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सोमवार, 14 जनवरी 2013

कैसे उजड़ा श्रीपुर ? Sirpur ………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
सिरपुर भ्रमण करने के बाद सामन्यत: पर्यटक के मन में यह विचार आता है कि कोसल जैसे विशाल राज्य की समृद्ध एवं वैभवशाली राजधानी श्रीपुर का पतन कैसे हुआ? इस नगरी का वैभव कैसे उजड़ गया? ऐसा क्या हुआ होगा जो श्रीपुर को पतनोन्मुख होना पड़ा? मेरे भी मन में यह प्रश्न उठने लगे। एक तरफ़ जहाँ महाशिवगुप्त जैसे बलशाली राजा हुए, जिन्होने लगभग 60 वर्षों तक सिरपुर पर शासन किया। उनके शासन काल में सभी धर्मों एवं मतों  को समान आदर मिला। विद्वानों को उनके राज्य में संरक्षण मिला। महाशिवगुप्त बालार्जुन का शासन काल राज्य का स्वर्णिम युग था। उसने कभी न सोचा होगा कि इस वैभवशाली राजधानी का पतन भी हो सकता है। किसी शहर, नगर या राजधानी का पतन एकाएक नहीं होता। जब उसे उतकर्ष पर पहुंचने में शताब्दियाँ लग जाती हैं तो पतन होने भी समय लगता है। श्रीपुर के पतन के अनेक कारण हो सकते हैं। जिनमें से कुछ हमें प्रत्यक्ष रुप से वहां के स्मारकों में परिलक्षित होते हैं।
पतन के कारण - महानदी की बाढ
अगर हम सिरपुर की भौगौलिक स्थिति देखें तो नगर के पश्चिम दिशा में महानदी प्रवाहित होती  है। उनके प्रवाह के कारण किनारों का क्षरण होता है। निरंतर कटाव के कारण नदियाँ बरसात के दिनों में अपना रास्ता भी बदल लेती हैं। अब यह तय नहीं होता कि कौन से किनारे तरफ़ कटाव अधिक होगा। उत्खन से ज्ञात है कि सिरपुर व्यापार की बहुत बड़ी मंडी था। यहाँ उत्खन में कई एकड़ों में बाजार क्षेत्र प्राप्त हुआ है। यह बाजार क्षेत्र महानदी के किनारे पर स्थित है। जब राजधानी बसी होगी तब महानदी का किनारा इतना दूर रहा होगा कि राजधानी को बाढ आदि से हानि न पहुंच सके। क्योंकि महानदी के किनारे उत्खनन में राजमहल परिसर भी प्राप्त हुआ है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा ने अपना महल सुरक्षित क्षेत्र में बनवाया होगा।
सुरंग टीला का महामंड़प 
बाजार में उत्खन से प्राप्त भवनों में मरम्मत के चिन्ह मिलते हैं। प्रतीत होता है कि अत्यधिक वर्षा होने से महानदी का प्रवाह तटबंध तोड़कर बाजार क्षेत्र में प्रवेश कर जाता था। जिसके कारण भवनों को हानि पहुंचती थी। बाढ का पानी उतरने के बाद निवासी अपने भवनों की मरम्मत कराते थे। बाजार क्षेत्र के भवनों में मूल निर्माण सामग्री के अलावा उस समय उपलब्ध निर्माण सामग्री से मरम्मत कराने के स्पष्ट प्रमाण दिखाई देते हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सिरपुर के पतन में महानदी की बाढ की भूमिका को नजर अंदाज नहीं  किया जा सकता। वर्तमान सिरपुर में भी महानदी में बाढ आने पर नगर को हानि पहुंचने की आशंका बनी रहती होगी।
पतन के कारण -भुकम्प
हम देखते हैं कि भूकंप आने पर बड़े बड़े नगर और राजधानियां कुछ पलों में निर्जन हो जाती हैं। धरती का एक बार थरथराना ही हजारों लाखों लोगों को काल के आगोश में समा देता है। श्रीपुर  के पतन में भुकंप की भूमिका भी रही होगी। भुकंप के चिन्ह सुरंग टीला स्थित पंचायत मंदिर के अधिष्ठान में दिखाई देते हैं। देखा जाए तो सुरंग टीला मंदिर की जगती भारत के मंदिरों में सबसे अधिक ऊंचाई पर है। दूर से देखने पर लगता है कि मिश्र के किसी पिरामिड के समक्ष खड़े हैं। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 43 सीढियां चढनी पड़ती हैं। इसका तल विन्यास नदी के तल से 17 फ़ुट ऊंचा है। वर्तमान में मंदिर सीढियाँ दबी हुई हैं। इनके कोण बदले हुए  हैं। विशाल मंदिर की संरचना में परिवर्तन सिर्फ़ भुकंप से ही आ सकता है। इससे स्पष्ट होता है श्रीपुर में भुकंप भी आया होगा। जिसके कारण इस नगर का पतन हुआ होगा।
मनसर का राजमहल( दबी हुई पैड़ियाँ)
भूकंप द्वारा विनाश के प्रमाण हमें अन्य स्थानों पर भी मिलते हैं। महाराष्ट्र के नागपुर जिले स्थित मनसर (मणिसर) में स्थित वाकाटक राजाओं के भग्न राजमहल का ढहने का कारण भुंकप हैं। भुकंप के चिन्ह राजमहल के भग्न भवन पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। मनसर से सिरपुर की दूरी लगभग 300 किलो मीटर होगी। हो सकता है दोनो जगह एक ही समय भुकंप आया हो। संयुक्त राष्ट्र भूगर्भीय सर्वे के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष रिक्टर स्केल 3 से 3.9 के 49000 हल्के, 6 से 6.9 के 120 अधिक तीव्र, 7.9 से 8 के 18 बड़े तथा 8 से 9 पर एक बहुत भीषण भुकंप आते हैं, पंजाब के उत्तर पूर्व में उत्तरांचल, टिहरी व गढ़वाल, दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण पूर्व में मध्य प्रदेश के क्षेत्र में भूकंप की दृष्टि से काफी संवेदनशील क्षेत्र माने जाते हैं।
पतन के कारण - बाह्य आक्रमण 
पाण्डुवंशियों में महाप्रतापी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन ने 60 वर्षों तक शासन किया। किसी भी राजा के द्वारा लम्बी अवधि तक शासन करना यह दर्शाता है कि उसका प्रभुत्व स्थापित था। उसके अड़ोसी-पड़ोसी राज्य या तो उसके मित्र थे या उससे भय खाकर आक्रमण नहीं करते थे। ऐसा ही महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में हुआ होगा।  लम्बा शासन काल अवश्य ही जनकल्याणकारी रहा होगा। इसके बाद के उसके उत्तराधिकारियों के नाकारा एवं निर्बल होने के कारण ताक में बैठे पड़ोसियों ने आक्रमण करके उन्हे परास्त कर दिया। जिससे महाशिवगुप्त बालार्जुन का विशाल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। साम्राज्यवादी चालुक्यों से ये बच नहीं सके।  इनकी निर्बल स्थिति का लाभ नलवंशी शासकों ने भी उठाया और दक्षिण कोसल एवं पश्चिम कोसल में अपनी प्रभुता स्थापित की। राजिम का राजीव लोचन मंदिर नल वंशी शासक विलासतुंग का बनवाया हुआ है। इससे जाहिर होता है कि नलवंशी महानदी के तीर तक पहुंच चुके थे।

पतन के अन्य कारण
नवमी शताब्दी के अंतिम चरण में कलचुरी शासक भी आ चुके थे। उस समय पाण्डुवंशियों ने उड़ीसा की तरफ़ पलायन कर लिया और विनीतपुर एवं ययातिपुर को राजधानी बनाई। कलचुरियों तुम्माण से राजधानी रतनपुर ले आए। श्रीपुर उपेक्षित रहा। इसके पश्चात कलचुरी शासकों में विभाजन के पश्चात रायपुर राजधानी बनी तब भी श्रीपुर उपेक्षित ही रहा। राजधानी के पतन के साथ व्यापारी भी उस स्थान पर चले गए जहाँ उन्हे व्यापार की संभावनाए  नजर आई। व्यापारियों को लाभ अर्जित करने से मतलब होता है। चाहे किसी का राज हो और कोई भी शासक हो। इस तरह श्रीपुर के लोग अन्य राजधानियों की ओर पलायन कर गए और श्रीपुर श्री विहीन हो गया।
राजमहल के पार्श्व में महानदी 
समय की मार से कोई नहीं बच पाया। विशाल साम्राज्यों को भी यह दिन देखने पड़े हैं। श्रीपुर में रह गए तो सिर्फ़ खंडहर और पीपल एवं बरगद के वे वृक्ष जिन्होने अपनी आँखों से सिरपुर को बसते एवं उजड़ते देखा। रह गया तो महानदी का वह किनारा जहाँ श्रीपुर जैसी राजधानी ने अपने वैभव का चर्मोत्कर्ष देखा। खंडहरों में बोलते उल्लू और उल्टे लटके चमगादड़ों का बसेरा रह गया। न जाने कितने वर्षों के बाद एक छोटा सा गाँव फ़िर बसा यहाँ के खंडहरों के अवशेषों को जोड़कर। एक बार फ़िर से गौरेया का बसेरा बना श्रीपुर, नया नाम सिरपुर धर कर। …… आगे पढें …

