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मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

इहै नगरिया तू देख बबुआ …………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
प्राचीन राजधानी श्रीपुर के अवशेषों को देखने पर्यटक आते हैं, जरा चर्चा वर्तमान सिरपुर गाँव की भी कर ली जाए। प्राचीन राजधानी के वैभव को तो मैने देखा नहीं परन्तु उसके खंडहरों को देखकर उसके वैभव एवं महत्ता को महसूस किया है। वर्तमान में सिरपुर ग्लोब पर 21.40’51.13 उत्तर एवं 82.10’54.07 पूर्व में रायपुर से 81 किलोमीटर की दूरी पर महासमुंद तहसील, जनपद एवं जिलान्तर्गत आता है। इसका थाना क्षेत्र तुमगाँव है। सिरपुर के ढाई किलो मीटर पर नैनी नाला, 7 किलोमीटर पर मखमल्ला एवं खरखर नाला, 8 किलोमीटर पर धसकुड़ नाला एवं 12 किलोमीटर पर सुकलई नाला है। ये नाले महानदी में जाकर मिलते हैं। सुकलई नाला महासमुंद एवं बलौदाबाजार जिले की सीमा रेखा है।
महानदी के तीर सिरपुर एवं रायकेरा  तालाब 
पुष्पा बाई यादव सिरपुर ग्राम पंचायत की सरपंच एवं शंकर ध्रुव उपसरपंच हैं। सेनकपाट एवं खमतराई सिरपुर ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम हैं। 20 वार्डों में विभाजित इस पंचायत में लगभग 1700 मतदाता एवं 200 घर है। जिनमें 50% गोंड़ आदिवासी 30% कवंर एवं अन्य 20% में ब्राह्मण, राजपुत, चंद्राकर (कुर्मी) सतनामी, मोची, नाई, यादव, धीवर, निषाद, गिरी-पुरी आदि निवास करते हैं। यहाँ के 50% निवासी कृषक और 50% सरकारी कर्मचारी हैं।आस-पास के गाँवों का केन्द्र होने के कारण कर्मचारियों ने सिरपुर में निवास करना उपयुक्त समझा। ऐसा कोई घर नहीं है जिसमें किराएदार न बसे हों।
सिरपुर विहंगम दृश्य 
समीप के गाँवों अमलोर, पासिद, सुकुलबाय, लंहगर, बोरिद आदि का मुख्य बाजार सिरपुर ही है। यहाँ धान की खेती के साथ सब्जी का भी व्यवसाय बड़ी मात्रा में होता है। साप्ताहिक बाजार गुरुवार को भरता है जिसमें समीपस्थ गाँवों के निवासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की साप्ताहिक खरीदी खरीदी करते हैं। सिरपुर के मुख्य चौराहे पर 3 होटल हैं जिनमें जलपान की व्यवस्था है। विश्राम गृह के समीप सोनवानी होटल में दोपहर एवं रात का खाना उपलब्ध हो जाता है। ग्रामीण आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए 2 मेडिकल स्टोर्स, 4 किराना दुकान, 3 कपड़ा दुकान, गाड़ी का पंचर बनाने की 2 दुकान, मोटर सायकिल मेकेनिक 2, इलेक्ट्रिकल दुकान 3 मोबाईल शॉप 4 एवं 2 फ़ोटो स्टुडियो, पैट्रोल पंप भी हैं। इस तरह आवश्यकता की समस्त सामग्री एवं सहायता सिरपुर में उपलब्ध है।
सिरपुर का रास्ता 
