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रविवार, 22 जून 2014

यात्री सुविधाओं पर भी ध्यान दीजिए मंत्री जी

रेल का किराया एकाएक बढा दिया गया, जिससे आम यात्री की जेब पर अचानक बोझ बढ़ गया। मंहगाई वैसे ही कमर तोड़ रही है। अच्छे दिनों की आशा ने मोदी सरकार को आशा से अधिक सीटें देकर संसद में बहुमत प्रदान किया और दिल्ली में सरकार बनवा दी। सरकार बनने के एक महीने के भीतर गैस, पैट्रोल, डीजल, एवं रेलभाड़े के बढने की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी थी। पिछली सरकार ने भी इन चीजों के दाम बढाने में कोई कमी नहीं रखी। इनके दाम बढने का सीधा असर अन्य आवश्यक वस्तुओं पर भी पड़ता है। परिवहन दर में वृद्धि होने पर खाद्यान्न एवं आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ जाते है।
मोदी सरकार ने कुछ दिनों पूर्व अप्रिय फ़ैसले लेने की बात कही थी। जो जनता को पसंद नही आएंगे, उसकी शुरुआत रेल का किराया बढने से हो गई। रेल का किराया 14 प्रतिशत से अधिक बढा दिया गया और माल भाड़े में भी वृद्धि की गई। सरकार का कहना है कि खजाना खाली हो गया है और उसे भरने के लिए कड़े कदम उठाने होगें। साथ ही भाजपा के प्रवक्ता बचकानी दलील दे रहे हैं कि यह फ़ैसला पिछली सरकार का है। अगर पिछली सरकार का फ़ैसला है तो ऐसी कौन सी बाध्यता है कि जो इसे लागु किया जाए। सरकार फ़ैसला बदल भी सकती है। 
यह तो भारत की जनता है, कितना जुल्म कर लो, दो चार दिनों में रो-पीट कर चुप हो जाएगी। संसद में विपक्ष बचा नहीं जो हो हल्ला मचाएगा। कांग्रेस अपने कर्मो से कोमा में चली गई है। ऐसी स्थिति में मनचाहे निर्णय लिए जा सकते हैं। रेल का किराया बढाने के पीछे यह भी तर्क दिया जा रहा है कि रेल यात्रियों के लिए सुविधाओं का विस्तार होगा। अगर कभी मुंबई हावड़ा या अहमदाबाद हावड़ा ट्रेन की सामान्य बोगी में सफ़र करके देखें। नानी याद आ जाएगी। पैर रखने की जगह नहीं रहती और गंतव्य स्थान से ही गाड़ी फ़ुल हो जाती है। 
किराया बढाने के साथ यात्री सुविधा बढाने वाली बात थोड़ी राहत दे सकती है। परन्तु भारतीय रेल के यात्रियों की असुविधाओं को ध्यान में रख कर यात्री सुविधाएँ विकसित की जानी चाहिए। प्रथमत: तो तत्काल के नाम पर घोटाला बंद किया जाना चाहिए। तत्काल कोटा बना कर यात्रियों की जेब पर डाका डाला जा रहा है और इस कोटे में भी वेटिंग टिकिट दी जाती है, जो नान रिफ़ंडेबल होती है। अगर कोई यात्री मजबूरी में तत्काल की वेटिंग टिकिट ले लेता है और कन्फ़र्म नहीं होती तो उसके पैसे भी रेल्वे हजम कर जाती है। पहले तत्काल का अर्थ था कि गाड़ी चलने से पहले जो टिकिट रद्द कराई जाती थी उन्हें करंट टिकिट की खिड़की से बेच दिया जाता था। अभी तो ट्रेन में आधी सीटों को तत्काल कोटे में डाल दिया गया है। जिससे ट्रेन चलने के समय तक सामान्य कोटे के वेटिंग टिकिट धारी की टिकिट कन्फ़र्म नहीं हो पाती।
इसके साथ ही यात्रियों के जानमाल की पूरी सुरक्षा होनी चाहिए। नीतिश कुमार के रेलमंत्री बनने से पहले यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जीआरपी की थी। उसे आर पी एफ़ को दे दिया गया। पहले आर पी एफ़ का काम सिर्फ़ रेल्वे की संपत्ति की रक्षा करना था। अब दोनों सुरक्षा बलों में तालमेल के अभाव के कारण ट्रेन में चोरी डकैती एवं अन्य आपराधिक घटनाएँ होती हैं। आम आदमी कार्यवाही के इंतजार में दोनो सुरक्षा बलों के अहम का शिकार होकर पेंडुलम की तरह इधर-उधर लटकता रहता है। यात्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक बल को दी जानी चाहिए।
