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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

झूलती मीनार और अलबेला खत्री ने मारी डुबकी --- ललित शर्मा

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अगली सुबह अलबेला खत्री जी से बात हुई तो उन्होने बताया कि वे एक दिन पहले अहमदाबाद में ही थे। फ़िर उन्होने कहा कि अगले दिन मैं सुबह की गाड़ी से अहमदाबाद आ रहा हूँ। वहीं मुलाकात हो जाएगी। मैने कहा कि अहमबाद स्टेशन पर आपको गाड़ी तैयार मिलेगी। मुझे फ़ोन कर देना, ड्रायवर आपको हमारे ठिकाने पर पहुंचा देगा। मेरी यह चर्चा अलबेला भाई से लोथल से लौटते वक्त हो रही थी। सुबह जब हम ऑफ़िस में पहुचे और उन्हे फ़ोन लगाया तो पता चला कि उनकी गाड़ी छुट गयी। उन्होने कहा कि जब शाम को आप सूरत पहुंचेगें तो मिलते हैं। चलो कोई बात नहीं यह भी खूब रही। संजय बेगानी जी को वापसी की सूचना देने के लिए फ़ोन लगाया तो उनकी तबियत भी नासाज थी। सर्द गर्म और वायरल से जूझ रहे थे। उन्हे आराम करने की सलाह देते हुए मैने वापसी का समाचार दिया।

मेरे रास्ते का खाना घर से बन कर आ गया था। पोरबंदर हावड़ा एक्सप्रेस अपरान्ह 3.40 पर थी। हम दोपहर का भोजन करके स्टेशन पहुंचे। विनोद गुप्ता जी भी साथ ही थे। वहाँ पहुंचने पर पता चला कि ट्रेन रात को 10.50 पर आएगी। सुन कर झटका लगा, सात घंटे लेट थी ट्रेन। आगे कोई भरोसा भी नहीं कब आए। हावड़ा रुट की सभी गाड़ियाँ रिशेडयुल हो कर चल रही  हैं ज्ञानेश्वरी दुर्घटना के बाद। रेल्वे की वेबसाईट पर रिशेडयुल समय नहीं दिखाता। इसके कारण यात्रियों को परेशानी होती है। अगर मुझे सही समय का पता लग जाता तो अहमदाबाद पुरी से टिकिट करवाता। काहे के लिए हावड़ा वाली गाड़ी में मगजमारी करता। यह रेल्वे की सरासर धोखाधड़ी है यात्रियों के साथ। अगर पहले पता चल जाए कि ट्रेन 7-8 घंटे लेट चलेगी तो यात्री उसके हिसाब से इंतजाम करके आए। अल्पना जी का सामान मुझ तक पहुंच चुका था।

स्टेशन के पास झूलती हुई मीनार है, विनोद भाई ने कहा कि अब आ गए हैं तो वही देख लेते हैं। हम समीप में बनी झूलती मीनार देखने गए। दो मीनारें बनी हुई है। इन्हे चारों तरफ़ से घेर दिया गया है। कहते हैं कि हाथ से धक्का देने पर यह मीनारें हिलती हैं। इसलिए इन्हे झूलती हुई मीनार कहा जाता है। मीनारे गिरने का खतरा देखते हुए इन्हे घेर कर बाड़ कर दी है। आस-पास गंदगी फ़ैली हुई है। जबकि गुजरात पर्यटन के कैलेंडर में इन मीनारों की फ़ोटो भी लगी है। अगर कोई पर्यटक आएगा तो क्या गंदगी देखने आएगा। जहाँ सड़ांध उठ रही हो। हुँ छुँ अमदाबाद वाला बोर्ड शायद यही प्रदर्शित कर रहा है। आओ देखो अहमदाबाद में पर्यटक स्थलों का क्या हाल है। मीनारे देखने के बाद हम पुन: आफ़िस आ गए। अब रात को ट्रेन पकड़नी थी। तब तक नेट पर ही टाईम पास किया जाए।

शाम को विनोद भाई के साथ घर पहुंचे, फ़िर रात का भोजन करके साढे दस बजे स्टेशन रवाना हुए। रास्ते में सैंटा क्लाज की ड्रेस बिक रही थी। एक ड्रेस उदय के लिए ली। स्टेशन पहुंचने पर पता चला कि गाड़ी एक घंटे लेट और हो गयी है। इंतजार करते समय बीतता गय। सवा बारह बजे ट्रेन आई। हमने अपनी सीट संभाली और सो गए। सुबह आँख खुली तो सूरत निकल चुका था। सूरत नरेश अलबेला खत्री का कहीं पता नहीं था। न वो आए, न उनका फ़ोन आया। गजब ही कर दिया कविराज ने। कोई बात नहीं, परदेश का मामला ही ऐसा होता है। अगर कही सूरत पहुंच जाते तो वे शायद मुंबई में मिलते। वापसी की यात्रा का फ़ोन सूर्यकांत गुप्ता जी को कर दिया था। नागपुर में वे इंतजार कर रहे थे।

