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शनिवार, 16 जुलाई 2016

हैदराबाद में भटक कर ब्लॉगर पहुंचे अपने धाम : दक्षिण यात्रा सम्पन्न 21

आज का दिन हमने विप्रो भ्रमण के लिए नियत किया था। बाहरी आगंतुकों को शनिवार को इस परिसर में प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए बाकायदा पहले से अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ती है। उसके बाद वहां से परिचय पत्र जारी किया जाता है, उसे लेकर ही परिसर में प्रवेश दिया जाता है। जाहिर है विप्रो बड़ी कम्पनी है और इसने अपने कर्मचारियों के लिए परिसर में दोस्ताना वातावरण निर्मित कर रखा है, जिसमें बहुत बड़ी कैंटिन, बगीचा एवं ओपन थियेटर भी है। 
विप्रो बैंगलोर में पाबला जी के साथ
हम लगभग एक बजे विप्रो पहुंच गए। एक लम्बे सफ़र के बाद सुबह उठने में विलंब हो गया। यहां एक आकर्षक डोम बना हुआ है, जिसकी छत में कांच लगे हुए हैं, यह बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। हमने दोपहर का नाश्ता यहां की कैंटीन में ही किया और परिसर का भ्रमण किया। विप्रो ने अपने परिसर में खूब हरियाली कर रखी है। बैगलोर जैसे शहर में शुद्ध वायु एवं वातावरण के लिए इसकी निहायत ही आवश्यकता दिखाई देती है। अन्य कम्पनियों और कारखानों को भी इससे सीख लेनी चाहिए कि कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढाने के लिए अच्छे माहौल की आवश्यकता पड़ती है।
विप्रो का ग्लास डोम
विप्रो भ्रमण के बाद हम होटल आ गए। विचार विमर्श कर फ़ैसला किया कि आज की रात 9 बजे हम यहां से प्रस्थान कर लें और रात भर गाड़ी चला कर हैदराबाद में विश्राम करें। ब्लॉगर मित्र विजय सप्पति जी का भी कई बार फ़ोन आ चुका था और वे रविवार को हैदराबाद में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। दिन भर आराम करने के बाद हमने रात नौ बजे के आस पास होटल छोड़ दिया और वापसी के लिए गाड़ी चल पड़ी। वैसे रात का सफ़र करना तो नहीं चाहिए। परन्तु एक फ़ायदा यह रहता कि रात को ट्रैफ़िक कम रहता और सफ़र जल्दी कटता है। परन्तु नींद के झोंकों पर भी काबू करना पड़ता है।
रात का सफ़र, बैंगलोर से निकलते हुए
चलते मुझे भोजन करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। पाबला जी खाने के मूड में नहीं थे क्योंकि खा लिए तो फ़िर गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाएगा। बैंगलोर शहर के बाहर निकलते हुए हमने सोचा कि हाईवे पर कोई ढाबा मिलेगा तो खाना खा लिया जाएगा। परन्तु चलते हुए समस्या यह रहती है कि थोड़ा और चल लिया जाए, फ़िर देखा जाएगा। यही हमारे साथ हो रहा था। रात एक बजे ढाबा दिखाई दिया, हमने गाड़ी लगाई, जैसे ही भीतर प्रवेश किया तो माहौल समझ नहीं आया। हर जगह लोग दारु की बोतल लिए बैठे थे और कुछ अजीब से संदिग्ध चेहरे भी दिख रहे थे। मैं भीतर जाकर लौट आया, लम्बे सफ़र में सुरक्षा भी जरुरी होती है। पाबला जी को मना किया और गाड़ी फ़िर स्टार्ट कर ली।
रास्ते में एक मंदिर में पर्व
आगे चलकर एक स्थान पर सरदार जी का ढाबा दिखाई दिया। हमने गाड़ी वहीं रोक ली। लेमन राईस का आर्डर दे दिया, तब तक पाबला जी ने आराम कर लिया। लेमन राईस में मुंगफ़ली इतनी अधिक डाल दी कि मेरा मन उखड़ गया। पर खाना भी जरुरी था। अधूरे मन से भोजन किया और फ़िर हम आगे की यात्रा पर चल पड़े। देश में विकास हो रहा है और हाईवे बन रहे हैं। अच्छी स्पीड वाली सड़कों का निर्माण हो रहा है। हैदराबाद बैंगलोर हाईवे भी फ़ोर लाईन का बना है। परन्तु बीच का डिवाईडर पार करके कौन, कब आपकी गाड़ी के सामने आ जाए, इसका पता ब्रह्मा को भी नहीं चलता। 
जान जाए  चाहे लूले लंगड़े हों, पर सफ़र ऐसे ही करेंगे
हमने डिवाईडर पार निकलने वालों के कई एक्सीडेंट सुबह सुबह देखे, मन खराब हो गया। थोड़ी सी जल्दी मचाने के कारण लोग जान से हाथ धो बैठते हैं और सड़क दुर्घटना में सबसे अधिक जवान मौते होती हैं। पीछे माँ बाप औलादें बिलखती रह जाती है। बैरिकेट लगाकर बनाए गए हाईवे पर भी लोग घुस जाते हैं। इस यात्रा में मेरा पूरा ध्यान सड़क पर ही रहा। जहाँ भी रोड़ क्रासिंग दिखाई देती, पाबला जो हाथ का इशारा कर स्पीड कम करवाता, वरना इनसे गाड़ी एक सौ बीस से कम चलती ही नहीं है। सारी यात्रा में मेरा यही काम रहा। कभी-कभी तो मुझे भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते थे। :)
चिकनी फ़र्राटेदार सड़क
अब हमारा टारगेट हैदराबाद था, सुबह से कई बार विजय जी का फ़ोन आ चुका था, वो समझ रहे थे कि हम सुबह नाश्ते के टैम पर पहुंच जाएगें, परन्तु हम तो झपकियां लेते हुए आ रहे थे। इसलिए इतनी जल्दी पहुंचना संभव नहीं था। हम पौने एक बजे के लगभग हैदराबाद शहर में प्रवेश कर गए। विजय जी बताए पते को ढूंढते रहे, उनसे संपर्क करते हुए। उन्होंने एक ही स्थान के तीन तीन पते बता दिए, हमारा जीपीएस और कहीं ले गया। फ़िर मुड़ कर वापस आए। एक घंटे तक सिकंदराबाद कैन्ट एरिए में ही घूमते रहे, आखिर घूमते घूमते थक गए पर उनका घर का पता नहीं मिला। 
हैदराबार 82 किमी और नागपुर 562 किमी
मैने उनसे फ़ोन पर कहा कि हम हमारी जगह बता देते हैं, आप यहां आ जाओ। वे अपना पता ही बताते रहे, लेकिन घर से निकलने को तैयार नहीं हुए। मैने उनसे जी पी एस पता मांगा, वो भी नहीं दिया, जिस तरह विवेक रस्तोगी जी ने अपना जीपीएस पता दे दिया, जीपीएस में वो पता फ़ीड करते ही हम उनके घर के ठीक सामने पहुंच गए थे, किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इधर हम उनका घर ढूंढते हुए नागपुर रोड़ पर पहुंच गए। जहां से माईल स्टोन नागपुर की दूरी 500 किमी के आस पास दिखा रहा था। हम विजय जी का घर ढूंढते हुए एकदम पक चुके थे। माईल स्टोन देखकर सरदार का दिमाग सनक गया और गाड़ी नागपुर रोड़ पर बढ़ा दी। 
हैदराबाद के पार नागपुर की ओर
विजय जी का फ़िर फ़ोन आया, पूछे कहां पर हो, मैने कहा कि हम नागपुर निकल लिए और हैदराबाद से काफ़ी आगे आ चुके हैं। बोले कि मैं सुबह से इंतजार कर रहा हूँ, सारा बनाया हुआ खाना खराब हो जाएगा। मैने कहा कि अब लौटना संभव नहीं है और पाबला जी नाराज है, फ़ोन पर भी बात नहीं करेंगे। इसलिए इस मुलाकात को पेंडिग ही रखा जाए तो ठीक है। उन्होंने निराश होकर फ़ोन बंद कर दिया। नए शहर में घर तक बुलाने के लिए दो तरीके हैं, पहला तो उसे जीपीएस का अंक्षाश देशांश दे दो, जिससे वह बिना असुविधा के पते पर पहुंच जाएगा या फ़िर शहर का ऐसा कोई लैंड मार्क बता तो जहाँ तक कोइ आसानी से पहुंच जाए और उसे लेने आ जाओ। ये दोनो काम विजय जी ने नहीं किए और घर से ही निर्देश देते रहे। हमारा भी समय खराब हुआ और उनका भी खाना।
अस्ताचल  को जाता विरंचीनारायण
हैदराबाद में आराम करने का प्लान बना कर चले थे, वह फ़ेल हो गया। अब गाड़ी फ़िर हाईवे पर थी। रास्ते में एक उड़ीपी रेस्टोंरेंट में भोजन किया और आगे बढ गए। अभी भी हमको लगभग आठ सौ किमी का सफ़र करके घर पहुंचना था। रात भर गाड़ी चला कर थक चुके थे। शाम को ई टीवी की स्टेट हेड प्रियंका कौशल ने राजिम पर कार्यक्रम के प्रसारण की सूचना दी, तो कुछ मित्रों ने वीडियो बनाकर मुझे वाट्सएप पर भेज दिया। गाड़ी चलाते हुए लगातार 27 घंटे हो चुके थे, थककर बुरा हाल था, जैसे तैसे करके रात बारह बजे तक नागपुर पहुंचे और वहां रात रिश्तेदार संध्या सत्येन्द्र शर्मा जी के रात गुजारी। 
एक सेल्फ़ी हो जाए, बाय बाय दक्षिण यात्रा
यहां फ़ुल आराम कर एवं दोपहर का भोजन कर एक बजे के बाद नागपुर से निकले। शाम को भिलाई पहुंचते तक पाबला जी गाड़ी चलाने की हालत में नहीं थे। जैसे तैसे करके घर पहुंचे। मेरे पास सामान कुछ ज्यादा हो गया था। उसे लेकर बस में जाने का मेरा मन नहीं था। पाबला जी बोले कि घर पर ही रात आराम कर लो, सुबह चार बजे अभनपुर छोड़ आऊंगा। घर के समीप पहुंच कर रात रुकना मुझे जम नहीं रहा था तब हम नाम वर्मा जी को फ़ोन किया, उन्होने समस्या का हल निकाल दिया और गाड़ी लेकर पहुंच गए। इस तरह मैं रात ग्यारह बजे घर पहुंचा और हमारी दक्षिण की साप्ताहिक यात्रा निर्विघन सम्पन्न हुई।  इति दक्षिण यात्रा …

