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रविवार, 29 सितंबर 2013

वाहे गुरुजी की फ़तेह: काठमाण्डू की ओर - नेपाल यात्रा 1

वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फ़तह का मैसेज मेरे मोबाईल पर 11 सितम्बर की सुबह 3/46 बजे पर आया। मैं समझ गया था कि हमारी नेपाल यात्रा का पहला चरण प्रारंभ हो चुका है। श्री बी एस पाबला जी भिलाई से अभनपुर आने के लिए कूच कर चूके हैं। 1 घंटे में उन्हें मुझ तक पहुंचना था और अब एक लम्बी रोमांचक यात्रा के लिए मुझे भी तैयार होना था। इस एक घंटे में मैं तैयार हो गया। तभी गिरीश पंकज जी का फ़ोन आया कि हम लोग अभनपुर से रायपुर के लिए कब चल रहे हैं। मैने कहा कि पाबला जी आते ही होगें और हम दोनो शीघ्र ही आपके पास पहुंच रहे हैं आप तैयार रहें। लगभग 5 बजे पाबला जी अभनपुर पहुंच चुके थे। गाड़ी में सामान रखा और हमने माता जी से आशीर्वाद लेकर अपनी यात्रा प्रारंभ की।

साढे 5 बजे गिरीश पंकज जी के घर के सामने अत्याधुनिक इलेक्ट्रानिक उपकरणों से लैस हमारी कार खड़ी हुई। हार्न बजाते ही गिरीश भैया सामान लेकर बाहर आए और हम नेपाल की राजधानी काठमांडू के लिए अपने सफ़र पर चल पड़े। कार में ब्लेक बाक्स के साथ जी पी एस लगा हुआ था। जो हमें रास्ते की जानकारी दे रहा था। सभी चौक चौराहों पर रास्ता बताते हुए गंतव्य की ओर ले जा रहा था। हमारा पहला पड़ाव राबर्टसगंज था। जिसकी जानकारी जी पी एस को दे रखी थी। वह हिन्दी में मार्ग बता रहा था। हमें बिलासपुर से अम्बिकापुर होते हुए राबर्टसगंज पहुंचना था। सुबह जब घर से चले थे तो नाश्ता नहीं किया था। मालकिन ने आलू के पराठे बनाए थे जिसे दही के साथ खाने का ईरादा था। नाश्ता हमें बिलासपुर के बाद करना था। 

अरपा नदी का पुल पार करने के बाद अम्बिकापुर रोड़ लग जाता है, इस रोड़ पर छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर के साथ पाली का प्रसिद्ध शिव मंदिर भी दिखाई देता है। रास्ते में हमने कई ढाबों में रुक कर दही पूछा। लेकिन कहीं नहीं मिला। आखिर तय किया कि नाश्ता अब मेरी बहन के घर पर कटघोरा में किया जाएगा। कटघोरा से पहले ही कलचुरियों की प्रथम राजधानी तुम्मान आती है। मैने उसे फ़ोन करके 1 किलो दही मंगवाने के लिए कह दिया। लगभग साढे नौ बजे हम कटघोरा पहुंच चुके थे। वहाँ से नाश्ता करके हम आगे के सफ़र पर चल पड़े। कटघोरा से अम्बिकापुर के बीच लगभग 35 किलोमीटर की सड़क आंशिक रुप से खराब है। इस सड़क पर पिछली दुखदाई यात्रा की सोच कर दिमाग डोल रहा था। क्योंकि गड्ढे इतने अधिक थे कि तीन चक्के तो गडढों में पड़ ही जाते थे। कुछ गडढों में मिट्टी डाली जा रही थी। इस सड़क पर विश्रामपुर से कोयला लाने वाली गाड़ियाँ चलती है जिसके कारण यह सड़क खराब हो जाती है। परन्तु सड़क की हालत में कुछ सुधार दिखाई दिया। गाड़ी आराम से चल रही थी। हमें चोटिया के बाद अच्छी सड़क मिल गयी तो कुछ राहत की सांस ली। 

