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सोमवार, 26 सितंबर 2016

खारुन नदी के संग-संग सफ़र: उद्गम से पदयात्रा

कभी आप वनों में उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तो के साथ बहती किसी अल्हड़ सी नदी के साथ-साथ चले हैं? नहीं न। फ़िर आज चलते हैं प्राकृतिक सुषमा के बीचे वनों से आच्छादित भूधरा पर प्रवाहित सलिला खारुन नदी के साथ उसके उद्गम के सफ़र पर। 
कंकालिन मंदिर पेटेचुवा
खारुन नदी रायपुर शहर की जीवन रेखा है, जिसका सफ़र बालोद जिले के ग्राम पेटेचुवा से प्रारंभ होकर सोमनाथ में शिवनाथ से मिलन तक का है। नदी का उद्गम ग्राम पेटेचुवा के नायक तालाब से हुआ है। यहाँ इसे कंकालीन नाला कहा जाता है, जो आगे चलकर नदी का रुप धारण कर लेता है।
खारुन उद्गम नायक तालाब
रायपुर से धमतरी होते हुए चारामा घाट से पहले दाँए तरफ़ मरकाटोला ग्राम से पेटेचुआ तक का सफ़र 115 किमी का है। 
नदी के साथ साथ पदयात्रा का आरंभ
इस छोटे से वनग्राम में कंकालीन माता का प्रसिद्ध मंदिर है। खारुन नदी कंकालीन मंदिर  की चौहद्दी से लगकर खैरडिग्गी ग्राम तक का पांच किमी का सफ़र घने वन के बीच से तय करती है। इस पांच किमी का सफ़र विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरता है, यह ट्रैकिंग रोमांचित कर जाती है एवं अद्भूत अनुभूति से भर देती है। 
पदयात्रा के साथी, नारायण साहू, बन्नु राम
जब हम नदी के साथ साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं तब पहला स्थान भालू खांचा नाम का स्थान मिलता है। इस खांचा में बारहों महीने पानी रहता है, जिसका उपयोग भालू करते हैं। 
खारुन नदी में भालू खांचा
अगले पड़ाव में भकाड़ू डबरी मिलती है, यह छोटा सा तालाब है, जो पानी से लबालब भरा रहता है, इसके नामकरन के पीछे की कहानी रोचक है। मेरे साथी रामकुमार कोमर्रा बताए हैं कि गाँव में भकाड़ू नामक अविवाहित व्यक्ति रहता था। उसकी मृत्यु होने पर उसके रक्शा (कुंवारा प्रेत) बन जाने के डर से ग्रामवासियों ने दाह संस्कार के श्मशान में भूमि नहीं दी। तब वन में तालाब के किनारे उसके दाह संस्कार का निर्णय लिया गया, तब से इस तालाब का नाम भकाड़ू डबरी पड़ गया।
जंगल के मध्य भकाड़ू डबरी
आगे बढने पर नदी के बीच चटान काट कर कोटना जैसी आकृति बनाने के कारण एक स्थान को कुकुर कोटना कहा जाता है, यहाँ कभी शिकारी कुत्ते पानी पीते थे। यहां हमने दोपहर के भोजन में गांव से बनाकर लाई हुई टमाटर की चटनी के अंगाकर रोटी का आनंद लिया। 
दोपहर का भोजन कुकुर कोटना में
अगला पड़ाव अइरी बुड़ान है, जहां मछली भोजन की तलाश में अइरी नामक चिड़ियों का डेरा रहता है। यहां एक स्थान ऐसा भी है जहाँ कि मिट्टी खारी है और उसे चाटने के लिए नीलगाय, चीतल, कोटरी आदि जानवर आते हैं, उनके खुरों के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। 
अइरी बुड़ान
अगला पड़ाव नाहर डबरी है, गहराई होने के कारण यहाँ नदी का पानी कुछ महीनो ठहर जाता है, जिसका उपयोग वन ग्राम नाहर के लोग करते हैं। यहां जंगल के खोदकर लाए हुए बेचांदी कांदा की प्रोसेसिंग की जाती है।
नाहर डबरी में बेचांदी कंद की प्रोसेसिंग
इस यात्र का महत्वपूर्ण स्थान मासूल है, यहां नदी गहराई में उतर जाती है, ऊपर नीचे रखी बड़ी चट्टानें इमारत होने का भ्रम उत्पन्न करती हैं। यह स्थान इतना रमणीक है कि कुछ पल ठहरने का मन हो जाता है तथा भालूओं से भी भेंट हो सकती है। क्योंकि इनके रहने के लिए यह आदर्श स्थान है। 
नदी का बीहड़ मार्ग
इस स्थान का मासूल नाम धरने के पीछे की कहानी तिहारु राम सोरी बताते हैं, मासूल एक बड़ा और मोटा सर्प होता है, जो एक स्थान पर ही पड़ा रहता, उस पर दीमक चढ़ जाती है, फ़िर भी नहीं हिलता। जो उसके मुंह के सामने आ जाता है उसे खा लेता है। एक बार मछली पकड़ने वालों ने उसे लकड़ी का लट्ठा समझ कर उठा लिया और पानी रोकने के लिए आड़ के रुप में लगा दिया। पानी में मछली देख कर जब उसने हरकत की तब पता चला कि यह मासूल सर्प है, तब से इस स्थान का नाम मासूल प्रचलित हो गया।
मनोरम स्थल मासुल
मासूल के आगे दोरदे नामक स्थान है, यहां से मछलियां नदी में ऊपर नहीं चढती। जंगल यहीं पर समाप्त हो जाता है और आगे खैरडिग्गी नामक गांव का खार लग जाता है। नदी का यह सफ़र आनंददायक है। 
जोहर ले, सफ़र के साथी तिहारु राम सोरी
जब भी यहां कि ट्रेकिंग करें तब ट्रेकिंग शुरु करने से पहले अपना वाहन खैरडिग्गी ग्राम में बुलवा लें, अन्यथा इसी रास्ते पर पुन: लौटना होगा। विशेष ध्यान रखे कि गांव के किसी जानकार व्यक्ति के साथ पर्याप्त भोजन पानी लेकर ट्रेकिंग करें।       

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

प्रकृति का अजूबा जलजली (दलदली) मैनपाट

राजधानी रायपुर से 352 किलोमीटर अम्बिकापुर एवं अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर छत्तीसगढ़ का शिमला एवं निर्वासित तिब्बतियों की शरण स्थली मैनपाट स्थित है। 

मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है। 

इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।

मैनपाट
मैनपाट जलजली

जलजली की इस विशेषता से बाहरी दुनिया के लोग अधिक परिचित नहीं है। फ़िर भी कुछ सैलानी प्रतिदिन कुदरत के इस अजूबे को देखने के लिए पहुंचते हैं। 

जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है। 

यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। 

इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
मैनपाट
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
मेरा मानना है कि यह स्थान देश में धरती बनने की प्रक्रिया का प्रथम उदाहरण है। जब धरती पर जल ही जल था और उसके बाद धीरे-धीरे जल में वनस्पति का जमाव होने लगा और जल दलदल में परिवर्तित होकर ठोस होते गया. 

करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया के पश्चात जल ठोस भूमि में परिवर्तित हो गया। यहाँ पर जल से भूमि बनने की यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। सैकड़ों वर्षों के पश्चात यह भूमि भी ठोस हो जाएगी। 
मैनपाट जलजली
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
दलदली की इस भूमि के नीचे नदी बहती है। वनस्पति ने इस भूमि को इतना अधिक जकड़ रखा है कि इसका क्षरण भी नहीं होता और कूदने पर हमेशा यह इसी तरह की प्रतिक्रिया करती है। 

नदी के जल के ऊपर मिट्टी और वनस्पति की लगभग 4-5 मीटर मोटी परत है, इस पर मैने पत्थर से भरी ट्राली लेकर ट्रेक्टर को भी जाते हुए देखा है, यह जमीन इतने वजन के बाद भी फ़टती नहीं है और न ट्रेक्टर के पहिए इसमें धंसते हैं। प्रकृति का यह अजूबा मैने मैनपाट में देखा और कहीं नहीं।

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

श्रीपुर की महारानी वासटा की शिलालेखीय आज्ञा


छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध 7वीं शताब्दी ईस्वीं में ईष्टिका निर्मित मंदिर (लक्ष्मण मंदिर) का निर्माण महारानी (राजमाता) वासटा ने करवाया था। मंदिर निर्माण एवं उसकी व्यवस्था को लेकर एक शिलालेख खंडित मंदिर का मलबा साफ़ करते हुए प्राप्त हुआ था। 

महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मा की पुत्री थी। इस शिलालेख में लिखा है कि अपने वैष्णव पति की स्मृति में राजमाता वासटा ने हरि (विष्णु) मंदिर का निर्माण कराया। 

इस शिलालेख की प्रशस्ति रचना करने वाले का नाम कवि ईशान उल्लेखित है जिसका उपनाम चिंतातुरांक था। इस लेख में 26 पंक्तियाँ और छंदबद्ध 42 श्लोक रचे गए हैं।
प्राचीन राजधानी सिरपुर
सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, जिसका निर्माण महारानी वासटा ने कराया था

मैं विशेष रुप से मंदिर की संचालन व्यवस्था की जानकारी हेतु इसका उल्लेख कर रहा हूँ। प्रशस्ति के उत्तरार्ध में मंदिर के प्रतिपालन एवं प्रबंधन के लिए की गई व्यवस्था का उल्लेख है। 

बताया गया है कि तोडंकण, मधुवेढ, नालीपद्र, कुरुपद्र और वाणपद्र नामक पाँच गांव मंदिर में दिए गए थे। उन गाँव से होने वाली आय को चार भागों में विभाजित किया गया था। 

इसमें से एक-एक भाग मंदिर में आयोजित सत्र (सामूहिक भोजन), मंदिर चालू मरम्मत, और पुजारी के परिवार के पोषण हेतु क्रमश: दिया गया था। 

आय का चौथा हिस्सा बचाकर उसके बराबर पन्द्रह भाग किए गए और 1- त्रिविक्रम, 2-अर्क, 3-विष्णुदेव, 4-महिरदेव, इन चारों ॠग्वेदी ब्राह्मणों, 5- कर्दपोपाध्याय, 6- भास्कर, 7-मधुसूदन तथा 8- वेदगर्भ, इन चार यजुर्वेदी ब्राह्मणों, 9- भास्कर देव, 10- स्थिरोपाध्याय, 11-त्रैलोक्यहंस तथा 12- मोउट्ठ, इन चार सामवेदी ब्राह्मणों तथा 13 - स्वस्तिकवाचक वासवनन्दी, 14 - वामन एवं 15 - श्रीधर नामक भागवत ब्राह्मणों को एक-एक भाग दान दिया गया था। 

यह आय उनके पुत्र-पौत्रों को भी प्राप्त होते रहने की व्यवस्था की गई थी। यदि वे लोग भी छ: अंग युक्त और अग्निहोत्री रहें तथा जुआ, वेश्यागमन आदि के व्यसनी न हों और न ही किसी की चाकरी करें।



यदि कोई इसके विपरीत आचरण करे अथवा कोई निपूता मर जाय तो उसके स्थान पर विद्या और वय से वृद्ध संबंधी को सम्मिलित कर लेने की व्यवस्था कर दी गई थी। किन्तु यह चुनाव उपर्युक्त ब्राह्मणों की सहमति से ही हो सकता था, राजाज्ञा से नहीं। 

ब्राह्मण अपने भाग को न तो किसी को दान में दे सकते थे, न बेच सकते थे और न ही गहन धर सकते थे। इन सबके भोजन की भी व्यवस्था की गई थी और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशस्ति के लेखक आर्य गोण्ण के भोजन की व्यवस्था भी की गई थी।

एक अन्य ग्राम वर्गुल्लक भगवान के लिए बलि, चरु, नैवेद्य तथा सत्र के लिए अलग से दिया गया था। इसका प्रबंध पुजारी, मुख्य मुख्य ब्राह्मणों की सलाह से करता था। 

भावी राजाओं से प्रार्थना की गई है कि वे इस स्थिति का पालन करेगें। इसके साथ ही मंदिर का निर्माण करने वाले कारीगर केदार के नाम का उल्लेख है। 

परन्तु कारीगर के जीविकोपार्जन के लिए क्या व्यवस्था की गई है, इसका उल्लेख नहीं मिलता। ईष्टिका निर्मित यह भव्य मंदिर आज भी शान से अटल है और दर्शनीय है।

