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सोमवार, 12 मार्च 2012

नि:शब्द मौन के बोल -- ललित शर्मा



नि:शब्द
मौन के बोल
अबोल से झरते
शब्द
ज्यूँ झरता
अनहद से रसानंद
बजता अनहद नाद
अंतर में
यूँ लगा
कबीर हो गया
बजा जब
अनहद मृदंग
शुन्य में
पुलकित रोम रोम
एकाकार होते
उष्मा भरे वलय
ब्रह्माण्ड समाया हो
अंतर में
उष्मा से भरा अंतरिक्ष
फ़िर भीषण प्रकाश
और प्रकाश ही प्रकाश
हुआ अंतर आलोकित
तिमिर कलुष भागे
अबोल से झरे शब्द
यूँ लगा कि
तुमसे मिलकर
परमहंस हो गया
रोम रोम काव्य मय हुआ
स्वरलहरियां चल पड़ी
शब्दों से मिलने
बनकर गीत गुंजेगी
मेरे अंतस  में नित
अनहद नाद की तरह
जो बजता है अनवरत