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शुक्रवार, 1 मई 2015

सूर्यमंदिर का निर्माण : इतिहास की महान परियोजना - कलिंग यात्रा

अभी तक सूर्यमंदिर के अधिष्ठान एवं भित्तियों पर जड़ी प्रतिमाओं पर ही एक नजर डाल रहे थे। अब बारी है मंदिर निर्माण एवं उसकी संरचना की। सूर्य मंदिर निर्माण की योजना साधारण नहीं है। काल के हिसाब से तत्कालीन राज्य के विशाल एवं महत्वाकांक्षी योजना थी। इसके प्रारुप निर्माण पर ही काफ़ी वक्त लगा होगा। प्रधान शिल्पकार बिशु महाराणा ने अपने निर्माण दल के साथ महीनों विचार विमर्श किया होगा तब कहीं जाकर इस योजना का प्रारुप तैयार हुआ होगा। हमने देखा है कि मंदिर की भित्तियों का कोई भी स्थान खाली नहीं है जिस पर शिल्पकार की छेनी के निशान नहीं है। ज्यामितिय आकृतियों के साथ भित्तियों पर विषयाधारित शिल्पांकन महत्वपूर्ण है। प्रतिमाओं में राजा के परिजनों से लेकर उनकी गतिविधियों को स्थान दिया गया है। अपने प्रज्ञानुसार तो बिशु (विष्णु) महाराणा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी होगी।

अगर कल्पना दृश्यांकन करें तो निर्माण स्थल पर मेला लगा रहता होगा। बारह सौ शिल्पकार और उनके सहयोगियों तथा निर्माण सामग्री पूर्तिकर्ताओं को मिलाकर कम से कम पांच हजार की मानव संख्या कार्य में लगी होगी। निर्माण स्थल पर इनकी दिनचर्या से संबंधित सारी वस्तुएं उपलब्ध कराई गई होगीं तथा इनके भोजन के लिए विशाल भोजनालय का भी अस्थायी निर्माण किया गया होगा। शिला निर्माण योजनाबद्ध हो रहा होगा। सैकड़ों लोहार लोहे की पट्टी तैयार कर रहे होगें जिनसे शिलाओं को बांधना है। प्रधान शिल्पी एक-एक निर्माण का स्वयं निरीक्षण कर रहा होगा। राजा के कारनून निर्माण कार्य में लगने वाले धन का संग्रह कर रहे होगें। निर्माण में गजबल एवं अन्य पशुबल के लिए भी चारा जुटाया गया होगा। आखिर एक विशाल स्मारक का निर्माण हो रहा था।

सिंहद्वार की एक प्रतिमा का वजन 28 टन बताया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निर्माण में 40 एवं 50 टन के भी प्रस्तर खंडों का प्रयोग किया गया होगा। इन पत्थरों को पहाड़ से काट कर अलग करने एवं निर्माण स्थल तक लाने में श्रम के साथ धन भी पानी की तरह बहाया होगा। तेरहवी सदी वैसे भी विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी। निर्माण के लिए आधुनिक यत्रों का प्रयोग किया गया होगा। पत्थरों पर कारीगरी करने के लिए जल की आवश्यकता भी होती है। निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले जल की भी व्यवस्था की गई होगी। छेनी हथौड़ी की लयबद्ध तान निर्माण स्थल पर बरसों गुंजती रही होगी और शिल्पकारों का पसीना बह कर चंद्रभागा नदी में मिल कर समुद्र को और भी खारा कर गया होगा। 

कलिंग की अपनी विशिष्ट शैली है, जिसमें कोणीय अट्टालिका पर मंडप की तरह छतरी ढ़ंकी होती है। यह मंदिर भी  उड़ीसा के अन्य मंदिरों जैसा ही है। मुख्य गर्भ गृह की ऊंचाई 229 फ़ुट मापी गई है। गर्भ गृह के साथ नाट्यशाला 128 फ़ुट ऊंची है। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फ़ुट X 50 फ़ुट का है। यह मंदिर पुर्व एंव पश्चिम दिशा में बना है। निर्माण में प्रयुक्त प्रत्येक शिला को लोहे की पट्टियों (क्लैंप) से बांधा गया है। शिलाओं को स्थापित करने में कहीं पर भी अन्य लेपन (चूना या अन्य) का प्रयोग नहीं किया गया। मंदिर के समस्त निर्माण को योजनानुसार एक दूसरे पत्थर के साथ लौह बंधन में ही बांधा गया है। इसका उदाहरण हमें मंदिर में कई स्थानों पर मिलता है।

मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहीं दूरस्थ स्थान से लाए गए होगें। खैर अबुल फ़जल कुछ भी कहे पर मंदिर निर्माण के साथ नरसिंह देव का ही नाम जुड़ा हुआ है।. पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ 1278 ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने 1282 तक शासन किया. कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के बीच हुआ था।

इतिहास की कहानी प्रमाणों के अभाव में अनुमान पर ही गति प्राप्त करती है। इस मंदिर के निर्माण से लेकर विध्वंस तक अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। कोई भी सदा के लिए साक्षी नहीं हो सकता। एक कालखंड तक ही जीवित साक्ष्य मिल पाते हैं। कहते हैं कि मंदिर में पूजा नहीं हो सकी। यह मंदिर बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही रह गया। अगर मुख्य गर्भ गृह में प्रतिमा की स्थापना हो जाती तो पूजा भी अनिवार्य रुप से शुरु हो जाती। पूजा न होने के पीछे भी कई कहानियाँ सामने आती हैं। सर्व प्रथम तो कहा जाता है कि मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के पुत्र की मृत्यु मंदिर निर्माण के समय हो गई थी। इसे अपशुगन मान कर आगे का कार्य पूर्ण नहीं हो सका। एक अन्य किंवदन्ति कहती है कि मंदिर निर्माण के दौरान ही राजा की अकाल मृत्यु हो गई। इसलिए निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका। खैर उस काल में जो भी हुआ हो परन्तु कोणार्क के रुप में दुनिया को एक अद्भुत कृति प्राप्त हो गई। जो वर्तमान में भी विद्यमान है।

मंदिर के विध्वंस के विषय में भी कई किंवदन्तियां सुनाई देती हैं। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण में वास्तु दोष था इसलिए मंदिर में पूजा न हो सकी और कालांतर में ध्वस्त हो गया। अब तथाकथित वास्तु शास्त्रियों को भी अपना उल्लू सीधा करने का साधन मिल गया। सबसे बड़ा वास्तुकार और वास्तुशास्त्री तो बिशु महाराणा था जिसने राजा की परिकल्पना को साकार किया। इतनी बड़ी योजना पर कार्य करने वाला वास्तुकार और शिल्पकार इतना मुर्ख नहीं होगा कि उसे वास्तु ग्रंथों का ज्ञान ही न हो और राजा भी इतना मुर्ख नहीं होगा कि जो अनाड़ी व्यक्ति के हाथों में अपने जीवन की सबसे भव्य एवं महत्वपूर्ण परियोजना को किसी ऐरे गैरे के हाथों में बर्बाद करने के लिए दे दे। आज व्यक्ति छोटा सा दो कमरों का मकान बनाता है तो वह खर्च करने से पहले किसी वास्तुकार से नक्शा बनवा कर उसकी देख रेख में कार्य शुरु करता है। जारी है आगे पढ़े…