शनिवार, 3 सितंबर 2016

शिल्पांकन में आलिंगन भेद - वृक्षाधिरूढकम

तीवरदेव विहार सिरपुर छत्तीसगढ़ की द्वार शाखा का शिल्पांकन नयनाभिराम है, इस पर इतने सारे रचना शिल्प अंकित किए गए हैं कि द्वार शाखा के शिल्प का बखान करते हुए ही एक किताब लिखी जा सकती है। जिसमें जातक कथाओं से लेकर पशुमैथुन तक को विषय बनाया गया है। 

शिल्पकार शास्त्र विधान के अनुसार प्रतिमाओं का निर्माण करते थे। शिल्प को देखने के बाद यदि उसे शास्त्रों में ढूंढा जाए तो उसका मूल मिल जाएगा। 

जैसे पहले पटकथा लिखी जाती है और उसके बाद उसका फ़िल्मांकन किया जाता है ठीक वैसे ही शास्त्रों से विषय लिए जाते थे फ़िर उनका शिल्पांकन किया जाता है। 

आलिंगन भेद - वृक्षाधिरूढकम
उपरोक्त मिथुन चित्र में आलिंगनबद्ध चुम्बनरत नर-नारी दिखाई दे रहे हैं। यह आलिंगन भेद का एक प्रकार है। वात्स्यायन ने कुंवारे और विवाहित लोगों के आलिंगन भेद बताए हैं। 

कहते हैं कि (तत्रासमागतयोः प्रीति लिंग द्योतनार्थमालिंगन चतुष्टयम्।स्पृष्टकम्, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम्, इति।।) प्रेम को प्रकट करने के लिए स्पृष्टकम, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम आदि चार तरह का आलिंगन होता है। 

प्रदर्शित प्रतिमा शिल्प में आचार्य वाभ्रवीय द्वारा बताए गए आलिंगन के एक प्रकार "वृक्षाधिरुढ़कम" का प्रयोग किया गया है। 

इस आलिंगन के प्रकार को विस्तार देते हुए कहते हैं - चरणेन चरणामाक्रम्य द्वितीयेनोरुदेशामाक्रमन्ती वेष्टयन्ती वातत्पृष्ठ सक्तैक बाहुद्विती येनां समवनमयन्ती ईषन्मन्द सीत्कृत कूजिता चुम्बनार्थ मेवाधिरोढुमिच्छेदिति वृक्षाधिरूढकम्।। 

वृक्षाधिरूढकम - जिस तरह से पेड़ पर चढ़ते हैं उसी तरह वृक्षाधिरूढकम आलिंगन में स्त्री अपने एक पैर से पुरुष के पैर को दबाती हैं और अपने दूसरे पैर से पुरुष के दूसरे पैर को पूरी तरह से लपेट लेती हैं। 

इसके साथ ही अपने एक हाथ को पुरुष की पीठ पर रखकर दूसरे हाथ से उसके कंधे तथा गर्दन को नीचे की तरफ झुकाती हैं और फिर धीरे-धीरे से पुरुष को चूमने लगती हैं और उस पर चढ़ने की कोशिश करती हैं। 

इस आलिंगन को वृक्षाधिरूढकम आलिंगन कहा जाता है। इस तरह मंदिरों विहारों की भित्तियों पर अनेक शिल्पांकन प्राप्त होते हैं। काम कला की शिक्षा देने के उद्देश्य से इनका शिल्पांकन प्रमुख स्थान पर किया जाता था

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

आरंग का भांड देऊल जैन मंदिर

छत्तीसगढ अंचल में जैन धर्मावलंबियों का निवास प्राचीन काल से ही रहा है। अनेक स्थानों पर जैन मंदिर एवं उत्खनन में तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं। 

सरगुजा के रामगढ़ की गुफ़ा जोगीमाड़ा के भित्ति चित्रों से लेकर बस्तर तक जैन उपस्थिति दर्ज होती है। चित्र में दिखाया गया मंदिर रायपुर सम्बलपुर मार्ग पर 37 वें किमी पर रायपुर जिला स्थित आरंग तहसील का 11 वीं सदी निर्मित "भांड देऊल" मंदिर का है। 
भांड देऊल मंदिर आरंग
भांड देवल मंदिर आरंग
ऊंची जगती पर बना पश्चिमाभिमुखी भाण्ड देवल" इस श्रृंखला में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ताराकृत शैली में बने इस जैन मंदिर के गर्भगृह में 6 फ़ुट ऊंची पीठिका पर श्रेयांशनाथ, शांतिनाथ एवं अनंतनाथ तीर्थकंरों की ओपदार पालिश युक्त काले पत्थर से निर्मित तीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर अनेक प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनमें मिथुन मुर्तियों को प्रमुखता से स्थान दिया गया है।
तीर्थंकर जैन
जैन तीर्थंकर श्रेयांशनाथ, शांतिनाथ एवं अनंतनाथ
आरंग जैन धर्म का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। भांड देउल के अतिरिक्त सभी मंदिरों शैव, वैष्णव धर्म के देवों के साथ-साथ जैन तीर्थकंरों की प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं। चण्डी मंदिर में 6 जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी हैं। हनुमान मंदिर की बाह्य भित्तियों पर सोमवंश कालीन ब्राह्मण प्रतिमाओं के साथ कायोत्सर्ग मुद्रा में एक जैन तीर्थंकर भी हैं। 

आरंग में पारदर्शी स्फ़टिक प्रस्तर की तीन पद्मासन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं चांदी के सिंहासन पर स्थापित प्राप्त हुई हैं जो रायपुर के दिगम्बर जैन मंदिर में स्थापित हैं। उन्हें देखने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है। इन प्रतिमाओं का निर्माण कुशल शिल्पी के द्वारा हुआ प्रतीत होता है।
भांड देऊल मंदिर आरंग की मिथुन मूर्तियां
मिथुनांकन
आरंग प्राचीन काल से महत्वपूर्ण नगर रहा है और वर्तमान में भी ऐतिहासिक एवं पुरातत्वीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है। क्योंकि यहां से कई उत्कीर्ण लेख प्राप्त हुए हैं जिनमें चौथी शताब्दी का ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण राजर्षितुल्य कुल के भीमसेन द्वितीय का गुप्त संवत 182 (501ई) ताम्रपत्र है तथा शरभपुरिया वंश के जयराज द्वारा अपने शासन काल में जारी ताम्रपत्र इसकी प्राचीनता की पुष्टि करता है। 