गाड़ी आगे बढती गई, पाबला जी मुस्तैदी से हांक रहे थे और विचारों की श्रृंखला शुरु हो गई। नेपाल जाने का मेरा कार्यक्रम सिर्फ़ 2 दिन में ही तैयार हुआ था। लगभग 15 दिन पहले गिरीश जी ने फ़ोन करके मुझसे पूछा था इस बारे में तो मैने मना कर दिया और मेरी टिकिट भोपाल के "मीडिया चौपाल" में उपस्थित रहने के लिए बन चुकी थी। दोनों कार्यक्रमों की तारीखें समान थी। इसलिए मैने भोपाल जाना ही ठीक समझा था। अंतिम दो पहले तक अनिल सौमित्र जी को मेल से उनके द्वारा मांगी गई जानकारियाँ भेजी थी। रविन्द्र प्रभात जी से बात होने और पाबला जी चर्चा होने पर पाबला जी ने कहा कि अगर कोई साथ नहीं होगा तो भी वे अकेले की कार से काठमाण्डू जाएगें। तब मैने अगले ही दिन टिकिट कैंसिल करवाई और पाबला जी को उनके साथ काठमांडू जाने का संदेश दिया। बात कुछ इस तरह से बनी।

अचानक कार्यक्रम बदलने पर मालकिन ने भी ताना मारा। जाने की तैयारी कहीं और के लिए करते हो और पहुंच कहीं और जाते हो। बस यही हो रहा था इस घुमक्कड़ के साथ। सड़क मार्ग से विदेश यात्रा करने लोभ छोड़ नहीं पा रहा था। वैसे तो सड़क मार्ग के स्वयं के साधन पर भारत में लम्बी यात्राएं की हैं मगर नेपाल को करीब से जानने और परखने का मौका पहली बार लग रहा था। साथ ही गिरीश पंकज जी जैसे वरिष्ठ के सानिध्य में यात्रा के सुखद होने की ही उम्मीद थी। माता जी पूछा था कि कौन-कौन जा रहे हैं। मैने जब पाबला जी का नाम बताया तो वे संतुष्ट हो गई। बोली - जाओ, घूम आओ। पाबला जी समझदार आदमी हैं। उन्हें भरोसा हो गया कि हम यह यात्रा निर्विघ्न पूरी कर सकते हैं।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

सामत सरना एवं टांगीनाथ ……… ललित शर्मा

बिजली विभाग का चीफ़ इंजीनियर
प्रारंभ से पढें
अम्बिकापुर से 73 किलोमीटर शंकरगढ से आगे जाने पर डीपाडीह का सामत सरना टीला आता है। हमारी गाड़ी गेट पर रुकती है। राहुल और पंकज मुझसे पहले प्रवेश करते हैं और मै थोड़ी देर पश्चात रास्ते में लगी हुई  मूर्तियों को देखते हुए आगे बढता हूँ। यहीं पर मेरी मुलाकात सामत सरना मंदिर समुह के चौकीदार जगदीश से होती  है। हँसमुख व्यकित्व का धनी जगदीश मुझे मूर्तियों के विषय में जानकारी देता है। मैं कुछ चित्र लेता हूँ। मुख्य मंदिर के समक्ष राहुल एक पंडित नुमा व्यक्ति को अपनी हस्त रेखाएं दिखा रहा था और उससे सवाल कर रहा था। राहुल की शादी के विषय में उसने बताया कि अब  के फ़ागुन में हो जाएगी। राहुल प्रसन्न भए और दस रुपया दक्षिणा किए। इनके संवादों से मेरा ध्यान भी उनकी तरफ़ चला गया।