शैक्षणिक दृष्टि से सिरपुर के निवासियो ने अधिक तरक्की नहीं की है। विद्युत विभाग के इकलौते जुनियर इंजीनियर के अतिरिक्त कोई भी अधिकारी नहीं बन पाया। वन विभाग, पुलिस विभाग, शिक्षा विभाग में कुछ लोग सेवारत हैं। शिक्षा के साधन के रुप में 2 प्राथमिक सहशिक्षा स्कूल, 1 कन्या माध्यमिक शाला, 1 बालक माध्यमिक शाला, 1 सहशिक्षा हायरसेकेंडरी स्कूल, 1 आदिम जाति कल्याण विभाग का आश्रम एवं गुड शेफ़र्ड नामक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी है। अंग्रेजी माध्यम का स्कूल होने का अर्थ है कि सिरपुर के निवासी अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का महत्व समझ रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर उप स्वास्थ्य केंद्र, आर्युवैदिक औषधालय है। यहाँ छोटी-मोटी बीमारी  का ईलाज हो जाता है। गंभीर बीमारी होने पर रायपुर या महासमुंद ही एक मात्र विकल्प है। पशुओं की चिकित्सा एवं कृत्रिम गर्भाधान के लिए पशुचिकित्सालय की व्यवस्थित है। पर्यटकों के लिए सूचना केंद्र है जिससे छत्तीसगढ पर्यटन के होटल, मोटल, एवं रिसोर्ट बुक किए जाते हैं और पर्यटन संबंधी सूचनाएं दी जाती हैं।
महानदी के तीर प्राचीन आश्रम 
सिरपुर में सरकारी कार्यालय के नाम पर ग्रामीण बैंक, सहकारी समिति, पुलिस चौकी, विद्युत सब स्टेशन, लकड़ी डीपो, पटवारी निवास, फ़ारेस्टर का निवास है। इसके अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए महासमुंद जाना पड़ता है। पर्यटकों एवं ग्रामीणों के मनोरंजन की सुविधा के लिए अंग्रेजी एवं देशी शराब के ठेके भी हैं। विडम्बना है कि शराब ठेके गाँव के मध्य में स्थित हैं और पुलिस चौकी गाँव की सीमा के बाहर। यात्रियों के निवास के लिए पीडब्लुडी का एक मात्र विश्राम गृह है। जिसके आरक्षण के लिए महासमुंद उप जिलाधीश या संबंधित विभाग के उच्चाधिकारियों से समपर्क करना पड़ता है। वर्तमान में पर्यटन मंडल द्वारा एक रिसोर्ट का निर्माण कराया जा रहा है। जो कि रिहायश से बाहर है। आवगमन की सुविधा के लिए सड़कों की  हालत बढिया है और स्कूल के खेल मैदान में एक हैलीपैड स्थित है। जिस पर विशिष्ट लोगों के आगमन हेलीकाप्टर उतारा जाता है।
हेलीपेड 
ग्राम विकास एवं पुरासामग्री की चोरी रोकने के लिए सिरपुर प्रवेश द्वार पर नाका लगाया गया है। फ़िर भी मूर्तियाँ चोरी होने की घटना हो चुकी है। नाके में प्रति 4 चक्के एवं उससे बड़ी गाड़ी के आगमन पर 10 रुपए टैक्स लिया जाता है तथा गाड़ी का नम्बर रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इससे पता चल जाता है कि कितनी गाड़ियाँ सिरपुर में प्रतिदिन आ रही  हैं। ग्रामवासी  कहते हैं कि विद्युत व्यवस्था में ही समस्या है। बिजली कब चली जाए और आ जाए इसका पता नहीं चलता। यह भी विडम्बना है कि जितने दिन मैंने सिरपुर में निवास किया कभी बिजली नहीं गयी। पैट्रोल-डीजल भी कभी उपलब्ध रहता है कभी नहीं। उपलब्धता की निरंतरता नहीं  है। ऐसी स्थिति में स्थानीय दुकानदारों से अधिक मूल्य पर खरीदना पड़ता है।
सिरपुर के घोंघा बसंत 