ट्रेन नागपुर लगभग 4 बजे पहुंची। गुप्ता जी स्टेशन पर मिल गए। अब एक से भले दो। रात और आधा दिन मैने सोकर ही काटा था। गुप्ता जी के आने से बहार आ गए। गुंजने लगे हंसी के ठहाके और ट्रेन चलने लगी। साढे सात बजे लगभग हमारी ट्रेन दुर्ग स्टेशन पहुंच गयी। गुप्ता जी विदा लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ लिए। अब हमें रायपुर आने का इंतजार था। लगभग 8 बजे हम रायपुर पहुंचे। स्टेशन के बाहर अल्पना जी इंतजार करते मिली। उनका सामान जो लाए थे। ठंड बढ गयी थी, एक मित्र की सहायता रात घर पहुंचे। उन्होने गाड़ी भेज दी थी। इस तरह गुजरात की अधूरी यात्रा सम्पन्न हुई। होली के बाद बाकी यात्रा पुरी करनी है। कुछ देखना छूट गया, उसे पूरा करना है।

रविवार, 22 जनवरी 2012

फ़ेसबुकिया कबूतरी की गुड मार्निंग -- ललित शर्मा

अहमदाबाद का सुबह का नजारा
सुबह साढे 5 बजे आँख खुली तो खिड़की से अंधेरा नजर आ रहा था। तब समझ आया कि यहाँ हमारे छत्तीसगढ की अपेक्षा दिन देर से निकलता है। खिड़की से नीचे झांक कर देखा तो स्ट्रीट लाईट जल रही थी। सुनसान सड़क शंहशाह की सवारी गुजरने का अहसास करा रही थी। अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर................। खिड़की से झांक कर हमने फ़िर बिस्तर पकड़ लिया। 7 बजे उठे तो थोड़ा प्रकाश देखने मिला। हम भी खुश हुए कि सुबह हो गयी। केयर टेकर को चाय की घंटी मारी। नामदेव जी भी उठ गए, उन्हे ड्यूटी पर लगाया जिससे वे जल्दी स्नान ध्यान कर लें उसके बाद हम कर लेगें। हमें तो कहीं जाना नहीं था, आज दिन भर आराम का ही मुड था। थोड़ी देर में चाय आ गयी।

कबूतर और कबूतरी (दुर्लभ चित्र)
हम बिस्तर छोड कर सोफ़े पे डट गए, जैसे ही खिड़की की तरफ़ देखा तो कल वाला कबूतर एक कबूतरी पटा लाया था। चोंच लड़ा कर प्रात: कालीन फ़ेसबुकिया गुड मार्निंग कर रहा था। हमें थोड़ी ईर्ष्या हुई, काश! हम भी कबूतर होते तो लाला जी मुंडेर पर ही बैठे रहते। बने रहते लोटन कबूतर, लाला जी की दूकान भी चलते रहती और कबूतरी भी गुटरगूँ करते रहती। कौउनु फ़रक नहीं पड़ने वाला था। तभी प्रेम चोपड़ा की एन्ट्री हो जाती है, उसे देखते ही कबूतरी फ़ुर्रर्र हो गयी, कबूतर बैठा रहा वहीं छज्जे पर। कितना खौफ़  है न प्रेम चोपड़ा का? यह किरदार चराचर जगत के सभी प्राणियों में पाया जाता  है। जैसे ललाईन के छज्जे के सामने बनवारी काका। दिन हो रात खिड़की खोले खांसता ही रहता है मुआ। चलो छोड़ो सुबह सुबह क्या झमेला ले बैठे। कबूतर जाने और कबूतरी जाने, हमे क्या लेना? हूँ ...........तो।

विनोद भाई
चाय समाप्ति पर कार्यक्रम बना कि नामदेव जी जाएगें दर्जी युवक-युवती परिचय सम्मेलन में और हम जाएगें विनोद भाई के घर पर। दोनो स्नानादि से निवृत्त होकर बीएसएनएल कालोनी पहुंचे, वहाँ रिदम एवं व्योम के साथ भाभी जी से भी मुलाकात हुई। चाय लेकर नामदेव जी युवक-युवती परिचय सम्मेलन मे चल दिए। हम और विनोद भाई गजल के काफ़िया मिलाने में लगे रहे। दिन भर बीत गया। नामदेव जी के पहुंचने पर शाम को कांकरिया तालाब घूमने निकले। अल्पना ने मुझे बताया कि अहमदाबाद में घूमने की एकमात्र जगह है। कांकरिया तालाब का निर्माण किसने कराया, क्यों कराया इसकी तो जानकारी नहीं ली। कांकरिया तालाब में प्रवेश करने के लिए 10 रुपए टिकिट लगती है। विनोद भाई ने अब्दुल कलाम जी जैसे लाईन में खड़े होकर टिकिट ली। हम लाईन के बाहर खड़े रहे, जब एक लाईन में लगा है दो क्यों लगे? दो लगने से भी टिकिट तो जल्दी मिलने से रही।

