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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है

नुष्य सब कुछ साध लेता है पर प्रकृति को नहीं साध पाया। वह अपनी मन मर्जी से चलती है, कहीं धूप कहीं छाया, कहीं बारिश कहीं सर्दी। सफ़र पर निकलने से पहले सोचता हूँ कि सामान कम हो, क्योंकि सामान का बोझ मुझे ही उठाना है। पीठ पर जितना सामान कम होगा, सफ़र उतनी आसानी से तय होगा। यदि 2 कपड़ों  में काम चल जाए तो एक ही रखना पसंद करुंगा। नवम्बर-दिसम्बर में उत्तर भारत में कड़ाके ठंड पड़ने लगती है। रेगिस्तानी इलाके में रात ठंडी होने से रेत ठंडा हो जाता है और ठंड बढ जाती है। गुलाबी होती हुई ठंड लाल होकर जला देने की क्षमता प्राप्त कर लेती है। जब ढेर सारे गर्म कपड़े लेकर जाता हूँ तो उनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती और जब ठंड के कपड़े कम रखता हूँ तो जान लेवा ठंड का सामना करना पड़ता है। इस तरह के मौसम घुमक्कड़ी में आड़े आते हैं। अबकि बार गर्म ओव्हर कोट रख लिया, जो किसी रजाई से कम नहीं है। पहनकर सोने पर ओढने की जरुरत नहीं पड़गी।
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डिस्पले पर गाड़ी का नम्बर और कोच नम्बर दिखाई देने लगा, वरना आधे घंटे से मरणासन्न पड़ा हूआ था। अपना सामान उठा कर निर्धारित स्थान पर ले आया और स्तम्भ के सहारे टिक कर बैठ गया। साथ ही एक अधेड़ महिला पुरुष का जोड़ा भी बैठा हुआ था। तभी करीना कपूर जैसी जीरो साईज वाला लड़का आ पहुंचा, उसने महिला और पुरुष का चरण स्पर्श किया तथा भृकूटी एवं हाथ संचालित करते हुए उनसे बात करने लगा। हर शब्द पर उसकी भाव भंगिमा बदल जाती थी। होठों से अधिक सैन से बातें कर रहा था। गजब के संकेत दिखाई दे रहे थे उसके चेहरे पर मुख मुद्रा के साथ। लगा कि उसमें स्त्री आत्मा का प्रतिशत कुछ अधिक है, हारमोनल बैलेंस बिगड़ गया। उसकी मम्मी ध्यान से सुन कर उसे घर जाने की हिदायत दे रही थी। वो भी बेचारी क्या करे, बेटी जैसा बेटा जनने की तकलीफ़ तो उठानी पड़ेगी। बाप सिर झुकाए शायद सोच रहा था कि वह कौन सी घड़ी थी, जब दुर्घटनावश गर्भाधान हुआ होगा।
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प्लेटफ़ार्म का डिस्पले नम्बर बदल गया। जहाँ बैठे थे वहाँ से एक फ़र्लांग दूर हमारा डिब्बा लगेगा। क्या करते हम? अपना सामान लादे पहुंच गए नियत डिसप्ले के समीप। रेल्वे वालों को किराया बढाने से सरोकार है, यात्रियों सुविधाओं की ओर कोई ध्यान नहीं है। ट्रेन आने के समय पर प्लेटफ़ार्म बदल देते हैं। उस वक्त सवारियों को कितनी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है। सवारियों में कई व्याधिग्रस्त भी होते हैं जो सहजता से प्लेटफ़ार्म नहीं बदल सकते। वे रिजर्वेशन टिकिट होने के बाद भी ट्रेन नहीं पकड़ पाते। उनका हर्जाना कौन देगा? भारतीय रेल भी भगवान भरोसे चल रही है। करोड़ों मुसाफ़िर अपनी जान जोखिम में डाल कर यात्रा करते हैं। थोड़ी देर के लिए प्लेटफ़ार्म पर हल-चल मच जाती है। जैसे कोई तूफ़ान आ गया हो। सवारियाँ भी अपने साथ अतिरिक्त सामान लेकर यात्रा करती हैं, जिसका खामियाजा ऐसे वक्त ही उठाना पड़ता है। ट्रेन आ गई। मैने अपने लिए 30 नम्बर की बर्थ ली थी। उपर की बर्थ पर आराम से सो कर सफ़र काटा जा सकता है। न किसी की किच-किच न किसी की झिक-झिक।
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ट्रेन ने सरकना शुरु किया। सांझ ने साथ छोड़ दिया और निशा ने अपनी ड्यूटी संभाल ली। बैग सिरहाने लगाया और लेट गया। अब बर्थ पर आने के बाद निशा से मिलन होने पर निद्रा रानी का आना भी तय था। वह प्यार से मेरे बाल सहलाती रही। कभी कान में फ़ुसफ़ुसाती, कभी वन, टू, थ्री, फ़ोर का गाना सुनाती। उसका मधूर स्वर मादक होकर कानों में रस घोल रहा था। मैं उसकी चूड़ियों से खेलने लगा। जैसे पहली कक्षा में पढ़ते वक्त मनके वाली स्लेट से गिनती करता था। सावधानी इतनी थी कि चूड़ियाँ आपस में टकरा कर कहीं खनक न जाएं। यहाँ प्यार की पाठशाला में पढाई शुरु थी कि निद्रा रानी ने अब अपने बाहूपाश में बांध लिया। न कुछ सुनाई दे रहा था न कुछ दिखाई। कभी-कभी कानों में ट्रेन की पहियों की आवाज सुनाई दे जाती। सफ़र जारी था, ट्रेन के पहियों की आवाज कब दूर चली गई पता न चला। निद्रा रानी ने स्वप्न द्वार उनमुक्त कर दिया। 
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मर्द के सपने में औरतें दिखाई देती हैं या फ़िर वे जो उसके कभी अत्यधिक करीबी थे और इस दुनिया में नहीं रहे। कइयों से सुना कि सपने में फ़िल्मी अभिनेत्रियाँ आती हैं। मेरे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि कैटरीना कैफ़ या करीना कपूर आकर गले में बाँहे डाल कर लटक गई हों। कभी सपनों में स्त्री की जगह भैंस क्यों नहीं दिखाई देती। आखिर वो भी स्त्रीलिंग है। लेकिन ऐसा नहीं होता। दिन में जो घटता है वह चेतन मन से होकर अवचेतन की ओर सफ़र करता दिखाई दे जाता है। सपने भी बड़े अजीब होते हैं, फ़िल्म की तरह चलते हैं। लेकिन सपनों की फ़िल्म चलाने वाला प्रोजेक्टर मिस्त्री बड़ी गड़बड़ करता है। कहीं की रील कहीं जोड़ देता है। मैं देख रहा हूँ कि स्कूल की क्लास लगी हुई है, टीचर पढा रहे हैं, तत्कालीन सारे सहपाठी दिखाई दे रहे हैं। मैं  हांफ़ते हुए कक्षा में पहुंचता हूँ, टीचर कहते हैं - इतने लेट क्यों आए हो? क्या बताऊँ सर! ये श्रेया-श्रुति (दोनो बेटियाँ) रोज बदमाशी करती हैं, कभी जूता-मोजा तो कभी किताबें छिपा देती हैं। इसलिए विलंब हो जाता है। अब इस स्वप्न में तीनों काल जुड़ जाते हैं। कहीं की रील कट कर कहीं जुड़ जाती है। सपने जारी रहते हैं…………
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रंग बदलते सपने तो सपने बदलते रंग होते हैं। सूर्य सी चमकीली रोशनी नीले, पीले, हरे, लाल, नारंगी, बैगनी रंगों में बदलती हैं। कभी बादलों में उड़ते हुए नीचे झांकने पर समंदर दिखाई देता है तो थरथरी आ जाती है। कहीं पहाड़ की ऊंचाई से खाई की तरफ़ देखने से पिंडलियों में सनसनी भर जाती है। अभी पैर फ़िसला और गिर जाऊंगा अंतहीन गहराई में। कभी ब्लेक होल में घुस कर कहीं से कहीं निकल जाता हूँ ,यह सपनों की दुनिया भी अजीब है। जहाँ शरीर नहीं पहुंच पाता वहाँ रुह पहुंच जाती है। अनंत का सफ़र भी कर आती है। करवट बदलते चोभा मीची में रात गुजर जाती है। चे गरम, चे गरम, पेप्योर, पेप्योर की कर्कश पुकार से दिन की शुरुवात होती है। आवाज सुनकर आँखें मलता हुआ अपनी हथेलियों को देखता हूँ, कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, कर मूले गोविंदम्, प्रभाते कर दर्शनम्। किसी अन्य का मुंह देखने से पहले अपनी भाग्य रेखा, हृदय रेखा पर नजर दौड़ा लेता हूँ। ये दोनो रेखाएं सही रही तो जीवन रेखा तो स्वमेव ही सही चलते रहेगी। 
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ए चाय, एक इधर भी देना। कितने पैसे हुए? 7 रुपए, इलायची वाली चाय है। पैसे देते हुए सोचता हूँ साले इलायची का सत डालकर चाय पिला रहा है पावडर दूध की और बखान ऐसे कर रहा है जैसे शिलाजीत डाल रखा हो। पेप्योर पेप्योर, पेपर भी दे देना। कौन सा? जिसमें कम पैसे अधिक पन्ने हों। वह 2 रुपए में भारी सा अंग्रेजी अखबार टिका देता है। चाय की चुस्कियों के साथ अंग्रेजी खाने का प्रयास करता हूँ, अंग्रेज जब हिन्दूस्तान को खा गए तो क्या मैं अंग्रेजी नहीं खा सकता है। लेकिन भाषाएं अजीब बला होती हैं। जितना खाओ, उतना ही विस्तृत होती जाती हैं। समझ आता है, खाने से अंग्रेजी खत्म नहीं होने वाली। जब तक अंग्रेजी राज-काज की भाषा बनी रहेगी, अंग्रेजी सिखाने वाले कोचिंग सेंटर फ़लते फ़ूलते रहेगें और गुलामी लदी रहेगी। बिग बॉस के घर जैसे रेल में सुबह किसी अच्छे गाने से होनी चाहिए। चे गरम और पेप्योर की कर्कश ध्वनि से नहीं। सुबह अच्छी हो तो सफ़र में दिन तो रुमानी बना रहेगा। चाय की उड़ती हुई भाप से सुनाई दे रहा था … न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है, आगे पड़ाव आ रहा है, मंजिल का पता नहीं………

