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रविवार, 3 दिसंबर 2017

कलजुग केवल नाम आधारा, टमर टमर नर उतरहिं पारा।

हजार बार टटोलता हूँ घर से निकलने पहले आधारकार्ड को, भूल तो नहीं गया। अगर किसी ने आधार पूछ लिया और न मिला तो कहीं परग्रही करार न दे दिया जाऊं, अच्छा भला आदमी पी के हो जाएगा। भले ही और भी कुछ जरुरी सामान छूट जाए, पर आधार नहीं छूटना चाहिए वरना निराधार चपेट में आने का खतरा बना रहता है। 
सफ़र के दौरान हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर ही टिकिट के साथ पहचान पत्र दिखाना पड़ता है, अब आदमी कितने पहचान पत्र रखे, आधार दिखाने से काम चल जाता है, भले ही फ़ोटो किसी और की सी लगे, पर सुरक्षा अधिकारी आधार देखते ही भीतर जाने दे देता है, समझता है कि देश का जिम्मेदार एवं ईमानदार नागरिक है, जो निराधार नहीं है। 
पूरे सफ़र में घर लौटते तक दिमाग पर आधार ही छाया रहता है, बैठे-बैठे चौंक कर अनायास ही आधारकार्ड पर हाथ चला जाता है, जरा टटोल लूँ कहीं भूल तो नहीं आया। बैग में भी कई जेबें होती है, इधर वाली में रखकर उधर वाली में टटोलने पर अगर आधारकार्ड नहीं मिलता तो माथे से पसीने की बूंदे चूह जाती हैं। फ़िर सारा सामान उलटकर आधार मिलने पर जो संतुष्टि होती है, उसका बयान नहीं कर सकता।
एक बरस पहले ही बैंक मैनेजर ने आधारकार्ड मांग लिया था, कहा कि खाते से आधारकार्ड लिंक करना पड़ेगा, उसके बाद रसोई गैस भी आधारकार्ड से लिंक हो गई, अब तो हालात ये हो गए हैं कि सांसे भी आधारकार्ड से स्वत: लिंक हो गई हैं। चौबीस घंटे में जितनी सांसे लेता हूँ पूरी गिनती आधारकार्ड बता देता है। राशन से लेकर प्राशन तक सब आधार हो गया है। 
कुछ दिन पहले नगर पंचायत से कूड़े के दो डिब्बे (नीले-हरे) वितरण करने के लिए कर्मचारी आए। डिब्बे रखने के बाद उन्होंने पहले आधारकार्ड मांगा। पंजी में आधारकार्ड नम्बर दर्ज करने के बाद उन्होंने दोनो डिब्बे मेरे सुपूर्द किए और कहा कि आजकल तो हर चीज में आधारकार्ड अनिवार्य हो गया है। बिना आधार कोई भी शासकीय सुविधा नहीं मिल सकती। शासकीय अस्पताल में आधारकार्ड अनिवार्य हो गया है, जिसके पास आधारकार्ड नहीं, उसको ईलाज कराने की पात्रता नहीं।
कुछ दिनों पहले एक समाचार सोशल मीडिया में वायरल हो रहा था कि फ़रीदाबाद के श्मशान से। जहाँ बड़ा सारा सूचना पट लगा है, जिसमें लिखा है कि मृतक का आधार कार्ड लाना जरुरी है, नहीं तो संस्कार नहीं होगा। लो जी! आधार ने अब तक तो जीना मुहाल कर रखा था अब मरना भी दुष्कर हो गया। 
लगता है कि अगर बिना आधार कार्ड मर गए और जबरिया अंतिम संस्कार कर भी दिया तो ऊपर बिना आधार कार्ड के यमराज जी स्वीकार नहीं करेंगे। दुआरे से लात मार दिए जाओगे, न नीचे के रहोगे न ऊपर के। मैं तो यह सोचकर हलकान हूँ कि अब न जाने कितने त्रिशंकू ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाएंगे निराधार होकर। राम जाने कितनी कर्मनाशाएँ धराएँ पर अवतरित होंगी।
इन सब हालात को देखकर भगवान से एक ही विनती है कि अब किसी को धरती पर भेजे तो बिना आधारकार्ड के न भेजे। ऊपर से सीधे आधार नम्बर प्रिंटेट बॉडी भेजे। माथे पर लिखा हुआ आधार नम्बर दूर से ही दिख जाए। न खो ने झंझट, न ढूंढने का लफ़ड़ा। न दिल दिमाग आधार के पीछे लगा रहे। यहाँ तो जिन्दगी आधारकार्ड संभालने और नम्बर दर्ज कराने में बीत रही है। भाई इतना तो रहम करो, आधार के बिना जीने नहीं दे रहे, कम से कम मरने तो दो। कलजुग केवल नाम आधारा, टमर टमर नर उतरहिं पारा।

सोमवार, 19 नवंबर 2012

चचा छक्कन और चोर पार्टी की सदारत

सुबह की सैर के वक्त चचा छक्कन दिखाई दे गए, दुआ सलाम के साथ हाल-चाल खैरियत का आदान-प्रदान हुआ। "क्या बताएं मियाँ महंगाई ने हालत ख़राब कर दी, जीना मुहाल हो गया। वैसे भी खानदानी होने के चलते हम सरकार की किसी भी एपीएल, बीपीएल जैसे योजना के खांचे में फिट नहीं होते। ऊपर से खुदा के फजल से दर्जन भर बच्चों की फ़ौज तैयार हो गयी। कोई गरीब मानने को तैयार ही नहीं होता। ऐसे में हमारे जैसे निठल्ले साहित्यकार का तो सवा सत्यानाश समझिये। कभी-कभार एक दो मुशायरे कवि सम्मलेन मिल जाते थे, वे भी छद्म श्री की भेंट चढ़ गए। जिसकी छाती पर बिल्ला लटक गया, समझो उससे बड़ा ठेकेदार कोई नहीं। सारे के सारे धन के स्रोतों का प्रवाह उसकी जेब में जाकर गिरता है। गोया उनकी जेब ना हुई,बंगाल की खाड़ी हो गई।" चचा ने जाफरान की खुश्बू का फव्वारा मुंह से छोड़ते हुए कहा। 
"बजा फ़रमाया चचा आपने, कुछ ऐसा ही अपना भी हो गया है। 4 साल से इंटरनेट का कुंजी पटल खटखटाते जेब में छेद हो गया। ऊपर से महंगाई ने तो कनिहा ही तोड़ कर रख दिया है। एक काम करिए, किसी राजनैतिक पार्टी के मेम्बर बन जाइये। फिर धीरे से एकाध पद ले लीजिये, सत्ता वाली पार्टी हो तो पौ बारह जानिए। आपकी जेब भी बंगाल की खाड़ी से कम न रहेगी। फिर हम भी तो हैं आपके साथ ही, जिसकी भी जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने कहेगें, आपके आदेश का पालन करते हुए, तत्काल कर दी जाएगी।" मैंने चचा की जेब में झांकते हुए कहा। "चलो उस पुलिया पर बैठ कर चर्चा करते हैं, तुम्हारी सलाह पर गौर किया जाएगा।" चचा ने कहा।  पुलिया पर झाड़-पोंछ कर बैठने के बाद चचा ने जेब से खैनी निकाली और घिसने लगे। खैनी घिसने का मतलब था की वे चिंतन में व्यस्त थे। थोड़ी देर बाद मुझे खैनी दी और डिबिया जेब के हवाले की।
चलो मियाँ अब तुम्हारी सलाह मान लेते हैं, वैसे भी हम कुछ ढीठ किस्म के इन्सान हैं. एक बार जो सोच लिया वह सोच लिया। ठीक है चचा फिर मिलते हैं ब्रेक के बाद। इस मुलाकात के बाद हम अपने काम में लग गए और चचा अपने नए धंधे में। अपनी व्यस्तताओं के चलते एक-डेढ़ बरस में चचा से मुलाकात ही नहीं हुई।  एक दिन चचा के घर के बाहर बड़ी सी होर्डिंग लगे देखी। उसमे लगी फोटो में चचा ने कलफ लगी अचकन और शेरवानी पहनी हुई थी, ऐनक के पीछे से नूर टपक रहा था। चचा की आदमकद फोटो थी और बड़े नेताओं की छोटी। मैंने एक सरसरी निगाह डाली और आगे बढ़ गया। लौटते हुए मेरी निगाह होर्डिंग पर पड़ी तो गायब थी। मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया।
अगले दिन मुझे सुबह की सैर के वक्त चचा मिल गए। दुआ सलाम के बाद खैरियत पूछने पर उन्होंने मुझे ही निशाने पर ले लिया - आप भी कमाल करते हैं मियाँ, मुझे फंसा कर खुद रफूचक्कर हो लिए, उस दिन के बाद आज खैर-खबर ले रहे हो। अरे कौन सा पहाड़ टूट पड़ा चचा, जो सुबह-सुबह ही फायर हुए जा रहे हो- मैंने चचा से आँख मिलाते हुए कहा। अरे मत पूछो हमारा हाल, वो तो हम ही जानते हैं या उपर बैठा वो जानता है। सालों ने जीना हराम कर दिया, इससे तो निठल्ले ही भले थे- चचा ने पैजामे से ऐनक पोंछते हुए कहा। कुछ तो बताओगे चचा, सियासी पार्टी में तो सभी चांदी काट रहे हैं। जिनको खाने का सऊर नहीं वो भी छिलके समेत केला गटक रहे हैं। जिनके पास भुनाने को कभी दाने नहीं थे वे भाड़ के मालिक बने बैठे हैं और एक आप हैं जो मुझे ही लानत-मलानत  जा रहे हैं।
जब यही बात यही बात है तो सुनो, चचा ने आँखों पर ऐनक लगते हुए कहा - मंत्री जी के चेले ने कहा कि चचा अब आप अध्यक्ष बन गए हैं चोर पार्टी के, कम से कम अपने नेताओं को खुश करने के लिए एक दो होर्डिंग ही लगवा दो। उसमे आपकी फोटो भी रहेगी और नेताओं की भी। इससे आपके नंबर बनने के चांस बढ़ जायेगे और मंत्री जी की गुड बुक में आपका नाम दर्ज हो जायेगा। मियाँ, यहाँ के सियासी दांव-पेंच हमारी समझ से बाहर थे। हमने होर्डिंग बनवा कर लगाव दी। होर्डिंग लगवाने के एक घंटे के बाद ही छुटकू नेता जी का फोन आ गया। बोले कि बहुत बड़े नेता बनते हो चचा, होर्डिंग में अपनी फोटो बड़ी और हमारी फोटो छोटी लगवा दी। कहीं ऐसा न हो आपके पर कतरने पड़ें। हमने तुरंत होर्डिंग उतरवा दी। तभी एक नेता और पहुँच गए, वो कहने लगे कि चचा होर्डिंग हटवाने के बाद दूसरी बनवा कर लगवाइए। 
अब हमने जो होर्डिंग बनवाई, उसमे अपनी फोटो छोटी लगाई, पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं को सिर पर बैठाया। लोकल नेताओं की फोटू लगवाई। मंत्री जी और अध्यक्ष जी की फोटो लगवाई। होर्डिंग लगते ही मंत्री जी का फोन आ गया, बोले कि इतनी जल्दी बड़ी सियासत सीख गए चचा। हमारे विरोधी की फोटो बड़ी और हमारी छोटी लगाई है, हमें नीचा दिखाने के लिए, देखो कहीं आपकी लुटिया न डूब जाये। अब मियाँ हमने फिर होर्डिंग उतरवाई, दूसरी बनवाई, इसमें मंत्री जी और अध्यक्ष जी की फोटो बराबर करके लगवाई, फीते से नाप कर। होर्डिंग लगते ही जेलर के जासूस फिर सक्रिय हो गए। अध्यक्ष जी का फोन आया, क्या मजाक बना रखा है चचा आपने। मंत्री बड़ा होता है या संगठन का अध्यक्ष ? हमने उसे टिकिट दी है तब मंत्री बना है और हमारी फोटो आपने मंत्री के बराबर लगवा दी। हम आपको सस्पेंड करते है। समाचार कल के अख़बारों में देख लेना।
हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। बड़ी देर तक घिघियाए, अध्यक्ष जी हमें गरियाते रहे, फनफनाते रहे। बड़ी  मुस्किल से माने और हम सस्पेंड होने से बच गए। हमने होर्डिंग फिर उतरवा दी। अगले दिन मंत्री जी का फोन आ गया कि होर्डिंग क्यों हटवाई? हमने कहा कि कल के तूफान में होर्डिंग उड़ गयी। मंत्री जी ने कहा कि होर्डिंग फिर बनवाई जाये। उनका आदेश सुनते ही हमारी तो पुतलियाँ फिर गयी और गश आ गया। चुन्नू की अम्मा ने हमें लुढकते देख लिया और पानी के छींटे मारे तब होश आया। होश में आते ही हमने अपना इस्तीफा लिख दिया और अध्यक्ष जी को भेज दिया। हमें छक्कन मियाँ  ही बने रहने दिया जाए। साल भर से ढक्कन बने हुए थे। ये सियासत भी बड़ी गन्दी चीज है मियाँ। होर्डिंग की फोटो से ही इनके कद बड़े-छोटे हो जाते हैं, लानत है इन पर। लाहौल बिला कुव्वत, लौट कर बुद्धू घर को आए। बंगाल की खाड़ी तो नहीं बनी हमारी जेब, हाँ! कंगाल की खाड़ी जरुर हो गयी। अब हम किसी के चक्कर में नहीं फंसेंगे, हम भले और हमारा कुनबा भला।

शनिवार, 19 मई 2012

46 वर्षों से बाट जोह रहे उपन्यास "धान के देश में" का प्रकाशन ---- ललित शर्मा

कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाए तरुवर फ़ले, केतक सींचो नीर। इस कथन से लगता है कि किसी भी कार्य को भाग्य एवं ईश्वर के भरोसे छोड़ देना चाहिए। समय आने पर कार्य होगा ही। लेकिन अधिरता भी रखना जरुरी है। यदि कार्य के प्रति लगन लगी रहेगी तो एक दिन अवश्य सम्पन्न भी होगा और सिरे भी चढेगा। अकर्मण्यता से सिर्फ़ ईश्वर के भरोसे छोड़ने से कार्य सिद्ध नही होता, इसके लिए सतत प्रयास भी करना चाहिए और सतत प्रयास ही रंग लाता है। ऐसी ही कुछ कहानी स्व: हरिप्रसाद अवधिया के उपन्यास "धान के देश में" की है। यह उपन्यास सन् 1965 में लिखा गया था। इसका प्रकाशन लेखन के 47 वें वर्ष में हो रहा है। प्रख्यात साहित्यकार और पत्रकार पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी जी ने इस उपन्यास की भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को  लिखी थी। छत्तीसगढ शासन के संस्कृति विभाग एवं हरिप्रसाद अवधिया जी के पुत्र जी.के. अवधिया के वित्तिय सहयोग से वैभव प्रकाशन रायपुर से "धान के देश में उपन्यास" का प्रकाशन होना सुखद है।