किसने मारी कंकरी कांकरिया तलाव में
कांकरिया तालाब काफ़ी बड़े इलाके में बना है। रात को तालाब के सब तरफ़ झमाझम रंगीन बल्बों का प्रकाश सुंदर दिखता है। हम पैदल ही निकल लिए तालाब के चक्कर लगाने के लिए। एक ने बताया की तालाब का पुरा चक्कर लगभग 4 किलोमीटर का है। तालाब का विकास एक पिकनिक स्थल की तरह किया गया। यहाँ गैस के बैलून से लेकर, टॉय ट्रेन एवं ओपन बसे भी हैं। जो पर्यटकों को तालाब का भ्रमण कराती हैं। गैस के गुब्बारे में चढकर आप अहमदाबाद का रात का नजारा देख सकते हैं। बताते हैं कि गुब्बारा फ़ूटने से कुछ लोग नीचे गिरकर उपर भी चले गए थे। तब इसे बंद कर दिया था। लेकिन अब गुब्बारे का सफ़र पुन: चालु है। तालाब के किनारे पर हनुमान जी का एक मंदिर भी दिखाई दिया। थोड़ी ही दूर पर शास्त्री जी भी खड़े थे। एक स्थान पर हल्का फ़ुल्का नाश्ता लिया और कांकरिया तालाब का हमारा चक्कर पूरा हो चुका था।

मैया रेल खिलौना लैइहौं -नामदेव जी
10 बज रहे थे, विनोद भाई ने कहा कि अब कहीं खाना खाने चलते हैं। संकल्प नाम के होटल में गए, वहां पहुंचने पर खाने के लिए लोग लाईन लगा कर बैठे थे। गजब मामला है, हम तो मुफ़्त की पंगत में इंतजार नहीं करते, काउंटर वाले ने हमे आधे घंटे का टाईम दिया। बाहर चेयर डाल रखी थी हम वहीं गपियाते बैठ गए। आधे घंटे बाद हमारा नम्बर आया, खाने का आडर दिया स्टीवर्ड को। सबसे पहले उसने एक धमेले जैसा फ़ाफ़ड़ा लाकर रखा। कहा कि होटल की तरफ़ से स्टाटर फ़्री है। भोजन लगते ही खाने लगे, तभी एक सब्जी में से बाल निकल आया। लम्बा बाल था, छोटा-मोटा होता तो पता ही नहीं चलता। मैनेजर को बुलाया, उसने माफ़ी मांगी लेकिन अब मुड किरकिरा हो चुका था।

होटल संकल्प - ढूंढो अन्य विकल्प
विनोद भाई पहले बता रहे थे इस रेस्टोरेंट की अहमदाबाद में चैन है। हमारी सब्जी से चैन निकलती तो कोई बात थी,  लेकिन निकला बाल और उसने मन का चैन खो दिया। आखिर में उसने आईसक्रीम दी। लेकिन बिल से सब्जी का चार्ज कम नहीं किया। इसलिए संकल्प की चैन के चक्कर में जाएं तो अपने रिस्क पर। यह एक ग्राहक का अनुभव है। दो बार बाहर भोजन किया, दोनो बार ही अनुभव सही नहीं रहा। इससे बढिया तो हमारे अमरू का ढाबा है, सब कूछ आँखों के सामने। भट्ठी, तवा, कड़ाही तेल, जो कुछ बन रहा है वह सामने है। आँखों के सामने बनवाओ और खाओ। एक ब्रिटिश सीरियल में और यू ट्यूब हाईजेनिक किचन के शेफ़ लोगों के विडियो देखने के बाद तो क्या मन करेगा इन हाईजैनिक फ़ुड वाले होटलों में। खाना अपने गेस्ट हाऊस के केयर टेकर का ही बढिया लगा। इसलिए अहमदाबाद जाने वाले संकल्प का विकल्प अभी से देख लें। संकल्प से सबक लेकर हम पहुंचे अपने गेस्ट हाऊस, आगे की कथा अगली पोस्ट में............आगे पढें

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

अदभुत शिल्पकारी : रुड़ा बाई नी बाव -રુદ઼ા બાઈ ની બાવ​ -- ललित शर्मा


अड़ालज का रास्
मारुतिनंदन रेस्टोरेंट से भोजन करके गांधीनगर मार्ग पर बढते हैं, इस मार्ग पर आगे चल कर बाएं हाथ को अड़ालज लिखा हुआ एक बोर्ड लगा है। हमारी गाड़ी यहीं से एक गोल चक्कर लेती है और अड़ालज की ओर बढ जाती है। बावड़ियाँ तो बहुत देखी हैं। लेकिन जिग्नेश ने बताया कि रुड़ा बाई नी बाव नामक यह बावड़ी कुछ खास हैं। खंडहरों में चक्कर काटने वाले मेरे जैसे आदमी को सुनकर ही अच्छा लगा। हमने तुरंत निर्णय ले लिया बाव देखने का। थोड़ी देर में अड़ालज से पहले दाएं हाथ की तरफ़ मुक्तिधाम दिखाई देता है। मुक्ति धाम गाँव में सही जगह पर था। अगर व्यक्ति को मुक्ति हमेशा याद रहे तो दुनिया चमन हो जाए, अमन हो जाए। लेकिन याद कहाँ रहता है, आदमी बड़ी जल्दी भूल जाता है। मुक्तिधाम से दाएं मुड़ने पर एक बड़ा चौक आता है, उसके चारों तरफ़ सब्जी वालों ने डेरा लगा रखा है। इसके दाएं तरफ़ एक लोहे का गेट नजर आता है। उसके दाएं तरफ़ रुड़ाबाई नी बाव की जानकारी देते हुए एक पत्थर लगा है।