किंवदन्तियों में इसे मोरध्वज की नगरी भी कहा जाता है। लोकगीतों में गाये जाने वाली प्रेम कहानी "लोरिक चंदा" का गृह भी आरंग को माना जाता है। जबकि यह प्रेम कहानी प्रदेश की सीमाओं से बाहर अन्य प्रदेशों में गाई जाती है। इस तरह प्राचीन काल में आरंग एक महत्वपूर्ण नगर एवं राजर्षितुल्य कुल की राजधानी रहा है

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

उदयगिरि की प्राचीन गुफ़ाएँ

विश्व हिन्दी सम्मेलन के बाद 13 सितम्बर 2015 को सांची होते हुए उदयगिरि जाना हुआ। उदयगिरि विदिशा से वैसनगर होते हुए भी पहुँचा जा सकता है। नदी से यह गिरि लगभग 1 मील की दूरी पर है। पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर गुफाएँ बनाई गई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर- मूर्तियों के प्रमाण मिलते हैं, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। 
उदयगिरि में ललित शर्मा
गुफ़ा नम्बर 5 वराह अवतार
उत्खनन से प्राप्त ध्वंसावशेष अपनी अलग कहानी कहते हैं।उदयगिरि को पहले नीचैगिरि के नाम से जाना जाता था। कालिदास ने भी इसे इसी नाम से संबोधित किया है। १० वीं शताब्दी में जब विदिशा धार के परमारों के हाथ में आ गया, तो राजा भोज के पौत्र उदयादित्य ने अपने नाम से इस स्थान का नाम उदयगिरि रख दिया।
उदयगिरि
गुफ़ा नम्बर 4
गुफा संख्या - 5 वाराह गुफा के नाम से जाना जाता है तथा उदयगिरि की समस्त गुफाओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसे पांचवी छठी शताब्दी की माना जाता है। वास्तव में यह पहाड़ी को काटकर एक दालान के रुप में बनाई गई है, जो २२ फीट लंबी तथा १२ फीट ८ इंच ऊँची एवं ३ फीट ४ इंच पत्थर में भीतर की ओर गहरी है।
उदयगिरि वराह अवतार
वराह अवतार

यहाँ पत्थर को काटकर बनाई गई वाराह अवतार की मूर्ति पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक मानी जाती है। मूर्ति का मुख भाग वाराह के रुप में है तथा शेष हिस्सा मानवाकृति का है। बलिष्ठ भुजाएँ, मांसल जंघाओं तथा सुडौल बनावट ने मूर्ति को बल, शौर्य तथा सुंदरता का प्रतीक बना दिया है। मूर्ति पीतांबर पहने हुए है तथा साथ- साथ कंठहार, वैजयंतीमाला तथा कंगन भी उत्कीर्ण किये गये हैं।
उदयगिरि जैन मंदिर
उदयगिरि 
बांये पैर को मुकुट पहने किसी विशेष व्यक्ति के हृदय पर रखा हुआ दिखलाया गया है, जिसके मस्तक के ऊपर विशाल १३ फणों वाला नाग स्थित है। वह वाराह की स्तुति करने की मुद्रा में है। इस विशेष व्यक्ति की पहचान के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्धान इसे राजा बताते हैं, तो कुछ देवता या विष्णु की मूर्ति। मुझे यह शेषनाग की प्रतिमा लगी क्योंकि कुंडली मारे शेषनाग पर वराह ने अपने चरण स्थिर कर रखे हैं। 
उदयगिरि शेष शैया पर विष्णु
शेष शैया पर विष्णु
पुराणों के अनुसार वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस से पृथ्वी का उद्धार किया था। अतः कुछ विद्वान इसे हिरण्याक्ष की मूर्ति मानते हैं। परंतु मूर्ति का मुख असुर सदृश नहीं दिखलाया गया है। मूर्ति के ऊपर नाग फणों का घेरा होने के कारण लोग इसे पाताल का स्वामी भी मानते हैं या फिर समुद्रराज। वाराह के बायीं ओर स्तुति करती हुई दिखाई गई रानी, संभवतः नीची की मूर्ति की राजमहिषी हो सकती हे।
उदयगिरि राजनिवास
राज निवास के भग्नावशेष
वाराह के कंधे पर नारी रुपी पृथ्वी को दिखलाया गया है। पृथ्वी के दोनों पैर नीचे लटके हुए दिखाए गये हैं। अंग- प्रत्यंग में करुणा भाव दिखलाया गया है। चोली में स्थित पुष्ट पयोधर पृथ्वी की पोषणात्मक शक्ति के प्रतीक हैं। नीचे स्थित लेटे अवस्था में दिख रही मूर्ति के पीछे स्थित कलश लिए देवता वरुण का प्रतीक प्रतीत होता है। साथ में दिखाई दे रही दो जल- धाराएँ गंगा तथा यमुना की प्रतीक हैं, जो स्वर्ग से नीचे की तरफ अवतरण करती हुई दिखाई गई हैं। 
उदयगिरि का प्रस्तर स्तंभ
भग्न प्रस्तर स्तंभ
गंगा तथा यमुना को अपने- अपने वाहन मकर तथा कच्छप पर दिखलाया गया है। ऊपर अप्सराएँ दिखाई गई हैं तथा बाई ओर पाँच पंक्तियों में यक्ष, किन्नर, गंर्धव व मरुत गणों को स्तुति- गान करते हुए दर्शाया गया है। ऊपरी पंक्ति में दिख रहे गंधर्व के हाथों में स्थित वायलिन जैसा वाद्य यंत्र इस बात के साक्ष्य हैं कि ऐसे यंत्र की उत्पति भारत में ही हुई होगी। दांयी ओर यक्ष व महर्षिगण चार पंक्तियों में दर्शाये गये हैं। ब्रह्मा तथा नंदी वाहन समेत शिव को सबसे ऊपरी पंक्ति में दर्शाया गया है।
उदयगिरि शिकारगाह
ग्वालियर स्टेट द्वारा निर्मित शिकारगाह
उदयगिरि की पहाड़ी पर शंख लिपि के बहुत सारे लेख हैं। इसके साथ ही एक गुफ़ा में प्रस्तर निर्मित किरिट धारित शेष शैया पर विष्णु को शयन करते हुए दिखाया गया है। आगे चलने पर पहाड़ी पर एक विशाल भवन के भग्नावशेष हैं, जिसके समक्ष विशाल प्रस्तर स्तंभ भग्न पड़ा है। इससे आगे बढने पर ग्वालियर स्टेट द्वारा निर्मित शिकार गाह भी है, जो अभी सलामत है।