स्लीपर में जगह न मिलने पर सामान्य कोच में लम्बी दूरी के यात्री को यात्रा करनी पड़ती है, इससे स्थानीय सवारियों को तकलीफ़ होती है। दैनिक यात्रा करने वाले भी परेशान रहते हैं। इसलिए सामान्य कोच में व्यवस्था करनी चाहिए कि सीटों से अधिक टिकिट न बेची जाएं। जिससे यात्री भेड़ बकरी की तरह यात्रा करने से बच पाएगा तथा दुर्घटनाओं में कमी आएगी। चलती हुई ट्रेन पकड़ने के चक्कर में अत्यधिक दुर्घटनाएँ होती हैं। रेल्वे की खान-पान सेवा भी माशा अल्ला है। अगर कोई यात्री पेंट्रीकार में घुस कर खाना बनते हुए देख ले तो जीवन में पैंट्री का खाना नहीं खाएगा। खाने की गुणवत्ता के साथ पैंट्रीकार का स्तर भी सुधरना चाहिए।
पेयजल की समस्या सभी स्टेशनों पर प्राय: दिखाई देती है। इससे यात्रियों को विभिन्न कम्पनियों के पेयजल की बोतल मंहगे में खरीद कर पीनी पड़ती है। इस वर्ष ट्रेनों में लोकल ब्रांड की पानी की बोतलें भी 20 रुपए प्रति बोतल बिकती हुई दिखाई दी। 20 रुपए में तो आधा लीटर दूध आ जाता है। आज रेलयात्री को दूध की कीमत पर पानी खरीदना पड़ रहा है। इसलिए सभी मुख्य स्टेशनों पर शुद्ध पेयजल की व्यवस्था होनी चाहिए। जिससे यात्रा के दौरान जलजनित बीमारियों से बचा जा सके। साथ वेंडरों द्वारा अधिक मूल्य पर खाद्य सामग्री बेचे जाने पर भी लगाम लगनी चाहिए। इसके लिए रेल्वे के वाणिज्य विभाग की जवाबदेही तय की जानी चाही। 
यात्रा के दौरान बड़ी अजीब स्थिति हो जाती है जब आप भोजन कर रहे हों और कोई आपसे भोजन मांग ले। यात्रा के दौरान व्यक्ति सीमित भोजन लेकर ही चलता है। भिखारियों के द्वारा रुपया पैसा मांगना यात्री को शर्मिंदा करता है। साथ ही हिजड़ों ने पूरे भारत में रेल के प्रमुख स्टेशनों में अपने अड्डे बना रखे हैं जो यात्रियों की बेईज्जती करके उनसे पैसे वसूल करते हैं। कुछ दिनों पूर्व हिजड़ों द्वारा किसी यात्री को ट्रेन से बाहर धकेलने की भी खबर समाचार पत्रों में आई थी। परिवार के साथ सफ़र कर रहा व्यक्ति इनकी हिंसा का शिकार कब हो जाए इसका पता नहीं चलता। ये टीटी और सुरक्षा बलों की नाक के नीचे जबरिया वसूली करते हैं। ट्रेन का ऐसा कोई भी यात्री नहीं होगा जिसका पाला इनसे नहीं पड़ा होगा। भिखारियों एवं हिजड़ों को ट्रेनों में कड़ाई से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
रेल्वे ने बहुत सारे कार्य ठेके पर दे दिए हैं, जिनमें से ट्रेनों में पानी भरना भी एक है। कई बार ट्रेनों की बोगियों में पानी नहीं भरा जाता और ट्रेन गंतव्य स्थान से रवाना कर दी जाती है। इनकी बदमाशी को यात्री सफ़र के दौरान भुगतते हैं हजार बार शिकायत दर्ज कराने पर भी ट्रेनों में पानी नहीं भरा जाता। यही हाल बोगियों की साफ़ सफ़ाई का भी है। कुछ ट्रेनों में ही सफ़ाई कर्मी दिखाई देते हैं बाकी भगवान भरोसे चल रही हैं। वातानुकूलित बोगियों के यात्रियों को दिए जाने वाले चादर और कंबलों की सफ़ाई नहीं रहती। उन्हें गंदे ही थमा दिए जाते हैं। स्थिति यह हो गई है कि भारतीय रेल समस्याओं एवं असुविधाओं का पिटारा हो गयी है। परिवार लेकर यात्रा में निकला हुआ व्यक्ति किस-किस के साथ पंगा लेगा। इसमें चुप रह कर यात्रा पूरी करने में ही अपनी भलाई समझता है।
दो महीने पहले टिकिट आरक्षण करवाने पर यात्री को उसके जमा के बदले ब्याज के रुप में टिकिट में छूट दी जानी चाहिए। दो महीने तक रेल्वे विभाग उसके पैसों का उपयोग करता है। एक बार ट्रेन चलने के बाद यह टीटीयों के हवाले हो जाती है, जो चाहे करें इनकी मर्जी। क्रमवार प्रतीक्षा सूचि के यात्रियों को सीट नहीं देते, जो इन्हें भेंट चढा देता है उस की सीट कन्फ़र्म कर दी जाती है। ट्रेन में टीटीयों की मनमानी बंद होनी चाहिए। 
यदि ट्रेन का किराया बढाया जा रहा है तो सरकार यात्रियों सुविधाओं की विस्तार की ओर ध्यान देना चाहिए। अगर यात्री सुविधाओं को विस्तार दिया जाएगा और यात्री सकुशलता की गारंटी होगी तो बढा हुआ किराया भी तकलीफ़देह नहीं है। भारत एक  विकासशील देश हैं जहां 50 प्रतिशत जनता आज भी दो वक्त की रोटी के लिए कमरतोड़ मेहनत करती है, जब उनकी जेब पर अत्यधिक भार डाला जा रहा है तो उन्हें बढे हुए किराए के साथ सुविधाएं भी मिलनी चाहिए, तभी अच्छे दिन आएगें।