उपन्यास के प्रकाशन को लेकर मैने गत वर्ष एक पोस्ट ललित डॉट कॉम पर लिखी थी। जिसके फ़लस्वरुप यह उपन्यास चर्चा में आया। संस्कृति विभाग के उच्चाधिकारियों की दृष्टि इस पर पड़ी और वे उपन्यास के प्रकाशन के लिए सहयोग करने को तैयार हो गए। छत्तीसगढ की पृष्ठ भूमि को लेकर रचित यह उपन्यास सांस्कृतिक विरासत से कम नहीं है। उपन्यास को लिखे हुए अर्ध शताब्दी बीत रही है। इन वर्षों में समाज में बदलाव आया है। लोगों के रहन सहन का अंदाज बदला है तो साथ ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन हुआ है। गांव में त्यौहारों एवं शादियो के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत गायब हो रहे हैं तो लोकाचार में भी परिवर्तन आया है। साहित्य भी सांस्कृतिक प्रदूषण की मार झेल रहा है ऐसे समय में स्व: हरिप्रसाद अवधिया के उपन्यास का प्रकाशन होना छत्तीसगढ की संस्कृति के प्रचार प्रसार एवं उसे संवर्धन में महती भूमिका निभाएगा। ग्रामीण परिवेश पर आधारित उपन्यास में छत्तीसगढ के रीति रिवाजों, परम्पराओं का विशेष रुप से सम्मिलित होना इसे विशेषता प्रदान करता है, उपन्यास के कुछ अंश यहाँ पर उदधृत करना प्रासंगिक समझता हूँ।



दूर्गाप्रसाद द्वारा विधवा राजवती का हाथ मांगने से उपन्यास का कथानक प्रारंभ होता है। इसके साथ कहानी फ़्लेश बैक में चलती है। साथ ही ग्रामीण अंचल का सुंदर चित्रण भी - संध्या की सुनहरी किरणे अभी पेड़ों के पत्तों पर बिछल रही थीं। खेतों से झुण्ड के झुण्ड गायों को घेर कर लाते हुये ग्वाले अपनी बाँस की बाँसुरी पर सुरीली तान छेड़ रहे थे। पश्चिमी क्षितिज में डूबते हुये सूर्य की लालिमा को उड़ती हुई धूल ने ऐसा ढँक दिया था कि मानो लाल रंग के परदर्शी मलमल से परदा कर दिया गया हो। गाँव के अंतिम छोर पर मिट्टी का छोटा सा घर था। लाल खपरैल की जगह घास की छत थी। दीवालें नीचे से आधी दूर तक गोबर से लिपी हुई थीं। शेष आधा भाग गेरू से पुता था। घर में एक ही दरवाजा था और एक ही खिड़की। घर तथा दरवाजे के मध्य छोटा सा साफ-सुथरा लिपा-पुता आँगन था जिसके बीचोबीच तुलसी चौरा (एक छोटे से चबूतरे पर बोया गया तुलसी का पौधा) था। आँगन के एक कोने में धनिया और मिर्च के पौधे संध्या की बिखरती हुई कालिमा में उनींदे हो रहे थे। दूसरे कोने में एक गैया कोठा था जिसमें एक देसी गाय बँधी थी जिसके पास ही बँधा बछड़ा रह-रह कर रँभा उठता था - शायद दिन भर के बाद इस समय तक उसे जोरों से भूख लग आई थी।


ग्रामीण अंचल में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले गहनों का जिक्र भी उपन्यास में है -रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहने सुहागिनों के मांग में सिंदूर की मोटी नारंगी रंग की रेखायें थीं और हाथों में चूड़ियाँ। विभिन्न गहनों से उन्होंने अपना श्रृंगार कर रखा था - कानों में 'खिनवा', बाहों में 'बँहुटे' या 'नागमोरी', कमर में चांदी के 'करधन' और पावों में काँसे या चांदी की 'पैरियाँ'। विधवायें सफेद रंग की साड़ियाँ पहने थीं और किसी-किसी के हाथ में चांदी का 'चुरुवा' था क्योंकि इस क्षेत्र के रिवाज के अनुसार वे चुरुवा के सिवा अन्य कोई गहना नहीं पहनतीं। साथ ही त्यौहारों एवं उत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों का विशेष उल्लेख है।

सोहर गीत हैं -
सतहे मास जब लागै तौ अठहे जनाय हो ललना।
अठहे मास जब लागै तौ सधौरी खवाय हो ललना।
नवे मासे जब लागै तो कंसासुर जानय हो ललना।
जड़ि दिहिन हाथे हथकड़ियाँ पावें बेलिया तो ललना।

इस प्रकार सोहर के पदों में ललनाओं ने बालक की श्री कृष्ण से तुलना कर उसके यश की कामना प्रकट करती हैं।

विवाह के अवसर पर औरतें गाती हैं

घेरी बेरी बरजेंवँ दुलरू दमाद राय,
दूर खेलन मत जाव हो।
दूर खेलत सुवना एक पायेव,
लइ लानेव बहियाँ चढ़ाय हो।
बारे दुलरुवा के हरदी चढ़त हय,
सुवना करत किलकोर हो।
तुम तो जाथव बाबा गौरी बिहाये,
हमहु क ले लौ बरात हो।
अइसन दुलरू मैं कबहुँ नहिं देखेंव,
सुवना ला लाये बरात हो।

दीवाली के अवसर पर गाँव में जुआ खेलने की परम्परा है और थाने में सरगर्मी बढ़ गई थी। पुलिस वाले जुये की टोह में गाँव-गाँव का दौरा कर रहे थे। स्वयं सब इस्पेक्टर खुड़मुड़ी आये। गाँव के कोटवार भुलउ ने उनकी बड़ी आवभगत की। चौपाल पर खाट बिछा दी गई। उस पर सब इंसपेक्टर बैठ गये। दारोगा का आगमन सुन कर महेन्द्र और सदाराम भी आ गये। तीनों में बातें होती रहीं। भुलउ चुपचाप बैठा था। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गये थे। दारोगा ने भुलउ को बताया कि वह रात गाँव में ही रहेगा। सुनकर भुलउ दौड़ता हुआ गया और उसके लिये खाट तथा रसद का प्रबंध कर आया। बेगार और रसद अंग्रेजी शासन के युग में साधारण बात थी।

उपन्यास में दीवाली का जिक्र - लक्ष्मी पूजा की रात गाँव में प्रायः कोई नहीं सोया। औरतें 'गोड़िन गौरा' की पूजा और उत्सव में व्यस्त हो गईं। इसके पहले दिन वे औरतें मालगुजार और बड़े किसानों के घर जाकर 'सुआ नाच' नाचती रहीं थीं। बाँस से बने एक टोकनी में चाँवल भर कर उसमें चार-पाँच पतली लकड़ियाँ खड़ी की गई थीं। उन लकड़ियों के ऊपरी भाग में मिट्टी के छोटे-छोटे तोते बनाये गये थे। उस टोकनी को बीच में रख कर स्त्रियाँ गोल घेरे में आधी झुकी हुईं गोल घूम घूम कर, झूम झूम कर नाचती रहीं थीं। उनके मुँह से एक स्वर होकर सहगान के रूप में छत्तीसगढ़ का 'सुआ गीत' गूँज रहा था -

जावहु सुवना नन्दन वन
नन्दन वन आमा गउद लेइ आव,
ना रे सुआ हो, आमा गउद लेइ आव।
जाये बर जाहव आमा गउद बर, कइसे के लइहव टोर,
ना रे सुआ हो, कइसे के लाहव टोर।
गोड़न रेंगिहव, पंखन उड़िहव, मुँहे में लइहव टोर,
ना रे सुआ हो, मुँहे में लइहव टोर।
लाये बर लाहव आमा गउदला, काला मैं देहँव धराय,
ना रे सुआ हो, काला मैं देहँव धराय।
गुड़ी में बइठे मोर बंधवइया, पगड़िन देहव अरझाय।
रे सुआ हो, पगड़िन देहव अरझाय।

आगे चलकर उपन्यास में प्रेम कहानी जन्म लेती है और विभिन्न घटनाक्रमों को लेकर उत्सुकता एवं रोचकता को बनी रहती है। मेरा प्रयास उपन्यास की एक झलक प्रस्तुत करना है। "धान के देश में" उपन्यास शोधार्थियों के लिए भी मददगार साबित होगा। उपन्यास प्रकाशन के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने में इनकी महती भूमिका है। "धान के देश में" के विमोचन की सूचना सभी मित्रों तक पहुंचाई जाएगी। जिन्होने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से प्रकाशन हेतू सहयोग प्रदान किया उन्हे साधुवाद।

गुरुवार, 10 मार्च 2011

परबतिया भौजी की लाटरी

परबतिया भौजी नेता गिरी में जाती है, जब कोई पार्टी वाला बुला लेता है रैली, सभा के लिए सौ पचास रुपया दिहाड़ी में, घुम-घुम के सब जानने लगी, कि इन्टर नेट और ई मेल-फ़ी मेल क्या होता है।

एक दिन बोली-"लल्ला हमार भी, ऊ का कहत है, हाँ! ई मेल बनाई दो।"

हमने कहा-"' क्या करेंगी भौजी ई मेल का? तुमको तो सुअर चराना है और क्या।"

भौजी कहने लगी-" देखो लल्ला, सरकार के बहुत सारी इस्कीम आवत है, जौन में गाँव के लोगन का फ़ारेन लेई जात है। हमने नई बिधि से सूअर के गोबर के ईकोफ़्रेंडली गोइठा तैयार किए हैं। उसको सरकार ने मान्यता दे दी है, उर्जा का स्रोत मान के। गैस बहुत मंहगी हो रही है। इसलिए गोइठा को सिगरी में डाल के खाना बनात हैं। हमार इस्कीम सरकार ने मान ली है और फ़ारेन मा सुअर बहुत होत है, तो हमको वहाँ ईकोफ़्रेंडली गोइठा बनाना सिखाने के लिए ले जात है। तो अब ई मेल की जरुरत नइ पड़ेगी?"

मैने परबतिया भौजी का ई मेल बना दिया और उसको आई डी पास वर्ड पकड़ा के छुट्टी पाए- "जाओ भौजी तोहार ई मेल-फ़ी मेल सब तैयार है। ये कागज पकड़ो इसमें तोहार लेटरबाक्स के ताला-चाबी है। जब खोलाना होय तो ये कागज ले के आ जाओ, बाद में मैं देख दूंगा, कोई समाचार, संदेश होय तो।

तीन दिन बाद भौजी पहुंच गयी हमारे  पास और कहने लगी-" हमार लेटर बाक्स खोल के देखो जरा कोई चिट्ठी-पतरी आई है का?

मैने उनका ई मेल चेक कि्या तो एक मेल दिखा, जिसमें अंग्रेजी में लिखा था कि आप भाग्य शाली हैं आपका 500000 पौंड का लाटरी खुल गया है। अपना पता और टेलीफ़ोन नम्बर भेजें।

मैं मेल देख ही रहा था कि भौजी फ़िर बोल पड़ी-"बताते काहे नहीं हो लल्ला, का लिखा है?

मैने बता दिया कि एक चिट्ठी आई है, इंग्लैंड से, जिसमें लिखा है कि आपकी  500000 पौंड याने लगभग 4,00,00,000 की लाटरी खुली है। सुन के भौजी को गश आ गया। मै उनके मुंह पर पानी छींट कर होश में लाया।

बड़ी मुस्किल से मुंह से बोल फ़ूटे - "तो ये बताओ लल्ला पैसा कहाँ मिलेगा? "

अरे भौजी ऐसी लाटरी खुलने की चिट्ठी तो मेरे पास दिन भर 10-20 आ ही जाती है। उसे मैं कूड़े के डब्बे में डाल देता हूँ।"

भौजी को बात कुछ हजम नहीं हुई, मुझे ही गरियाने लगी, "लल्ला हम तुम्हारी सब चाल बाजी समझत हैं। हम अनपढ हैं समझ के बेवकूफ़ बना कर पुरा रुपया हड़पना चाहत हो। हमार भी नाम परबतिया है, पाई-पाई ले के छोड़ूंगी।"

अब गश खाने का समय मेरा था। समझाऊं तो समझाऊं कैसे? भौजी सड़क पर खड़े होकर होले पढी रही थी। तभी उसने कहा कि-" हमारा लेटरबाक्स का ताला चाबी लगा के हमारा कागज वापस करो। कल हम शहर जाकर देखाएगें।" मैने सोचा, चलो बला टली। उसका कागज देकर राम-राम किया। उसके बाद भौजी 2-3 महीना दिखाई ही नहीं दी।

एक दिन खेत जाते समय मिल गयी। मैंने पूछ ही लिया -" का हुआ भौजी तोहार लाटरी का, मिल गया रुपया?

बस मेरा तो ये कहना हुआ और भौजी फ़ट पड़ी -" का बताएं लल्ला, बताने में भी शरम आत है, तुमने सही कहा था। लेकिन हमारे ही दिमाग पर पत्थर पड़ गया था। ऊ लाटरी के चक्कर मा हमार सब सुअर बेचा गए। 30,000 रुपया जमा कराए बैंक में उनके खाते में। लालच पड़ गया था  कि रुपया मिलेगा तो कम से कम सुख से तो जीएगें। जब पैसा नहीं आया तो थाने में गए रपट लिखाने, दरोगा साहब बोले, इंग्लैंड का मामला है, वहीं रपट लिखाओ जाके। बताओ अब कैसे इंग्लैंड जाएं। ये अंग्रेज बहुत बदमाश हैं, पहले यहाँ रहके लूटते रहे देश को और जब छोड़ दिए तो ई मेल से लूट रहे हैं, सत्यानाश होई जाए इनका। किस मुंह से तुम्हे बताने आते।

मैने कहा-" भौजी, लतखोर बाज नहीं आते, चाहे जितना लतिया लो, जी भर के जुतिया लो। मेरे पास हजारों बार ई मेल आया है और मैने इन्हे लतियाया है, और कहा कि मुझे आपका ईनाम-ईकराम नहीं चाहिए, धरे रहो अपने पास।" अगर इनके ई मेल से रुपया मिलता तो मैं आज देश का सबसे धनी आदमी होता, ऐसे ही फ़ालतु घर में बैठ कर कम्प्युटर नहीं खटखटाता।

नोट गंवा के भौजी हालत गंभीर है, कल की महिला सभा में जाते टैम सायकिल पिचंर हो गई। अब कैसे करें?