बुधवार, 31 अगस्त 2016

अजंता की गुफ़ाओं की सैर

अजंता (अजिंठा लेणी) की दूरी एलोरा से लगभग 101 किलोमीटर है, हम एलोरा से घाट चढ़ कर अजंता पहुंचे। जो एलोरा देखने जाता है वह अजंता भी पहुचता है। मेरी यह यात्रा 1994 के दौरान की है, और चित्र भी उसी समय के रोल कैमरे से खींचे गए हैं।

यहाँ चट्टानों को काटकर बनाए गए बौद्ध गुफ़ा मंदिर व मठ, अजंता गाँव के समीप, उत्तर-मध्य महाराष्ट्र, पश्चिमी भारत में स्थित है, जो अपनी भित्ति चित्रकारी के लिए विख्यात है।

औरंगाबाद से 107 किलोमीटर पूर्वोत्तर में वगुर्ना नदी घाटी के 20 मीटर गहरे बाएँ छोर पर एक चट्टान के आग्नेय पत्थरों की परतों को खोखला करके ये मंदिर बनाए गए हैं।

गुफ़ाओं के इस समूह की खुदाई पहली शताब्दी ई. पू. और सातवीं शताब्दी के बीच दो रूपों में की गई थी- चैत्य (मंदिर) और विहार (मठ)। यद्यपि इन मंदिरों की मूर्तिकला, ख़ासकर चैत्य स्तंभों का अलंकरण अद्भुत तो है, लेकिन अंजता की गुफ़ाओं का मुख्य आकर्षण भित्ति चित्रकारी है। 

इन चित्रों में बौद्ध धार्मिक आख्यानों और देवताओं का जितनी प्रचुरता और जीवंतता के साथ चित्रण किया गया है, वह भारतीय कला के क्षेत्र में अद्वितीय है।
अजंता की गुफ़ांए
घोड़े के नाल की आकार की अजंता लेणी
अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म द्वारा प्रेरित और उनकी करुणामय भावनाओं से भरी हुई शिल्‍पकला और चित्रकला से ओतप्रोत हैं, जो मानवीय इतिहास में कला के उत्‍कृष्‍ट ज्ञान और अनमोल समय को दर्शाती हैं।

बौद्ध तथा जैन सम्‍प्रदाय द्वारा बनाई गई ये गुफाएं सजावटी रूप से तराशी गई हैं। फिर भी इनमें एक शांति और अध्‍यात्‍म झलकता है तथा ये दैवीय ऊर्जा और शक्ति से भरपूर हैं।

दूसरी शताब्‍दी डी. सी. में आरंभ करते हुए और छठवीं शताब्‍दी ए. डी. में जारी रखते हुए महाराष्ट्र में औरंगाबाद शहर से लगभग 107 किलो मीटर की दूरी पर अजंता की ये गुफाएं पहाड़ को काट कर विशाल घोड़े की नाल के आकार में बनाई गई हैं।

अजंता में 29 गुफाओं का एक झुंड बौद्ध वास्‍तुकला, गुफा चित्रकला और शिल्‍प चित्रकला के उत्‍कृष्‍तम उदाहरणों में से एक है।

इन गुफाओं में चैत्‍य कक्ष या मठ है, जो भगवान बुद्ध और विहार को समर्पित हैं, जिनका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा ध्‍यान लगाने और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था।

गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं।

इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं, ये एक संत थे जिन्‍हें बुद्ध बनने की नियति प्राप्‍त थी।

ये शिल्‍पकलाओं और तस्‍वीरों को प्रभावशाली रूप में प्रस्‍तुत करती हैं जबकि ये समय के असर से मुक्‍त है। ये सुंदर छवियां और तस्‍वीरें बुद्ध को शांत और पवित्र मुद्रा में दर्शाती हैं।
अजंता की गुफ़ांओं में ललित शर्मा
लेखक के पार्श्व में अजंता लेणी
सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित इन गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ हैं। इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन् 1819 में की गई थी। 

वे यहाँ शिकार करने आए थे, तभी उन्हें कतारबद्ध 29 गुफाओं की एक शृंखला नज़र आई और इस तरह ये गुफाएँ प्रसिद्ध हो गई।

घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएँ अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है। इनमें 200 ईसा पूर्व से 650 ईसा पश्चात तक के बौद्ध धर्म का चित्रण किया गया है। 

अजंता की गुफाओं में दीवारों पर ख़ूबसूरत अप्सराओं व राजकुमारियों के विभिन्न मुद्राओं वाले सुंदर चित्र भी उकेरे गए है, जो यहाँ की उत्कृष्ट चित्रकारी व मूर्तिकला के बेहद ही सुंदर नमूने है।

अजंता की गुफाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक भाग में बौद्ध धर्म के हीनयान और दूसरे भाग में महायान संप्रदाय की झलक देखने को मिलती है। हीनयान वाले भाग में 2 चैत्य और 4 विहार है तथा महायान वाले भाग में 3 चैत्य और 11 विहार है।

ये 19वीं शताब्दी की गुफाएँ है, जिसमें बौद्ध भिक्षुओं की मूर्तियाँ व चित्र है। हथौड़े और छैनी की सहायता से तराशी गई ये मूर्तियाँ अपने आप में अप्रतिम सुंदरता को समेटे है।
अजंता की गुफ़ांए
अजंता की गुफ़ांए

अजन्ता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही, गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16, 17 शेष है। इन 6 गुफाओं में गुफा संख्या 16 एवं 17 ही गुप्तकालीन हैं। अजन्ता के चित्र तकनीकि दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखते हैं।

इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फूल-पत्तियों, वृक्षों एवं पशु आकृति से सजावट का काम तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के चित्रण का काम, जातक ग्रंथों से ली गई कहानियों का वर्णनात्मक दृश्य के रूप में प्रयोग हुआ है।

ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते हैं। इन चित्रों में कहीं-कही गैर भारतीय मूल के मानव चरित्र भी दर्शाये गये हैं। अजन्ता की चित्रकला की एक विशेषता यह है कि इन चित्रों में दृश्यों को अलग अलग विन्यास में नहीं विभाजित किया गया है।

अजन्ता में 'फ़्रेस्को' तथा 'टेम्पेरा' दोनों ही विधियों से चित्र बनाये गए हैं। चित्र बनाने से पूर्व दीवार को भली भांति रगड़कर साफ़ किया जाता था तथा फिर उसके ऊपर लेप चढ़ाया जाता था।