बाव में शिल्पकार
हम गेट से बावड़ी में प्रवेश करते हैं वहाँ बाएं हाथ की तरफ़ एक मंदिर है और सीधे में बावड़ी का प्रवेश द्वार है। वावड़ी 5 मंजिली है और लगभग 100 से उपर सीढियाँ हैं नीचे उतरने के लिए। बावड़ी का प्रस्तर शिल्प अदभुत है। कारीगर ने बहुत ही बारीकी से छेनी हथौड़े का काम कर अंकन किया है। पहला स्टेप उतरने बाद दोनो तरफ़ सुंदर झरोखे बने हुए हैं। झरोखों पर बेल बूटे से लेकर हाथी, घोड़े, नर-नारी इत्यादि कुशलता से उकेरे गए हैं। हाथि्यों की तो पूरी फ़ौज ही है। बावड़ी को अंग्रेजी में स्टेप वेल कहा जाता है। मैने अन्य जगहों पर बावड़ियाँ देखी हैं पर इस बावड़ी की कला अद्भूत है। बावड़ी में नीचे उतरने पर अंतिम मंजिल पर जाली से ढंका हुआ एक कुंआ है। इस कुंए तक जाने नहीं दिया जाता। यह बावड़ी पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। 

सिक्का फ़ेंक तमाशा
कुछ लोग कुंड के पानी में सिक्के फ़ेंक रहे थे, फ़ेंका गया सिक्का पानी में सीधे डूबता नहीं था। कई देर तक वह पानी के उपर चक्कर काटता रहता था। हमने भी कई सिक्के फ़ेंक कर जायजा लिया। लगा कि पानी घनत्व अधिक होने के कारण सिक्का सीधे नहीं डूब रहा था। सिक्का कई देर तक कुंए में गोल चक्कर काटते हुए डूबता उतरता रहता और फ़िर पानी पर तैरने लगता। पानी पर सैकड़ों सिक्के तैर रहे थे। अन्य किसी कुंए में सिक्के फ़ेंकने के बाद पानी में डूब जाते हैं, लेकिन इस बावड़ी में सिक्के नहीं डूब रहे थे।अगर आप जाएं तो प्रयोग करके देख सकते हैं। बावड़ी के निर्माण में लाल सेंड स्टोन का प्रयोग किया गया है। शिला लेख में लिखा है कि पत्थर लाने के लिए जिन गाड़ियों का उपयोग किया गया था उनके तेल का खर्च एक लाख स्वर्ण मुद्राएं था। मुझे समझ नहीं आया कि 1550 में कौन से ऐसे वाहन चलते थे जिन्हे चलाने के लिए तेल का उपयोग किया जाता होगा।

बावड़ी का सुंदर दृश्य, यहीं पर ब्राह्मी मे लिखा हुआ शिलालेख है
बावड़ी निर्माण के पीछे की कहानी यह है कि अड़ालज गाँव पाटण राज्य के अंतर्गत आता था। राजा वीर सिंह बाघेला ने वेबु राज्य के सामंत ठाकोर को लड़ाई में हराकर उसके राज्य पर कब्जा किया तथा उसकी रुपवती कन्या लाल बा के साथ शास्त्रोक्त पद्धति से विवाह रचाया। स्थानीय बोली में रुड़ा नेक काम करने वाले को कहा जाता है। लाल बा के प्रजा वत्सल होने के कारण प्रजा के प्रति उसका अपार स्नेह था। वह अपनी प्रजा का ख्याल रखती थी इसलिए उसे रुड़ा बाई कहा जाने लगा। 1550 में भयंकर अकाल पड़ा, राज्य में त्राहि-त्राहि मच गयी। इससे द्रवित होकर रानी लाल बा ने अपने खजाने से 5 लाख स्वर्ण मुद्राएं प्रजा की सहायता के लिए निकाली और बावड़ी का निर्माण करना तय किया। तब से यह बावड़ी रुड़ा बाई नी बाव के नाम से जानी जाती है। यह बावड़ी गुजरात की शिल्प धरोहरों के मुकुट मे चमकता हुआ एक हीरा है। शिल्प कला की एक धरोहर है। 5 माले की यह बावड़ी शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना है। 

बावड़ी से बाहर आते हुए नामदेव जी के साथ
कुछ समय बाद अहमदशाह ने वीरसिंह वाघेला को युद्ध में मार गिराया और उसके राज्य पर कब्जा कर लिया। लाल बा की सुंदरता के चर्चे उसने सुन रखे थे। लाल बा के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा। जब यह घटना घट रही थी तब बावड़ी का काम चालु था। इसका गुम्बद एंव तीन दरवाजे बनने बाकी थे। लाल बा ने चतुराई का सहारा लिया और अहमदशाह को संदेश दिया  कि जब बावड़ी का कार्य पूरा हो जाएगा वह उसके साथ विवाह कर लेगी। शायद अहमदशाह ने लाल बा की बात नहीं मानकर जिद की होगी तब हार कर लाल बा ने अपना सतित्व बचाने के लिए बावड़ी की पांचवी मंजिल से कूद कर जल समाधि ले ली। रुड़ा बाई (लाल बा) के जान देने के पश्चात बावड़ी का काम अधुरा रह गया। अभी तक बावड़ी का गुम्बद एवं तीन दरवाजों का अधूरा पड़ा है। शिल्पकारों का अधूरा छोड़ा गया काम भी स्पष्ट दिखाई देता है।