फ़ूलचंद चचा से 14 रुपए मांग कर ले गयी। तब इनकी सायकिल का पंचर बना। घर वाला ठहरा निखट्टू। कोई काम-धाम तो करता नहीं, दिन भर बैठे ठाले ताश पीटता हैं, और मेम साहेब बिहाने-बिहाने तगाड़ी धर के सुअर चराने निकल जाती है।

बुधवार, 9 मार्च 2011

ओम…खुजाए नम:-- खजु खजुवाए स्वाहा

असीमित परिकल्पनाओं के इस देश में सफलता का यही एक मूलमंत्र है कि…तू मेरी खुजा..मैं तेरी खुजाता हूँ…इस कार्य में खुजाने वाला भी और खजुवाने वाला ..दोनों ही खुश रहते हैं…एक के हाथों की खुजली मिट जाती है और दूसरे के बदन की  खुजाल… ऐसा आज से नहीं पुरातन काल से होता चला आया है..राजा के दरबार में मंत्री से लेकर संतरी तक सभी राजा की खुजाते थे और राजा अपने मतलब के चलते पटरानियों की..समय के साथ-साथ सत्ता परिवर्तन हुए लेकिन ये खुजाने और खजुवाने की परंपरा तब से लेकर अब तक बिना किसी अवरोध के निरंतर चलती रही| अभी तक कायम है। 
ये रोग है या फिर शौक?…इस बारे में प्राय: भिन्न-भिन्न प्रकार के मत हैं ..जिन्हें इसका  शौक या शगल नहीं है..उनके हिसाब से ये एक लाइलाज बीमारी है और जो इसके जरिये फलीभूत हो रहे हैं या होने की संभावना देख रहे हैं… उनके लिए इससे बढकर कोई और नेमत नहीं ….. कुछ लोग गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले होते हैं

अपने वक्त और ज़रूरत के हिसाब से दूसरों की खुजाते तथा अपनी खजुवाने रहते हैं और कुछ को इसकी लत लग चुकी होती है…वो हर समय बिना खुजाए या खजुवाने नहीं रह सकते|। जैसे वहम का कोई इलाज नहीं है … कोई तोड़ नहीं है … ठीक वैसे ही इस बीमारी का भी कोई इलाज … कोई तोड़ नहीं है … जिसको खुजानी है वो तो हर हालत में … हर माहौल में खुजाएगा ही … या पत्थर पर घिस लेगा और जिसको अपनी खजुवानी है वो भी कोई ना कोई बकरा ढूंढ लेगा ही..

ये खुजाने की आदत राजा से लेकर रंक तक..दुर्जन से लेकर सुजान तक…संसद से लेकर विधान तक….किसी को भी हो सकती है…और लेखक जाति के करोंदे टाईप लोग भी इसका अपवाद नहीं है…नाम के साथ-साथ दाम कमाने की चाह के चलते  कुछ बजरबट्टू टाईप के लेखक अपनी रचनाओं को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में छपवाने के लिए प्रकाशकों इत्यादि की तन्मयतापूर्वक खुजाने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करते…तो कुछ अपने पेटपोसवा टाईप की प्रत्रिकाओं के सम्पादक अपनी पत्रिका में रिक्त रह गए स्थानों की आपूर्ति के लिए “आप बहुत बढ़िया लिखते हैं…कभी हमारे लिए भी लिखिए"  कह कर इनकी खुजाने में किसी भी तरह का संकोच या परहेज़ नहीं करते… लेकिन इस सारी बन्दर बाँट में पाठक बेचारा बिना किसी कसूर के अपच शिकार हो कै करने को मजबूर हो जाता है…

हमारे देश में खजुवाने वाली सत्ता का सबसे बड़ा केन्द्र दिल्ली है…यूँ समझिए कि ये खुजाने और खजुवाने वाले दोनों के लिए स्वर्ग है…यहाँ नेता….मंत्री की और मंत्री प्रधानमंत्री की खुजाते हैं और प्रधानमंत्री हाई कमान की खुजाने के लिए बिना किसी संकोच के अपनी दाढी खुजाते हुए दस जनपथ तक पहुँच जाते हैं…कुछ ऐसे भी निर्भाग लोग भी होते हैं इस दुनिया में जो अपनी खजुवाना तो चाहते हैं लेकिन चाहकर भी महज़ इसलिए नहीं खजुवा पाते हैं कि कोई इन्हें भाव ही नहीं देता…। ये इस आस में दिल्ली  में लगे हैं कि….कभी तो खुजाने वाली सुबह आएगी…

लोकतंत्र में सत्ता के विकेन्द्रीकरण के कारण खुजली उपर से नीचे तक सभी को समान रुप से बंट जाती है…. प्रधानमंत्री से लेकर आम टटपूंजिए नेता तक..। वह इसे अपने मुंह लगे कार्यकर्ता तक पहुंचा ही देता है…. सब खुजाने में लगे हैं। आज तक किसी ने कभी कोई शिकायत नहीं की या आन्दोलन, प्रदर्शन नहीं किया कि…. खुजली उस तक नहीं पहुंची, और उसे खुजाने का सुख नहीं मिला। जिस तरह अमेरिका के गेंहूँ के साथ कांग्रेस (गाजर) घास स्वत: ही देश में वितरित हो गयी, उसी तरह बजट के साथ खुजली का भी वितरण स्वत: सुनिश्चित हो जाता है। इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।

खुजली छूत की बीमारी होने की वजह से पूर्णरूप से इसका खात्मा होना लगभग असंभव है लेकिन फिर भी कुछ नासमझ टाईप के अपवादस्वरूप लोग इस उम्मीद पे अपनी दुनिया को कायम रख बेवजह जीए चले जा रहे हैं … लेकिन इनके होने या ना होने से किसी को भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ज़्यादातर लोग सपनों की दुनिया में जीने के बजाय यथार्थ के धरातल पर खुद अपनी मेहनत और लगन से जुनून की हद तक सबकी खुजाते हुए अपने सपनों को हकीकत में बदलने का माद्दा रखते हैं…इसलिए  आईए और तू मेरी खुजा…मैं तेरी खुजाऊँ की तर्ज़ पर सभी एक दूसरे की खुजाएँ…खुजाते चले जाएँ….  सितारे बुलंद अवश्य होगें .... अस्तु

मंगलवार, 8 मार्च 2011

निर्मला पुत्तुल की कविता

आज "एक बार फिर" से आदिवासी कवियत्री निर्मला पुत्तुल जी की एक कविता पेश कर रहा हूँ, जो इन्होने "अंतर राष्ट्रीय महिला दिवस का आमंत्रण" पाकर लिखी थी.

इस  कविता को अर्चना  चावजी ने अपना स्वर दिया है। आप सुन भी सकते हैं।


एक बार फिर
हम इकट्ठे होंगे 
विशाल सभागार में
किराये की भीड़ के बीच 
 
एक बार फिर
ऊँची नाक वाली 
अधकटे ब्लोउज पहनी महिलाएं
करेंगी हमारे जुलुस का नेतृत्त्व 
और प्रतिनिधित्व के नाम पर
मंचासीन होंगी सामने
 
एक बार फिर 
किसी विशाल बैनर के तले
मंच से खड़ी माइक पर वे चीखेंगी
व्यवस्था के विरुद्ध 
और हमारी तालियाँ बटोरते
हाथ उठा कर देंगी साथ होने का भरम

एक बार फिर
शब्दों के उड़न खटोले पर बिठा
वे ले जाएँगी हमे संसद के गलियारों में
जहाँ पुरुषों के अहम से टकरायेंगे हमारे मुद्दे
और चकनाचूर हो जायेंगे 
उसमे निहित हमारे सपने

एक बार फिर
हमारी सभा को सम्बोधित करेंगे 
माननीय मुख्यमंत्री
और हम गौरवान्वित होंगे हम पर 
अपनी सभा में उनकी उपस्थिति से
 
 एक बार फिर
बहस की तेज आंच पर पकेंगे नपुंसक विचार
और लिए जायेंगे दहेज़-हत्या, बलात्कार, यौन उत्पीडन
वेश्या वृत्ति के विरुद्ध मोर्चाबंदी कर
लड़ने के कई-कई संकल्प

एक बार फिर
अपनी ताकत का सामूहिक प्रदर्शन करते
हम गुजरेंगे शहर की गालियों से
पुरुष सत्ता के खिलाफ 
हवा में मुट्ठी बांधे  हाथ लहराते 
और हमारे उत्तेजक नारों की ऊष्मा से
गरम हो जायेगी शहर की हवा

एक बार फिर 
सड़क के किनारे खडे मनचले सेकेंगे अपनी ऑंखें
और रोमांचित होकर बतियाएंगे आपस में कि
यार शहर में बसंत उतर आया है

एक बार फिर
जहाँ शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
इकट्ठे होकर हम लगायेंगे उत्तेजक नारे 
वहीं दीवारों पर चिपके पोस्टरों में
ब्रा पेंटी वाली सिने तारिकाएँ
बेशर्मी से नायक की बांहों में झूलती
दिखाएंगी हमें ठेंगा
धीर-धीरे ठंडी पड़ जायेगी भीतर की आग
 
और एक बार फिर 
छितरा जायेंगे हम चौराहे से
अपने-अपने पति और बच्चों के 
दफ्तर व स्कूल से लौट आने की चिंता में 

सोमवार, 7 मार्च 2011

कम इनपुट में अधिक आउटपुट का अर्थ शास्त्र : व्यंग्य

हमारा भारत देश प्राचीन काल से ही तकनीक सम्पन्न रहा है। हवाई जहाज से लेकर ब्रह्मास्त्र एवं पक्षेपास्त्र तक का निर्माण वैदिक काल में ही चुका था। पत्थर और ताम्र पत्र पर लिख कर इस ज्ञान को सहेजा गया था। जैसे-जैसे धरती की खुदाई होती है वैसे-वैसे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान सामने आकर चमत्कृत करते रहता है।

सरकार की अनुंसधान शाखा भी खुदाई करने का ही काम करती है। इसकी खुदाई भी पुरातत्व विभाग से कम नहीं होती।

सरकार के विरोधियों एवं निवृतमान सरकार के करीबी अधिकारियों की जड़ तक खुदाई करके सारे रिकार्ड जमा रखती है। जैसे ही सरकार का इशारा होता है, रिपोर्ट पेश हो जाती है। खुदाई के सारे रिकार्ड अखबारों तक पहुंच जाते हैं।

सभी सरकारें यही करते आई हैं। लेकिन कभी-कभी सरकारों को अपने ही लोगों की कारगुजारियों की जानकारी रखनी पड़ती है।

हमारे देश में एक नए अर्थशास्त्र का जन्म हुआ है। इस अर्थशास्त्र के सामने विश्व के सारे अर्थशास्त्रियों के बनाए नियम फ़ेल हो गए हैं। चाणक्य से लेकर अमर्त्य सेन तक अपनी खोपड़ी खुजा रहे हैं।

कम इनपुट से अत्यधिक आउटपुट लेने के अर्थ शास्त्र से पुरी दूनिया चकित है और भारत की इस उपलब्धि की तरफ़ मूँह फ़ाड़े देख रही है। हम भी यही कर रहे हैं।

बात यहाँ से शुरु होती है। हमारे मोहल्ले में मिश्रा जी का खटाल है, उन्होने दो भैंसे पाल रखी है। जिसमें एक दूध देती है दूसरी नहीं। मतलब क्रम से एक भैंस का दूध वर्ष भर मिलता है।

एक भैंस 10 किलो दूध देती है, लेकिन ये मोहल्ले भर में सुबह शाम 30 किलो एक नम्बर का खालिश दूध बेचते हैं। इस पर भी अगर कोई नया ग्राहक पहुंच जाता है एकाध किलो दूध लेने के लिए तो उसे वापस नहीं करते, उसके लिए भी कहीं से दूध का इंतजाम कर ही देते हैं।

उसके बाद पान चबाते हुए ठससे अपने पान की दुकान में बैठ कर कत्था-चूना लगाते रहते हैं।

ये तो रही मिश्रा जी चमत्कारिक कहानी, आगे चलते हैं, लाला जी का घी मावा सेंटर है। भैंस-गाय इनके पास एक भी नहीं है। दिन भर दुकान में लाईन लगे रहती है। कई क्विंटल शुद्ध मावा और देशी घी दिन भर में बेच लेते हैं।

गाँव के छोटे व्यापारियों से 10-20 किलो शुद्ध मावा और देशी घी खरीदते हैं बाकी शुद्ध माल सीधा फ़ैक्टरी से ही आता है पैक होकर। गाँव की सेहत बना रहे हैं, दम लगा कर और पहलवान इनकी डेयरी का घी खा रहे हैं और जोर लगाकर दम निकाल रहे हैं।

पता चला कि एक चपरासी विभाग की मास्टर चाबी है। उसकी स्वीकृति बिना किसी का जायज काम भी नहीं होता। नाजायज की बात तो छोड़िए।

हमारे पहुंचते ही सबसे पहले उनकी चपरासनिन से सामना हुआ। गोल-मटोल कम से कम आधा किलो तो सोना लाद रखा होगा, गाँव की मालगुजारिन जैसे।

शानदार मार्बल के फ़र्श वाला तीन तले का मकान और उसमें 6 किराएदार। उन्होने मुझे किराए पर मकान लेने वाला समझ लिया और कहा कि-“ यह मकान देख लें, अगर पसंद आए तो ठीक नहीं, दूसरे मोहल्ले में दो मकान और हैं, वे आपको जरुर पसंद आएगें।

कुल मिला कर चपरासी ही दो-चार करोड़ की आसामी निकला। तनखा 5-10 हजार और महीने खर्च 50,000 रुपए। इसे कहते हैं अर्थशास्त्र का चमत्कार।

कुछ दिनों पहले एक उच्चाधिकारी के यहाँ छापा पड़ा। सरकारी तनखा तो उनकी 40 से 50 हजार होगी, छापे में सम्पत्ति 400 करोड़ रुपए मिलती है।

एक के अधिकारी ने गजब ही कर दिया, उसके यहाँ से छापे में डेढ क्विंटल सोना मिला। 1801.5 करोड़ रुपया नगद। इसकी पराकाष्ठा तो तब हो जाती है, जब एक मंत्री पर 1लाख 37 हजार करोड़ रुपए का घोटाला करने का आरोप लगता है। जबकि इनको हर चीज में सरकार ने छूट दे रखी है,

1 रुपए में चाय से लेकर 20 रुपए में चिकन करी मिल जाता है। इन सब तकनीक के सामने आकर तो संसार के अर्थशास्त्र का गणित ही फ़ेल हो जाता है।

कुछ दिनों पहले भारत दौरे पर आए ओबामा आश्चर्य चकित रह गए, कम इनपुट में अधिक आउटपुट लेने की पद्धति को देख कर।

उन्होने पूछा भी कि आपके यहाँ यह चमत्कार कैसे हो जाता है? हमारे वित्त मंत्री ने कहा कि-“ये मत पूछिए कैसे होता है? लेकिन इतना बता देता हूँ कि हमारे देश में जुगाड़ से सब संभव है। अब ये भी मत पूछना कि जुगाड़ क्या होता है?

