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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

मल्हार: आस्था का केन्द्र डिड़नेश्वरी माई



डिडनेश्वरी माई का प्रसिद्ध मंदिर मल्हार ग्राम की पुर्व दिशा में लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर है। इसके दांए तरफ़ एक बड़ा तालाब है तथा मंदिर के सामने भी एक पक्का तालब है। जिसमें ग्रामीण निस्तारी करते हैं। मंदिर के द्वार पर पहुंचने पर एक सिपाही खड़ा दिखाई दिया। शायद इसे मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात किया गया है। मंदिर के गर्भ गृह को लोहे के दरवाजों से बंद किया गया है, दर्शनार्थी बाहर से ही दर्शन करके जा रहे थे। मंदिर में नवीन निर्माण कार्य प्रारंभ है। गर्भ गृह के सामने बड़े मंडप का निर्माण हो रहा है।
डिड़नेश्वरी मंदिर परिसर
मल्हार में सागर विश्वविद्यालय द्वारा उत्खनन कार्य करवाया गया। विद्वानों ने इस नगर को ईसा पूर्व 4 भी शताब्दी का माना है। यहाँ ईसा पूर्व 2 शताब्दी की विष्णु प्रतिमा प्राप्त हुई, जिससे आंकलन किया जा सकता है कि पूर्ववर्ती राजा वैष्णव धर्मानुयायी होगें। इसके पश्चात शैवों धर्म का प्रचलन हुआ होगा। मौर्यकाल से लेकर 13-14 वीं शताब्दी तक यह नगर उन्नत एवं विकसित रहा होगा। शैवों के साथ तंत्र उपासना भी प्रारंभ हुई। शाक्तों का भी मल्हार में प्रभाव रहा है। स्कंद माता, दूर्गा, पार्वती, महिषासुर मर्दनी, लक्ष्मी, गौरी, कंकाली, तारादेवी इत्यादि देवियों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। परन्तु डिड़नेश्वरी देवी की काले ग्रेनाईट की अद्भुत प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। 
निर्माणाधीन मंडप
डिड़नेश्वरी नाम के विषय में राहुल सिंह कहते हैं -  "डिड़िन दाई से तो जैसे पूरे मल्हार की धर्म-भावना अनुप्राणित हुई है। काले चमकदार पत्थर से बनी देवी। डिड़वा यानि अविवाहित वयस्क पुरुष और डिड़िन अर्थात्‌ कुंवारी लड़की। माना जाता है कि मल्हार के शैव क्षेत्र में डिडिनेश्वरी शक्ति अथवा पार्वती का रूप है, जब वे गौरी थीं, शिव-वर पाने को आराधनारत थीं। डिड़िन दाई का मंदिर पूरे मल्हार और आसपास के जन-जन की आस्था का केन्द्र है।" डिड़नेश्वरी देवी प्रतिमा को कई बार चोरी करने का प्रयास किया पर चोर एक बार कामयाब हो गए। इस दौरान अखबारों में इस प्रतिमा चोरी के समाचार छपने से यह प्रतिमा विश्व प्रसिद्ध हो गई। फ़िर अचानक यह प्रतिमा बरामद भी हो गई। 
डिड़नेश्वरी माई
मान्यता है कि यह कलचुरियों की कुलदेवी है, देवार गीतों में इसे राजा वेणू की इष्ट देवी भी बताया गया है। डिड़नेश्वरी की प्रतिमा को कलचुरी काल ग्याहरवी सदी की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति माना गया है। काले ग्रेनाईट की यह प्रतिमा 4 फ़ुट ऊंची है। आभामंडल के साथ छत्र को महीनता से लघु घंटिकाओं द्वारा अलंकृत किया गया है। मुक्ताहार, भुजबंध, कर्णफ़ूल, कमरबंध, पायल इत्यादि अलंकरण प्रतिमा को गरिमा प्रदान करते हैं। प्रतिमा के फ़लक पर नौ देवियाँ उत्कीर्ण हैं, कहते हैं जब देव गण युद्ध में असुरों से हार गए तो वे पार्वती की शरण में आए। पार्वती ने पद्मासन में बैठ कर ध्यान किया जिससे नौ देवियों ने प्रकट होकर असुरों का संहार किया।
राजपुरुष: डिड़नेश्वरी मंदिर मल्हार
प्राचीन मंदिर के अधिष्ठान पर नवीन निर्माण किया गया है। मल्हार में मल्लाहों (निषाद) की अच्छी आबादी है। वे डिड़नेश्वरी को अपनी आराध्य देवी मानते हैं। डिड़नेश्वरी माई की कर बद्ध ध्यानावस्थित प्रतिमा मोहित करने वाली है। जिस शिल्पकार ने इसका निर्माण किया होगा उसे नमन है। ऐसे खुबसूरत प्रतिमा मैने आज तक देखी नहीं। गर्भगृह के द्वार के बांई तरफ़ एक राजपुरुष की प्रतिमा भी स्थापित है। अब यह प्रतिमा किस राजा की है यह बताना कठिन है। हमने मंदिर की एक परिक्रमा लगा कर पुजारी से प्रसाद ग्रहण किया और मल्हार नगरी भ्रमण करने आगे चल पड़े।