गुरुवार, 17 मार्च 2016

वो सत्रह घंटे : दक्षिण यात्रा-2

आरम्भ से पढ़ें 
त श्री अकाल का संदेश सुबह 4 बजे मेरे चलभाष पर आ गया। मतलब पाबला जी भिलाई से अभनपुर की ओर प्रस्थान कर चुके थे। भिलाई से अभनपुर 60 किमी की दूरी पर है। मैने भी उनके पहुंचते तक तैयारी कर ली। मालकिन ने भी रास्ते के लिए खाना बना दिया। सुबह सवा पाँच बजे हमने अभनपुर से बंगलोर के लिए माता जी का आशीर्वाद लेकर यात्रा का श्री गणेश कर दिया। अभी अंधेरा ही था, रायपुर और भिलाई के बीच उजाला होने लगा, दिन निकलने वाला था। भिलाई से निकलते हुए पाबला जी मन एक बार फ़िर घर की तरफ़ जाने का हुआ, फ़िर उन्होने इरादा बदल कर गाड़ी हाईवे पर डाल दी। ठीक दो घंटे के बाद हमने सुबह सवा सात बजे राजनांदगाँव के बाद तुमड़ी बोड़ के गुरुनानक ढाबे में चाय पी। तुमड़ी बोड़ से डोंगरगढ़ के लिए रास्ता जाता है। 
सफ़र का प्रारंभ अभनपुर
मुकेश के पुराने गानों एवं जीपीएस वाली बाई के निर्देशों के तहत सपाटे से गाड़ी आगे बढ़ती गई। रायपुर नागपुर हाईवे फ़ोर लाईन होने के बाद से मैने कार द्वारा इस सड़क पर सफ़र नहीं किया था, तो अंदाजा था कि 12 से एक बजे के बीच नागपुर पहुंच जाएगें। पर हाईवे पर सपाटे के साथ गाड़ी एक सौ बीस की स्पीड से चल रही थी रास्ता जल्दी तय हो रहा था। हम सवा आठ बजे महाराष्ट्र की सीमा में प्रवेश कर गए। हमें नागपुर से संध्या जी के यहाँ का बना खाना लेना था। इसलिए उन्हें समय 12 से एक बजे के बीच का बताया गया था। हमारी गाड़ी लगभग साढ़े नौ बजे भंडारा के पास पहुंच चुकी थी। इससे लगा कि साढे दस बजे तक किसी भी हालत में नागपुर पहुंच जाएगें। 
तुमड़ी बोड़ ढाबा छत्तीसगढ़
हमने वहीं नाश्ता करने का निर्णय लिया। होटल वाले से दही होने की जानकारी ली, मिलने पर मटर के पराठे निकाल कर वहीं पर बैठ कर खाए। इस प्रक्रिया में आधा घंटा लग गया। इसके बाद नागपुर बायपास से हम शहर के बाहर ही बाहर निकल लिए। यह बायपास बुटीबोरी वाले रोड़ में जामठा के पास मिल जाता है। यहीं पर हमें खाना मिल गया। यहां से हम बारह बजे आगे बढे। हिंगणघाट होते हुए हमें आज रात हैदराबाद पहुंचना था। एक बजे के बाद भूख लगने लगी। हम भोजन करने के लिए हाईवे के किनारे नीम, बरगद, पीपल, महुआ आदि किसी छायादार वृक्ष की तलाश करने लगे। परन्तु एक घंटे तक तलाश करने पर भी हमें कहीं पर मनवांछित वृक्ष नहीं मिला। हर तरफ़ कीकर की ही झाड़ियाँ नजर आ रही थी। जिसके नीचे बैठने की सोच कर बचपन में लगाई डॉक्टर की सारी सुईयाँ याद कर तशरीफ़ सिहर जाती है।
सपाटे की सड़क
आखिर दो बजे एक ढाबे के पास नीम का एक वृक्ष दिखाई दिया, जिसके नीचे छाया में एक गाड़ी वाला सोया हुआ था। हमें यही स्थान उपयुक्त लगा भोजन के लिए। गाड़ी वृक्ष के नीचे लगा कर, छाया में चादर बिछाकर हमने आराम से भोजन किया। जब मनचाहा हो जाए तो उससे अच्छी तृप्ति और कोई नहीं हो सकती। भोजन के बाद हमने तीन बजे फ़िर सफ़र शुरु किया। यहाँ से हैदराबाद लगभग 400 किमी था। बीच में लगभग 50 किमी की सड़क का निर्माण अधूरा होने के कारण गति धीमी हो गई। इसके बाद आगे चलकर पांडुरकवड़ा होते हुए आदिलाबाद के बायपास से गुजरे। देखा जाए तो विदर्भ के इस इलाके में वर्षा आधारित फ़सल ही हो सकती है। सिंचाई के कोई साधन दिखाई नहीं दे रहे थे और न ही हरियाली। चारों तरफ़ झाड़ झंखाड़ एवं सूखा दिखाई दे रहा था।
दोपहर का भोजन कुड़ूए नीम की छांव में
हम एशियन हाईवे 43 पर चल रहे थे। एशियन हाईवे बनने के बाद यह पता चलना कठिन हो गया है कि हम किस गाँव से गुजर रहे हैं। क्योंकि इसकी गति इतनी अधिक है कि गांवों की तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता। कामारेड्डी पहुंचने पर दिन ढल गया। चौड़ी सड़क गाड़ी सपाटे से चलती है और एक टोल से दूसरे टोल के बीच का सफ़र तेजी से कट जाता है। 45 रुपए के टोल से शुरु हुई यात्रा 103 रुपए तक पहुंच गई। ये टोल रोड़ भी नोट को कागज बनाने की मशीन हो गए हैं, आप उन्हें नोट दो और ये आपको उसके बदले में एक छोटी सी पर्ची थमा देते हैं। हमने टोल रोड़ की सारी पर्चियाँ जमा करना शुरु कर दिया था। टोल देते ही पर्ची गाड़ी के टूल बाक्स में पहुंच जाती थी। यह पर्चियों का गुल्लक बन गया था।
अब जबेलियाँ दिखने लगी।
पाबला जी ने हैदराबाद बंगलोर रोड़ पर शहर से बाहर होटल बुक करवा रखा था। आज हमने लगभग 872 किमी और 17 घंटे लगातार कार ड्राईव की। हम रात को 10 बजे होटल में पहुंच गए।  होटल पहुंच कर खाना खाया। इस यात्रा के दौरान सभी होटलों में नेपाली या असमी स्टाफ़ ही दिखाई दिया। नेपाल में भूकंप से हुए नुकसान के बाद बड़ी संख्या में नेपाली बाहर काम करने निकल गए। भाषा की समस्या होने के बाद भी ये नौकरी कर कुछ धन अर्जित करने के लिए जद्दो जहद कर रहे हैं। रात को सुबह जल्दी बंगलोर निकलने के लिए प्लान बनने लगा। पर गोलकुंडा का किला देखने का मुड बन गया तो तय किया गया कि किला नौ बजे खुलता है इसलिए होटल से आठ बजे चला जाए और रास्ते में ही नाश्ता किया जाए। किला देखकर बंगलोर के लिए प्रस्थान किया जाए। जारी है, आगे पढ़ें 