यह हमारे देश का कोका कोला की तरह का टॉप सीक्रेट फ़ार्मुला है, जो किसी को भी बताया या हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता।“

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

चुटैयानंद जी का प्रज्ञावतरण: व्यंग्य

अरबी नाम से ही लगता है कि अरब जगत का प्रोडक्ट होगा। इसकी सब्जी बड़ी स्वादिष्ट बनती है। स्थानीय भाषा में इसे कोचई कहते हैं। जैसे जिमिकंद को काटने से हाथों से में खुजलाहट और  बिना पकाए खाने से मुंह में खुजलाहट होती है उसी प्रकार कोचई का भी हाल है।

अब कोचई में बिना दही-मही डाले सब्जी बना लिए तो समझो दिन भर जय जय कार करनी पड़ेगी। क्योंकि मुंह खुजाएगा और खुजली मिटाने के लिए कुछ न कुछ बोलना ही पड़ेगा और बोलने के लिए विषय न मिले तो बाबा और बीबी की जय जयकार ही सही।

कुछ लोगों के मुंह में जन्म जात खुजली के जरासीम होते हैं। उनका मुंह रुकता ही नहीं है। चाहे उसमें पैरा(धान का तूड़ा) ही घुसेड़ दो। बिना बोले मानेगें नहीं।

कई लोगों में यह बीमारी प्रज्ञा अवतरण के पश्चात आती है। प्रज्ञा अवतरण संस्कार याने (मुंडन कराने एवं कान फ़ूंका कर गुरु बनाने) के बाद आता है। इसके पश्चात प्रज्ञा जागने की सौ प्रतिशत गारंटी होती है।

जिसकी प्रज्ञा न जागे समझो वह साधना नहीं करता है और गुरु के आदेश का पालन नहीं करता है। निम्न कोटि का चेला है। अब उच्च कोटि का पट्ट चेला बनने के लिए कुछ तो उद्यम करना ही पड़ेगा। बात यूँ हुई कि चंडालानंद ओभरसियर के अंतर में खलबली मच रही थी।

उन्हे ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या दिखने लगा था। एक दिन किसी ने सलाह दे दी कि डामर, गिट्टी बहुत खा लिए अब कुछ धर्म का काम भी कर लो। पाप को पचाने के लिए सत्कर्म का चुरण भी होना चाहिए।

सलाह उन्हे जंच गयी, हरिद्वार जाकर मुंड मुंडाए और कान फ़ुंकाए, धर्म-ध्वजा के संवाहक हो गए। गुरु धारण करते ही नाम चुटैयानंद बदल लिए, सबसे पहले हमारे पास ही पहुंचे और वहाँ की सब कहानी बताए।

कहने लगे महाराज-“कुछ सत्कर्म तो करना ही चाहिए। माटी का चोला है क्या साथ लेकर जाना है। सब यहीं रह जाएगा।“ उनके अंतर में वैराग भाव जागृत हो गया। दिन भर लोगों के पास घूम-घूम कर धर्म प्रचार करते रहे।

कुछ दिनों के पश्चात इन्हे चेले चपाटी भी मिल गए। चेले भी एक से एक, सारे मिल कर ज्ञान बांटने लगे। मतलब यह हुआ कि सभी ने कोचई (अरबी) का स्वाद ले लिया। दिन रात मुंह खुजाता था इनका और ये 24X7 चैनल बन कर लोगों का दिमाग चाटते थे।

अगर कहीं इन्हे माईक मिल गया तो फ़िर क्या पूछने! धुंआधार प्रज्ञा प्रसाद वितरण शुरु हो जाता था। एक बार की बात है, इनके चेले ने पास के गाँव में प्रवचन कार्यक्रम का आयोजित कर लिया।

रात को 9 बजे हमारे पास आए और बोले –“महाराज आपको इस कार्यक्रम में चलना ही पड़ेगा। गाँव वालों ने आपको विशेष निमंत्रण दिया है। वे आपको सुनना चाहते हैं।“ मैने रात होने के कारण मना कर दिया। वे माने ही नहीं, उनके हठ करने पर मुझे जाना ही पड़ा।

जब गाँव में पहुंच कर देखा तो सुंदर मंच बना हुआ था। माईक और लाईट की शानदार व्यवस्था थी। चार-पांच चेले तैनात थे। श्रोताओं का इंतजार हो रहा था। बार-बार घोषणा होने के बाद भी श्रोता श्रद्धालु नहीं आ रहे थे।

उन्होने मुझसे कहा कि-“महाराज आप चालु करो, आपको सुन कर लोग आ जाएगें।“ मैं तो आपका मान रखने के लिए आ गया था, मेरा मन नहीं है प्रवचन करने का, आप ही करें।–मैने कहा।

उन्हे तो मन चाही मुराद मिल गयी। रात 11 बजे से जो शुरु हुए संस्कार ज्ञान बांटने के लिए तो भोर के चार बज गए। कुछ मिला कर छ: मनुष्य और 14 कुत्ते मिला कर 20 प्राणी उनका प्रवचन सुन कर निहाल होते रहे।

वे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अंत में मुझे ही उन्हे जाकर संदेश देना पड़ा कि –“ स्वामी जी, अब प्रवचन को विराम दीजिए, सारे गांव वाले घर से ही श्रवण कर कृतार्थ हो गए हैं और हम भी यहाँ बैठे बैठे  धन्य हो गए।

आपको धन्यवाद देते हैं कि आपने हमारा ज्ञानरंजन किया। रही बात इन 14 कुत्तों की तो ये आपके प्रवचन के प्रभाव से जब अगले जन्म में मनुष्य योनि में जन्म लेगें तो, आपको अवश्य ही धन्यवाद देने आएगें।

तब कहीं जाकर बड़ी मुस्किल से उन्होने माईक छोड़ा। एक ऊंघ रहे चेले ने आभार प्रदर्शन किया। चुटैयानंद बोले-“बड़ा मजा आ रहा था प्रवचन में महाराज आपने बीच में ही समापन करवा दिया।“ अब हम क्या कहते निरत्तुर थे, बेशरम की झाड़ियाँ तो दे्खी थी लेकिन बेशरम का महावृक्ष अभी देखा था। मैं तो एक सलाह देना चाहता हूँ कि अगर शांति से जीवन गुजर-बसर करना है तो इन कोचई(अरबी) खाने वालों से बचें। अगर नहीं बच सकते तो खुद भी कोचई खाना शुरु कर दें, कहा गया है”लोहे को लोहा ही काटता है।”

मंगलवार, 1 मार्च 2011

भूख लगे तो मोबाईल चबाओ--आम बजट

प्रनब दादा ने अपनी बाजीगरी दिखाई, 
आम बजट में कम नहीं हुई मंहगाई,
मोबाईल, प्रिंटर, गाड़ी, टीवी साबुन, 
फ़्रीज, रेशम आदि सस्ता।
दाल-भात, गैस, कपड़ा, इलाज में 
बढाई मंहगाई हालत खस्ता।
भूख लगे तो मोबाईल चबाओ।
बीमार पड़े तो घर द्वार बेचाओ, 
टीवी पर देखो रोटी के विज्ञापन
कर चुकाने वालों को प्रोत्साहन
मुन्नी बदनाम का टी वी पर देखो डांस
अगले बजट का क्या पता ले लो चांस
न चुकाने वालों को कब भेजेगें जेल।
आम आदमी का नही बजट तो फ़ेल
80 साल के होने तक करो इंतजार छूट लेने का।
इससे पहले चल दिए तो पछताओगे, 
इस बजट की छूट कैसे ले पाओगे। 
आम आदमी को चाहिए दाल रोटी, 
लेकिन बजट में हो गयी खोटी, 
गरीबों को छूट दी जाएगी नगद
सुना है 700 रुपए गैस का रेट होगा 
आम जरुरत की चीजों पर वेट होगा
मध्यमवर्ग को चाट जाएगी मंहगाई
सेठों की तिजौरी भर जाएगी भाई
मंहगाई कम कैसे होगी प्रश्न है बड़ा
जनता के सामने जिन्न बनके है खड़ा।

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

इनकम टैक्स छापा और वेवफ़ा मुर्गी : व्यंग्य

पूछ-परख दो तरह के लोगों की ही होती है, कुख्यात या विख्यात। कुख्यात होने के लिए दुष्कर्म करने पड़ते हैं, विख्यात होने के लिए सत्कर्म। जीवन भर सत्कर्म करो लेकिन कोई पूछने वाला नहीं रहता।
लेकिन एक बार किसी हवाले-घोटाले में नाम आ जाए सारा जग उससे परिचित हो जाता है। परसों की ही बात है, एक पत्थर की दूकान वाले के यहाँ इनकम टैक्स का छापा पड़ गया। जैसे ही यह खबर शहर में फ़ैली, पड़ोसी को बुखार चढ गया। 
आते ही बोला-“महाराज किरपा करो, इनकम टैक्स वालों ने बैंड बजा रखी है।“

मैने कहा-“बढिया तो हो रहा है, जिसकी इनकम नहीं उसकी कदर नहीं और तुमने कौन सी कसर छोड़ रखी है। यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ सब खदाने तुम्हारी ही हैं। करोड़ों का कारोबार चलता है।“

“प्रभु ऐसा नहीं है, जैसा आप समझते हैं। ग्राहक फ़ंसाने के लिए रोल पट्टी तो देना पड़ता है। थोड़ा बहुत क्या झूठ बोल दिया, पंगे ही गले पड़ गए।“

“मतलब जैसा तुम कहते हो वैसा नहीं है, मतलब सरासर झूठ। कंगले के कंगले। तब तो ठीक है कि तुम्हारे यहाँ इनकम टैक्स का छापा पड़ जाए।“

“मरवाओगे क्या प्रभु मुझे।“ माथे पर पसीना चुचवाते वह बोला।

“अरे भाई जिस कंगले के यहां इनकम टैक्स का छापा पड़ जाता है। उसकी मार्केट वैल्यु बढ जाती है। बाजार में जिसको कोई दो रुपए की उधारी न दे, छापे के बाद उसे करोड़ों की उधारी मिल जाती है। तुम्हे पता है कि नहीं कल्लु मल बनिए की बेटी का रिश्ता नहीं हो रहा था। उसका कोई रिश्तेदार इनकम टैक्स में अफ़सर है, उसने कल्लु मल के यहाँ छापा लगवा दिया। बस फ़िर क्या था दूसरे दिन से लड़के वालों की लैन लग गयी। इनकम टैक्स के छापे के बहुत फ़ायदे हैं।“

“यह तो आपने बहुत ज्ञान की बात बताई महाराज।”

“अरे मैं तो कब से चाह रहा हूँ कि मेरे घर पर भी कोई इनकम टैक्स की रेड मारे। जिससे मेरा भी नाम नामी-गिरामियों की लिस्ट में आ जाए। लेकिन ससुरे हमारा नाम का बोर्ड देख कर ही भाग लेते हैं। कहीं हम उनके गले ना पड़ जाएं, कौन कवि लेखक से पंगा ले?   कविता-व्यंग्य मार-मार मुंह सूजा देगा। न इधर के रहेंगे न उधर के।“

“हां! आज तक सुना नहीं किसी कवि-लेखक के यहाँ इनकम टैक्स का छापा पड़ा हो।“

“जिसका खुद का ही छापा खाना हो, उसे कौन कैसे छापेगा?

अब चचा को ही लो, हर कार्यक्रम में वे किसी ना किसी कवि,लेखक,साहित्यकार का सम्मान करते हैं। कार्यक्रम न भी हो तो अनुराग के साथ घर तक अभिनन्दन, सम्मान-पत्र भेज देते हैं, अब तक इतना सम्मान बाँट चुके हैं कि उनका ही सम्मान जाता रहा। 

परसों ही कह रहे थे- "कोई हमारा भी सम्मान कर दे, थोड़ा ही सही। कंगाल कर दिया सालों ने सम्मान ले-लेकर।"
हमने कहा-" इनकम टैक्स की रेड मरवा लें फ़िर देखे सम्मान की बरसा होने लगेगी चारों तरफ़ से।“

चचा को बात जंच गयी, उन्होने भी अपने रिश्तेदार से सम्पर्क किया। जल्द ही उनके यहाँ भी इनकम टैक्स की रेड पड़ जाए तो सम्मान गति को प्राप्त होएं। अब तो जिन्दगी में दो ही काम रह गए हैं सम्मान पाना और सम्मान करना। अब चैन नहीं है। रिश्तेदार भी ने भी सोचा कि इस कंगले के यहाँ इनकम टैक्स की रेड पड़वा दुंगा तो साला और भी अधिक अकड़ कर चलेगा। अभी तो अपने मतलब से पेट में घुसा जा रहा है। उसने भी बदला लिया। चचा के दुश्मन पड़ोसी के यहां इनकम टैक्स की रेड पड़वा दी।

पड़ोसी के यहाँ इनकम टैक्स की रेड की खबर सुनते ही चचा झनझना गए। कैसे-कैसे रिश्तेदार हैं विपत्ति के टैम काम भी नहीं आते। वो तो कल्लु मल बनिए का रिश्तेदार था जिसने उसका मार्केट में रुतबा बढा दिया। चचा के सगेवाले ने एक तीर से दो निशाने साध लिए। 

अब पड़ोसी रोज चचा को सुनाकर कहता और भीतर ही भीतर गदगद हुआ जाता –“ ऐसे पड़ोसी किसी को मत देना भगवान, मुंह में राम बगल में छूरी। शकल तो कृष्ण जैसी चिकनी चुपड़ी बना कर रखते हैं और काम कंस या दु:शासन जैसा करते हैं। अब देखो हमारे यहाँ इनकम टैक्स का छापा लगवा दिया। इनका सत्यानाश हो। ईर्ष्या में जल कर भस्म हो जाएगें हमें तो भगवान और कहीं दे देगा“