शनिवार, 26 अप्रैल 2014

मल्हार : प्राचीन प्रतिमाएँ


ल्हार पर प्राण चड्ढा जी से चर्चा हो रही थी। उन्होनें बताया कि 25-30 वर्ष पूर्व मल्हार में प्राचीन मूतियाँ इतनी अधिक बिखरी हुई थी कि महाशिवरात्रि के मेले में आने वाले गाड़ीवान मूर्तियों का चूल्हा बना कर खाना बनाते थे। इसके वे साक्षी हैं। मल्हार पुरा सम्पदा से भरपूर नगर था। वर्तमान मल्हार गाँव मल्लारपत्तन नगर के अवशेषों पर बसा हुआ है। हर घर में किसी न किसी पुराने पत्थर या प्रतिमावशेष का उपयोग दैनिक कार्यों में होता है। कलचुरियों के समय यह नगर अपनी प्रसिद्धी की बुलंदी पर था। पर न जाने ऐसा क्या हुआ जो इसे पतनोन्मुख होना पड़ा। यही सोचते हुए मैं संग्रहालय (संग्रहालय तो नहीं कहना चाहिए, वरन एक बड़ा कमरा जरुर है, जहाँ बेतरतीब प्रतिमाएं पड़ी हैं) की ओर बढा।
संग्रहालय
आस-पास कुछ लोग नल के पानी से स्नान कर रहे थे। प्रांगण में प्रतिमाएं बिखरी हुई हैं। संग्रहालय के द्वार पर चौकीदार से भेंट हुई, हमें देख कर चौकीदार ने भवन के द्वार उन्मुक्त किए एवं भीतर के हॉल में रोशनी की। सिर्फ़ एक ही ट्यूब लाईट का प्रकाश दिखाई दिया। अन्य ट्यूब लाईटें झपकी भी नहीं, मौन रह गई। भगवान जाने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी शासन द्वारा भरपूर बजट मिलने के बाद भी प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ती करने में भी क्यों कोताही बरतते हैं। मद्धम मद्धम रोशनी में प्रतिमाओं का अवलोकन प्रारंभ हुआ। अवलोकन करने के लिए एक सिरा ही पकड़ना ठीक था।
शेष नारायण
दरवाजे के सामने ही शेषशायी विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा दिखाई देती है। अपने आयुधों के साथ बांया पैर दाएं जंघा पर रखा हुआ है, नाभी से निकले हुए कमल पर ब्रह्मा विराजे हैं। चरणों की तरफ़ लक्ष्मी विराजमान हैं। प्रतिमा थोड़ी घिसी हुई है, आँखे और नाक स्पष्ट नहीं है। 
कुबेर
आगे बढने पर कुबेर की एक प्रतिमा दिखाई देते हैं। किरीट मुकुटधारी कुबेर ने दांए हाथ में गोला(पृथ्वी) थाम रखा है और बांए हाथ में धन की थैली। अगर धन न हो तो फ़िर कैसा कुबेर? इसलिए शिल्पकार कुबेर का पेट गणेश सदृश्य बड़ा बनाते हैं और हाथ में धन की थैली थमाते हैं।
वीरभद्र
वीरभद्र की सुंदर प्रतिमा भी संग्रह में रखी हुई है। शिवालयों में वीरभ्रद की प्रतिमा भी अनिवार्य रुप से बनाई जाती थी। वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया. देवसंहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से 'वीरभद्र' नामक गण उत्पन्न किया. महादेवजी के श्वसुर राजा दक्ष ने यज्ञ रचा और अन्य प्रायः सभी देवताओं को तो यज्ञ में बुलाया पर न तो महादेवजी को ही बुलाया और न ही अपनी पुत्री सती को ही निमंत्रित किया। 
विष्णु
पिता का यज्ञ समझ कर सती बिना बुलाए ही पहुँच गयी, किंतु जब उसने वहां देखा कि न तो उनके पति का भाग ही निकाला गया है और न उसका ही सत्कार किया गया इसलिए उसने वहीं प्राणांत कर दिए. महादेवजी को जब यह समाचार मिला, तो उन्होंने दक्ष और उसके सलाहकारों को दंड देने के लिए अपनी जटा से 'वीरभद्र' नामक गण उत्पन्न किया। वीरभद्र ने अपने अन्य साथी गणों के साथ आकर दक्ष का सर काट लिया और उसके साथियों को भी पूरा दंड दिया।
स्कंद माता
स्कंधमाता की भी स्थानक प्रतिमा हैं। पौराणिक गाथाओं में भगवान शंकर के एक पुत्र कार्तिकेय भी हैं, वे भगवान स्कंद 'कुमार कार्तिकेय' नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है।
शिव पार्वती
एक प्रतिमा नंदी आरुढ शिव पार्वती की है, जिसमें नंदी वेग से आगे बढे जा रहे हैं, उनके दोनो अगले पैर हवा में दिखाए गए हैं। नंदी की लगाम पार्वती ने अपने हाथ से थाम रखी है। इस प्रतिमा में शिव का चेहरा भग्न है, किसी ने प्रतिमा को खंडित कर दिया है। 
विष्णू 
इसके साथ ही एक अद्भुत प्रतिमा भी इस संग्रह में है। जिसे अध्येता विष्णु की प्रतिमा बताते हैं। जिसके एक हाथ से सीधी तलवार दबाई हुई है, शीष पर टोपी और कानों में कुंडल के शीष के बगल में चक्र दिखाई देता है। पोषाक बख्तरबंद जैसी है तथा पैरों में लम्बे जूते हैं।  इस प्रतिमा के नाम निर्धारण पर गत संगोष्ठी में विवाद की स्थिति उत्पन्न थी, कुछ इसे विष्णु प्रतिमा मानते हैं , कुछ नहीं। यह प्रतिमा किसी युनानी योद्धा जैसे दिखाई देती है। 
संभवत: तीर्थंकर आदिनाथ
संग्रहालय में अन्य भी बहुत सारी प्रतिमाएं है, जिनमें जैन-बौद्ध प्रतिमाएं भी दिखाई देती हैं। हमें अन्य स्थानों का भी भ्रमण करना था इसलिए यहाँ से जल्दी ही निकलना चाहते थे। पातालेश्वर मंदिर के दर्शनोपरांत हम डिडनेश्वरी मंदिर की ओर चल पड़े।

