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सोमवार, 5 दिसंबर 2011

ब्लॉगर सबसे बड़ा मौन का साधक --- ललित शर्मा

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सुबह जब सो कर उठे तो सुरज की किरणें कनात की झिरियों से आकर मुंह पर पड़ रही थी। रात नदी की रेत पर ही अच्छी नींद आयी। काफ़ी साथी लोग नहा धोकर तैयार हो गए थे। मौनी बाबा आदतन मौन थे, ये तो सिर्फ़ दो घंटे ही मौन रहते हैं। ब्लॉगर तो जब तक कम्पयुटर पर रहता है तब तक मौन रहता है। ब्लॉगर से बड़ा साधक कौन है? सारी विद्याएं ही हैं जैसे त्राटक (एक टक मानीटर को देखना) मौन, धारणा, ध्यान, समाधि। वैसे ब्लॉगर को ॠषि तुल्य ही मानना चाहिए। ॠषि का कार्य है कि गुरुओं से मिले हुए ज्ञान को प्रचारित एवं प्रसारित करना। यही काम ब्लॉगर भी मनोयोग से कर रहे हैं। आँख खुली ही थी कि तुरकने जी ने एक विषय छेड़ दि्या और हमने पकड़ लिया। सुबह-सुबह ही एक घंटे का लेक्चर हो गया। अब तैयार होना था, हरिद्वार में तो कल से अफ़रातफ़री का माहौल था।

भगदड़ की घटनाओं को लेकर अफ़वाहों का बाजार गर्म था। जो वहां नहीं था वह भी प्रत्यक्षदर्शी बना हुआ था। कोई कह रहा था कि आतंकवादी घुस गए थे। कोई कह रहा था कि पुलिस वालों ने भगदड़ मचा दी तो कोई कह रहा था कि दंगा हो गया। गंगा तीर से स्नान कर आई महिलाओं ने बताया कि वहां स्नान कर रही दो महिलाएं कह रही थी कि वे यज्ञशाला में थी। वहां यज्ञ की अग्नि में एक महिला जल गयी और उन्होने अपनी आँखों से देखा है। मैने कहा कि इतना बड़ा झूठ, उनकी कनपटी में बजाना था दो, तुम लोग सुन कर कैसे आ गयी। भीड़ की अधिकता से भगदड़ में 16 लोगों के मृत होने की सूचना अवश्य आ रही थी। किसी वृद्ध के बेहोश होकर गिरने के बाद भगदड़ मची। जिसे धुंए की अधिकता से बेहोश होना बताया जा रहा है। उसमें ही लोग घायल हुए हैं और कुछ मरे हैं। पता नहीं लोगों को अफ़वाह फ़ैला कर क्या मिलता है? अफ़वाहें ही सारा माहौल खराब करती है और इन पर लगाम लगाना किसी के बस का नहीं।

भगदड़ होने का एक कारण मेरी समझ में आया कि इतनी भीड़ को संभालना प्रशासन के बस की बात नहीं। स्वअनुशासन की आवश्यकता होती है। ऐसा भी नहीं है कि गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं में अनुशासन की कमी है। पर अधिक भीड़ लाने के चक्कर में कुछ सैलानी भी मात्र घूमने एवं देखने चले आए। इसके कारण अनुशासन कायम नहीं रह सका। भीड़ को कोई नहीं संभाल सकता। गायत्री परिवार का आयोजन उम्दा था। किसी संस्थान के द्वारा किया गया आज तक का सबसे बड़ा आयोजन था। कुंभ में भी सरकार करोड़ों रुपए खर्च करके ऐसा आयोजन नहीं कर सकती, यह तो मानना ही पड़ेगा। भीड़ के कारण कुंभ में भी भगदड़ मची है। नासिक कुंभ इसका ताजा तरीन उदाहरण है। वहाँ भी भगदड़ में काफ़ी लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। हादसों को रोका जाना चाहिए, भीड़ पर नियंत्रण न होने के कारण हादसे होते हैं।

हमारे कुछ साथी चंडी देवी मंदिर और कुछ शांतिकूंज जाना चाहते है। पर मैने अपना रुख अडिग रखा, क्योंकि हमारी ट्रेन 2.40 बजे दोपहर को थी। अगर भीड़ के कारण ट्रेन निकल गयी तो हरिद्वार में ही हरे राम भजना पड़ता। मैने हांका लगा दिया कि जिसको भी स्टेशन चलना है वह मेरे साथ चले। पैदल ही जाना होगा क्योंकि कहीं पर भी सवारी मिलने की संभावना नहीं है और मुसीबतों का एकमात्र पुल भी पार करना है। आधे सहयात्री मेरे साथ चलने को तैयार हो गए। हम अपना सामान लाद कर गौरीशंकर के यात्री स्वागत पंडाल तक पहुंच गए। वहाँ रुक कर साथियों का इंतजार किया। सभी के साथ आने पर गंगा को प्रणाम करके हम आगे बढ गए। महिलाओं ने अपना बैग सिर पर रख लिया। क्योंकि आज तो लगभग 10 किलोमीटर के अधिक चलना था। इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था।

