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बुधवार, 17 नवंबर 2010

एक दिन के वकील--फैसला ऑन दी स्पाट


आरम्भ से पढ़ें 
रोहतक यात्रा प्रारंभ हो चुकी है. कल रायपुर से ४.५० को दुर्ग जयपुर एक्सप्रेस से रवाना हुए कोटा के लिए. स्टेशन पहुच कर देखा तो अपार भीड़ थी.

इतनी भीड़ मैंने कभी रायपुर रेलवे स्टेशन पर नहीं देखी थी. मैंने सोचा कि यदि ये सभी जयपुर की सवारी है तो आज की यात्रा का भगवान ही मालिक है. तभी रायपुर डोंगरगढ़ लोकल गाड़ी आ कर खड़ी हुई. आधी सवारी उसमे चली गई. थोडा साँस में साँस आया.

अपनी गाड़ी भी आकर स्टेशन पर लगी. अपनी सीट पर हमने कब्ज़ा जमा लिया. तभी एक बालक भी आकर बैठा. खिड़की से उसके मम्मी-पापा उसे ठीक-ठाक यात्रा करने की सलाह दे रहे थे.

उसके पापा ने मुझे मुखातिब होते हुए कहा-"सर जरा बच्चे का ध्यान रखना और इसके पास मोबाइल और रिजर्वेशन नहीं है. कृपया टी टी को बोल कर कन्फर्म करवा देना और आप अपना नंबर भी दे दीजिये मैं इससे बात कर लूँगा.

मैंने भी हां कह कर एक मुफ्त की जिम्मेदारी गले बांध ली. क्या करें अपनी आदत ही ऐसी है. दिल है की मानता नहीं है. दो चार सवारियां और आ गई हमारी बर्थ पर. 

हम प्रखर समाचार की दीवाली स्मारिका पढ़ने लगे. उसमे मानिक विश्वकर्मा जी की ४ उम्दा गजले छपी थी. हम रह ना सके और उन्हें फोन लगा बैठे. ग़ज़लों के लिए शुभ कामनाएं दी और काफी दिनों से चर्चा नहीं हुयी थी इसलिए लम्बी चर्चा भी कर बैठे.

पाबला  जी का भी फोन आया की गाड़ी में बैठा की नहीं. मैंने उन्हें अपने सकुशल स्थान प्राप्ति की सूचना दे दी और यात्रा की सफलता के लिए शुभकामनायें भी ग्रहण की.

घर से चले थे तो श्रीमती जी ने यात्रा के लिए सब्जी के विषय में पूछा था. तो मैंने उनसे मेरी प्रिय सब्जी जिमीं कंद बनाने के लिए कहा और उसे ठीक से पैक करने की सलाह भी दी, जिससे सब्जी कोटा तक पहुच जाये. क्योंकि वकील साहब को जिमीं कंद की सब्जी जो खिलानी थी.

बिलासपुर स्टेशन में ट्रेन २० मिनट रुकती है. वहां श्याम (उदय) भाई भी पहुच गए, बहुत दिन हो गये थे उनसे मिले. बिलासपुर में मिलकार अच्छा लगा. अरविन्द झा जी तो दरभंगा गए होए थे. ट्रेन चल पड़ी. तभी पेंड्रा रोड से गुड्डू को फोन लगाया ट्रेन वहां ८.३० को पहुचती है. लेकिन लेट होने पर मैंने उसे आने से मना कर दिया.

रास्ते में मैंने खोंगसरा स्टेशन देखा तो पुरानी घटना याद आ गई. १६ जुलाई १९८१ गुरुवार को यहाँ एक भीषण रेल दुर्घटना हुई थी, जिसकी श्री रमेश नैयर दिनमान में रिपोर्टिंग की थी. मैंने उसे पढ़ा था.

यहाँ ट्रेन रुकी तो मुझे एक रेलवे ड्राईवर जगदीश प्रसाद निर्मल कर मिल गाय. उन्होंने बताया कि मैंने ७ जुलाई १९८१ को पदभार ग्रहण किया और १६ जुलाई की घटना होने के कारण मुझे इसकी पूरी जानकारी है. इस ट्रेक पर इंदौर जाने वाली गाड़ी थी. उसके पीछे एक माल गाड़ी जा रही थी जिसमे असिस्टेंट ड्राईवर था.

रास्ते में गाड़ी रोल हो गयी. असिस्टेंड ड्राईवर को अधिक जानकारी नहीं थी. इसलिए पता नहीं की उसने लोको ब्रेक लगाया की नहीं. वह चलती ट्रेन से उतर गया और गाड़ी धडधडाते सामने जा रही ट्रेन से जा टकरायी सैकड़ों लोग मारे गए. इस दुर्घटना के कारण एक छोटा सा स्टेशन खोंगसरा अभी तक याद किया जाता है.  