सुन कर चचा के तो बदन में आग लग जाती। अगर उनका बस चलता तो दो खून करते, पहला अपने रिश्तेदार का और दूसरा पड़ोसी। अब सुनिए मुकद्दर की बात, चचा ने मुर्गी पाल रखी थी। शुरु में तो दो चार अंडे दिए, फ़िर अंडे देने बंद कर दिए। चचा को शक हो गया कि मुर्गी अंडे कहीं दूसरी जगह जाकर देती है। गुस्से में आकर उन्होने मुर्गी को 5 दिन दबड़े में बंद कर दिया। मुर्गी ने अंडे नहीं दिए। चचा ने थक हार कर स्वीकार कर लिया कि यह मुर्गी अंडे नहीं देती। दो दिनों बाद हम उनके पड़ोसी के यहाँ दोपहर में पहुंचे। देखा कि एक मुर्गी सरपट आकर कुर्सी के उपर से टेबल की खुली दराज में घुस गयी।

मैने कहा -"मुर्गी दराज में घुस गयी निकालो उसे।"

चचा के पड़ोसी ने जवाब दिया कि- "यह चचा की मुर्गी है, अंडे मेरे यहां आकर देती है।"

 नसीब खराब हो तो अपनी मुर्गी ही अंडे पड़ोसी के यहाँ दे जाती है, इनकम टैक्स की रेड का सम्मान तो बहुत दूर की बात है। आदमी तो क्या मुर्गी भी बेवफ़ा हो जाती है।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

कल्लू मल घी वाले की बेटी और चचा गालिब

चचा की इश्कबाजी तो मशहूर है, कोतवाल साहब ने मौका देखकर बदला ले ही लिया था, लेकिन काजी की दोस्ती काम आ गयी। चचा हवालात की हवा खाने से बच गए।

कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हां, रंग लाएगी अपनी फाकामस्ती एक दिन। गालिब चचा की कर्ज की मय बहुत रंग लाई। मुफ़्त की होती तो और भी रंग लाती। क्योंकि खुद खरीदी गई मय में रंग कहाँ होता है।

सितारे नहीं झिलमिलाते, चाँद भी नजर नहीं आता। छोड़ गए बालम जरुर याद आता है। इश्क भी गजब की शै है। इसका चढा हुआ खुमार उतरता कहाँ है। ताजिन्दगी कायम रहता है। थोड़ा सा झोंका चलते ही जख्म हरे हो जाते हैं। 

ड्रायवरी करते वक्त मनभावन संगीत चलना चाहिए। चाहे एक ही गीत बार बार बज रहा हो। अब कारों में कैसेट के जमाने लद गए। एफ़ एम रेड़ियो ने कसर पूरी कर दी।

गालिब चचा के जमाने में होता तो वे क्यों जाते चंडूखाने में। अचकन की जेब में रेड़ियो रख कर मन की मुराद पूरी कर लेते। न डोम टंटा होता, न कोतवाल से साबका। कल्लु खाँ को चुगली करने का मौका नहीं मिलता। खैर, कार का रेड़ियो रेंज से बाहर होते ही सरसराने लगा। जैसे सागर किनारे लहरों की घरघराहट होती है।

अब बिना गीत के मन नहीं करता ड्राईव करने का। खोपड़ी खुजाने लगती है, जब टेप बंद हो तो गाना कौन सुनाए? हम ही गुनगुनाने लगे, लेकिन कोई वाह-वाही करे तो मजा आए गाने का। पर गर्दभगान पर कोई वाह वाही कैसे करे?

मय भी कमाल की चीज है, बस इशारा कर दो कि “साथ चलो यार फ़ुल इंतजाम है।“ फ़िर तो ऐसे लोग मिल ही जाते हैं, जो गंगा तक पहुंचाकर आ जाएं। साथ न छोड़ें रास्ते भर। थोड़ी लगी होनी चाहिए।

चचा के पास मौरिस (फ़िएट) कार थी। उन्हे काली घोड़ी पसंद थी। लेकिन कार हरियाली होनी चाहिए। दरवाजे भी उसके उल्टे खुलते थे। केरोसिन तेल से चलाते थे इसलिए उसका कोई भरोसा नहीं था कि कहाँ खड़ी हो जाए।

चचा ने इसके लिए जुगाड़ किया। घर से कार निकालते ही दो बोतल डेशबोर्ड पर ऐसे रखते कि लोगों को दिख जाए। फ़िर तो चार-पाँच निठल्ले आदमी उन्हे मिल ही जाते थे। कार में बैठते ही बोतल उन्हे पकड़ा देते और शहर की ओर चल पड़ते।

जहाँ कार खड़ी होती, वहीं एक-एक गिलास उन्हे दे देते। वे भी मस्त और चचा भी मस्त। अब चाहे उनसे धक्के लगवा कर ही कार घर पहुंचानी पड़े तो वो भी काम हो जाएगा और किरासन तेल भी बच जाएगा। बड़ी जुगत लगाते थे। कल्लु खाँ तो स्थाई सेवा देता था एक अद्धे के बदले।

टेप बंद होते ही हमने भी उन्हे गाना सुनाने के लिए कहा। उनका कहना था कि उन्हे गाना नहीं आता। हम भी चक्कर में पड़ गए। जीवन विरथा चला गया इनका। एक गीत भी इंद्रधनुष के दिखने पर इन्हे नहीं आया।

जीवन में प्रेम उमड़ा ही नहीं, श्रंगार रस से रचे बसे गीत अंतर में ही नहीं उतरे। वह प्रेम को क्या जाने, वह तो गुंगे का गुड़ है। चचा की गज़ल नहीं सही, चना जोर गरम ही सही। कुछ तो चलता रहेगा।

अजब शेख तेरी जिन्दगानी गुजरी, एक शब भी न सुहानी गुजरी। मुझे तो कुछ याद नहीं रहता। चचा कहते थे सुनाने के लिए, लेकिन याद रहे तब न सुनाऊं। एक अंतरा सुनाकर चुप रह जाता।

शादी की पार्टी में आर्केष्टा हो रहा है। लोगों की फ़रमाईश चल रही है, सोफ़े पर लातें लम्बी किए काले अंगूर के रस की चुस्कियाँ ले रहे थे।

हमने भी “तेरे नैना हैं जादू भरे, ओ गोरी तेरा नैना हैं जादू भरे” की फ़रमाईश कर दी। गायक ने गाया भी उम्दा। डूब गए जादू भरे नयनों में।

सहसा देशी घी की खुश्बू तंद्रा से बाहर ले आई। इस मंहगाई के जमाने में देशी घी। कनखियों से देखा तो कल्लू मल घी वाले की बेटी मंहगाई टहलते हुए आ रही थी। लग रहा था कोई रोड़ रोलर आ रहा है घी के फ़व्वारे उड़ाते हुए।

पी.डी.एस का सारा माल ही जैसे उदरस्थ कर लिया हो, पहले तो ऐसी नहीं थी। सुंदर कमसिन काया का क्या हाल कर लिया। इतर की खुश्बू से दूर से ही पता चल जाता था कि कल्लु मल घी वाले की बेटी आ रही है।

अब तो कोई भी सेंट इतर का इस्तेमाल कर लेता है, समाज में बदलाव आ रहा है, अमीरी का रौब-दाब दिखाने के लिए घी की खुश्बू से उम्दा रास्ता कोई नहीं।

चचा भी दीदे फ़ाड़े ताक रहे थे, उनके जन्नत-ए-उलफ़िरदौस इतर के खुश्बू की देशी घी ने खाट खड़ी कर दी। वे कभी अपनी अचकन तो कभी रोड़रोलर को देखते हैं।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

बसंत पंचमी के अवसर पर काव्य गोष्ठी

संतोषी नगर में बसंत पंचमी के अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। सरस्वती पूजन के पश्चात कार्यक्रम संचालन का भार श्री शिवराम शर्मा को सौंपा गया और कवि गोष्ठी प्रारंभ हो गयी।

इस कवि गोष्ठी में दुर्भाग्य से मैंने ही 40 बसंत देखे थे बाकी सभी 60 से अधिक बसंत देख चुके थे। कहने का मतलब यह है कि काव्य रचना के मामले में मेरा अनुभव कम था।

सभी उपस्थित कवियों ने अपनी-अपनी रचना का पाठ किया। जो धूरंधर थे उन्होने चौके छक्के लगाए एवं श्रोताओं के छक्के छुड़ाए एवं हमारे जैसे रंगरुटों ने एक्का दुआ से ही काम चलाया। लेकिन आऊट नहीं हुए क्रीज पर ड्टे ही रहे।

संतोषी नगर की काव्य गोष्ठी में मुझे पहली बार शामिल होने का अवसर मिला। सभी के पास अपनी-अपनी डायरी थी।

मेरे पास डायरी न होने के कारण मुझे लैपटॉप से काम चलाना पड़ा। बसंत का मौसम हो और गीत कविताओं में मौसम का असर न दिखे, यह नहीं हो सकता।

कुछ सुंदर गीत श्री शीतलाबख्श सिंह द्वारा प्रस्तुत किए गए। शिवराम शर्मा , सत्यप्रकाश चौबे , रिछारिया, राममूरत शुक्ला, कैलाश तिवारी, नंदलाल यादव जी ने काव्य के माध्यम से साक्षात ॠतुराज को ही धरती पर उतार दिया। गोष्ठी श्री शीतलाबख्श सिंह के प्रांगण में हुई।

इस अवसर पर सुधि श्रोताओं के साथ गणमान्य अश्विनी कुमार तिवारी, दशरथ शूक्ला, श्रीकांत दुबे, नरेश मिश्रा, अरविंद सिंह, एस बी सिंह, डॉ नरेन्द्र बहादुर सिंह उपस्थित थे।

नंदलाल यादव ने छत्तीसगढी में सुंदर गीत सुनाया। हमने भी एक गीत और दो कविताएं सुनाई। इस आयोजन का बैम बजर पे लाइव टेलीकास्ट किया गया था।

जिससे कई प्रदेशों में इस काव्य गोष्ठी के लाईव प्रसारण का आनंद लिया गया। साऊंड सेटिंग नहीं होने के कारण आवाज में कट रही थी। गोष्ठी के आयोजक साधूवाद के पात्र हैं। कवि गोष्टी के कुछ गीतों की रिकार्डिंग इसमें लगा रहा हूँ। आप उसे सुन सकते हैं।


मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

संकल्प शक्ति - राम सजीवन और पुस्तक मेला

किताबें मनुष्य सच्ची और अच्छी जीवंत साथी होती हैं। किताबों से प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में लाने से सामाजिक जीवन में लाभ मिलता है। जब मनुष्य ने ज्ञान को सहेजना प्रारंभ करने की दिशा में पहल की होगी तभी पहली किताब का जन्म हुआ होगा।

सहेजा हुआ ज्ञान आने वाली पीढी का मार्गदर्शक बने,इसके पीछे यही सोच रही होगी। श्रुति परम्परा से ज्ञान को संरक्षित करने में हमारे पूर्वजों का कोई सानी नहीं था।

आतताईयों के आक्रमण में विशाल ग्रंथालय नष्ट हो गए, लेकिन श्रुति परम्परा से कुल में संरक्षित वाचिक ज्ञान कायम रहा। पश्चात श्रुति ज्ञान को किताबों का रुप दिया गया। जो आज तक प्रचलित है।

साहित्य का तात्पर्य है कि “वह ज्ञान जिसमें समाज हित निहित हो।“ मनुष्य के हित में समाज को नए विचार देने में साहित्य की महती भूमिका रही है।

वेदों के मंत्र दृष्टा ॠषियों से लेकर कवि, लेखक, आलोचक आदि ने श्रम पूर्वक अपनी श्रेष्ठ कृतियाँ समाज को दी। इसी कड़ी में शांतिकुंज हरिद्वार एवं गायत्री परिवार के अधिष्ठाता आचार्य श्रीराम शर्मा ने भी समाजोपयोगी वैदिक साहित्य का संकलन किया और उसे नए कलेवर में समाज के समक्ष प्रस्तुत किया।

कहते हैं उन्होने अपने जीवन काल में 3200 छोटी बड़ी पुस्तकों की रचना की। कुछ मैनें भी पढी हैं। इस पुस्तकों ने सर्व साधारण के लिए ज्ञान प्राप्ति का मार्ग खोल दिया।

विगत 11 फ़रवरी को अभनपुर के गायत्री परिवार सत्संग परिसर में पुस्तक मेले का आयोजन किया गया है। जिसे नगरवासियों का अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है।

पुस्तक मेले के अवलोकन के लिए समाज के सभी वर्गों के लोग आ रहे हैं तथा अपनी पसंद के अनुसार किताबें क्रय कर रहे हैं।

इस पुस्तक मेले में शांति कुंज हरिद्वार से आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा रचित सभी 3200 पुस्तकों को प्रदर्शित किया है। शायद ही ऐसा कोई विषय हो जिससे संबंधित पुस्तक यहाँ उपलब्ध न हो।

आर्षग्रंथ, गायत्री विद्या, कथा एवं पुराण, गीत एवं संगीत, स्वास्थ्य एवं औषधि, शिक्षा एवं स्वावलंबन  व्यसन मुक्ति, पर्यावरण, नारी जागरण, व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण, आत्मचिंतन,  भारतीय संस्कृति धर्म एवं दर्शन, महापुरुषों के प्रेरक जीवन वृत्तांत, विद्यार्थियों के लिए उपयोगी साहित्य एवं ज्योतिष विज्ञान आदि से संबंधित पुस्तकें विक्रय के लिए उपलब्ध हैं।

नगर में गायत्री परिवार की स्थापना तो 80 के दशक में हो चुकी थी। वर्षादि में एकाध बार यज्ञ हुआ करते थे। उसके पश्चात मिशन का प्रचार कार्य सिर्फ़ अखंडज्योति के सदस्य बनाने तक सिमट गया।

90 के दशक तक यही चलते रहा। फ़िर एक व्यक्ति ने गायत्री परिवार की दीक्षा ली और उसने प्रचार अभियान प्रारंभ किया। 24 घंटे समाज सुधार एवं समाज कल्याण का ही चिंतन करते थे साथ ही परिवार में नए परिजन जोड़ते थे।