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

प्राचीन बंदरगाह ....................... ललित शर्मा

प्राचीन बंदरगाह
महर्षि महेश योगी की जन्म भूमि पाण्डुका से आगे सिरकट्टी आश्रम से पहले मगरलोड़ और मेघा की ओर जाने वाले पुल के किनारे नदी में लेट्राईट को तोड़ कर बनाई गयी कुछ संरचनाएं दिखाई देती हैं।   मैने कयास लगाया कि यह अवश्य ही बंदरगाह है। नदी में उतर कर बंदरगाह का निरीक्षण किया एवं कुछ चित्र लिए। बंदरगाह की गोदियों में घूमते हुए कई तरह के विचार आ रहे थे। कौन लोग यहाँ से व्यापार करते थे? यह बंदरगाह किस समय बना? किसने बनाया? आदि आदि। इन प्रश्नो के उत्तर बाद में ढूंढेगे, पहले सिरकट्टी आश्रम देख लें, नाम तो बहुत सुना था पर देखा नहीं था। पैरी नदी के तट पर कुटेना ग्राम का सिरकट्टी आश्रम स्थित है। आश्रम का नाम सिरकट्टी इसलिए पड़ा कि यहाँ मंदिर के अवशेष के रुप में सिर कटी मूर्तियाँ प्राप्त हुई, जिन्हे बरगद के वृक्ष के नीचे स्थापित कर दिया। तब से इसे सिरकट्टी आश्रम के नाम से जाना जाता है।

सिर कट्टी आश्रम 
यहाँ बैरागी पुनीतराम शरण से चर्चा हुई। उन्होने बताया कि महाराज भुनेश्वरीशरण दास ने 16 वर्ष की आयु में सन्यास ले लिया था। उन्हे ग्राम कुटेना स्थित चंडी मां ने स्वप्न में इस स्थान की जानकारी दी। तो ग्राम वासियों के सहयोग के वे इस स्थान पर बैठ गए और यज्ञ करने लगे। आश्रम में स्थित सिरकटी मूर्तियाँ एक दीमक की बांबी से प्राप्त हुई थी। उन्होने बताया कि भुनेश्वरीशरण दास को कुछ द्रव्य के साथ दो शिवलिंग भी यहाँ प्राप्त हुए, जिसमें से पेड़ के नीचे एक स्थापित है, दूसरा मंदिर में स्थापित है। इस स्थान पर सुदूर प्रांतों  से संत आते हैं, संतों का आगमन 1963 से हो रहा है, अब वे यहीं स्थायी रुप से बस कर आश्रम की सेवा कर रहे हैं। आश्रम में जाति समाज वालों ने अपने भवन बना रखे हैं। यहाँ लगभग सौ अधिक गाय भैस हैं एवं आश्रम के नाम से लगभग 40-50 एकड़ जमीन है। जो कुटेना, पाण्डुका, जटिया सोरा, पोंड, गाड़ा घाट एवं फ़िंगेश्वर आदि गांवों में है।

प्राचीन बंदरगाह
अब चर्चा करते हैं बंदरगाह की, मानव सभ्यता का उद्भव एवं विकास समुद्र तथा नदियों के किनारे हुआ। जलमार्ग ही आवागमन एवं परिवहन का प्रमुख साधन था। प्राचीन काल में थलमार्ग से परिवहन कम ही होता था। जितनी भी प्राचीन राजधानियाँ एवं शहर हैं, सभी नदियों के तट पर ही स्थित हैं। अन्य राष्ट्रों से व्यापार जल मार्ग से होता था तथा वर्तमान में भी हो रहा है। वास्कोडिगामा, कोलंबस इत्यादि यायावर भी जल मार्ग से ही भारत में प्रविष्ट हुए। जल परिवहन द्वारा व्यापार करना थल परिवहन से कम लागत में हो जाता है। नाव एवं बड़े जहाजों के माध्यम से माल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता है। ऋग्वेद में जहाज और समुद्रयात्रा के अनेक उल्लेख है (ऋक् 1/25/7, 1/48/3, 1/56/2, 7/88/3-4 इत्यादि)। प्रथम मंडल (1-116-3) की एक कथा में 100 डाँड़ोंवाले जहाज द्वारा समुद्र में गिरे कुछ लोगों की प्राणरक्षा का वर्णन है। इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ऋग्वेद काल, अर्थात् लगभग 2,000 - 1,500 वर्ष ईसा पूर्व, में यथेष्ट बड़े जहाज बनते थे और भारतवासी समुद्र द्वारा दूर देशों की यात्रा करते थे। इन जहाजों के द्वारा लाए गए माल को उतारने के लिए गोदी या बंदरगाहों का निर्माण किया जाता था। छत्तीसगढ की प्रमुख नदी चित्रोत्पला गंगा महानदी के जल मार्ग से व्यापार होता था। महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगर राजधानी सिरपुर के उत्खन में व्यापार से संबंधित वस्तुएं एवं प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं। 

महानदी उद्गम स्थान - भीतररास 
चित्रोत्पला गंगा महानदी का उद्गम सिहावा नगरी के भीतररास ग्राम से हुआ है। भीतररास में महानदी दक्षिण की ओर प्रवाहित होती प्रतीत हुई। महानदी के उद्गम स्थान पर मेरा दो बार जाना हुआ। महानदी धमतरी जिले के सिहावा नगरी स्थित भीतररास ग्राम से निकल कर 965 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है। इसकी सहायक नदियाँ हसदो, जोंक, शिवनाथ, पैरी एवं सोंढूर नदियाँ है। पैरी, सोंढूर एवं महानदी का त्रिवेणी संगम पद्मक्षेत्र राजिम मे होता है। इस संगम पर कुलेश्वर (उत्पलेश्वर) महादेव का मंदिर है। जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को मेला भरता है, जिसे अब राजिम कुंभ का नाम दिया गया है। पैरी नदी का उद्गम मैनपुर से लगे हुए ग्राम भाटीगढ से हुआ है। पहाड़ी पर स्थित पैरी उद्गम स्थल से जल निरंतर रिसता है। अब इस स्थान पर छोटा सा मंदिर भी बना दिया गया है। पैरी और सोंढूर नदी का मिलन रायपुर-गरियाबंद मार्ग पर स्थित मालगाँव के समीप मुहैरा ग्राम के समीप हुआ है। यहाँ से चल कर दोनो नदियाँ महानदी से जुड़ जाती है। राजिम पद्मक्षेत्र पैरी नदी के तट पर स्थित है। 

डॉ विष्णु सिंह ठाकुर एवं यायावर 
पैरी नदी के तट पर कुटेना में स्थित यह बंदरगाह (गोदी) पाण्डुका ग्राम से 3 किलोमीटर दूर स्थित है। अवलोकन करने प्रतीत होता है कि इस गोदी का निर्माण कुशल शिल्पियों ने किया है। इसकी संरचना में 90 अंश के कई कोण बने हैं। कठोर लेट्राईट को काटकर बनाई गयी गोदियाँ तीन भागों में निर्मित हैं, जो 5 मीटर से 6.60 मीटर चौड़ी तथा 5-6 मीटर गहरी हैं। साथ ही इन्हें समतल बनाया गया, जिससे नाव द्वारा लाया गया सामान रखा जा सके। वर्तमान में ये गोदियाँ नदी की रेत में पट चुकी हैं। रेत हटाने परगोदियाँ दिखाई देने लगी। प्रख्यात इतिहासकार एवं पुरात्वविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर से इस विषय मेरी चर्चा हुई। उन्होने इसे चौथी शताब्दी ईसा पूर्व माना। बताया कि इस स्थान पर महाभारत कालीन मृदा भांड के टुकटे भी मिलते हैं। नदी से "कोसला वज्र" (हीरा) प्राप्त होता था तथा जल परिवहन द्वारा आयात-निर्यात होता था।