कुछ मास्टरिन भी साथ थी, रास्ते में कहती थी -"रेंगत नई बनत हे महाराज, सुखियार होगे हन गा", तो मैं कहता - "आज तो सुखियारी चले नहीं, रेंगे ला परबेच करही। धीरे बांधे चलव, टैम में पहुंच जाबो।" कुछ साथियों को ऑटो मिल गए, पर ऑटो वालों का पुल पर प्रवेश बंद था, वे भी हमें पुल पर ही इंतजार करते मिले। कुछ महिलाओं ने रास्ते में एक रिक्शा किया 50 रुपए में, जो उनके बैग पुल के प्रवेश द्वार तक पहुंचा दे। इस रिक्शे में प्रताप सेन बैठ गया पुल तक। किसी भी तीर्थ यात्री को यह ध्यान रखना चाहिए कि मेले, स्नान, या कुंभ इत्यादि जैसे पर्वों पर 11 नम्बर की ही सवारी काम आएगी। मतलब पैदल ही चलना पड़ेगा। क्योंकि भीड़ चलने वाले रास्तों पर रिक्शा इत्यादि वाहनों का प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है। इसलिए तीर्थ पर जाने से पहले लगभग 15 दिनों की रोज 5 किलोमीटर चलने का अभ्यास कर लेना चाहिए।

पुल पार करके हमने उसके मुहाने पर कुछ देर विश्राम किया। उत्तराखंड पुलिस की महिला विंग की ड्युटी पुल के पास वाले चौराहे पर लगी थी। कभी-कभी मोबाईल पर मुस्कुरा कर बात कर लेती थी फ़िर अपने काम में लग जाती थी। मोबाईल भी मन बहलाने का उम्दा साधन है। बस उपयोग सही होना चाहिए। एक मिस कॉल दो और घंटे भर बात करो। धन धनिए का, माल बनिए। अपना तो हवा हवाई में ही काम चल जाता है। खिरामा खिरामा टहलते टहलते हम स्टेशन तक पहुंच गए।पैदल चलते चलते हरिद्वार की कई बातें और यादें जेहन में चल रही थी। कुछ चित्रों के रुप में यादें संजो ली थी। हरिद्वार के प्लेटफ़ार्म पर जनसुविधा का न होना आश्चर्य चकित कर गया। क्योंकि कुछ महिला सहयात्रियों को आवश्यकता पड़ गयी थी। उन्हे स्टेशन के बाहर जाना पड़ा। जारी है................।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

तेरे बाप का राज है क्या? -- ललित शर्मा

आराम के मोड में
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टो वाले भी मुफ़्त का फ़ायदा उठाना चाहते थे। मेरे साथ हृदयलाल गिलहरे, पंकज नामदेव, चौरसिया जी, बीएस ठाकुर गुरुजी और उनके साथ 3 महिलाएं थी। ॠषिकेश जाने के 1500 रुपए देना मुझे बहुत अखर रहा था। लेकिन साथियों की जिद के आगे झुकना पड़ा। ॠषिकेश पहुंच कर ऑटोवाले ने युनियन में मुझसे 1500 रुपए जमा कराने को कहा और जब पर्ची काटने के 10रुपए और मांगे तो खोपड़ी घुम गयी। मैने जोर से गरिया दिया उसे। तो ड्राईवर ने पर्ची के 10रुपए अपनी जेब से दिए। पर्ची लेकर उसने हमें लक्ष्मण झूला मार्ग पर छोड़ दिया और 6 बजे बस स्टैंड पर मिलने कहा। हरिद्वार और ॠषिकेश में 500 का नोट तुड़वाना भी एक समस्या ही है। कोई भी छुट्टे देने को तैयार नहीं। हम सबके पास बड़े नोट ही थे। एक जगह पानी की दो बोतल लेने के बाद भी छुट्टे नहीं मिले। हम पानी की बोतल ले रहे थे तभी एक गाईड आ गया। बोला की 40 रुपए लूंगा और सारी जगह दिखाऊंगा। हमने उसे साथ रख लिया।

पंकज, चौरसिया जी, गुरुजी, बी एस ठाकुर
।वह सबसे पहले एक मंदिर में ले गया। कोई नया मंदिर ही था, उसके विषय में बताने लगा। फ़िर एक जेम्स की दुकान में ले जाकर घुसा दिया। दुकान का नाम Uttrakhand Handicraft Gems Centre था और साईन बोर्ड से लग रहा था कि उत्तराखंड सरकार के हैंडीक्राफ़्ट विभाग का शो रुम है। लेकिन हकीकत में ऐसा था नहीं। उसने लिख रखा था Directorate fo industries Govt. of Uttrakhanad) मैने उससे कई बार कहा कि - आप तो ऐसा लिख रहे हैं जैसे यह उत्तराखंड सरकार का ही शो रुम हैं। तो उसने अपना नाम आर सी चतुर्वेदी बताया और इस शो रुम को उत्तराखंड सरकार का ही बताया। मैने उसका विजिटिंग कार्ड ले लिया। वह हमें पत्थर दिखाने लगा। स्फ़टिक के कई सैम्पल दिखाए। तब तक मैने उसकी दुकान में मोबाईल चार्ज किया। थोड़ा बहुत चार्ज हो जाए तो बात हो जाए लोगों से। 15मिनट तक हम उसका सामान देखते रहे। फ़िर आगे बढ लिए।