सामत सरना मे अमित सिंह देव
खल्वाट खोपड़ी, माथे एवं गले में रोळी चंदन, हाथ में कुछ कागज-कापी, पेन के साथ दो फ़िल्मी नायिकाओं के चित्र के साथ अगरबत्ती रखे हुए था। शर्ट के साथ कटिवस्त्र धारित उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली लगा। मेरे चर्चा होने पर उसने बताया कि वह बिजली विभाग का चीफ़ इंजीनियर था, बिजली के खंभे पर चढने दौरान उसे बिजली का झटका लग गया। तब से नौकरी छोड़ दिया है। हाथ  में रखी नायिका की फ़ोटो दिखाकर कहता है कि - यह मेरी पत्नी है और यह बेटी है। दूसरी फ़ोटो को इंदिरा गांधी कह रहा था। इससे जाहिर हो गया कि उसका दिमाग फ़िरा हुआ है। फ़िरे हुए दिमागी से इस सिरफ़िरे को और भी चर्चा करने की इच्छा हो रही थी। लेकिन हमारे पास समय कम था। इसलिए अपने उद्धेश्य की ओर मुड़ गए।

गज लक्ष्मी अंकन
डीपाडीह का यह सामत सरना मंदिर समूह है। मुख्य मंदिर का द्वार अलंकरण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सिरदल के ललाट पर पद्मासन में बैठी हुई गजलक्ष्मी के साथ दोनो तरफ़ शिव का अंकन है। द्वार शाखाओं पर नदी देवी गंगा एवं यमुना का अंकन है। बांयी द्वार शाखा पर नदी देवी यमुना के साथ ही चैत्य गवाक्ष के उपर मिथुन अंकन भी दिखाई देता है। दायीं द्वार शाखा में इस स्थान पर वीणावादिका दिखाई देती है। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग एवं जलहरी खंडित है। इस मंदिर में अन्य मूर्तियां भी स्थापित हैं जिनमें नृवराह, भैरव, गौरी, ब्रह्मा, नृत्य गणेश, कार्तिकेय, महाविष्णु, महिषासुर मर्दनी प्रमुख हैं। भग्नवशेषों से प्रतीत होता है कि इन मंदिरों के अनुपम शिल्प सौंदर्य को देख कर मुसाफ़िर अपनी धड़कन भूल जाया करता होगा।

परशुधारी शिव- सामत राजा
मुख्य मंदिर के सामने बहुत सारे छोटे-छोटे शिवमंदिर हैं।  संख्या में ये लगभग 40 होगें।  मंदिर समूह के निकट ही दो नदियों (गलफ़ुल्ला एवं कन्हर) दो नदियों का संगम है। गलफ़ुल्ला नामकरण पर राहुल सिंह का कहना है कि इस नदी के जल के उपयोग से गला फ़ूलने जैसी कोई बीमारी मानव एवं पशुओं में हो जाती होगी। इसलिए गलफ़ुल्ला नाम प्रचलन में आया होगा। सामत सरना समूह परिसर में  परशुधर शिव की सबसे ऊंची प्रतिमा रखी हुई है। इसे स्थानीय जन सामत सरना राजा रहते हैं। यह प्रतिमा चतुर्भुजी है। अलंकरणो के साथ बांया पैर घुटने से टूटा हुआ है तथा दायां पैर जंघा से खंडित है। बाएं पैर के नीचे परशु दिखाई देता  है। प्रतीत होता है कि यह पैर परशु पर रखा होगा।

मुख्य मंदिर का दृश्य
किंवदंतियों से ज्ञात होता है कि सामत सरना एवं झारखंड राज्य में स्थित टांगीनाथ के मध्य युद्ध हुआ था। जिसमें सामत सरना राजा वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद सामत सरना की सभी रानियों ने परिसर में स्थित बावड़ी में डूब कर प्राण त्याग दिए। परिसर में स्थित परशुधारी शिव की प्रतिमा को स्थानीय जन सामत सरना मान कर पूजा करते हैं। सरगुजा के आदिवासी अंचल में सामत सरना एवं टांगीनाथ के विषय में जनश्रुतियाँ बिखरी पड़ी हैं। ये दोनो स्थानीय निवासियों की श्रद्धा के केन्द्र बन गए हैं। सामत सरना मंदिर के समक्ष शत लिंग स्थापित है। इसके समीप ही एक आमलक भी पड़ा है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल नंदी स्थापित है। शिल्पकार ने नंदी प्रतिमा का बहुत सुंदर निर्माण किया है।