आगे पढें…… जारी है।

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

मल्हार : पातालेश्वर मंदिर

ल्हार जाने के लिए सुबह का 6 बजे का वक्त तय हुआ। सुबह की शीतलता के साथ मल्हार दर्शन हो जाएगें वरना इस मौसम में सूरज दादा इतने भन्ना जाते हैं कि झुलसा कर ही छोड़ते हैं। द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी सपत्नी (माधुरी जी) के साथ मुकर्रर वक्त पर होटल पहुंच गए। मैं भी अपने औजार (कैमरा, टोपी, पानी की बोतल इत्यादि) लेकर तैयार था। हम मल्हार की ओर चल पड़े। 
बिलासपुर की सुबह
मल्हार नगर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अक्षांक्ष 21 90 उत्तर तथा देशांतर 82 20 पूर्व में 32 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। बिलासपुर से रायगढ़ जाने वाली सड़क पर 18 किलोमिटर दूर मस्तूरी है। वहां से मल्हार, 14 कि. मी. दूर है। मस्तुरी पहुंचने पर मल्हार जाने वाले मार्ग पर एक बड़ा द्वार बना हुआ है और यहीं से तारकोल की इकहरी सड़क मल्हार की ओर जाती है।
मल्हार का मड फ़ोर्ट
पुरातात्विक दृष्टि से मल्हार महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कई एकड़ में फ़ैला हुआ मृदा भित्ति दुर्ग भी है। मल्हार के मृदा भित्ती दुर्ग  (मड फ़ोर्ट) सर्वप्रथम जिक्र जे. डी. बेगलर ने 1873-74 के अपने भ्रमण के दौरान किया। परन्तु उन्होने इस मड फ़ोर्ट में विशेष रुचि नहीं दिखाई। उन्होने इस शहर में मंदिरों के 2 खंडहरों का जिक्र किया।
पंचमुखी गणेश
के. डी. बाजपेयी मानते हैं कि पुराणों में वर्णित मल्लासुर दानव का संहार शिव ने किया था। इसके कारण उनका नाम मलारि, मल्लाल प्रचलित हुआ। यह नगर वर्तमान में मल्हार कहलाता है। मल्हार से प्राप्त कलचुरीकालीन 1164 ईं के शिलालेख में इन नगर को मल्लाल पत्त्न कहा गया है। विशेष तौर पर इस नगर का प्रचार तब अधिक हुआ जब यहाँ से डिडनेश्वरी देवी की प्राचीन प्रतिमा चोरी हो गई थी। तब समाचार पत्रों में इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता रहा। मैने भी तभी इसका नाम सुना था, पर इस स्थान पर जाना कभी न हो सका था।
पातालेश्वर मंदिर का प्रवेश द्वार एवं स्थानक विष्णु लक्ष्मी :)
चर्चा के दौरान द्वारिका प्रसाद जी ने भी कहा था कि सारी उम्र बिलासपुर में गुजारने के बाद भी वे मल्हार नहीं जा सके। आज आपके साथ जाना हो जाएगा। अब हम मल्हार से अनजान तीन लोग इस नगर की ओर बढ रहे थे। धीमी रफ़्तार से चलते हुए हम लगभग 7 बजे मल्हार पहुंच गए। सूर्य देवता भी अपना हल्का प्रभाव दिखाने लगे थे। मल्हार में प्रवेश करते समय छत्तीसगढ़ पर्यटन के सूचना पट पर पातालेश्वर मंदिर का रास्ता दिखाया गया था। हम भी इसी मंदिर में जाकर रुके। 
नदी देवियाँ एवं अनुचर
मंदिर परिसर की सुरक्षा चार दिवारी बना कर की गई है। लोहे का गेट खुला मिला और हम प्रवेश कर गए। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है, गेट से प्रवेश करते समय 18 अप्रेल विश्व धरोहर दिवस का बैनर टंगा हुआ दिखाई दिया। वैसे तो उदयपुर वाले श्री कृष्ण जुगनु जी ने फ़ेसबुक पर पूछ ही लिया था कि आज आप क्या करने वाले हैं। हमने उन्हें बताया कि मल्हार जाने वाले हैं।