अजन्ता की गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण ‘मरणासन्न राजकुमारी‘ का चित्र प्रशंसनीय है। इस चित्र की प्रशंसा करते हुए ग्रिफिथ, वर्गेस एवं फर्गुसन ने कहा,- ‘करुणा, भाव एवं अपनी कथा को स्पष्ट ढंग से कहने की दृष्टि‘ यह चित्रकला के इतिहास में अनतिक्रमणीय है। 
अजंता की गुफ़ांए
अजंता की गुफ़ाओं का अनुपम दृश्य
वाकाटक वंश के वसुगुप्त शाखा के शासक हरिषेण (475-500ई.) के मंत्री वराहमंत्री ने गुफा संख्या 16 को बौद्ध संघ को दान में दिया था। 

गुफा संख्या 17 के चित्र को ‘चित्रशाला‘ कहा गया है। इसका निर्माण हरिषेण नामक एक सामन्त ने कराया था। 

इस चित्रशाला में बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबधित चित्र उकेरे गए हैं। 

गुफा संख्या 17 में उत्कीर्ण सभी चित्रों में माता और शिशु नाम का चित्र सर्वोत्कृष्ट है। अजन्ता की गुफाऐं बौद्ध धर्म की ‘महायान शाखा से संबधित थी।

अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के चित्रों की चमक हज़ार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों में अभिव्यक्त किया गया है।

चावल के मांड, गोंद और अन्य कुछ पत्तियों तथा वस्तुओं का सम्मिश्रमण कर आविष्कृत किए गए रंगों से ये चित्र बनाए गए।

लगभग हज़ार साल तक भूमि में दबे रहे और 1819 में पुन: उत्खनन कर इन्हें प्रकाश में लाया गया। हज़ार वर्ष बीतने पर भी इनका रंग हल्का नहीं हुआ, ख़राब नहीं हुआ, चमक यथावत बनी रही।

कहीं कुछ सुधारने या आधुनिक रंग लगाने का प्रयत्न हुआ तो वह असफल ही हुआ। रंगों और रेखाओं की यह तकनीक आज भी गौरवशाली अतीत का याद दिलाती है।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सरगुजा की कैलाश गुफ़ा


छत्तीसगढ़ प्रदेश का प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय होने के साथ यहाँ का इतिहास भी उतना ही समृद्ध है। प्रदेश के सरगुजा अंचल हरित वनों, पर्वतों, नदियों का सौंदर्य रमणीय है। प्रत्येक स्थान पौराणिक इतिहास से भरा पुरा है और यहाँ सुरम्यता रमणीय है। रायपुर से हम इस अंचल के कैलाश गुफ़ा क्षेत्र के पर्यटन के लिए चल पड़े। रायपुर से अम्बिकापुर 358 किलोमीटर की दूरी पर है। इस नगर की पूर्व दिशा में सामरबार नामक स्थान पर 80 किलोमीटर की दूरी पर कैलाश गुफ़ा स्थित है। हम अम्बिकापुर से बतौली होते हुए पठार पर पहुंचे, यहाँ से जंगल के रास्ते पर चलते हुए गायबुड़ा नामक ग्राम से बांए सड़क पर चलकर कैलाश गुफ़ा तक पहुंचे। गायबुड़ा से सड़क सीधी पंडरापाट होते हुए बगीचा एवं जशपुर चली जाती है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थान महत्वपूर्ण है। 

यहाँ आदिवासी समाज के संत रामेश्वर गहिरा गुरु जी ने प्राकृतिक गुफ़ा की चट्टानों को तराश कर वर्तमान रुप दिया है। कैलाश गुफ़ा के नीचे झरना बहता है, जहाँ स्थानीय लोग धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न करते हैं। इस स्थान पर आने के पश्चात मन को शांति मिलती है और मनुष्य के प्रकृति से जुड़ जाता है। 

इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य एवं महत्ता को देखते हुए गहिरा गुरु जी ने अपनी उपासना के लिए चयन किया। सघन वन के बीच आश्रम, गुफ़ाएं, कल-कल करता झरना एवं पक्षियों का मधुर स्वर में आगंतुकों का स्वागत मन को मोह लेता है। ऐसा लगता है कि शहरी भाग दौड़ के से थोड़ा अलग रह कर दो चार दिन इस प्राकृतिक स्थल पर व्यतीत किए जाएं।


प्रकृति से एकाकार होने के लिए यह बहुत ही आदर्श स्थान है। यहाँ श्रद्धालुओं, दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों का बारहों मास आना लगा रहता है। यह खुबसूरत स्थान अपने साथ अनेक पौराणिक कथाओं को भी समेटे हुए है। वर्षा काल में इस स्थान की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। झरना अपने पूरे यौवन पर होता है, वनांचल में छोटे-मोटे वन्य प्राणी भी दिखाई देते हैं। हमें इस सुंदर स्थान का भ्रमण कर अपूर्व आनंद की अनुभूति हुई। सांझ तक यहाँ रहने के पश्चात हम पंड्रापाट से बगीचा होते हुए मैनपाट के अपने अस्थाई डेरे सैला रिजोर्ट में लौट आए।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

जतमई में नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद

छत्तीसगढ़ में गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक अंतर्गत जतमई नामक प्राकृतिक झरना है। हरितिमा से आच्छादित पहाड़ी से यह झरता हुआ यह झरना बरसात के दिनों में सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र होता है। रायपुर से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण शहर एवं आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के सैलानी सप्ताहांत में यहाँ पहुंच जाते हैं और जतमई माता के दर्शन के साथ झरने में जलकिलोल करने का लुफ़्त उठाते हैं। 

रविवार के दिन तो यहाँ पर रेलमपेल मची रहती है। वनक्षेत्र के रमणीय वातावरण का आनंद इस स्थान पर लिया जा सकता है। वनांचल में प्राकृतिक झरना होने के कारण कुछ वर्षों से पर्यटकों की बड़ी संख्या इस स्थान पर मनोरंजन के लिए पहुंचती है, इसके साथ ही वनदेवी जतमई के दर्शन करने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। वैसे तो जतमई का बरसाती झरना जुलाई से दिसम्बर तक ही रहता है। नववर्ष के दिन पिकनिक मनाने वालों का भीड़ अत्यधिक रहती है।