विष्णु सिंह देव, शत लिंग एवं केयर टेकर जगदीश
जगदीश कहता है कि पहले यहाँ बहुत सारे पोखर-तालाब इत्यादि थे। अब थोड़े ही बचे हैं। ब्रह्मा की प्रतिमा पगड़ीधारी है साथ ही लिंग भी दिखाई देता है। शिल्पकार ने इस प्रतिमा को अंतिम रुप नहीं दिया है। पत्थर पर छेनी की मार के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। स्तम्भों पर मिथुन अलंकरण भी दिखाई देता है। साथ ही इस स्थान पर शतलिंग भी दिखाई देता है। खंडहरों से अनुमान होता है कि कभी यह मंदिर समूह भव्यता लिए होगा। सामत सरना समूह का अवलोकन कर हम शंकर गढ की ओर लौट चले। हमारा दोपहर का भोजन शंकर गढ के विश्राम गृह में था। शंकर गढ का विश्राम गृह अधिक पुराना नहीं है। लगभग 30 साल हुए होगें इसका निर्माण हुए। इसके केयर टेकर ने बताया कि विश्राम गृह के आरंभ से ही वह यहाँ पर पदस्थ है। भोजन करने के पश्चात हम आगे की यात्रा पूर्ण करने के लिए चल पड़े। ……… आगे पढें … जारी है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

सामत सरना डीपाडीह की ओर यायावर


बिलासपुर टेसन
यात्राएं चलते रहती हैं जीवन के साथ। जीवन भी एक यात्रा कहा जाता है। मैने देखा कि यात्राओं का कोई कारण होता है। कोई निमित्त होता है, अकारण यात्राएं भी अकारथ नहीं होती। इस यात्रा का कारण पंकज का 27 नवम्बर 2012 की रात का फ़ोन संदेश बना। शाम को पंकज का फ़ोन आता है और वह कहता है कि आज रात को नेपाल चलते हैं कार से। बहुत दिन हो गए कहीं गए। रात को और सीधे नेपाल हीं, नहीं मुझे नहीं जाना है। फ़िर कहीं भी चलिए लेकिन आज ही चलना है। कल सुबह आता हूँ उसके बाद सरगुजा चलते हैं। वहीं के स्मारकों एवं जंगल की सैर करते हैं। कई दिनों से वहां के मित्र बुला भी रहे हैं। सही मौका है उधर ही चला जाए। सरगुजा भ्रमण तय हो जाता है। अगले दिन हमें सरगुजा जाना है। यहाँ जाने का कार्यक्रम बाईक से क्वांर नवरात्रि के समय भी बन गया था। लेकिन पंकज की तरफ़ से ढिलाई होने के कारण रह गए।

सुंदरवन
सरगुजा जाना पहले भी हुआ है। लेकिन जी भर के नहीं देखा था। घने जंगलों के बीच सुरम्य वादियाँ और उतने ही स्नेही निवासी मुझे हमेशा आकृष्ट करते रहे हैं। बिलासपुर पहुंच कर पता चला कि शाम को 4 बजे चलना है। तो मुड खराब हो गया। बना बनाया प्लान चौपट। मुझे रास्ते में चैतुरगढ और कलचुरियों की प्राचीन राजधानी तुम्माण भी देखना था। वैसे नवम्बर-दिसम्बर के माह में दिन छोटे हो जाते हैं। अब 4 बजे निकलने के बाद पाली पहुंचते तक ही शाम हो जाएगी। इसके बाद तुम्माण देखना तो संभव ही नहीं है। दोनो जगहों को देखते हुए हमें रात 8 बजे तक कटघोरा के विश्रामगृह में पहुंचना था। कटघोरा पहुंचते तक अंधेरा हो चुका था। अब हमें उदयपुर तक जाना था तथा हमारा रात्रि विश्राम उदयपुर के विश्रामगृह में तय हुआ। लखनपुर के अमित सिंहदेव ने वहाँ व्यवस्था कर दी थी।