जय भोले शंकर-कांटा गड़े न कंकर
द्वार से प्रवेश करने पर बांई ओर टीन के छत से ढकी मंदिर की विशाल संरचना दिखाई दे रही थी। इसे देखते ही अपुन समझ गए कि यही पातालेश्वर मंदिर है। पालेश्वर मंदिर का मंडप अधिष्ठान ऊंचा है पर गर्भ गृह में जाने के लिए 5-6 पैड़ियाँ उतरना पड़ता है अर्थात गर्भगृह धरातल पर ही है। द्वार के बांई तरफ़ कच्छप वाहिनी यमुना एवं दांई तरफ़ मकर वाहिनी गंगा देवी की स्थानक मुद्रा में आदमकद प्रतिमा है। इनके साथ ही शिव के अन्य अनुचर भी स्थापित हैं। 
गौमुखी पातालेश्वर शिव
गर्भ गृह में जाने के लिए पैड़ियों का प्रयोग होने के कारण इस मंदिर का नाम पातालेश्वर प्रचलन में आया तथा शिवलिंग का गौमुखी होना भी इसे विशेष मान्यता देता है। जब हम लोग मंदिर में पहुंचे तो कुछ लोग पूजा पाठ कर रहे थे। माधुरी जी ध्यान करती हैं, उन्होने शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात बताया कि इस स्थान पर उर्जा का स्तर काफ़ी ऊंचा है।
ई हमार कौनो जनम के भाई बंधू हैं मूंछधारी
द्वार पर स्थापित प्रतिमाओं को देखने के बाद मन प्रसन्न हो गया। शिल्पकार ने इन्हें सुडौल बनाया। प्रतिमा निहारने पर कहीं पर भी निगाहें अटकती नहीं हैं। कहा जाए तो सब कुछ "सूत" में निर्मित किया है सूत्रधार ने। इस मंदिर का निर्माण कलचुरी राजा पृथ्वीदेव के पुत्र जाजल्लदेव द्वितीय के समय में सोमराज नामक ब्राह्मण ने कराया, जिसे केदारेश्वर नाम दिया जो वर्तमान में पातालेश्वर प्रसिद्ध है। 
राम जी की सेना चली - हस्तिदल
मंदिर की भित्तियों में हस्ति दल, सिंह संघाट प्रतिमा, गणेश, पुष्प वल्लरियों का सुंदर अंकन है। मंदिर की दाईं भित्ति पर मूंछधारी सिंह का अंकन भी मनोहारी दिखाई देता है। मंदिर के सामने ऊंचे अधिष्ठान पर नंदी सजग मुद्रा में विराजमान हैं। कान खड़े हुए और आँखे शिव की ओर एक टक लगी हुई। जैसे आदेश होते ही त्वरित कार्यवाही करने को तत्पर दिखाई देते हैं।
नंदी बाबा तैयार हैं कार्यवाही के लिए- आदेश की प्रतीक्षा
मंदिर के समक्ष ही हनुमान जी की आदमकद प्रतिमा विराजमान है। स्थानक मुद्रा में हनुमान जी ने एक स्त्री पर बांया पैर धर रखा है। एक हाथ सिर पर है तथा दूसरा हाथ अभय मुद्रा में दिखाई देता है। यह प्रतिमा किस पौराणिक आख्यान पर आधारित है, स्मरण नहीं हो पा रहा। मंदिर के आस पास कई आमलक बिखरे पड़े हैं।  इसके साथ ही मडफ़ोर्ट की परिखा के तरफ़ पंचमुखी गणेश की आदमकद प्रतिमा भी रखी हुई है। 
भग्न मंदिरों के खंडहर
मंदिर परिसर में उत्खनन में प्राप्त कई मंदिरों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं इससे जाहिर होता है कि इस स्थान  पर मंदिरों का समूह रहा होगा। मंदिर के सामने ही कई जैन प्रतिमाएं पड़ी हुई हैं। सामने ही संग्रहालय भी बना हुआ है। परन्तु इस संग्रहालय में इतनी जगह नहीं है कि सभी प्रतिमाएं रखी जा सकें। संग्रहालय में मौजूद प्रतिमाओं का अवलोकन करने लिए हमने संग्रहालय में प्रवेश किया। 