शीघ्र ही उनका प्रयास रंग लाया। एक जगह गायत्री मंदिर की स्थापना हुई। लोगों को जुड़ने के लिए एक नियत स्थान मिल गया। इससे युग निर्माण का कार्य सुचारु रुप से प्रारंभ हुआ। समाज के सभी तबकों के लोग जुड़ने लगे। मंदिर में नित्य हवन पूजन प्रारंभ हुआ। नित्यता ही सफ़लता का कारक होती है। इसके लिए दृढ संकल्प आवश्यक है।

संकल्प के धनी इस व्यक्ति का नाम राम सजीवन चौरसिया है। हम भी पहले इनसे मजाक करते थे कि-"क्या यार पागल हो गए हो और कोई काम नहीं है क्या? दिन रात इसी बक-बक में लगे रहते हो।" लेकिन इस तरह के तानों से विचलित नहीं हुए। एकनिष्ठ होकर गायत्री मिशन के कार्य में लगे रहे। प्रारंभ की आर्थिक कठिनाईयों में अपना वेतन भी इन्होनें मिशन कार्य में लगाते रहे। घर-परिवार, नौकरी के साथ जीवन की जीजीविषाओं से जूझते हुए गायत्री मिशन के कार्य को गति देते रहे।

प्रज्ञा पुत्र-श्री देवलाल साहू एवं श्री राम सजीवन चौरसिया
एक दिन मुझसे कहने लगे कि नगर में कोई सार्वजनिक संत्संग हॉल नहीं है। इसकी कमी नगर में महसूस की जा रही है। मैने भी सहमति जताई। उस दिन से इन्होने सत्संग भवन निर्माण हेतू कार्य शुरु कर दिया।

नगर के मध्य में लगभग 22000 शासकीय भूमि का आबंटन कराया गया। इसके पश्चात नगर वासियों से सम्पर्क किया गया। किसी ने निर्माण सामग्री दी तो किसी ने नगद धन राशि।

उसके पश्चात 3000 वर्गफ़ुट में हॉल का निर्माण हो गया, जिसमें 50 लाख रुपए जन सहयोग से खर्च हुए हैं, इसके साथ ही यज्ञशाला का निर्माण हो रहा है। सम्पूर्ण योजना का बजट लगभग 2 करोड़ रुपए का है।

प्रारंभ में लगता था कि इतना रुपया कहाँ से आएगा? लेकिन साथी मिलते गए और कारवाँ बढता गया। कहा जाता है कि संकल्प में बल होता है। कभी कभी मैं मजाक में कह देता था कि “सुबह से झोला उठाकर मांगने निकल पड़ते हो।“ तो ये हँस कर कहते थे कि – 

मांगन से मरनो भलो,मांगु तन के काज।
परमारथ के कारने आवे न मोहे लाज ॥ 

अब इसी सत्संग परिसर में पुस्तक मेला सजा हुआ है। लोग पुस्तक मेले का लाभ उठा रहे हैं। यह पुस्तक मेला 20 फ़रवरी तक चलेगा। जिससे अंचल के पाठक और विद्यार्थी लाभान्वित होगें। आज इनके साथ अनुशासन बद्ध कार्यकर्ताओं की फ़ौज खड़ी है।

जो निरंतर अर्थ दान के साथ समय दान भी कर रही है। मैं राम सजीवन चौरसिया को हृदय से धन्यवाद देता हूँ तथा मिशन की सफ़लता की कामना करता हूँ।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

कागभुसुंडी ज्योतिषी--वेलेन्टाईन डे--समाज सुधारक

वाह! वेलेन्टाईन बाबा, जब तुम आए हो हमारे देश में निठल्लों को काम मिल गया है। जो दिन भर बैठ कर ताश पीटते थे वे भी सजग हो गए हैं। छोकरे-छोकरी से लेकर डोकरे-डोकरी तक काम में लग गए हैं।

दोनो एक दूसरे पर निगाह रखे हुए हैं। किसका फ़ेंका हुआ गुलाब, किसके आंगन में गिरता है और मामला कोट कचहरी तक पहुंचता है यह तो वक्त ही बताएगा। बाग-बगीचों में अदृश्य कैमरे फ़िट हो चुके हैं।  

जाओ बेटा कहाँ तक जाते हो? फ़ूलों एवं टेडी बियर की दुकानें सज चुकी हैं। पुलिसिए भी अपने डंडे को तेल पिला कर तैयार हैं।

जनता हवलदार ने नयी नकोर चालान बुक निकाल ली है। कहीं हत्थे मत चढ जाना, बिना चालान के ही अंदर का रास्ता दिखा देगा। उसे पिछला वेलेन्टाईन याद है, जब कप्तान साहब ने फ़ीत उतारने की धमकी पिलाई थी।

शाम को कुछ निठल्ले समाज चिंतकों ने घेर लिया। गाहे-बगाहे टैम खराब करने चले आते हैं। इन्हे समाज सुधारने की घोर चिंता है। रोज कोई न कोई टापिक छेड़ ही देते हैं और खुद ही उसमें उलझ जाते हैं।

चौबे जी कहने लगे “इस वेलेन्टाईन ने तो सत्यानाश कर दिया। जो हरकतें खुले आम हो रही हैं, उससे तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। भारतीय संस्कृति का ह्रास हो रहा है। हमें यूँ ही हाथ पर हाथ धरे खाली नहीं बैठना चाहिए, कुछ करना चाहिए।“

“क्या करना चाहिए?”

“अरे! गाँव मोहल्ले में घर-घर जाकर युवाओं को समझाना चाहिए, इस विदेशी त्यौहार के फ़ेर में मत पड़ो। हमारी संस्कृति पर खतरा है। समझाने से कुछ लोगों में तो जागृति आएगी।“

“हां! आपका कहना तो सही है चौबे जी। तनि ये भी सोचिए, हमारी संस्कृति पर तोप, गोला, बारुद से हमला होते रहा है सदियों। तब तो नष्ट नहीं हुई। क्या त्यौहार मनाने से संस्कृति का नाश हो जाएगा।“-बालु बाबा गंभीरता ओढे हुए बोले।

“अरे भाई बसंत उत्सव मनाओ, फ़ाग गाओ, डफ़ और नंगाड़े बजाओ, नफ़ेरी तुनतुनाओ। किसने मना किया है? पर वेलेन्टाईन जैसे उल्टे काम तो छोड़ो।“

“वाह! क्या उम्दा रास्ता ढूंढा है आपने। जब आप फ़ाग में गाते हो “खिड़की से यार को बुलाए रेSSS। तो संस्कृति कायम रहती है?”

“अरे हमारा मुंह मत खुलवाओ?  बात निकरेगी तो बहुत दूर तक जाएगी। पिछले वेलेन्टाईन में हम तुम्हारे लड़के को घर में चौका बर्तन करने वाली फ़ूलमतिया के साथ फ़टफ़टिया पर नहीं पकड़े थे क्या? बड़े संस्कार और संस्कृति के पहरुवा बने हो”

“देखो! प्रवचन देना आसान है, लेकिन उस पर अमल करना बहुत मुस्किल। आपै खारी खात है बेचत फ़िरै कपूर। गए साल रामखिलावन के खेत में तुम्हारी छोकरी को सबने नहीं देखा था क्या? चोट्टे पंसारी के लड़के के साथ।

बात कहाँ समाज सुधारने की हो रही थी और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच गयी।  एक दूसरे की पोल खोलने लगे, धोती खींचने लगे, वाद, विवाद में बदलने लगा तो मुझे ही हस्तक्षेप करना पड़ा। नहीं तो इनका बेलनटाईन अभी ही मनने लगता।

“जाईए आप लोग बहुत देर हो गयी, घर पर प्रतीक्षा हो रही है। अपना-अपना घर संभालिए। समाज सुधारने की चिंता समाज पर ही छोड़ दीजिए। बेमतलब लट्ठम लट्ठा होने से कोई फ़ायदा नहीं है। वेलेन्टाईन मनाईए, प्रेम से रहिए।“

इधर वेलेन्टाईन डे की आहट सुनकर परदेशी राम के कान खड़े हो जाते हैं। हर बरस 14 तारीख को दिल से गुलाब लगाए, बगीचों, मॉल, वी आई पी रोड़ पर चक्कर लगाते रहते हैं।

कोई तो, कहीं तो मिलेगी दिलरुबा। साल भर सपने देखने के बाद 14 फ़रवरी को सपनों के हकीकत में बदलने का दिन आ जाता है। लेकिन पुलिस के डंडे और हिन्दुवादी संगठनों के अंडे ख्याल आते ही सार फ़ितूर उतर जाता है। पिछले साल पिछवाड़े में पड़े डंडों का दर्द आज तक है।

हिम्मते मर्दां मददे खुदा। अगर ईश्क की राह में दो चार डंडे और अंडे खा लिए तो क्या हुआ। कौन सी शर्म की बात है? शर्म तो आनी-जानी चीज है, बंदा ढीठ होना चाहिए।

हुआ यूँ कि पार्क में परदेशी राम को बैठे बहुत देर हो गयी थी, कोई अकेला आयटम नजर नहीं आ रहा था। सभी बुक थे, अब किसकी ओर दोस्ती का गुलाब बढाएं?

बैठे-बैठे थाह ले रहे थे। दो घंटे बुरबक जैसे बैठने के बाद इन्होने दुसरी जगह जाने की ठानी। जैसे ही बेंच से उठकर चलने लगे तो आवाज आई “परदेशी परदेशी जाना नहीं, मुझे छोड़ के, मुझे छोड़ के।“ इन्होने मुड़ कर देखा तो पेन्सिल जींस टॉप में सपनों की रानी दिख ही गयी।

परदेशी की तो बांछे खिल गयी। चलो मेहनत सफ़ल हुयी। ये बोले-“ कहाँ जा रहे हैं हम। येल्लो आही गए, हैप्पी वेलन्टाईन डे- कहते हुए उसकी ओर गुलाब बढाया। पता नहीं उसके बाद क्या हुआ? तीन दिनों के बाद अस्पताल में ही होश आया।

बुजुर्ग कहते हैं कि इतिहास से सबक लेना चाहिए, तभी भविष्य और वर्तमान कारगर होता है। परदेशी राम ने तय कर लिया कि इस साल कागभुसुंडी ज्योतिषी से कुंडली पढवा कर जाएगें। जिससे खतरा कम हो जाएगा।

कागभुसुंडी ज्योतिषी महाराज सुबह से अपने स्थान पर पोथी पतरा लिए तैनात थे। क्योंकि वेलेन्टाईन डे पे ग्राहकों की संख्या बढ जाती है।  परदेशी राम को  जोतिस महाराज ने बता दिया की आज दक्षिणा का रेट बढ गया। सवा रुपया से काम नहीं चलेगा। परफ़ेक्ट नुश्खा चाहिए तो 251 रुपया लगेगा।  मरता क्या न करता परदेशी ने 251 रुपया महाराज के नजर किया। रुपया अंटी में धर के महाराज बल्लु को स्कूल छोड़ने गए हैं।

परदेशी मुंह फ़ाड़े दरवाजे पर बैठा है, आए तो नुश्खा बताएं। आपके पास कोई नुश्खा हो तो परदेशी की सहायता करें और वेलेन्टाईन का पुण्य लाभ अर्जित करें।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

डायरी के जर्द पन्नों से


बसंत का आगमन हो चुका है, पुराने जख्म फ़िर कुरेद रहा हूँ यानी की दैनन्दिनी के पन्ने पलट रहा हूँ। बांच रहा हूँ, कुछ पुरानी यादें जिसमें तुम टुबलाकड़ी की तरह जगमगा रही हो। मेरे दिल की धड़कने भी घरघंटी सी पीस रही हैं पुराने सूखे गुलाब को इत्र बनाने के लिए। जिससे महक उठे सारा वजूद। सामने झूल रहा है छीका, जिसमें रखा है यादों का स्नेह। वह छलक रहा है धीरे-धीरे। दूर कहीं सन्नाटे को चीरती नगाड़े की आवाज में स्वर उभर रहा है गायक का, :-

पृष्ठ 47 दिनांक 2 मार्च 1969

धीरे बहो नदिया धीरे बहो, धीरे बहो
धीरे बहो नदिया धीरे बहो
राधा जी उतरैं पार
नदिया धीरे बहो


काहेन के तोरे नाव-नउलिया काहेन के पतवार
कौन है तोरे नाव खिवैया कौने उतरै पार
नदिया धीरे बहो


अगर-चंदन के नाव-नउलिया सोनेन के पतवार
कृष्णचन्द्र हैं नाव खिवैया राधा उतरै पार
नदिया धीरे बहो

धीरे बहो नदिया धीरे बहो, यौवन की रुपी नदी की तीव्रता, चपलता एवं चंचलता विध्वंसक होती है। उछलती-उफ़नती, पहाड़ों को काटती, वनों को चीरती, हुई बेखौफ़ अल्हड़ सी आगे बढती है। चाहे जो भी सामने आ जाए, उसे ठिकाने लगा ही देती है। लेकिन जब यौवन का ज्वार उतरता है तो चूक सामने दिख ही जाती है। इसलिए नदिया धीरे बहो, बाद पछताना ठीक नहीं है। मेरी सलाह मानो तो जरा आँखें खोल लो।

पृष्ठ 74 दिनांक 8 मार्च 1973

होली का मौसम है, मौसम न सर्द है न गर्म है। गुलाबी ठंड है बासंती रंग में रंगी हुई। कल्पना में खोया हुआ हूँ। कल्पनाओं को रचने के लिए भी समय और एकांत चाहिए। आम के तले खाट पर पड़ा हुआ आँखें बंद कर लेता हूँ। यहाँ इसलिए कि व्यवधान न हो, आँखे बंद करते ही चलचित्र प्रदर्शित होता है। कल्पनाएं तुम्हारे साथ होली खेलने को मचलती हैं। रंगों का चयन करता हूँ जिससे रंगने के बाद तुम अलग ही नजर आओ और उस पर दूजा रंग न चढे। तैयार हूँ मैं, तभी एक सन्यासी कवि का गीत गूंजने लगता है-

एक थी लड़की मेरे गाँव में चंदा उसका नाम था
वह थी कली अछूती लेकिन हर भंवरा बदनाम था।

महानदी-सी लहराती थी
जैसे उसकी चाल में
पवन हठीला ज्यों थिरका हो
नौंकाओं की पाल में

प्रश्न चिन्ह सी लचक कमर में आगे पूर्ण विराम था
वह थी वनवासिन सीता-सी बिछड़ा जिसका राम था

उसकी गागर की लहरों से
सागर भी शरमाता था
गोरी पिंडलियों को धोने
पनघट तक आ जाता था

वह नदिया थी हर प्यासे को छलना उसका काम था
वह ढाला करती थी लेकिन खाली रहता जाम था।