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

भारतीय रेल : चित्र प्रदर्शनी बिलासपुर

चुनावी सरगर्मी के साथ शादियों का माहौल भी गर्म है। आम चुनाव और शादियों के मुहूर्त एक साथ आते हैं। जिससे दोनों ही प्रभावित होते हैं। 18 अप्रेल को एक शादी के सिलसिले में बिलासपुर जाना था तथा 19 को भी एक शादी में सम्मिलित होना था। इस तरह 2 दिनी बिलासपुर प्रवास तय हो गया। बिलासपुर रेल्वे जोन ने रेल्वे पर आधारित एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था। इस प्रदर्शनी को देखने की भी ललक थी। "कहाँ शुरु कहाँ खत्म" आत्मकथा के लेखक द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी को फ़ोन करने पर उन्होने कहा कि "बिलासपुर में आप मेरे मेहमान रहेगें।" मेरा इरादा था कि एक रात बिल्हा रुका जाए और अगली सुबह फ़िर बिलासपुर पहुंच जाऊंगा। पर द्वारिका प्रसाद जी के स्नेहिल आग्रह को टाल न सका। 
आत्मकथा लेखक श्री द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी
प्रदर्शनी की अंतिम तिथि 18 तारीख बताई गई थी। मैने सोचा कि शाम 5 बजे तक प्रदर्शनी का समापन हो जाएगा तो देख नहीं पाऊंगा। इसलिए दोपहर को ही बिलासपुर के चल पड़ा। शाम को 4 बजे तक पहुंच कर भी एक घंटे का समय प्रदर्शनी के लिए मिल जाएगा। बिलासपुर पहुंचने पर द्वारिका प्रसाद जी स्टेशन पर ही मिल गए। हम प्रदर्शनी स्थल ढूंढते हुए डी आर एम ऑफ़िस के आगे तक पहुंच गए। आसमान में बादल होने के कारण गर्मी का असर कम ही था। एक तरह से मौसम सुहाना ही बन गया था। आखिर ढूंढते हुए प्रदर्शनी तक पहुंच गए। तो हॉल के सभी दरवाजे बंद थे। मैने सोचा कि समापन हो गया लगता है। परन्तु हॉल में कूलर चलने का संकेत मिलने पर समझ आ गया कि भीतर कोई तो है। आवाज देने पर दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाले ने बताया कि प्रदर्शनी की तारीख बढ़ा कर 20 कर दी गई है।
भिलाई स्टील प्लांट का पावर इंजन
हॉल में थोड़ी सी ही जगह में फ़ोटो प्रदर्शनी लगाई गई थी। अगर सरसरी तौर भी निगाह डालें तो 5 मिनट में मामला रफ़ा-दफ़ा हो सकता था। लगभग 30 पुराने चित्र लगाए गए थे। जिनमें रेल्वे संचालन से संबंधित जानकारियाँ दिखाई गई थी। अगर पार्श्वालोकन करें तो 1887 में बंगाल नागपुर रेल्वे के अंतर्गत बिलासपुर में रेल लाइन बिछी और 1890 में बिलासपुर स्टेशन बना तथा 1891 में बिलासपुर जंक्शन। बिलासपुर में सुंदर रेल्वे कालोनी बसाई गई, जो शहर से काफ़ी दूर थी। प्रारंभिक काल में स्टीम इंजन चलते थे। प्रदर्शनी में स्टीम इंजन के चित्र भी दिखाई दिए, जो सवारी गाड़ी एवं माल गाड़ी को खींचते थे।
रायपुर धमतरी नैरोगेज लाईन का भाप इंजन
एक चित्र रायपुर धमतरी रेल लाईन के स्टीम इंजन का था। जिसे देखकर मेरी पुरानी यादें ताजा हो गई। मेरे निवास के एक कोने पर इस नेरोगेज लाईन का आउटर सिगनल है। गर्मी के दिनों में जब भी यह स्टीम इंजन इधर से गुजरता था तो ड्रायवर भाप का प्रेसर बढा कर धुंए के साथ कोयले भी उड़ाता था। इन जलते हुए कोयलों से सूखी घास में आग लग जाती थी। शाम को वक्त तो हमें पानी की बाल्टी भरकर तैयार रहना पड़ता था। घास में आग लगते ही बुझाया करते थे। अब भाप के इंजन की छुक छुक की आवाज एवं मधूर सीटी गुजरे हुए जमाने की बात हो गई। इस स्टीम के इंजन को डी आर एम ऑफ़िस रायपुर के बाहर ट्राफ़ी बना कर रखा गया है।