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

निठल्लाई: साधो सहज समाधि भली

घुमक्कड़ी और लेखन का सिलसिला ही टूट गया, 4 महीने हो गए, जब से दिल्ली में चोट खाई तब दना-दन चोटें जारी हैं, एक ठीक होती है दूसरी लग जाती है। इनसे उबरने की कोशिश जारी है फ़िल्में देख-देख कर साधो सहज समाधि भली। जितनी फ़िल्में सारे जीवन में नहीं देखी, उतनी एक महीने में देखी। नेट और यू ट्यूब का अच्छे से दोहन किया। थोड़ा बहुत समय फ़िल्मों के बीच मिलता है वह फ़ेसबुक की भेंट चढ जाता है। घुमक्कड़ी से हासिल उर्जा जीवन की गाड़ी को आगे बढाती है। घुमक्कड़ी रुक जाती है तो लगता है कि दुनिया ठहर गई, सांसों का स्पन्दन भी सुनाई नहीं देता। चलती है धीरे-धीरे जीवित होने का अहसास कराते हुए। 

बरसात की झड़ी जारी है। बरसती बूंदों के बीच फ़सल हरिया रही है तो रुपया पीला पड़ते हुए मरणासन्न है, औंधे मुंह गिर रहा है धरा पर। जिसके पास धरा है वह भी धरे-धरे धराशाई हो रहा है और जिसके पास नहीं धरा वह तो नंगा ही खड़ा है, क्या खाए और क्या खिलाए। देश की अर्थ व्यवस्था धराशाई हो रही है और नेताओं के खजाने में अकूत संपत्ति जमा होती जा रही है। जिसे गिनने वाला कोई नहीं। बोरों में भरे हुए नोट गिनने का समय इनके पास कहाँ है? भरे के भरे बोरों का इस्तेमाल ही जाता है। 

रायपुर से घर लौटते हुए रास्ते में डूमरतराई के समीप गोलगप्पे का ठेला लगा देखा तो कंट्रोल नहीं हुआ। चलो गोल गप्पे खा लिए जाएं। गोल गप्पे में भरने के लिए मुझे अपनी पसंद का मसाला चाहिए। जिसमें प्याज होना जरुरी है। गोलगप्पे वाले कहा कि - महाराज प्याज नहीं है। मैने एक लड़के को 10 रुपए देकर प्याज लेने भेजा। वह 10 रुपए में एक ही प्याज लेकर आया। देख माथा खराब हो गया। प्याज की एक-एक परत एक-एक रुपए हो गई। जिसके पास हराम का धन है उसे क्या फ़र्क पड़ने वाला है। एक बार कुर्सी पर बैठते ही सात पुश्तों का जमा कर लेते हैं और गोवा में जाकर आयटम सांग करते हैं। यहाँ जांगर तोड़ कमाने के बाद भी कुछ नहीं बचता।