माघ माह की पूर्णमासी को सिरपुर में मेला लगता है तथा तीन दिवसीय शासकीय कार्यक्रम "सिरपुर महोत्सव"  मनाया जाता है। मेले के दौरान सभी जाति समाजों के लोग जुटते हैं और अपनी जातिय समस्याओं का बैठक करके हल निकालते हैं। सिरपुर धर्म की ही  नगरी है। यहाँ वर्तमान में लगभग सभी समाजों के अपने मंदिर एवं धर्मशालाएं हैं। जिनमें पटेल मरार समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कोसरिया यादव समाज का कृष्ण मंदिर एवं दुर्गा मंदिर, कोसरिया पटेल समाज का दुर्गा मंदिर, निषाद समाज का राम जानकी मंदिर, बेलदार समाज का रामजानकी मंदिर, कंवर समाज का रामजानकी मंदिर, धीवर समाज  का रामेश्वर शिव मंदिर, सेन समाज का राधाकृष्ण मंदिर, सतनामी समाज की गुरु घासीदास की गद्दी, झेरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कबीर पंथियों की कबीर कुटी, वैष्णव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, साहू समाज का कर्मा मंदिर, गोंड़ समाज का प्राचीन शिव मंदिर, समलेश्वरी मंदिर एवं 2 जगन्नाथ मंदिर, रविदास मंदिर(मेला स्थल), चंडी मंदिर (गंधेश्वर महादेव मंदिर के समीप) दुर्गा मंदिर (सुरंग टीला से विस्थापित) भी हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय ग्रामदेवता के रुप में  महामाया, शीतला, ठाकुरदेव, सांहड़ादेव भी हैं।
 रायकेरा  तालाब 
सिरपुर में तालाबों की भरमार है, शायद ही कोई ऐसा प्राचीन मंदिर हो जिसके समीप पोखरी या तालाब नहीं है।  निस्तारी के  लिए नित्य उपयोग में आने वाले प्रमुख तालाब रायकेरा बंधवा एवं कमार डेरा तरिया हैं। रायकेरा बंधवा के विषय में जन श्रुति है कि प्राचीन काल में एक साधु था, उसके पास एक गाय थी। साधु ने स्थानीय चरवाहे को गाय चराने के लिए दी। एक दिन साधु ने चरवाहे की सेवा से उसे प्रसन्न होकर एक पत्थर दिया। चरवाहा में पत्थर तो ले लिया पर मन-मन साधु को कोसने लगा कि बरसों की सेवा के दिया तो एक पत्थर। चरवाहे सोचा कि इस पत्थर का क्या किया जाए। उसने रायकेरा तालाब में जाकर पत्थर से अपनी कुल्हाड़ी मांजा और पत्थर तालाब में फ़ेंक दिया। जब चरवाहा घर पहुंचा और कांधे से कुल्हाड़ी उतारी तो देखा वह सोने की हो गयी थी। वहा आश्चर्य चकित रह गया और अपने भाग को कोसने लगा।
महानदी के तीर पर ब्लॉगर मंडली राजीव रंजन, ललित शर्मा एवं आदित्य सिंह
उसने तालाब में जाकर खूब डुबकियाँ लगाई पर वह पत्थर नहीं मिला। यह जानकारी गाँव से प्रारंभ होकर राजा तक पहुंची। राजा के मन में पारस पत्थर प्राप्त करने के लिए लोभ जागृत हो गया। एक पारस पत्थर राजा की दशा सुधार सकता था और उसके सेना समेत राज्य को बना सकता था। यही सोच कर राजा ने चरवाहे को बुलाकर सत्यता की जाँच की। चरवाहे सारी घटना का वर्णन राजा से किया। राजा ने हाथी के पैर में लोहे की जंजीर बांध कर तालाब में घुमाने का आदेश दिया। हाथी सारे दिन तालाब को मथता रहा। शाम को जब उसे तालाब से बाहर निकाला गया तो उस लोहे  की जंजीर की एक कड़ी सोने की हो गयी थी। उसके बाद से किंवदंती चल रही है कि रायकेरा तालाब में पारस पत्थर है। यह वर्तमान सिरपुर है। जारी है … आगे पढे।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