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

मल्हार: देऊर मंदिर


प्राचीन नगर की सैर करते हुए सूरज सिर पर चढने लगा था। हमें अभी देऊर मंदिर देखना था। यहीं से एक रास्ता कसडोल एवँ गिरोदपुरी होते हुए रायपुर को जाता है। देऊर मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचने पर मन प्रसन्न हो गया। देऊर मंदिर की भग्न संरचना देखने से ही पता चलता है कि यह मंदिर विशाल रहा होगा।। इसका अधिष्ठान भूतल पर ही है। गर्भ गृह द्वार पर नदी देवियों की सुंदर प्रतिमाएँ हैं। अलंकृत द्वार की ऊंचाई लगभग 14 फ़ुट होगी। इसकी विशालता से ही मंदिर के महत्व का पता चलता है।
भव्य देऊर मंदिर (शिवालाय)
प्राचीन काल में मल्हार महत्वपूर्ण नगर रहा होगा। इस नगर को राजधानी का दर्जा प्राप्त था या न था। इस पर अध्येताओं के विभिन्न मत हैं। इस नगर का उत्खनन प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग सागर विश्वविद्यालय के के डी बाजपेयी एवँ एस के पाण्डे ने 1975 से 1978 के दौरान किया था। जिसमें प्रतिमाएँ, विभिन्न संरचनाएँ, सिक्के, पॉटरी, शिलालेख एवं अन्य वस्तुएँ प्राप्त हुई थी। 
नदी देवियाँ (जमुना एवं गंगा)
इनके आधार पर आंकलन किया गया कि इस स्थान से पाँच ऐतिहासिक काल खंडों के प्रमाण मिलते है। आद्य ऐतिहासिक काल - 1000 से 350 ई पू, मौर्य, शुंग, सातवाहन काल - 300 से 350 ईसा पूर्व, शरभपुरीय एवं सोमवंशी काल - 300 से 650 ईस्वीं, सोमवंशी काल - 650 से 900 ईंस्वी, कलचुरी काल - 900 से 1300 ईस्वीं माना गया है।

भीमा - कीचक
इस अवधि तक यह नगर आबाद रहा। इसके पश्चात यह टीले रुप में प्राप्त हुआ, जिसके उत्खनन के पश्चात 7 वीं से 8 वीं सदी का यह मंदिर प्राप्त हुआ। इस शिवालय का निर्माण सोमवंशी शासकों ने कराया था। मंदिर के समीप ही प्रांगण में दो बड़ी प्रतिमाओं के शीर्ष भाग रखे हुए हैं। विशालता देखते हुए ग्रामीण जनों में महाभारत कालीन भीमा-कीचक के रुप में उनकी पहचान स्थापित हो गई।
शिव परिवार
मंदिर के द्वार पट पर शिव के गणों की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं, मुख्य द्वार शाखा पर परिचारिकाएँ स्थापित हैं। द्वार पर किए गए बेलबूटे के अलंकरण देख कर सिरपुर के तिवर देव विहार का स्मरण हो उठता है। मंदिर की भित्तियों में प्रतिमाएँ लगाई गई हैं तथा मंदिर के निर्माण में बड़े पत्थरों का प्रयोग किया गया। द्वार के एक-एक पट का वजन ही कम से कम 10 टन होगा।
यज्ञ करते हुए ब्रह्मा
मंदिर की भित्तियों पर पशु, पक्षियों, यक्ष, यक्षिणी, गंधर्व, कीर्तीमुख, भारवाहक इत्यादि की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। द्वार शाखा पर ब्रह्मा को यज्ञ करते हुए, उमा महेश्वर संग कार्तिकेय उत्कीर्ण किया है। द्वार पर स्थापित नदीं देवियों के वस्त्र अलंकरण मनमोहक हैं। शिल्पकार ने अपने कार्य को महीनता से अंजाम दिया है।
शिल्पकार द्वारा अधूरा छोड़ा गया महिषासुर मर्दनी का अंकन
शिवालय के द्वार पट पर एक अधूरी प्रतिमा का दागबेल दिखाई दिया। यह प्रतिमा महिषासुर मर्दनी की बनाई जानी थी। शिल्पकार ने सुरमई से अंकन के बाद छेनी चलाकर उसे पक्का भी कर दिया था। इसके पश्चात प्रतिमा का अंकन होना था। पता नहीं क्या कारण था जो इतने बड़े एवं भव्य मंदिर में वह सिर्फ़ एक शिल्प अधूरा छोड़ कर चला गया।
कीर्तिमुख
शिवालयों के अलंकरण में कीर्ति मुख का स्थान अनिवार्य माना जाता है। भगवान शिव के इस गण को मंदिरों में आवश्यक रुप से बनाया जाता है। कीर्तिमुख को शिव ने वरदान दिया था। मंदिर की भव्यता देखने के पश्चात लगा कि यदि इस मंदिर का अवलोकन हम नहीं करते तो मल्हार के विषय में काफ़ी कुछ जानने से वंचित रह जाते। मंदिर दर्शन के पश्चात हम बिलासपुर की ओर चल पड़े। …… इति मल्हार यात्रा कथा।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

भानगढ़ का मंदिर शिल्प

भूतिया कुंए का पानी पीते रतन सिंह जी
आरंभ से पढें
सोमेश्वर मंदिर से दांई तरफ़ चलने पर घनी झाड़ियाँ है तथा इधर कोई रिहायसी निर्माण कार्य नहीं है। यहाँ पर शेवड़ों की मढियाँ और समाधियाँ है तथा एक भवन के बाहर शिवलिंग स्थापित है और भवन के भीतर गणेश जी। कहते हैं कि यहीं पर शेवड़े (शव साधक तांत्रिक) तांत्रिक उपासना करते थे। जो चेला दर चेला चली आ अही है। धूणे के पास एक छोटा सा कुंआ है, जिस पर डिब्बा और रस्सी रखी हुई थी। गढ में काम करने वाले मजदूर इसी कुंए से पानी पीते हैं। हमें भी प्यास लग रही थी। भरत सिंह ने पानी निकाला तथा हमने बारी-बारी से अपनी प्यास बुझाई। कुंए का जल शीतल होने के साथ मीठा भी था। इस दौरान चौकीदार हमारे साथ ही चल रहा था। झाड़ियों के बीच से हम रास्ता बनाते हुए टीले पर चढे। यह मंगला देवी का मंदिर था। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है। बलुए पत्थर से निर्मित मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है। 