पुल निर्माण - हैट वाले इंजीनियर के साथ कुत्ता भी दिखाई दे रहा है।
रेल्वे के शुरुवाती दिनों में पहाड़ों को काटकर बोग्दे बनाकर एवं नदियों पर पुल बना कर यातायात सुगम किया गया। इस निर्माण से संबंधित चित्र भी प्रदर्शनी में रखे गए। उस समय सभी व्यक्ति सिर पर पगड़ी पहनते थे। इस चित्र में नंगे सिर कोई नहीं दिखाई दे रहा। इंजीनियर के निर्देशन में पुल के निर्माण का कार्य चल रहा है। जिसमें गार्डर लगाने के लिए रस्सी एवं चैन पुल्ली जैसा यंत्र भी दिखाई दे रहा है। इस चित्र में महत्वपूर्ण बात तो यह दिखाई दी कि इंजीनियर का पालतू कुत्ता भी उसके साथ पुल निर्माण की कार्यवाही तल्लीनता से देख रहा है। यह उनके पशुप्रेम को प्रकट करता है।
गोंदियां रेल्वे स्टेशन का हिन्दू टी स्टाल
1932 के एक चित्र से तत्कालीन सामाजिक स्थिति का पता चलता है। यह चित्र "हिन्दू-चाय" की दुकान का है। उस जमाने में मुस्लिम और हिन्दूओं में इतना अधिक विभाजन था कि हिन्दू मुसलमान के हाथों का भोजन ग्रहण नहीं करते थे। इसलिए रेल्वे ने हिन्दू टी स्टाल का अलग से निर्माण कराया। इनके लिए पानी के नलके भी अलग रहते थे। उस समय लम्बी दूरी का मुसाफ़िर पीने का पानी अपने साथ लेकर चलता था। ज्ञात हो कि जयपुर के महाराज सवाई मान सिंह द्वितीय 1902 में एडवर्ड सप्तम के राजतिलक समारोह में सम्मिलित होने इंग्लैंड गए थे तो चांदी के कलशों में लगभग 8000 लीटर गंगाजल अपने साथ ले गए थे।
शंटिग के लिए हाथी का सहारा
उस समय रेल्वे डिब्बों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए हाथियों का सहारा लेती थी। स्टीम इंजन को चलाने के लिए कोयले के भंडार के साथ पानी भी भरपूर व्यवस्था की जाती थी। इंजन में कोयले भरने के बाद उसमें पानी डाला जाता था, जिससे कि कोयला सूखने पर उसमें आग न लग जाए। इंजनों के दिशा परिवर्तन के लिए गोल घर बनाए जाते थे। जिस पर इंजन को चढाकार लेबर धक्का मार कर उसका दिशा परिवर्तन करते थे। यह व्यवस्था राजस्थान के फ़ूलेरा, जोधपुर जैसे स्टेशनों पर मैने देखी है।
बोग्दा
जनशक्ति के आवागमन के लिए रेल्वे उपयोगी साधन बन गया। आजादी के पहले रेल संचालन खंड-खंड में निजी कम्पनियों द्वारा किया जाता था। जिनके अलग-अलग प्रतीक चिन्ह हुआ करते थे। इस प्रदर्शनी में इन निजी कम्पनियों के प्रतीक चिन्हों को भी प्रमुखता से दर्शाया गया। रेल्वे के एकीकरण के पश्चात इसका प्रतीक चिन्ह बदल गया। इन प्रतीक चिन्हों को देखने के पश्चात पता चलता है कि किन कम्पनियों द्वारा रेल परिवहन का संचालन हो रहा था। 
निर्माण के दौरान क्रेन का उपयोग
ऐसी एक रेल मारवाड़ जंक्शन से उदयपुर के लिए खामली घाट होते हुए चला करती थी। जो जोधपुर रियासत की निजी रेल थी। इस रेल से मुझे यात्रा करने का सौभाग्य 1990 में मिला था। शायद अब यहाँ अमान परिवर्तन के कारण यह रेल नहीं चलती हो। रेल चित्र प्रदर्शनी से लौट कर हम श्री जगदीश होटल पहुंचे। कुछ देर विश्राम करने के पश्चात आशीर्वाद समारोह में सम्मिलित हुए। अगला दिन हमने मल्हार दर्शन के लिए तय किया। 