अमरकंटक की ओर यायावर ………… ललित शर्मा

रेल के यात्री
मालकिन कई दिनों से मायके जाने की कह रही थी। वैसे इनका मायके जाना 30 अप्रेल के बाद तय है। अब मई के प्रथम सप्ताह में ही कोई तारीख तय होती है जाने की। इस समय 6 मई की तारीख तय हुई। 4 मई को नामदेव जी ने फ़ोन करके बताया कि अमरकंटक चलना है। वहाँ कोई धार्मिक कार्यक्रम है। हमने मालकिन से कहा कि उन्हे भाटापारा पहुंचाते हुए चले जाएगें। संवाद होते रहा, पर कैसे जाना है यह तय नहीं हुआ। आखिर सालिगराम जी के फ़ोन से तय हुआ कि दोपहर को एक नयी पैसेंजर चली है। उससे ही आना ठीक रहेगा। 6 मई को हम दोपहर 1 बजे की ट्रेन में इन्हे बैठाने रायपुर स्टेशन पहुंचे। तभी नामदेव जी ने बताया कि शाम को 5 बजे अमरकंटक चलेगें। मैने उन्हे घर से कपड़े और दैनिक उपयोग की सामग्री साथ लेने कहा और रायपुर में उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा।

रेल्वे क्रासिंग
शाम 5 बजे नामदेव जी रायपुर पहुंच गए। साथ में उनके अग्रज और मदन लाल साहू भी थे। हम चलने के लिए कारारुढ हुए। बैग के विषय में पूछा तो उन्होने कहा कि अम्मा से मांग कर ले आए हैं। मैने पीछे रखा हुआ बैग देखा तो माथा खराब हो गया। वह बैग तो मेरे दैनिक उपयोग की सामग्री के साथ रहने वाला था। उसमें पेन-पैड छोड़ कर कुछ भी नहीं था। मैने जाने से मना कर दिया। नहीं जाऊंगा अब तीन-चार दिन बिना कपड़ों के एक ही जोड़ी में गुजारा नहीं हो पाएगा और इस तरह का वाकया पहली बार हुआ है मेरे साथ। मदन लाल साहू ने सफ़ाई दी कि अम्मा से बैग मांगने पर उन्होने यही दिया है। अरे कम से कम इतना तो स्वविवेक होना चाहिए कि 3-4 दिन के लिए जा रहे हैं तो बैग में कपड़े तो होने चाहिए। अब कपड़े लेने अभनपुर आते तो एक घंटे का फ़टका लग जाता। मैने जाने से मना कर दिया और कहा कि-जहां से मुझे लिया है वहीं छोड़ दो। आप लोग जाईए, मुझे नहीं जाना है। 

लल्लन प्रसाद नामदेव जी (साबरमती आश्रम गुजरात)
नामदेव जी कहने लगे कि कार तो आपके कहने से ही लाए हैं। नहीं तो हम ट्रेन से ही चले जाते। चलिए दैनिक उपयोग के कपड़े वहीं ले लेगें। नाराज काहे होते है भाई, छोटी-मोटी चूक हो जाती है। इनकी सलाह जंच गयी, हमने सोचा कि एक बार ऐसी भी यायावरी का तजुर्बा ले लिया, चला जाए बिना किसी तैयारी के। आज बुद्ध पूर्णिमा भी थी।  हमने एक बार फ़िर कार मोड़ कर रास्ते पर डाल ली। अब याद आया कि हमारी गोली दवाई भी नहीं है और मुझे उनका नाम भी याद नहीं है। डॉ सत्यजीत को फ़ोन लगाया तो उसने फ़ोन नहीं उठाया। हम क्लिनिक के पास के मेडिकल स्टोर्स में पहुंचे कि उसे तो याद होगा क्या दवाई मै लेकर जाता हूँ उसे भी नाम याद नहीं था। येल्लो लग गयी वाट्। तभी याद आया कि मेरे बैग में दवाईयों की पर्ची पड़ी है। बस काम बन गया। दवाईयों की पर्ची से दवाई खरीदी, अब जाना पुख्ता हो गया। हम अमरकंटक की ओर चल पड़े। आशा थी कि रात तक अमरकंटक पहुंच जाएगें।

पंकज सिंह और लेखक अयोध्या के होटल में 
सड़क मार्ग से रायपुर से बिलासपुर 110 किलीमीटर की दूरी पर है, एक्सप्रेस ट्रेन से 36 रुपए की दूरी पर। बिलासपुर से पेंड्रा रोड़ होते हुए अमरकंटक 120 किलीमीटर पर है। कुल मिला कर हमें 230 किलोमीटर की दूरी तय करनी थी। रायपुर से 45 किलोमीटर सिमगा पहुंचने पर भूख लगने लगी। क्योंकि आज दोपहर में भी भोजन नहीं किया था। मारी बिस्किट से ही काम चलाना पड़ा। डॉ ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि खाने पीने में कोताही नहीं बरतना अन्यथा भ्रमण छोड़ कर घर पर ही मौज करिए। क्योंकि 2 मई को शुगर का लेबल मीटर की सुईयाँ तोड़ कर HI बोल चुका था। हमने खाने-पीने में कोताही नहीं बरतने का वादा किया। तब कहीं जाकर उसने बाहर जाने की इजाजत दी। अब मामला कंट्रोल में था। सिमगा पहुंच कर हमने तरबूज लिए। बाकियों ने कुछ अड़बड़गम नाश्ता किया। हमने चलती कार में ही तरबूज उदरस्थ किए। बिलासपुर पहुंचने पर अंधेरा हो चुका था। पंकज के घर पर पहुंचने तक 8 बज चुके थे।