गरियाबंद मार्ग पर मालगाँव 
गरियाबंद 15 किलोमीटर पर पैरी नदी के तट पर स्थित एक ग्राम का नाम मालगाँव है। यहाँ नावों द्वारा लाया गया सामान (माल) रखा जाता था। इसलिए इस गांव का नाम मालगाँव पड़ा। मालगाँव में पैरी नदी के तट पर आज से लगभग 10-15 वर्ष पूर्व तक एक रपटा (छोटा पुल) था जो नदी में पानी आने के कारण वर्षाकाल में बंद हो जाता था। जिससे गरियाबंद से लेकर देवभोग एवं उड़ीसा तक जाने वाले यात्री प्रभावित होते थे। नाव द्वारा नदी पार कराई जाती थी और उस पार बस गाड़ी इत्यादि के साधन से लोग यात्रा करते थे। वर्तमान में इस नदी पर पुल बनने के कारण बरसात में भी मार्ग खुला रहता है। वर्षाकाल में रायपुर से देवभोग जाने वाले यात्री मालगाँव से भली भांति परिचित होते थे, क्योंकि यहीं से पैरी नदी को नाव द्वारा पार करना पड़ता था। यहाँ से महानदी के जल-मार्ग के माध्यम द्वारा कलकत्ता तथा अन्य स्थानों से वस्तुओं का आयात-निर्यात हुआ करता था। पू्र्वी समुद्र तट पर ‘कोसल बंदरगाह’ नामक एक विख्यात बन्दरगाह भी था। जहाँ से जल परिवहन के माध्यम से व्यापार होता था।  इससे ज्ञात होता है कि वन एवं खनिज संपदा से भरपूर छत्तीसगढ प्राचीन काल से ही समृद्ध रहा है। नदियाँ इसे धन धान्य से समृद्ध करते रही हैं।
प्राचीन बंदरगाह

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

आमचो बस्तर के साथ राजिम यात्रा ............. ललित शर्मा

राजीवलोचन मंदिर परिसर 
तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना ......... चलभाष गाने लगा, कोई बात करना चाहता है, चलभाष पर नया नम्बर दिखाई दिया। चलो बात कर लेते हैं, नम्बर नया हो या पुराना और कौन से हम किसी के कर्जदार हैं जो फोन पर नया नम्बर देख कर न उठाएं, हेलू.........सर! मैं राजीव रंजन बोल रहा हूँ, 14 अक्टुबर को रायपुर पहुँच रहा हूँ, आपके साथ राजिम और सिरपुर चलना है, साथ चलेगें तो अच्छा लगेगा।...... क्यों नहीं, जरुर चलेगें। फिर घरेलू बातचीत होते रही, कुछ चर्चा "आमचो बस्तर" भी हुई। हमने १६ तारीख का सुबह जल्दी चलकर जाने का कार्यक्रम बना लिया। इधर 15 तारीख को पितृमोक्ष अमावस्या थी और भाई अशोक बजाज की माता जी का बारहवां और पगड़ी रस्म भी। 14 को राजीव रायपुर पहुँच गए और हमारा कार्यक्रम पहले ही बन गया। १५ तारीख को राजीव रंजन "आमचो बस्तर" के साथ दोपहर मे अभनपुर पहुँच गए। इनके पहुँचने से पहले विवेक विश्वकर्मा डीजीएम बीएसएनएल पहुँचे हुए थे। हम सभी चाय पीकर अशोक भाई के यहाँ कार्यक्रम में पंहुचे। वहाँ प्रसादी का कार्यक्रम चल रहा था। अशोक भाई से मिलकर हम राजिम चल पड़े।

राजेश्वर-दानेश्वर मंदिर 
राजिम नगर सोंढूर-पैरी-महानदी के त्रिवेणी संगम पर रायपुर से 45 कि मी एवं अभनपुर से 18 कि मी  पर देवभोग जाने वाले मार्ग पर स्थित है। रास्ते  में हसदा के मोड़ पर साहू चाट वाला अपनी दुकान लगाए तैयार था, मन तो ललचाया, पर समय की कमी होने से आगे बढ़ गए। नयापारा पहुँच कर पहला काम खाने का किया। महानदी पार करके राजीव लोचन मंदिर पहुँचे। पहले राजीव लोचन मंदिर के ईर्द गिर्द लोगों ने कब्जा कर रखा था। दुकानों के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश करना पड़ता था। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। एतिहासिक मंदिर परिसर से अवैध कब्जा हटाने का एतिहासिक कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल के तत्कालीन अधीक्षण डॉ प्रवीणकुमार मिश्रा ने किया। आज राजीव लोचन मंदिर अपने पुराने रूप के करीब पहुँच चुका है। राजीव लोचन मंदिर महानदी (चित्रोत्पला गंगा) के पूर्वी तट  पर स्थित है। लोक मान्यता है कि  महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से मनुष्य के सारे कष्ट मिट जाते हैं और वह मृत्युपरांत विष्णु लोक को प्राप्त करता है। यहाँ का कुम्भ मेला जग प्रसिद्ध हो चुका है, यह मेला माघ मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि  जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक राजिम की यात्रा न कर ली जाए।

महामंडप, मुख्य द्वार एवं मूर्ति शिल्प 
महाशिव तीवरदेव के ताम्रपत्र एवं राजीव लोचन मंदिर से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि  राजिम के विष्णु मंदिर (राजीव लोचन) का निर्माण 8 वीं सदी में नलवंशी राजा विलासतुंग ने कराया था। शिलालेख में रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की कुछ विजयों का उल्लेख है। उनके सामंत (सेनापति) जगतपालदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। हम मंदिर के पश्चिमी द्वार पर पहुच गए। द्वार पर ही नारियल एवं पूजा सामग्री वालों ने अपनी दुकाने सजा रखी हैं। कार के रुकते ही पूजा सामग्री वाले झपट पड़े, मुझे देखते ही पहचान गए कि यह पण्डा कुछ नहीं देने-लेने वाला। मंदिर प्रांगण में निर्माण कार्य चल रहा है। आगामी नवम्बर की 19 तारीख से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल रायपुर, विश्व दाय सप्ताह का आयोजन कर रहा है। पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सबसे पहले राजेश्वर एवं दानेश्वर मंदिर दिखाई देते हैं। इन मंदिरों के सामने राजीवलोचन का भव्य प्रवेश द्वार महामंडप है। इसकी चौखट के शीर्ष भाग में शेषशैया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं लतावल्लरियों के मध्य विहाररत यक्षों की विभिन्न भाव भंगिमाओं एवं मुद्राओं में प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गयी हैं। बायीं दीवाल के स्तम्भ पर एक पुरुष की खड़ी प्रतिमा है, जिसका एक हाथ ऊपर है तथा दूसरा हाथ ह्रदय को स्पर्श कर रहा है। कमर पर कटार एवं यज्ञोपवित धारण किए हुए है। 

रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका
पुरुष मूर्ति के दोनों तरफ नारियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक मूर्ति स्त्री और पुरुष की युगल है। इसमें पुरुष स्त्री से छोटा दिखाया गया है, वह हाथ में सर्प धारण किये हुए है। लोग इसे सीता की प्रतिमा मानते हैं पर सर्प के साथ पुरुष काम का प्रतीक है, इसलिए इसे रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका की प्रतिमा माना जा सकता है। इसके साथ ही यहाँ पर आकर्षक मिथुन मूर्तियाँ भी दिखाई देती है। इनके वस्त्र अलंकरण भी नयनाभिराम हैं। अंतराल में ललाट बिम्ब पर गरुडासीन विष्णु की प्रतिमा है। यहाँ पर राजीव अपनी नायिका की तलाश में आये हैं, उसका वस्त्र अलंकरण देख रहे हैं। हमने यहाँ के चित्र लिए और मुख्य मंदिर की तरफ चल पड़े। मंडप एवं मुख्य मंदिर के बीच अन्तराल है। पिछली बार गए थे तो यहाँ भागवत महापुराण का पाठ हो रहा था और भगवताचार्य अपने प्रवचन में से क्विज पूछ रहे थे श्रोताओं से, सही उत्तर देने वाले को इनाम भी दिया जा रहा था। यह तरीका मुझे पसंद आया, इनाम के लालच में श्रोता भागवत का श्रवण ध्यान लगा कर करते हैं और अंत में प्रश्नों का उत्तर देकर इनाम भी पाते है।

राजा जगतपालदेव के रूप में बुद्ध 
मुख्य मंदिर आयताकार प्रकोष्ट के बीच में निर्मित है। भू विन्यास योजना में राजिम का मंदिर महामंडप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा मार्ग में बंटा हुआ है। गर्भ गृह में प्रवेश करने के लिए पैड़ियों पर चढ़ना पड़ता है। सामने ही एक स्तम्भ पर पूर्वाभिमुख गरुड़ विराजमान है। सामने काले पत्थर की बनी चतुर्भुजी विष्णु की मूर्ति है। जिसके हाथो में शंख, गदा, चक्र एवं पद्म दिखाई देते है। इसे ही भगवान राजीवलोचन के नाम से जाना जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। बायीं भीत पर दो शिलालेख लगे है, इनसे ही इस मंदिर के निर्माताओं एवं जीर्णोद्धारकर्ताओं की जानकारी मिलती है। राजीव लोचन की नित्य पूजा क्षत्रिय करते है, विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है। इस मंदिर के उत्तर में जगन्नाथ मंदिर है। इसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के वामन अवतार की प्रतिमा लगी है। जिसमें तीसरा पग राजा बलि पर के शीश पर रखते हुए विष्णु को दिखाया है। मैंने पुजारी से पूछा कि लोगों से सुना है कि यहाँ पर राजा जगतपाल की प्रतिमा भी है। तो उसने महामंडप में बायीं तरफ लगी एक प्रतिमा की तरफ संकेत किया। यह प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की दिखाई पड़ी। राजीव ने कहा कि कोंडागांव में जिस तरह बुद्ध आदिवासी देवता भोंगापाल बन गए उसी तरह यहाँ भी बुद्ध जगतपाल हो गए। परन्तु राजीवलोचन मंदिर में अकेली बुद्ध की प्रतिमा का मिलना समझ से परे है।