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है

नुष्य सब कुछ साध लेता है पर प्रकृति को नहीं साध पाया। वह अपनी मन मर्जी से चलती है, कहीं धूप कहीं छाया, कहीं बारिश कहीं सर्दी। सफ़र पर निकलने से पहले सोचता हूँ कि सामान कम हो, क्योंकि सामान का बोझ मुझे ही उठाना है। पीठ पर जितना सामान कम होगा, सफ़र उतनी आसानी से तय होगा। यदि 2 कपड़ों  में काम चल जाए तो एक ही रखना पसंद करुंगा। नवम्बर-दिसम्बर में उत्तर भारत में कड़ाके ठंड पड़ने लगती है। रेगिस्तानी इलाके में रात ठंडी होने से रेत ठंडा हो जाता है और ठंड बढ जाती है। गुलाबी होती हुई ठंड लाल होकर जला देने की क्षमता प्राप्त कर लेती है। जब ढेर सारे गर्म कपड़े लेकर जाता हूँ तो उनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती और जब ठंड के कपड़े कम रखता हूँ तो जान लेवा ठंड का सामना करना पड़ता है। इस तरह के मौसम घुमक्कड़ी में आड़े आते हैं। अबकि बार गर्म ओव्हर कोट रख लिया, जो किसी रजाई से कम नहीं है। पहनकर सोने पर ओढने की जरुरत नहीं पड़गी।
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डिस्पले पर गाड़ी का नम्बर और कोच नम्बर दिखाई देने लगा, वरना आधे घंटे से मरणासन्न पड़ा हूआ था। अपना सामान उठा कर निर्धारित स्थान पर ले आया और स्तम्भ के सहारे टिक कर बैठ गया। साथ ही एक अधेड़ महिला पुरुष का जोड़ा भी बैठा हुआ था। तभी करीना कपूर जैसी जीरो साईज वाला लड़का आ पहुंचा, उसने महिला और पुरुष का चरण स्पर्श किया तथा भृकूटी एवं हाथ संचालित करते हुए उनसे बात करने लगा। हर शब्द पर उसकी भाव भंगिमा बदल जाती थी। होठों से अधिक सैन से बातें कर रहा था। गजब के संकेत दिखाई दे रहे थे उसके चेहरे पर मुख मुद्रा के साथ। लगा कि उसमें स्त्री आत्मा का प्रतिशत कुछ अधिक है, हारमोनल बैलेंस बिगड़ गया। उसकी मम्मी ध्यान से सुन कर उसे घर जाने की हिदायत दे रही थी। वो भी बेचारी क्या करे, बेटी जैसा बेटा जनने की तकलीफ़ तो उठानी पड़ेगी। बाप सिर झुकाए शायद सोच रहा था कि वह कौन सी घड़ी थी, जब दुर्घटनावश गर्भाधान हुआ होगा।
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प्लेटफ़ार्म का डिस्पले नम्बर बदल गया। जहाँ बैठे थे वहाँ से एक फ़र्लांग दूर हमारा डिब्बा लगेगा। क्या करते हम? अपना सामान लादे पहुंच गए नियत डिसप्ले के समीप। रेल्वे वालों को किराया बढाने से सरोकार है, यात्रियों सुविधाओं की ओर कोई ध्यान नहीं है। ट्रेन आने के समय पर प्लेटफ़ार्म बदल देते हैं। उस वक्त सवारियों को कितनी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है। सवारियों में कई व्याधिग्रस्त भी होते हैं जो सहजता से प्लेटफ़ार्म नहीं बदल सकते। वे रिजर्वेशन टिकिट होने के बाद भी ट्रेन नहीं पकड़ पाते। उनका हर्जाना कौन देगा? भारतीय रेल भी भगवान भरोसे चल रही है। करोड़ों मुसाफ़िर अपनी जान जोखिम में डाल कर यात्रा करते हैं। थोड़ी देर के लिए प्लेटफ़ार्म पर हल-चल मच जाती है। जैसे कोई तूफ़ान आ गया हो। सवारियाँ भी अपने साथ अतिरिक्त सामान लेकर यात्रा करती हैं, जिसका खामियाजा ऐसे वक्त ही उठाना पड़ता है। ट्रेन आ गई। मैने अपने लिए 30 नम्बर की बर्थ ली थी। उपर की बर्थ पर आराम से सो कर सफ़र काटा जा सकता है। न किसी की किच-किच न किसी की झिक-झिक।
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ट्रेन ने सरकना शुरु किया। सांझ ने साथ छोड़ दिया और निशा ने अपनी ड्यूटी संभाल ली। बैग सिरहाने लगाया और लेट गया। अब बर्थ पर आने के बाद निशा से मिलन होने पर निद्रा रानी का आना भी तय था। वह प्यार से मेरे बाल सहलाती रही। कभी कान में फ़ुसफ़ुसाती, कभी वन, टू, थ्री, फ़ोर का गाना सुनाती। उसका मधूर स्वर मादक होकर कानों में रस घोल रहा था। मैं उसकी चूड़ियों से खेलने लगा। जैसे पहली कक्षा में पढ़ते वक्त मनके वाली स्लेट से गिनती करता था। सावधानी इतनी थी कि चूड़ियाँ आपस में टकरा कर कहीं खनक न जाएं। यहाँ प्यार की पाठशाला में पढाई शुरु थी कि निद्रा रानी ने अब अपने बाहूपाश में बांध लिया। न कुछ सुनाई दे रहा था न कुछ दिखाई। कभी-कभी कानों में ट्रेन की पहियों की आवाज सुनाई दे जाती। सफ़र जारी था, ट्रेन के पहियों की आवाज कब दूर चली गई पता न चला। निद्रा रानी ने स्वप्न द्वार उनमुक्त कर दिया। 