लक्ष्मण झूला
ठाकुर गुरुजी को आगे चलने की आदत है। वे सपाटे से चलते हैं, पीछे मुड़ कर भी नहीं देखते। उनकी बहन पत्नी और सास पीछे छूट गयी। मुझे बार बार कह रही थी कि वे दिख नहीं रहे हैं। मैने उन्हे कहा कि लक्ष्मण झूले के पास मिल जाएगें। आप चिंता न करें। जब हम लक्ष्मण झूले के पास पहुंचे तो वे वहीं खड़े मिले। मेले मे लोग इसी तरह छूटा करते थे। लक्ष्मण झूला पर हमने फ़ोटो खींचे। फ़ोन चालु होते ही सबसे पहले संगीता पुरी जी का फ़ोन आया। उन्होने हाल चाल पता किया, फ़िर संध्या शर्मा जी का मैसेज मिला। अभनपुर एवं रायपुर से मित्रों के फ़ोन आने शुरु हो गए। 10 मिनट तक चलने के बाद फ़ोन फ़िर बंद हो गया। मतलब जै राम जी, अब किसी से समपर्क नहीं हो सकेगा। लक्ष्मण झूले से मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाई। पुल पर दर्शनार्थियों की बहुत भीड़ थी।

सड़कों पर बसंत उतर आया
हमने शाम को डूबते हुए सूरज और उगते हुए चाँद के चित्र लिए। बाजार से चलते हुए चोटी वाले के होटल में पहुंचे। ये चोटीवाले होटल ॠषिकेश की पहचान बन गए हैं। होटल के सामने घंटी लेकर बैठे हुए ये चोटी वाले ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। मार्केटिंग का यह फ़ंडा अच्छा है। ऊंची कुर्सी पर बैठे ये चोटी वाले होटल के सामने भीड़ भी नहीं लगने देते। यहाँ से हम दुसरे झूले याने राम झूला पर पहुंचते हैं। पिछली बार जब आया था मैने यहां एक दुकान से एक किलो आटा लेकर गोलियाँ बनाकर मछलियों को खिलाई थी। बड़ी बड़ी मछलियाँ आकर आटे की गोलियाँ खाती हैं। मछलियों को आटे की गोली खिलाने से उग्र ग्रह शांत होते हैं। ऐसा कहा जाता है, कई ज्योतिषि यह टोटका करने कहते हैं। ग्रह शांत हो न हो पर मन की शांति तो हो जाती है। 

राम झूला पर चढने से पहले वहां पर चबुतरे बने हैं। पैदल चल कर थक लिए थे इसलिए वहीं बैठकर विश्राम करने लगे। मै चबुतरे पर बैठा तो पंकज फ़ोटो लेने लगा। मैने बगल में मुड़ कर देखा तो एक जाना पहचाना चेहरा सामने आ गया। ये थे पेंड्रारोड़ के रामनिवास तिवारी जी, अपनी डुकरिया के साथ तीरथ करने आए थे। मैने उन्हे देखा और उन्होने मुझे देखा। बोले शर्मा जी, हमने कहा- हाँ तिवारी जी, कैसे हैं? गजब मुलाकात हुई भाई। फ़िर क्या था तिवारी सुनाने लगे, वे किसान कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। पेंड्रारोड़ का बच्चा बच्चा उन्हे जानता है। पिछले इलेक्शन में हम भी उनके यहाँ के पहुंचे थे। पान चबाते हुए गले में चुंदड़ी स्टाईल का पटका डाले मिले। गजब कहानी है भाई। धन्य हो गए तिवारी जी से मिल कर। जब मै फ़ोटो लेने लगा तो पता चला कि वे पंकज के पापा के भी परिचित निकले।

पंकज सिह 
रामझूला पर चढे तो वह हिल रहा था, गुजरात की कुछ महिलाएं डरते हुए उस पर चल रही हैं। नदी पर केबल के सहारे बना हुआ यह पुल कारीगरी की अद्भुत मिशाल है। मोटर सायकिल और स्कूटर वाले भी इसी पुल से जा रहे थे और पुल लगातार हिल रहा था। डर भी लगता है कि कहीं गिर न जाए। लेकिन जब इतने बरसों से नहीं गिरा तो हमारे चलने से क्या गिरेगा। हमारे आगे गिलहरे गुरुजी और चौरसिया जी थे। हम पीछे पीछे चल रहे थे फ़ोटो लेते हुए। पुल पार करके हम धीरे धीरे बाजार की तरफ़ हो लिए, आगे बस अड्डा था। वहीं पर हमें ऑटो वाला मिल गया। बलदाऊ गुरुजी भी वहीं इंतजार करते मिले परिवार के साथ। लेकिन गिलहरे गुरुजी और चौरसिया जी नहीं आए थे। ऑटो वाला जल्दी चलने के लिए हाय तौबा मचाने लगा। मैं इन्हे ढूंढ रहा था। मोबाईल की बैटरी खत्म थी इसलिए इन्हे ढूंढने में समस्या हो रही थी। पैदल चलने की इच्छा न होने पर भी इन्हे ढूंढा। कहीं नहीं मिले, जमीन खा गयी कि आसमां निगल गया।