मंगला माता मन्दिर
भानगढ़ के मंदिरों में मुझे कहीं पर भी मिथुन  मूर्तियाँ दिखाई नहीं दी। जिस तरह अन्य प्राचीन मंदिरों में दिख जाती है। किसी भी प्राचीन मंदिर बहुत सारी नहीं तो एक मिथुन मूर्ति मिलती ही है। अगर मानव मिथुन मूर्तियाँ नहीं प्राप्त होती तो उनकी जगह पशु मिथुनरत मूतियाँ उत्कीर्ण होती हैं। प्रतीत होता है कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में मिथुन मूर्तियों का निर्माण शिल्पकारों ने बंद कर दिया होगा। जबकि प्राचीन काल में मिथुन मूतियों के निर्माण के पीछे मान्यता थी कि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं बनाने के कारण उस पर तड़िक प्रकोप नहीं होता तथा वे मिथुन मूर्तियों को मंदिर में उत्कीर्ण कर जनता के लिए एक कौतूक पैदा करना चाहते थे। मिथुन मूर्तियों के निर्माण के पीछे अन्य कारण भी बताए जाते हैं। यहाँ मिथुन मूर्तियों के न होने से लगता है कि मिथुन दृश्यों का कौतुक जन सामान्य की निगाह में समाप्त हो गया था।

केशवराय मंदिर के पार्श्व में मंगला माता मंदिर
मंगला देवी मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा गायब है। इसके वितान पर 16 वाद्यकों का चित्रण है। संगीत में प्रयोग में आने वाले तत्कालीन वाद्यों का चित्रण शिल्प की समृद्धता का परिचायक है। इसके द्वार पर भी प्रतिहारों का अंकन है. इस मंदिर से थोड़ी दूर पर केशव राय का मंदिर है, इस मंदिर के गर्भ गृह में भी प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के द्वार पर दंडधारी प्रतिहारों का ही अंकन है. इस मंदिर में कोई विशेष शिल्पकारी नहीं है। कहते हैं कि इन मंदिरों की प्रतिमाएं तत्कालीन राजा जयपुर ले गए थे। यहाँ पर हमने कुछ देर विश्राम किया। चौकीदार ने चर्चा के दौरान बताया कि यहाँ आर्कियोलाजी के 16 चौकीदार 4-4 की पाली में काम करते हैं। किसी को भी कभी कोई भूत प्रेत नहीं दिखाई दिया और न ही कोई आवाजें सुनाई दी। उसका कहना है कि लोगों ने इस तरह की अफ़वाहें उड़ा रखी हैं। उसने बताया कि एक बार मंगला माता के मंदिर तरफ़ आते हुए उसे शेर मिल गया था। हाथ में लालटेन लिए दो चौकीदार साथ थे और मंगला माता के मंदिर तरफ़ जा रहे थे। अचानक झाड़ियों में से शेर निकल कर सामने आ गया। उनकी तो घिघ्गी बंध गई। थोड़ी देर बाद शेर चला गया। यहाँ भूत प्रेतों की बजाए जंगली जानवरों का अधिक डर है।

भानगढ के यात्री
इस किले में 5 द्वार हैं जिन्हें हनुमान द्वार, फ़ुलवारी द्वार, अजमेरी द्वार, दिल्ली द्वार तथा लुहारी द्वार के नाम से जाना जाता है। 5 शताब्दी पूर्व भानगढ़ के समीप से अजमेर और दिल्ली जाने वाला मार्ग रहा होगा। इसलिए इन द्वारों का दिल्ली और अजमेरी द्वार नामकरण किया गया होगा। लुहारी द्वार से संबंधित कथानक है कि इस द्वार के समीप लुहारों की बस्ती थी। इस स्थान पर आज भी लौह मल के बड़े बड़े ढेर पड़े हैं। राजा को आयुधों के निर्माण के लिए सिद्धस्थ लुहारों की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हे अलग बस्ती बनाकर बसाया गया होगा। इन लुहारों के वशंज समीप के गांवों में रहते हैं। गढ की प्राचीर के ये द्वार दूर-दूर स्थित हैं। भानगढ का क्षेत्र काफ़ी बड़ा है, इसे एक दिन में देख पाना संभव नहीं। जंगली जानवरों की आमद के कारण यहाँ पर रात्रि में भ्रमण करने अनुज्ञा नहीं दी जाती तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रात्रि में किसी भी संरक्षित स्मारक में जाने की अनुमति नहीं देता। इसमें भानगढ़ की कोई विशेष बात नहीं है। 

चलते चलते यात्रा समापन  चित्र
भानगढ़ से भ्रमण कर हम अब वापस जयपुर की ओर चल पड़े। मुझे अलवर से खैरथल जाना था और अन्य साथियों को जयपुर। चौकीदार से चर्चा होने पर उसने बताया कि 5 बजे आश्रम एक्सप्रेस दौसा से खैरथल जाने के लिए मिल सकती है। अगर आप 5 बजे तक दौसा स्टेशन तक पहुंच गए तो खैरथल जाने के लिए यह बढिया साधन है। भानगढ से दौसा लगभग 22 किलो मीटर की दूरी पर है। प्रदीप जी ने जल्दी ही मुझे दौसा स्टेशन पहुंचा दिया। यहाँ से मैने खैरथल की टिकिट ली। क्योंकि अगले दिन मुझे अलवर का बाला किला देखना था। एक घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात आश्रम एक्सप्रेस प्लेट फ़ार्म पर लगी। अंधेरा हो चुका तथा थोड़ी ठंड भी बढ चुकी थी। यह समय राजस्थान में अच्छी ठंड का था और मैने छत्तीसगढ़ के वातावरण के हिसाब से एक पतली सी स्वेटर ले रखी थी। खैरथल पहुंचते तक सिकुड़ कर आधा रह गया था। ...... आगे पढ़ें .......... 

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

सिरपुर के शिल्पकार .....Sirpur Chhattisgarh......ललित शर्मा

लक्ष्मण  मंदिर 
प्रारंभ से पढ़ें 
धार्मिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भारत में तीर्थाटन की परम्परा सहस्त्राब्दियों से रही है। परन्तु समय के साथ लोगों की रुचि एवं विचारधारा में परिवर्तन हो रहा है। काम से ऊबने पर मन मस्तिष्क को तरोताजा करने के लिए लोग प्राचीन पुरातात्विक एवं प्राकृतिक स्थलों के सपरिवार दर्शन करके मानसिक थकान दूर करते हैं। साथ ही उन्हें देश दुनिया के विषय में जानकारी भी मिल जाती है। जब भी अपनी प्राचीन धरोहरों को देखते हैं तो हमें उनके निर्माताओं पर गर्व होता है कि उन्होने सहस्त्राब्दियों पूर्व ऐसे निर्माण किए या कराए जिससे आने वाली पीढ़ी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करे। प्राचीन शिल्पियों ने भवन निर्माण सामग्री की गुणवत्ता के विषय में कोई समझौता नहीं किया, तभी हमें हजारों वर्ष पुरानी संरचनाए देखने मिल जाती हैं। प्राचीन भवन निर्माण, नगर विन्यास, मुर्ति शिल्प की उत्कृष्टता एवं भव्यता के नाम पर पाण्डुवंशीय शासकों की राजधानी श्रीपुर (सिरपुर) का स्मरण होता है। जब भी सिरपुर जाता हूँ कुछ न कुछ नया देखने मिलता है। अद्भुत शहर है, इसका तिलस्म मुझे अपनी ओर खींचता है, प्रतीत होता है कि पिछले जन्म का कोई नाता है इस नगर से।