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मर्द के सपने में औरतें दिखाई देती हैं या फ़िर वे जो उसके कभी अत्यधिक करीबी थे और इस दुनिया में नहीं रहे। कइयों से सुना कि सपने में फ़िल्मी अभिनेत्रियाँ आती हैं। मेरे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि कैटरीना कैफ़ या करीना कपूर आकर गले में बाँहे डाल कर लटक गई हों। कभी सपनों में स्त्री की जगह भैंस क्यों नहीं दिखाई देती। आखिर वो भी स्त्रीलिंग है। लेकिन ऐसा नहीं होता। दिन में जो घटता है वह चेतन मन से होकर अवचेतन की ओर सफ़र करता दिखाई दे जाता है। सपने भी बड़े अजीब होते हैं, फ़िल्म की तरह चलते हैं। लेकिन सपनों की फ़िल्म चलाने वाला प्रोजेक्टर मिस्त्री बड़ी गड़बड़ करता है। कहीं की रील कहीं जोड़ देता है। मैं देख रहा हूँ कि स्कूल की क्लास लगी हुई है, टीचर पढा रहे हैं, तत्कालीन सारे सहपाठी दिखाई दे रहे हैं। मैं  हांफ़ते हुए कक्षा में पहुंचता हूँ, टीचर कहते हैं - इतने लेट क्यों आए हो? क्या बताऊँ सर! ये श्रेया-श्रुति (दोनो बेटियाँ) रोज बदमाशी करती हैं, कभी जूता-मोजा तो कभी किताबें छिपा देती हैं। इसलिए विलंब हो जाता है। अब इस स्वप्न में तीनों काल जुड़ जाते हैं। कहीं की रील कट कर कहीं जुड़ जाती है। सपने जारी रहते हैं…………
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रंग बदलते सपने तो सपने बदलते रंग होते हैं। सूर्य सी चमकीली रोशनी नीले, पीले, हरे, लाल, नारंगी, बैगनी रंगों में बदलती हैं। कभी बादलों में उड़ते हुए नीचे झांकने पर समंदर दिखाई देता है तो थरथरी आ जाती है। कहीं पहाड़ की ऊंचाई से खाई की तरफ़ देखने से पिंडलियों में सनसनी भर जाती है। अभी पैर फ़िसला और गिर जाऊंगा अंतहीन गहराई में। कभी ब्लेक होल में घुस कर कहीं से कहीं निकल जाता हूँ ,यह सपनों की दुनिया भी अजीब है। जहाँ शरीर नहीं पहुंच पाता वहाँ रुह पहुंच जाती है। अनंत का सफ़र भी कर आती है। करवट बदलते चोभा मीची में रात गुजर जाती है। चे गरम, चे गरम, पेप्योर, पेप्योर की कर्कश पुकार से दिन की शुरुवात होती है। आवाज सुनकर आँखें मलता हुआ अपनी हथेलियों को देखता हूँ, कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, कर मूले गोविंदम्, प्रभाते कर दर्शनम्। किसी अन्य का मुंह देखने से पहले अपनी भाग्य रेखा, हृदय रेखा पर नजर दौड़ा लेता हूँ। ये दोनो रेखाएं सही रही तो जीवन रेखा तो स्वमेव ही सही चलते रहेगी। 
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ए चाय, एक इधर भी देना। कितने पैसे हुए? 7 रुपए, इलायची वाली चाय है। पैसे देते हुए सोचता हूँ साले इलायची का सत डालकर चाय पिला रहा है पावडर दूध की और बखान ऐसे कर रहा है जैसे शिलाजीत डाल रखा हो। पेप्योर पेप्योर, पेपर भी दे देना। कौन सा? जिसमें कम पैसे अधिक पन्ने हों। वह 2 रुपए में भारी सा अंग्रेजी अखबार टिका देता है। चाय की चुस्कियों के साथ अंग्रेजी खाने का प्रयास करता हूँ, अंग्रेज जब हिन्दूस्तान को खा गए तो क्या मैं अंग्रेजी नहीं खा सकता है। लेकिन भाषाएं अजीब बला होती हैं। जितना खाओ, उतना ही विस्तृत होती जाती हैं। समझ आता है, खाने से अंग्रेजी खत्म नहीं होने वाली। जब तक अंग्रेजी राज-काज की भाषा बनी रहेगी, अंग्रेजी सिखाने वाले कोचिंग सेंटर फ़लते फ़ूलते रहेगें और गुलामी लदी रहेगी। बिग बॉस के घर जैसे रेल में सुबह किसी अच्छे गाने से होनी चाहिए। चे गरम और पेप्योर की कर्कश ध्वनि से नहीं। सुबह अच्छी हो तो सफ़र में दिन तो रुमानी बना रहेगा। चाय की उड़ती हुई भाप से सुनाई दे रहा था … न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है, आगे पड़ाव आ रहा है, मंजिल का पता नहीं………