सबसे अधिक त्रासदी तो अब मध्यमवर्ग भुगतने वाला है। अभी तक किसानों के द्वारा ही आत्महत्या करने की खबरें मिलती थी। अब अर्थ व्यवस्था का यही हाल रहा तो मध्यमवर्ग से भी समाचार आने प्रारंभ हो जाएगें। खाद्य सुरक्षा बिल लोकसभा में पास हो गया। वोटों की राजनीति के कारण मुफ़्त बांटने की परम्परा शुरु हो गई। सत्तारुढ पार्टियाँ वोट बैंक बनाने के उद्देश्य से जनता की गाढी कमाई को दोनों हाथों से मुफ़्त बांट रही है। जिसका भार मध्यम वर्ग को झेलना है। उच्च वर्ग को टैक्स चुरा कर काला धन बनाने में लगा हुआ है। मध्यम वर्ग को ही प्रत्येक स्थान पर अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष कर देना पड़ता है। मुफ़्त का माल मिलने से कामचोरी बढते जाएगी। अगर खाना मुफ़्त में मिल जाएगा तो कमाने कौन जाएगा?

जो पैसा संसाधनों के विकास में लगना चाहिए वह मुफ़्तखोरी की भेंट चढता जा रहा है। लगाए जाओ तुम्हारे बाप का है, तुमने तो कमाया नहीं है जो खर्च करने में जान निकलेगी। इधर चीन बार बार सीमाएं लांघ जाता है। भारतीय सैनिकों के खाना-पानी मांगता है। मांगने की बीमारी प्रत्येक जगह है। अब तो म्यांमार के सैनिक भी मांगने भारतीय सीमा में घुसे चले आ रहे हैं। सोचता हूँ खाद्य सुरक्षा लागु होने के बाद देश में कहीं पर भी भिखारी नहीं दिखाई देगें। क्योंकि जब सरकार भरपेट में मुफ़्त में भोजन देगी और निराश्रित पेंशन इत्यादि मिल रही होती तो भीख मांगने की आवश्यकता ही खत्म हो जाएगी। हर हाथ को काम की जगह नारा होना चाहिए "हर पेट को खाना"। 

कई स्थानों से संगोष्ठियों के निमंत्रण आ रहे हैं। कई तो एक ही दिन पड़ रहे हैं, ऐसे में अलग-अलग स्थानों पर एक ही तारीख को उपलब्ध हो पाना असंभव है। रविन्द्र प्रभात जी भी काठमांडू में कार्यक्रम कर रहे हैं। परिकल्पना की टीम ने नेपाल में सम्मान देने की घोषणा की है। उन्हें समारोह की सफ़लता के लिए मेरी शुभकामनाएं। बरसात खत्म हो तो कुछ यात्राएं की जाएं। भोपाल में "मीडिया चौपाल" का इस वर्ष पुन: आयोजन हो रहा है। अनिल सौमित्र जी का निमंत्रण आया हुआ है। उम्मीद है कि नेपाल नहीं सही तो भोपाल जाना हो सकता है तथा उसके साथ ही आस-पास के स्थानों की घुमक्कड़ी करने का इरादा है।

दो बरस हो गए, पांडीचेरी गए। वहाँ काफ़ी मित्र हैं जो इंतजार करते हैं। भाषा अवश्य समस्या बनती है पर भावों से काम चल जाता है। नागमणि दूभाषिए की भूमिका निभा लेती हैं। एक बार पुन: पांडीचेरी जाने का मन बन रहा है। मित्र वी तंगम का फ़ोन आया था कि दो बरस हो गए पांडीचेरी आए। वैसे अभी पांडीचेरी का मौसम अच्छा होगा। समुद्र ठाठें मार रहा होगा और लहरें सिंहगर्जना कर रही होगी। रात के समय समुद्र किनारे आँख बंद कर बैठने पर लहरों का स्वर किसी दूसरी दुनिया में ले जाता है तथा बड़ा ही अलौकिक एवं अद्भुत अनुभव होता है। इसके साथ किनारे पर स्थित "ली कैफ़े" की काफ़ी और "शंकरा" के चखने का तो कोई तोड़ ही नहीं है। अभी तो जयपुर की दाल-बाटी-चूरमा का योग बन रहा है। फ़िर जोधपुर के मिर्ची भजिए का। बाकी बाद में देखा जाएगा।