मंगलवार, 6 मई 2014

खोपड़ी: महापाषाण कालीन सभ्यता का साक्षी

भूगोल में किसी एक प्रदेश या भूखंड में सभ्यताएं स्थाई नहीं रही। प्रकृति के चक्र के साथ नया बनता गया तो पुराना उजड़ता गया। जब आर्यावर्त की सभ्यता डंके सारे विश्व में बजते थे तब आज के शक्तिशाली राज्य अमेरिका नामो निशान भी नहीं था। महाभारत के युद्ध में सब कुछ गंवा देने के बाद आर्यावर्त में नई सभ्यता का उदय हो रहा था। तब इस काल में मिश्र की सभ्यता उत्कर्ष पर थी और हम पुन: विकास की ओर बढ रहे थे। इन सभ्यताओं के उदय एवं पतन के साक्ष्य धरती पर पाए जाते हैं, प्राचीन काल के मानव एवं उसकी सभ्यता को जानने के लिए पुरातत्व पर आश्रित होना पड़ता है। पुरातत्ववेत्ता तकनीकि प्रमाणों के आधार पर प्राचीन सभ्यता को सामने लाते हैं। 
माला चा गोटा
अध्ययन की दृष्टि से इतिहास को कई कालखंडों में विभाजित किया गया है। इसमें एक काल खंड मेगालिथिक पीरियड (महापाषाण काल) कहलाता है। भारतवर्ष में विशाल पाषाणखंडों से बनी कुछ समाधियाँ (मृतक स्मृतियाँ) प्राप्त होती हैं जिन्हें महापाषाणीय स्मारक के नाम से सम्बोधित करते हैं। जिस काल में इनका निर्माण हुआ उसे महापाषाण काल कहते हैं। महाराष्ट्र प्रदेश के विदर्भ अंचल में नागपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर कुही कस्बा है। इस क्षेत्र में महापाषाण कालीन अवशेष पाए जाते हैं। जिसके उत्खनन की जानकारी मुझे डेक्कन कॉलेज के डॉ कांति पवार सहायक प्राध्यापक डेक्कन कॉलेज द्वारा प्राप्त हुई थी। उनके सहयोगियों एवं विद्यार्थियों द्वारा इस उत्खनन कार्य को अंजाम दिया जा रहा था। इस महापाषाण कालीन स्थल पर उत्खनन हो रहे उत्खनन कार्य को मैं देखना चाहता था। 
माला चा गोटा
मुंबई से लौटते हुए उत्खनन निदेशक कांति पवार को फ़ोन करने के पश्चात ज्ञात हुआ कि वे कुही में ही हैं। आज गर्मी बहुत अधिक थी, लू भी चल रही थी। पारा सातवें आसमान पर था, परन्तु उत्खनन स्थल पर पहुंचने की ललक ने तपते हुए सूरज का अहसास नहीं होने दिया। नागपुर से उमरेड़ मार्ग पर पाँच गाँव से बाँए हाथ को कुही के लिए रास्ता जाता है। इस रास्ते पर पत्थर की खदाने भी दिखाई देती हैं। जिनमें अभी उत्खनन जारी है। प्रारंभ में तो रास्ता धूल घक्कड़ से भरा हुआ है परन्तु आगे बढने पर ग्रामीण वातावरण की झलक दिखाई देने लगती है। हम लगभग भोजन के समय ही कुही पहुंचे। डॉ कांति पवार भोजन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने साथ ही भोजन किया और साईड देखने चल पड़े।
महापाषाण कालीन स्मारक
कुही कस्बे से थोड़ी दूर पर "माला च गोटा" नामक महापाषाण कालीन स्थल है। देखने से प्रतीत होता है कभी यह घन घोर वन क्षेत्र रहा होगा। सड़क के बांई तरफ़ बड़े पत्थरों का गोला बना हुआ है। जिसका ब्यास लगभग 15 मीटर होगा। इसे मेगालिथिक सर्कल (महापाषाण कालीन वृत) कहते हैं। इस सर्कल में सफ़ेद पत्थरों का प्रयोग किया गया है। शायद आस पास कहीं इन पत्थरों की उपलब्धता हो। पत्थरों का आकार बड़ा होने से ज्ञात होता है कि इस स्थान पर दफ़्न किया गया व्यक्ति सामाजिक दृष्टि से उच्च स्थान एवं सम्मान का पात्र होगा। अन्य स्थानों पर मेगालिथिक सर्कल मिलते हैं पर बड़े आकार के पत्थर मेंरी दृष्टि में देखने में नहीं आए। अगर इन पत्थरों को ध्यान से देखें तो "स्टोंन हेंज" की संरचना सामने आती है। उसमें गढे हुए पत्थर हैं और ये अनगढ़, बस फ़र्क इतना ही है। स्टोन हेंज एवं माला च गोटा दोनो को बनाने का प्रयोजन एक ही रहा होगा।
उत्खनन कार्य
स्मृति शब्द से ही  स्मरण रखने, करने का अर्थ निकलता है। वर्तमान में भी हम देखते हैं कि किसी की मृत्यू होने के पश्चात उसे याद रखने के लिए लोग मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ, स्कूल एवं प्रतिमाओं का निर्माण करवाते हैं। यही याद रखने वाली एषणा मनुष्य की सभ्यता के साथ चली आ रही है। इस नश्वर लोक में व्यक्ति कुछ ऐसा कर जाना चाहता है कि जिससे उसे युग युगांतर आने वाली पीढियाँ याद कर सकें, स्मृति में संजोकर स्मरण कर सकें।  महापाषाण काल में भी मृतकों के लिए स्मारकों का निर्माण किया जाता था। मृतक के अंतिम यात्रा स्थल पर स्मृति स्वरुप विशालकाय पत्थरों का प्रयोग किया जाता था। किसी कब्र के स्थान पर एक पत्थर प्राप्त होता है किसी स्थान पर स्मृति वृत बना हुआ प्राप्त होता है। मृतक के साथ उसकी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ एवं उसकी निजी प्रिय वस्तुओं को भी दफ़नाया जाता था। इस मैगालिथिक सर्कल में मुझे 3 बड़े गड्ढे दिखाई, जाहिर होता है कि "ट्रेजर हंटर्स" ने खजाने की खोज में इसे भी खोद डाला।
उत्खनन में प्राप्त मृदाभांड के टुकड़े
मेगालिथिक सर्कल एक टीले पर बना हुआ है। इसके बांई तरफ़ एक नाला बहता है और नाले के उस तरफ़ भी ऊंचाई वाला स्थान है। यही उत्खनन कार्य चल रहा है। इस स्थल के समीप ही नाग नदी बहती है। हमने स्थल निरीक्षण किया और पाया कि इस स्थान पर अन्य मेगालिथिक प्रमाण भी उपस्थित हैं। उत्खनन स्थल "खोपड़ी" कहलाता है। इसे रीठी गाँव कहते हैं। रीठी गाँव से तात्पर्य है वीरान गाँव, जो कभी आबाद था और उजड़ गया। राजस्व रिकार्ड में खोपड़ी गाँव का नाम दर्ज है और उसका रकबा भी है। परन्तु स्थान पर कोई बसाहट नहीं है। प्राचीन काल में इस स्थान पर मानवों की बड़ी आबादी रही होगी। जिसके अवशेष उत्खनन में प्राप्त हो रहे हैं। 5 वर्ष पूर्व इस स्थान सर्वेक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुराविद डॉ सुभाष खमारी ने किया था तथा वर्तमान में उत्खनन कार्य डेक्कन कॉलेज के उत्खनन निदेशक कांति पवार के निर्देशन में  डॉ गुरुदास शेटे, डॉ रेशमा सांवत के द्वारा किया जा रहा है।
उत्खनन स्थल पर डॉ रेशमा सावंत, ललित शर्मा एवं किसान भाऊ
डॉ कांति पवार ने बताया कि इस स्थान से उत्खन में भूतल के तीन स्तर पाए गए हैं, साथ ही अस्थियाँ, काले एवँ लाल मृदाभांड के टुकड़े एवं चित्रित मृदा भांड अवशेष, खाद्यान्न जमा करने के बड़े भांड, सिल बट्टा, लोहे का चीजल, लोहे की छड़ एवं अन्य सामग्री प्राप्त हुई है। जो इतिहास की नई परतें प्रकाश में ला रही हैं। महापाषाण काल की संस्कृति को लगभग 3500 वर्ष प्राचीन माना जाता है। उत्खनन धीमी गति से पर पुरातात्विय मानकों के आधार पर किया जा रहा है। जिससे की एक भी प्रमाण नष्ट न होने पाए। इस उत्खनन स्थल की 15 हेक्टेयर भूमि पे खेत हैं जिनमें गेंहू की फ़सल बोई गई थी। यह भूमि कुही के किसी जमीदार की है। उन्होने इसे उत्खनन कार्य के लिए सौंप दिया है। किसी को अपनी निजी भूमि पर उत्खनन कार्य कराने के लिए तैयार करना ही बड़ी बात होती है।
डॉ कांति पवार (सहायक प्राध्यापक डेक्कन महाविद्यालय पुणे)
डॉ कांति पवार कहते हैं कि महापाषाण कालीन उपलब्धियों से कुही क्षेत्र समृद्द है। कुही ब्लॉक के 30 किलोमीटर के दायरे में अड़म, मांडल, पचखेड़ी, पोड़ासा, राजोला, लोहरा इत्यादि महापाषाण कालीन स्थल पाए जाते हैं। अड़म में डॉ अमरनाथ ने उत्खनन किया था जहाँ मध्य पाषाणकाल से लेकर सातवाहन काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए। मांडल से वाकाटक नरेश प्रवर सेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। पचखेड़ी से मृतक स्तंभ प्राप्त हुआ है। इस तरह कुही क्षेत्र से पुरासम्पदाएँ प्रकाश में आने के कारण इतिहास की परते उघड़ रही हैं। डेक्कन महाविद्यालय का पुरातत्व विभाग इस क्षेत्र में अग्रणी हो कर कार्य कर रहा है।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कमला बाई की कहानी, उसकी जुबानी