तुलसी बाबा
पंकज के यहाँ मैने एक गिलास लस्सी पी और बाकियों ने चाय। पंकज आज ही छत्तीसगढ पीएससी का एक्जाम देकर आया था और किसी एक्जाम की तैयारी में लगा था। हम थोडी देर के बाद बिलासपुर से अमरकंटक की ओर निकल लिए। अंधेरा गहराता जा रहा था साथ ही हमें अचानकमार का जंगल भी पार करना था। इस जंगल की सर्पिली सड़कों पर रात को गाड़ी संभाल कर चलानी पड़ती है। इस जंगल में शेर की उपस्थिति भी देखी जा चुकी है। अचानकमार जंगल के प्रारंभ होने पर फ़ारेस्ट के नाके में जानकारी देनी पड़ती है। ड्रायवर एवं गाड़ी मालिक सहित जाने का सबब भी बताना पड़ता है। फ़िर इस गेट पर एक टोकन दिया जाता है। जिसे अंतिम  निकासी गेट पर देना पड़ता है। तब कहीं जाकर इस जंगल की यात्रा सम्पूर्ण होती है। टोकन का सिस्टम अभी शुरु हुआ है, पहले नहीं था। हमने भी यही प्रक्रिया अपनाई। जंगल में जिस नाले के पास शेर देखा गया वहीं पर हम गाड़ी से बाहर निकले। हो सकता है हमारी किस्मत में भी देखना लिखा हो। 

बुद्ध पूर्णिमा का चाँद
चाँदनी रात थी, और खास बात यह थी कि आज के दिन ही बुद्ध पूर्णिमा का चाँद पृथ्वी के सबसे समीप था। इसलिए बड़ा दिखाई दे रहा था। याद आया, इस आशय की एक पोस्ट संगीता जी ने लगाई थी। मैने संगीता पुरी जी से रास्ते में चर्चा भी की थी। चाँद की रोशनी में नदी बड़ी सुंदर दिखाई दे रही थी। पानी कम ही था, पर जंगली जानवरों की निस्तारी के लिहाज से काफ़ी था। वरना गर्मी में पानी कहाँ मिलता है? सभी नदी-नाले सूख जाते हैं। शेर या अन्य कोई जानवर नहीं दिखने पर हम आगे बढते हैं। जंगल के भीतर के गावों में बिजली नहीं है। अभ्यारण्य घोषित होने के कारण यहाँ कुछ भी निर्माण नहीं किया जा सकता। सोलर लाईट गांव में चमक रही थी। पहले तो सड़क के किनारे कई लाईटें लगी थी। पर अब दो चार ही जल रही थी। पहले हमने जिस छोटे से होटल में चाय पी थी अब वह बंद मिला। यहाँ मौसम में ठंडक आ जाती  है। वैसे भी अमरकंटक का मौसम गर्मी के दिनों में खुशनुमा हो जाता है।

रामसजीवन चौरसिया
रास्ते में पता चला कि हमारे परम सखा आर एस चौरसिया (जिन्हे मैं स्वामी जी कहकर संबोधित करता हूँ) रींवा से सीधे ही अमरकंटक पहुंच रहे हैं। रात को उन्होने मृत्युंजय आश्रम में रुम बुक करवा रखा है। हम रात 12 बजे के लगभग अमरकंटक पहुंचे। मृत्युंजय आश्रम में दरवाजा खटखटाने पर भी किसी ने नहीं खोला। हमने स्वामी जी को फ़ोन करके जगाया। पर चौकीदार ने उनकी भी नहीं मानी। कहा कि 10 बजे के बाद आश्रम का गेट किसी के लिए नहीं खुलता। मरते क्या न करते। नामदेव जी सामने स्थित गुरु जी के आश्रम में चले गए। उन्होनें वहीं सोने का जुगाड़ लगाया । हाँ! एक खास बात देखने मिली कि अमरकंटक में नर्मदा जी के किनारे एक भी मच्छर नहीं था। रामघाट पर हमने गाड़ी लगाई और कार में ही सीट लम्बी करके सो गए। दो-चार घंटे की ही तो रात काटनी थी। सुबह आश्रम गेट खुल जाना था।  …… यात्रा जारी है…… आगे पढें

शनिवार, 9 जुलाई 2011

भोले बाबा के भोले भक्त -- ललित शर्मा

बाबा की नगरिया (बैद्यनाथ धाम) पहुंचने की तैयारियाँ जोर शोर से चल रही हैं, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी बाबा के दर्शनों के लिए लालायित हैं। इस वर्ष मेरा टाईम टेबल कुछ गड़बड़ होने के कारण पहुंचना मुश्किल लगता है। सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर तक का सफ़र रोमांचकता से भरपुर होने के कारण आनंददायी है। जो एक बार जाता है वह बार-बार जाना चाहेगा। यात्रा में जाने के लिए मीनु के साथ न्यौता मुझे मिला। कांवरिए दो महीने पहले से तैयारी कर लेते हैं पूरे रास्ते की। एक बानगी देखिए।
बोलबम यात्रा मीनू चार्ट