उत्खनन में प्राप्त लौह, कांसा, प्रस्तर की मूर्तियाँ एवं उपकरण 
सिरपुर को बनाने बसाने वाले अज्ञात शिल्पियों के प्रति मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। अन्य स्थलों पर दृष्टिपात करने से वहाँ के भवन, मंदिर,मूर्तियों पर निर्माण करने वाले शिल्पियों के नाम नही मिलते।  संसार को अद्वितीय रचना देने के बाद भी शिल्पियों के हाथ काटे जाने की कहानी सामने आती हैं। धम्मपाद के बोधिराज कुमारवत्थु पृष्ठ ४१० में एक कारीगर का हाल इस प्रकार लिखा है कि बोधिराज कुमार ने एक महल बनवाया, बनाने वाले कारीगर ने उसे बड़ा ही विचित्र बनाया। बोधिराज ने सोचा कि यह कारीगर कहीं दूसरे स्थान पर ऐसा महल न बना दे, इसलिए इसके हाथ कटवा देना चाहिए। राजा ने यह बात अपने सलाहकार से भी कह दी, सलाहकार ने यह खबर कारीगर तक पहुँचा दी। कारीगर ने अपनी पत्नी को संदेश भेजा कि वह घर-द्वार मालमत्ता बेच कर एक दिन महल देखने का निवेदन करे। स्त्री ने यही किया, राजा से अनुमति लेकर महल देखने गई, कारीगर उसे एक कोठरी में ले गया और स्त्री तथा प्राण बचाने हेतू लड़कों समेत गरुड़ यंत्र पर चढ़कर भाग गया।

तीवरदेव विहार का मूर्ति शिल्प 
आज हम देखते है तो सिरपुर एक छोटा सा गाँव है, पर ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व इसे दक्षिण कोसल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन प्रतापी राजा हुए, उन्होनें ५७ वर्ष तक शासन किया, यह काल दक्षिण कोसल के लिए स्वर्णिम काल था। वास्तुकला एवं सांस्कृतिक समृद्धि उत्कर्ष पर थी। मंदिरों भवनों के साथ सरोवरों का निर्माण हुआ। कारीगरी के अनुपम नमुने यत्र तत्र परिलक्षित होते हैं। ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर का शिल्प मन मोह लेता है। मगध के राजा सूर्य वर्मन की पुत्री, महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा ने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में इसका निर्माण कराया था। इस मंदिर का निर्माण काल 650 ईस्वी के लगभग माना जाता है। 7 फिट ऊँची जगती पर निर्मित इस मंदिर के मुख्य द्वार पर दशावतार, कृष्ण लीला, अलंकारिक प्रतीक, मिथुन दृश्य एवं द्वारपालों का अंकन है। तीवरदेव विहार में उत्कीर्ण मूर्तियों का शिल्प देखते ही बनता है। शिल्पकार ने बहुत ही बारीकी से शास्त्रीय अंकन किया है। जातक कथाओं का भी अंकन प्रभावोत्पादक है। मूर्ति शिल्प में वस्त्रों का अंकन महीन कारीगरी से हुआ है। ऐसा ही मनमोहक शिल्प आनंदप्रभ कुटी विहार, सुरंग टीला, गंधर्वेश्‍वर मंदिर, पंचायतन बालेश्वर महादेव मंदिर में दिखाई देता है। 
विशाल बाज़ार क्षेत्र सिरपुर 

भूमिगत अनाज की कोठी के साथ गुप्त चेंबर 
उत्खनन में विशाल व्यापार क्षेत्र प्राप्त हुआ है, ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व योजनाबद्ध रुप से बाजार की बसाहट वास्तुकारों के कौशल को प्रदर्शित करती है। बाजार के मध्य मुख्य मार्ग पर जब हम चलते हैं तो लगता है सारा बाजार जीवंत हो उठा। दुकानों के बरामदे, फिर दुकान और उसके पीछे अनाज रखने की भूमिगत कोठियाँ प्रत्येक दुकान में पाई गई हैं, जिससे जाहिर होता है कि उस काल में वस्तु विनिमय होता था। लोग अपने साथ अनाज लेकर आते थे और अपने काम की वस्तु खरीद कर बदले में ले जाते थे। बाजार क्षेत्र में ३ कुंए प्राप्त हुए हैं, जिससे पेयजल की व्यवस्था होती थी। चूना पत्थर से निर्मित कुंए वर्तमान में जस के तस हैं, काल की मार से सुरक्षित भी। बाजार क्षेत्र में उत्खनन के दौरान एक भवन से धातु की लगभग 80 प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। प्रतिमाओं को देखने से पता चलता है कि धातु शिल्पकला उत्कृष्ट कोटि की थी। बाजार में सभी तरह की मानवोपयोगी वस्तुओं व्यापार होता था। जहाँ से धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई, उस भवन में दो अंतराल और पीछे की तरफ आंगन नुमा संरचना है। अनुमान है कि किसी व्यापारी श्रेष्ठी का निवास रहा होगा।

लोहार का घर 
मुख्य मार्ग के पूर्व में दो आवास आमने‍-सामने हैं, जिनके मध्य में बड़ा आंगन है, एक आवास में दो मुख्य द्वार हैं तथा पीछे की तरफ अनाज रखने की भूमिगत बड़ी कोठियाँ हैं, यहाँ से लोहे के औजार एंव कच्चा माल प्राप्त हुआ है। जाहिर है कि यह लोहार का निवास एवं कार्य स्थल दोनों होगा। इसके सामने एक मुख्य द्वार का आवास है, यहाँ से उत्खनन में ताम्रपत्र एवं ढ़लाई का कच्चा माल प्राप्त हुआ है। यहाँ तांबा का कार्य करने वाले ताम्रकार का निवास था। ये तांबे और कांसे की मुहर ढ़ालने का कार्य कुशलता से करते थे। बाजार की पूर्व दिशा में ही बरगद के वृक्ष के समीप सोनार का घर एवं भटठी प्राप्त हुई है। इससे प्रतीत होता है कि परम्परागत शिल्पकारों को श्रीपुर में मान सम्मान एवं राजकीय संरक्षण प्राप्त था। लकड़ी एवं पत्थर का काम करने वाले बढ़ई एवं प्रस्तर शिल्पकारों के आवास का पता नहीं चलता। परन्तु उनके कार्य सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं। बढ़ईयों के कार्य को प्रस्तर शिल्पियों ने अपने प्रस्तर शिल्प में स्थान दिया है। लकड़ी का सामान हजारों वर्षों तक अक्षुण्‍ण नहीं रह सकता। परन्तु प्रस्तर शिल्पियों के कार्य हजारों वर्षों तक विद्यमान रहते हैं। ये मंदिर निर्माण के स्थान पर ही कार्य करते थे। मंदिरों के उत्खनन मे प्राप्त पत्थरों के किरचे एवं अधूरी प्रतिमाएं इसका प्रमाण हैं।