राम मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ 
पुजारी जी से प्रसाद ग्रहण कर हम राम मंदिर के दर्शनों को चल पड़े। यहाँ से बस्ती के बीच 50 कदम की दूरी पर राम मंदिर है। यह मंदिर भी ईंटों का बना है, इसके स्तम्भ पत्थरों के हैं।अधिलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इस पूर्वाभिमुख मंदिर का निर्माण भी कलचुरी नरेशों के सामंत जगतपालदेव ने कराया था। मंदिर के महामंडप में प्रस्तर स्तंभों पर प्राचीन मूर्तिकला के श्रेष्ठतम उदहारण है। इन स्तंभों पर आलिंगनबद्ध मिथुन मूर्तियों के साथ शालभंजिका, बन्दर परिवार, माँ और बच्चा तथा संगीत समाज का भावमय अंकन है। मकरवाहिनी गंगा,  राजपुरुष, अष्टभुजी गणेश, अष्टभुजी नृवाराह की मूर्ति है। मिथुन मूर्तियाँ का शिल्प उत्तम नहीं है। जैसे नौसिखिये मूर्तिकार ने इसे बनाया हो। हमने चित्र लिए, दो सज्जन वहां पर थे, राममंदिर के केयर टेकर के विषय में पूछने पर पता चला की वह कहीं गया है। वे दोनों भी यहीं के केयर टेकर थे। एक ने बताया की वह मलार से स्थानांतरित होकर यहाँ आया है। 

प्राचीन यंत्र
राम मंदिर के प्रदक्षिणापथ से सम्बंधित प्रवेश द्वार शाखाओं से युक्त है, इनके अधिभाग पर गंगा-यमुना नदी देवियों की मूर्तियाँ हैं, राजिम के किसी भी मंदिर के प्रवेश द्वार में नदी देवियों की मूर्तियाँ नहीं है। राजीव ने टिप्पणी दी कि राजिम के मंदिरों का शिल्प सर्वोत्तम भव्य एवं बहुत ही सुन्दर है। मंदिर से बाहर निकलते हुए मुझे एक प्राचीन यंत्र दिखाई दिया। जिसका प्रयोग निर्माण के दौरान होता था, पता नहीं किसने उस भारी भरकम यंत्र को भी तोड़ कर रख दिया। दुनिया में उत्पाती लोगों की कमी नहीं है। बेमतलब ही नुकसान करने में इन्हें मजा आता है। सीमेंट आने के कारण अब यह काम में नहीं आता। वर्ना इसके बिना निर्माण कार्य संभव नहीं था। कभी इस यन्त्र के विषय में विस्तार से लिखूंगा। 

कुलेश्वर महादेवमंदिर में संध्या जी 
राजिम दर्शन कर अब हमें सिरपुर की और चलना था, लेकिन कुलेश्वर महादेव की चर्चा न हो तो राजिम यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। पुराविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार कुलेश्वर महादेव का प्राचीन नाम उत्पलेश्वर महादेव था जो कि अपभ्रंश के रूप में कुलेश्वर महादेव कहलाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर नदियों के संगम पर स्थित है। यह अष्टभुजाकार जगती पर निर्मित है। नदी के प्रवाह को ध्यान में रखते हुए वास्तुविदों ने इसे अष्टभुजाकार बनाया। इसकी जगती नदी के तल से 17 फुट की ऊंचाई पर है। कुल 31 सीढियों से चढ़ कर मंदिर तक पंहुचा जाता  है। कहते हैं कि मंदिर के शिवलिंग को माता सीता ने बनाया था। मंदिर में कार्तिकेय एवं अन्य देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। किंवदंती है की नदी के किनारे पर स्थित संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम से कुलेश्वर मंदिर तक सुरंग जाती है। सुरंग का प्रवेश द्वार संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम में है, जिसमे प्रवेश करके मैंने स्वयं देखा है। प्रवेश द्वार छोटा है। सीढियों से नीचे उतरने पर दो कमरे हैं जिसमे काली माई की प्रतिमा रखी है एवं आगे का रास्ता बंद कर दिया गया है।

राजीव रंजन "आमचो बस्तर"
राजिम दर्शन करने के बाद हम चम्पारण से आरंग होते हुए सिरपुर चल पड़े। राजिम से आरंग लगभग 28 किलोमीटर है। रास्ते में हमने प्रभात सिंह को फोन लगाया तो उनके फोन से कोई उत्तर नहीं आया। क्योंकि हम तय कार्यक्रम से एक दिन पहले चल रहे थे। फिर आदित्य सिंह को फोन लगाने पर पता चला की वे महासमुंद में हैं। इस दिन पितृमोक्ष अमावश्या भी थी, इसलिए आदित्य सिंह महासमुंद पहुँच गए थे। उन्होंने कहा कि आप सिरपुर पहुचे मै  तत्काल निकल रहा हूँ। नदी मोड़, तुमगांव निकल चुका था। अब भूख लगने लगी तो रास्ते में कोई ढाबा भी दिखाई नही दे रहा था। हम सिरपुर के मोड़ से आगे निकल गए ढाबे की खोज में 5 किलोमीटर आगे जाने पर नवागांव में जंगल-मंगल ढाबा मिला। वहां तो सिर्फ जंगल मंगल ही था। चावल ख़त्म हो चुके थे, सब्जी नहीं थी, हमने रोटी बनवाई और काले उड़द चने की दाल ली। प्रभात सिंह का फोन भी आ गया, उन्होंने रेस्ट हाउस बुक कर दिया था। प्रभात सिंह रायपुर में थे, उन्हें सुबह आना था। 

"आमचो भारत" वाले यायावर 
नवागांव से चलने पर मैंने राजीव से कहा कि  सिरपुर का रेस्ट हाउस बहुत बढ़िया है और महानदी के किनारे पर स्थित है, सुबह उठने पर पुण्य सलिला महानदी के दर्शन होंगे, पर रेस्ट हाउस पहुचने पर चौकीदार ने पुराना रेस्ट हाउस खोला, जिसके कमरे को महानदी नाम दिया गया था। नए रेस्ट हाउस के बारे में कहने पर उसने बताया की वह मंत्री के लिए बुक है। बस यही खाली है, मरते क्या न करते, केयर टेकर को बुलाने कहा तो उसने आकर कहा कि उसकी तबियत ख़राब है वह नहीं आ रहा। आस-पास खेत होने के कारण कमरे में लाइट जलाते ही कीड़े भर गए। वैसे मैंने देखा है कि जितने भी रेस्ट हाउस है वे अघोषित रूप से मंत्रियों और अधिकारियों के लिए पूर्णकालिक बुक रहते हैं, रेस्ट हाउस के केयर टेकर नहीं चाहते कि कोई वहां आकर रुके। मुझे बताया गया कि रेस्ट हाउस कि बुकिंग महासमुंद के अधिकारी करते हैं, हमने अपने आप को धन्य समझा, कम से कम पुराना रेस्ट हाउस तो खुल गया, रात गुजारने के लिए। अब मंत्री जी ही जाने इन हालातों में सिरपुर को किस तरह विश्व धरोहर का दर्जा दिलाएंगे, जबकि रेस्ट हाउस के ये हाल हैं। रात्रि कालीन भोजन  में आदित्य सिंह ने कम्पनी दी, हमने सुबह के कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार की और सुबह के इंतजार में लोट-पोट हो गए। .......जारी है,  आगे पढ़ें .........