दूरियाँ बताता सूचना फ़लक

अमित सिंह देव लखनपुर ने बताया कि कटघोरा से उदयपुर की दूरी लगभग 70 किलो मीटर होगी। कटघोरा से अम्बिकापुर वाली सड़क पर पहुंच कर यह लगा कि हमने सड़क मार्ग द्वारा अम्बिकापुर जाने की बहुत बड़ी भूल कर दी। सड़क की हालत देखकर लगा कि 70 किलो मीटर का रास्ता अगर रात भर में तय हो जाए तो बहुत बड़ी बात है। सड़क कहीं है ही नहीं, सिर्फ़ गड्ढे ही गड्ढे। कहना चाहिए गड्ढों में सड़क ढूंढना भी बहुत कठिन कार्य है। छत्तीसगढ में इतनी गंदी सड़क पहली बार देखी है। ऐसा लग रहा था किसी अन्य राज्य की सीमा में प्रवेश कर गए। पता नहीं सरगुजा की इस सड़क के प्रति सरकार सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है। जब ओंखली में सिर दे ही दिया तो अब मुसल का प्रहार भी सहना पड़ेगा। मै पिछली सीट पर लेट गया, पंकज और राहुल दोनो पायलेट और नेवीगेटर की भूमिका में थे।


उदयपुर विश्राम गृह
रास्ते में भूख लगने लगी। एक ढाबा देख कर गाड़ी को किनारे लगाया और ढाबे में पहुंच गए। ढाबा छोटा ही था, लोग हिलते डुलते नजर आ रहे थे। रात का समय हो और जंगल के निवासी हिलते डुलते नजर न आएं तो समझना चाहिए कि हम वन क्षेत्र में नहीं है। आज कुछ स्पाईसी खाने का मन था। हमने भी जंगली खाने का आडर दिया। उसने कुक्कड़ बहुत बढिया बनाया।  मनवांछित भोजन मिलने के बाद आत्मा तृप्त हो गयी। अन्य सहयात्रियों ने भी खाने की तारीफ़ की। भोजन जैसा महाआयोजन सफ़ल हो गया। इससे हम भी धन्य हो गए। गाड़ी फ़िर सड़क पर आ गयी। मै पिछली सीट पर लेट गया। क्योंकि इस सड़क पर सोते हुए चलना ही ठीक है। जागते हुए तो रास्ता भी नहीं कटता। मेरी आँख 11 बजे उदयपुर रेस्ट हाऊस के मुख्यद्वार पर पहुंच कर खुली। रेस्ट हाऊस के गृह मंत्री ने गेट खोला। ठंड अच्छी थी मै बिस्तर के हवाले हो गया।

सामत सरना शिवमंदिर एवं विष्णु सिंह देव
सुबह चौकीदार लाल चाय बनवा कर ले आया। सुबह की चाय के बाद थोड़ी नींद की खुमारी उतरी। चाय के बाद रेस्ट हाऊस का एक चक्कर लगाया तो आस पास के शहरों दी दूरियाँ बताता हुअ एक सूचना फ़लक दिखाई दिया। जिसमें कटघोरा से उदयपुर की दूरी 112 किलो मीटर लिखी थी। चौकीदार गरम पानी ले आया और हम स्नानाबाद से लौटकर आगे की यात्रा के लिए तैयार हो गए। सुबह से दो बार अमित सिंह देव का फ़ोन आ गया था। हम रेस्ट हाऊस से बिना नाश्ता किए ही लखनपुर चल पड़े। अमित सिंह देव लखनपुर में रहते हैं। इनके विषय में चर्चा बाद में की  जाएगी। इन्होने अम्बिकापुर के युवा नेता विष्णु सिंह देव को साथ लिया। जायसवाल होटल में नाश्ता करके डीपा डीह की ओर चल पड़े। अम्बिकापुर से शंकरगढ 60 किलोमीटर पर एवं शंकरगढ से डीपाडीह 15 किलोमीटर पर स्थित है। डीपाडीह पुरातात्विक स्थल है, जहाँ उत्खनन कार्य राहुल सिंह के द्वारा हुआ॥