प्यास बुझाएं - मेरी फ़ोटोग्राफ़ी
ऑटो वाला कह रहा था कि गुरु जी नहीं मिले तो उन्हे छोड़ कर चले जाएगें। अरे कैसे छोड़ कर चले जाएगें, तेरे बाप का राज है क्या? तुझे अधिक जल्दी है तो जाकर ढूंढ कर ला। अभी 6 नहीं बजे हैं और हमारे पास 6 बजे तक का समय है। हम उन्हे ढूंढते-ढूंढते थक हार कर बैठ गए। जब वे आएगें तभी चलेगें। मैं समझ तो गया था कि वे गलत रास्ते चले गए पुल से। दांए मुड़ने की बजाए बांए चले गए, जैसे नीरज जाट एवं जाट देवता में दांए बांए का लफ़ड़ा हो जाता है वैसा ही इनके बीच भी हुआ होगा। आखिर में हमने तय किया कि 10 मिनट में ये लोग नहीं आते हैं तो इन्हे छोड़कर ही चले जाएगें। ऐसा विचार बनाते ही ये दोनो सामने नजर आए और वही हुआ कि ये पुल से बांए तरफ़ चल गए थे। इसलिए रास्ता भूल गए थे। लेकिन वह जगह भूलने वाली नहीं है। ऑटो वाले ने युनियन में आकर पर्ची देकर 1500 रुपए लिए और अपनी जेब में रख लिए। मैने सोचा कि चलो हरिद्वार जाकर देने हैं उसने पैसे अभी रख लिए तो कोई बात नहीं।

पानी वाले बाबा- आधा सच
अब हरिद्वार हम मेन रोड़ से जा रहे थे। राजाजी पार्क वाला रास्ता रात में बंद कर दिया जाता है। जंगली जानवरों के हमला होने और बियाबान में लूटपाट का खतरा है। रास्ते में श्यामपुर की पुलिस चौकी के पास दो तीन लड़के मिले, उन्होने ऑटो वाले को रोक लिया और उनमें आपस में कुछ बातें होने लगी। मेरा ध्यान उनके तरफ़ ही था पता चला कि ऑटो ड्रायवर का नहीं था और वह किसी से किराए पर चलाने के लिए लाया था। जिसकी मियाद 6 बजे तक थी। अब ऑटो मालिक अपना ऑटो वापस मांग रहा था और कह रहा था कि सवारी जाए भाड़ में, मुझे अभी ऑटो चाहिए। तुम जानो और सवारी जाने। ऑटो ड्रायवर ने हमें पहुंचाने के लिए दुसरे ऑटो वाले से बात की। वह 400 मांग रहा था हमें छोड़ के आने के। यह 400 देने को तैयार नहीं था। इस तरह उसने सड़क पर ही 20 मिनट लगा दिए। मुझसे कहने लगा कि हरिद्वार रोड़ पुलिस ने बंद कर रखा है आपको किसी और साधन से जाना पड़ेगा। मैं आगे नहीं ले सकता। गाड़ी ही नहीं जा रही है।

विचार क्रांति अभियान की मशाल
आधे रास्ते में गाड़ी रोक कर साले तमाशा करने लगे। बस फ़िर अपन ने अपना फ़ार्मुला नम्बर 45 इस्तेमाल किया। उस ऑटो मालिक को कोने में ले जाकर मंत्र दिया। उस पर मंत्र का असर बिच्छु के डंक मारने जैसा हुआ। जो अभी तक ऑटो मांग रहा था वह उस ड्रायवर से बोला- साले सवारी देख कर बैठाए करो, खुद भी मरोगे और हमें भी मरवाओगे। चलो अब जैसे भी होगा इन्हे गौरीशंकर 1 तक पहुंचा कर आना है। अब इन्होने यहीं से हिसाब लगाना शुरु कर दिया कि रास्ता बंद होने पर किधर से गौरीशंकर तक पहुंचा जाएगा। पहले हमें हर की पौड़ी तक छोड़ने की बातें करने लगे। वहां से हरिशंकर लगभग 5 किलो मीटर है। मैने कहा कि - एक बार तो तुम्हे समझा दिया, फ़िर मत कहना कि जादू नहीं दिखाया। जब जादू देख लोगे तो भालू के बालों वाला ताबीज भी लेना पड़ेगा। जब ताबीज ले लिया तो गले में डालना पड़ेगा। बहुत दुखदायी होगा तुम्हारे लिए।