हाथीयों की फ़ौज की मौज
सुंदर शिल्पकला युक्त निर्माणों के साथ शिल्पकारों की पीड़ा भी जुड़ी होती है। यहाँ भी वही हुआ जो अन्य जगहों पर सुनाई देता है। राजा ने उन शिल्पकारों को मार डाला जिन्होने ने बावड़ी का निर्माण किया था। इस तरह की बावड़ी का निर्माण अन्य स्थान पर न कर सके। निर्माण के पुरुस्कार स्वरुप शिल्पकारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मैने जहाँ भी निर्माण देखे हैं वहाँ पर बनाने वाले शिल्पकारों की कोई चर्चा ही नहीं होती। उनके नाम निशान नहीं होता। जिन्होने बनवाया है उनका ही नाम होता है। हाँ अपवाद स्वरुप आमेर के किले के शिल्पियों दिलावर सिंह और मोहन लाल का नाम किले के साथ जुड़ा है। रुड़ाबाई की बाव के शिल्पियों का भी कोई नाम नहीं निशान नहीं है। 

इतिहास के झरोखे में
इस बावड़ी में ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख है जिस पर रुड़ा बाई की बाव के निर्माण के विषय में लिखा है। मैं शिलालेख की तश्वीर लेना चाहता था। यह शिला लेख 4 थी मंजिल पर लगा है और उपर की सीढियाँ बंद होने के कारण नीचे से एक फ़िट के छज्जे से होकर उस तक पहुंचा जा सकता है। साथ की दीवाल पर कोई पकड़ नहीं होने के कारण दुर्घटना की आशंका भी थी। पुरातत्व सर्वेक्षण के चौकीदार ने बताया कि इस रास्ते से कुछ लो गिर कर प्राण गंवा बैठे हैं। इसलिए रास्ता बंद कर दिया है। मैने खतरा उठाना ठीक नहीं समझा। शिलालेख की फ़ोटो तो और कहीं भी मिल जाएगी। अगर किसी और ने फ़ोटो नहीं ली होती तो एक बार प्राण की बाजी लगाई जा सकती थी। बाव के उपरी हिस्से में लोहे के जाल लगा दिए गए हैं तथा एक बगीचा भी बना है। जहाँ लोग तफ़री करते दिखाई दिए।

बावड़ी के उपर का दृश्य
बाव की उपरी सतह पर रस्सी से पानी निकालने के लिए चकरी की व्यवस्था भी है। साथ ही गगरियाँ रखने के लिए खेळ का निर्माण भी किया गया है। हमने बाव को अच्छी तरह से देखा। अब समय हो गया था आगे बढने का। विदेशी पर्यटक भी दिखाई दे रहे थे, यह बाव गुजरात पर्यटन के नक्शे पर है। जिसके कारण जो भी पर्यटक आते हैं वे इस बाव को जरुर देखते हैं। अहमदाबाद के नजदीक होने के कारण यहाँ तक आने के लिए सभी तरह के साधन उपलब्ध हैं। अहमदाबाद से गांधी नगर के लिए शानदार सड़क जाती है। अगर यहाँ के लोगों का ट्रैफ़िक सेंसर सही काम करे तो यह दूरी बहुत ही कम समय में पूरी की जा सकती है। रुड़ाबाई  की बाव देखना सुखद रहा। बाजार से होते हुए हम वापस गांधीनगर की ओर चल पड़े।………आगे पढें

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

"हुं छुं अमदाबाद" હું છું અમદાબાદ​ --- ललित शर्मा

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चौधरी की चाय, चौधरी की चाय के शोर के साथ आँख खुली। आँख बंद किए किए ही चाय का आर्डर दिया। महाराज भी उठ चुके थे, उन्होने एक चाय मुझे थमाई और एक चाय खुद थामी। 5 रुपये में चाय उम्दा थी, लेकिन कप छोटा था, महाराज ने चाय वाले से दुबारा कप में चाय डलवाई तब उनकी इच्छा पुरी हुई। सूरत जा चुका था कब का, खिड़की से बाहर झांके तो मणिनगर था, मतलब अहमदाबाद करीब था। विनोद भाई का फ़ोन आया उन्होने लोकेशन ली, थोड़ी देर में ड्रायवर का भी फ़ोन आ गया। उसने कहा कि वीआईपी लेन में स्टेशन के सामने गाड़ी खड़ी है, सामने ही मिलुंगा।