बुधवार, 28 मार्च 2012

नगरी सिहावा और कर्णेश्वर महादेव -- ललित शर्मा


महानदी उद्गम 
पुरातात्विक खजाने से छत्तीसगढ समृद्ध है। हम छत्तीसगढ में जिस स्थान पर जाते हैं वहां कुछ न कुछ प्राप्त होता है और हमारी विरासत को देख कर गर्व से भाल उन्नत हो जाता है। चित्रोत्पला गंगा (महानदी) भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। महाभारत के भीष्म पर्व में चित्रोत्पला नदी को पुण्यदायिनी और पाप विनाशिनी कहकर स्तुति की गयी है - उत्पलेशं सभासाद्या यीवच्चित्रा महेश्वरी। चित्रोत्पलेति कथिता सर्वपाप प्रणाशिनी॥ चित्रोत्पला गंगा के तट पर सभ्यता का विकास हुआ, शासकों ने राजधानी बनाई और समृद्धि पाई। रायपुर से धमतरी होते हुए 140 किलो मीटर पर नगरी-सिहावा है, यहां रामायण कालीन सप्त ॠषियों के प्रसिद्ध आश्रम हैं। नगरी से आगे चल कर लगभग 10 किलोमीटर पर भीतररास नामक ग्राम है। वहीं पर श्रृंगि पर्वत से महानदी  निकली है। यही स्थान महानदी का उद्गम माना गया है। यहीं महेन्द्र गिरि पर्वत है, जहाँ महर्षि परशुराम का आश्रम है। नगरी और सिहावा के मध्य में देऊरपारा कर्णेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर राज्य पुरातत्व के संरक्षण में दर्शनीय स्थल है। यहां छत्तीसगढ पर्यटन विभाग का नव निर्मित रेस्ट हाऊस भी है।

कर्णेश्वर महादेव मंदिर में शिलालेख
नगरी से 6 किलोमीटर पर स्थित है देऊरपारा, इसे छिपली पारा भी कहते हैं। यह गाँव महानदी और बालुका नदी के संगम पर पहाड़ी की तलहटी में  बसा है। नदी के एक फ़र्लांग की दूरी पर कर्णेश्वर महादेव का मंदिर है। राम मंदिर में प्रवेश करता हूं तो मुझे यहां स्थित मूर्तियां काफ़ी पुरानी दिखती हैं और मेरी जिज्ञासा बढती है कि इस स्थान के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करुं। राम मंदिर से लगा हुआ कर्णेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर के गर्भ गृह का द्वार अलंकृत है। दाहिने हाथ की तरफ़ एक शिलालेख लगा हुआ है। शिलालेख देखकर इस मंदिर के एतिहासिक महत्व का दृष्टिगोचर होता है। देऊर पारा के इन मंदिरों का निर्माण कांकेर के सोमवंशी राजाओं ने 12 वीं सदी में कराया था। सपाट बलुआ पत्थर पर अभिलेख अंकित है। इसकी लिखावट राजिम लोचन मंदिर में लगे शिलालेख से मिलती हुई लगी। कर्णेश्वर महादेव के सम्मुख नंदी भी विराजमान हैं तथा नंदी के मंडप के पीछे गणेश जी का विग्रह स्थापित है। इस स्थान पर गांव के यादव समाज, पटेल समाज, विश्वकर्मा समाज, केंवट समाज, आदि ने भी मंदिर बना रखे हैं। मंदिर प्रांगण में कबीर चौरा भी दिखाई दिया। इससे लगा हुआ सतनामी समाज का जैतखांभ भी है। मंदिर की उत्तर दिशा में एक कुंड बना हुआ है। इसे किसने और कब बनाया, इसकी जानकारी तो नहीं मिली। अनुमान है कि मंदिर बनाने के लिए किए गए पत्थरों के उत्खनन से कुंड का निर्माण हुआ होगा।

राम मंदिर का दृश्य
मंदिर परिसर में मेरी मुलाकात पुजारी राजेन्द्र पुरी गोस्वामी से होती है। मैं उनसे चर्चा करता हूँ एवं इस स्थान के विषय में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करता हूँ। वे बताते है कि जिसे राम मंदिर कहते हैं उसमें विष्णु भगवान की दो मूर्तियाँ एवं एक मूर्ति सूर्य की है। पहले मंदिर नदी के किनारे हुआ करता था। लेकिन कालांतर में समय की मार से वह ध्वस्त हो गया और उसके भग्नावशेष अभी तक नदी में पड़े हैं। वहाँ से इन  मूर्तियों  को कर्णेश्वर महादेव मंदिर के समीप स्थापित किया गया। गणेश जी की मुर्ति को सिहावा के तत्कालीन थानेदार गुप्ता जी ने मंदिर के भग्नावशेष का जीर्णोद्धार करके स्थापित कराया था। गाँव की आबादी अधिक नहीं है लगभग 70 घर हैं। जिनमें 7 घर ब्राह्मण, 15 साहू, 10 गोस्वामी, 7  केंवट, 10 गोंड , 4 राऊत , 1 लोहार, 3 सारथी एवं अन्य निवासी हैं।  गाँव में नाई का एक भी घर नहीं है। वे बताते हैं कि गांव में नाई नदी पार के गांव सिरसिदा से आता है। वही गांव का काम करता है। ग्रामीणों के जीवन यापन का मुख्य साधन खेती है। कुछ लोग नौकरी में भी लगे हैं। रामेश्वरी साहू भूतपूर्व जनपद सदस्य कहती हैं, नदी के किनारे बसे होने पर भी गांव में पीने के पानी की समस्या है। इस सड़क को मैने अपने कार्यक्राल में बनवाया था।हम राजेन्द्र पुरी गोस्वामी के साथ महानदी और बालुका के संगम की ओर चल पड़ते हैं।

राजेन्द्र पुरी गोस्वामी एवं ब्लॉगर
महानदी के तट पर मोती तालाब है, इस तालाब में भी एक कुंड बना हुआ है, इसे अमृत कुंड या औषधि कुंड कहते हैं, राजेन्द्र पुरी बताते हैं कि इस कुंड में नहाने से बड़े से बड़े रोग का शमन हो जाता है, ऐसी मान्यता है। कुंड सूखा पड़ा है, नहाने की बात तो दूर अभी इसमें उतर भी नहीं सकते। कहते हैं कि एक राजा को कोढ हो गया था। वह इस स्थान पर शिकार करने आए थे, एक दिन उसके कुत्ते इस कुंड में नहाकर उसके पास पहुंचे, कुत्तों ने थरथरी लेकर पानी को झाड़ा, वह पानी राजा के शरीर में गिरा। जिससे कुछ दिनों बाद उसका कोढ ठीक गया। तब से मान्यता है कि इस औषधि कुंड में जो भी नहाएगा उसके समस्त रोग ठीक हो जाएगें। कुंड से लगा हुआ नदी किनारे एक आम का वृक्ष है, इसके नीचे की भूमि को लीप बहार कर बैठने लायक बना दिया है। इस वृक्ष के नीचे लोग अपने मृतकों का संस्कार करते हैं, मुंडन एवं पिंड दान इत्यादि यहीं होता है। डोमार प्रसाद मिश्रा कहते हैं कि यहां पर अस्थि विसर्जन करने के ढाई दिनों के पश्चात अस्थियों के अवशेष नहीं मिलते, यह प्रमाणित है। उड़ीसा, बस्तर कांकेर आदि से लोग अस्थि विर्सजन के लिए आते हैं।

रुपई
डोमार प्रसाद मिश्रा मुझे मोती तालाब के उस स्थान पर ले जाते हैं जहां सोनई और रुपई नामक स्थान है। आम के पेड के एक तरफ़ रुपई एवं दुसरी तरफ़ सोनई है। मोती तालाब के गहरीकरण के समय इस स्थान को नहीं खोदा गया। कहते हैं यहां खजाना गड़ा हुआ है और दैवीय स्थान है। कई बरस पहले कुछ तांत्रिको ने यहां से खजाना (हंडा) निकालने का प्रयास किया था परन्तु वे सफ़ल नहीं हुए। उसके बाद किसी ने इस स्थान पर उत्खनन करने का प्रयास नहीं किया। विशेष पर्व पर इन स्थानों ही होम धूप देकर पूजा की जाती है। (छत्तीसगढ में हंडा (गड़े धन) के विषय में गाँव-गाँव में चर्चाएं चलते रहती हैं, बैगा और तांत्रिक हंडे का लालच दिखा कर लोगों की जेब खाली करवाते रहते हैं, मुझे तो आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने कहा हो कि उसे हंडा मिला है। हाँ, हंडे के पीछे धन सम्पत्ति गंवाकर कंगाल बने लोग यदा-कदा मिल जाते हैं।

समाधियाँ
मोती तालाब से मुझे पहाड़ी की तलहटी में कुछ समाधियां बनी दिखाई देती हैं। हम सड़क के उस पार चल कर समाधियों पास पहुंचे। राजेन्द्र पुरी बताते हैं कि उनके पूर्वज 200 साल पहले इस गाँव में उत्तर प्रदेश से आए थे। उत्तर प्रदेश के किस गाँव से आए थे इसका उन्हे पता नहीं। यहाँ आकर उन्होने मंदिर के भग्नावशेष में शरण ली। उन्हे यहाँ शिव जी मिल गए और उन्होने पूजा शुरु कर दी। उसके पश्चात उनका परिवार यहीं का हो कर रह गया। अब मंदिर में राजेन्द्र पुरी पूजा करते हैं। ये समाधियाँ उनके पूर्वजों की हैं। एक समाधि मौनी महाराज की है, मौनी महाराज लगभग डेढ सौ वर्ष पूर्व हुए हैं, इन्होने 16 साल मौन रह कर तपस्या की। मंदिर के सर्वराकार गणेश महाराज हुए, उन्हे गांव के मालगुजार गोपाल सिंह ने पाँच एकड़ जमीन 1927 मे दी। यह जमीन अब भी मंदिर के नाम से ही है। इस पर गाँव वाले रेग (किराए पर) खेती करते हैं। मंदिर इस जमीन पर ही माघ के महीने में पुन्नी मेला भरता है।