हरिद्वार में गंगा जी का पुल - मुसीबत की जड़
इधर उधर से घुमाते हुए वे हमें पुल के नीचे ले आए जहाँ से हमें बैठाया था। मैने कहा कि पर्ची में गौरीशंकर लिखा है देख ले। हमें वहाँ तक छोड़ना पड़ेगा। वह अड़ गया कि गौरीशंकर तक नहीं जाऊंगा। मैने कहा कि बहुत देर से तुझे बरज रहा था। अब तेरे क्रियाकर्म का समय आ गया है। जब नहीं ही मानेगा तो फ़ार्मुला नम्बर 36 लगाना पड़ेगा और फ़िर तू दो चार दिन किसी काबिल नहीं रहेगा। सोच ले अब, वैसे भी बिना गौरी शंकर जाए हम ऑटो से नहीं उतरने वाले। साले तुझे हराम का माल चाहिए, मुफ़्त में 1500 सौ रुपए नहीं दिए हैं। जात भी देगा और जगात भी देगा। फ़िर वह हमें गौरीशंकर 1 तक छोड़ने के लिए चल पड़ा। ठंड बढ चुकी थी, लाउडस्पीकर पर प्रसारण हो रहा था कि- शांतिकूंज हरिद्वार द्वारा बाकी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं, कल सिर्फ़ पूर्णाहूति होगी, जो परिजन अपने वाहनों से आए हैं वे वापस चले जाएं। ट्रेन आदि से आए हुए परिजन अपने टेंटों में रहे। भोजन की व्यवस्था यथावत चलती रहेगी तथा स्नान करने के लिए गंगा के किनारे न जाएं। जिससे भीड़ बढ जाए, खास कर हर की पौड़ी की तरफ़ जाने की मनाही है। भोजन करने के पश्चात योग निद्रा में पहुंच गए। जारी है --
(फ़ोटो - पंकज सिंह के सौजन्य से)

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बसंती तागें वाली और हरिद्वार--- ललित शर्मा

तांगे की सवारी - बी एस ठाकुर एवं गिलहरे के साथ
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संती तांगे वाली हमें पुल पर छोड़कर फ़रार हो गयी, पुल पर बहुत भीड़ थी बड़ी मुस्किल से नीचे उतरने के बाद हमने गौरीशंकर 1 का पता पूछा तो पता चला कि पुल के आखरी छोर से रास्ता बना है। मेरे पास वी आई पी पास था, वीआईपी व्यवस्था यज्ञशाला के पास ही की गयी थी। लेकिन वहाँ वीआईपी बनकर अकेले रहने की बजाय साथियों के दल में रहना ही उपयुक्त लगा। हम अपना सामान लाद कर गौरीशंकर 1 के लिए चल पड़े। सीढियों के पास से लगभग 3 किलोमीटर पैदल जाना पड़ा। रास्ते में एक जगह पुल पर लगी लोहे की सीढी से लोग उपर चढ रहे थे। यह बहुत ही खतरनाक कार्य था। महिलाएं भी सीढी पर उपर चढ रही थी। लोग पैदल चलने से बचने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे थे और लगभग आधा किलोमीटर लाईन में लग कर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अगर पैदल चलते तो पहुंच जाते। इस सीढी से भी दुर्घटना हो सकती थी। मैने एक फ़ोटो ली और आगे बढ गया।

बसाहट का नक्शा
गौरी शंकर 1 के रिसेप्शन पर लोग आमद देकर अपना टेंट नम्बर ले रहे थे। हमें टेंट नम्बर छत्तीसगढ 220 मिला। यह लगभग 100 लोगों के रहने के लिए मुफ़ीद था। यहाँ से गंगा का किनारा भी समीप होने से रोज गंगा स्नान हो सकता था। सभी को प्रिंटेट परिचय पत्र दिए गए। तीन माह पहले से सभी शक्तिपीठों से आने वाले परिजनों की लिस्ट मंगा ली गयी थी और सभी के परिचय पत्र यहां बन कर तैयार थे। इतने बड़े आयोजन की सुरक्षा की दृष्टि से यह सही कदम था। टेंट के कई शहर बसाए गए थे। जिनमें छत्तीसगढ से आने वालों की संख्या अधिक थी। हमारे सीताराम गुरुजी दो महीने पहले से ही समय दान के लिए पहुंच गए थे। उनकी ड्युटी पंत द्वीप में थी और उन्होने मिलने की इच्छा भी जाहिर की थी। यहाँ कहीं भी जाने के लिए पैदल ही जाना पड़ेगा, यह मैं जानता था। कोई सवारी और साधन उपलब्ध नहीं था।

अपना सामान लेकर टेंट की ओर जाते सहयात्री
गायत्री परिवार के इस आयोजन की तैयारी तीन साल पहले से हो रही थी। कुंभ से भी विशाल आयोजन और इंतजाम था। जिसमें प्रशासन की कहीं पर भी भागीदारी नहीं थी। समय दानी वालिएन्टर्स अपना योगदान दे रहे थे। मुस्तैदी से अपनी ड्युटी पर लगे थे। जिस दिन हम पहुंचे बताते हैं कि उस दिन लगभग 50 लाख गायत्री परिजन हरिद्वार पहुंच चुके थे। उनके रहने, खाने एवं निस्तारी की उत्तम व्यवस्था थी। कुंभ में अरबों रुपए खर्च करके भी शासन इतनी सुंदर व्यवस्था नहीं कर पाता। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसका परिचय पत्र बना हुआ तैयार मिल रहा था और रहने के लिए तुरंत छोलदारियों का आबंटन कर दिया गया। खानी की व्यवस्था सुबह से प्रारंभ हो जाती थी। लोग स्वयं जाकर भोजनालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। सेवा भाव से भोजन करवा रहे थे। भोजन के लिए अनुशासित कतारबद्ध लोग खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हम अपने टेंट की ओर चल पड़े।