मणिनगर से अहमदाबाद के बीच भी वही देखने मिला जो हर जगह रेल पटरी के किनारे देखने मिलता है सुबह-सुबह और सिर झुका कर आँखे बंद करनी पड़ती है। कोई नया दृश्य नहीं है, यह नजारा देखने के बाद मुझे अंग्रेजों को धन्यवाद देने का मन हो जाता है, वे होते तो उन्हे प्रशस्ति-पत्र भी देता। अगर उन्होने ने रेल की पटरी नही बिछाई होती तो लोग सुबह-शाम की निस्तारी के लिए कहाँ जाते? भारत में भाषाएं संस्कृति अलग-अलग है, लेकिन पटरियों के किनारे लोटा-डब्बा लेकर जाने वाले सभी एक वर्ग से ही आते हैं। बिना किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के अपना काम निपटाते हैं, शायद यही एक काम है जो भारतीयों को एक सूत्र में बांधता है। कुछ दिनों बाद शायद इनकी अखिल भारतीय स्तर पर युनियन भी बन जाए। :)

मणिनगर से अहमदाबाद के बीच ट्रेन ने काफ़ी समय ले लिया। डाऊन गाड़ी मान कर इसे पीट दिया गया और एक घंटे लेट हो गयी। एक चाय और पीकर खुमारी उतारने की कोशिश की। गाड़ी ने धीरे-धीरे चलकर स्टेशन तक पहुंचाया। प्लेट फ़ार्म की सीढियों पर चेकिंग चल रही थी, दो चार सिपहिया यात्रियों का बैग खुलवाने में लगे थे। हमें रोका नही, और हम रुके नहीं। स्टेशन से बाहर निकले तो गाड़ी लगी थी। ड्राईवर हाजिर था, लगभग 8 बज रहे थे। अहमदाबाद स्टेशन के बाहर निकलते ही, एक बहुत बड़ी होर्डिंग दिखाई दी। उसी गर्वीले अंदाज में  जैसी लखनऊ स्टेशन के बाहर दिखाई दी थी। "हुं छुं अमदाबाद" लिखी हुई होर्डिंग सीना तान कर खड़ी थी। स्टेशन पर ट्रैफ़िक बहुत अधिक था। ड्राईवर जिग्नेश ने बताया कि सुबह और शाम स्टेशन के भीतर-बाहर जाना बहुत मुश्किल होता है। हमे अहमदाबाद ने ही बताया "हूँ छूँ अमदाबाद" । परिचय के बाद हम चल पड़े अपने ठिकाने पर, जिग्नेश से अहमदाबाद के रास्तों के बारे में पूछते हुए चलते हैं। वह में बीएसएनएल की 11 माले की ईमारत में ले जाता है। इस इमारत में 4 लिफ़्ट हैं, जिसमें 3 साधारण है और एक सुपरफ़ास्ट। कब 11 वीं मंजिल पर पहुंचती है पता ही नहीं चलता।

11 वीं मंजिल पर स्थित गेस्ट हाऊस में हमारा रुम था। रुम में पहुच कर चाय बुलाई, अटेंडेंट से गरम पानी का पता किया, उसने बताया कि गीजर चालु ही रहता है। मैने पहले नामदेव जी को स्नान करने कहा और मैंने रुम की खिड़की खोली, नीचे झांकते ही छत्तीसगढ दिखाई दिया। वाह भाई तू जहाँ तक चलेगा, मेरा साया साथ होगा वाली लाईन याद आ गयी। क्यों नहीं साथ होगा? जन्म भूमि और कर्म भूमि की बात तो यही होती है, मरते-जीते खींच कर ले ही जाती है जहाँ जन्म हुआ है। एक बिल्डिंग की छत पर छत्तीसगढ पर्यटन का प्रचार करती एक होर्डिंग दिख रही थी। जिसमें छत्तीसगढ आने का आमंत्रण था। वहीं खिड़की के सामने एक कबुतर भी बैठा था। उसकी गुटर गुँ जारी थी। जिग्नेश ने बताया था कि इस जगह का नाम सुंदरपुरा है, हमें स्नान करके सबसे पहले कांकरियाँ तालाब के पास एक विवाह घर में जाना था। जहाँ कुछ देरे नामदेव जी को दर्जी समाज के सम्मेलन में हाजिरी देनी थी। जिग्नेश को भी नहाने भेज दिया और उसे 10 बजे बुलाया। गेस्ट हाउस में केयर टेकर ने पोहा दही का नाश्ता कराया। लेकिन पोहा में मीठा डाल कर मजा किरकिरा कर दिया। खैर अन्न का अपमान करना मेरी फ़ितरत में नहीं, जो मिला खाया और आगे बढे।