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

ज्योतिष का प्रभाव

लोकसभा चुनाव 2009 में छत्तीसगढ़ की कोरबा लोकसभा सीट से चरणदास महंत जी कांग्रेस के उम्मीद्वार  थे, सुमित दास ने मुझसे कोरबा चुनाव प्रचार के दौरान साथ चलने कहा तो मैंने भी घुमक्कड़ी दृष्टि से इलाके का सर्वेक्षण करने के लिए हां कर दी। उसका भी काम हो जाएगा और मेरा भी। 16 अप्रेल को मतदान सम्पन्न हुआ और 17 अप्रेल को मैं अत्यावश्यक कार्य से शाम की फ़्लाईट से दिल्ली आ गया। गुड़गाँव के होटल में रात्रि विश्राम कर रहा था तभी लगभग रात्रि 11 बजे महंत जी का फ़ोन आया और चर्चा के दौरान मैने उन्हे बताया कि मेरा आंकलन है कि कांग्रेस सिर्फ़ एक सीट पर ही विजयी रहेगी और 10 सीटों पर भाजपा का कब्जा रहेगा। 16 मई को चुनाव परिणामों की घोषणा हुई, जिसमें मेरा आंकलन सही निकला।

48 डिग्री सेल्सियस की एक महीने की चुनाव प्रचार की कड़ी मेहनत के बाद परिणाम आ ही गया, चरण दास जी विजयी रहे।  चुनाव के पश्चात कांग्रेस को बड़ा दल होने के कारण सरकार बनाने का मौका मिला। 26 मई को केबिनेट का शपथ ग्रहण होना था। चरणदास महंत जी को मंत्रिमंडल में स्थान मिलने की चर्चाएं हवा में गर्म थी। स्थानीय कार्यकर्ताओं में भी उत्साह था और वे अपने साधनों से दिल्ली पहुंच रहे थे। सुमित दास के मन में दिल्ली जाने की थी जिससे शपथ ग्रहण कार्यक्रम को वह करीब से देख सके। हम 26 मई को दिल्ली पहुंच गए और पहाड़गंज में डेरा जमाया। स्नानाबाद पता चला कि आज होने वाला शपथ ग्रहण स्थगित हो गया है अब अगला कार्यक्रम 28 को होगा।

हम दो दिन दिल्ली और गुड़गाँव घूमे-फ़िरे। 28 तारीख को होने वाले मंत्रिमंडल में शपथ लेने वालों की सूची में चरणदास महंत का नाम नहीं था। दोपहर सभी मंत्रियों ने शपथ ले ली थी। अब हमने वापसी का कार्यक्रम बनाया। मैं और सुमित संध्या काल में चरण दास महंत जी के फ़्लैट पर गए, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के काफ़ी नेता वहाँ एकत्रित थे। हमारी मुलाकात महंत जी से हुई और हमने अपनी वापसी के विषय में बताया। उन्होने टिकिट कन्फ़र्म कराने के लिए रेलमंत्री के नाम चिट्ठी लिख दी। गर्मी के दिन थे, हमने 3900 रुपए में एसी की 2 टिकिटें ली और स्वयं जाकर रेल मंत्रालय के डिब्बे में चिट्ठी डाल कर आए। अब हम मौज में थे, गाड़ी का समय अगले दिन सवा तीन बजे के लगभग था। पालिका बाजार की सैर करके कुछ इलेक्ट्रानिक आयटम खरीदे और शाम पंचकुईया रोड़ पर फ़ैशन डिजायनर रोहित बल की बार में गुजारी।

अगले दिन जब नेट से पता किया तो टिकिट कन्फ़र्म नहीं हुई थी। सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता, अभी चार्ट क्लियर नहीं हुआ है स्टेशन पर जब चार्ट लगेगा तो उसमें कन्फ़र्म दिखाएगा। स्टेशन पहुंचने पर चार्ट में देखा तो तब भी 15-16 वेटिंग बता रहा था। मतलब एसी में सीट नहीं होने के कारण हमारा आरक्षण कन्फ़र्म नहीं हुआ। टी टी से चर्चा होने पर उसने बताया कि आगे भी कन्फ़र्म होने की कोई गुजांईश नहीं है। आपको स्लीपर में बैठना होगा। हो गया सत्यानाश, 39 सौ रुपए देने के बाद भी स्लीपर में भी जगह नहीं थी। हम एसी 2 के बगल वाले स्लीपर में चढ गए। लैट्रिन खोली के पास दो तीन सवारियाँ बैठी थी। हमने भी बैग रख कर वहीं डेरा जमा लिया। सोच रहा था कैसा दुर्भाग्य है कि इस स्थान पर तो 200 में बैठकर सफ़र कर सकते थे। 39 सौ में भी यही स्थान मिला। सुमित ने टी टी से चर्चा की, लेकिन उसने भी स्थान नहीं होने की बात कहकर अपना पीछ छुड़ाया। 

हम टट्टी खोली के पास टिके रहे क्योंकि किसी की आरक्षित सीट पर जाकर बैठने से रात को उठना ही पड़ता और आरक्षित सीट का मालिक भी नहीं चाहता कि कोई अन्य सीट पर बैठे, सभी सवारियाँ उसे चोर उचक्के नजर आती हैं। इसलिए हमने यहीं बैठने का फ़ैसला लिया। यह जीवन में पहली बार घटा था। दिल्ली से रायपुर तक का 23 घंटे का लम्बा सफ़र होने के कारण बैठने का स्थान भी जरुरी था। साथी सवारियों से बात-चीत करते आगरा पहुंच गए। आगरा पहुंचने के बाद सुमित मुझे कह कर गया कि सीट का इंतजाम करके आता हूँ। थोड़ी देर बाद लड़का मेरे पास आया और कहने लगा कि सुमित भैया ने भेजा है, आप कृपया मेरे बारे में कुछ बताईए न, ऐसा कहकर वह हाथ की हथेली खोल कर बैठ गया। मैं समझ गया कि सुमित ने टाईम पास मुर्गा भेज दिया है और अब इसका भविष्य जांचना पड़ेगा।

मैने उसकी जन्म तिथि का आंकलन करते हुए 2-4 भूतकाल की बातें और 2-4 वर्तमान की घटनाओं पर तुक्का छोड़ा, जो एकदम सही फ़िट हो गया। अब वह लड़का पूरे प्रभाव में आ चुका था। वहीं मेरे पास बैठा ही रहा। थोड़ी देर में सुमित का भेजा हुआ दूसरा बंदा भी पहुंचा। उस पर भी मेरा आंकलन सटीक बैठ गया। वह भी वहीं बैठकर चर्चा करने लगा। अगली बार तीसरा बंदा आया, यह कोई 35-40 की उमर का रहा होगा। उसने भी मुझसे कुछ बताने कहा। मैने उसकी जन्मतिथि से आंकलन लगाया तो इस समय उसकी किडनी में स्टोन होना चाहिए था। मैने कहा कि आपकी किडनी में स्टोन है और परेशान है उससे। डॉक्टर ने आपरेशन करवाने की सलाह दी है। सुनकर वह भौंचक्क रह गया, सीधे पैर ही पकड़ लिए। बोला महाराज आपको कैसे पता चला कि मेरी किडनी में स्टोन है और डॉक्टर ने आपरेशन कराने कहा है? मैने कहा कि फ़िर मेरे पास क्यों आए थे, अपने आस पास की किसी सवारी से ही पूछ लेते।

उसने विनय पूर्वक निवेदन किया कि आप यहाँ सवारियों की ठोकर में मत बैठिए, मेरी सीट पर चलिए, एक साईड बर्थ आपको देता हूँ, हम पति-पत्नी और एक बच्चे के पास तीन सीट हैं एक सीट पर आप विराजिए, बच्चे को हम अपने साथ सुला लेगें। मेरे मना करने पर भी नहीं माना और मेरा बैग उठा कर आगे आगे चल पड़ा। मैं उसके पीछे पीछे पहुंचा। उसने साईड लोवर वाली बर्थ मेरे नाम कर दी। सुमित सीट पर बैठा था और उसके चेहरे पर विजयी भाव की हल्की हल्की स्मित थी। इस तरह भविष्याकांक्षी जिज्ञासु लोगों के कारण हमारा उद्धार हुआ, अन्यथा टट्ठी खोली के पास बैठकर ही रात कटती। जब मैने एसी 2 की टिकिट ली थी तभी संदेह हो गया था कि कन्फ़र्म होनी मुश्किल है, क्योंकि गोंडवाना में एसी 2 की एक ही बोगी लगती है और सवारियाँ सैकड़ों होती है। उस दिन के बाद मैने जब भी एसी की टिकिट ली तो कन्फ़र्म ही ली वरना स्लीपर की विश्वसनीय सवारी करने का ही आनंद लिया।

सोमवार, 5 नवंबर 2012

करबीन टीले में दबे (unexplore) प्राचीन युगल मंदिर ..Sirpur Chhattisgarh......... ललित शर्मा

अवैध कटाई 
प्राम्भ से पढ़ें 
रबा-करबीन टीला के विषय में प्रभात सिंह से पूर्व में चर्चा हुई थी। पूर्व में जब सिरपुर आया था तो समय नहीं था कि सभी जगहों पर जा सकूँ। इस दौरे में हमने दो दिन निर्धारित किये थे।दिन में भ्रमण करना और रात में देखी गयी जगहों पर चर्चा करना। इन दो दिनों में विभिन्न विषयों पर खूब चर्चा हुयी। तीवरदेव विहार परिसर में बौद्ध भिक्षुणियों के लिए निवास के लिए पृथक व्यवस्था थी। जहाँ तक देखा गया है सन्यासियों के साध्वियों के निवास नहीं रहते। महिलाओं को विहारों में निवास को अनुमति बुद्ध ने ही दी थी और अनुमति देते हुए अपने शिष्य आनंद से  कहा था ..... आनंद! मैंने जो धर्म चलाया वह पांच हजार वर्ष तक टिकने वाला था लेकिन अब वह सिर्फ पांच सौ वर्ष तक ही चलेगा, क्योंकि हमने स्त्रियों को संघ में शामिल होने की प्रथा चला दी है।"

जंगल के राही, प्रभात सिंह और राजीव 
सिरपुर से लगभग 5-6 किलोमीटर दक्षिण में मुख्य मार्ग से लगभग आधे किलोमीटर पर करबीन तालाब है। छत्तीसगढ़ी में करबा-करबीन हिजड़ों को कहा जाता है। अनुमान है सिरपुर राजधानी में हिजड़ों के निवास की व्यवस्था आम रिहायश से पृथक होगी या इस तालाब का निर्माण किसी हिजड़े ने कराया होगा या हिजड़ों के निवास के समीप होने के कारण इस तालाबा का नाम करबिन तालाब रूढ़ हुआ होगा। मुख्य मार्ग से जंगल में जाने के लिए कार का मार्ग नहीं है। हमने कार सड़क पर ही छोड़ दी और पैदल ही जंगल में प्रवेश कर गए। नई जगह देखने का लालच यहाँ तक खींच लाया था। धूप सिर पर चढ़ रही थी। बरसात के मौसम में विभिन्न तरह के कीटों का जन्म होता है, कुछ का प्रजनन काल बरसात के बाद शरद के मौसम में। इनमे मकड़ियाँ प्रमुख हैं, जगह-जगह बड़ी-बड़ी मकड़ियों ने जले बना रखे हैं। इनसे बचते हुए चलना जरुरी है, अन्यथा थोडा सा भी मकड़ी का जहर विकलांग बनाने के लिए काफी है।

शिव मंदिर के भग्नावशेष - स्तम्भ 
जंगल में लकड़ियों की चोरी वन विभाग के सहयोग से बेखटके होती है, पहले वृक्ष को सुखा लिया जाता है, जड़ कमजोर होने पर काट कर इस्तेमाल कर लेते हैं। अगर कोई दबंग है तो हरे-भरे वृक्ष ही ईमारती लकड़ी में तब्दील हो जाते हैं। ऐसा ही नजारा हमें जंगल में दिखाई दिया। एक जगह बीजा का वृक्ष काट कर पटक रखा था। समय मिलते ही उसे पार किया जाएगा। आगे चलने पर कुछ वृक्ष और कटे दिखाई दिए। करबीन तालाब का दृश्य मनोहारी लगा। तालाब में कमल-कुमुदिनी खिले हुए थे। उसके आस पास की झाड़ियों में पिकनिक कर्ताओं के छोड़े गए अवशेष दिखाई दे रहे थे। जहाँ एक मुर्गा और एक बोतल दारू का इंतजाम हो जाये, वहीँ पिकनिक हो जाती है। मुर्गे के पंख उड़ रहे थे, साथ ही अंग्रेजी के एक ब्रांड की बोतल डिस्पोजल गिलासों के साथ दिखाई दे रही थी।

शिव मंदिर की चौखट के अवशेष 
थोड़ी दूर चलने पर मकोई की कटीली घनी झाड़ियाँ प्रारंभ हो गयी, यहाँ तो जंगल में कोई पगडंडी भी नहीं थी। इस स्थान पर कोई आता हो तो पगडंडी बनेगी। हम सामने टीला देख कर उसी दिशा में चल रहे थे। इस स्थान पर गर्मियों के मौसम में प्रभात सिंह पूर्व में आ चुके हैं, उस समय सभी झाड़ियाँ सूख जाती हैं, रास्ता दूर से ही दिखाई देता है। टीले में कुछ दूरी तक ईंटों के टुकड़े बिखरे हुए हैं साथ ही चारों तरफ पत्थरों का भंडार भी लगा हुआ है। यह स्थान भी खजाने के चोरों से सुरक्षित नहीं है। टीले पर पहुँचने पर पत्थरों एवं ईंटों के दो ऊँचे ढेर दिखाई दिए। ढेर पर चढ़ने पर दिखा की यहाँ किसी ने पहले ही खुदाई कर डाली है। एक गड्ढे में काली हांड़ी और स्टील की छोटी कटोरी पड़ी थी। इससे अनुमान है कि यह "हंडा" (सोने की मोहरों से भरी हांड़ी) ढूंढने वालों की करतूत है।

यायावर टीले पर 
दूसरे ढेर पर दो स्तम्भ दिखाई दे रहे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर शिव मंदिर में जल निकासी के लिए बने गई जलहरी दिखाई दे रही थी , पत्थर पर खोद कर नाली को जलहरी का रूप दिया गया है। ढेर के ऊपर मंदिर की चौखट के दो पत्थर भी स्पष्ट दिख रहे थे। उत्तर दिशा में जलहरी होने पर अनुमान है कि यह मंदिर पूर्वाभिमुख रहा होगा। प्रभात सिंह ने बताया कि यहाँ किसी बाबा ने भी कुटिया बना कर डेरा डाल लिया था, जोत भी जलाने लगा था, लेकिन दाल नहीं गलने पर डेरा-डंडा उठा कर चलते बना। पहले टीले से तो स्पष्ट है कि यह विशाल शिव मंदिर रहा होगा। इसके स्तम्भ भी विशाल हैं। दूसरे टीले के विषय में उत्खनन के उपरांत ही जानकारी मिल पायेगी कि उसके नीचे क्या दबा हुआ है। हमने कुछ चित्र लिए और लौट चले।

गुल्लू  का पेड़ (गिदोल)
मंदिर टीले से लौटते हुए मुझे एक बांस की लाठी मिल गयी, पसीने आने के कारण पसीना चुसने वाली छोटी मक्खियों ने परेशान कर दिया। झाड़ियों के बीच से निकलने के कारण पसीना खुजा रहा था। बांस की लाठी का उपयोग मैंने मकड़ियों का जाला हटाने में किया। रास्ते में एक खूबसूरत वृक्ष दिखाई दिया, जिसका तना सफेद एवं चिकना था, बड़े बड़े पत्ते सुन्दर दिख रहे थे। इस पर लगे फल शायद गर्मी के मौसम में फूट चुके थे, उसका खोल चार भागों में बंट कर सुन्दर फूल की तरह दिखाई दे रहा था। मैंने पहले कभी देखा नहीं था इस प्रजाति का वृक्ष। इसकी हमने फोटो ली, मकड़ियों के जालों से बचते हुए हम रास्ता भटक कर दूसरी जगह पर पहुच गए, यहाँ हमारे और सड़क के बीच  नाला होने के कारण पार करना मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं। हमने उचित जगह की तलाश आकर ध्यान से नाला पार किया। अगला पड़ाव था सिरपुर का पर्यटन सूचना केंद्र .................
   

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस: लो भई हम भी सम्मानित हो गए -------------- ललित शर्मा

दो दिन से इंटरनेट सता रहा था, थक हार कर शिकायत करने मुझे बी एस एन एल (bsnl) के दफ़्तर में जाना पड़ा, वहाँ एक बैनर लगा था। जिसमें लिखा हुआ था "हिन्दी पखवाड़ा"। बैनर देख कर मुझे लगा कि अब सरकारी तौर हिन्दी को याद करने का मौसम आ गया। इसके लिए विभागों ने अलग से बजट जारी किया होगा और हिन्दी दिवस पर कोई कार्यक्रम करके हाई टी या महाभोज द्वारा खर्च किया जाएगा। दो-चार विभागीय तुक्कड़ों को सम्मान-पत्र एवं शाल श्रीफ़ल देकर सम्मानित किया जाएगा। फ़िर हिन्दी पखवाड़े की इति श्री हो जाएगी। कमोबेश सभी सरकारी आयोजन इसी तरह होगें। पान चबा कर पीक से मुंह और कुरते को रंगने वाले कुछ घिसे-पिटे झोला छाप तथाकथित साहित्यकारों की जै-जै हो जाएगी। अगले दिन से सरकारी काम काज फ़िर राज महिषी अंग्रेजी की छत्र छाया में प्रारंभ हो जाएगा। अरे! कोई हमारी जै जै करे तो बात बने। बरसों हो गए कीबोर्ड तोड़ते हुए।

दफ़्तर से बाहर आते समय एक जबरिया साहित्यकार जी से मुलाकात हो गयी, उन्होने अपने झोले से एक निमंत्रण पत्र निकाला और लिफ़ाफ़े पर बिना नाम लिखे ही मुझे सादर समर्पित किया। साथ करबद्ध कुटिल मुस्कान के साथ सरकारी सहयोग से उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रम का निमंत्रण दिया। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और कहा कि समय मिलने पर आपके कार्यक्रम में अवश्य ही पहुंचने का प्रयास करुंगा। क्योंकि हिंदी दिवस ही वर्ष में एक दिन ऐसा आता है जिस दिन कहीं से जुगाड़ कर दो चार सम्मान पत्र कबाड़ लिए जाते हैं। कम से कम साहित्य जगत के मित्रों पर रौब जमाने के काम आते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण दिन किसी फ़ोकटिया कार्यक्रम में जाकर समय खराब करना बुद्धिमानी नहीं है। अगर आपकी संस्था द्वारा सम्मान करवाएं तो मैं अवश्य आ सकता हूँ।

उन्होने कुटिल मुस्कान के साथ पान की पीक के साथ थूक छलकाते हुए कहा - भैया इस साल के तो सब सम्मान बुक हो गए हैं, कहें तो अगले वर्ष की बुकिंग अभी से कर देता हूँ। मैने हामी भर ली - अरे भाई हजार-दू हजार की जरुरत पड़े तो वह भी बता दीजिएगा, संकोच न कीजिएगा, समझे कि नहीं। उन्होने कहा - हाँ भैया, बगैर मुद्रा के मुख मुद्रा ही नहीं बनती। देखिए न कितने सारे मुद्रा राक्षस फ़िर रहे हैं, मुद्रा की थैली धर के कहीं सम्मान हो जाए तो बात बने। पर आप किंचित भी संशय न रखें। आगामी वर्ष के लिए आपका सम्मान तय समझिए। सम्मान पत्र के साथ में साथ शाल और श्रीफ़ल भी बुक रहा। मैने प्रसन्न मुद्रा में उनकी जय-जय कार की और आगे बढ लिया।

रास्ते में सम्मान के थोक व्यापारी चचा मिल गए, गालिबन वे भी पान चबाते हुए सायकिल ओंटते चले जा रहे थे। मुझे देखते ही रोक ली सायकिल और सामने के जंग खाकर टूटे हुए दांतो के बीच से एक लम्बी पीक मारी। थोड़ी ही दूरी बच गयी वरना हमारा एक्शन का चकाचक जूता शर्म से लाल हो जाता। कहाँ से आ रहे हो मियां?- पीक मारते ही सवाल की तोप दाग दी। राम राम चचा, हम तनि ई ऑफ़िस से आ रहे हैं। अच्छा अच्छा, हिन्दी दिवस का कौनो कार्यक्रम का निमंत्रण है का हिंया का? नहीं चचा, हमारा इंटरनेट खराब हो गया है, वह उसका बी पी उपर नीचे होते रहता है। कहीं रात को हृदयाघात न हो जाए यही सोच कर चले आए थे। फ़िर कल हिन्दी दिवस है। अगर एक लेख हिन्दी पर नहीं लिखेगें तो लोग बाग सोचेगें कि साल भर हिन्दी को घोरते रहते है और जब मौका आए तो लिखना ही भूल गए। बस यही सोच कर साहब से मिलने चले आए थे।

चचा कहने लगे कि - का बताएं भतीजे, बड़ा खराब जमाना आ गया है। हमने प्रतिवर्षानुसार हिन्दी दिवस पर सम्मान समारोह आयोजित किया है इस बार कोई दिख ही नहीं रहा किसका सम्मान किया जाए। जिसके पास जाते हैं वही बुक मिलता है। कहता है कि चचा विलंब से आए हम तो फ़लां-फ़लां के कार्यक्रम में बुक हो गए हैं। अब बताओ भतीजे हम इतने बरसों से सम्मान बांट रहे हैं अगर इस दिन सम्मान नहीं बांट पाए तो हमारी अंतर्रात्मा हमें धिक्कारेगी कि हिन्दी के लिए कुछ किए नहीं। सोचो जरा हिन्दी लेखन करने वाले साहित्यकार का हिन्दी दिवस के दिन शाल श्रीफ़ल से कहीं सम्मान न हो तो कितनी अपमान की बात है। वो दिन भी क्या दिन थे जब लोग सम्मान करवाने के लिए बरसों पहले सम्पर्क करके बुकिंग करवाते थे। तब कहीं जाकर उनका नम्बर आता था। हमें मालूम नहीं था कि इतने बुरे दिन भी आएगें। संकट के समय अपना ही काम आता है तो तुम्हें रोक लिए।

निराश न होईए चचा, आदेश कीजिए मैं आपका क्या प्रिय कर सकता हूँ, चचा की आँखों में झांकते हुए मैने कहा। मुझे तुमसे यही आशा थी, मुझे मालूम था कि तुम मुझे निराश नहीं करोगे। कुछ खर्चा वर्चा दो तो कोई पुराना सभागृह बुक करवा लेता हूँ एक दो अतिथि और मुख्यातिथि तय करने पड़ने पड़ेगें। बहुत काम है, अब जल्दी से कुछ नगदऊ दर्शन कराए दो- चचा जीभ से लार ट्पकाते हुए बोले। मैने कहा - का बताएं चचा, इतने बुरे दिन आ गए हैं कि गाहे-बगाहे लोग हिन्दी को गरियाते रहते हैं कि हिन्दी रोजगार देने वाली भाषा नहीं है। क्या करेगें हिन्दी सीख कर, हिन्दी बोल कर। जब रोजगार ही नहीं मिलेगा तो पेट कहाँ से भरेगा। बड़े-बड़े नामवर लोगों का हिन्दी लिख बोल कर पेट नहीं भरा, वे दिन भर पानी पीकर डकारते रहते हैं झेंप मिटाने के लिए, ताकि लोगों को अहसास हो, भर पेट खाकर आए हैं। आप कौन सा तीर मार लोगे हिन्दी की हिमायत करके ?

मेरे पास भी इतनी रकम नहीं है कि आपको देकर सम्मानित हो जाऊं, यहाँ फ़ोकट में सम्मानित करने वालों के लगातार चलभाष पर फ़ोन आ रहे हैं अब बताओ घाटे का सौदा मैं कैसे करुं? यदि आप चाहें तो मै आपकी एक सहायता कर सकता हूँ। जिससे आपका नाम भी कायम रहेगा और सम्मान भी कायम रहेगा। चचा ने अचरज भरी निगाहों से देखते हुए कहा - बताओ, क्या करना होगा। मैने कोरा सम्मान पत्र उनके थैले में देख लिया था। उनसे कहा - आपके थैले में जो सम्मान पत्र है उसमें मेरा नाम भर दीजिए और सामने जो हिन्दी पखवाड़ा का बैनर लगा है उसके सामने मुझे दे दीजिए। वहाँ उपस्थित गार्ड और चपरासी को भी बुला लेगें, चार छ: लोग साथ में दिखेगें भी और फ़ोटो भी हो जाएगी सम्मान करते हुए, आपकी इज्जत भी कायम रहेगी और बिना खर्चे के हम भी सम्मानित हो जाएगें। अखबार में भी आपकी संस्था के द्वारा किए गए सम्मान चित्र भी छप जाएगा।

चचा बोले - मान गए भतीजे, तुम्हारी खोपड़ी को, गाल पर चुम्मा लेने का दिल कर रहा है। हम ही भकवाए हुए थे कि कैसे होगा सम्मान समारोह का आयोजन। सम्मान करके भले ही हम तीर-तलवार नहीं मार लेगें पर साल भर यह बात कचोटते रहती कि किसी साहित्यकार का सम्मान नहीं कर पाए। अगर सम्मान नहीं होगा तो न जाने कितने उदयीमान कवि साहित्यकारों की भ्रूण हत्या हो जाएगी। तुमने मुझे इस कलंक से बचा लिया। अगर हिन्दी लेखन बंद कर देगें तो हिन्दी के सम्मान का दम भरने वाली इतनी सारी संस्थाओं का क्या होगा? उन्हे आयोजन करके हिन्दी के प्रति शहीद होने का भाव प्रकट करने का अवसर कैसे मिलेगा? चलो जल्दी से तुम्हारा सम्मान कर दें, फ़िर किसी और को तलाशें, जो सम्मान के तलबगार हैं। हिन्दी पखवाड़ा के बैनर के नीचे चचा ने हमें सम्मान-पत्र देकर सम्मानित किया। गार्ड ने मेरे मोबाईल फ़ोन से यादगार चित्र लिया और हम निहाल हो गए और चचा भी।

वह साहित्यकार ही क्या जिसका सम्मान नहीं। अगर कभी हमें किताब भी छपानी पड़ी घर दुआर बेचकर, अपने खर्चे से, बिना सम्मान के हम क्या लिखेगें अपनी उपलब्धि के तौर पर। वर्तमान में काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, व्यंग्य संग्रह आदि में आवरण के अंतिम पृष्ठ पर साहित्यकार को मिले हुए सम्मानों की सूची प्रकाशित करना परम्परा हो गयी है। जिसकी सम्मान  सुची जितनी बड़ी वह उतना बड़ा लेखक-साहित्यकार कहलाता है। पद्म श्री इत्यादि के लिए भी अर्जी लगाते समय उसमें भी सम्मानों की सुची मय सम्मान के प्रमाण के संलग्न करनी पड़ती है। सम्मान पाकर मैं मुदित होकर चचा को धन्यवाद दे रहा था कि यदि इसी तरह बिना खर्चे के सम्मान करते रहें तो एक दिन हिन्दी अवश्य अपने उच्च स्थान को प्राप्त करेगी। अगर यही सम्मान करने का जज्बा चचा जैसे लोगों में रहा तो हिन्दी को सम्मानित होने और हमें पद्म श्री पाने से से कौन रोक सकता है। चलते चलते मेरे होंठों से नगमा फ़ूट पड़ा, हम होगें कामयाब, हम होगें कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास………। 

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

स्नानाबाद से सीधा प्रसारण --------------- ललित शर्मा

3म नम: शिवाय, नम: शिवाय, नम: शिवाय, हर हर गंगे, हर गंगे। स्नान हो रहा है, एक लोटा पानी डालते ही विचार उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। बरसाती बादल की तरह बस फ़ट पड़ने को तैयार। सावन मास के आखरी दिन नित्य की तरह अपना जलमस्तकाभिषेक स्वयं कर रहा हूँ। कोई देवाधिदेव महादेव तो नहीं जो कोई भी भक्त आकर स्नान करा जाएगा। महादेव भाग्यशाली हैं, पंच स्नान दस स्नान से भी कुछ फ़र्क नहीं पड़ता बरसात के मौसम में। यहाँ तुच्छ मानव को ठंडे जल से ही छींक आ जाती है। कसाईखाने में जाने की नौबत आ जाती है। बरसात तो आखिर बरसात है, न आए तो रोना पीटना मच जाता है, आ जाए तो समस्या खड़ी हो जाती है। पर आना जरुरी है, नहीं तो भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

अति किसी भी चीज की वर्जनीय है। अतिवृष्टि, अतिप्रेमासक्ति, अति धनवृष्टि, अतिज्ञानदृष्टि, अति अल्पज्ञता, अतितृष्णा, अतिकृपणता, अतिदरिद्रता अतिक्षुधा, अति, अति आदि आदि आदि पागलपन की निशानी है। कुछ लोगों को लोकैषणा पागल कर देती है तो कुछ को वित्तैषणा। वित्तैषणा में व्यक्ति सर्वभक्षी हो जाता है। लोकैषणा उसे अंधा बना देती है। प्रेमासक्ति सांप को भी रस्सी बना देती है। हर हर गंगे हर गंगे, बालों को एक हाथ से रगडते हुए एक लोटा जलाभिषेक और हो जाता है। सब चलचित्र सा चल रहा है। स्नानागार नहीं, यह चिंतन केंद्र हो गया। सारे विचार यहीं लोटे के जल के साथ लोटते हैं। हर हर गगें हर गंगे…… 

कल्पनाएं, परिकल्पनाएं, अल्पनाएं रक्काशाओं का रक्स घुंघरुओं की लयबद्ध ताल ध्वनि के संग भंवरे की गुंजन सुनाई देती है, गुन गुन करता भंवरा पराग कणों के लालच में फ़ूलों पर मंडरा रहा है। फ़ूल का मन भी सांवले सलोने भंवरे को देख कर प्रसन्न हो गया। पराग कणों के लालच में फ़ूलों की देह सहला रहा है। फ़ूल लाल हो कर पराग कण छोड़ देगा। दोनो ही बेवफ़ा हैं, फ़ूल ने पराग कण छोड़े और भंवरे ने चुराए और उड़ गया दूसरे फ़ूल की ओर।

तृष्णा और क्षुधा के साथ कैसी वफ़ा की उम्मीद? दोनों की ही जरुरत है। तितलियाँ कौन सी कम हैं? जो भंवरे ने किया, वही तितलियों ने किया। फ़ूल के जिस्म को सहलाया और भिगोया, धोया, निचोया और हो गया। संसार यही है, स्वार्थ सिद्धी योग जीव-जंतु, थलचर, नभचर, चलचर, उभयचर सभी को आता है। इसे सीखने के लिए किसी बाबा की दरकार नहीं। प्रकृति और आवश्यकता सब सीखा देती है। नव जातक को कौन दूध पीना सिखाता है, वह स्वयं ही आँखे बंद किए हुए स्तन ढूंढ लेता है और अपनी क्षुधा शांत कर लेता है। हर हर गंगे, हर हर गंगे……

एक लोटा जल और सिर पर पड़ते ही फ़ेसबुकिया बु्ड्ढे-बुढिया,छोरे-छोरी, छिछोरे-छिछोरी दिखाई देने लगे। फ़ेसबुक पर इतना अधिक प्रेम-इश्क उमड़ रहा है कि लोगों की रगों से फ़ूट-फ़ूट कर बह रहा है। कोई दवा नहीं जो रगों से फ़ूटते फ़ेसबुकिया प्रेम को थक्का बना कर जमा दे, रोक ले। बुढापे में अल्हड़ पहाड़ी नदी सा बहता प्रेम बड़े-बड़े भाखड़ाओं को भी धराशायी करता उफ़नती कोसी की तरह पार तोड़ता फ़ेसबुकिया मैदानों की तरफ़ दौड़ रहा है तबाही मचाने के लिए। इसके रास्ते में आने वाले कई महल दोमहले धराशायी हो गए।

भोर से ही भिक्षुक निकल पड़ते हैं कमंडल लेकर, जहाँ चैट की बत्ती हरी देखी, "लाईक भिक्षाम देहि" और "कमेंट भिक्षाम देहि" के अतिरिक्त कुछ सुनाई-दिखाई नहीं देता। जिन्हे हम जानते हैं उन्हे तो बिना कहे लाईक दे आते हैं पर जिन्हे नहीं जानते वे भी आकर अपना पेज टिका देते हैं। "प्लीज एक लाईक दीजिए" साला लाईक नहीं हुआ, गुडमार्निग का चुम्मा हो गया। कम से कम ब्रश तो कर लो यार, दांतो की सड़न दूरियां बढा रही है। क्लोज अप का जमाना है। फ़िर लाईक, इश्क, प्यार, चुम्मा, सब मिल जाएगा, थोड़ा माउथ फ़्रेशनर इस्तेमाल किए करो। हर हर गगें हर गंगे……

फ़ेसबुकिया कबूतर और कबूतरी किसी भी मुंडेर पर गुटुर गुं कर लेते हैं पर कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी, साम्यवादी, पुंजीवादी, अन्नावादी, बाबावादी, धर्मनिरपेक्षतावादी दलों के दल के दल मौजूद हैं। बिना दलों के इनकी बात कही-सुनी नहीं जाती। किसी की वाल पर हमला भी होता है तो लगता है कि वियतनाम पर अमेरिका ने फ़िर से कारपेट बमिंग कर दी। धड़ाम-धड़ाक-धुम-धड़ाम के अलावा सदवचन @%$#@%& भी सुनाई देते हैं। किसी दूसरे ग्रुप में यही शहीदी विचारवान साथ में वड़ापाव खाते दिख जाते हैं एक कटिंग चाय के साथ।

वाह रे फ़ेसबुक, एक भाई साहब सामयिक दृष्टि से अपना चिंतन प्रतिदिन संध्या काल में लिखते हैं। उनकी पोस्ट तो कुंवारी ही रह जाती है। कमेंट करना बहुत बड़ी बात है, लाईक किए बगैर ही लोग निकल लेते हैं। उनकी पीड़ा का अहसास तब होता है जब कोई रुपसी अपनी प्रोफ़ाईल फ़ोटो बदलती है तो वाह-वाह और लाईक करने वालों की लाईन लग जाती है। अगर किसी सुंदरी ने दो लाईने लिख दी समझिए केंवाच सी खुजली सम्पूर्ण वातावरत में फ़ैल जाती है। लोग कंघे लेकर अपनी खुजाल मिटाने निकल पड़ते हैं। ऐसे में सदवचन लिखने वाले सज्जन को गहन पीड़ा होना स्वाभाविक है। हर हर गगें हर गंगे…… 

ऐसे में अदम गोंडवी याद आते हैं। प्रेम का रोग, भरे पेट का बुद्धिविलास है, जिसके पेट में रोटी न हो, वह क्या खाक प्रेमार्थ और नयनों की भाषा समझेगा? उसे मुंडेर पर बैठी कबूतरी की गजल कैसे पसंद आएगी? चाहे उसने कितना भी खुश्बू वाला अफ़गान स्नो पोत रखा हो और उसकी खुश्बू मीलों तक जा रही हो। उसे तो सिर्फ़ गर्म रोटी की ही महक खींच ले जाती होगी मीलों दूर, चाहे रोटी महक पाने के लिए उसे दिन-रात हथौड़ा बजाना क्यों न पड़े।

अदम कहते हैं - गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे, पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें। देखने को दे उन्हे अल्लाह कम्प्यूटर की आँख, सोचने को कोई बाबा बाल्टीवाला रहे। फ़ेसबुक पर कभी रोटी की चिंता की गजल-कविता नहीं पढी। सोचता हूँ क्या रोटी की भूख बोल्ड नहीं हो सकती? अगर खाने को रोटी न मिले और पेट भूखा रहे तो क्लीन बोल्ड होने में भी समय नहीं लगता। भूख, गरीबी, मुफ़्लिसी, टूटे छप्पर नंगापन, तन की पीड़ा व्यक्त करती कविताओं को तालियाँ बहुत मिलती हैं, पर रोटी नहीं मिलती। "एक फ़ेसबुकिए को दुनियां में यायावर क्या चाहिए, एक नेट, एक लैपी, 100 कमेंट 500 लाईक हरदम रहे।" हर हर गंगे हर गंगे………

आंख बंद किए लोटे पर लोटा उड़ेल रहा हूँ, कितना पानी गंगा जी में बह गया पता ही नहीं चला, क्योंकि जब कोई पुरस्कार-सम्मान वितरण का दृश्य सामने आता है तो कंट्रोल ही नहीं होता। दिखाई देता है कुटिल मुस्कान लिए पुरस्कार-सम्मान दाता और अनुग्रहित कमान सी कमर झुकाए फ़र्शी सलाम ठोकता पुरस्कार का आकांक्षी दरिद्र भाव लिए प्राप्तकर्ता। पुरस्कार लेखक के जमीर को खरीद लेता है, मुंह पर ताला लगा देता है। बार-बार सुनना पड़ता है उसे फ़ुंफ़कार कि हमने आपको सम्मानित किया, जब आपका कोई सम्मान नहीं था। सम्मान के विषधर सांप को गले में लपेटे वह ठगा सा खड़ा देखते रहता है और उसके सामने द्रौपदी का चीर हरण हो जाता है।


कितना बेबस नपुंसक बना देता है एक सम्मान? सम्मान देकर जमीर खरीदने वालों का बाजार गर्म है तो जमीर बेचकर सम्मान पाने वाले भी कम नहीं। जैसे गर्म गोश्त के सौदागर एक रात का सौदा करके नोच लेते हैं बदन को, उसे एक रात की कीमत तो पूरी वसूलनी है। ये  सिर्फ़ एक रात ही नोचते हैं , पुरस्कार-सम्मान देने वाले तो जर खरीद गुलाम समझ लेते हैं। छुटभैयों का सम्मान पत्र कोई पद्मश्री तो नहीं, जिस लौटाने की घोषणा करके कोई भी सुर्खियों में आ जाएगा या स्वर्ण पदक नहीं जिसे बेचकर एक वक्त की रोटी जुटा लेगा… मोबाईल बजने लगता है………जब भी बाथरुम में होता हूँ किसी को मेरी याद तभी आती है। …चेहरे पर साबुन लगाए झट-पट तौलिया लपेटे बाहर आता हूँ………हेल्लो हेल्लो हेल्लो……और फ़ोन कट जाता है…… हर हर गगें हर गंगे……

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

अथ सम्मार्जनी कथा --- ललित शर्मा

छिन बाहरी (झाड़ू)
झाड़ू को संस्कृत में सम्मार्जनी कहते हैं, यह आदिम काल से ही मानव की सहचरी बनी हुई है। भोर होते ही घर-भीतर से लेकर आंगन की साफ़-सफ़ाई करती  है। मानव ने अग्नि के अविष्कार के पूर्व झाड़ू का अविष्कार कर लिया। उसे निस्तारी के लिए साफ़-सुथरी भूमि की आवश्यकता हुई तो घास की कुछ सीकों को एकत्र करके झाड़ू बनाई और नित्य सम्मार्जन का कार्य प्रारंभ किया। कहने का तात्पर्य है कि आदिम मानव ने झाड़ू का निर्माण कर इसे सहज ही अपना लिया। आदिम मानव से लेकर आज तक झाड़ू का सफ़र जारी है। झाड़ू निरंतर मानव सभ्यता को बचाने एवं संवारने में लगी है। जिसके घर या स्थान पर साफ़-सफ़ाई नहीं होती और कूड़ा-करकट पड़े रहता है उसे मानव समाज सभ्य नहीं मानता अर्थात मानव को सभ्य बनाने में झाड़ू का प्रथम एवं प्रमुख स्थान है। सम्मार्ज्जनश्च संशुद्धिः संशोधने विशोधने।

चंवर का प्रयोग-चंवर डुलाते हुए (गुगल से साभार)
कहावत है कि कुत्ता भी कहीं बैठता है तो पूंछ से झाड़ कर बैठता है। संसार निर्माता ने पशुओं की शारीरिक संरचना में ही झाड़ू पूंछ के रुप में संलग्न कर दी। जिससे पशु अपनी पूंछ का उपयोग झाड़ू के रुप में करते हैं। मक्खी उड़ाने से लेकर बैठने के स्थान को झाड़ने का काम पूंछ ही करती है। डार्विन का कहना है कि वनपशु के क्रमिक विकास परिणाम वर्तमान मानव है। मानव द्वारा हाथों से काम लेने के कारण पूंछ की उपयोगिता खत्म हो गयी, इसलिए मानव शरीर से पूंछ रुपी झाड़ू विलुप्त हो गयी। जैसे-जैसे मानव सभ्य होता गया, झाड़ू सिर चढकर बोलने लगी। आंगन और घर बुहारते-बुहारते चँवर बनकर मक्खियाँ उड़ाने एवं हवा देने का काम करने लगी। राजा-महाराजा एवं देवी-देवताओं को चँवर (चँवरी भी कहते हैं) रुपी झाड़ू शोभायमान होने के साथ-साथ इनके सानिध्य में झाड़ू ने चँवर का रुप ग्रहण कर सम्मान पाया।

भित्ती चित्र- (गुगल से साभार)
झाड़ू को कूंची, बुहारी, बहरी, बहारी, सोहती, बढनी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। जहाँ तक मानव सभ्यता का विकास एवं विस्तार हुआ वहाँ तक झाड़ू उसका साथ निभाया और साथ निभा रही है। इसने कूंची, ब्रश, दंताली, से लेकर वैक्युम क्लीनर तक एवं धरती से लेकर अंतरिक्ष तक का सफ़र तय किया। अमीर से लेकर गरीब तक, निर्बल से लेकर सबल तक, मुर्ख से लेकर विद्वान तक, चरित्रहीन से लेकर चरित्रवान तक सभी को झाड़ू समान भाव से अपनी सेवाएं प्रदान कर रही है। इसने किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। सफ़ाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य को करने वाली झाडू प्राचीन काल से ही उपेक्षा का शिकार हुई।मिश्र, हरक्वेलिनियम, पाम्पेई, हड़प्पाकालीन सभ्यता के प्रकाश में आने लेकर वर्तमान में हो रहे उत्खन्न में कहीं पर झाड़ू के चिन्ह प्राप्त नहीं होते। आदिम काल से झाड़ू की सेवाएं लेने वालों ने मुर्तियों, चित्रों एवं शैल चित्रों में इसे उल्लेखित नहीं किया। इसे हम कृत्घ्नता ही मानेगें।

ग़ड़ोरी जाति की महिला
झाड़ू के फ़ुलकांसबहारी, छिनबहारी, खरहेराबहारी (बांस से निर्मित), बरियारी,बलियारी बहारी (बलियारी आयुर्वैदिक औषधि है,इसकी जड़ का प्रयोग पौरुष शक्ति बढाने में एवं पत्र एवं पुष्प भी औषधि रुप में प्रयुक्त होते हैं) , मोरपंखीबहारी (तांत्रिक उपयोग हेतु) आदि कई प्रकार हैं। छत्तीसगढ में झाड़ू का निर्माण गड़ोरी नामक जाति करती है। इनका मुख्य पेशा झाड़ू बनाना एवं शिकार करना ही है। विशेष कर ग़ड़ोरी लोग छिन की बहारी ही बनाते हैं। छिन की झाड़ू भारत से लेकर अफ़्रीका तक में बनती है। बांस की बहारी कंडरा जाति के लोग बनाते हैं। झाड़ू से झाड़ना शब्द बनता है।झाड़ू लगाना या सफ़ाई करना मेहतर या झाड़ूबरदार जाति विशेष का कार्य है। कभी-कभी वर्ष में राजा-महाराजा भी एक बार झाड़ू लगा लिया करते हैं, जगन्नाथ भगवान की रथ यात्रा के मार्ग को राजा सोने की झाड़ू से बुहारता है तब रथ यात्रा प्रारंभ होती है। बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के रथ भ्रमण का प्रारंभ राजवंशियों के झाड़ू से मार्ग बुहारने के पश्चात होता है। ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद स्वयं को जमीन नेता बनाने के लिए सड़क पर अक्सर झाड़ू लगाते हैं तथा सफ़ाई कर्मियों की बैठक में हिस्सा लेते हैं।

झाड़ू पर सवार गोरी चुड़ैल (गुगल से साभार)
बैगा-गुनिया,तांत्रिक मोर पंखी झाड़ू का उपयोग भूतप्रेत झाड़ने में करते हैं। मेरे नाना जी के पास भी मोर पंखी झाड़ू थी, जिससे वे झाड़-फ़ूंक करते थे। गोरी (अंग्रेज) चुड़ैलों का वाहन झाड़ू ही है। गोरी चुड़ैलों की कहानी में इन्हे झाड़ू पर सवार दिखाया जाता है, विदेशी कहानियों में इसका जिक्र आता है। भोपाल के मेलादपुर में मंदिर का पुजारी झाड़ू से पीट कर भूत उतारता है। यहाँ इतनी भीड़ होती है कि इसे भूतों का मेला कहा जाने लगा है। मनौती मानने के लिए लोग कई जगह झाड़ू की भेंट चढाते हैं। मुरादाबाद के बहजोई में बने मंदिर में शिव की झाड़ू से पूजा की जाती है,महादेव का आशीर्वाद झाड़ू चढ़ाकर मांगा जाता है, कहते हैं कि झाड़ू चढाने से भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी कर देते हैं।

उत्तरप्रदेश के जनपद मुज़फ्फरनगर के गाँव सोरम में साग्रीबपीर बाबा की मजार पर(जिसे लोग सोरम साग्रीब पीर और झाड़ू वाले पीर बाबा के नाम से भी जानते है) प्रसाद के रूप में झाड़ू चढ़ाई जाती है देश के कोने कोने से सभी धर्मो के श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मन्नत मांगने आते है | मान्यता है की किसी भी मनुष्य को कोर्ट कचहरी से बचना हो या फिर पारिवारिक विवाद ,या घरो में खटमल हो गए हो ,और या फिर किसी के शरीर पर मस्से हो गए हो तो यहाँ झाड़ू चढाकर मन्नत मांगने से इच्छा पूरी हो जाती है।चीन के जिलिन राज्य के चांगचुन शहर के निवासी जू मिंग ने गोल्डन रिट्रीवर प्रजाति के अपने कुत्ते को झाड़ू लगाना सिखाया। यह अपने मालिक के साथ सड़क पर टहलते हुए झाड़ू लगाता है। यह कुत्ता टहलते हुए हमेशा अपने मुंह में पकड़े हुए छोटे से झाड़ू से झाड़ता है।

फ़ुलकांस बहारी
मान्यता है कि झाड़ू लक्ष्मी का रुप है, यह घर की दरिद्रता को बाहर कर धन-समृद्धि लाती है।  जिस घर में साफ़-सफ़ाई रहती है, वहाँ लक्ष्मी का वास रहता है, दरिद्रता दूर होती है। जिस घर में झाड़ू नहीं लगती वहाँ भूत-प्रेतों का वास होने के कारण हमेशा आर्थिक विपन्नता रहती है। झाड़ू लगाने के नियम और कायदे भी हैं। झाड़ू को पैर नहीं लगाते, पैर लगने से इसे छूकर माफ़ी मांगी जाती है। इसे घर में दरवाजे के पीछे छुपा कर रख जाता है। कहते हैं कि अगर झाड़ू बाहर दिखाई देती है तो घर में कलह होता है। इसे बिस्तर पर एवं पूजा स्थान पर रखने एवं शाम एवं रात्रि के समय झाड़ू लगाने की मनाही है। धन-संपत्ति लाभ हेतू टोटका बताया जाता है कि रविवार या सोमवार को तीन झाड़ू खरीदकर उसे किसी मंदिर में रख देना चाहिए,ध्यान रहे कि झाड़ू ले जाते हुए एवं मंदिर में रखते हुए कोई देखे नहीं, इससे अर्थ जनित समस्याएं दूर हो जाती है। झाड़ू दरिद्रता दूर करने के टोटके के भी रुप में काम आती है। सपने में झाड़ू देखना हानिकारक बताया गया है।

बेबी हालदार (गुगल से साभार)
झाड़ू ने लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया, एक झाड़ू के सहारे परिवार चलता है। गरीबी एवं विपत्ति के समय अनपढ या कम पढी-लिखी महिलाओं का झाड़ू-पोंछा जीवन यापन का सहारा बनता है। झाड़ू पोंछा करने वाली बेबी हालदार आज एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के रुप में स्थापित है। "आलो आँधारि" लिख कर उनकी कीर्ति पुरी दुनिया में जगमगा रही है। विश्व के कई देशों में भ्रमण कर चुकी बेबी हालदार को हांगकांग जाते समय दिल्ली एयरपोर्ट  पर रोक दिया गया। उसे सिक्योरिटी वाले लेखिका बेबी हालदार मानने को तैयार नहीं थे। लेखिका होने के साथ दिखना भी जरुरी है। बेबी साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेकर हांगकांग, पेरिस से होकर आ चुकी है और आज वह देश के भी कई शहरों में वायुयान से आती-जाती हैं, जो उनकी संघर्ष का नतीजा है। न्यूयार्क टाइम्स, बीबीसी, सीएनएन-आइबीएन आदि पर उसका इंटरव्यू आ चुका है।

छिन (खजुर के जैसा वृक्ष) झाड़ू
बेलन के पश्चात झाड़ू ही एक ऐसा शस्त्र है, जो गृहणी को सदा सुलभ रहता है, कई जगह इस मारक शस्त्र का प्रयोग होते भी देखा जाता है। गृहणी को क्रोध आने पर झाड़ू युद्ध एवं उसकी मूठ से कुटाई होने की आशंका बनी रहती है। लंदन के एक घर में दो हथियारबंद लुटेरे चोरी की नीयत से घुस गए। 90 एवं 49 वर्षीय दो व्यक्तियों को बांधकर उनसे 50 डालर छीन लिए। जब वे सीढियाँ चढ कर उपर जाने लगे तो एक 43 वर्षीय महिला से सामना हो गया जो झाड़ू लेकर उनका इंतजार कर रही थी। उसका रौद्ररुप एवं हाथ में झाड़ू देखकर चोरों के होश उड़ गए और वे भाग खड़े हुए। इस तरह झाड़ू ने एक घर को लुटने से बचा लिया। झाड़ू कारगर हथियार है, अगर समय पर उपलब्ध हो जाए तो।

बलियारी का पौधा
चोर मौका पाते ही झाड़ू लगा जाते हैं, सरकार भी झाड़ू लगाती है, क्रिकेटर भी झाड़ू लगाकर (स्वीप) रन बनाते हैं। झाड़ू आदिमकाल से मानव की सेवा में रत है। इसके बिना घर की स्वच्छता की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी के पास मकान नहीं पर भी उसके पास एक अदद झाड़ू मिल ही जाएगी। कच्चे-पक्के घरों एवं आंगन को बुहारने के लिए पृथक-पृथक झाड़ूओं का प्रयोग होता है। छत्तीसगढ अंचल में धान पकने के पश्चात ब्यारा (खलिहान) का निर्माण किया जाता है। धान मींजने(निकालने) के लिए बेलन या ट्रेक्टर चलाने लायक भूमि की घास को छील कर उसे गोबर से लीपा जाता है। जिससे धान के दाने खराब न हों। लीपने के कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व ब्यारा में होम धूप देकर बलियारी की झाड़ू से ही लीपा जाता है। बलियारी बलवर्धक माना जाता है। इस तरह झाड़ू हमारे जीवन का एक अंग है। जिसके बिना हम दिन की शुरुवात करने की कल्पना ही नहीं कर सकते। सुरज भी कभी-कभी साथ छोड़ देता है, उगता नहीं या बादल ढक लेते हैं। परन्तु झाड़ू प्रत्येक काल परिस्थिति में मानव का साथ निभाते आई है। इसलिए वैदिक वांग्मय ने इसे सम्मार्जनी कह कर सम्मानित किया, मानव समाज के लिए झाड़ू वंदनीय है।

शनिवार, 30 जुलाई 2011

हरेली अमावस और जादू-टोना की रात

पंजा जोड़ी- बैगा ने पत्थर से निकालना बताया, जीवाश्म हो सकता है
त्तीसगढ अंचल में सावन माह को तन्त्र-मंत्र और जादू टोने के साथ जोड़ा जाता है एवं सावन माह को ग्रामांचल में काफ़ी महत्व दिया जाता है। प्रत्येक ग्राम में एक बैगा होता है, जो गाँव के देवी-देवताओं की पूजा करके उन्हे परम्परागत ढंग से मनाता है। सावन में प्रत्येक ग्राम वासी से चंदा करके गाँव बांधने एवं देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।  इसे सावनाही बरोना कहते हैं, सावन के प्रथम सोमवार की रात को पूजा का सामान लेकर अपने चेलों के साथ बैगा गाँव की चौहद्दी सीमा (सरहद-सियारा-मुनारा) में अपने चेलों के साथ जाता है, तथा जिस स्थान पर देवी-देवता का स्थान नियत है, उस स्थान पर होम-धूप देकर पूजा करता है। ग्राम के बाहर खार (खेत) में भैंसासुर, सतबहनिया, शीतला, ग्राम देवता, आदि का निवास माना जाता है तथा ग्राम की भीतर सांहड़ा देव, महादेव, हनुमान जी, दुर्गा देवी एवं अन्य देवताओं का निवास मानते हैं।