सीढी पर चढते लोग
टेंट में सामान रख कर साथी लोग गंगा स्नान के लिंए चले गए और हम सामान की चौकीदारी करते रहे। छोलदारी में रात गुजारने का अपना ही आनंद है। वीआइपी लोगों के लिए स्विस कॉटेज का इंतजाम था। जिसमें पलंग, लैट्रिन बाथरुम, पंखा था। छोलदारी में लाईट और दरी बस थी। इस पर ही रात गुजारनी थी। साथियों के आने के बाद हम स्नानादि से निवृत्त हुए। हमारा कार्यक्रम मसूरी जाने का था। इसलिए बस स्टैंड के लिए जल्दी निकलना चाहते थे। बस स्टैंड जाने के लिए फ़िर उसी पुल पर चढना था। हम 4किलोमीटर चलते हुए सीढी के पास पहुंचे तो वहाँ पुलिस लग चुकी थी और सिर्फ़ लोगों को उतरने दिया जा रहा था। चढने नहीं दिया गया। हमारी योजना खटाई में पड़ चुकी थी। वापस पुल पर आने के लिए 5 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता और 12 बज रहे थे। मसूरी जाकर वापस आना संभव नहीं था।

भोजन की लाईन
जब मैं गौरीशंकर से पुल की तरफ़ आ रहा था, लगभग 11 बजे होगें, तब घर से श्रीमती जी का फ़ोन आया कि हरिद्वार में भगदड़ मच गयी है। कई लोग मारे गए हैं, फ़िर एक मित्र का फ़ोन आया कि हरिद्वार में यज्ञ स्थल पर दंगा हो गया है। ऐसा मुझे कहीं नजर नहीं आया। टेंट में दिन में बिजली न होने से हमारा मोबाईल चार्ज नहीं हो पाया था। इसलिए बंद हो गया। अब किसी से सम्पर्क नहीं हो सकता था। यह भी एक समस्या हो गयी। जितने भी इष्ट मित्र परिजन थे इस अवधि में आशंकाओं से दो चार होते रहे। वे फ़ोन से जानकारी लेना चाहते थे लेकिन मोबाईल बंद होने से उन्हे सही जानकारी नहीं मिल पा रही थी। जैसा अफ़रा तफ़री एवं भगदड का माहौल बताया जा रहा था वैसा तो मुझे वहाँ नहीं लगा। हम लोग सीढी के पास से वापस आते हुए थक चुके थे। अब कहीं बैठने की जगह देख रहे थे। जहाँ खड़े होने के लिए जगह नहीं थी वहाँ बैठने के लिए जगह तलाश करना बड़ी बात है।

छोलदारियों का विहंगम दृश्य
हम चलते हुए आगे बढे तो एक स्थान पर चायवाले की 5-6 कुर्सियाँ खाली दिखी। बस हमने उन्हे हथिया लिया और चाय का आर्डर दिया। सभी ने आराम किया। उसने चाय एकदम घटिया बनाई। हमें चाय से कोई मतलब नहीं था, हमारा मुख्य उद्देश्य कुछ देर आराम करना था। यहां 1बज गए थे, पंकज और मैने कुछ फ़ोटुएं ली। अब विचार बनाया कि मसूरी की बजाए ॠषिकेश चला जाए। जब पहले मैं आया था तब हरिद्वार से ॠषिकेश जाने के 5 रुपए लगते थे। मैने सोचा कि अब अधिक से अधिक 20 रुपए लगेंगे। लेकिन जब पुल के नीचे जाकर ऑटोवालों से पूछा तो उन्होने आठ सवारी के 1600 रुपए बताए, ॠषिकेश से घुमाकर वापस लाने के। मै तो भौंचक रह गया। एक बार तो मन में आया कि बजाऊं उसके कान के नीचे। साले अनाप-शनाप किराया बता रहे हैं। दो चार ऑटो वालों से पूछा तो उन्होने भी यही किराया बताया। 