जिग्नेश आ चुका था, तभी मुझे याद आया कि अहमदाबाद में हमारे दिग्गज सीनियर ब्लॉगर रहते हैं। उनका नम्बर मेरे दूसरे फ़ोन में था। पाबला जी को फ़ोन लगाया उनका नम्बर लेने के लिए। थोड़ी देर में पाबला जी ने नम्बर दिया, मैने उनसे बात की। बड़े खुश हुए भाई, मुझे भी अच्छा लगा। गेस्ट हाऊस से निकल कर सबसे पहला काम था ब्लॉगर मित्र से मिलना। जिसे हमने आभासी पढा था, देखा था, समझा था लेकिन रुबरु नहीं हुए थे। जिस तरह लोग दिन की शुरुआत मंदिर के भगवान के दर्शन से करते हैं, उसी तरह हम किसी भी शहर में जाने पर दिन की शुरुवात ब्लॉगर देव के दर्शन से करते हैं। बस यह देव-देवी कृपा बनी रहे। पता पूछते-पूछते हम उनके 5 वें माले के दफ़्तर में पहुच गए। वे गायब थे, थोड़ी देर में पहुंच गए, हमने छत्तीसगढ की राम कथा की एक प्रति भेंट की। यह हम उनके लिए विशेष तौर पर लाए थे। जब घर से चले थे तो बेगानी जी से मिलना याद था। लेकिन रास्ते में भूल गए। इसलिए पाबला जी से नम्बर लेना पड़ा। संजय भाई ने फ़टाफ़ट काफ़ी बना कर पिलाई, उनके दर्शन के पश्चात फ़िर मिलने का वादा कर विदा लेकर कांकरिया तालाब के जसवंत हॉल की ओर चल पड़े। 

कांकरिया तालाब अहमदाबाद का मुख्य आकर्षण है, यहाँ शाम को काफ़ी रौनक रहती है लोग पिकनिक मनाने और तफ़री करने आते हैं। इसके सामने ही मिला जसवंत राय हॉल्। गुजराती दर्जी सम्मेलन चल रहा था, नामदेव जी भी जाति मोह में यहां तक पहुच गए थे। स्टेज पर रौनक लगी थी, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के दो साधु अतिथि के तौर पर मंच पर विराजमान थे। हम भी पिछली कुर्सियों पर बैठ गए जाकर। जिनके निमंत्रण पर नामदेव जी पहुंचे थे उन्हे ही फ़ुरसत नहीं थी परघाने की। इसलिए हमने कहा था कि घर से ही परघे परघाए चलो। क्या भरोसा उनकी बोली आपकी समझ में न आए। उस सज्जन को बुलाकर मैने नामदेव जी के बारे में बताया तो वे उन्हे मंच पर ले गए और शाल श्री फ़ल से सम्मान किया। नामदेव जी भी बिरादरी में मिल गए। सभी ने उन्हे देखा और पहचाना। अब हमने ईशारा किया कि काम खत्म हो गया आज का, अब आगे बढा जाए। जिग्नेश को पूछने पर उसने बताया कि पहले रुड़ाबाई नी बाव में चलते है फ़िर वहीं से गांधीनगर का अक्षर धाम देख लेगें। ये आईडिया सही लगा, समय का सदुपयोग हो जाएगा। हम गांधीनगर की ओर चल पड़े। विनोद भाई ने फ़ोन पर भोजन की खैर खबर ली।

अहमदाबाद से गांधीनगर के रास्ते पर बहुत सारे ढाबे हैं, जिनके साईन बोर्ड पर "काठियावाड़ी-पंजाबी खाना" लिखा है। काठियावाड़ी खाने के साथ पंजाबी खाना भी मिलता है। मैं पहले भी गुजरात का पंजाबी खाना खा चुका था। वह भी गुजराती खाने जैसा ही था। मतलब गुजराती अगर पंजाबी बोलेगा तो वह भी गुजराती में बोलेगा। हा हा हा। एक ढाबा बढिया दिखाई दिया, झमाझम सजावट बडे बड़े साईन बोर्ड और गाड़ियों की भीड़। हमने यहीं भोजन के लिए गाड़ी रोकी और तय किया कि काठियावाड़ी भोजन ही करेंगे। ढाबे नुमा होटल का नाम मारुतिनंदन होटल था। वेटर ने मीनू कार्ड सामने लाकर रख दिया। उसमें मारुतिनंदन स्पेशल बहुत कुछ दिखाई दिया, पर समझ नहीं आया। 

हमने काठियावाड़ी थाली का आर्डर दिया। मुझे छाछ की बारहों महीने जरुरत रहती है। इसलिए छाछ देख कर मन प्रसन्न हो गया। वेटर ने पूछा कि रोटली चाहिए की रोटला। मैने बाजरे की रोटी खाने के इरादे से रोटले का आडर दे दिया। जब रोटी आई और एक कौर खाया तो कुछ खटक गया। मुझे बाजरे के आटे में मिलावट लगी। खाने का मन नहीं किया, लेकिन खाना थाली में न छोड़ने के कारण दो रोटले खा ही लिए, छोटे छोटे थे। अब यही रोटले आगे की यात्रा में भारी पड़ने वाले थे, यह मुझे मालूम नहीं था।  जिग्नेश और नामदेव जी ने रोटली ली वे सुखी रहे। भोजन करके हम रुड़ा बाई नी बाव की तरफ़ बढे........... क्रमश यात्रा जारी है..........आगे पढें