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

रेल तू महाठगनी जग जानी

शिया का सबसे बड़ा एवं 150 वर्ष पुराना रेल संगठन कहलाने वाला भारतीय रेल उपक्रम कहने को तो यात्री सुविधाएं देने के नित नए दावे करता है परन्तु यहाँ सुविधाओं से अधिक अव्यवस्थाएं दिखाई देती है और अव्यवस्थाएँ भी इतनी घातक हैं कि यात्रियों का प्राण हरण कर लेती हैं। सुविधाओं के नाम से यात्रियों से धन की भरपूर वसूली की जाती है, जब सुविधा देने की बारी आती है तो सारी व्यवस्था ही वेंटिलेटर पर चली जाती है। नित नई योजनाएँ बनाकर भिन्न भिन्न शुल्क लाद कर यात्रियों की जेब डाका डाला जा रहा है। रेल यात्रियों की सलाहकार समितियाँ बनाई हुई हैं लेकिन उनकी सलाहों को कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है। ये मानकर चलिए कि यात्री स्टेशन के प्लेटफ़ार्म पर पहुँचते ही लूट का शिकार होने लगता है तथा यह लूट एक मुश्त न होकर किश्तों में होती है। जिसका सामना प्रत्येक रेलयात्री को करना पड़ता है।

सबसे अधिक लूट खान-पान सेवा द्वारा की जाती है। घटिया खाद्य सामग्री को मनमाने मूल्य पर बेचा जाता है और यह सब जिम्मेदार अधिकारियों की नाक के नीचे बदस्तुर जारी है। कुछ दिनों पूर्व मैने रेल्वे स्टेशन के पार्किंग स्टैंड पर अपनी बाईक खड़ी की और मुझे 5 रुपए की पर्ची दी गई। जिसमें लिखा था "पहले 12 घंटे के 5 रुपए, 12 घंटे से 24 घंटे के 10 रुपए अतिरिक्त, 24 घंटे के से आगे 15 रुपए अतिरिक्त"। 24 घंटे के बाद आने पर मुझसे 30 रुपए लिए गए। स्टेशन पर पानी की बोतलें लोकल कम्पनियों की रखी जाती है, जिन्हें ब्रांडेड कम्पनियों के दाम से भी 5 रुपए अधिक पर बेचा जाता है। खाद्य सामग्री का कोई माई बाप नहीं है, बाजार मूल्य से दुगने भाव में बेची जाती हैं और यात्रियों को मजबूरी में खरीदना पड़ता है।

लम्बी दूरी की गाड़ियों के साथ चलने वाली पैंट्री कार के भीतर का हाल अगर कोई देख लेगा तो वहाँ का भोजन कभी नहीं करेगा। पैंट्री कार में गंदगी चारों तरफ़ पसरी रहती है। पैंट्री कार से सामान की बिक्री भी रेल्वे द्वारा तय मूल्यों से अधिक पर की जाती है साथ ही तय मात्रा से कम ही खाद्य सामग्री दी जाती है। गर्मी के दिनों में शीतल पेय एवं बोतल बंद पानी को ठंडा करने की कीमत भी अलग से वसूली जाती है। अगर रायपुर से दिल्ली तक का सफ़र कोई व्यक्ति करता है तो उसे कम से कम 200 रुपए तो सिर्फ़ पानी पर ही खर्च करने पड़ते हैं। स्टेशन पर मिलने वाली खाद्य सामग्री भी मानकों पर खरी नहीं उतरती। वेंडरों का यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार आम बात है। 

