कुटी विहार, सुरंग टीला, गंधर्वेश्‍वर मंदिर, पंचायतन बालेश्वर महादेव मंदिर में दिखाई देता है। 
विशाल बाज़ार क्षेत्र सिरपुर 

भूमिगत अनाज की कोठी के साथ गुप्त चेंबर 
उत्खनन में विशाल व्यापार क्षेत्र प्राप्त हुआ है, ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व योजनाबद्ध रुप से बाजार की बसाहट वास्तुकारों के कौशल को प्रदर्शित करती है। बाजार के मध्य मुख्य मार्ग पर जब हम चलते हैं तो लगता है सारा बाजार जीवंत हो उठा। दुकानों के बरामदे, फिर दुकान और उसके पीछे अनाज रखने की भूमिगत कोठियाँ प्रत्येक दुकान में पाई गई हैं, जिससे जाहिर होता है कि उस काल में वस्तु विनिमय होता था। लोग अपने साथ अनाज लेकर आते थे और अपने काम की वस्तु खरीद कर बदले में ले जाते थे। बाजार क्षेत्र में ३ कुंए प्राप्त हुए हैं, जिससे पेयजल की व्यवस्था होती थी। चूना पत्थर से निर्मित कुंए वर्तमान में जस के तस हैं, काल की मार से सुरक्षित भी। बाजार क्षेत्र में उत्खनन के दौरान एक भवन से धातु की लगभग 80 प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। प्रतिमाओं को देखने से पता चलता है कि धातु शिल्पकला उत्कृष्ट कोटि की थी। बाजार में सभी तरह की मानवोपयोगी वस्तुओं व्यापार होता था। जहाँ से धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई, उस भवन में दो अंतराल और पीछे की तरफ आंगन नुमा संरचना है। अनुमान है कि किसी व्यापारी श्रेष्ठी का निवास रहा होगा।

लोहार का घर 
मुख्य मार्ग के पूर्व में दो आवास आमने‍-सामने हैं, जिनके मध्य में बड़ा आंगन है, एक आवास में दो मुख्य द्वार हैं तथा पीछे की तरफ अनाज रखने की भूमिगत बड़ी कोठियाँ हैं, यहाँ से लोहे के औजार एंव कच्चा माल प्राप्त हुआ है। जाहिर है कि यह लोहार का निवास एवं कार्य स्थल दोनों होगा। इसके सामने एक मुख्य द्वार का आवास है, यहाँ से उत्खनन में ताम्रपत्र एवं ढ़लाई का कच्चा माल प्राप्त हुआ है। यहाँ तांबा का कार्य करने वाले ताम्रकार का निवास था। ये तांबे और कांसे की मुहर ढ़ालने का कार्य कुशलता से करते थे। बाजार की पूर्व दिशा में ही बरगद के वृक्ष के समीप सोनार का घर एवं भटठी प्राप्त हुई है। इससे प्रतीत होता है कि परम्परागत शिल्पकारों को श्रीपुर में मान सम्मान एवं राजकीय संरक्षण प्राप्त था। लकड़ी एवं पत्थर का काम करने वाले बढ़ई एवं प्रस्तर शिल्पकारों के आवास का पता नहीं चलता। परन्तु उनके कार्य सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं। बढ़ईयों के कार्य को प्रस्तर शिल्पियों ने अपने प्रस्तर शिल्प में स्थान दिया है। लकड़ी का सामान हजारों वर्षों तक अक्षुण्‍ण नहीं रह सकता। परन्तु प्रस्तर शिल्पियों के कार्य हजारों वर्षों तक विद्यमान रहते हैं। ये मंदिर निर्माण के स्थान पर ही कार्य करते थे। मंदिरों के उत्खनन मे प्राप्त पत्थरों के किरचे एवं अधूरी प्रतिमाएं इसका प्रमाण हैं।

तीवर देव विहार का मुख्य द्वार एवं प्रतिमाएं 
सिरपुर में परम्परागत शिल्पियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था एवं रहन सहन एवं आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थे। इसका अनुमान उनके आवासों के स्तर से लगाया जा सकता है। तीवरदेव विहार के मुख्य द्वार की पट्टिका मे उत्कीर्ण चाक पर बरतन बनाता हुआ कुम्हार शिल्पकारों की सामाजिक स्थिति को दर्शाता है। जब कुम्हार के कार्य को विहार के सिंह द्वार में प्रदर्शित किया है तो मानना चाहिए कि शिल्पकारों को महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त था। सुरंग टीला के स्तंभों में शिल्पकारों ने अपने हस्ताक्षर छोडे हैं। यहाँ स्तंभों पर ध्रुव बल, द्रोणादित्य, कमलोदित्य एंव विट्ठल नामक कारीगरों के नाम उत्कीर्ण हैं। किसी राज्य या राजा के कार्यकाल की स्थिति का आंकलन हम उसके काल में हुए शिल्प कार्य, निर्माण एवं उसके द्वारा चलाए गए सिक्कों से करते हैं। इनका निर्माण परम्परागत शिल्पकारों के बगैर नहीं हो सकता। राजाश्रय मिलने पर ही शिल्पकार स्वतंत्र हो कर कार्य करते थे। यजुर्वेद में "कुलालेभ्य कर्मारेभ्यश्च वो नमः" के अनुसार कुम्हार और बढ़ईयों से लेकर जितने भी कारीगर हैं सबके लिए आदर एवं अन्न की व्यवस्था बतलाई गई है। शिल्पियों एवं रथकारों को यज्ञ मे शामिल होने का भी आदेश है और इनका दर्जा ब्राह्मणों के बराबर दिया गया है। 

तमेर के घर से प्राप्त ताम्रपत्र 
कई शिला लेखों में एवं ताम्रपत्रों में लेखक के नाम का जिक्र होता है।  कुरुद में प्राप्त नरेन्द्र के ताम्रपत्र लेख में उत्कीर्णकर्ता के रुप में श्री दत्त का, आरंग मे प्राप्त जयराज के ताम्रलेख में अचल सिंह का, सुदेवराज के खरियार में प्राप्त ताम्रलेख में द्रोणसिंह का, महाभवगुप्त जनमेजय के ताम्रलेख में रणय औझा के पुत्र संग्राम का वर्णन है। प्रथम पृथ्वीदेव के अमोदा में प्राप्त ताम्रपत्रलेख में वर्णन है कि "गर्भ नामक गाँव के स्वामी ईशभक्त सुकवि अल्हण ने सुन्दर वाक्यों से चकोर के नयन जैसे सुंदर अक्षर ताम्र पत्रों पर लिखे जिसे सभी शिल्पों के ज्ञाता सुबुद्धि हासल ने शुभ पंक्ति और अच्छे अक्षरों में उत्कीर्ण किया।" द्वितीय पृथ्वीदेव के रतनपुर में प्राप्त शिलालेख संवत 915 में उत्कीर्ण है " यह मनोज्ञा और खूब रस वाली प्रशस्ति रुचिर अक्षरों में धनपति नामक कृती और शिल्पज्ञ ईश्वर ने उत्कीर्ण की। उपरोक्त वर्णन से शिल्पकारों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति का पता चलता है। जारी है ....... आगे  पढ़ें