महानदी एवं बालूका नदी का संगम
हम चल कर नदी के संगम पर पहुंचते हैं। यहां पर रेत की बोरियों से पानी रोक कर निस्तारी के लिए उपयोग किया जा रहा है। नदी पर सकरिया गांव दिखाई दे रहा है। उसके दायीं तरफ़ से बालूका नदी आकर महानदी में मिल रही है। राजेन्द्र पुरी कहते हैं, उनके दादा बताते थे कि नदी के तट से एक सुरंग उनके घर तक जाती है। एक दिन कोई मंछन्दर नदी में मछली मारते हुए सुरंग में प्रवेश कर गया और उनके घर के पास जाकर निकला। उन्हे सुरंग दिखाने कहता हूँ तो वे कहते हैं कि उन्होने सुरंग में जाने का कभी प्रयास नहीं किया और न ही किसी गाँव वाले ने डरकर उसमें जाने का प्रयास किया। हम तो बाबू आपको पूर्वजों से सुनी सुनाई बता रहे हैं। ग्रामीण अंचल में पीढी दर पीढी किंवदंत्तियाँ चलते रहती हैं, इनके मूल में कहीं न कहीं सत्य छिपा होता है। जो कालांतर मे प्रकट होता है। हम वापस मंदिर की ओर चल पड़ते हैं।

प्राप्त मूर्तियाँ
डोमार मिश्रा कहते हैं कि पहले हमारा एक ही घर था। परिवार बढने के साथ बंटवारा होता गया, घर भी बढ गए। गाँव की गलियों में चलते हुए मंदिर पहुंचते हैं। वहां राजेन्द्र पुरी नारियल फ़ोड़ कर उसकी गिरी खिलाते हैं। समीप ही बने हुए एक कमरे में इस स्थान से प्राप्त 15 मुर्तियाँ रखी हैं। यहां मुझे संग्रहालय जैसा ही दृश्य दिखाई दिया। वहाँ पर बैठे कुछ ग्रामीणों से चर्चा होती है, मंदिर के संचालन के लिए संचालन समिति बनी हुई है। समिति ही मंदिर की देखरेख करती है। मंदिर के प्रांगण में चंपा (सप्त पर्णी) का पेड़ है, उसके सुंदर सफ़ेद फ़ूल प्रांगण में झर रहे हैं। दर्शनार्थी उन फ़ूलों पर पैर नहीं रखते, उन्हे बचा कर चलते हैं। धूप बढती जा रही है और भूख भी। भोजन का समय होता है। हमारे भोजन का इंतजाम रामेश्वरी साहू के घर पर है। घर पहुंचने पर वे स्नेह से हमें भोजन कराती हैं।

महानदी  का उद्गम
भोजनोपरांत हम सिहावा की ओर चल पड़ते हैं, यहां रामायण कालीन सप्त ॠषियों के नाम से पर्वत हैं। सामने श्रृंगि ॠषि पर्वत सड़क के उस पार है और महानदी का उद्गम सड़क के इस पार। इस पर्वत को श्रृंगि नामक होने की जनश्रुति मिलती हैं। श्रृंगि ऋषि का विवाह रामचन्द्र की बहन शांता से हुआ था। अतः समीप में इसी श्रृंगि पर्वत में शांता गुफा भी हैं। रामायण कालीन प्रसिद्ध सप्त ऋषि-मुनियों ने श्रृंगि ऋषि प्रमुख माने जाते हैं।  कन्क ऋषि के नाम पर कन्क ऋषि पर्वत,  शरभंग ऋषि के नाम से शरभंग पर्वत,  अगस्त्य ऋषि के  नाम पर अगस्त्य पर्वत, मुचकुन्द ऋषि एक प्रमुख ऋषि थे। सप्त ऋषियों में इनका भी नाम है। इन्हीं के नाम पर सिहावा क्षेत्र में मेचका पर्वत अर्थात् मुचकुन्द पहाड़ी, गौतम ऋषि के नाम पर गौतम पर्वत, सप्त ऋषियों में से अंगिरा ऋषि का भी महत्वपूर्ण स्थान हैं। इनके नाम पर सिहावा में पर्वत है, जिसे अंगिरा पर्वत कहा जाता हैं। रामायण काल में भगवान श्रीराम अंगिरा ऋषि से भी भेंट कर उनसे परामर्श लिये थे। यहाँ इन सप्त ॠषियों के आश्रम प्रसिद्ध हैं।

राम मंदिर में नदी तट के मंदिर की स्थापित मूर्तियाँ 
श्रृंगि ॠषि पर्वत से महानदी का उद्गम हुआ हैं। पर्वत से सड़क के नीचे से नदी बहती है। उद्गम स्थल पर दो चट्टानों के बीच सफ़ेद झंडिया लगा रखी हैं। एक बाबाजी नदी के बीच बड़ी सी चट्टान पर बैठे हैं। मैं नदी मे उतरता हूं तो चिकने पत्थरों पर पैर फ़िसल जाता और धड़ाम से नदी में ……… कैमरा संभालने की कोशिश करता हूँ और पानी से कैमरे को बचाने में कामयाब हो जाता हूँ। कुछ चित्र उद्गम के लेता हूँ। मेरी यात्रा का यह महत्वपूर्ण पड़ाव है। उद्गम के चित्र लेने के लिए ही मुझे जंगल में आना पड़ा। यहाँ अपने उद्गम से महानदी विपरीत दिशा में बहती दिखाई देती है। जो वहां से चलकर देऊर पारा होते हुए सिरसिदा ग्राम तक जाती है। सिरसिदा एवं देऊर पारा को नदी विभाजित करती है और यहीं पर बालुका और महानदी का संगम है। नदी के किनारे वन में स्थित होने के कारण स्थान सुरम्य एवं रमणीय है। पर्यटन के लिए उत्तम स्थान है, इस रामायण कालीन प्रसिद्ध स्थान पर समय हो तो एक बार अवश्य आएं।

रविवार, 18 सितंबर 2011

देखईया के जर जाये गऊकिन! --- ललित शर्मा

गणपति विसर्जन के दिन श्रीमती जी ने चेताया कि आज लम्बोदर महाराज जी को विदा करना है. कहीं चले मत जाना. दोपहर को सिराये आना इन्हें. हमने उनकी आज्ञा सिरोधार्य की. 11 दिनों के इस पर्व का उत्साह के साथ इंतजार रहता है. दिन में दो बार पकवानों भोग लगा कर लम्बोदर महाराज साल भर के लिए फिट हो जाते हैं. फिर उन्हें ३५४ दिन कुछ खाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. सुबह ६ बजे आरती शुरू हो गई. भगवान को भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण कर ब्लोगिंग चमकाने बैठ गए. उधर श्रीमती जी गुड के मोदक बनाने में लग गई. तभी फोन की घंटी बजी, उठाने पर आवाज आई "मै मुलायम सिंग बोल रहा हूँ, आप ललित शर्मा जी ही बोल रहे हैं ना. मैंने कहा- बोल रहा हूँ, लेकिन आपने गलत नंबर लगा लिया. अमर सिंह को लगना चाहिए था. आपका और कांग्रेस का संकट मोचन तो वही है. मुझे काहे झमेले में फंसा रहे हैं. उन्होंने पूछा- आप कहाँ है? मैंने कहा घर पर हूँ आज गणेश भगवान को सिराने जाना है. तो उन्होंने कहा - घर से बाहर निकलिए हम गेट पर ही खड़े हैं. येल्लो हो गया बंटाधार .....

देखे तो मुलायम जी की कार गेट पर खड़ी है और वे कुण्डी खड़खड़ा रहे हैं. आइये आइये मुलायम जी कैसे इधर आना हुआ. आज रास्ता कैसे भूल गए? मुलायम जी बोले- आपकी याद आ गई थी इसलिए चले आये. कुछ चाय पानी तो पिलवाओगे? जरुर-जरुर क्यों पिलवायेंगे... अभी हाजिर होती है चाय और साथ में नास्ता भी. चाय नास्ता करके मुलायम जी ने हमसे राजिम चलने का आग्रह किया. लेकिन सुबह की दी हुयी श्रीमती जी की चेतावनी याद आ गई, नहीं तो उनके साथ निकल ही जाते. मुलायम जी मन मसोस कर हमसे विदा लेकर निकल लिए और हम फिर अपनी ब्लोगिंग की दुकान पर आ गए.  जरा एक दो ब्लॉग झांक लें. कहीं टिपिया दें. टिपियाने क्या लगे फंटूश फिल्म जैसा सीन उपस्थित हो गया. हम गए तो हिंदी ब्लॉग नगरिया और पहुच गए अंग्रेजी के ब्लोगों में. सोचे की भाई टिपियाना तो है ब्लॉगर के लिए जैसी हिंदी वैसी अंग्रेजी :) पर अंग्रेजों की नगरी से बिना टिपियाये वापस आना मतलब हार कर आना है. अगर हार गए तो जिल्ले इलाही को नागवार गुजरेगी और हमें मुफ्त की सजा मिलगी. तभी चाचा चौधरी जैसे दिमाग की बत्ती जली और हमारे लिए संकट मोचक बन कर आये NICE वाले सुमन जी. उनसे नाईस उधार लिया और अपनी तरफ से POST और जोड़ कर NICE POST का टिप्पणी १५-२० जगह पर चेप आये. इज्जत बची लाखों पाए.