नागपुर से ट्रेन में सवार हुआ, आरक्षण था नहीं, नसीब में रायपुर तक का जनरल बोगी का ही सफ़र लिखा था। दूरी भी अधिक नहीं है, सिर्फ 5 घंटे का सफ़र यूँ ही कट जाएगा। भारी भीड़ के बीच बड़ी मशक्कत के बाद बोगी में घुस सका, चलने की जगह पर भी लोगों का सामान रखा हुआ था।
बड़ी जद्दोजहद के बाद बालकनी (उपर की सीट) पर पहुंचा। नीचे की सीटों पर छत्तीसगढ़ से कमाने-खाने बाहर गए परिवार बैठे थे। लम्बी सी एक महिला पहुंची, नीचे सीट न देखकर वह भी बालकनी में चढ़ने का प्रयास करने लगी, लेकिन सफल नहीं हो सकी।
सहायता के लिए मेरी और देखा तो मैंने उनका हाथ थाम कर चढाने की प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। फिर वह सामने की तरफ से सीट पर पैर रख कर बालकनी तक पहुचने में कामयाब हो गयी। अब सभी सवारियां कोच में ठंस चुकी थी। ट्रेन खुलने में एक घंटा और था।
उस अधेड़ महिला ने मुझसे पूछा कि कहाँ जा रहे हो? मैंने बताया "रायपुर", तो उसने बताया कि वह रायपुर के गर्ल्स डिग्री कालेज से पास आउट है। वर्ष पूछने पर वही वर्ष बताया जिसमे मैंने भी रायपुर से पढाई की थी। मेरे कालेज का नाम सुनकर बोली -" वह तो बड़ा ही फेमस कालेज है, और ठहाका लगा कर कहा - आप भी कभी लाइन मारने हमारे कालेज आते होगे? 
मैं सकपका गया :) कहीं पहचान तो नहीं गई, मैंने भी ठहाका लगा कर उसका साथ दिया और कहा - मेरे कालेज का रास्ता आपके कालेज से ही होकर जाता था। फिर वहां की कैंटीन और उसके साथ पुरानी भूली-बिसरी यादों में गोते लगाने लगे। उस समय के साथियों को याद करने लगे। चर्चा चलते रही।
मैं उसे पहचानने की कोशिश करने लगा। परन्तु पहचान नहीं पाया। उसने भी अपनी पहचान छुपा ली, मुझे कुछ नहीं बताया अपने बारे में। एक हाथ में सोने का कंगन और दूसरे हाथ में सोने की घडी पहने थी। सुहाग चिन्ह कहीं दिखाई नही दे रहे थे, चेहरे पर विधवा सी उदासी थी। मैंने अधिक जानना ठीक नहीं समझा। 
ट्रेन चल पड़ी थी, मैं सोचते रहा कि इस तरह बिंदास होकर किसी ने पुरे जीवन में ही नहीं पूछा कि कभी लाइन मारने हमारे कालेज आते होगे? उसके व्यक्तित्व को लेकर चिंतन चलते रहा। उसने बताया कि उसके परेंट्स नागपुर में रहते थे और वह गर्ल्स डिग्री कालेज के हास्टल में रहकर बायो की पढाई कर रही थी। 
इससे इतना ही जाहिर हुआ की वह बायो स्नातक है। अगले स्टेशन पर मेरे बगल की सीट खाली हुई। नीचे बैठी एक मोटी सी अधेड़ महिला उस पर चढ़ गयी। उसे ऊपर चढ़ने के लिए किसी भी सहायता जरुरत नहीं पड़ी। हाथो में सोने की मोटी-मोटी चूड़ियाँ पहन रखी थी, गले में सोने की चैन और कान में सोने के बुँदे भी। रंग धूप में पका हुआ था, चेहरे पर जीवन से संघर्ष की छाया स्पष्ट दिख रही थी। छुई-मुई नहीं, मेहनतकश महिला लग रही थी।
प्रदेश के लोग मिलने पर अपनी छत्तीसगढ़ी बोली में बात करने का लोभ नहीं छोड़ पाता। छत्तीसगढ़िया मिला और बात शुरू हो जाती है। महिला ऊपर की सीट पर बैठ कर अपने साथियों के साथ छत्तीसगढ़ी में बात करने लगी। इससे जाहिर हुआ कि सब जम्मू से से आ रहे हैं। मैंने सोचा कि महिला इतनी मोटी है कि वह मजदूरी नहीं कर सकती, अपने बेटे बहुओं के बच्चों की रखवारी करने साथ गई होगी।
मेरा ऐसा सोचना सही नहीं था। उससे पूछ बैठा कि वह जम्मू में क्या काम करती है? मेरा  पूछना ही था बस वह शुरू हो गयी, उसने अपने जीवन की कथा ही खोल कर रख दी। मैं मन्त्र मुग्ध उसे सुनता रहा।
"मैं जम्मू में अपना धंधा करती हूँ, देह भारी हो गई और उम्र भी बढ़ गई इसलिए शारीरिक श्रम के काम नहीं होते। महीने में 15 दिन जम्मू के पास बड़ी बम्हना में रहती हूँ, वहां बहुत सारे छत्तीसगढ़िया रहते हैं, उनको कपडे, सुकसी( सुखाई हुई मछली), गुड़ाखू, बाहरी, सूपा और भी बहुत सारे सामान ले जाकर बेचती हूँ, इससे ही मेरा गुजर बसर चलता है। बच्चों को पालने के लिए कुछ तो करना पड़ता है बाबू साहब। आप क्या करते हैं? उसने अपनी बात कहते हुए सवाल दाग दिया। मैंने बताया कि घुमक्कड़ हूँ और घुमक्कड़ी पर लिखता हूँ। वह समझ गई "पेपर लिखैया" है।
बाबू, मैंने भी सरपंची का चुनाव अपने गाँव सरसींवा से लड़ा है। फेर लोगों ने हरवा दिया। ढाई लाख खर्च हो गया। सब सगा लोग खा पी गए, रांड़ी दुखाही का खाने से कौन सा उनका भला होने वाला है? 22 बरस पहले मेरे धनी की मौत हो गई। 
मेरे पांचो लड़के छोटे थे। धनी के रहते कभी बाजार नहीं गई थी सब्जी लेने भी। मुझे बहुत चाहते थे, सिर्फ घर का ही काम करती थी। उनकी किडनी ख़राब हो गयी तो रायपुर के समता कालोनी के बड़े डाक्टर से उनका इलाज करवाया, सब गहना गुंथा बिक गया, लेकिन उन्हें बचा नहीं पाई।
बच्चों को पढाना बहुत जरुरी था, इसलिए नए सिरे से जिन्दगी शुरू की। मैंने पहला धंधा दारू बेचने का शुरू किया। उलिस-पुलिस थाना कभी देखा नहीं था। दारू के धंधे में अच्छी कमाई थी।
थाने वालों ने 6 बार छापा मार कर अपराध दर्ज किया, कोर्ट में पेशी में जाती थी। सब में बाइज्जत बरी हो गयी। बस वकील लोगों को डट के पैसा देना पड़ा। बड़े लड़के ने एम् ए किया, उससे छोटे ने बी ए। नौकरी नहीं लगी तो ड्राईवर बन गए। 
उससे छोटा लड़का पखांजूर से आई टी आई किया है और एक फैक्टरी में नौकरी कर रहा है। 5 बेटा और 3 बहु और 7 पोते -पोती हैं। पक्का घर और 6 दुकान बना दी हूँ, एक बेटे का व्यव्हार ठीक नहीं है इसलिए उसे अलग कर दिया। वह अलग रहता है, उसका महीने का राशन भेज देती हूँ, बहु को कह दिया है कि किसी चीज की कमी हो तो लिस्ट बना कर भेज दिया करे।
मैं रिक्शे में राशन भरवा कर भेज देती हूँ।  रानी कुंती ने 5 बेटों के लिए एक बेटे कर्ण को त्याग दिया था, मैंने भी 4 बेटों के लिए एक बेटे  को त्याग दिया। उसे अलग कर दिया। मेरी सम्पत्ती का बटवारा उसे मेरे मरने पर मिलगा, ऐसा फौती चढवाई तब पटवारी को लिखवा दी थी।