शनिवार, 4 मई 2013

त्रिपुरी के कलचुरि

त्रिपुर सुंदरी तेवर
प्रारंभ से पढें
ज का दिन भी पूरा ही था हमारे पास। रात 9 बजे रायपुर के लिए मेरी ट्रेन थी। मोहर्रम के दौरान हुए हुड़दंग के कारण कुछ थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया था। आज कहीं जाने का मन नहीं था। गिरीश दादा को फ़ोन लगाए तो पता चला कि वे डूबलिया कार्यक्रम में डूबे हुए हैं। ना नुकर करते 11 बज गए। आखिर त्रिपुर सुंदरी दर्शन के लिए हम निकल पड़े। शर्मा जी नेविगेटर और हम ड्रायवर। दोनो ही एक जैसे थे, रास्ता पूछते पाछते भेड़ाघाट रोड़ पकड़ लिए। त्रिपुर सुंदरी मंदिर से पहले तेवर गाँव आता है। यही गाँव विजय तिवारी जी का जन्म स्थान एवं पुरखौती है। हमने त्रिपुर सुंदरी देवी के दर्शन किए और कुछ चित्र भी लिए। मंदिर के पुजारी दुबे जी ने बढिया स्वागत किया। 

तेवर का तालाब
ससम्मान देवी दर्शन के पश्चात हम तेवर गाँव पहुंचे। राजा हमे सड़क पर खड़ा तैयार मिला। तेवर गाँव में प्रवेश करते ही विशाल तालाब दिखाई देता है। कहते हैं कि यह तालाब 85 एकड़ में है। अभी इसमें सिंघाड़े की खेती हो रही हैं। तेवर पुरा सामग्री से भरपूर गांव है। जहाँ देखो वहीं मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। कोई माई बाप नहीं है। खंडित प्रतिमाए तो सैकड़ों की संख्या में होगी। इससे मुझे लगा कि यह गाँव कोई प्राचीन नगर रहा होगा। तालाब के किनारे पर शिवालय दिखाई दे रहा था और एक चबुतरे पर शिवलिंक के साथ कुछ भग्न मूर्तियाँ भी रखी हुई थी। ग्राम के मध्य में एक स्थान पर खुले में उमा महेश्वर की प्रतिमा रखी हुई है, यहाँ कुछ लोग पूजा कर रहे थे। ढोल बाजे गाजे के साथ कुछ उत्सव जैसा ही दिखाई दिया।

तेवर की बावड़ी
इससे आगे चलने पर एक विशाल बावड़ी दिखाई देती हैं। इसके किनारे पर एक मंदिर बना हुआ है, इस मंदिर में एक शानदार पट्ट रखा हुआ है जिसमें बहुत सारी मूर्तियाँ बनी हुई हैं। इस मंदिर के ईर्द गिर्द सैकड़ों मूर्तियाँ लावारिस पड़ी हुई हैं जिनका कोई माई बाप नहीं है। इसके बाद राजा हमें एक घर में मूर्तियाँ दिखाने ले जाता है, वहां पर सिंह व्याल की लगभग 5 फ़िट ऊंची प्रतिमा है, जिसे रंग रोगन लगा दिया गया है और उसके साथ ही दर्पण में प्रतिबिंब देखते हुए श्रृंगाररत अप्सरा की सुंदर प्रतिमा भी दिखाई थी। पास ही चौराहे पर उमामहेश्वर की एक बड़ी भग्न प्रतिमा रखी हुई है। राजा यहाँ से हमें झरना दिखाने ले चलता है। 

झरने में गड्ढे
4-5 किलो मीटर कच्चे रास्ते पर जाने के बाद एक स्थान पर झरना दिखाई देता है। इस स्थान के आस-पास बड़े टीले हैं और टीलों के बीच के मैदान में गाँव के बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। उम्मीद है कि इन टीलों में भी कोई न कोई मंदिर या भवन के अवशेष अवश्य ही दबे पड़े होगें। झरने का जल निर्मल है, हमने यहीं पर बैठ कर भोजन किया और झरने के निर्मल जल पीया। झरने की तलहटी में लगभग 1 फ़ीट त्रिज्या के कई गड्ढे बने हुए हैं और यहीं पर शिवलिंग भी विराजमान है। साथ ही एक दाढी वाले बाबा की मूर्ति भी रखी हुई है जिसे विश्वकर्मा जी बताया जा रहा है। अवश्य ही यह किसी राजपुरुष की प्रतिमा होगी। विजय तिवारी जी ने बताया था कि त्रिपुर सुंदरी मंदिर के रास्ते में खाई में महल के अवशेष भी दिखाई देते हैं। 