विष्णु सिंह देव, अमित सिंह देव, ललित शर्मा
लगभग 10 बजे हम डीपाडीह के लिए चले, अम्बिकापुर से डीपाडीह की सड़क अच्छी है। सड़क को देख कर हम कटघोरा से अम्बिकापुर आने का दर्द भूल चुके थे। विष्णु सिंह देव शंकरगढ जमीदारी से हैं। उन्हे इस इलाके की अच्छी जानकारी होने के कारण उनका साथ हमारे जैसे जिज्ञासु के लिए अच्छा रहा। यह सुरम्य वन आच्छादित इलाका है। डीपाडीह के सामत सरना समूह को देखने इच्छा कर दिनों से थी। कई बार जाने का प्रयास हुआ लेकिन समयाभाव के कारण सफ़लता नहीं  मिली। आज समय आ गया हमारे डीपाडीह पहुचने का। कुछ वर्षों पूर्व इस इलाके में नक्सलियों की आमद हो चुकी है। यह इलाका नक्सल प्रभावित माना जाता है। चर्चा के दौरान हम 12 बजे शंकर गढ पहुंच कर विष्णुसिंह देव के चाचा जी से मिले। उसके बाद हम डीपाडीह के सामत सरना समूह पुरातत्विक स्थल पर पहुंचे।

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सोमवार, 11 जून 2012

महेशपुर ---------- ललित शर्मा

बड़े देऊर मंदिर, के पी वर्मा,ललित शर्मा, राहुल सिंह
हम महेशपुर की ओर बढ रहे हैं, उदयपुर रेस्टहाउस से आगे जाकर दायीं तरफ़ के कच्चे रास्ते पर गाड़ी मोड़ने का आदेश मिलता है। यह रास्ता आगे चलकर एक डब्लु बी एम सड़क से जुड़ता है। थोड़ी दूर चलने पर जंगल प्रारंभ हो गया जहां सरई के वृक्ष गर्व से सीना तान कर खड़े हैं जैसे सरगुजा के वैभव का बखान कर रहे हों। सरगुजा है ही इस लायक रमणीय और मनोहारी, प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं पुरासम्पदा से भरपूर्। जिस पर हर किसी को गर्व हो सकता है। गर्मी के इस भीषण मौसम में भी सदाबहारी वृक्षों से हरियाली छाई हुई है। महुआ के वृक्षों के पत्ते लाल से अब हरे हो गए हैं। फ़ूल झरने के बाद अब फ़ल लगे हुए हैं, जिन्हे कोया, कोवा, टोरी कहते हैं। इनका तेल निकाला जाता है। तेल निकालने के बाद खल भी कई कार्यों में ली जाती है। पेड़ों पर परजीवी लताएं झूल रही हैं। जंगल का जीवन मनुष्य से लेकर वन्यप्राणियों एवं पेड़ पौधों से लेकर पशु पक्षियों तक एक दूसरे पर ही निर्भर है। कह सकते हैं कि सभी एक दूसरे पर ही आश्रित हैं। तभी जीवन गति से आगे बढ रहा है। वरना किसी की क्या बिसात है जो दो पल भी जीवन का सुख या दु:ख झेल ले। शाम होने को है, कच्ची सड़क के 5 किलोमीटर की एक पक्की सड़क आती है जो सीधे महेशपुर के पुरावशेषों तक ले जाती है। कुल मिलाकर उदयपुर से महेशपुर की दूरी 12 किलोमीटर है।