इधर हम टिपियाते टिपियाते गणेश जी के विसर्जन का गुमताडा लगा रहे थे कि कहाँ और कैसे विसर्जन किया जाये. सोचा कि मोटर सायकिल पर बैठा के ले जायेगे और सिरा आयेंगे. गणपति बप्पा भी खुश और हम भी खुश. लेकिन उदय महाराज सुबह से कुछ और ही प्लान कर रहे थे. सारी गाड़ियाँ  घर में खड़ी थी. सभी बच्चों को कह आये कि ट्रक से चलेंगे गणेश विसर्जन करने के लिए झांकी डैम में. डेढ़ बज गया खाने का समय हो चूका  था. हमने भोजन के लिए कहा तो आदेश आया की पहले गणेश जी का विसर्जन करके आइये फिर खाना मिलेगा. शंख ध्वनि के साथ गणपति बप्पा की जय बोलकर गणपति महाराज को ट्रक में विराजित किया और सभी बच्चों को लेकर चल पड़े झांकी डैम की ओर, डैम का रास्ता ख़राब है. छोटे भाई ने गाड़ी कच्चे में ले जाकर ऐसी जगह फंसाई कि आस-पास में कोई सहायता भी नहीं. हमने खूब कोशिश की गाड़ी निकालने की. लेकिन कीचड़ इतना अधिक था कि चक्के स्लिप हो जाते थे. गाड़ी निकालने प्रक्रिया में सफल ना होने पर घर में फोन लगा कर दूसरी ट्रक और रस्से मंगवाए गए.

दूसरी ट्रक का इंतजार करते हुए इधर उधर नज़र दौडाई तो गायों और भेड़ों का झुण्ड दिखाई दिया. वह हमारे तक चरते हुए पहुँच चूका था. एक विद्यार्थी उन्हें चरा रहा था. उसकी ओर मुखातिब हुआ. बालक ७ वीं कक्षा का छात्र है. छुट्टी के दिन पिताजी के साथ गाय भेड़ चराने आता है. उसने बताया कि सीताराम गुरूजी पढ़ाते हैं.सीताराम गुरुजी को ह्रदय रोग हो गया है, उनकी दो आर्टरी में ब्लोक है. लेकिन बाई पास सर्जरी कराने की बजाय कपालभाती और अनुलोम विलोम कर रहे हैं. बाबाजी ने उन्हें कह दिया है कि उनकी बीमारी योग से ठीक हो जाएगी. वे ठीक होने की आस में रोज धोंकनी चलाये जा रहे हैं. विश्वास में बहुत बल होता है. लगभग ३ वर्षों से उन्हें अटेक नहीं आया है. एक बार मेरे साथ हरिद्वार, ऋषिकेश और मसूरी की यात्रा करके आ चुके हैं. धर्म कर्म के प्रति उनका लगाव सदा से ही है. बालक से बात करते रहा तब तक उसके पिताजी भी खुमरी ओढ़े, भंदई पहने पहुच गए. राम राम होने के बाद भेड़ों के साथ दोनों चल पड़े.

समय व्यतीत करने बरगद के पेड के पास पंहुचा, थोड़ी डेरे छाया में विश्राम करने का लालच था. वहां पर पहले ही महिला मजदूरों ने कब्ज़ा कर रखा था. उनका यह भोजन और विश्राम का ठिया है. सोच लिया कि अब जगह नहीं मिलने वाली है. उनकी बातों का ही रस लिया जाए. एक कह रही थी --"कईसे या साग नई लानेच, भात संग मा, अथाने (आचार) धरे हच". दूसरी ने कहा - "सागो हां अड़बड़ महँगी होगे हे. तोरई हां घलो ४० रूपया किलो चलत हे. कतेक ला बिसाबे बहिनी, बखरी मा घलो पानी के मारे नई जागे, जम्मो बिजहा सरगे, मनमाने बरसत हे". तभी एक महिला पानी की बोतल लिए आ रही थी, उससे पूछा - कहाँ गिंजरत हस सुकवारो मंझनी मंझना?" सुखदास हां बाबु संग भर्री खार मा गे हवे, बिहनिया ले कांही खाए नई हे. अऊ मोला बजार जाना हे. घर मा कोनो नई हे. चल दुहूँ त खाए बार कोन दिही, तेखरे सेती ओखर मन बर भात साग ला अमरा के आए हंव." बात सुनते-सुनते हार्न की आवाज सुनाई दी, दूसरी ट्रक पहुँच चुकी थी. अब आशा बंध गई कि गणेश जी विसर्जित हो जायेंगे.

फंसे हुए ट्रक के चक्के के नीचे से एक बार फिर मिटटी कीचड़ निकाला गया. फावड़ा नहीं होने से दंताली का उपयोग किया गया. फंसे हुए ट्रक से दुसरे ट्रक को रस्सों से बांधा गया. बच्चे सारे ट्रक में बैठे-बैठे हलकान हो रहे थे. दोनों ड्राईवरों ने आपस में सहमती बनाकर एक साथ ट्रकों को चलाया, लेकिन रस्से ने साथ नहीं दिया. एक झटके में दम तोड़ गया. फंसे हुए ट्रक ने फिर जोर लगाया. अब वह बिना रस्से के ही कीचड़ से  निकल गया. इसे कहते हैं मुफ्त की मगजमारी. जब कहीं हलकान होना लिखा रहता है तो आदमी बेबात ही हलकानी में फँस जाता है. अगर यह ट्रक पहले ही निकल जाता तो दूसरी गाड़ी मंगाने कि जरुरत नहीं पड़ती. सारी विद्याएँ धरी की धरी रह गई. गाड़ी अपने मन से निकल गई. चल पड़े लिफ्ट की तरफ. पहुँचते ही गणपति बप्पा ने सारे पम्प चलवा दिये नहर में पानी आने लगा. हमने भी तय किया कि बप्पा को यही सिरा दिया जाये. पूजा पाठ करके नहर के हवाले कर दिया गया. 
         
महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना एशिया की सबसे बड़ी परियोजना मानी जाती है. महानदी के पर बने गंगरेल बांध से नहर द्वारा पानी यहाँ लाया जाता है. और फिर उसे २८ पंपों से लिफ्ट करके नहर में छोड़ा जाता है, जिससे यह पानी नहरों द्वारा आरंग एवं तिल्दा-नेवरा तक खेतों की सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जाता है. ३० बरस पहले जब इस परियोजना का निर्माण हो रहा था तो हम लोग इसे देखने आते थे. करोड़ों रूपये खर्च करके इस महत्वाकांक्षी योजना का निर्माण हुआ. इसके कारण आस पास के गांवों में दो फसल होने लगी, किसानो को इससे बड़ी राहत मिली. गणपति बप्पा अगले बरस आने का निमंत्रण स्वीकार कर अपने धाम को चले गए और हम भी उन्हें विदा करके घर पहुचे तभी खाना मिला. गणपति बप्पा मोरिया, अगले बरस तू जल्दी आ. ड्राईवर कह रहे थे- गणेश भगवान अब्बड़ वजनी होगे गा. लटे-पटे ठंडा हुईस....."देखईया के जर जाये" गऊकिन. 