विशाल मंदिर का मंडप
हम महल के अवशेष देखने के लिए खाई पर पहुंचे, वहाँ सब्जी बोने वालों ने अतिक्रमण कर रखा है। कहते हैं कि सड़क निर्माण के दौरान यहाँ से बहुत सारी पुरासामग्री निकली है और मिट्टी के कटाव में बहुत सारे मृदा भांड के अवशेष हमें भी दिखाई दिए। झाड़ झंखाड़ के बीच हम खाई में उतरे और मंडप तक पहुंचे। यह किसी विशाल मंदिर का मंडप है। गर्भगृह के स्थान पर एक गड्ढा बना हुआ है, खजाने के खोजियों ने यहाँ पर भी अपना कमाल दिखा रखा है। इस गड्ढे को लोग सुरंग कहते हैं। बताया जाता है यहाँ से रास्ता महल तक जाता था। खाई में सैकड़ों की संख्या में बिल दिखाई दे रहे थे ऐसी अवस्था में अधिक देर हमने ठहरना मुनासिब न समझा। क्योंकि यह स्थान सांपों के लिए मुफ़ीद स्थान है। 

अप्सरा
अब तेवर के ऐतिहासिक महत्व की चर्चा करते हैं, पश्चिम दिशा में भेड़ाघाट रोड पर स्थित वर्तमान तेवर ही कल्चुरियों की राजधानी त्रिपुरी है जो कि शिशुपाल चेदि राज्य का वैभवशाली नगर था। इसी त्रिपुरी के त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करने के कारण ही भगवान शिव का नाम ‘त्रिपुरारि‘ पड़ा। यहाँ स्थित देवालयों एवं भग्नावशेषों से ही ज्ञात होता है कि कभी यह नगर वैभवशाली रहा होगा। तेवर की प्राचीनता हमें ईसा की पहली शताब्दी तक ले जाती है। तेवर जिसे हम त्रिपुरी कहते हैं यह चेदी एवं त्रिपुरी कलचुरियों की राजधानी रहा है।  गांगेय पुत्र कल्चुरी नरेश कर्णदेव एक प्रतापी शासक हुए,जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे।

भग्नावशेषों का निरीक्षण करते हुए
जबलपुर के पास ही गढ़ा ग्राम पुरातन "गढ़ा मण्डलराज्य' के अवशेषों से पूर्ण है। गढ़ा-मण्डला गौड़ों का राज्य था गौड़ राजा कलचुरियों के बाद हुए हैं। जबलपुर के पास की कलचुरि वास्तुकला का विस्तृत वर्णन अलेक्ज़ेन्डर कनिंहाम ने अपनी रिपोर्ट (जिल्द ७) में किया है। प्रसिद्ध अन्वेषक राखालदास बैनर्जी ने बी इस विषय पर एक अत्यन्त गवेष्णापूर्ण ग्रंथ लिखा है। भेड़घाट और नंदचंद आदि गाँवो में भी अनेक कलापूर्ण स्मारक हैं। भेड़ाघाट में प्रसिद्द "चौंसठ योगिनी' का मंदिर। इसका आकार गोल है। इसमे ८१ मूर्तियों के रखने के लिए खंड बने हैं। यह १०वीं शताब्दी में बना है। मन्दिर के भीतर बीच में अल्हण मन्दिर है। इन सभी स्थानों में मन्दिरों और मूर्तियों में जिस प्रकार की कला पाई जाती है। 

हमारा त्रिपुरी दर्शन पूर्णता की ओर था। राजा को गाँव में छोड़ कर हम जबलपुर वापस आ गए, मुख्यमार्ग में कर्फ़्यू लगे होने के कारण कई घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए हम सिविल लाईन पहुंचे। यहाँ से स्टेशन थोड़ी ही दूर है, 9 बजे हमारी ट्रेन का टाईम था और अमरकंटक एक्सप्रेस हमारी रायपुर वापसी थी। नियत समय पर ट्रेन पहुंच गई और जबलपुर की यादें समेटे हुए चल पड़ा अपने गंतव्य की ओर नर्मदे हर नर्मदे हर का जयघोष करते हुए। इति जाबालिपुरम् यात्रा