मंदिर की ताराकृति प्रस्तर जगती
महेशपुर रेण नदी के तट पर बसा है, यह क्षेत्र में 8 वीं सदी से लेकर 11 वीं सदी के मध्य कला एवं संस्कृति से अदभुत रुप से समृद्ध हुआ। इस काल के स्थापत्य कला के भग्नावेश महेशपुर में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। उपलब्ध पुरासम्पदा की दृष्टि से महेशपुर महत्वपूर्ण पुरातत्वीय स्थल है। यहाँ शैव, वैष्णव एवं जैन धर्म से संबंधित पुरावशेष मिलते हैं। रियासत कालीन प्रकाशित पुस्तकों में महेशपुर प्राचीन स्थल एवं शैव धर्म के आस्था स्थल के रुप में उल्लेखित है।अभी भी कई बड़े टीलों का उत्खनन होना है। जिससे इस स्थान  के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलेगी तथा इसका इतिहास प्रकाश में आएगा। सड़क मार्ग से जुड़ा यह पुरास्थल अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर है। इस रास्ते से ही भगवान राम का दण्डकारण्य में आगमन हुआ और उन्होन वनवास का महत्वपूर्ण समय यहाँ पर व्यतीत किया। दण्डकारण्य सरगुजा के लेकर भद्राचलम तक के भू-भाग को कहा जाता है। जनश्रुति के अनुसार जमदग्नि ॠषि की पत्नी रेणुका ही इस स्थान पर रेण नदी के रुप में प्रवाहित है। रेण नदी का उद्गम मतरिंगा पहाड़ है और यह अपने आंचल में प्रागैतिहासिक काल से लेकर इतिहास के पुरावशेषों को समेटे हुए है।

विध्वंस कथा:विशाल वृक्ष की जड़ में फ़ंसा मंदिर का आमलक
हमारी कार सबसे पहले बड़का देऊर कहे जाने वाले शिव मंदिर के सामने रुकती है। सन 2008 में पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग छत्तीसगढ द्वारा पुराविद जी एल रायकवार के निर्देशन में यहाँ उत्खनन प्रारंभ हुआ। उत्खनन से विभिन मंदिरों की संरचनाएं सामने आई और दक्षिण कोसल की एतिहासिक शिल्पकला प्रकाश में आई। हम शिव मंदिर का निरीक्षण करते हैं, मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है। पत्थरों से बनी ऊंची जगती पर स्थापित यह मंदिर ताराकृति में बना हुआ है। पुराविद कहते हैं कि ताराकृति मंदिर की बनावट बहुत कम देखने मिलती है। शिल्पकारों के बनाए नाप जोख के निशान अभी भी पत्थरों पर निर्माण की मूक कहानी कहते हैं। हम मंदिर की जगती के चारों तरफ़ घूम कर देखते हैं। मंदिर का सिंह द्वार पश्चिम की ओर है अर्थात मंदिर पश्चिमाभिमुख है। आस-पास मंदिरों के प्रस्तर भग्नावेश बिखरे पड़े हैं। मंदिर की पश्चिम दिशा में रेण नदी प्रवाहित होती है। मंदिर के प्रांगण में सैकड़ो वर्ष पुराने वृक्ष इन मंदिरों की तबाही की गाथा स्वयं कहते हैं। किसी कारण वश जब इनकी मंदिरों की देख रेख नहीं हो रही होगी तब इन वृक्षों की जड़ों ने मंदिरों को तबाह किया। 

वामन और राजा बली
यहाँ से हम आगे चल कर दायीं तरफ़ स्थित टीले की ओर जाते हैं वहाँ सैकड़ो प्रस्तर मूर्तियाँ खुले में रखी हुई हैं। जिन्हे देख कर महेशपुर के वैभवशाली अतीत की एक झलक मिलती है। हमने मुर्तियों के चित्र लिए तथा बायीं तरफ़ स्थित मंदिरों की देखने गए। यहां भी सैकड़ों मुर्तियां एवं मंदिरों के विशाल आमलक पड़े हैं। एक आमलक तो वृक्ष की विशाल जड़ में फ़ंसा हुआ दिखाई दिया। मंदिरों की जगती एवं दीवारों को अपनी जड़ों से जकड़े विशाल वृक्ष खड़े हैं। कुछ टीलों का पुरातत्व विभाग ने उत्खनन कर मुर्तियों को बाहर निकाला है। अभी भी सैकड़ों टीले कई किलोमीटर में जंगल के भीतर फ़ैले हुए हैं जिनका उत्खनन करना बाकी है। इन मंदिरों को त्रिपुरी कलचुरी काल में निर्मित बताया गया है। त्रिपुरी कलचुरी राजाओं की राजधानी जबलपुर में स्थित थी। महेशपुर की विशालता से पता चलता है कि यहां तीर्थयात्री आते थे तथा यह स्थान दंडकारण्य में प्रवेश करने का द्वार रहा होगा। यहीं से होकर यात्री रतनपुर एवं रायपुर ओर बढते होगें।