ग्राम पटेवा के निकट यह स्थान होने के कारण स्थानीय लोग एक समिति बनाकर इस स्थान का विकास कर रहे हैं। यह झरना 70 फ़ुट की ऊंचाई से गिरता है। यहां विशालकाय चट्टाने एक के ऊपर एक इस तरह से रखी हैं कि लगता है किसी कुशल कारीगर ने इन्हें स्थापित कर दिया हो। जतमई मंदिर के निकट सिद्ध बाबा का प्राचीन स्थान है, यहां पर एक चिमटा रखा हुआ है। कहते हैं कि इस स्थान पर 400 बरस पहले कोई सिद्ध बाबा रहते थे। उनके कारण इस स्थान की मान्यता अधिक हो गई। 


यहीं पर एक शेर माड़ा भी है, जिसे लोग शेरगुफ़ा कहते हैं। पहले इस स्थान पर जंगली जानवर भी बड़ी संख्या में रहते थे। भालुओं की आमदरफ़्त तो अभी भी रहती है। शहर के समीप रविवारिय मनोरंजन के लिए यह एक आदर्श प्राकृतिक स्थल है। इस स्थान का सौंदर्य देखने लायक है। एक बात गौर करने लायक यह भी है कि अत्यधिक पर्यटकों के पहुंचने के कारण इस स्थान पर प्लाटिक की पन्नियों, खाने की सामग्री के रैपरों एवं पर्यटकों द्वारा फ़ैलाई गई गंदगी के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। प्लास्टिक के सामानों पर यहां प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

छत्तीसगढ़ का मॉरिशस बुका

राजधानी रायपुर से कटघोरा होते हुए 230 किलोमीटर की दूरी पर मड़ई गांव से 5 किलोमीटर की दूरी पर हसदेव बांगो बांध के डुबान क्षेत्र में विकसित पर्यटन केन्द्र बुका में नौका विहार का मजा ले सकते हैं। वन विभाग ने यहां पर्यटकों के लिए काटेज का निर्माण कराया है। जहां शुल्क जमा कर रूक सकते हैं। 

छत्तीसगढ़ में भले ही समुद्र नहीं है लेकिन ‘सी बीच’ की सैर करने और बोटिंग की तमन्ना रखने वालों को मायूस होने की जरूरत नहीं। शहरों की आपाधापी से दूर प्राकृतिक सौंदर्य से भरी यह ऐसी जगह है, जहाँ गर्मी में भी दिलोदिमाग को सुकून मिलता है। यहां मीलों तक 400-450 फीट की गहराई में पानी ही पानी है। हरे-भरे जंगल और पहाड़ों के बीच झीलनुमा इस जगह पर नीला जल दिल-ओ-दिमाग पर छा जाता है। 


झील के बीच में प्राकृतिक रूप से उभरे टापू और उस पर खड़े दरख्तों की हरियाली की वजह से इसे छत्तीसगढ़ का मॉरिशस कहा जाने लगा है। कटघोरा के पास स्थित जल विहार ‘बुका’ खूबसूरती अनूठी है। पहाड़ियों से घिरे बुका के गहरे पानी के बीच स्थित टिहरीसराई के मध्य निकली एक चट्टान में प्राकृतिक रुप से बने गणेश का स्वरूप दिखाई देता है।


सूर्योदय के समय ग्लास हाउस से आसमान में उगते सूरज का अप्रतिम होता है। मौसम के अनुसार दिन चढ़ने से शाम ढलने तक अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। गर्मियों में बुका में सुबह-शाम स्वीमिंग और बोटिंग का लुत्फ उठाने लोग दूर-दूर से आते हैं। बोट से 16 किमी के सफर में कई छोटे-छोटे टापू हैं तो साल, सागौन, साजा, सेन्हा आदि के पेड़ों की श्रृंखला मन को सुकून देती है। 

थकान मिटाने के लिए टेंट, रेस्ट हाउस और ग्लास हाउस हैं, जहां सौर ऊर्जा की रोशनी तो तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं। बुका प्रदेश का संभवत: पहला पर्यटक स्थल है, जहां कई टूरिस्ट प्लेस का सफर बोट से किया जाता है। बुका से बांगो डैम का फासला 25 किमी का है। बुका से बोट के जरिए दो घंटे में वहां पहुंचा जा सकता है। इसी तरह डेढ़ घंटे में सतरेंगा, घंटेभर में गोल्डन आईलैंड तथा केंदई जल प्रपात, मंजूरखोर आदि टूरिस्ट प्लेस तक जा सकते हैं।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

रानी माई की रहस्यमय दुनिया: बस्तर अंचल

गोड़ मा पैरी, माथा म लाली वो SS, कान मा झुमका तिकोनी वाली होSS मोर गांवे म हाबे मड़ई, देखे ल आबे वोSS… वाहन में बज रहा छत्तीसगढ़ी गीत बसंत के इस मौसम में गाँव की मड़ई देखने का निमंत्रण दे रहा था।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।

यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
हल्बा टिकरापारा की दुपहरिया
सरपंच तिलक राम कुंजाम के आने के बाद चर्चा शुरु होती है। इस इस गाँव में लगभग 150 छानी (छतें) हैं, जिनमें बसने वाले सर्वाधिक गोंड़ जनजाति के लोग हैं, उसके बाद अधिक जनसंख्या कलार जाति के लोगों की है। धोबी, लोहार के साथ एक घर साहू जाति का भी है। गाँव में पेयजल का साधन नलकूप हैं और बाकी निस्तारी दो तालाबों से होती हैं।

गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।

गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
रानी डोंगरी
ग्राम पंचायत रानी डोंगरी नाम लोकदेवी देवी रानी माई के नाम से है, रानी माई आस पास के सात आठ गाँव की देवी हैं। जो टिकरापारा से लगभग 3 किमी की दूरी पर जंगल में डोंगरी की गुफ़ा में विराजती हैं,

ग्राम परम्परा के अनुसार वहाँ पूजा करने के लिए बैगा किरपा राम सोरी नियुक्त है। जब भी देवी की पूजा करनी होती है या उन्हें ग्राम में आमंत्रित करना होता है तो बैगा के माध्यम से ही इस कार्य को सम्पन्न किया जाता है।

मड़ई के दिन सारे गाँव वासी रानी माई होम धूप देकर गाँव आने का निमंत्रण देते हैं, तथा उसके आदेश के बाद मड़ई की डांग लेकर गाँव आया जाता है, देवी मड़ई के कार्य को सफ़ल बनाने के लिए गाँव में पधारती हैं, साथ ही अनुषांगी देवता भी ग्राम में पहुंचते हैं।
रानी माई के दरबार का रास्ता
सरपंच, बैगा एवं ग्राम के पूर्व निवासी चंदूलाल जैन के साथ देवी स्थान पहुंचते हैं, यहाँ विशाल चट्टानों की छोटी सी डोंगरी है। डोंगरी के सामने ही सामुदायिक भवन बना दिया गया है, जिससे इसकी सुंदरता को ग्रहण लग गया है।