ये तो स्टेशन तक का मामला था। चलती हुई गाड़ियों में अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करने के बाद भी सामान चोरी हो जाते हैं। हिजड़ों के दल के दल यात्रियों का भयादोहन कर खुले आम वसूली करते दिखाई देते हैं, रुपए नहीं देने पर धमकी पर उतर आते हैं, शिकायत करने पर सुरक्षा बल एवं टी टी कन्नी काट लेते हैं। जबकि इन्हें मालूम रहता है कि कौन से स्टेशन से हिजड़े चढ कर यात्रियों को परेशान करते हैं। इन हिजड़ों के पास टिकिट भी नहीं होती। आर पी एफ़ से शिकायत करने पर कहा कि - "इन हिजड़ों के कौन मुंह लगे?" इन्हे तो वीरता पुरस्कार देना चाहिए क्योंकि ये मर्दों के मुंह लग लेते हैं लेकिन हिजड़ों के नहीं। टी टी और सुरक्षा बलों की ड्युटी यात्रियों की सहायता के लिए की जाती है, टीटी टिकिट चेक करने पर अन्य किसी बोगी में मुंह छिपा कर बैठ जाते हैं फ़िर दुबारा दिखाई नहीं देते, सुरक्षा बल सिर्फ़ वसूली करते दिखाई देते हैं। 

मध्य प्रदेश कटनी के पास 17 अप्रेल गुरुवार की रात छपरा-वाराणसी-दुर्ग सारनाथ एक्सप्रेस में लूटपाट की घटना हुई। समाचार है कि डकैती के वक्त आर पी एफ़ के जवान गाड़ी में थे और उन्होने ने लुटेरों पर कोई कार्यवाही नहीं की सिर्फ़ वाकी टाकी पर बात करते रहे। घटना को लेकर डी आर एम का कहना है कि " यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जी आर पी की है। आर पी एफ़ सिर्फ़ रेल्वे की संपत्ति की रक्षा करता है।" 20 अप्रेल रविवार को दतिया-झांसी के बीच करारी स्टेशन के पास छत्तीसगढ़ सम्पर्क क्रांति में लूट-पाट हुई और यात्री लूट का शिकार हो गए। जब चोर डकैत ट्रेन पर हमला करते हैं तो आर पी एफ़ की बहादुरी धरी की धरी रह जाती है। घटना होने पर आर पी एफ़ एवं जी आर पी एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल कर अपनी खाल बचाते हुए दिखाई देते हैं। जब यात्रियों से तीन महीने पहले अग्रिम टिकिट की पूरी राशि वसूल कर ली जाती है उनकी सुरक्षा भी मुस्तैदी से करनी चाहिए।

गत वर्ष गुवाहाटी से आते वक्त देखा कि ट्रेन के स्लीपर की किसी बोगी में पानी नहीं था। टीटी से शिकायत करने पर उसने कहा कि मैने पिछले स्टेशन पर स्टेशन मास्टर को पानी न होने की शिकायत लिखित में दे दी है। गोवाहाटी से चल कर बोंगाई गाँव पहुंचने टी टी ने कहा कि जब तक आप लोग ट्रेन नहीं रोकोगे इसमें पानी नहीं डाला जाएगा। यात्रियों द्वारा बोंगाई गांव में चैन पुलिंग करके गाड़ी आधा घंटा रोकने के बाद भी पानी नहीं भरा गया। रात 12 बजे न्यु जलपाई गुड़ी स्टेशन पर पहुंचने के बाद यात्रियों ने गाड़ी में पानी भरने के लिए एक बार फ़िर हंगामा किया। एक घंटा गाड़ी खड़ी रही लेकिन पानी नहीं भरा। स्टेशन पर मौजूद अधिकारियों ने कहा कि गाड़ियों में पानी भरने की व्यवस्था ठेके पर दी गई है और ठेकेदार के आदमी कह रहे हैं कि टंकी में पानी नहीं है, इससे आगे चलने वाली गाड़ी को पानी दे दिया गया। बिना पानी के ही यात्रियों को लम्बा सफ़र करना पड़ा।

अगर लम्बी दूरी की चलती हुई गाड़ी में किसी यात्री की अचानक तबियत खराब हो जाए तो उसे चिकित्सा सहायता नहीं मिल पाती। आपातकालीन चिकित्सा सुविधा न मिलने से यात्रियों की जान चली जाती है। 1 जुलाई सोमवार को मुंबई हावड़ा मेल में रेल्वे की लापरवाही के चलते 35 वर्षीय संतोष दास की जान चली गई। बताया जाता है कि संतोष दास नागपुर से तड़पता हुआ 6 घंटे का सफ़र तय करके रायपुर पहुंच गया। रेल्वे के अधिकारियों को जानकारी देने के बाद भी इन 6 घंटों में किसी भी स्टेशन पर उसे चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं हो पाई, जिससे रायपुर स्टेशन पर बीमार यात्री ने प्राण त्याग दिया। यह अमानवीयत और लापरवाही की पराकाष्ठा है। इन लापरवाहियों और लूट पाट को देखते हुए तो यही लगता है कि यात्री भगवान भरोसे अपनी यात्रा सम्पन्न करके घर लौट आए तो ईश्वर की विशेष अनुकम्पा समझना चाहिए। एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क कही जाने वाली भारतीय रेल के लिए तो अब यही कहा जा सकता है - रेल तू महाठगनी जग जानी।