तीवर देव विहार का मुख्य द्वार एवं प्रतिमाएं 
सिरपुर में परम्परागत शिल्पियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था एवं रहन सहन एवं आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थे। इसका अनुमान उनके आवासों के स्तर से लगाया जा सकता है। तीवरदेव विहार के मुख्य द्वार की पट्टिका मे उत्कीर्ण चाक पर बरतन बनाता हुआ कुम्हार शिल्पकारों की सामाजिक स्थिति को दर्शाता है। जब कुम्हार के कार्य को विहार के सिंह द्वार में प्रदर्शित किया है तो मानना चाहिए कि शिल्पकारों को महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त था। सुरंग टीला के स्तंभों में शिल्पकारों ने अपने हस्ताक्षर छोडे हैं। यहाँ स्तंभों पर ध्रुव बल, द्रोणादित्य, कमलोदित्य एंव विट्ठल नामक कारीगरों के नाम उत्कीर्ण हैं। किसी राज्य या राजा के कार्यकाल की स्थिति का आंकलन हम उसके काल में हुए शिल्प कार्य, निर्माण एवं उसके द्वारा चलाए गए सिक्कों से करते हैं। इनका निर्माण परम्परागत शिल्पकारों के बगैर नहीं हो सकता। राजाश्रय मिलने पर ही शिल्पकार स्वतंत्र हो कर कार्य करते थे। यजुर्वेद में "कुलालेभ्य कर्मारेभ्यश्च वो नमः" के अनुसार कुम्हार और बढ़ईयों से लेकर जितने भी कारीगर हैं सबके लिए आदर एवं अन्न की व्यवस्था बतलाई गई है। शिल्पियों एवं रथकारों को यज्ञ मे शामिल होने का भी आदेश है और इनका दर्जा ब्राह्मणों के बराबर दिया गया है। 

तमेर के घर से प्राप्त ताम्रपत्र 
कई शिला लेखों में एवं ताम्रपत्रों में लेखक के नाम का जिक्र होता है।  कुरुद में प्राप्त नरेन्द्र के ताम्रपत्र लेख में उत्कीर्णकर्ता के रुप में श्री दत्त का, आरंग मे प्राप्त जयराज के ताम्रलेख में अचल सिंह का, सुदेवराज के खरियार में प्राप्त ताम्रलेख में द्रोणसिंह का, महाभवगुप्त जनमेजय के ताम्रलेख में रणय औझा के पुत्र संग्राम का वर्णन है। प्रथम पृथ्वीदेव के अमोदा में प्राप्त ताम्रपत्रलेख में वर्णन है कि "गर्भ नामक गाँव के स्वामी ईशभक्त सुकवि अल्हण ने सुन्दर वाक्यों से चकोर के नयन जैसे सुंदर अक्षर ताम्र पत्रों पर लिखे जिसे सभी शिल्पों के ज्ञाता सुबुद्धि हासल ने शुभ पंक्ति और अच्छे अक्षरों में उत्कीर्ण किया।" द्वितीय पृथ्वीदेव के रतनपुर में प्राप्त शिलालेख संवत 915 में उत्कीर्ण है " यह मनोज्ञा और खूब रस वाली प्रशस्ति रुचिर अक्षरों में धनपति नामक कृती और शिल्पज्ञ ईश्वर ने उत्कीर्ण की। उपरोक्त वर्णन से शिल्पकारों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति का पता चलता है। जारी है ....... आगे  पढ़ें 

सोमवार, 17 सितंबर 2012

विश्वकर्मा पूजा विशेष: भारत के परम्परागत शिल्पकार--------- ललित शर्मा

जहाँ पर मानव सभ्यता के विकास का वर्णन होता है वहां स्वत: ही तकनीकि रुप से दक्ष परम्परागत शिल्पकारों के काम का उल्लेख होता है। क्योंकि परम्परागत शिल्पकार के बिना मानव सभ्यता, संस्कृति तथा विकास की बातें एक कल्पना ही लगती हैं। शिल्पकारों ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक विभिन्न स्वरुपों में (लोहकार, रथकार, सोनार, ताम्रकार, शिल्पकार-वास्तुविद) अपने कौशल से शस्य श्यामला धरती को सजाने में कोई भी कसर बाकी नहीं रखी। समस्त एषणाओं से परे एक साधक की तरह परम्परागत शिल्पकार अपने औजारों के प्रयोग से मानव जीवन को सरल-सहज एवं सुंदर बनाने का उद्यम कर रहे हैं। आज समस्त सृष्टि जिस सुवर्ण रुप में दृष्टिगोचर हो रही है वह हमारे परम्परागत शिल्पकारों के खून पसीने एवं श्रम की ही देन है। इससे हम इंकार नहीं कर सकते। यह बात हम गर्व से कह सकते हैं।

मानव के सामाजिक एवं आर्थिक विकास का प्रथम चरण वैदिक काल से प्रारंभ होता है। इस काल में अग्नि का अविष्कार एक ऐसा अविष्कार था जिसने मानव के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया। उसे जानवर से मनुष्य बनाया। यह अविष्कार मानव का सभ्यता की ओर बढता हुआ क्रांतिकारी कदम था। आज हम इस महान अविष्कार के महत्व को नहीं समझ सकते। जब जंगल की आग दानव की तरह सब कुछ निगल जाती थी, उसे काबू में करके प्रतिकूल से अनुकूल बनाने का कार्य मानव सभ्यता के लिए क्रांतिकारी अविष्कार था। आश्वलायन संहिता में इस कार्य का श्रेय महर्षि अंगिरा को दिया गया है। सभी मनुष्यों के लिए उपस्करों एवं उपकरणों का निर्माण विकास का दूसरा चरण था। परम्परागत शिल्पकारों ने एक चक्रवर्ती राजा से लेकर साधारण मजदूर किसान तक के लिए उपकरणों का विकास किया गया। यज्ञों के लिए यज्ञपात्रों ( जो मिट्टी, काष्ठ, तांबा, कांसा, सोना एवं चांदी के हुआ करते थे) से लेकर यज्ञ मंडप का निर्माण, राजाओं के लिए अस्त्र-शस्त्र, शकट, रथों का निर्माण, किसान मजदूरों के लिए हल, फ़ाल, कुदाल, कुटने, पीसने, काटने के उपकरण बनाए गए।

जिसे हम आज इंडस्ट्री कहते हैं किसी जमाने उसे शिल्पशास्त्र कहा जाता था। वायुयान, महल, किले, वायु देने वाले पंखे, थर्मामीटर, बैरोमीटर, चुम्बकीय सुई(कम्पास) बारुद, शतघ्नी (तोप) भुसुंडि (बंदुक) एवं एश्वर्य की अन्य भौतिक वस्तुओं का वर्णन संक्षेप में न करुं तो पुन: कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। परम्परागत शिल्पकारों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इतिहास की छाती पर अपने खून पसीने से जो कालजयी इबारतें लिखी हैं वे वर्तमान में भी अमिट हैं। काल का प्रहार भी उन्हे धराशायी नहीं कर पाया। परम्परागत शिल्पकारों की रचनाओ एवं कृतियों के वर्णन से वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथ भरे पड़े हैं तथा वर्तमान में भी परम्परागत शिल्पकारों द्वारा रची गयी आर्यावर्त के कोने कोने में गर्व से भाल उन्नत किए आसमान से होड़ लगा रही हैं। जिसे देख कर आज का मानव स्मृति खो देता है, उन कृतियों को बनाने वाले शिल्पकारों के प्रति नतमस्तक होकर सोचता है कि हजारों साल पूर्व मानव ने मशीनों के बगैर अद्भुत निर्माण कैसे किए होगें?