ट्रेन में खाटू श्याम जी जाने वाले बहुत से भगत मौजूद थे. उन्होंने खंजरी और सुर ताल के साथ भजन गाना शुरू कर दिया. हमने भी मौके का फायदा उठाया और पहुच गए उनके पास और २ घंटे तक भजन गाते सुनते रहे. भरपूर आनंद आया.

इस तरह की सवारियां रहे तो सफ़र मजे से कट जाता है और यदि कोई मनहूस शक्ल लिए बैठा हो तो सफ़र बहुत भारी पड़ जाता है. ऐसे लगता है जैसे हम फ्लाईट या एसी क्लास की सवारी कर रहे हैं. जो मजा स्लीपर क्लास में है वह इन सबमे कहाँ.

इस क्लास में तो असली भारत देखने मिलता है. सीट पर बैठते ही लोग ईज्जत से पूछते हैं कि "भाई साहब आप कहाँ जा रहे हैं?"

लेकिन फ्लाईट या एसी क्लास में कोई भी नहीं पूछता. सारे ही १२ सेर के होते हैं. भोजन करते वक्त भी एक बार मनुहार कर ही लेते हैं, चाहे सामने वाला अपरिचित क्यों ना हो.

भोजन-भजन करने के बाद देखा तो एक मोबाइल की बैट्री उतर रही है. हमने सोचा अब चार्ज ही कर लिया जाये. ४ बोगी में जाने के बाद एक जगह सही प्लग मिला लेकिन वह भी ढीला था उसमे पिन लगाने के बाद पिन को पकड़ कर खड़ा होना पड़ता था.

कुछ देर खड़े रहे फिर हिम्मत जवाब दे गई. दुसरे फोन में बैटरी फुल है सोचकर दरवाजे के पास पहुचे दो देखा एक सज्जन फुल तन्न हुए वहां खड़े खड़े हिल रहा था. कही थोडा झटका लगा और समझो हैप्पी बर्थ डे हुआ.

उसे हटा कर दरवाजा बंद किया और चल दिये अपनी सीट का किराया वसूल करने के लिए. सुबह नींद खुली तो अपने को गुना स्टेशन पर पाया. यह वही गुना है जहाँ से राजमाता विजया राजे चुनाव लडती थी. उसके बाद दिग्विजय सिंह से भाई लक्षम्ण सिंग चुनाव जीते थे.

सुबह के ८.२५ हुए थे ये वहां की घडी बता रही थी. हमें चाय की तलब लगी तो स्टेशन के काउंटर से चाय बेचने वाले के पास पहुचे वहां लाइन लगी थी. जैसे राशन की लाइन लगी हो. बड़ी मशक्कत के बाद एक कफ चाय मिली. उसे पीने के बाद यही सलाह दूंगा की कभी भी गुना में चाय नहीं पीना.

दिनेश जी का भी फोन आया, तो हमने बताया कि गुना पहुचे हैं. उन्होंने बताया की कोटा में बरसात हो रही है. मतलब मौसम खुशगवार हो गया है. लेकिन कहीं ज्यादा बरसात हो गयी तो इससे ज्यादा खुशगवार मौसम नहीं होना है.

रास्ते में बारां के बाद दो स्टेशन और आये. सरदारों वाले टाइम पे हम कोटा पहुच चुके थे. दिनेश जी फोन करके प्लेट फार्म पे ही रहने को कहा. थोड़ी देर में वे भी पहुच गए. स्टेशन से सीधा घर आये.....

आज उनकी कार हास्पिटल में लीवर का इलाज करने गई है. बस थोड़ी ही देर में आने वाली है फिर हम जरा कोटा शहर के एक चक्कर लगायेंगे. हां हमने मशहूर रतन लाल की कचौरियां जरुर खाई. कुछ तो दम है इन कचौरियों में, अभी तक भूख नहीं लगी है.

दिनेश जी ने बताया कि अमिताभ बच्चन भी कोटा की कचौरिया खाकर ही कोलाईटिस होने से अस्पताल में दाखिल हुए थे. लेकिन हमारे हाजमे पर कोई संदेह नहीं है. हमने आते ही दिनेश जी को कुर्सी संभाल ली. एक दिन के वकील बन गए. कोई मुक़दमा हो तो ले आओ. फैसला ऑन दी स्पाट, हा हा हा, मिलते हैं एक ब्रेक के बाद कल सुबह  में ....... आगे पढ़ें