जय बाबा की - वानप्रस्थ की ओर अग्रसर :)
ॠषिकेश दो बार मेरा पहले भी देखा हुआ था, लेकिन जो नए लोग मेरे साथ आए थे वे देखना चाहते थे। आखिर 1500 रुपए में एक ऑटो तैयार हुआ। वह हमें मुख्यमार्ग की बजाय राजा जी पार्क के भीतर से नहर के किनारे-किनारे ॠषिकेश लेकर गया। उसने बताया कि ॠषिकेश पहुंचकर आपको 1500 रुपए युनियन में जमा करने होगें। फ़िर वहां से आपको रसीद और टाईम दिया जाएगा। उस टाईम पर आपको वापस आना है। युनियन वालों ने भी फ़र्जीवाड़ा खोल रखा है। पैसे की रसीद काटने के 10रुपए लेते हैं सवारियों से। खुले आम डकैती का शिकार हो रहे हैं पर्यटक। घुमकर आने के बाद रसीद दिखाने पर वह आपके रुपए वापस करेगा। ऑटो वाले कहा कि जब आपको वापस छोड़ देगें तभी आप किराया देना। ऑटो वाला गाजीपुर का था, कुछ अधिक ही चलता पुर्जा नजर आ रहा था। सोच रहा था कि मुफ़्त में ही 1500 हजम कर ले। लेकिन उसका पाला तो मोगेम्बो से पड़ा था। अभी उसने मेरा चमत्कार नहीं देखा था। जारी है.....आगे पढें।

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

देशाटन, तीर्थाटन और पर्यटन - मथुरा की ओर -- ललित शर्मा

घड़ी चौक रायपुर
जिज्ञासु प्रवृत्ति मनुष्य को देशाटन, तीर्थाटन को प्रेरित करती है, वह अज्ञात को जानना चाहता है। यही अज्ञात को जानने की ललक उससे यात्राएं करवाती हैं। पहले लोग जीवन के उत्तरार्ध में तीर्थाटन करते थे, बैलगाड़ी, घोड़े एवं पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। सुरक्षा की दृष्टि से ये यात्राएं समूहों में होती थी, यदा कदा ही कोई यायावर अकेले यात्रा करता था। लोग जब तीर्थाटन को जाते थे तो गाँव के लोग उन्हे विदा करते और गाँव की सीमा तक गाजे-बाजे के साथ छोड़कर आते। तीर्थाटन निर्विघ्न समपन्न होने पर सकुशल घर लौटते तो उन्हे गाजे बाजे से ही परघाया जाता। सकुशल वापस आने की खुशी में पूजा-पाठ करके सामुहिक भोज का आयोजन भी किया जाता। वैसे अभी भी तीर्थ करके आने पर प्रसादी की जाती है, जिसमें इष्ट मित्रों को आमंत्रित किया जाता है और खुशी मनाई जाती है। अब किसी भी उम्र में, कभी भी तीर्थयात्रा की जा सकती है,यात्रा के तीव्रतम साधन उपलब्ध हैं, अगर कहीं दुर्घटना न हो तो तीर्थ यात्राएं कम समय में सकुशल सम्पन्न हो जाती हैं।
रास्ते का स्टेशन (सवाल जाट जी के लिए)
ऐसी ही एक सामुहिक तीर्थ यात्रा के सुत्रधार थे रामसजीवन चौरसिया जी। शांतिकूंज हरिद्वार के आमंत्रण पर दो-तीन माह से यात्रा की तैयारियाँ हो रही थी। चौरसिया जी का आग्रह था कि मैं भी उनके साथ यात्रा पर चलुं। आगामी कार्यक्रमों को देखते हुए मेरे मन में इस यात्रा को करने का विचार कम ही था। मैने अनमने मन से हाँ तो कर दी थी, पर पूर्ण रुप से यात्रा के लिए मन नहीं बना पाया था। चौरसिया जी ने 117 यात्रियों का दल बताया था। अब इतने सारे लोगों को एक साथ लेकर यात्रा कराना भी कठिन कार्य है। जिसमें बच्चों से लेकर उम्र दराज सभी शामिल हों। सामुहिक यात्रा कि अपनी कठिनाईयाँ भी हैं। हमारी यात्रा 5 नवम्बर से प्रारंभ होने वाली थी, मैने दो दिन पहले ही जाने का विचार त्याग दिया था क्योंकि 18 नवम्बर को छत्तीसगढ के राज्योत्सव कार्यक्रम में दिल्ली जाने का विचार था। 