17/7/11---सुबह - 8 बजे स्टेशन में:- चाय, बिस्किट, सूप
आरंभ से क्युल तक :- पेप्सी, सेवनअप, लिची ज्युस,सेब ज्युस, मठा, नमकीन बिस्किट, काजू, बादाम, पिस्ता, हल्दीराम भुजिया, कुरकुरे नमकीन्।
9 बजे बिलासपुर में नास्ता :- 2 मलाई चाप, 1 कटलेट, 1 ढोकला, 1सेंडविच, 1 भुजिया ।
11/30 को रायगढ में दोपहर का खाना:- 1 मीठा, 1 दही बड़ा, 2 सब्जी (पनीर मसाला, मिक्स वेज), सादी रोटी, मेसी रोटी, पापड़ एवं सलाद
दोपहर 2 बजे:- राउरकेला स्टेशन में :- फ़ल, आईसक्रीम, मुसंबी ज्युस।
4 बजे चक्रधरपुर स्टेशन में :-  नास्ता, चाय, मीठा, नमकीन
6 बजे टाटा स्टेशन में :- 2 मीठा, दहीबड़ा, तन्दूरी रोटी, नान रोटी, पुलाव, दाल, मिक्सवेज, मलाई कोफ़्ता
रात 9 बजे पुरुलिया स्टेशन में :- केशर दूध।

18/8/11 सुबह 5 बजे क्युल स्टेशन में :-  सुबह का नाश्ता
सुल्तान गंज स्टेशन में :-  दोपहर :-  धर्मशाला में खाना
असरगंज में रात का खाना :- दाल-चावल, कढी, सब्जी में-फ़ूलगोभी, भिंडी, सादी रोटी, मेथी, पापड़, सलाद, अचार (केशर दूध)

19/8/11 सरकारी धर्मशाला :-  छोले भटूरे, केसर जलेबी, पूलाव, मठा, लस्सी
चंदन मोड़ रात में :-  चावल, सादी रोटी, सब्जी, पापड़, सलाद, गुलाब जामुन, केशर दूध

20/8/11 शिवलोक दोपहर खाना :-  बादाम का हलवा, पकोड़ी (मुंग दाल) मसाला कचोड़ी, आलू की सब्जी, हरी चटनी।
रात्रि का खाना:-  चावल,रोटी, सब्जी, कढी, पापड़, सलाद, मुंगदाल का हलवा, केशर दूध
21/8/11 धर्मशाला में - खीर-पुड़ी, सब्जी,पुलाव
झारखंड गेट में रात्रि भोजन :-  चावल, सादी रोटी और मेसी रोटी, सब्जी पापड़, रसगुल्ला

22/8/11 बाबाधाम बिहार गेस्ट हाउस :-  सुबह का नास्ता, पोहा, गुलाब जामुन, हल्दीराम का सेव
दोपहर एवं रात में सादा खाना

23/8/11 सुबह नास्ता:- कटलेट,मलाईचाप, खीर मोहन, हल्दीराम का भुजिया, सेंडविच, चाय बिस्किट
दोपहर में:- दाल-बाटी-चूरमा, चाव-दाल-सब्जी
रात में :-  पुलाव, पूरी, आलू की सब्जी, रमकेलिया की सब्जी

वापसी

24/8/11 को सुबह 8 बजे टाटा स्टेशन में :-  2 कटलेट, ढोकला, समोसा, मीठा, भुजिया, सेंडविच
11 बजे राउरकेला में दोपहर का खाना :- 2 मीठा, सादा रोटी, मेथी रोटी, चावल-दाल, पापड़ सलाद, रायता
3 बजे रायगढ स्टेशन में शाम का नास्ता :- पकोड़ी, चाय-बिस्किट, मीठा
रात 6 बजे बिलासपुर में :- काफ़ी बिस्किट
रात 7 बजे यात्रा सम्पन्न।

जय भोले बाबा के भक्तों की। भोलेपन में ही कितना वजन बढा लिया एक हफ़्ते में इस खान-पान यात्रा में भक्तों ने। :)

NH-30 सड़क गंगा की सैर