गीत गूंजता अमराई में
चरवाहे की तान से
छंद-पंक्ति सी वह बलखाती
आंगन में अभिराम से

उमर दिवस की घटने लगती चढ़ता आता घाम था
उसका सपना देहरी पर बेसुध करता आराम था।

वह रुकती थी हाथ जोड़ कर
मलयालिन रुक जाता था
तुलसी की मंजरियों का
बोझिल मस्तक झुक जाता था

उसके चरणों में अर्पित सूरज का नम्र प्रणाम था
स्वपनिल चिंतन में उतराता मेरा दिवस तमाम था।

उसकी खोज में बाग का पंछी
बना हुआ बनजारा है
जब से वह ससुराल गयी है
मेरा गाँव कुंवारा है

उसका प्यार लूटने वाला हर प्रयत्न नाकाम था
मुझे स्मरण दहला देता है उस अंतिम शाम का।

पड़े-पड़े यही सोचता हूँ। एक तरफ़ पढाई का मौसम और दूसरी तरफ़ बासंती होली का धमाल। गत वर्ष तो एक घर में पहुंचा रंग खेलने तो खेलावन भैया होली खेलने के डर से घर की दीवाल कूद कर बाहर भाग गए और भौजी फ़्रंट में आ गई………….।


(नोट- चंदा उसका नाम था गीत आदरणीय संत पवन दीवान जी का है)

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

जेठू राम! कुर्सी खाली मत छोड़ो यार

दिल्ली से बड़े मंत्री पधारे हुए थे। मेरे परिचित थे और मुझे भी कुछ काम था उनसे। मेरे साथ जेठू राम भी था। जिस हॉल में मंत्री जी का कार्यक्रम था वहाँ बहुत सारी कुर्सियाँ लगी थी। हमने सामने  वाली कुर्सियों पर कब्जा जमा लिया। सारी कुर्सियाँ भर चुकी थी।

कुछ लोग कुर्सियों के खाली होने पर कब्जियाने के चक्कर में ताक रहे थे। मंत्री जी के स्वागत के लिए मंच से पुकार होने लगी। हमारा नाम आने पर स्वागत करने गए।

जब वापस लौटे तो जेठू राम की कुर्सी पर किसी ने कब्जा कर लिया। जेठू ने मेरी तरफ़ देखा, वह बताना चाहता था कि उसकी कुर्सी पर कब्जा हो गया,वह मायूस हो गया । 

मैने उसे गरियाते हुए और कुर्सी कब्जाने वाले को सुनाते हुए कहा कि-“ साले कुर्सी छोड़कर जाओगे तो ताकने वाले कब्जा कर ही लेगें। लोगों ने कुर्सियों के लिए इमान धरम बेच खाया, तुम्हें क्या छोड़ेगें।

दिन में कुर्सी और रात को खटिया कभी खाली नहीं छोड़नी चाहिए, नहीं तो कब्जा होने में टैम नही लगता। राजनीति करना है तो कुर्सी कभी खाली छोड़ कर नहीं जाओ।

उस पर अपना कब्जा बना कर रखो। खुल्ली गाय और खाली कुर्सी का मालिक वही होता है जिसका कब्जा होता है। इतना सुनकर भी खद्दरधारी कुर्सी नहीं छोड़ी और मुंह फ़ेर लिया, बड़े नेता जो ठहरे। जेठू खड़ा रह गया।

कभी-कभी बस में सफ़र करते हुए भी सोचना पड़ता है कि कोई वरिष्ठ महानुभाव न मिल जाएं, नहीं तो पूरा सफ़र खड़े-खड़े ही करना पड़ेगा। दूसरी अन्य सवारियाँ भी यही सोचती होगीं।

बस में चढते ही कोई पहचान वाला दिख जाए और उसे पहचान लिए तो मुसीबत समझो। सीट छोड़नी ही पड़ेगी। इसलिए पहचान लेने की बजाए मुंह फ़ेरना ही ठीक है, जैसे की उसे देखा ही नहीं।

अब तो साधन भी मिल गया है, आँखें फ़ेर कर मुंह चुराने का। बस मोबाईल का हेड फ़ोन कानों में ठूंस कर रंगीन ऐनक लगा कर आँखें बंद करके मजे से गाना सुनिए। पहचान वाला समझ जाएगा कि सो रहा है और उसे सीट भी न देनी पड़ेगी।

जब ठिकाने पर पहुचे तो अंगड़ाई लेकर उठें जैसे नींद से जागे हो और फ़िर उसकी तरफ़ देख कर कहें कि- नमस्कार जी, क्या हाल चाल है? आगे जाएगें तो मैने सीट खाली कर दी है आपके लिए।

जो सज्जन रेल के दैनिक यात्री होते हैं, उन्हे सीट कब्जा करने एवं अपनी सीट बचाकर रखने का गजब का अनुभव होता है। राजनीति में सफ़लता की संभावना अन्य से अधिक होती है।

लोकल ट्रेन आते ही प्लेट फ़ार्म पर अपने-अपने रुमाल, तौलिए, पंछे, छाते, बोतलें, अखबार लेकर तैयार हो जाते हैं जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर लगती है, खिड़कियों से अपने सामान सरका देते हैं और निश्चिंत हो जाते हैं। अगर कोई पूछता है कि सीट खाली है क्या? तो कह देते हैं कि सवारी आ रही है।

सीट उनकी और उनके बाप की हो गयी। आराम से अपनी सीट पर टांगे फ़ैलाते हुए सफ़र का मजा लेते हैं। एक दो साथी मिलते ही ताश का खेल शुरु हो जाता है। दैनिक यात्री जो ठहरे। ट्रेन में विशेष छूट रहती है इनके लिए। आर पी एफ़ से लेकर टी टी तक सब ताबेदार रहते हैं।

मैं बिलासपुर जाने के लिए लोकल में फ़ंस गया। दरवाजे से चढने लगा तब तक कब्जाने वाले सारे हथियार सीटों पर आ चुके थे। मैं खिड़की के पास एक के रुमाल पर ही बैठ गया। अब वह अपना रुमाल ढूंढता फ़िर रहा था।

बार-बार मेरे पास आता था, लेकिन कहता कुछ नहीं था। जब उसने तीसरा फ़ेरा लगाया तो मैने उससे कहा कि- क्यों मित्र क्या ढूंढ रहे हो?

उसने कहा कि- मैने यहाँ पर कहीं अपना रुमाल रखा था।, मैने रुमाल दिखाते हुए कहा कि-‘ यह तो नहीं है? उसने अपना रुमाल पहचान कर ले लिया। तो उसने मुझे धौंस जमाई कि सीट उसकी है।

मैने कहा कि- यूँ अपना सामान लावरिस छोड़ना ठीक नहीं है। कोई ले जाता तो। एक तो तुम्हारा रुमाल ईमानदारी से लौटा रहा हूँ और मुझे ही धौंस दे रहे हो। अगले स्टेशन में सीट खाली होगी वहाँ बैठ जाना। तब तक खैनी खाओ।

सीट और कुर्सी का लफ़ड़ा जमीन पर ही नहीं आसमान में भी है। मुझे चीलगाड़ी से कहीं जाना होता है तो खिड़की वाली कुर्सी की ही मांग करता हूँ और ईश कृपा से मिल भी जाती है।

एक बार रायपुर से दिल्ली के लिए चढे, अपनी कुर्सी संभाले ही थे कि पड़ोसी ने खिड़की के पास बैठने की मंशा जाहिर की। उन्हे समझाया कि मुझे खिड़की वाली सीट ही लेनी थी इसलिए आधे घंटे पहले बोर्डिंग किया।

उसने अपनी मजबूरी बताई कि- खैनी खाने के बाद थूकना पड़ता है। इसलिए खिड़की वाली सीट चाहिए। मैं समझ गया कोई नया-नया कलफ़ चढा है, ट्रेन-बस की सवारी फ़्लाईट में आ गयी। 

मैने अपनी जेब से खैनी की डिबिया निकाल कर दिखाई, और कहा कि हम भी गंवईहा है भाई, तुम्हारे से पहले जहाज चढ लिए, इसलिए अपना  देहाती जुगाड़ फ़िट  कर लिए। प्लेन में खिड़की खुलती ही नहीं है दादा, कहाँ थूकोगे?

उसने कहा कि आप कहाँ थुकते हैं? मैने कहा कि इसके लिए सामने कुर्सी में एक थैली है। जिसे अंग्रेजी में वोमैटिंग बैग कहते हैं, थूकने के लिए इसका ही इस्तेमाल करता हूँ। आप भी करिए और मजे से मौज लीजिए,

क्या बताएं? नेता से कुर्सी बचाना बड़ा मुस्किल है भैया। कुर्सी का चक्कर गजब है भाई, इसे पाना भी कठिन है तो बचाना उससे भी कठिन। 

कहते हैं कि राजा पहले रानी के पेट से पैदा होता था। सोने का सिंहासन साथ लेकर आता था। लेकिन  अब राजा पेटी के पेट से पैदा होता है और अपनी कुर्सी साथ लेकर आता है।

जनता की, जनता के द्वारा,जनता के लिए सरकार आने के बाद जिन्होने कुर्सी पकड़ी, आज तक छोड़ी ही नहीं। फ़ेविकोल लगा के चिपक गए। बिना रिनिवल के ही कुर्सी पर लदे हैं। ड्रायविंग लायसेंस के रिनिवल न होने पर जनता हवलदार चालान कर देता है।

एक्सपायरी लायसेंस से सरकार चला लेते हैं। इनका चालान कौन करे? हर छोटी कुर्सी बड़ी कुर्सी के नीचे, बड़ी कुर्सी छोटी कुर्सी के उपर है, यह सनातन परम्परा है।

कुर्सियाँ आपस में तय करती हैं किस कुर्सी पर किसे बिठाना है और किसे कुर्सी से हटाना है। कुल मिला कर कुर्सियाँ ही चलती-चलाती हैं। जमीन पर खड़े होने वाले हम लोग कमर तक झुक कर फ़र्शी सलाम ठोंकने लिए ही हैं।

सोमवार, 31 जनवरी 2011

आएगें सजना तो होगा सजना

हमारा सजना भी क्या सजना, आएगें सजना तब होगा सजना। रजनीगंधा की खुश्बू के साथ अलसाई सी सुबह हुई, खुमारी लिए हुए। चाय के प्याले की भाप में स्वर्णिम किरणें इंद्रधनुष बना रही हैं। हल्की-हल्की गुलाबी ठंड में चाय की एक चुस्की ने गर्माहट दी।

खुमारी उतरने का इंतजार कर रहा हूँ। अखबार के पन्ने पलटता हूँ, वही बरसों पुराने समाचार हैं, नए अखबार में। अखबार नया है पर समाचार वही हैं, सिर्फ़ किरदार बदले हैं।

घूस लेने का समाचार। चाणक्य के काल में भी घूस इसी तरह ली जाती थी, फ़र्क इतना है, इसे उत्कोच कहते थे। लेकिन थी घूस ही। लेने और देने वाला बदला है। बाकी समाचार वही है। सिर्फ़ नाम बदल कर कट पेस्ट करना है।

इसी तरह बाकी अन्य समाचार भी अपनी पुरानी गाथा ही कहते नजर आते हैं। नया कुछ भी नहीं है इस अखबार में।

पढते-पढते जम्हाई आने लगती है। जम्हाई भी आना तय है जब बोरियत होने लगे। सुबह-सुबह बोर होना ठीक नहीं है। अखबार पुराना है तो क्या हुआ? सूरज तो नया है, हवा तो नई है, सामने खिले हुए रजनीगंधा के फ़ूल तो नए हैं। चाय का प्याला पुराना है लेकिन चाय तो नई है, उसमें निकलती भाप भी नई है। फ़िर क्यों पुराना-पुराना की रट लगाए बैठे हो?

नए का स्वागत करो, स्वागत करने के लिए सजना संवरना भी पड़ेगा। सजना के स्वागत के लिए सजना भी जरुरी है। जब आएगें सजना तो होगा सजना। सजना नहीं आए तो क्या हुआ, पर पुरवाई जरुर चली। चाय के प्याले की भाप उड़ कर मुंह तक आने लगी, ठंड से थोड़ी राहत मिली, गर्माहट तो आई, प्रतीक्षा है खुमारी उतरने की।

रजनीगंधा की खुश्बू वजूद पर छा गयी है, वातावरण में भीनी-भीनी महक घुल कर सुबह का स्वागत कर रही है। सुबह तो हुई, रात कैसी बीती? चाय की चुस्की के साथ जरा पीछे भी पलट कर देख लो। कुछ छोड़ तो नहीं आए खुमारी में? नहीं तो, ऐसा नहीं हो सकता? आपे में था, आपे में रहना भी इतना आसान नहीं है।

कह रहे थे कि फ़िर न आऊंगा यहाँ। ओह, कुछ याद नहीं। स्लेट साफ़ हो गयी है। कुछ लिखा हुआ नहीं दिखाई देता। जब तुम कहते हो तो लगता है कि लिखा बहुत कुछ था। मिटा किसने दिया? स्वत: ही मिट गया। बुराईयाँ स्वत: नहीं मिटती। उसे तो जग जाहिर होना पड़ता है।

अच्छाई पर तो कालिख लगाई जा सकती है, पर कालिख पर कालिख कैसे लगे। चाय गले के नीचे ही नहीं उतर रही।

ओह! क्यूँ होता है यह सब? लाख मना करने पर भी न माना। हमने कैसा पैमाना बना लिया है? अच्छाई और बुराई को तोलने का। सभी के पैमाने अलहदा हैं।

वैसे भी पैमाने एक जैसे नहीं होते। देश-काल के अनुसार पैमाने तय होते हैं। हमने गढने भी सीख लिए हैं। किसी की मजबूरी किसी के तरक्की का बायस बन जाती है।

सौ बुराइयों में एक अच्छाई को मान्यता मिल जाती है। सौ अच्छाईयों में एक बुराई वैसा ही काम करती है जैसे दरिया में विष की एक बूंद।

चाय ठंडी हो गयी। भाप ही पहुंची थी मुझ तक। गर्माहट का सुखद अहसास है, रजनीगंधा की खुश्बू एवं तुम्हारी याद के मध्य।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

इश्क है दरिया प्यार का-जो डूबा सो पार

दिन ढलते ही तुम्हारी यादों का साया घेरने लगता है। मन मानता ही नहीं। बहाना यार का होता है और बह हम जाते हैं। दरिया गहरा है। कदम मानते नहीं, स्वत: बढने लगते हैं। तलाशते हैं तेरा दर मिल भी जाता है।