भारत में समस्त तकनीकि ज्ञान एवं शिल्पज्ञान का प्रवर्तक भगवान विश्वकर्मा को माना गया है। भगवान विश्वकर्मा के अविष्कारों का बखान करते हुए वेद एवं पुराण नहीं थकते। ॠग्वेद के मंत्र दृष्टा ॠषि भगवान विश्वकर्मा भी हैं। कहते हैं - यो विश्वजगतं करोत्य: स: विश्वकर्मा अर्थात वह समस्त जड़ चेतन, पशु पक्षी, सभी के परमपिता है, रचनाकार हैं। महर्षि दयानंद कहते हैं - विश्वं सर्वकर्म क्रियामाणस्य स: विश्वकर्मा सम्यक सृष्टि का सृजन कर्म जिसकी क्रिया है, वह विश्वकर्मा है। प्राचीन काल से ही सृष्टि के रचियिता भगवान विश्वकर्मा के अनुयायी विश्वकर्मावंशी अपने तकनीकि कौशल से के बल पर सम्पूर्ण सृष्टि को रचाने-बसाने में लगे हैं। मानव सभ्यता को नया आयाम देने का कार्य परम्परागत शिल्पकारों ने ही किया, इसमें कोई संदेह नहीं है। स्थानीय राजाओं के साथ-साथ हजारों वर्षों तक भारत में शासन करने वाले विदेशियों ने भी शिल्पकार्य को बढावा दिया। परन्तु अंग्रेजों के शासन काल में औद्यौगिकरण के नाम पर कुटीर उद्योगों की बलि चढा दी गयी। अंग्रेजों ने देखा कि भारत में शिल्पकला का स्तर बहुत ही ऊंचा है और यहाँ के शिल्पकार उन्नत शिल्प गढते हैं। तकनीकि ज्ञान से दक्ष शिल्पकार अगर विरोधी हो गए तो उनके शासन को खतरा हो जाएगा क्योंकि विश्व में जितने भी सत्ता परिवर्तन हुए वे श्रमिकों एवं शिल्पकारों के आन्दोलनों के द्वारा ही हुए। इसलिए षड़यंत्र करके अंग्रेजों ने मशीनीकरण किया और परम्परागत शिल्पकारों के हाथ से उनका पैतृक व्यवसाय छीन कर कमर तोड़ने का कार्य किया।

अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बना रखा था, तब प्रत्येक नागरिक की किस्मत का फ़ैसला उनकी सरकार ही करती थी। उनके जोर जुल्म को नियति समझ कर शिल्पकारों ने आजादी के आन्दोलनों में सक्रीय भागीदारी निभाई। समय बदला, आजादी मिली, पर शिल्पकारों की किस्मत नहीं बदली। आजादी के बाद गद्दी पर बैठने वाली सरकार ने प्रथम पंचवर्षीय योजना में शिल्पकारों को कोई स्थान नहीं दिया। उनके विकास के लिए कोई योजना नहीं बनाई। शिल्पकारों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया गया। आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद भी परम्परागत शिल्पकारों को वही पीड़ा झेलनी पड़ रही है जो अंग्रेजों के जमाने में झेलनी पड़ी थी। फ़र्क तो सिर्फ़ इतना था कि मुखौटा बदल गया, हाकिम नहीं बदले। आजादी के 65 सालों के बाद भी परम्परागत शिल्पकार आजाद नहीं हुआ है। क्योंकि जब तक आर्थिक आजादी नहीं, बाकी आजादी झूठी है। लोकतंत्र का अर्थ यही है कि जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन। लोकतंत्र में सभी जातियों, पंथों, फ़िरकों को समान विकास का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन वोटों की राजनीति ने शिल्पकारों के हाथ-पैर बांध कर विकास की दौड़ में खुला छोड़ दिया। फ़लस्वरुप दोगली राजनीति का दंश झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा। आज परम्परागत शिल्पकार राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक रुप से अत्यंत ही पिछड़ गया।

पूर्वजों ने वसुधैव कुटुम्बकं की अवधारणा को जन्म दिया, जिसे हम आज ग्लोबलाईजेशन का नाम दे रहे हैं। परन्तु ग्लोबलाईजेशन के गलत स्वरुप के कारण इसका प्रतिकूल असर परम्परागत शिल्पकारों पर पड़ रहा है। जिन वस्तुओं का निर्माण हमारे शिल्पकार कुशलता पूर्वक करते है उन वस्तुओं के साथ अन्य छोटी-छोटी वस्तुओं का भी विदेशों से आयात हो रहा है। वर्तमान में विश्व वृहद बाजार का रुप ले रहा है, जिससे उत्पादन की चुनौतियाँ सीधे-सीधे ही परम्परागत शिल्पकारों के जीवन को प्रभावित कर रही हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण लोहकारों, सोनारों, ताम्रकारों के धातु संवर्धन एवं गलाई के कारखानों का बंद हो जान है। बड़ी-बड़ी सुरसा मुख विदेशी एवं देशी कम्पनियों ने इनके कार्यक्षेत्र पर कब्जा जमा लिया है। वनों से ईमारती लकड़ियों का निकास लगभग न्यून ही हो गया है जिससे लकड़ी के निर्माण के कच्चे माल में बेतहाशा मूल्य वृद्धि हुई है। बढईयों के सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गयी है वे आर्थिक विपन्नता से जूझ रहे हैं। सरकार बड़े उद्योगों के लिए सब्सिडी एवं टैक्सों में छूट देकर इनकी वकालत कर रही है। वहीं दुसरी ओर परम्पराग्त शिल्पकार कच्चे माल की कमी से जुझते हुए मंदी की मार झेल रहे हैं। यह विसंगति चिंतनीय है।

परम्परागत शिल्पकारों में शिक्षा की कमी है, राजनैतिक हस्तक्षेप भी नहीं के बराबर है। मुझे ज्ञात नहीं कि कभी परम्परागत शिल्पकार समुदाय से कोई व्यक्ति राजनैतिक उच्च पदों पर आसीन रहा हो। कोई अपवाद भी हो सकता है। 1931 में अंग्रेजों ने जातिगत आधार पर जनगणना कराई थी, उसमें परम्परागत शिल्पकारों की जनसंख्या 10% बताई गयी थी।31 मार्च 2011 की जनगणना के अस्थायी आंकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 122 करोड़ है। इस हिसाब से भारत में परम्परागत शिल्पकारों की कुल जनसंख्या 12 करोड़ 20 लाख होती है। इतनी बड़ी जनसंख्या में होने के बाद भी वर्तमान में परम्परागत शिल्पकारों का राज्य सभा, लोकसभा, राज्यों की विधानसभाओं एवं सरकारी उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर ही है। परम्परागत शिल्पकार आजादी के 65 वर्षों के बाद भी आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से अपना कोई मुकाम नहीं बना पाए। सत्ता के गलियारों में इनकी आवाज उठाने वाला कोई प्रतिनिधि नहीं है। भारत की लगभग 12 करोड़ 20 लाख जनसंख्या उपेक्षित हो रही है, जिसके कारण एक बड़ा समुदाय भारत में विनाश के कगार पर खड़ा है। यह एक चिंतनीय स्थिति है जिस पर सभी को चिंतन करना चाहिए।