आदिनाथ
इस स्थल के पास से आदिनाथ की प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुई है। पुराविद कहते हैं कि आदिनाथ की यह प्रतिमा कहीं अन्य टीले से लाकर यहाँ रखी गयी होगी। इस स्थल पर रखी हुई मूर्तियों में विष्णु, वराह, वामन, सू्र्य, नरसिंह, उमा महेश्वर, नायिकाएं एवं कृष्ण लीला से संबंधित मूर्तियां प्रमुख हैं। इस स्थान से 10 वीं सदी ईसवीं का भग्न शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। उत्खनन से प्रागैतिहासिक काल के कठोर पाषाण से निर्मित धारदार एवं नुकीले उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। उत्खनन से महेशपुर की कला संपदा का कुछ अंश ही प्रकाश में आया है। महेशपुर की प्राचीनता का प्रमाण प्राचीन टीलों, आवसीय भू-भागों, तथा सरोवरों के रुप में वनांचल में 2 किलोमीटर तक फ़ैले हैं। महेशपुर की शिल्पकला को देखकर दृष्टिगोचर होता है कि वह समय शिल्पकला के उत्कर्ष दृष्टि से स्वर्णयुग रहा होगा। महेशपुर से उत्खनन में प्राप्त दुर्लभ शिल्प कलाकृतियाँ हमारी धरोहर हैं। इन्हे संरक्षित करना सिर्फ़ शासन का ही नहीं नागरिकों का कर्तव्य भी है। इस स्थान को देख कर मन रोमांचित होकर कल्पना में डूब गया कि आज से हजारों वर्ष पूर्व यह स्थल भारत के मानचित्र में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता होगा। जो आज खंडहरों में विभक्त हो धराशायी होकर मिट्टी के टीलों में दबा पड़ा है।

नृसिंह  
महेशपुर के विषय में शोध होना अभी बाकी है। यहां के मंदिरों एवं भवनों का निर्माण कराने वालों के नाम उल्लेख अभी प्रकाश में नहीं आया है। निर्माणकर्ताओं का नाम प्रकाश में आने के पश्चात छत्तीसगढ की गौरवमयी विरासत में एक कड़ी और जुड़ जाएगी। मंदिर के समीप ही उत्खनन में प्राप्त प्रतिमाओं एवं सामग्री को रखने के लिए संग्रहालय का निर्माण अपने अंतिम चरण में है। संग्रहालय की छत टीन की चद्दरों की है, चौकीदार ने बताया कि बिजली लगने पर संग्रहालय में प्रतिमाएं रख दी जाएगीं जिससे प्रतिमाओं का क्षरण एवं चोरियाँ न हो। मूर्ती तस्करों निगाह खुले में पड़ी मूर्तियों पर रहती है। जिसे चोरी करके वे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़ी कीमत में बेचते हैं। सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा है, आदिनाथ टीले के पार्श्व में बने एक मकान में फ़लदान (सगाई) का कार्यक्रम चल रहा है। सगे-संबंधी महुआ रस के साथ नए संबंधों के जुड़ने का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हैं। खंडहर हुए महेशपुर में भी कभी ढोल नगाड़े बजते होगें तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, पथिकों की चहल-पहल रहती होगी। दुकाने एवं बाजार सजते होगें। वर्तमान दशा को देखकर लगता है कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। चाहे बनाने वाले ने कितना ही मजबुत और विशाल निर्माण क्यों न किया हो? हम समय के साथ अपने आश्रय स्थल पर पहुचने के लिए चल पड़ते है।