एक दिन वादा लिया था तुमने दर पे न आने का। फ़िर भी चला आया, वादा तोड़ कर। वैसे भी दुनिया कहती है, वादे तोड़ने के लिए होते हैं। मेरे से भी टूट गया। शर्मिन्दा हूँ, अपराध बोध के साये में डूबता उतराता हुआ।

लौ लगाई थी, उजास के लिए। तम दूर हुआ लेकिन तामस बाकी है। बाधा है मेरी राह की। प्रयास है इस राह के पत्थर को हटाने का पुरजोर। एक छोर पकड़ता हूँ तो दूसरा छूट जाता है।कभी तो दोनों छोर हाथ आएगें आशा है। निराश नहीं हूँ।

रात खिड़की से देखता हूँ बाहर अंधेरा गहरा है। किसी ने बत्तियाँ बुझा दी। झींगुरों की आवाज एक रहस्य हैं, आती कहाँ से हैं कुछ ज्ञात नहीं।

पर सुना है कि ऐसी आवाजे झींगुरों की होती हैं। कभी-कभी सोचता हूँ कि ढूंढ लूँ कुछ झींगुर, कांच कूप्यक में बंद रखुं, जब मन आए, सुनने लगुं उनका शास्त्रीय गान।

आरोह अवरोह का अच्छा अभ्यास हैं इन्हें। दीर्घ-हस्व-प्लूत स्वर में सामवेदी गान करते हैं। जैसे गुरुकुल के बटुक सस्वर पाठ कर रहे हों संध्या वेला में।

कहाँ से सीखा है झींगुरों ने यह गान? स्वत: ही प्रज्ञा जागृत हुइ होगी। डूब कर पाया होगा स्वर और आरोह अवरोह का सामुहिक अभ्यास किया होगा। डूबता हूँ मैं भी। स्वर पकड़ने को।

रात गहराती है, खिड़की खुली है। पारिजात फ़ूलों की खुश्बू का एक झोंका आता है,  गुंजने लगता है “बहुत कठिन है डगर पनघट की”। गला सूखता है और पनघट की याद आती है।

उनींदे बेसुध कदमों से पनघट की ओर चलता हूँ। सामने अंधेरा और पनघट का न मालूम रास्ता। पहुचे कैसे पनघट तक? पनघट को पता है कोई प्यासा राहगीर तलाश में है उसकी।

सहसा पायल की ध्वनि सुनाई देती है। जैसे कहीं रश्क हो रहा हो, दूर कहीं मृदंग की ताल पर रक्काशा थिरक रही हो। चांदी की घंटियाँ मृदंग की ताल पर संगत कर रही हों।

कहीं पनघट से भटकाने की चाल तो नहीं है किसी की। पथिक प्यासा रह जाए। बस एक बार पनघट तक पहुंचना है। दूबारा शर्मिन्दा नहीं होना चाहता पथिक। वादा तोड़ने का अपराध बोध लेकर जीयेगा कैसे?

बस बात एक रात की है, रात कट जाए तो सवेरा हो । यह रात मन बोझ बनती जा रही है। जैसे एक पहाड़ किसी ने मेरे वजूद पर पटक दिया हो।

प्याले में मय तड़फ़ती है, लबों तक आने के लिए बेताब। डूबो देना चाहता हूँ अपने को। लेकिन इस प्याले में नहीं, दरिया में, दरिया जो इंतजार कर रहा है मेरा।

पनघट तक न पहुंच पाया तो कोई बात नहीं। प्यास तो कभी बुझेगी। रात इतनी काली क्यों है? शायद यह एक इम्तिहान है। इम्तिहान कितने भी हों, पर तेरे पथ पर पथिक चलता ही रहेगा। किसी न किसी चौराहे पर मुलाकात तय है।
 

इश्क है दरिया प्यार का ,वा की उलटी धार।
जो उबरा सो डूब गया,और जो डूबा सो पार॥


गुरुवार, 20 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ी संस्कृति के दस्तावेज उपन्यास को प्रकाशन का इंतजार

इंतजार की सीमा क्या हो सकती है? जीवन पर्यंत देहावसान तक या उसके पश्चात भी? कभी-कभी इंतजार की घड़ियाँ लम्बी हो जाती हैं और अंतिम यात्रा के पश्चात भी चलते रहती हैं। ऐसा ही कुछ एक उपन्यास के साथ हुआ।

इस उपन्यास को मैने पढा। छत्तीसगढ अंचल की संस्कृति की अमिट छाप है इसमें। छत्तीसगढ़ के जन-जीवन का प्रथम आंचलिक उपन्यास है पढते हुए लगता है कि मैं समय के उस काल खंड में पहुंच गया हूँ।

सन् 1965 में लिखे गए इस उपन्यास का नाम है “धान के देश में”। इसकी भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी ने लिखी थी। लेकिन यह उपन्यास काल की गर्त में दब गया। प्रकाशित न हो सका।

धान के देश की भूमिका में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी कहते हैं कि “हरिप्रसाद अवधिया जी की रचनाओं से मैं पहले ही परिचित हो चुका था यद्यपि मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य तब हुआ जब मैं महाकोशल में काम करता था।

उनका जन्म स्थान रायपुर है। सन् 1918 में उनका जन्म हुआ था। सत्रह वर्ष की अवस्था से ही वे कहानियाँ लिखने लगे। उनकी 'नौ पैसे' शीर्षक कहानी पहली रचना है। वह इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली 'नई कहानियाँ' नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वे आज तक बराबर लिखते जाते हैं। उनकी रचनायें 'सरस्वती', 'माधुरी', 'विशाल भारत', 'नव भारत' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में भी प्रकाशित हुई हैं। सन् 1948 में वे एम.ए. हुये और साहित्य के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अवतीर्ण हुये।

जब मैंने उनकी रचनायें पढ़ीं तब मैंने उन्हें उपन्यास लिखने के लिये कहा। सच तो यह है कि उस समय जो भी तरुण साहित्यकार मेरे पास आते थे, उन सभी को मैं उपन्यास लिखने के लिये प्रेरित करता था।

लमनहर चौहान जी ने मुझको अपना एक उपन्यास दिखलाया। उस छोटी अवस्था में भी उनका रचना-कौशल देखकर मैं विस्मित हो गया।

विश्वेन्द्र ठाकुर और परमार जी कहानियाँ लिखा करते थे। उनसे भी मैंने छत्तीसगढ़ के जन-जीवन को लेकर उपन्यास लिखने का आग्रह किया। मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि अवधिया जी ने "धान के देश में" नाम देकर पहली बार उपन्यास की रचना की है।

उपन्यास रचना में उन्हें कितनी सफलता हुई है इसका निर्णय तो सुविज्ञ आलोचक और मर्मज्ञ पाठक ही करेंगे। अवधिया जी पर मेरा विशेष स्नेह है। अपने स्नेह पात्रों की रचनाओं में हम लोग गुण-दोष की विवेचना नहीं करते।

मैं तो यही कहूँगा कि उनकी इस प्रथम कृति से मुझे असन्तोष नहीं हुआ है। मुझे यह आशा भी है कि जब वे अन्य उपन्यास लिखेंगे तो उन्हें उत्तरात्तर अधिक से अधिक सफलता प्राप्त होगी।“

एक अर्ध शताब्दी भी बीत गयी लेकिन “धान के देश में” की सुध लेने कोई नहीं आया। सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले चापलूस लेखकों ने शासकीय अनुदान से अपनी घटिया से घटिया रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करवा लिया।

लेकिन जो इस दुनिया से चला गया है उसकी सुध कौन ले? धान के देश में नामक उपन्यास अपने प्रकाशन की बाट आज भी जोह रहा है। इकबाल का एक शेर याद आता है मुझे-

हजारों साल से नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
बड़ी मुस्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

मेरे धान के देश में उपन्यास का जिक्र करने का कारण यही है कि कोई संस्था व्यक्ति या शासन अगर इस महत्वपूर्ण उपन्यास को प्रकाशित करना चाहता है तो उसे इसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध कराई जा सकती है।

जिससे यह उपन्यास अपने काल खंड की अंधेरी कोठरियों से निकल कर प्रकाशित हो और उपन्यासकार स्व: हरिप्रसाद अवधिया जी का उपन्यास प्रकाशन का इंतजार मरणोपरांत समाप्त हो सकें।

बुधवार, 19 जनवरी 2011

पैमाना लबालब न भरा हो तो कैसी तृप्ति?

“मन लागो मेरो यार फ़कीरी में” – फ़कीरी का आनंद अलमस्ती में है। शाम के धुंधलके में एक-एक कर प्रकाशित होती दीप मालिकाएं तम हरण की भरपूर कोशिश में है।

कार में बजता हुआ स्टिरियो ले जा रहा है मुझे फ़कीरी की ओर। शब्द–शब्द अंतर पर चोट कर रहे हैं। बस मैं हूँ और तू है। दूसरा कोई नहीं।

कबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। बाहर जो बज रहा है वह अनहद बन कर अंतर में भी बज उठा होगा। अंतर भी बज उठा होगा। अनहद नाद के साथ हजारों दीपों का सूर्य सा प्रकाश अंतर को आलोकित कर गया होगा। कुछ ऐसी ही अनुभूति होने लगी। 

तेरे साथ बिताए कुछ पलों का स्मरण आते ही। गर्दन पर झुरझुरी होने लगती है। एक थरथराहट के साथ गर्दन को झटकाता हूँ। सामने से आती वाहनों की हेड लाईटें सुहाती नहीं हैं। जैसे पार्क के किसी कोने में बैठे होने पर जनता हवलदार डंडा हाथ में लिए आते दिखाई देता है।

ध्यान भंग होने लगता है। आनंद के सागर में गोते लगाते हुए एक कड़ुवाहट सी मुंह में आ जाती है। इन वाहनों में हेड लाईटें क्यों हैं? बिना लाईट के वाहन क्यों नहीं चलते? क्यों न मैं अपनी कार की हेड लाईटें बंद कर लूँ?

अंधेरा सुहाना लगता है तो कभी डरावना भी। किसी से टक्कर हो सकती है? लेकिन लाईटें क्यों बंद हों? वे तो अंधेरे के विरुद्ध लड़ाई में सैनिक सी डटी हैं। अंधेरा दूर करने का संकल्प जो किया है।

बाहरी दुनिया को देखने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। हम अंधेरे में भी देखना चाहते हैं प्रकृति के विरुद्ध। अंधेरा होना भी आवश्यक है। अंधेरा न होगा तो प्रकाश का मोल कौन समझेगा?

दु:ख न होगा तो आनंद उत्सव का मोल कौन समझेगा? अंधेरे की दुनिया भी अलग ही है। जो प्रकाश में नहीं मिल पाता वो अंधेरे में मिल जाता है।

खुली आँखें होते हुए भी हम देख नहीं पाते। जब आँखें बंद करते हैं तो सब कुछ दिख जाता है। एक चलचित्र सा चलता हुआ। भूत-भविष्य और वर्तमान। जहाँ खुली आँखों से पहुंचना संभव नहीं। वहाँ हम बंद आँखों से घूम आते हैं। कितना विस्मयकारी है। बंद आँखों से देखना।

प्रकृति के विरुद्ध भी हम चलना चाहते हैं। हमारी फ़ितरत है यह। हम अपने आपको सर्वशक्तिमान समझते हैं। हमारी मेधा के आगे सब बौने हैं। लेकिन कभी उस ओर भी झांकने की कोशिश की?

जहाँ से मेधा आई है। नहीं, गदह पचीसी से अवकाश मिले तब न। प्रकृति से बड़ा कोई नहीं। उसे हमारी छेड़ छाड़ पसंद नहीं है। हम अपने कबीले का कानून बना लेते हैं और उसके सहारे दुनिया को चलाने की कोशिश करते हैं।

 बस यहीं मुंह की खा जाते हैं। जिस सर्वशक्तिमान प्रकृति के कानूनों के आगे किसी भी कबीले का कानून नहीं चलता। वह बौना है इसके सामने। आनंद में यही बाधा है, हम प्रकृति को अपने अनुरुप चलाना चाहते हैं।

शाम ढलने लगती है। सोचता हूँ कि वह बाट देख रही होगी।  आज न मिलुं तो कैसा रहेगा? कल ही तो मिला था। प्रतिदिन की मुलाकातें आनंद में बाधा है।

व्यग्रता न हो मिलन की, अधीरता न हो, तो कैसा प्रेमानंद? बाट तो देखना ही है। पैमाना लबालब न भरा हो तो कैसी मयकशी? कैसी तृप्ति?

सुरुर का अहसास रग रग में समाने लगा। रोम-रोम पुलकित होने लगा । आनंद का सागर हिलोरें लेता है। मांझी की नाव अंधेरे में उफ़नती हुई लहरों के बीच डूबती-उतराती पार जाना चाहती है। पार तो लगना ही है उसे एक दिन। मझधार में डूबने वालों को कौन याद रखता है?

मेड़ में छिपी बैठी फ़न फ़ैलाए काली नागिन उन्मत्त होकर लहरानी लगी। उन्मुक्त हो गयी  है अंधेरे में।कितना सौंदर्य है उसके बलखाने में? एक जोड़ी आँखे उसे ताक रही हैं। हाथ बढाते ही फ़ुफ़कार एक झपट्टा मारा उसने। मैने हाथ पीछे खींच लिया। बहुत सारा विष धरा पर फ़न मारते वमन किया उसने।

लेकिन आज मैं भी आर-पार की हद तक पहुंचना चाहता हूँ, विष को रगों में बहते हुए देखना चाहता हूँ। मेरी नजर चूकते ही, लिपट गयी वह देह से, ढेर सारा विष उसने उड़ेल दिया, मेरी रगों में बहने लगा। बेसुधी आने लगी, विषाक्त होकर भी आनंद आने लगा। विषाक्त होकर भी आनंदित होना पराकाष्ठा है।

प्रकृति ने विष दिया तो जीवनामृत भी। सूर्योदय होने लगा। क्षितिज पर लालिमा दिखाई देने  लगी। सुध आई तो नागिन बेसुध पड़ी थी। विष कोष रिक्त जो हो गया था।

मैं अपनी विषाक्त देह लिए चल पड़ा था कि फ़िर कभी नहीं आना है इस ओर। रमे रहना है फ़कीरी में, वही जीवन का शास्वत सत्य है। यही जीवन का शास्वत सत्य है। "तेरे ईश्क नचाया,करके थैया थैया"