उसकी कहानी शुरू थी और मैं सुन रहा था। गाड़ी अपनी रफ़्तार से स्टेशन पर सवारी उतारते-चढाते चल रही थी। मेरी सफ़र की साथिन के जीवन के उतार चढाव भी कुछ इसी तरह जारी थे। उसने कथा जारी रखी। 
एक दिन थानेदार ने छापा मारा और कहा - कमला बाई अब दारू का धंधा बंद कर दो। तो मैंने कहा कि साहब अपने घर में झाड़ू बर्तन का काम दे दो। जिससे मैं अपने बच्चों को पाल सकूं। थानेदार साहब चुप हो गए। दारू का धंधा चालू रहा।
दिन भर आडर लिखती और रात को 12 बजे के बाद हाथ में लोहे की राड लेकर घर से चुपके से निकलती, गाँव से 3 किलो मीटर दारू की गाड़ी बुलवाती और रात भर में आडर का माल सप्लाई करके सुबह 4 बजे घर आकर चुपचाप सो जाती।
दारु का धंधा जरुर किया पर कभी भी दारु का एक छींटा मुंह में नहीं लिया। बच्चे बड़े  होने लगे तो मैंने दारू का धंधा खुद ही छोड़ दिया। कमाई तो बहुत थी पर ऐसा धंधा भी किस काम का जिससे बच्चे बिगड़ जाएँ।
गाँव के आस पास से काफी लोग जम्मू कमाने खाने जाते हैं, मैंने सोचा कि उनके लिए छत्तीसगढ़ में दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाली जरुरत की चीजे वहां ले जाकर बेचूं तो अच्छी कमाई हो सकती है। तब से मैंने यह धंधा शुरू कर दिया।
यहाँ से जम्मू तक सामान ले जाने में समस्या बहुत आती है, लगेज में बुक करके ले जाने में बहुत खर्च होता है। सारी कमाई लगेज में ही खप जाती है। इसलिए सब सामान जनरल बोगी में ही भर देती हूँ, एक तरफ की लैट्रिन में सामान भर कर दरवाजा लगा देती हूँ और एक सीट पकड़ कर बैठ जाती हूँ।
पुलिस वाले सब पटे हुए हैं, कोई 10 तो कोई 20, ज्यादा से ज्यादा 50 रूपये देती हूँ। लेकिन कई बहुत मादर ....... होते हैं। तो उनसे उसी तरह निपटती हूँ, जस को तस। एक बार टी टी ने बहुत परेशान किया। पुलिस बुला लिया। जेल भेजूंगा कहने लगा, तो मैंने उसे समझाया कि जेल से बहर आउंगी तो धंधा यही करुँगी। तेरे से भी निपट लुंगी।
अकेली औरत देख कर धमकाता है क्या बे? मेरा भी नाम कमला बाई है। तेरे जैसे पता नहीं कितने देखे। हर महीने आती हूँ बीसों साल से तेरे को जो उखाडना है उखाड़ ले। मैं किसी से से नहीं डरती, कोई चोरी चकारी करुँगी तो डरूंगी। बाकायदा टिकिट लेकर गाड़ी में चढ़ती हूँ। फिर वह टीटी 200 में मान गया। पेट की खातिर सब करना पड़ता है। 
उसने ब्लाउज से बटुवा निकला, उसमे मतदाता पहचान पत्र और पैन कार्ड था। ये सब मैंने बनवा रखा है, भले ही पहली दूसरी क्लास पढ़ी हूँ पर हिसाब-किताब सब जानती हूँ, जो भी सामान उधारी में बेचती हूँ उसे डायरी में लिखती हूँ, हर महीने 5 तारीख तक जम्मू  जाती हूँ सामान लेकर और 20 तारीख तक सामान बेच कर उधारी वसूल कर घर आ जाती हूँ। 
अभी जम्मू में मेरी 2-3  लाख की उधारी बगरी है। वहां काम करने वालों को 7 से 15 तारीख तक तनखा मिलती है। उस समय मेरा वहां रहना जरुरी रहता है वर्ना उधारी डूब जाएगी। गांव में ए टी एम् है, वहां से बैंक में पैसा जमा करवा देती हूँ और यहाँ निकाल लेती हूँ। जम्मू में एक झोपडी बना रखी है, जिसमे टी वी कूलर सब है। खाना बनाने के सारे सामान की बेवस्था है।
कभी आप जम्मू आओगे तो अपने हाथ से बना कर खिलाऊंगी। मुझे उसके बटुए में दवाई दिखाई दी, तो उसने बताया कि बी पी की गोली है। बच्चेदानी का आपरेशन करवाया तब से खा रही है।बीपी की गोली के साथ नींद की गोली भी थी। कहने लगी इसे दिन में खाती हूँ तब अच्छा लगता है। अब आदत हो गयी है। 
जम्मू में सब लोग पहचानते हैं, किसी छत्तीसगढ़िया कोई समस्या होती है तो उसका निदान भी करती हूँ, उन्हें अस्पताल ले जाती हूँ, उधारी पैसा कौड़ी भी देती हूँ, किसी का रुपया पैसा घर भेजना रहता है तो अपने एकाउंट से भेज देती हूँ। 
गाँव में मेरा बेटा एटीएम् से रुपया निकल कर सम्बंधित के घर पहुंचा देता है। मेरे से जितना बन पड़ता है उतना कर भला कर देती हूँ। अब कुछ लोग कह रहे थे कि जम्मू आने के लिए भी लायसेंस लेना पड़ेगा। ऐसा होगा तो बहुत गलत हो जायेगा।
इस बात पर कई लोगों से मेरा झगडा भी हो गया। जम्मू से चलते हुए सेब लेकर आई हूँ, नाती पोते लोग इंतजार करते रहते हैं, दाई आएगी तो खई खजानी लाएगी अभी घर जाउंगी तो मेरे लिए नाती पोते पानी लेकर आयेगें, खाट पर पड़ते ही मेरे ऊपर चढ़ कर खूंदना शुरू कर देगें। देह का सारा दर्द मिट जायेगा। फिर नहा कर अपने आस पड़ोस में बच्चों को सेब दूंगी। नाती पोतों के संगवारी भी मेरे आने का इंतजार करते हैं।
गाडी दुर्ग स्टेशन पहुँच चुकी थी। कमला बाई की कहानी ख़त्म होने का ही नाम नहीं ले रही थी। उसके पैन कार्ड में यही नाम लिखा था "कमला बाई", फिर वह कहती है - मेरा बेटा रायपुर आया है, पुलिस में भरती होने। आज उसका नाप जोख है। 
वह कहता है कि पुलिस की ही नौकरी करेगा। कोई उसे पुलिस की नौकरी लगा दे तो 4 लाख भी खर्च करने को तैयार हूँ, एक बार अपने सगा थानेदार को 3 लाख रुपया दी थी, पर वह नौकरी नहीं लगा सका। 5 हजार रुपया काट कर बाकी वापस कर दिए।
5 बेटा हे महाराज, नोनी के अगोरा मा 5 ठीक बेटा होगे। अब एक गरीब की लड़की को पाल पोस रही हूँ, वही मेरी बेटी है। उसकी शादी करुँगी। जब तक जांगर चल रही है। जम्मू की यात्रा चलते रहेगी। मेरा गंतव्य समीप आ रहा था, कमला बाई का साथ छूटने का समय था।
उससे मोबाईल नंबर लिया और अपना कार्ड दिया। सामने बैठी महिला से कमला बाई ने पूछा कि वह कहाँ जाएगी? तो उसने कहा कि जहाँ फोन आएगा वहीँ उतर जाउंगी, बिलासपुर, जांजगीर, खरसिया इत्यादि। दोनो महिलाओं में कितना अंतर था। एक ने पूरी जीवन गाथा सुना दी और दूसरी ने पता ठिकाना भी नहीं बताया।
दो अनुठे पात्रों से मेरा सामना हुआ। कमला बाई के जीवन संघर्ष की गाथा सुनते हुए रायपुर कब पहुँच गया, पता ही नहीं चला। गाडी से उतरते हुए कमला बाई को सैल्यूट किया और कभी जम्मू में मिलने का वादा करके गंतव्य की ओर बढ़ लिया। आगे की स्टोरी पढने के लिए यहाँ क्लिक करें।