देवी के स्थान तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण भी कर दिया गया है। नवरात्रि में यहाँ मेला लगता है और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए वृहद संख्या में भक्त जन आते हैं तब यह वनांचल गुलजार हो जाता है माता के सेवा गीतों से।

पैड़ियां जहाँ जाकर समाप्त होती हैं वहीं लगभग 50 फ़ुट ऊंची एकाश्म चट्टान है और इस चट्टान पर एक बड़ी चट्टान छत की तरह प्राकृतिक रुप से रखी हुई है। यहाँ खुले में रानी माई का स्थान है, इनकी कोई प्रतिमा नहीं है, यहाँ सिर्फ़ आभासी रुप में विराजमान होकर बैगा के माध्यम से अपना पर्चा देती हैं। 
रानी माई के दरबार में बैगा किरपा राम सोरी
बैगा किरपाराम बताते हैं कि देवी भीतर गुफ़ा में विराजित हैं, एकाश्म चट्टान के ऊंचाई में फ़ट जाने के कारण गुफ़ा तक पहुंचने का स्थान बंद हो गया, इसके पीछे के तरफ़ से गुफ़ा में जाने का स्थान है, परन्तु वहाँ भी बड़ी चट्टानों के गिरने के कारण रास्ता बंद हो गया है, सिर्फ़ भालू ही इस गुफ़ा में शरण लेते हैं।

रानी माई के स्थान पर उनकी सेवा के लिए घोड़ा रखा गया है और पोला के दिन लोग यहाँ पर मिट्टी के बैल भी चढाने आते हैं।  रानी माई आस-पास के रानी डोंगरी, टिकरापारा, कुरुभाट, कोटेला, टोंकोपाट आदि सात गांव की आराध्या हैं। इन गांव के लोग किसी दैवीय समस्या के निवारण के लिए रानी माई के स्थान पर आते हैं।
रानी माई के दरबार में चंदूलाल जैन, उनके भानजे, उनके मित्र, सरपंच तिलकराम कुंजाम एवं श्रीकांत दामले
मान्यता है कि रानी माई का आगमन बस्तर से हुआ है, ये महानदी के साथ आई और इनके साथ बावन कोरी (52X20=1040) देवता भी आए। इन्होने ने इस डोंगरी को उपयुक्त जानकर अपना निवास बना लिया।

इसके बाद इनका सारा परिवार पति देशमात्र,बेटा कुंवर पाट एवं बहु बिजली कैना, जोगड़ा बाबा, गढ़ हिंगलाज देवी, राजाराव देव भी आ गए हैं। इस तरह रानी माई का पूरा कुनबा ही इस स्थान पर जुट गया। बावन कोरी में बाकी देवता महानदी के पास ही रह गए, उनकी पूजा उनके ठहरने के स्थान पर जाकर ही की जाती है।

यहां रानी माई के पति देशमात्र नहीं रहते, उन्हें अन्य स्थान पर रहना पड़ रहा है। बैगा बताते हैं कि इस स्थान पर एक बूढा सिंह भी रहता था जो देवी के स्थान के ईर्द गिर्द ही मंडराता रहता था। जब कोई पूजा करने आता था तब बह गुफ़ा में चला जाता था और पूजा करके लौटने पर फ़िर बाहर निकल आता था। लगभग बारह वर्षों से अब सिंह दिखाई नहीं देता। शायद गुफ़ा में बंद हो गया होगा।
रानी माई दरबार के पार्श्व की गुफ़ा से निकलते हुए लेखक
रानी माई ने अपने पति देशमात्र को इस स्थान से भगा दिया, जिसके कारण उसे यहाँ से लगभग 12 किमी की दूरी पर भिरावर के पहाड़ पर बसना पड़ा। इसके पीछे कहानी है कि रानी देवी भक्त वत्सल हैं और वे प्रतिदिन सुबह उठकर भक्तों की फ़रियाद सुनती हैं।

उनके पति देशमात्र ने खेत जोतने के लिए हल में भैंसा फ़ांद रखा था और खेत जोत रहे थे, उन्हें भूख लगने लगी, इधर रानी माई को भक्तों की फ़रियाद सुनते हुए विलंब हो गया और खाना पहुंचाने में देर हो गई। खाना न लाते देख देशमात्र नें भूख के कारण भैंसे का सींग तोड़ कर आग में भूंज लिया और उसे खाने लगे।

रानी तभी खाना लेकर पहुंची तो उन्हें हड्डी जलने की बदबू आई, देखा कि उनका पति भैंसे का सींग तोड़ कर भूंज कर खा रहा है, उन्हें गुस्सा आ गया और उसे अपने स्थान पर कभी न आने चेतावनी दे दी। इससे देशमात्र भिरावर की पहाड़ी पर बस गए, उन्हें लगभग 12 गांव के लोग अपने अराध्य के रुप में मानते हैं।
रानी माई के दरबार का मनोरम दृश्य
उपरोक्त कथा से पता चलता है कि ग्रामीण भक्तों का रानी माई से मानवीय संबंध है, वे अपने सुख दुख ही हर बात उनसे करते हैं और रानी माई उनका निदान भी करती है।

पौराणिक देवताओं की तरह कोई बहुत बड़ा प्रभामंडल नहीं है, वे मानवीय गुणों से परिपूर्ण देवी हैं, उनका स्वभाव इससे ही पता चलता है कि पति द्वारा अनैतिक कार्य करने पर उसे भी उन्होने ने नहीं बख्शा तथा बेटे और बहू को अपने स्थान पर साथ ही रखा है। उनकी बहू बिजली कैना अर्थात बिजली की कन्या भी उनके साथ ही बेटी की तरह रहती है।

सजा का भागी सिर्फ़ उनका पति ही बनता है। देवी के इस मनोरम स्थल पर पहुंच कर मन प्रसन्न हो जाता है। बस बिना किसी योजना के यहां शासकीय निर्माण कार्य इस स्थान की सुंदरता में धब्बा लगा रहे हैं। इस स्थान को प्राकृतिक रुप में रखने की आवश्यकता है तभी इसकी सुंदरता कायम रह सकती है। सांझ ढ़ल रही थी और हम भी विहंगों के साथ अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे।