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सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

लाडमल्लिका और टुटवा गोरा साहब: चुनारगढ़

रानी झरोखे से गंगा नदी का दृष्य
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विंध्याचल पर्वत श्रेणी में कैमूर पर्वत स्थित चुनारगढ़ चरण के आकार की आधा मील चौड़ी एवं 1 मील लम्बी पहाड़ी पर वाराणासी से 45 किली मीटर की दूरी पर स्थित है। किंवदन्ति है कि जब भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी थी तब उन्होने वामन अवतार लेकर अपना पहला चरण इस स्थान पर ही रखा था। भगवान के चरणरज इस पहाड़ी पर पड़ने के कारण इसका नाम चरणाद्रिगढ़ पड़ा। चुनारगढ का संबंध द्वापर युग से भी जोड़ा जाता है। कहते हैं कि जरासंध ने पराजित राजाओं की 16 हजार रानियों को इस किले के विशाल अंधकारमय तहखाने में कैद किया था। यहाँ पर गंगा जी में जरगो नामक नदी आकर मिलती है तथा जरगो नदी पर बांध भी बना हुआ है। किवंदन्तियों,  जनश्रुतियों एवं मान्यताओं के आधार पर इस स्थान की प्राचीनता एवं पौराणिकता सिद्ध होती है। इस गढ़ का निर्माण बलुए पत्थर से हुआ है।

कभी गंगा के इसी मैदान में सेनाएं आमने सामने होती थी
चुनारगढ़ के भवनों को देखने से प्रतीत होता है कि इनका निर्माण भिन्न भिन्न कालखंडों में हुआ है अर्थात यह गढ़ भिन्न भिन्न काल में भिन्न भिन्न शासकों का शासन केन्द्र रहा।  प्राचीन हिन्दू, राजपूत, मुगल, ब्रिटिश स्थापत्य शैली से निर्मित भवन दिखाई देते हैं। गढ़ में मुख्य द्वार के बाईं तरफ़ मेहराबदार द्वार दिखाई देता है जिन पर उर्दू में लिखा है। मुगल शैली के भवन मेहराबदार होते थे। इससे स्थापित होता है कि गढ़ पर मुगलों का कब्जा भी रहा है। राजा भृतहरि की समाधि वाला भवन हिन्दू  स्थापत्य शैली में निर्मित है तथा रानी झरोखा राजपूत शैली का है। गढ़ में स्थित कारागार एवं विश्रामगृह ब्रिटिश शैली का होने के कारण ब्रिटिश शैली में निर्मित है। जाहिर है कि मिश्रित स्थापत्य शैली के इस गढ़ पर अंग्रेजों का भी कब्जा था।

सैनिकों की बैरकें
अगर चुनारगढ़ के इतिहास पर दृष्टिपात करे तो ज्ञात होता है कि बंगाल पर शासन करने के लिए चुनारगढ़ अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था। शासन करने की दृष्टि से आक्रमणकारियों को चुनारगढ़ पर कब्जा करना अत्यावश्यक रहा होगा। जनश्रुति है कि इस चरणाद्रिगढ़ (चुनारगढ़) का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने भ्राता राजा भृतहरि (भरथरी) के सन्यास (वनवास ) काल में उनके निवास के लिए बनवाया था। मीरजापुर गजेटियर के अनुसार इस गढ़ का निर्माण 56 ईं पू हुआ था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह गढ़ 7 वीं शताब्दि में निर्मित हुआ था। इसके दोनो तरफ़ गंगा प्रवाहित होती है। गजेटियर के अनुसार इस किले पर राजपूतों, मुगलों, अफ़गानों एवं अंग्रेजों का आधिपत्य रहा है।

स्थापत्य शैली का मिश्रण-कारागार एवं भृतहरि समाधि भवन
प्राप्त अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के पश्चात इस गढ़ पर 1166 से 1191 तक पृथ्वीराज चौहान का आधिपत्य रहा। 1192 ईंस्वी में शहाबुद्दीन गौरी से पृथ्वीराज चौहान तराईन के युद्द में पराजित हो गया। दिल्ली पर गौरी का कब्जा होने से चुनारगढ़ स्वत: उसके नियंत्रण में आ गया। शहाबुद्दीन गौरी की मृत्यु कुतबुद्दीन ऐबक गद्दी पर बैठा। 1333 ईस्वीं में किसी स्वामीराज के आधिपत्य का जिक्र आता है। मैने कहीं स्वामीराज का जिक्र नहीं पढा। चुनारगढ़ के इतिहास का कुछ कालखंड विलुप्त है। 1445 ईस्वीं से जौनपुर के मुहम्मदशाह शर्की, 1512 ईस्वीं से सिकन्दर शाह लोदी, 1529 से बाबर के कब्जे में रहा। 

सोनवा मंडप का गलियारा
1530 में बाबर की मृत्यु के पश्चात 1529 ई. में बंगाल शासक नुसरतशाह को पराजित करने के बाद शेरशाह सूरी ने हजरत आली की उपाधि ग्रहण की। 1530 ई. में उसने चुनार के किलेदार ताज खाँ की विधवा लाडमलिका से विवाह करके चुनार के किले पर अधिकार कर लिया। शेरशाह सुरी ने इस गढ़ का पुनर्निर्माण कराया। 1532 ईस्वीं में हुमायूँ ने चुनार के गढ़ पर आधिपत्य स्थापित करने के इरादे से घेरा डाला। 4 महीने के घेरे के बाद भी इस गढ़ को नहीं जीत पाया। फ़िर उसने शेरशाह से संधि कर ली और गढ़ शेरशाह के पास ही रहने दिया। 1538 में हुमायूँ ने अपनी अपने तोपखाने के साथ गढ पर पुन: आक्रमण किया तथा चालाकी से गढ़ पर कब्जा कर लिया। 

प्रस्तर निर्मित कारागार
इसके पश्चात यह गढ़ 1545 से 1552 तक इस्लामशाह कब्जे में रहा। 1561 ईस्वीं में अकबर ने अफ़गानों को हरा कर इस पर कब्जा किया। 1575 से अकबर के सिपहसालार मिर्जामुकी और 1750 से मुगलों के पंचहजारी मंसूर अली खां का शासन इस गढ़ पर था। तत्पश्चात 1765 ई. में किला कुछ समय के लिए अवध के नवाब शुजाउदौला के कब्जे में आने के बाद शीघ्र ही ब्रिटिश आधिपत्य में चला गया। शिलापट्ट पर 1781 ई में वाटेन हेस्टिंग्स के नाम का उल्लेख अंकित है। अंग्रेजों की तोपखाना पलटन यहाँ रहा करती थी। उन्होने भी यहाँ निर्माण कार्य करवाया। द्वितीय विश्व युद्ध के युद्धबंदियों को इस गढ़ में रखने का उल्लेख मिलता है। 1942 के महाजागरण के राष्ट्रवादी बंदी भी इस गढ में रखे गए थे।

कब्रों में दफ़्न अंग्रेज
इतिहास में दर्ज है कि चुनारगढ़ ने निरंतर युद्ध अपने वक्ष पर झेले। अनेकों राजाओं के फ़ांसी घर के रुप में भी यह कुख्यात रहा। सिर कटा कर सिद्धी प्राप्त करने वालों का भी स्थान रहा है। काली मंदिर में शीश चढाने लोग चले आते थे।  इसने शासकों के सभी रंग - ढंग और ठसके देखे। गढ़ के समीप बनी अंग्रेजों की कब्रें चुनारगढ़ के इतिहास की मूक गवाह हैं। इन कब्रों में पता नहीं कहाँ कहाँ के अंग्रेज दफ़्न पड़े हैं। कब्रों पर उनके नाम के लिखे शिलापट ही अब उनकी पहचान रह गए हैं। समय की मार से ये शिलापट भी धूल धुसरित हो जाएगें। उनके नाम फ़ना हो जाएगें जो हाथ में हंटर लेकर तोपखाने और बंदूकों के बल पर शासन करते थे। समय की मार से कुछ नहीं बचा इस नश्वर लोक में। वे सब धराशायी हो गए जिन्हें बलशाली होने का गुमान था। अगर वे जिंदा हैं तो सिर्फ़ किस्से कहानियों में और इतिहास की गर्द से भरी किताबों में। मेरे जैसा कोई घुमक्कड़ जब आता है तो उन किताबों का गर्द झाड़ कर एक बार इतिहास पर दृष्टिपात कर लेता और पुन: कब्र से निकल पड़ता है टुटवा गोरा साहब हाथ में चमड़े का हंटर लिए। नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढ़ें ……

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

राजा भृतहरि, रानी झरोखा एवं वध स्थल : चुनारगढ़

चुनारगढ़ का मुख्य द्वार
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न्मुक्त द्वार हमें प्रवेश के लिए आकर्षित कर रहा था। प्रवेशाग्रह को स्वीकार कर हमारी "ईको" भी सरसराते-बलखाते हुए उन्मुक्त द्वार से प्रवेश कर गई। भीतर जाने पर खाकी वर्दी वाले दिखाई पड़े तो चौंकना पड़ गया। हमने गाड़ी विश्राम गृह तक चढा दी थी। एक सिपाही दौड़ कर आया तो हमने भीतर का रास्ता पूछा तो उसने गाड़ी गेट पर खड़े करने कहा और बताया कि इस गढ़ में उत्तरप्रदेश पुलिस का दरोगा प्रशिक्षण केन्द्र है। पाबला जी गाड़ी बाहर खड़ी करने गए और मैने आवक पंजी में अपना नाम, पता एवं आने का उद्देश्य दर्ज किया। सामने बनी बैरकों के बीच से गढ़ पर जाने का रास्ता है। द्वार पर भृतहरि शतकम का श्लोक लिखा है।

भवनों का प्रवेश द्वार
हम भवनों ओर जा रहे थे तभी एक व्यक्ति मिला और उसने बताया कि वह गाईड है। मैने सोचा कि रख लिया जाए वरना भवनों पर तो कोई नाम पट्ट लिखा नहीं है, जिससे हमें जानकारी मिल जाए। गाईड ने 150 रुपए पारिश्रमिक कहा और मैने 50 रुपए। वह तैयार नहीं हुआ, मैने फ़िर पूछा तो वह नखरे करता रहा। थोड़ी देर में 50 रुपए में मान गया। गढ़ की पहाड़ी के 90 प्रतिशत भाग पर पुलिस का कब्जा है, सिर्फ़ 10 प्रतिशत भाग ही आम आदमी के दर्शनार्थ खुला छोड़ा गया है। वैसे भी भारत के कई किले और दुर्ग पुलिस एवं सेना के कब्जे में है। सिर्फ़ लाल किले को ही सेना से मुक्त किया गया है। लेकिन ये पता नहीं है कि अब पूरे किले में घूमने दिया जाता है या नहीं।

एड़ी के आकार की गढ़ संरचना एवं गंगा नदी
एड़ी आकार के चुनारगढ़ के उपरी घेरे में प्रवेश करने पर सामने सोनवा मंडप दिखाई देता है। कहा जाता है कि महोबा के उद्भट योद्धा आल्हा का विवाह इसी मंडप में हुआ था। प्रस्तर निर्मित इस मंडप पे चूने की पोताई की हुई है। मंडप के प्रवेश द्वार के अलंकरण में छिद्र दिखाई देते हैं। गाईड ने कहा कि इन छिद्रों में हीरे, मोती, पन्ना, नीलम इत्यादि रत्न जड़े हुए थे तो मैने उसे डांट दिया - "झूठ बोलते हो, यह तो प्रस्तर पर बेल-बूटों का अलंकरण है यहाँ रत्न जड़ने की जगह एवं उखाड़ने का स्थान ही दिखाई नहीं देता। रत्न संगमरमर पर जड़े जाते थे, जिससे उसकी आभा बढ जाती थी तथा बलुए पत्थरों पर भित्तियों में कहीं पर मैने रत्नालंकरण नहीं देखे। पर्यटकों को झूठ बोल कर रोमांचित करने की बजाए सत्य से अवगत कराना चाहिए। यह एक परम्परा ही चल पड़ी है, किसी भी प्राचीन इमारत में जाओ, वहां भित्तियों पर रत्न जड़ने का जिक्र अवश्य ही गाईड करते हैं।" मेरी लताड़ सुनकर वह झेंप गया।

सोनवा मंडप एवं तहखाने का रास्ता
गिरीश भैया एवं पाबला जी अपनी अलग ही दुनिया में व्यस्त थे। धड़ाधड़ फ़ोटो लिए जा रहे थे, लगता था, गढ़ के इतिहास में कुछ विशेष रुचि नहीं है। सोनवा मंडप के पश्चिम मे बारहदरी है, उसके पीछे एक भवन में कुछ लोग दिखाई दिए। वहाँ जाने पर पता चला कि यहाँ राजा भृतहरि की समाधि है तथा वे यहाँ के पुजारी हैं। चुनारगढ़ का प्राचीन नाम चरनाद्रिगढ़ बताया जाता है। राजा विक्रमादित्य ने इसका निर्माण अपने भाई राजा भृतहरि के तप हेतू वनगमन के कारण वन्य पशुओ से रक्षार्थ गंगा नदी के तट पर करवाया था। यह गढ़ धरातल से लगभग 500 फ़ुट की उंचाई पर है दो तरफ़ गंगा नदी प्रवाहित होती है। गढ़ के उपर से गंगा जी की विशाल जलराशि दिखाई देती है। टाईल्स लगा कर समाधि को चमकाया गया है तथा लोग इस स्थान पर मनौतियाँ मानने आते हैं।

राजा भृतहरि की समाधि
इसके पीछे एल आकार की भवन संरचना है, जिसकी खिड़कियों से गंगा नदी दिखाई देती है। खिड़कियों में मोटे सरिए लगे हुए हैं। गाईड ने बताया कि यह विशिष्ट जनों की जेल है। मानो लालू, ए राजा, कन्नीमोझी, आशाराम सरीखे विशिष्ट कैदी रखे जाते थे। यह स्थान खुला-खुला एवं हवादार है। जिससे विशिष्ट कैदियों को हवा-पानी बराबर मिलता रहे और गंगा दर्शन कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें। इसके साथ ही नीचे तहखाने बताए जाते हैं, मुझे तो कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया पर फ़र्श को ठोकने पर पोली आवाज आती है। इससे स्त्यापित होता है कि अवश्य ही भवन के नीचे तहखाने होगें। क्योंकि तत्कालीन शिल्प में तहखाने महत्वपूर्ण स्थान रखते थे।

कचहरी से दिखाई देता रानी झरोखा
इस हॉल से जुड़ा हुआ एक कक्ष है जिसमें सुरक्षा की दृष्टि से शतघ्नि रखकर संचालित करने के लिए दीवार में मोखे बनाए गए हैं। जहाँ शतघ्नि को रख कर सुविधानुसार चलाया जा सके। गाईड बताता कम था और सुनता अधिक था। वो भी सोच रहा था कि 50 रुपए में कितना सुनना पड़ता है :), अभी तक तो वह कथा सुनाता आया है, आज सुननी पड़ रही है। इस कक्ष की विपरीत दिशा में रानी झरोखा बना हुआ है। इस झरोखे का काफ़ी अलंकरण किया गया है तथा इस झरोखे से कचहरी दिखाई देती है। तत्कालीन समय में कचहरी के काम-काज पर रानी की नजर रही होगी। ये सभी इमारतें बलुए पत्थर से निर्मित हैं। कुछ निर्माण तो प्राचीन एवं कुछ निर्माण 14 वीं 15 वीं शताब्दी के दिखाई देते हैं जिनमें मुगल शैली की झलक दिखाई देती है।

कारागार
इस भवन के दांई तरफ़ कारागार का निर्माण किया गया है। यह कारागार लगभग 80 फ़ुट लम्बा और 30 फ़ुट चौरा होगा। इसमें कई कक्ष बने हैं तथा लोहे के मजबूत किवाड़ों से सुरक्षित किया गया है। गाईड ने बताया कि इस जेल का निर्माण वारेन हेस्टिंग्स ने कराया था तथा इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने वाले बंदी रखे जाते थे। शिल्प की दृष्टि से मुझे यह कारागार किसी घुड़साल जैसे दिखाई दिए, जिनकी बनावट में कुछ परिवर्तन करके परवर्ती शासकों ने इसे कारागार का रुप दे दिया। किवाड़ों पर लोहे की मोटी एवं मजबूत सलाखें जड़ी हुई हैं। इलेक्ट्रिक वेल्डिंग न होने के कारण ये किवाड़ लोहार द्वारा निर्मित प्रतीत होते हैं। लोहे के ऐसे किवाड़ों का निर्माण अंग्रेजों के काल में होता था। मैने किवाड़ के पीछे खड़े करके गिरीश भैया की तश्वीर ली।

वध स्थल
गढ़ के अन्य भवनों में कचहरी प्रमुख है। गाईड ने बताया कि इसका निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था। कचहरी में तीन कक्ष दिखाई देते हैं तथा एक बड़ा दालान है। जिसमें फ़रियादी और फ़रियाद सुनने वाले अधिकारी स्थान पाते होगें। कचहरी से लगा हुआ कारागार है। सजायाफ़्ता को तुरंत ही कारागार में डाला जाता होगा। कचहरी के साथ कारागार होने के कारण बंदी व्यक्ति के भागने की आशंका नगण्य होती होगी। कचहरी के समक्ष ही दंड स्थल है। जहाँ सिर कलम करके एवं फ़ांसी द्वारा दंड देने की व्यवस्था है। जिसकी जैसी इच्छा होती थी वैसी मृत्यू चुन लेता होगा। कचहरी से गंगा तट की ओर झांकने पर किले की प्राचीर से लगकर वध स्थल बना हुआ है।

सुरंग का मुहाना
गाईड ने एक स्थान पर सुरंग दिखाई, जिसे ईंटों से बंद कर दिया गया है। चंद्रकांता उपन्यास में चुनार गढ़ से आस पास के गढों में जाता हुआ सुरंगों का जाल दिखाई देता है। परन्तु मुझे लगता है कि हकीकत में ऐसा नहीं होगा। जनमानस को रोमांचित एवं भयभीत करने हेतु सुरंग के किस्सों को गढ़ा गया होगा। इस सुरंग के साथ ही सैनिकों के बैरेक बने हुए हैं। जिसमें गढ़ के सुरक्षाकर्मी एवं प्रहरी निवास करते होगें। सारी व्यवस्था चाक चौबंद दिखाई देती है। अनुमान है कि प्रहरियों की संख्या खासी रही होगी। क्योंकि दुश्मन गंगा की दिशा में कमंद डाल कर गढ़ में प्रवेश करने का रास्ता बना सकता था। गंगा की तरफ़ से गढ़ में सीधी चढाई नहीं है। बाहर की ओर निकली हुई चट्टानें दुश्मन के आक्रमण में सहायक हो सकती हैं।

कुंए में काल्पनिक सुरंग का रास्ता
एक कोने में वह प्रसिद्ध कुंआ है, जिसमें सुरंग मार्ग होने का जिक्र हमेशा सुनाई देता है। गाईड ने बताया कि कुंआ 85 हाथ गहरा है। पहाड़ी पर 85 हाथ गहरे कुंए को हम पातालतोड़ कुंआ कह सकते हैं। पत्थरों से बांधे गए इस कुंए में सीढियाँ बनी हुई हैं तथा दो स्थानों पर द्वार जैसी संरचना भी दिखाई देती है। जिसके समक्ष प्रकाश के हेतू मशाल रखने के लिए पत्थर का ठिया भी बना हुआ है। इससे थोड़ा नीचे एक बड़ा द्वार भी है, जिससे पैड़ियाँ एक कक्ष में पहुचती है। कुंए में ऐसी व्यवस्था संकट काल में गुप्त वार्तालाप करने के लिए बनाई जाती थी। जिससे लोगों को इसके सुरंग होने का भ्रम होने लगता था और ऐसी लफ़्फ़ाजियों का जन्म होता था जो अभी तक जनमानस में प्रचलित हैं।
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शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

कुल्हड़ का वामन अवतार : चुनारगढ़

तीन तिकट-महा विकट  
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जैविक घड़ी ने संकेत दे दिया कि जागने का समय हो गया है, 4 बजे भोर में ही आँख खुल गई। सबसे पहले मैं स्नानादि से निवृत्त होकर तैयार हुआ तब पाबला जी और गिरीश भैया को जगाया गया। साढे 4 बजे हम स्वागत कक्ष में पहुंचे तो किवाड़ों पर ताला लटका हुआ था। काऊंटर न कोई बंदा, न बंदे की जात। आवाज देने पर भी कोई नहीं आया। वहीं 3-4 बंदे सोए थे लेकिन आवाज सुनकर कोई चुस्का ही नहीं। सभी मकरासनस्थ थे। एक को उठाने पर उसने कहा कि वह ड्रायवर है। फ़िर रात को जिस छोकरे ने खाना खिलाया था वह सोया हुआ दिखाई दिया। उसे उठाया गया, जागा हुआ तो वह पहले से था, पर मकरासन कर रहा था। पता चला कि स्वागताधिकारी अस्नान के लिए गए हैं। उनके आने पर किवाड़ खुले और हम 5 बजे बनारस के लिए रवाना हुए। जीपीएस को बता दिया गया था कि बनारस जाना है।

चुनार की वादियों का सौन्दर्य 
कुछ दूर मुख्य मार्ग पर चलने के बाद जीपीएस ने सिंगल रोड़ पर गाड़ी मोड़ दी। हम आगे बढते रहे। कुछ देर बात मील के पत्थर चुनार का पता बताने लगे। पहाड़ियों के बीच गाड़ी चली जा रही थी। छोटे-छोटे गाँव के साथ कुछ कस्बे भी थे। हमें बनारस जाना था इसलिए अधिक ध्यान नहीं दिए। रास्ते में गंगाजी किनारे कुछ भगवे वस्त्रधारी दिखाई दिए। साथ एक बड़ी गाड़ी भी। जिसमें श्वेतवस्त्रधारी भी थे। नदी के किनारे खड्ड में उतर रहे थे। वहाँ पर कोई मंदिर था तथा किसी आयोजन के संकेत दिखाई दे रहे थे। वहाँ से आगे चलने पर शक्तेसगढ नामक आश्रम दिखाई दिया। वे सभी साधू इस स्थान पर ही रहते हैं। कुछ कमंडलधारी आयोजन स्थल की बढते दिखाई दे रहे थे।

निर्माण सामग्री स्थल 
इस स्थान पर प्राकृतिक भूदृश्यावली मनमोहक है। चारों तरफ़ पहाड़ियाँ और उसके बीच मैदान से चलती हुई चेचक के धब्बेधारी बलखाती सड़क के दोनो तरफ़ खेतों में लहलहाती हुई फ़सल मनोहारी थी। आगे चलकर यह सड़क दो पहाडियों के बीच से निकलती है। इस पड़ाड़ी के चट्टानों पर मुझे निर्माण सामग्री के लिए पत्थर निकालने के संकेत दिखाई दिए। हो सकता है कि गढ़ के निर्माण के लिए पत्थर यहीं से निकाले गए होगें। प्राचीन काल में चट्टान तोड़ने के लिए सबसे पहले चट्टान में लंबवत 3-4 इंच के सुराख किए जाते थे फ़िर सूखी लकड़ियों को ठोक कर उसमें पानी दिया जाता था। लकड़ी फ़ूलने पर चट्टान में दरार पड़ जाती थी फ़िर उसे वहाँ से अलग कर लिया जाता तथा निर्माण सामग्री की मांग के अनुसार इसी तरह चौरस करके उपयोग में लाया जाता था।

पहाड़ियों के बीच सर्पीली सडक
जब से चुनारगढ का मील का पत्थर देखा तो प्रौढ़ता को प्राप्त सड़क के चेचक के धब्बे दिखाई देने बंद हो गए, सड़क अब किसी नवयौवना सी खूबसूरत दिखाई देने लगी थी। खोपड़ी में एक-एक करके बाबू देवकी नंदन खत्री के उपन्यास 'चंद्रकांता" के दृश्य चलचित्र की तरह दिखाई देने लगे। चंद्रकांता, चपला, कुमार विरेन्द्र सिंह, एयार तेज सिंह, क्रूर सिंह, नौगढ़, लखलखा इत्यादि के साथ तिलस्म भी सामने था। जीपीएस ने अगर छोटा रास्ता न बताया होता तो हम इधर आते ही नहीं। जीपीएस वाली बाई को धन्यवाद दिया क्योंकि इसके सुझाए रास्ते के कारण हम चुनार गढ़ देख सकेगें। उपन्यास की पृष्ठभूमि में बताए गए दृश्यों से इस इलाके की तुलना करते हुए चारों तरफ़ खोजी नजरें घूम रही थी। सामने पहाड़ी पर एक गुफ़ा सदृश्य संरचना दिखाई दे रहे थे। जिसमें तराशे हुए स्तम्भ भी दिखाई दे रहे थे। लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं था कि रास्ते में दिखने वाली प्रत्येक चीज को परखते चलें।

लिप्टन टाइगर  
सुबह जब से हम चले थे, तब से चाय नहीं पी थी। वैसे भी मैं दिन में सिर्फ़ 2 बार ही चाय पीता हूँ। चाय के स्वाद का तो पता नहीं पर मैने इसे सुबह और शाम से जोड़ रखा है। जब चाय मिल जाती है तो लगता है कि सुबह हो गई और शाम की चाय सांझ होने एवं सूरज के अस्ताचलगामी होने की सूचना देती है। इसके अतिरिक्त मुझे फ़िर कभी भी चाय की दरकार नहीं होती। हाँ पाबला जी अवश्य तीन चार बार पीते हैं। खरामा-खरामा चल कर हम चुनार नगरी पहुंच गए। जीपीएस ने सीधे हाथ की तरफ़ मुड़ने कहा, मुड़ने पर एक होटल दिखाई दिया। पर चुनारगढ़ कहीं दिखाई नहीं दिया। हमने होटल के सामने गाड़ी खड़ी कर ली। चाय के साथ चुनारगढ़ के विषय में पूछताछ का उद्देश्य भी पूरा होने की संभावना थी।

चुक्कड़धारी
चाय की दूकान में बूढे बाबा बैठे थे, साथ ही चुक्कड़धारी कुछ हमारे जैसे निठल्ले भी। गिरीश भैया के चेहरे पर नौगजी मुस्कान झलक रही थी। जिससे देख कर लग रहा था कि हिरण्यगर्भ की मुस्कान से देह तरोतजा है। कम शक्कर की तीन चाय बनाने का आदेश देकर हमने कुर्सियां संभाल ली। पाबला जी को दो कुर्सियों की जरुरत पड़ती है। मेरा तो अब 1 से ही काम चल जाता है। जब से साले की शादी में तीन कुर्सियां टूटी हमने अपना वजन कम कर लिया। चुक्कड़ में चाय आ गई। चुक्कड़ याने कुल्हड़ का वामनअवतार, इसमें चाय कम ही आती है। पाबला जी ने डबल चुक्कड़ लिए। पूछने पर पता चला कि चुनारगढ़ यहाँ से 3 किलोमीटर की दूरी पर है। जहाँ जाने के लिए रेल्वे लाईन पार करनी पड़ेगी।

चुनारगढ़ का कब्रिस्तान 
चाय पीकर हम चुनारगढ़ की ओर बढे। रेल्वे लाईन पार करने के बाद यह रास्ता चुनार गांव के बीच से जाता है। जीपीएस ने फ़िर नया मार्ग चुन लिया था। थोड़ी देर बाद पहाड़ी पर चुनारगढ़ दिखाई देने लगा। गढ़ की प्राचीर दूर से ही दिखाई दे रही थी। यद्यपि इसके आस-पास बस्ती बस चुकी है। गढ़ तक जाने के लिए पक्का मार्ग बना हुआ है। जैसे जैसे उपर चढते जाते हैं गंगा नदी दिखाई देने लगी है। इस स्थान पर गंगा का पाट भी चौड़ाई लिए हुए दिखाई देता है। उपर चढते समय बांयी तरफ़ अंग्रेजों के कब्रिस्तान जैसी संरचना दिखाई दी। जिसमें कब्रों पर बने हुए चिन्ह, क्रास दिखाई दे रहे थे। मैने अनुमान लगाया कि यह गढ़ अंग्रेजों के कब्जे में भी रहा होगा।

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