शुक्रवार, 22 जून 2012

हिडिम्बा टेकरी और गंजों के लिए खुशखबरी ………… ललित शर्मा

हम बोधिसत्व नागार्जुन संस्थान के पिछले गेट से पहाड़ी पर चढने के लिए चल पड़े। इस पहाड़ी को स्थानीय लोग हिडिम्बा टेकरी कहते हैं। धूप बहुत तेज थी,  पहाड़ी के किनारे बहुत बड़ी झील है, जिसके नाम पर ही इस गाँव का नाम मनसर पड़ा। मनसर नाम मणिसर का अपभ्रंस है। इसे देखने से आभास होता है कि पहाड़ियों के बीच यह एक प्राकृतिक झील है। जिसमें बारहों महीने पानी रहता है। पहाड़ी की तरफ़ झील का उलट है, अर्थात झील लबालब भरने पर पानी की निकासी का मार्ग बना है। इसमें लोहे का गेट भी लगा है। पहाड़ी छोटी है पर चढाई खड़ी है। रास्ते में हमें रुक कर कुछ जलपान लेना पड़ा। उस दिन की गर्मी का अहसास करता हूँ तो आज भी उबल उठता हूँ। 
हिडिम्बा टेकरी से मनसर झील का नजारा
पहाड़ी पर चढते समय ही धरती पर पाषाण काल के मानव के रहने चिन्ह प्राप्त होते हैं। मिट्टी के बर्तनों की ठेकरियाँ और चकमक पत्थर के पाषाण कालीन औजार बिखरे पड़े हैं। कौन कितना उठाए और सहेजे। गर्मी से संध्या जी तो लाल हो गयी थी, पुरातात्विक धरोहरें देखने के मजे के साथ कष्ट भी था, लेकिन इस कष्ट का भी हर हाल में आनंद लेना था। पैट्रोल के बढे हुए रेट ने रोते-गाते भी मजा लेने को मजबूर कर दिया। पहाड़ी पर चढते ही एक चार दीवारी दिखाई दी। इसके भीतर एक बड़ी शिला पर लिखे हुए अभिलेख है, जो समय की मार से धुंधले हो गए, पढने मे  ही नहीं आया क्या लिखा है? वैसे भी हम कोई प्राचीन भाषा के विशेषज्ञ तो हैं नहीं जो पढ लेगें, पर आडी टेढी लाईने तो समझते हैं। 
समय की मार से धुंधले होते शिलालेख
इस स्थान से उपर पहाड़ी पर ईंटो की अंडाकार कलात्मक इमारत अभी भग्नावस्था में है। हम ईमारत पर चढते हैं, पर वैसा कुछ दिखाई नहीं देता जैसा भंते रामचंद्र ने बताया था। उनका कहना था कि यह एक बौद्ध मठ था, इसके आचार्य नागार्जुन थे। ईमारत में त्रिआयामी त्रिभुजों का निर्माण हुआ है। पूरी ईमारत पक्की ईंटो की बनी है। उपर जाने के लिए त्रिकोणी घुमावदार सीढियाँ बनी हैं। पहाड़ी के शिखर पर बनी हुई यह सुंदर संरचना है। ईमारत के चारों तरफ़ लाल पत्थर के शिवलिंग स्थापित हैं। जिन्हे अभी भी देखा जा सकता है। इससे पता चलता है कि यह एक शिवालय था। 
हिडिम्बा टेकरी के द्वादश शिवलिंगों मे से एक
पूर्व दिशा में एक टीन शेड बना हुआ है जिसके दरवाजे पर ताला लगा है। वहां पर पुरातत्व विभाग का कोई व्यक्ति नहीं मिला। अगर कोई पर्यटक ईमारत को नुकसान पहुंचा दे तो कोई देखने वाला नहीं है। पहाड़ी से मनसर कस्बे का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। साथ ही मणिसर झील भी खूबसूरत दिखाई देती है। पूर्व दिशा में एक पहाड़ी पर भी ईमारत के चिन्ह दिखाई दिए। वहां जाने के लिए किसी दूसरे रास्ते का उपयोग होता है। इस पहाड़ी से उसका कोई संबंध नहीं है। हम मंदिर की उत्कृष्ट  कलाकारी को देखते रहे। समय कम था और हमें आगे भी जाना था। एक पेड़ के नीचे बैठ कर आराम किया। संग में लाए छाछ और फ़लों को उदरस्थ किया।
लू लग जाएगी, कुछ तो खा लीजिए
लौटते हुए मुझे ईमारत में एक दरवाजा दिखाई दिया, बाहर तो ईंटों की दीवाल है पर भीतर जाने पर पत्थरों को खोद कर बनाई गयी एक सुरंग दिखाई देती है। सुरंग का मुहाना भी ईटों से बनाया हुआ है। मै उसके भीतर उतरता हूं तो घुप्प अंधरा था। मोबाईल के टार्च की रोशनी में दीवाल से चिपकी हुई एक गोह (गोईहा) दिखाई दी। मैने आगे बढने का ईरादा त्याग दिया। क्योंकि शुरुवात में ही कुछ ऐसे चिन्ह दिखाई दे दिए कि आगे बढना जान जोखिम में ही डालना नजर आया। जैसे कभी अनजान गाँव के तालाब में गहरे नहीं जाना चाहिए वैसे ही अनजान जगह में सुरंग या पहाड़ी खोह को पूरी देख भाल कर जाना चाहिए। 
सुरंग का मुहाना
अनजान जगह पर भीतर जाने का विचार त्याग देना चाहिए। क्योंकि भालू जैसा प्राणी ऐसे स्थानों पर पाया जाता है। जो कि बड़ा खतरनाक होता है। साथ ही पहाड़ी पर तेंदुए भी विचरण करते हैं जो रहने के लिए ऐसे ही मुफ़ीद स्थानों की तलाश करते हैं। सुरंग में जाने पर सड़ांध आई, जिससे अहसास हो गया कि यह किसी मांसाहारी प्राणी का ठिकाना बन चुकी है। इससे दूर ही रहना सही होगा। भंते रामचंद्र ने बताया कि यह सुरंग 25-30 फ़ुट आगे तक जाती है, फ़िर बंद है। ऐसी ही एक सुरंग और भी है। उसका दरवाजा बंद है।
हिडिम्बा टेकरी का शीर्ष
दो लड़के भी चश्मा लगाए हमारे पीछे पीछे यहाँ आए थे। वे तो थोड़ी देर में ही कूद फ़ांद कर नीचे जाने लगे। मैने उन्हे रोक कर पूछा कि उन्होने यहाँ क्या देखा और समझा? दोनो यूवक महाविद्यालय के छात्र थे। उनका कहना था कि कुछ समय होने के कारण इसे देखने चले आए। अब यह क्या है और किसने बनाया है? इसके विषय में उन्हे जानकारी नहीं है। सरासर सच कहा दोनों ने, उनकी बातें सुनकर अच्छा लगा। पुरातात्विक पर्यटन स्थलों पर अधिकतर यही होता है। गाईड की व्यवस्था न होने पर पर्यटक को कुछ समझ ही नहीं आता कि वह क्या देख रहा है और क्यों देख रहा है? 
शिल्पियों द्वारा कलात्मक निर्माण
बिना गाईड के किसी भी स्थान के विषय में जानकारी नहीं मिल पाती। पर्यटक आता है और मुंह फ़ाड़े देखकर चला जाता है।थोड़े से पैसे खर्च करके किसी स्थान के विषय में सार्थ जानकारी मिल जाए तो घुमने का उद्देश्य पूरा हो जाता है।  हम भी सिर्फ़ देखकर यहाँ की जानकारी लिए बिना ही वापस चल पड़ते हैं। खड़ी चढाई से उतरते समय सावधानी रखने की जरुरत है। थोड़ा सा पैर फ़िसला नहीं कि एकाध हड्डी टूटने की गारंटी मानिए। हड्डी टूटने पर धरती पर यमराज के एजेटों का चक्कर पड़ सकता है। इसलिए हम संभल कर नीचे उतरे और नागार्जुन स्मारक संस्था में पहुचे। जहाँ हमारी मोटरसायकिलें खड़ी थी।
हिडिम्बा टेकरी पर यायावर- पुख्ता सबूत
संस्थान में एक स्थान पर लिखा था कि यहाँ गंजों के सिर में 10 दिन में शर्तिया बाल उगाए जाते हैं। इसे पढकर जानने की इच्छा हुई तो केयर टेकर प्रो रामचंद्र से ही हमने पूछा। उन्होने बताया कि बाल उगाने वाली दवाई वे ही देते हैं और शर्तिया 10 दिनों में बाल उग आते हैं। उनके पास आने वाले बहुत से लोगों का वे ईलाज कर चुके हैं। मैने मजाक में कहा कि शर्मा जी सिर के बगल के कुछ बाल उड़े हुए हैं उन्हे उगा दीजिए। इसका अनुभव हम भी ले लेते हैं। तो उनका कहना था कि हम सिर्फ़ 30 साल से कम उम्र वाले व्यक्ति के ही बालों का ईलाज करते हैं। इससे अधिक उम्र वालों के सिर पर पूरे बाल नहीं आते तथा यह ईलाज गर्मी के दिनों में नहीं करते। क्योंकि गर्मी में दवाई से सिर पर फ़ोड़े फ़ुंसी निकलने का डर रहता है। 
प्रो रामचंद्र उके (केयर टेकर)
इसलिए बरसात का मौसम सबसे अच्छा होता है बाल की फ़सल उगाने के लिए। साथ ही उन्होने अपनी फ़ीस 10,000/- अक्षरी दस हजार रुपए भी बता दी। लेकिन बाल उगाने का मजबूत दावा पेश किया। हमने उनका पता लिया। उन्होने बताया कि इस स्थान से दो किलोमीटर पर नालंदा जैसी एक सरंचना भी उत्खनन में प्राप्त हुई है। उसे आपको अवश्य देखना चाहिए। पहाड़ी पर उत्खनन में प्राप्त सामग्री को यहाँ स्थित एक भवन में रखा गया है। पर उसकी चाबी अरुण कु्मार शर्मा जी के पास ही है। इसलिए उसे खोला नहीं जा सकता। प्रो रामचंद्र से हम विदा लेकर अगले स्थान की ओर चल पडे। 
शिल्पियों द्वारा ईंटो से निर्मित त्रिआयामी भवन विन्यास
गंजे सर पर बाल उगाने वाले का पता है - प्रो रामचंद्र उके, केयर टेकर, बोधिसत्व नागार्जुन स्मारक संस्था व अनुसंधान केन्द्र, मनसर, तहसील रामटेक जिला नागपुर (महाराष्ट्र) मो. 09823214196, 08055397715। इनसे सम्पर्क कर अपने रिस्क से सिर पर बाल उगाएं। (मनसर के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक पहलू पर मैने नागपुर से आने के बाद सिरपुर जाकर अरुण कुमार शर्मा जी से चर्चा की वह विवरण आपको आगामी पोस्ट में मिलगा।) आगे पढें

मंगलवार, 1 मई 2012

"क्षितिजा" छाई काव्य क्षितिज पर - नागपुर से लौटकर ललित शर्मा

नागपुर, भारतीय रेल्वे का हृदय माना जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हावड़ा से मुंबई अहमदाबाद लाईन और दिल्ली से दक्षिण भारत की लाईन नागपुर से होकर ही गुजरती है। कहा जाए तो विजयवाड़ा से पहले नागपुर दक्षिण की यात्रियों का स्वागत करता सिंह द्वार है। एक खास बात और है नागपुर की, यहाँ दो रेल मार्ग 90 अंश के कोण में एक दूसरे को क्रास करते हैं। नागपुर हजारों बार जाना हो चुका है लेकिन 14 अप्रेल 2012 को नागपुर विशेष प्रयोजन से जाना पड़ा। करनाळ की कवियत्रि अंजु चौधरी जी को महात्मा फ़ूले टैलेंट रिसर्च अकादमी द्वारा उनके प्रथम काव्य संग्रह "क्षितिजा" पर सम्मान मिलना था। इस आशय का समाचार मुझे मिल चुका था। अंजु चौधरी जी का विशेष आग्रह था समारोह में उपस्थित होने का। जिसे मैं टाल न सका, क्योंकि नागपुर रायपुर से अधिक दूर भी नहीं है और मेरे पास समय भी था उनका निमंत्रण स्वीकार करने का। दिल्ली में हुए "क्षितिजा" के विमोचन समारोह में शामिल न हो पाने की भरपाई नागपुर में करना चाहता था। 13 अप्रेल की रात को नागपुर पहुंच चुका था सत्येन्द्र-संध्या शर्मा जी के दौलत खाने पर। सत्येन्द्र जी मुझे स्टेशन लेने आए।

सुबह की सैर पर हम एयरपोर्ट तक गए, वहाँ बाबा साहेब के पुतले समक्ष लोग एकत्रित हो रहे थे, अगरबत्ती की खुश्बू से वातावरण गमक रहा था। फ़ूल मालाएं बंदनवार भी सज रही थी। आज बाबा साहब की जयंती मनाई जा रही है। हमने भी पुतले की प्रदक्षिणा और वापस घर के रास्ते पर आ गए। बाबा साहब की जयंती पर नागपुर में विभिन्न संस्थाओं द्वारा कई कार्यक्रम रखे गए थे। रास्ते में सुबह की सैर करने वाले बहुत सारे लोग थे, लगा कि नि:संदेह रामदेव बाबा ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने में महती भूमिका निभाई है। कुछ लोग सड़क किनारे की दूब पर अनुलोम विलोम करते दिखाई दिए और एक स्थान पर लौकी, करेले, टमाटर, गाजर आदि का रस बोतलों में भरा दिखाई दिया। सैर करने वाले लोग वहीं आकर स्वास्थ्यवर्धक रसानंद लेते हैं। हम घर की ओर बढ रहे थे, सूर्य की किरणे शैशवावस्था से यौवन पर आ रही थी। धूप चमकीली हो चुकी थी। हमने सोचा कि जल्दी घर पहुंचने में ही भलाई है, अगर अधिक देर तक सैर हुई तो रसानंद, क्रंदन में भी बदल सकता है।

घर पहुंचने पर अंजु चौधरी जी का फ़ोन आया कि वे भी एयरपोर्ट से अभी होटल पहुंची है और हमें युनिवर्सिटी के पूर्णचंद बू्टी सभागृह में 9/30 पर पहुंचना है। मुझे उनका उत्साह समझ में आ रहा था। ऐसा कोई सेमीनार नहीं देखा जो सुबह 9/30 बजे प्रारंभ हो जाए। हम (मैं, संध्या जी और सत्येन्द्र जी) प्रात: रास लेकर घर से दस बजे यूनिवर्सिटी के लिए चले। हम जब यूनिर्वसिटी पहुंचे तो वहां कोई पुर्णचंद बूटी सभागृह नहीं मिला। पूछने पर गार्ड ने सिर हिला दिया और कहा कि महाराजबाग में देख लीजिए। महाराजबाग में कृषि विश्वविद्यालय है। सत्येन्द्र जी नागपुर के जानकार ठहरे इसलिए हम पूर्ण चंद बूटी सभागृह तक पहुंच गए। वहाँ पहुचते ही हमने अंजु चौधरी जी को ढूंढा, वे अपने चिंरजीव के साथ सिंहासनारुढ थी। मुलाकात होते ही सभी की बत्तिसियाँ खिल उठी, मेरी पूरी बत्तिसी नहीं है, अकल दाढ आज तक बाहर ही नहीं आई, इसलिए उसकी गिनती करना बेमानी है। हमने तीसी से काम चला लिया।

सभागृह के द्वार पर पंजीयन काउंटर लगा था, वहाँ आगंतुक पंजियन करवा कर अपना परिचय पत्र ले रहे थे। जिसे गले में लटकाना था, हमने भी दो लिए और गले में लटका लिया, जिससे पता चले कि छत्तिसगढ का प्रतिनिधित्व इस कार्यक्रम में हो रहा है। भले ही हम अंजु चौधरी जी द्वारा आमंत्रित थे पर अपनी उपस्थिति तो बताना जरुरी है। तभी अंजु चौधरी जी ने बताया कि केलीफ़ोर्निया से ब्लॉगर अनिता कपुर भी पधारी इस कार्यक्रम में, हम सब उनसे मिले जाकर। उन्होने पहचान लिया और कहा कि आप तो फ़ेसबुक पर मेरे मित्र हैं। हमने भी हामी भर ली और एक चित्र खिंचवा लिया साथ ही साथ। कार्यक्रम प्रारंभ हुआ, अतिथि मंचासीन हुए और उद्घाटनोपरांत उद्बोधन का कार्यक्रम प्रारंभ हो गया। सभागृह की कुर्सियां खचाखच भर चुकी थी, लगा कि काफ़ी जागरुक लोग हैं जो कार्यक्रम में सम्मिलित होने आए हैं। वरना वर्तमान किसके पास इतना समय है कि किसी की आनी-बानी की गोठ सुने?

संजीव तिवारी जी और अंजु चौधरी जी
बैठते ही अंजु चौधरी जी ने खुलासा किया कि हमारे परम सनेही ब्लॉगर संजीव तिवारी जी भी सहस्त्रचक्रवाहिनी लौहपथगामिनी से कार्यक्रम की शोभा बढाने पहुंच रहे हैं। वाह! सुनकर रोम रोम खिल गया। अब मजा आएगा कार्यक्रम का। संजीव जी को फ़ोन लगाया कि तो पता चला कि किसी ने रेल्वे प्रशासन को बता दिया कि इस ट्रेन में एक ब्लॉगर सफ़र कर रहा है इसलिए ट्रेन में विशेष सुरक्षा जांच नागपुर के प्रवेश द्वार इतवारी में की जा रही है। संजीव तिवारी जी के पासपोर्ट वीजा की गहन जाँच हो रही हैं। क्योंकि ब्लॉगर का क्या भरोसा कब, कहाँ किसका भंडाफ़ोड़ कर दे। वैसे न्यु मीडिया से डरना भी जायज है। संघवी ने इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया तक सीडी पहुंचने न दी पर किसी दिलजले ने यूट्यूब पर डाल कर उसके मंसुबों पर पानी फ़ेर दिया और अस्तीफ़ा देना ही पड़ा। संजीव तिवारी जी सभागृह में पधार चुके थे। हम उनका इस्तेकबाल करने के लिए ग्रंथालय के द्वार पर खड़े थे। मुलाकात भी ऐसे हुई जैसे कोई दो बिछुड़े प्रेमी बरसों के बाद औरंगजेब की कैद से छूट कर आए हों।

सतिथि देवी भव:
सभागृह में हम जिस तरफ़ बैठे थे उधर की विद्युत व्यवस्था में कुछ अवरोध था। बार-बार पंखे बंद हो जाते थे। अरे यार क्या करें किस्मत ही ऐसी है, जब कुछ अच्छा करने की कोशिश करते हैं कोई न कोई बाधा खडी हो जाती है। शादी के लिए जब लड़की वाले देखने आते थे तो डर के मारे सिर के बाल खड़े हो जाते थे, जो उन्हे पसंद नहीं आते थे और बात बनते बनते रह जाती थी। तब हमने सेट-वेट लगाकर थोड़ा सेक्सी लुक बनाया और बात फ़िट हो गयी । हम भी परणाय गए, नहीं बाल खड़े के खड़े ही रहते और हम प्लेटफ़ार्म पर। आज भी यही हो रहा था, अंजु जी को सम्मान मिलना था और पंखे पसीना निकाल दे रहे थे। संध्या जी ने जुगत लगाई, रजिस्ट्रेशन के वक्त मिले फ़ोल्डर से हवा करनी शुरु की, थोड़ी सी हमारे तक भी पहुंची। हमें भी ध्यान आया ऐसा ही फ़ोल्डर तो हमारे पास भी है। पर क्या करें? अकल हो तो उपयोग करे न? अब हमने भी फ़ोल्डर घुमाया और अपने को कम् और अंजु जी को अधिक हवा दी, क्योंकि उन्हे इसकी दरकार भी थी।

 अनिता कपुर जी
मंच से भाषण शुरु थे, श्रोत अध्येता भाषण दे रहे थे और हमारे जैसे श्रोता सुन रहे थे। अनिता कपूर जी का भी नम्बर आया, उन्होने अपना वक्तव्य देना प्रारंभ किया, हमने सोचा कि वे अपने भाषण के प्रांरंभ में ब्लॉगर बिरादरी का भी जिक्र करेंगी। क्योंकि हम ब्लॉगर भी वहीं थे और ब्लॉगर्स का जिक्र उनके मुंह से सुनना चाहते थे। लेकिन वे अपनी इस बिरादरी को भुल गयी। भाषण की समाप्ति पर मैने उन्हे मंच पर जाकर कहा कि - आपसे नाराज हूँ। कारण पुछने पर मैने उन्हे कारण बता दिया। उन्होने से क्षमा मांग कर कहा कि आगे से ध्यान रखुंगी। अब गलती नहीं होगी, आप नाराजी दूर कर लो बाबा। अब बाबा भी खुश हुए, मैने अपनी बात उन तक पहुंचा दी। प्रथम सत्र समाप्त हो चुका था, माईक से भोजन करने की घोषणा हो रही थी और कहा जा रहा था कि अगला सत्र सम्मान सत्र होगा जो 3 बजे प्रारंभ होगा। इस कार्यक्रम में विदेशों से भी प्रतिभागी आए थे। एक गोरा भी था शायद जर्मनी से उसने भी अपना भाषण पढा। भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ मंधानी भी मंचासीन थे। बाकी लोगों को मै जानता नहीं, इसलिए जिक्र भी उचित नहीं समझता।

जय बाबा की - काला पर्स रखते ही  कृपा आनी शुरु हुई :)
निर्मल बाबा की कृपा आनी शुरु हो गयी थी, सुबह उनका एस्क्लुसिव इंटरव्यु देख कर चले थे। सभी लोग भोजन करने गए तो हमने भी भोजन के लिए उचित जगह की तलाश शुरु कर दी। आखिर तय  हुआ, होटल एल बी चला जाए, जो नागपुर के सदर में है और वहीं अंजु जी का डेरा भी। आटो वाले ने 100 रुपए किराया बताया, भुख जोरों की लगी थी इसलिए मोलभाव करने का समय नहीं था हम चारों ऑटो में सवार हो गए। जगह सिर्फ़ तीन की थी। संजीव तिवारी जी को मुझे गोद में बिठाना पड़ा, बात थी कि किसी भी तरह फ़टाफ़ट भोजन करने  लिए होटल पहुंचा जाए। होटल एल बी का रेस्टोरेंट अच्छा था पर सप्लाई ढीली थी, खाना आते तक एक-एक साफ़्ट ड्रिंक झेली। फ़िर तीन लोगों की सहमति से कुक्कड़ भी आ गया। संजीव तिवारी जी ने घास पात से ही काम चलाया। वैसे पता चला कि अंजु जी कड़कनाथ अच्छा बनाती हैं। कभी मुहूर्त हुआ तो उनके हाथ का भी खाएगें। कविताओं की तरह रस जरुर मिलेगा उसमें। भाव प्रधान कड़कनाथ के कहने ही क्या हैं थोड़ा चटपटा भी चलेगा। रुकिए रुकिए यह विचार उस समय के थे, अब के नहीं क्योंकि अब मनाही हो चुकी है, बैन लग चुका है और इनकी निगाह मुझ पर सतत लगी रहती है।