सावनाही रेंगाना - ग्राम सीमा में टोटका
बैगा खार (खेतों) के नियत स्थानों पर पर देवी-देवताओं की पूजा करके गाँव की सीमा में एक स्थान पर विशेष पूजा करता है, जिसे गांव बांधना कहते हैं। सावन सोमवार को गाँव बांधने की पूजा के कारण ही सभी स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी रहती है, जब हम स्कूल में पढते थे तब भी होती थी और आज भी होती है। इस दिन गाँव के सभी लोग छुट्टी करते हैं काम से और किसी दुसरे गाँव भी नहीं जाते। गाँव बांधने की तांत्रिक पूजा में लाल, काले, सफ़ेद छोटे छोटे झंडे, नींबु, काली हंडी, बांस की टोकनी (चरिहा) खुमरी (बांस की बनी टोपी) नारियल होम-धूप, लकड़ी की बैलगाड़ी का प्रतीक, दारु, मुर्गी इत्यादि का प्रयोग होता है। इस पूजा में बैगा सभी देवी-देवताओं का आह्वान करके उनसे गाँव की रक्षा का निवेदन करता है कि गाँव में धूकी (हैजा-कालरा) भूत-प्रेत, टोना-टोटका एवं अन्य दैविय प्रकोप न हो। इसके बाद एक मुर्गी को जिंदा छोड़ा जाता है और फ़िर उस पूजा स्थल को दुबारा पीछे मुड़ के नहीं देखा जाता। बीमारियों को दैविय प्रकोप से जोड़ कर देखा जाता है। गाँव बांधने बाद सभी लोग घर नहीं जाते, गाँव के बाहर स्थित स्कूल, मंदिर या ग्राम पंचायत भवन में रात गुजार देते हैं। मान्यता है कि इनके साथ कहीं भूत-प्रेत गांव में प्रवेश न कर जाए। फ़ोड़े गए नारियलों का प्रसाद ये ही लोग खाते है, घर लेकर नहीं जाते।

टोटका का सामान-  श्वेत-लाल-काले ध्वज
गाँव में किसी के बीमार होने पर लोग सबसे पहले बैगा के पास ही इलाज के लिए जाते हैं, बैगा झाड़-फ़ूंक एवं परम्परागत जड़ी-बूटियों से इलाज करता है। बैगा के इलाज से स्वस्थ न होने पर ही लोग कस्बों एवं शहरों की तरफ़ इलाज के लिए उन्मुख होते हैं। इन्हे अपनी परम्परागत चिकित्सा एवं टोने-टोटके में अत्यधिक विश्वास है। इनका पारम्परिक मान्यताओं पर विश्वास ही पढे लिखे लोगों को अंधविश्वास दिखाई देता है। जबकि पारम्परिक जड़ी-बूटियों से भी कारगर इलाज होता है। विद्याअध्यन काल में मीठा खाकर घर से बाहर निकलने पर मुझे बुखार जैसा लग कर हाथ पैरों में दर्द के साथ ठंड लगने लगती थी। तब चुल्हे के पास बैठ कर उसकी गर्मी से बदन को सेकता था। एक बैगा हमारे यहाँ काम करता था, उसके एक बार झाड़ने फ़ुंकने से ही मैं ठीक हो जाता था। अब तो बरसों से ऐसी स्थिति नहीं बनी है। लगता है कि बैगा की विद्या भी काम करती थी।

बैलगाड़ी के प्रतीक का उपयोग
सावन की अमावस को हरेली का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बैगा और उसके चेले मंत्र सिद्ध करते हैं। गुरु नए चेलों को मंत्र दीक्षा भी देते हैं। गाँव के एकांत में नियत स्थान पर एकत्र होकर सभी तांत्रिक क्रियाओं को अंजाम देकर बैगा चेलों को जड़ी-बूटियों की पहचान भी बताते हैं। मेरी भेंट सिलोंधा निवासी दल्लु बैगा से हुई, ये साँप भी पकड़ते हैं एवं बैगाई-गुनियाई भी करते है। इनके पास मैने एक से एक सांप देखे जिसमें लगभग 9 फ़िट का किंग कोबरा भी था। जब उसकी फ़ोटो लेने लगा तो वह सिर उठाकर फ़ोटोशेसन करवाने लगा। सिर घुमाकर चारों तरफ़ देखता था। मैने दल्लु बैगा से टोनही देखाने को कहा। तो बैगा ने कहा कि टोनही तीन प्रकार की होती है,श्वेत, लाल और काली। आपको टोनही देखना है तो दैइहान (चारागन-जहां पशु एकत्र होते हैं) में अमावस की रात 12-1 बजे को एक नारियल लेकर खड़े हो जाओ, सब दिख जाएगा। एक से एक टोनही मिलेगी झुपते हुए, लेकिन उसके लिए तंत्र-मंत्र का इंतजाम करना पड़ेगा।

दल्लु बैगा - सिलोंधा वाले
मैने उसे अपने साथ चलकर टोनही दिखाने का आग्रह किया। उसने अनजान आदमी के लिए खतरा बताया। मैने कहा कि अपनी गारंटी मैं लेता हूँ और तुम्हे लिखित में देता हूँ कि अनहोनी होने पर मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। उसे मेरा प्रस्ताव पसंद नहीं आया। उसने कहा कि-"मैं आपको जड़ी दे सकता हूँ, उसके प्रभाव से आपको कुछ नहीं होगा, लेकिन मैं आपके साथ नहीं जाऊंगा, आपको अकेले ही जाना पड़ेगा।" इसका तात्पर्य यह था कि वह पल्ला झाड़ना चाहता था। परन्तु मैं भी जिद्दी आदमी हूँ, समय मिलने पर उसके गाँव तक जाऊंगा और सत्यान्वेषण करुंगा, छोड़ुंगा नहीं। उसने सांपों का जहर सेवन की भी बात बताई। उसका कहना था कि वे सांपों का जहर निकाल कर खाते भी हैं और बेचेते भी हैं। मैं जहर निकाल कर खाते हुए फ़िल्माना भी चाहता हूँ। देखते हैं यह अवसर कब आता है?

हत्था  जोड़ी
आज हरेली त्यौहार है, कुछ और बैगाओं को पकड़ते है, जिससे हमें भी ज्ञान मिले। अज्ञात से ज्ञात होना तो सभी चाहते हैं, लेकिन जो जानकार होने का दावा करते हैं वे सामने आने पर बहाना बनाकर भाग जाते हैं।हरेली त्यौहार मूलत: किसानों का त्यौहार है जिसमें बोआई के पश्चात किसान अपने कृषि यंत्रों को धो मांज कर उनकी पूजा करते हैं। घर में पकवान बनाकर भगवान को होम जग देते हैं। सावन में जल-जनित बीमारियाँ की रोकथाम के लिए गाँव के देवताओं से निवेदन करते हैं। गेंडी चलाकर उत्सव मनाते हैं। पता नहीं कैसे हरेली त्यौहार को लोगों ने टोना-टोटका एवं तंत्र-मंत्र से जोड़ दिया। मुझे भूत-प्रेत एवं जादू टोने पर विश्वास नहीं है। ऐसे अवसर ढूंढते रहता हूँ कि भूत-प्रेत से भेंट हो, पर नहीं होती तो क्या करें। आज जंगल के गावों में जाकर जादु-टोना देखने का विचार है, रात को बैगाओं के तंत्र-मंत्र के प्रयोग भी देखना है। सभी को हरेली त्यौहार की शुभकामनाएं।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

क्या 21 मई को दुनिया खत्म हो जाएगी? --- ललित शर्मा

21 मई कयामत का दिन (जजमेंट डे)है, इस दिन से दुनिया के खत्म होने का सिलसिला शुरु हो जाएगा जो 20 अक्टुबर तक चलेगा। 20 अक्टुबर को पूरी दुनिया खत्म हो जाएगी। ऐसा कहना है अमेरिका के ज्योतिष हेराल्ड कैपिंग का। उसका कहना है कि 70 वर्षों के शोध के पश्चात उसने उपरोक्त तारीख निकाली है। सिर्फ़ दो फ़ीसदी लोग स्वर्ग में जाएगें। एक समाचार के अनुसार इस आशय के होर्डिंग भी लगने लगे हैं। जिससे लोगों में दहशत बन रही है।
यह एक तरह से सम्प्रदाय विशेष का प्रचार तंत्र है। इस बहाने पुरी दुनिया में दहशत फ़ैला कर सम्प्रदाय का प्रचार करना ही मुख्य उद्देश्य है। मुर्खता पूर्ण प्रचार-प्रसार भी शुरु है। इस दुनिया से जब 2 फ़ीसदी लोग ही स्वर्ग में जाएगें तो बाकी कहाँ रहेगें? वैसे भी 2 फ़ीसदी लोग धरती पर ही स्वर्गिक आनंद ले रहे हैं। बाकी जनता तो नरक में ही पड़ी  है।
वैसे पहले भी पोप ने रुपए लेकर स्वर्ग के टिकिट बांटे थे। साल दो साल में कोई भी सिरफ़िरा दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणी कर देता है और मीडिया उसे हाथों-हाथ उठा लेता है। इस तरह के भ्रामक एवं असत्य प्रचार से मीडिया को बचना चाहिए। इस आशय की होर्डिंग लगाकर मिथ्या प्रचार करने वाले पर स्थानीय प्रशासन को कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए।

आप क्या कहते हैं, कितनी सत्यता है हेराल्ड कैपिंग की भविष्यवाणी में? होर्डिंग पर इनका वेब एड्रेस भी है।