जब भारत की पहली पंचवर्षी योजना तैयार की गयी तो उसमें बड़े कल-कारखाने लगा कर उनसे अधिक उत्पादन पर बल दिया गया। यह असर इंग्लैंड की औद्यौगिक क्रांति का था। किसानों के लिए योजना बना कर उन्हे लाभ पहुंचाने के लिए "हरित क्रांति" की शुरुवात की गयी तथा उसके कुछ वर्षों पश्चात श्वेत क्रांति प्रारंभ हुई। ये योजनाएं अभी चल रही हैं। अब सरकार ने मल्टीनेशनल कम्पनियों के सामने घुटने टेक दिए। अर्थव्यवस्था रसातल की ओर जा रही है। देश को विदेशियों के हाथों में गिरवी रखने की नौबत आ रही है। इन योजनाओं में जितना बजट लगाया है उसका 5% भी परम्परागत शिल्पकारों के दशा सुधारने में लगाया होता तो आज भारत विकसित राष्ट्रों की कतार में महाशक्ति बनकर खड़ा होता। परम्परागत शिल्पकारों के संरक्षण का सीधा लाभ भारत की अर्थ व्यवस्था को होगा क्योंकि यंत्रों एवं उपरकणों के निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा से मुद्रा भंडार समृद्ध होगा। भारत के विकास के लिए सरकार को अब "शिल्प क्रांति" की ओर उन्मुख होना चाहिए। परम्परागत शिल्पकारों को वे समस्त सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए जो मल्टीनेशनल कम्पनियों को उपलब्ध कराई जा रही हैं। उससे लाभ यह होगा कि भारत अपने उत्पादों के द्वारा सारे विश्व में छा सकता है। हमारे पास तकनीकि ज्ञान की कोई कमी नहीं है।

जब चीन से बना सामान भारत के बाजारों पर कब्जा जमा चुका है। हमें भी कुटीर उद्योगों की ओर वापस जाना होगा। जिससे परम्परागत शिल्प समृद्ध होगा और शिल्पकारों को काम मिलेगा। ऐसी स्थिति में परम्परागत शिल्पकारों को शासकीय संरक्षण की महती आवश्यकता है। जिस तरह अमेरिका की एजेंसी नासा निरंतर तरह-तरह के अनुसंधानों में लगी रहती है। उसी तरह संरक्षण मिलने पर परम्परागत शिल्पकार भी नित नए अविष्कार कर सकते हैं। जिससे प्रतिरक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग मशीनरी, विद्युत उत्पादन, उच्च शिक्षा, कृषि आदि क्षेत्रों में उन्नति का मार्ग खुलेगा। नयी तकनीकों के विकास से बेरोजगारी दूर करने में मदद मिलेगी तथा हर हाथ को काम मिलेगा। भारत को आर्थिक रुप से शक्तिशाली राष्ट्र बनाने में परम्परागत शिल्पकारों की भूमिका उल्लेखनीय होगी। क्योंकि प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक हम अपने तकनीकि ज्ञान से सम्पूर्ण विश्व को लोहा मनवा चुके हैं। आज भी तकनीकि ज्ञान के विकास की आवश्यकता है। इसलिए श्रम दिवस (विश्वकर्मा पूजा) के अवसर पर हमें भारत की  शिल्पकला की उन्नति एवं परम्परागत शिल्पकारों के अधिकारों की ओर ध्यान देना चाहिए। 

शनिवार, 25 अगस्त 2012

पाली के शिव मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ-------- ललित शर्मा

रतनपुर दुर्ग का मोतीपुर द्वार
बिलासपुर से रतनपुर होते हुए अंबिकापुर जाने वाले मार्ग पर ५० किलोमीटर दूरी पर उत्तरपूर्व में पाली स्थित है। वेरना सर्पीले रास्ते को नयी-नवेली दुल्हन की तरह बलखाते बड़ी सफ़ाई से नाप रही थी और पंकज कुशलता से हांक रहा था। गाड़ीवाले गाड़ी धीरे हांक रे……जिया उड़ा जाए लड़े आँख रे…… गाड़ी हांकने में जोर भी बहुत पड़ता है और आँख लड़ने के बाद तो आँख आने का खतरा कई गुना हो जाता है। जिनके आँख नहीं उनके भी आ जाती है। आलोक धरती से लेकर अंबर तक फ़ैल जाता है। सम्पूर्ण चराचर जगत प्रकाशमान होकर उमंगों से भर जाता है। हरियाली और मौसम बेईमान बनने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा।

ढाबा शेरे पंजाब पाली और पंकज सिंह
उत्तर से उमड़ती-घुमड़ती घटाएं प्रभावोत्पादक बन रही थी। वो आँख ही क्या जो कभी लड़े न, लड़ गयी तो आए न। आए तो फ़िर जाए न और फ़िर कभी लड़ने के काबिल रहे न। आंखे भी बड़े कमाल की हैं न। हमारी आँखें तो अब लड़ने-झगड़ने लायक बची नहीं। काला चश्मा लगाने के बाद दीदे फ़ाड़ कर देखने से भी दिखाई नहीं देता। काला चश्मा बड़ा कारगर होता है आँखों की बीमारी के लिए पास फ़टकने ही नहीं देता। गाड़ी पाली की ओर चली जा रही है और आँखे अपने काम में लगी है। दोपहर को आलस आ ही जाता है, पाली पहुंचने तक भूख लग चुकी थी।

पाली का शिव मंदिर और यायावर
हम वहाँ खाने का कोई अच्छा ढाबा ढूंढ रहे थे, मुझे याद आया कि एक ढाबे में कई वर्ष पूर्व भोजन किया था। वहीं चला जाए, लेकिन वह ढाबा दिखाई नहीं दिया, ढाबे की खोज में हम पाली की बाऊंड्री से पार हो चुके थे। आखिर फ़िर गाड़ी लौटा कर ढाबा ढूंढना शुरु किया। आखिर मनपसंद शेरे-पंजाब ढाबा मिल ही गया। शेरे पंजाब ढाबे हर जगह कमो-बेश मिल ही जाते हैं। जब से पंजाब के जंगलों का सफ़ाया हुआ सारे शेर जंगलों की तरफ़ आ गए। इधर जंगलों में कोई शिकार न मिला तो ढाबे ही खोल लिए। आम के आम और गुठली के दाम। खाने-खिलाने और पीने-पिलाने का इंतजाम तो हो गया। हमने यहीं खाने का आर्डर दिया। तंदूरी रोटियों के साथ करी का भरपूर स्वाद लिया। अब हम चल पड़े पाली मंदिर के दर्शनावलोकन करने।