फ़ोटो ग्राफ़ी - (चित्र संजीव तिवारी) 
भोजनोपरांत वापस ग्रंथालय सभागार उसी भाड़े में आए, हमें थोड़ा विलंब हो चुका था। सभागार में हमारे बैठने के लिए कुर्सियाँ ही खाली नहीं थी, पहले आओ और पहले पाओ वाली स्थिति थी, न ही किसी ने उठकर कुर्सियाँ देने की जहमत उठाई, उपस्थित सभी नौगजे थे। हम चारों पीछे की तरफ़ खड़े हो गए जाकर। समय बीतता जा रहा है। थोक में सम्मान प्रक्रिया शुरु थी, वहाँ जितने बैठे थे सभी को किसी न किसी नाम से सम्मान मिलना था। तभी नागपुर के खासदार विलास राव मुत्तेमवार का आगमन होता है, वे मराठी में जोरदार धुवांधार भाषण देते हैं साथ ही विदर्भ की बात करते हैं। उसके पश्चात एक दलित लेखक जो शायद विदेश में रहते हैं उन्होने भी लच्छेदार मराठी भाषा में अगड़ों-पिछड़ों को गरियाया। राजा बलि की जय बोलाई, स्वर्णों की खाल खींची, हम सुनते रहे बैठकर। अरे भाई जब सवर्णों को गाली नहीं दोगे तब तक तुम्हारी दुकान नहीं चलेगी। क्योंकि दलित संगठनों का मुख्य कार्य ही सवर्णों को गाली देना हो गया और इस पर ही एकता कायम है। जबकि मेरा सोचना है कि समाज का निर्माण सभी जाति घटकों को मिला कर होता है। इसलिए अलग रह कर या किसी को गाली देकर कोई अपने जाति संगठन का विकास नहीं कर सकता है। समाज में सभी घटकों की आवश्यकता होती है। खैर छोड़ों इन बातों को सभी पढे लिखे और समझदार हैं यार।

सम्मान ग्रहण करते अंजु चौधरी
सम्मान देने की प्रक्रिया जारी थी, कुछ लोग सम्मान लेकर चले गए इसलिए उनकी कुर्सी खाली हुई और हमें बैठने के लिए स्थान प्राप्त हो गया। नामों की घोषणाएं हो रही थी, हमें अंजु जी के नाम की व्यग्रता से प्रतिक्षा  थी क्योंकि 5 बजने को थे। इतनी देर तो भाड़े के ताली बजाने वाले दर्शक भी नहीं रुकते, 5 बजे दफ़्तर से चपरासी भी चले जाता है चाहे साह्ब बैठे रहें कुर्सी पर रात भर। पर हम भी भीष्म प्रतिज्ञा करके आए थे कि अंजु जी को सम्मान दिला कर ही जाएगें। चाहे धैर्य की कितनी भी परीक्षा ले ली जाए। हम भी भीष्म जैसे अंजु जी की सम्मान प्राप्ति से बंधे थे। इन्हे सम्मान मिला और हम हो जाएं रफ़ुचक्कर। एक बार सम्मानदाताओं कह भी आया था कि अंजु जी सम्मान जल्दी करो, उनकी फ़्लाईट छूट जाएगी तो तुम्हें फ़ालतु 20 हजार का दंड भरना पड़ेगा। आखिर वह घड़ी आ ही गयी, जब अंजु जी का नाम आसंदी से उद्घोषक ने लिया, हमारे गर्मी में मुरझाए, सिकुड़े हुए चेहरे खिल उठे। मुस्कुराते ही होठों पर पड़ी पपड़ियाँ फ़टकर दर्द करने लगी। भाई ब्लॉगर मित्र के सम्मान के लिए इतना दर्द तो सहना पड़ेगा। जिस मित्र ने मित्र का साथ नहीं दिया वह कैसा मित्र? अंजु जी मंच पर पहुंची उन्हे शाल श्री फ़ल के साथ सम्मान दिया गया और हमने फ़टाफ़ट चित्र उतारे। एक सुखद अहसास, लो भई 10 बजे से शुरु हुई तपस्या 6 बजे समाप्त हुई।

ललित शर्मा, अंजु चौधरी, संध्या शर्मा, सत्येन्द्र शर्मा
विजयी भाव और गर्व से तनी हुई गर्दन लिए हम सभागृह से बाहर आए और जी भर के अंजु जी को सम्मान प्राप्त करने की बधाई दी। उनके साथ चित्र भी खिंचवाए, भई एक सेलीब्रेटी के साथ चित्र खिंचवाने का आनंद ही कुछ और है। हमारे चित्र संजीव तिवारी जी ने खींचे और संजीव तिवारी जी के हमने। सत्येन्द्र शर्मा जी भी अपने जरुरी काम निपटा कर पंहुच चुके थे। अब अंजु जी से विदाई ली, हमने अपनी काली घोड़ी को पुचकार खरहेरा किया। उसने भी सिर हिलाया कि वह सवारी कराने के लिए तैयार है।इस तरह "क्षितिजा" का सम्मान समारोह निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। हमने भी राहत की सांस ली, जैसे स्कूल की छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे घर की ओर दौड़ लगा देते हैं, बस इसी तरह का कुछ मन हमारा भी था। इस कार्यक्रम में सूर्यकांत गुप्ता जी एवं गुप्तैईन भाभी को भी आना था पर गुप्ता जी की अस्वस्थता की वजह से वे पहुंच नहीं पाए। सभी से विदा लेते हुए आनंद के क्षणों को अपनी यादों एवं कैमरे में कैद करते हुए फ़िर मिलने का वादा करते हुए हम सब अपनी-अपनी मंजिल की ओर बढ गए। एक आत्मिक संतुष्टि मन को मिली। जब कोई व्यक्ति रचता है और उसे सम्मान मिलता है वह जीवन का अविष्मर्णीय समय होता है।घर पहुंचने पर रात भोजन के समय अंजु जी का मैसेज मिला कि फ़्लाईट दिल्ली के लिए टेक ऑफ़ हो गयी है और हम लग गए अपनी निर्गुणी धुन में……

रविवार, 27 जून 2010

भूख न देखे सूखी रोटी, यात्रा महाराष्ट्र

बिस्तर पर करवटें बदलते लोग सोने के लिए स्लीपिंग पिल्स का सहारा लेते हैं। थककर चूर हुआ आदमी बस लेटने की जगह ढूंढता है। नींद का संबंध मनुष्य के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। बस वह आनी चाहिए, फ़िर कुछ नहीं नजर आता। सिर्फ़ सोना और सोना।

बुलढाणा का घाट
एक बार 20 साल पहले मैं भी अकेला चित्तौड़ के प्लेट फ़ार्म पर सो गया, भीलवाड़ा जाने के लिए ट्रेन आने में चार घंटों का विलंब था। नींद आ रही थी, प्लेटफ़ार्म के बाहर ठंडी हवा चल रही थी और नींद आ रही थी। फ़िर क्या?

वहीं सड़क पर पेपर बिछाया और बैग सिरहाने लगा कर सो गया। बड़ी गहरी नींद आई। खुले आसमान में फ़ुटपाथ की वह नींद याद आने पर आज तक तरोताजा करती है। कहते हैं न " भूख न देखे सूखी रोटी, भूख न देखे सूखी खाट" 
 ढाबे में नींद-खाट की वाट
कुछ इसी तरह की नींद नीरज को भी आ रही है। उसने रात को एक ढाबे में कार रोकी और दौड़ कर एक खाट पकड़ ली। बस फ़िर क्या था, निद्रा रानी की गोद में नींद का मजा ले रहे हैं। यहां घर में एसी एवं गद्दों पर जो नींद नहीं आई होगी, उससे अच्छी नींद बिना बिछौने एवं एसी के सड़क के किनारे ली जा रही है। सुबह हमने इन्हे उठाया तो बड़ी मुस्किल से उठे, हम कार चला रहे थे और ये सीट लम्बी करके फ़िर पड़ लिए। सोते रहे और हम गाड़ी चलाते रहे।
कार में सोना ही सोना
कुछ इसी तरह से यात्रा चल रही है। एक सोता है तो एक ड्राईव करता है। वैसे बिना लक्ष्य की इस यात्रा में आनंद बहुत आ रहा है। कहीं भी पहुंच जाते हैं। जो रास्ते में मिल गया देख लेते हैं। 

नागपुर से प्लान करके निकले थे कि मुंबई जाना है धुलिया रोड़ पर मलकापुर के पास साले साहेब का फ़ोन आ गया कि वे चिखली(बुलढाणा) मे अपनी ससुराल में हैं। आपको यहां आना ही पड़ेगा। लेकिन हमने बताया कि बहुत दूर निकल चुके हैं वापस आने के लिए 125 किलो मीटर आना पड़ेगा। हम नहीं आ सकते। 

कुछ देर बाद घर से सुप्रीम अथारिटी का फ़ोन आ गया कि हमें वहां जाना ही पड़ेगा। मरते क्या न करते, गाड़ी वापस घुमाई और नांदुरा से मोपाळा-बुलढाणा होते हुए 11 बजे चिखली पहुंचे। 

यहां स्नान भोजन आदि से निवृत होकर अब दुसरा प्लान बना की शनि सिंघणापुर देखते हुए चलते हैं। यह स्थान औरंगाबाद पूना हाईवे पर 76 किलोमीटर पर है। गाड़ी की टंकी फ़ुल करके सिंघणापुर चल पड़े। मुंबई जाना स्थगित हो गया।