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

"मेरे दिल की बात" का विमोचन के बाद चले गुजरात की ओर -- ललित शर्मा

छत्तीसगढ के यशस्वी ब्लॉगर साहित्यकार स्वराज्य करुण का नाम परिचय का मोहताज नहीं है,लगभग-35-40 वर्षों से उनकी सतत साहित्य साधना जारी है। एक दिन फ़ोन पर बताया कि उनका द्वितीय काव्य संग्रह "मेरे दिल की बात" प्रकाशित हो चुका है। उन्होने काव्य संग्रह के विमोचन के लिए तारीख तय करने कहा। हमने 15 दिसम्बर तारीख तय की। स्वराज्य जी ने कहा कि अशोक बजाज जी बंगले "चौपाल" पर ही एक छोटा सा कार्यक्रम किया जाए और कुछ ब्लॉगर मित्रों की उपस्थिति में काव्यसंग्रह का विमोचन किया जाए। ब्लॉगर के काव्य संग्रह का विमोचन एक ब्लॉगर के हाथ और ब्लॉगर्स के साथ हो। इससे बड़ी क्या बात हो सकती है। बस कार्यक्रम तय हो गया।


मुझे 16 दिसम्बर को गुजरात भ्रमण पर जाना था। हावड़ा से अहमदाबाद जाने वाली सभी गाड़ीयाँ रिशेडयुल चल रही हैं। रायपुर सुबह आने वाली गाड़ियां शाम को पहुंच रही हैं। इससे हावड़ा अहमदाबाद मार्ग पर चलने वाले यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मैने एक सप्ताह पहले पुरी अहमदाबाद से अपना जाने का आरक्षण करवाया, पर 15 तारीख तक आरक्षण कनफ़र्म नहीं हुआ। इसलिए आपातकालीन कोटे से आरक्षण करवाने के लिए मुझे रायपुर डी आर एम कार्यालय से सम्पर्क करना था अर्थात रायपुर जाना तय था। दोपहर में डी आर एम ऑफ़िस से आरक्षण का पत्र देकर राहुल भाई के पास पहुंच गए। यहाँ पहुंचने पर सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक ज्ञान में वृद्धि हो ही जाती है। बैठे-बिठाए कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाता है। 

शाम को अरुणेश दवे जी का फ़ोन आने पर उन्हे राहुल भैया के आफ़िस में ही बुला लिया गया। थोड़ी देर बाद वरिष्ठ ब्लॉगर जी के अवधिया जी भी पहुंच गए। धीरे-धीरे ब्लॉगर साथी उपस्थित होने लगे। विमोचन का समय शाम 7 बजे का तय किया गया था। तब तक अशोक भाई भी चौपाल में पहुंच चुके थे। गिरीश पंकज, जी के अवधिया, राहुल सिंह, हबीब साहब, गुरबीर चावला, अरुणेश दवे, अल्पना देशपांडे एवं पिथौरा से उपस्थित श्रृंखला साहित्य मंच के प्रवीण प्रवाह, बंटी छत्तीसगढिया, शिवा मोहंती, शंकर गोयल  की गरिमामय उपस्थिति में "मेरे दिल की बात" का विमोचन भाई अशोक बजाज के द्वारा किया गया। सभी ने करतल ध्वनि से स्वराज्य करुण जी का स्वागत करते हुए काव्य संग्रह के विमोचन पर उन्हे ढेर सारी बधाईयाँ दी। स्वल्पाहार के दौर के पश्चात गिरीश पंकज जी ने नयी कविता और छन्द बद्ध कविता पर अपने विचार प्रगट किए। उपस्थित सभी साथियों ने भी अपने विचार इस कार्यक्रम के दौरान रखे। इस दौरान राज भाटिया, अर्चना चावजी, बीएस पाबला जी ने फ़ोन पर अपनी शुभकामनाएं दी।विमोचन कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात मैने चलते-चलते टिकिट का पी एन आर देखा तो टिकिट कन्फ़र्म हो चुकी थी। मतलब अब गुजरात का भ्रमण पक्का हो चुका था।

ठंड बढ चुकी है, इसका अहसास रात 9 बजे के बाद घर आने के दौरान रास्ते में हुआ। मैने रात विनोद गुप्ता जी को फ़ोन लगा कर गुजरात के मौसम के विषय में पूछा तो उन्होने बताया कि एक स्वेटर की ठंड है उधर। साथ ही एकाध कोट लाने की हिदायत भी उन्होने दे दी। अब कल सुबह 7-25 को हम अहमदाबाद पहुंचेगे, फ़िर तय किया जाएगा कि किधर घूमना है? गुजरात जाने का कार्यक्रम अगस्त माह से बन रहा था, लेकिन कुछ न कुछ अवरोध अवश्य उपस्थित हो जाता था। यात्रा टल रही थी, इस बीच कई जगह जाना पड़ा। मित्रों अब गुजरात का सफ़र जारी हो चुका है। अहमदाबाद में कोई ब्लॉगर मित्र हैं तो अवश्य जानकारी दें, उनसे मिलने का प्रयास किया जाएगा। रात उमड़त-घुमड़त विचार ने बताया कि नागपुर में भी अच्छी ठंड हो गयी है। रजाई का इस्तेमाल किया जा रहा है पर हल्की रजाई में ठंड नहीं रुक रही।  शरद कोकास भाई को भी नागपुर की शादी के दौरान ठंड लग गयी। फ़ोनिक चर्चा के दौरान उन्होने ठंड लगने की जानकारी दी। अब लेते हैं शार्ट ब्रेक और मिलते हैं अहमदाबाद में।