शिव मंदिर का गर्भ गृह
पाली का मंदिर अपनी शिल्पकला के लिए जग प्रसिद्ध है। केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत इसे चार दीवारी से घ्रेरा गया है। लोहे के बड़े प्रवेश द्वार से हमने मंदिर परिसर में प्रवेश किया। परिसर में मखमली घास बिछाकर सुंदर हरे गलीचे के साथ ही बगीचा  तैयार किया गया है। मुख्यद्वार के समीप ही मंदिर के केयर टेकर का निवास है। मंदिर के समीप ही एक सुंदर जलाशय है। अनुमान है कि यहाँ पूर्व में और भी मंदिर होगें जो काल की भेंट चढ गए। यहाँ आवाज देने पर संतोष त्रिपाठी जी अपने दो सहयोगियों के साथ मिले। इन्होने बताया कि ये पहले बारसुर के मंदिर में थे। अभी कुछ महीनों से ही स्थानांतरित होकर पाली आए हैं। रेड सेंड स्टोन से तैयार पाली के शिव मंदिर की कारीगरी मनमोहक एवं नयनाभिराम है। मंदिर के भीतर और बाहर प्रस्तर मूर्तियां उत्कीर्ण की गयी हैं। मंडप एवं जगती का पुनर्निर्माण हुआ है तथा पुरातत्व विभाग की देख-रेख में मंदिर अपनी पुरानी शानौ शौकत के साथ आकाश से टक्कर लेता हुआ अडिग, अविचल विद्यमान है।

मंदिर के भीतर शिलालेख
मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करने पर शिल्पकारी दिखाई देती है। मन श्रद्धा से भर जाता है उन शिल्पकारों के प्रति जिन्होने अनगढ पत्थरों को अपनी छेनी-हथौड़ी से तराश कर जीवंत कर दिया। नयनाभिराम शिल्प मन को मोह लेता था। गर्भ गृह का द्वार सुंदर लता वल्लरियों से अलंकृत है। बांई तरफ़ की दीवार पर ब्रह्मा विराजमान तथा चौखट के बाई तरफ़ दशावतार उपस्थित हैं। मंदिर के वितान पर मनमोहक अंकन विशिष्टता प्रदान करता है। गर्भ गृह का यह अलंकरण अनुपम है। दाईं तरफ़ स्तंभ पर उत्कीर्ण "श्रीमद जाजल्लादेवस्य कीर्ति रिषम" शिलालेख दिखाई देता है। पाली के प्राचीन शिव मंदिर की हरिहर प्रतिमा, इसका निर्माण 11वीं सदी में कलचुरी शासनकाल में राजा श्री मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वितीय ने कराया था। शिलालेख द्वारा अनुमान है कि इसका जीर्णोद्धार बारहवीं शताब्दी में रतनपुर के हैहयवंशीय राजा जाज्जल्वदेव प्रथम ने करवाया।

हरिहर की अद्भुत प्रतिमा
मंदिर के बाहरी परकोटों पर देवी-देवताओं के साथ व्यालाकृति, अप्सराओं की मूर्तियां अंकित हैं। व्याघ्र व्याल, हस्ति व्याल, वराह व्याल के साथ अन्य प्रकार के व्याल भी अंकित हैं। मंदिर के बांए तरफ़ की दीवार पर एक अद्भुत प्रतिमा है,जिसे हरिहर कहते हैं। इस मूर्ति में शिव और विष्णु के अर्धांग बने हुए हैं। दोनो अर्धागों से यह प्रतिमा पूर्ण हुई है। बाईं तरफ़ शिव एवं दायीं तरफ़ विष्णु का अंकन शिल्पकार ने किया है। शिव को त्रिशूल,डमरु एवं नदी के साथ अंकित किया है और विष्णु का शंख एवं गदा के साथ अंकन है। इस तरह की शिल्पाकृति मुझे अभी तक अन्य स्थान पर देखने नहीं मिली। अनुपम शिल्प का निर्माण हुआ है इस प्रतिमा के रुप में। शिल्पकार की कल्पना को नमन करना चाहिए।

पाली का शिव मंदिर
मंदिर के दाएं तरफ़ प्रेमासक्त,कामासक्त आलिंगनबद्ध अप्सराओं एवं गंधर्वों का अंकन है। प्रतिमाएं सुंदर एवं सुडौल होने के साथ आकर्षित भी करती हैं। खजुराहो का शिल्प भी यहां देखने मिलता है। एक मूर्ति में संभोग से समाधि की ओर जाते हुए गंधर्व एवं अप्सरा दिखाई दिए। मंदिरों में मिथुन मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की परम्परा से प्रतीत होता है  कि यौनशिक्षा का माध्यम कभी मंदिरों का शिल्प रहा होगा। हमने प्रतिमाओं के चित्र लिए, मंदिर के चारों तरफ़ इतनी मूर्तियाँ हैं कि चित्र लेने में आधा दिन निकल जाए। हमारे पास समय की कमी थी इसलिए मंदिर की एक परिक्रमा कर पुन: मूर्तियों को देखा और उन्हे बनाने वाले अनाम शिल्पकारों को नमन करके बाहर आ गए। इस बीच संतोष त्रिपाठी ने कहा, आप पुरी जाएं तो आपके रहने और खाने का पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार हूँ। हमने संतोष जी को धन्यवाद दिया और विदा लेकर हम चैतुरगढ की ओर चल पडे। मौसम यथावत बना हुआ था…॥ आगे पढें……

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

भूख मिटाने वाला साल्युशन -- ललित शर्मा

जूझती हैं कोहरे से
नित सूर्यकुमारियाँ
श्रमिक की तरह
रोटी के लिए
पृथ्वी का भार
कांधे पर लादे
बोझ से दबा एटलस
चलता है अनवरत
भूख मिटाने के लिए
कल पर्चे बंटे
बाजार मे
भूख मिटाने वाला
साल्युशन बनकर
तैयार
अब बोझा उतार दो
एटलस

सोमवार, 22 अगस्त 2011

पनघट मैं जाऊं कैसे? -- जन्माष्टमी विशेष -- ललित शर्मा

सभी मित्रों को जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।


पनघट मैं जाऊं कैसे, छेड़े मोहे कान्हा।
पानी      नहीं    है,    जरुरी   है   लाना।।

बहुत   हुआ  मुश्किल, घरों  से  निकलना।
पानी  भरी  गगरी को,सर पे रख के चलना।
फोडे  ना   गगरी,   बचाना    ओ    बचाना॥

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी      नहीं    है,    जरुरी    है   लाना॥

गगरी    तो   फोडी   कलाई   भी  ना  छोड़ी।
खूब   जोर  से  खींची  और  कसके  मरोड़ी।
छोडो  जी  कलाई,  यूँ सताना  ना   सताना॥

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी      नहीं     है,   जरुरी   है   लाना॥

मुंह    नहीं    खोले,  बोले    उसके    नयना।
ऐसी   मधुर   छवि  है, खोये  मन का चयना।
कान्हा   तू   मुरली    बजाना   ओ   बजाना॥

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा ।
पानी      नहीं    है,   जरुरी   है   लाना॥


NH-30 सड़क गंगा की सैर