बुधवार, 27 जुलाई 2011

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे ---- ललित शर्मा

सप्ताहांत के दिन की सुबह चमकीली नहीं थी, आसमाने में काले-काले बादलों की घटा छाई हुई थी, कोई पता नहीं कब बरस जाएं? 5 दिनों सर्दी बुखार का मजा लेते-लेते खोपड़ी खराब हो गयी, दवाईयाँ लो और सो जाओ, बस यही चल रहा था। तबियत जब कूछ ठीक हुई तो दिमाग ने भी काम करना शुरु किया, वह सोचने लगा कि घर में बैठे-बैठे भी क्या करें? आज कहीं घूम ही लिया जाए। बाईक पर लांग ड्राईव का मजा इसी मौसम में आता है, अगर रिमझिम फ़ुहारें बरस रही हों तो क्या कहने, आनंद ही आनंद। तिवारी जी फ़ोन लगाया तो पता चला कि वे साप्ताहिक धुलाई के कार्यक्रम में व्यस्त हैं। उन्होने एक घंटे बाद साथ चलने की हामी भरी। मैं नियत समय पर उनके घर पहुंच गया। सुबह का नास्ता हो गया था, पर समय देखते हुए श्रीमती जी ने भोजन करके ही जाने को कहा। लेकिन भोजन के कारण विलंब हो सकता था। इसलिए ऐसे ही चल पड़े। रास्ते में कहीं भोजन कर लिया जाएगा। तिवारी जी को घर से लेकर आगे बढ लिए। हमारी योजना में महानदी की बाढ, महर्षि महेशयोगी की जन्मस्थान की सैर शामिल था।

गाड़ी हाइवे पर चली जा रही थी, तिवारी ने हमें ही हांकने की आज्ञा दे दी। आसमान की तरफ़ देखकर लगता था कि बरस जाएगा, मानिकचौरी रेल्वे क्रांसिग पार करते ही भूख लगने लगी। घर से निकले तो 15 मिनट ही हुआ था। ग्राम हसदा चौक पर एक चाट का ठेला दिखाई दे गया। बस गोलगप्पे खाने के इरादे से वहीं टिक गए, हसदा आना-जान बचपन से लगा हुआ है, तिवारी जी भी हसदा में अध्यापन कर चुके हैं। जान पहचाने के लोग वहां मिल गए। स्टूल और बेंच पर जम गए, देवा चाट भंडार, प्रोप्राईटर साहू जी को गोलगप्पे का आडर दिया, तभी मन बदल गया, चाट बनाने के लिए कहा। तिवारी जी ने गोलगप्पे थामें और मैने चाट। वाह! स्वाद के क्या कहने थे, मजा आ गया। ऐसी चाट शहर की भी किसी बड़े होटल में नहीं खाई। एक प्लेट उदरस्थ करने के पहले ही दुसरी का भी आडर दे दिया। फ़िर गोल गप्पे का, गोल गप्पे में तेल की महक थी, थोड़ा उसे गरियाया। पता किया कि एस पी (सरपंच पति) कहाँ है? गाँव में नहीं थे, परन्तु याद करते ही वे भी पहुंच गए। बड़ी लम्बी उमर है यार, शैतान का नाम लेते ही हाजिर।

चाट भक्षण चालु था, तभी एक नवयुवक गले में हेडफ़ोन डाले, हाथ में मोबाईल लिए पहुंचा। मुझसे बोला -"अंकल जी थोड़ा सरकिए"। हम सरक लिए, वह बेंच पर आकर बैठ गया। मोबाईल में गाना सुना रहा था। मैने जब उसे नीचे से पर तक देखा तो उसकी हरकत पर गौर करके अन्य लोग भी हँसने लगे। तिवारी गुरुजी ठहाके लगाने लगे। तभी उसके मोबाईल में घंटी आई और बंद हो गई, बोला -" साले मन मिस काल करथे।" मैने कहा - "ओखर मोबाईल मे तैंहा रिचार्ज कराथस का?" करातेस त फ़ुल काल करतिस।" उसने क्या सोचा पता नहीं, तभी उसका एक साथी पहुंच गया - "चल बे, जाना हे त, मैं जात हंव।" मैने कहा-" हेडफ़ोन ला कान में लगा, बने दिखथे।" वहां बैठे लोग उसका मजा लिए जा रहे थे। चाट के आनंद के साथ आनंद दुगना हो गया। सामने मुझे सप्तपर्णी का वृक्ष दिखाई दिया। परसों ही मल्हार पर मेडागास्कर पाम का जिक्र सुब्रमनियन जी ने किया था। मैने उसके कुछ चित्र लिए और सुब्रमनियन जी के चित्रों से मिलान किया। यह वृक्ष भी उसी जाति का लगा पर, इसमें फ़ूल नहीं आए थे, मैने फ़ूल भी देखे हैं। जो सुब्रमनियम जी के चित्रों में दिखाए फ़ूलों जैसे ही होते हैं। 

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे अंदर करने के बाद हमने सेवा शुल्क पूछा तो उसने हमारे 30 रुपए लिए। सस्ते में मामला निपट गया। शुल्क जमा करके हम आगे बढ लिए, क्योंकि आगे जाने में विलंब होने की आशंका थी, नवापारा पहुचकर गंज रोड़ की प्रदक्षिणा करके हम महानदी के घाट पर पहुंचे। वहां कोई भी कावंडिया दिखाई नहीं दिया। हमारी फ़ोटो इच्छा पूर्ति नहीं हुई। जब नदी के पुल पर पहुंचे तो बाढ देखने की इच्छा भी अधुरी रह गयी। नदी में पानी ही नहीं था। कुलेश्वर मंदिर के आस-पास रेत दिख रही थी। अर्थात वर्षा कम ही हुई है, नदी में भरपूर जल नहीं आ सका। 

मैने सोचा था कि नदी में पानी होगा तो नाव वाले भी मिलेंगे। उनसे चर्चा करेगें कि - "नाव में मामा-भानजा एवं पहिलावत (ज्येष्ठ पुत्र-पुत्री) क्यों नहीं बैठते? मान्यता है कि इनके बैठने से नाव उलट जाती है। नाव वाले नहीं मिले, रामभरोसा जी ने बताया था कि एक बार जानकारी के अभाव में वे मामा-भांजा एक साथ नाव में बैठ गए। जब नाव डगमगाने लगी तो नाव ने कहा कि -" कोई मामा भांजा बैठे हो तो बता दो, नहीं तो नाव उलट जाएगी।" इनका पता चलने पर एक को नाव से नदी में कूद जाने कहा। मामा तो बैठे रहे, नदी में रामभरोसा जी को कूदना पड़ा। थोड़ी देर नजारे देखने के बाद आगे बढ लिए।

गरियाबंद मार्ग पर आगे बढे, रास्ते में बोल बम कावंड़िए मिले, सावन में शिव भक्ति सैलाब उफ़ान पर होता है। कौन कहां से जल लेकर कहां चढाने जा रहा है पता ही नहीं चलता। पर कावंड़िए हर सड़क पर मिल जाते हैं। एक महिला कांवड़िया दल भी मिला और नौजवान भी, चलते-चलते इनकी चाल बदल चुकी थी। मुझे भी अनुभव है इसका। जांघे छिलने के कारण पैदल चलना कठिन हो जाता है। मैने तो इसका तोड़ निकाल लिया था, नारियल तेल की एक शीशी साथ लेकर चलता था और जांघों में लगा लेता था। जिससे जांघे छिलती नहीं थी और यात्रा भी मजे से हो जाती थी। अब समय नहीं था कि इन्हे यात्रा टिप्स देते चलुं। नहीं तो अवश्य ही बता देता। धान के खेतों में फ़सल लहलहा रही है, जिन्होने पहले बोनी कर ली वे चलाई, निंदाई और बियासी कर रहे हैं। महिलाओं का दल रोपा लगा रहा है, जिस खेत में पानी अधिक था और समय पर बोनी नहीं हुई उसमें लाई-चोपी बोनी पद्धति (खेत को मता कर उसमें उपर ही बीज छिड़कना) का प्रयोग किया गया था।

रास्ते में एक नंगरिहा बैलों को खोलकर सड़क पर बैठकर चोंगी सिपचा (बीड़ी जलाना) रहा था, थोड़ी देर आराम करने के बाद फ़िर बैला नांगर में फ़ांदने की तैयारी कर रहा था, मतलब बैटरी रिचार्ज कर रहा था। 300 एकड़ के खार में बोवाई हो चुकी है, निंदाई चलाई चल रही है किसान पुरानिक पटेल ने बताया। तीन-चार दिनों की बारिश ने किसानों के चेहरे पर रौनक ला दी। पौधों के भरी हुई बैलगाड़ियाँ खड़ी हैं, रोपा लगाने वाले थरहा ले जा रहे हैं। रोपा कतार में लगाया हुआ सुंदर दिखाई दे रहा था। ढंग से रोपा लगाने से फ़सल अच्छी होती है। गांव में रोपा का काम ठेके पर होता है। अगर खेत का मालिक स्वयं सामने न रहे तो मजदुर एक पौधे से दुसरे पौधे की दुरी बढा कर जल्दी से काम निपटाने की कोशिश करते हैं। जिससे फ़सल कम होने की संभावना रहती है। इसलिए खेत मालिक को भी उनके साथ काम में जुटना पड़ता है। तभी तो कहते हैं "खेती अपन सेती"। कांवरिए लगातार चल रहे हैं अपनी मंजिल की ओर तथा हम भी बढ रहे हैं आगे।  

NH-30 सड़क गंगा की सैर

रविवार, 7 मार्च 2010

महानदी के किनारे तरबूज की खेती

महानदी के किनारे छत्तीसगढ़ के प्रसिद्द तरबूज जिसे स्थानीय भाषा में कलिंदर कहते हैं, उसकी खेती हो रही है, यहाँ से तरबूजों का निर्यात अरब देशों में होता है.........जिससे यहाँ के नदी किनारे के किसानों की रोजी रोटी चल जाती है.........यहाँ के तरबूज बहुत ही मीठे होते है..........जिसके कारण इनकी मांग विदेशों तक है. 
 
महानदी के किनारे तरबूज की खेती