सामुहिक चित्र
यात्रा के एक दिन पहले चौरसिया जी ने साथ चलने का विशेष आग्रह किया तो टाल न सका और यात्रा की तैयारी हो गयी।सभी की टिकिट एक ही ट्रेन में न होने के कारण 29 यात्रियों को गोंडवाना एक्सप्रेस से सुबह जाना था और बाकी बचे यात्रियों को समता एक्सप्रेस से शाम को निकलना था। यात्रा का पहला पड़ाव मथुरा था। दिल्ली रुट पर ट्रेन द्वारा छत्तीसगढ से जाने के लिए मेरी पहली पसंद गोंडवाना एक्सप्रेस ही है। क्योंकि रायपुर से सुबह 7/50 पर चलकर अगली सुबह 7/30 बजे दिल्ली पहुंचा देती है। एक ही दिन यात्रा में लगता है और दिल्ली पहुंच कर दिन भर काम करने के लिए मिल जाता है। समता एक्सप्रेस से जाने पर 2 दिन और 2 रात खराब होती है। सफ़र लम्बा लगने लगता है। सभी लोगों को 4 बजे तक स्टेशन पहुंचना था, मैं और गिलहरे गुरुजी घर से एक साथ ही चले थे और स्टेशन पहुंचने पर सभी लोग वहाँ मिल गए। सभी के मित्र मंडली के हिसाब से अलग-अलग ग्रुप बने थे। कुछ विशुद्ध तीर्थ यात्री थे तो कुछ विशुद्ध पर्यटक, घुमने का नजरिया अलग-अलग था। यात्रा करने का उल्लास सभी के चेहरे से प्रतीत हो रहा था। कुछ तो पहली बार इतनी लम्बी यात्रा पर जा रहे थे।
भजन यात्रा
समता एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर पहुंची, साथियों ने टूर आपरेटर (चौरसिया जी) के बताए अनुसार बोगियों में चढ कर सीटें संभाल ली। इस ट्रेन में हरिद्वार जाने वाले अन्य गायत्री परिजन भी थे। फ़ुल हाऊस चल रहा था। टिकिट चेक कराने पर मालूम हुआ कि लगभग 30 टिकिटें कन्फ़र्म नहीं हुई हैं। इसलिए जितनी सीटें हैं उन पर ही सभी को समायोजित हो कर जाना है। कुछ सहयात्री ऐसे थे कि वे अपनी सीट पर किसी और को बैठाने के लिए तैयार नहीं थे। अपनी सीटें संभालते ही उन्होने बिस्तर लगा लिया। हम तीन चार बोगियों में घूम कर उन्हे सीट दिलाते रहे। मेरी सीट पर भी कोई अन्य जम गए थे। सहयात्रियों में महिलाओं की संख्या अधिक थी, महिलाओं की सीट मिल जाए तो पुरुष कहीं पर भी रात का समय निकाल सकते हैं। पर कुछ महापुरुष थे जो अपनी सीट छोड़ने को ही तैयार नहीं थे। जैसे-तैसे करके सभी को स्थान दिलाया। सहयात्रियों ने डफ़ली लेकर भजन शुरु कर दिए। बड़ा ही अच्छा माहौल बन गया था। भजन कीर्तन में लग गए, बंछोर जी ने बढिया भजन सुनाए।

मथुरा जंक्शन
कुछ फ़ोर्स के भी जवान थे उस बोगी में, उन्होने दरवाजा बंद करके वहीं पर अपना डेरा लगा लिया और बोतल खोल ली। ट्रेन में ही कार्यक्रम शुरु कर दिया, शायद फ़ोर्स के जवानों के लिए ट्रेन में शराबखोरी की छूट है। ये ट्रेन में शराबखोरी करते हुए गाहे-बगाहे मिल ही जाते हैं। ट्रेन मंजिल की ओर दौड़ रही थी, मेरी सीट पर एक सज्जन सोए हुए थे। मैने सोचा कि इन्हे सोने दिया जाए, रात 1 बजे के बाद इन्हे उठाकर दो चार घंटे के लिए आराम कर लेगें। 1 बजे मैने अपनी सीट संभाली। नींद का समय निकल जाने पर बुलाने से भी नहीं आ रही थी। करवटे बदलते रहा, जैसे ही नींद आने लगी तो कुछ सवारीयाँ जोर-जोर से बातें करने लगी। उनके वार्तालाप से नींद में व्यवधान हो रहा था। जैसे-तैसे करके एकाध झपकी ली और भोपाल आ गया। चे गरम, चे गरम की आवाज सुनकर उठना पड़ा। चाय के साथ अखबार लिया पर थकान काफ़ी हो गयी थी। चाय पीकर पुन: लेट गया। सहयात्रियों ने अपनी नींद पूरी कर ली थी। शाम को तीन बजे हम मथुरा स्टेशन पर पहुंचे। सारी सवारियों के उतरने के बाद जाँच की गयी, कोई ट्रेन में छूट तो नहीं गया है।

ऑटो रिक्शा की सवारी भूखनलाल जी के साथ
प्लेटफ़ार्म के बाहर निकलते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। सब के अलग-अलग रेट थे, तपोभूमि तक जाने के 10 सवारियों के कोई 250 कह रहा था कोई 200 रुपए। हमने थोड़ा इंतजार किया तो प्रति सवारी 15 रुपए के हिसाब से ऑटो तय हुआ। 8 ऑटो रिक्शा करके हम तपोभूमि की ओर चल पड़े। राजस्थान जैसे इधर के ऑटो में भी पीछे डिक्की तरफ़ भी एक सीट लगा रखी थी। जिस पर 4 सवारियाँ बैठ जाती हैं, अगल-बगल और पीछे लटकाकर 20 सवारी तो ले ही जाते हैं। ट्रैफ़िक वाले चौक पर खड़े देखते रहते हैं। किसी ऑटो वाले को बाहर लटकी सवारियाँ देखकर भी रोकते-टोकते नहीं। तपोभूमि पहुंच कर आमद दी और स्नान ध्यान कर मथुरा घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैने और गिलहरे गुरुजी ने अलग ही जाने का विचार किया। तपोभूमि की सड़क पर ही ऑटो मिल जाते हैं, डीग गेट से कृष्ण जन्मभूमि जाने के लिए। हमसे ऑटो वाले ने 3 रुपए प्रति सवारी लिए।  आगे पढें