एलियन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एलियन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 2 जनवरी 2013

घोंघा बसंत: आदर्श घुमक्कड़ …………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
घोंघा बसंत! हाँ गुरुजी यही कहते थे। पढाने के बाद भी अगर कोई विद्याथी उनके प्रश्न का जवाब नहीं दे या फ़िर सवाल हल करने में अक्षम रहे तो गुरुजी  उसे सार्वजनिक रुप से घोंघा बसंत की उपाधि से नवाजकर सम्मानित करते थे। कक्षा में प्रतिवर्ष 2-4 घोंघा बसंत विरासत के तौर मिल जाते थे। हमारे सहपाठी घोंघा बसंत पिछली कक्षा में छूट जाते और अगली कक्षा में छूटे हुए मिल जाते। तब हमें यह न मालूम था कि गुरुजी ठस बुद्धि विद्याथियों को घोंघा बसंत क्यों कहते हैं। शंख जैसे छोटे से खोल में रहने वाला लिजलिजा प्राणी घोंघा कहलाता है यह हम जानते थे। हम आगे की  कक्षाओं में बढते बढते इतने आगे बढ गए कि आज तक मुड़कर पाठशाला का मुंह नहीं देखा। कुछ सहपाठी घोंघा बसंत वर्तमान में सरकारी नौकरियों में लग कर धरा को धन्य कर रहे हैं।  
सिरपुर के घोंघा बसंत (फ़ोटो-ललित शर्मा)

इस लिजलिजे प्राणी को देखने से जुगुप्सा होती है पर दिखने में बहुत सुंदर है। इसके सिर पर खड़े दो सींगों से लगता है कि कोई एलियन (परग्रही प्राणी) है। परंतु प्रकृति का अद्भुत निर्माण है कि इसके सींगों पर दो आँखों के साथ रिसिवर के रुप में दो एंटीना लगे हुए हैं। जिससे यह देखने एवं सुनने का दोनो काम कर सकता है। कहें तो प्रकृति का बनाया हुआ वायरलेस सेट या रेडियो जैसा उपकरण इसके सींगों में रोपित है। रीढ विहीन इस प्राणी को पटकने के बाद भी इसकी मौत नहीं होती। कठोर आवरण इसकी सुरक्षा करता है। सिरपुर के मार्केट काम्पलेक्स में कदम रखते ही सर्वप्रथम घोंघा बसंत से ही मुलाकात हुई। जनाब खरामा-खरामा टहलते हुए सुबह की सैर को निकले थे। तभी इनसे भेंट हो गयी। एक अरसे के बाद घोंघा बसंत से मुलाकात होने पर मन प्रसन्नता से भर गया। झट से घोंघा बसंत की उपाधि देने वाले गुरुजी याद आ गए।

कठोर आवरण में रहने के कारण यह सभी खतरों से महफ़ूज रहता है। बिगड़े हुए मौसम का इस पर कोई असर नहीं पड़ता। मान लिया जाए कि यह एक ढीठ प्राणी है। घोंघा की इसी प्रतिभा से कायल होकर ही गुरुजी ने ढीठ विद्यार्थियों के लिए "घोंघा बसंत" जैसी विशिष्ट उपाधि का सृजन किया होगा। इस तरह से ढीठ विद्यार्थियों के लिए घोंघा बसंत एक आदर्श उपाधि है तथा वर्तमान में भी प्रचलन में है। जब मनुष्य अपनी मर्जी से चलता है, किसी के कहे का उस पर कोई असर नहीं होता तो उसे घोंघा प्रवृति कहा जाता है। कार्टुनिस्ट केशव शंकर पिल्लई ने तो व्यंग्य चित्र द्वारा इसे संविधान और माननीय नेताओं से भी  जोड़ दिया था। जिस पर बहुत हंगामा हुआ था। 
सिरपुर के घोंघा बसंत (फ़ोटो-ललित शर्मा)
जल और थल दोनों में घोंघा पाया जाता है। अपनी मंथर गति के कारण यह अमेरुदण्डिय निशाचर प्राणी नौ दिन चले अढाई कोस वाली कहावत को चरितार्थ करता है। व्यंग्यकारों ने भी इसके नाम को खूब भंजाया, इसकी आड़ में कई व्यंग्य लिखे  गए। नाम व्यंग्यकारों ने कमाया, बदनाम घोंघा बसंत जी हुए। इसीलिए कहते हैं माल खाए गंगा राम और मार खाए मनबोध। गौर करें तो घोंघा बसंत किसी मनबोधी से कम नहीं है। जब मन आया तो चल पड़े, जब मन आया तो अपने महल के भीतर आराम किए। कहते हैं कि इनकी वृद्धि बड़ी तेजी से होती  है। ये उभयलिंगी भी होते हैं। जब मन में आया तो स्त्री बन गए, जब किसी को गरियाना हो तो इनका पुरुषतत्व जाग उठता है। टू इन वन जैसी ही बात है, कभी रेडियो चला तो कभी टेप रिकार्ड प्ले कर लो।

शारीरिक संरचना की विशिष्टता देखने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि घोंघा बसंत वर्तमान में घुमक्कड़ों के लिए एक योग्य आदर्श हैं। व्हेनसांग से लेकर हमारे तक घुमक्कड़ी में प्रमुख रुप से आवास एवं जान-माल की सुरक्षा की समस्या होती  है। अनजान जगहों पर सबसे पहले ऐसा ठिकाना ढूंढना पड़ता है जहाँ जान माल की सुरक्षा के साथ रात गुजारने के लिए आवास की व्यवस्था हो जाए। घोंघा बसंत के समक्ष ये समस्याएं नहीं  है। न कहीं टेंट ढूंढने की जरुरत न कहीं होटल में कमरा तय करना पड़ता। यह खानाबदोश प्राणी है। खानाबदोश उसे कहते हैं जिसका घर कांधे पर हो। घोंघा बसंत का घर कांधे पर है जब चाहे तब भीतर घुस कर ढक्कन बंद करले और चैन की नींद ले। अपनी सुरक्षा अपने हाथ, खाना-पीना-घूमना सबके साथ।
पिट्ठुधारी घुमक्कड़

घोंघा बसंत का घर भी इतना सुरक्षित है कि आंधी, तूफान, बर्फबारी आदि का कोई असर ही नहीं होता। बोले तो एकदम फुल प्रूफ, ऐसे ही एक आवास कि जरुरत मुझे पड़ जाती है कभी-कभी घुमक्कड़ी के दौरान। काश! भगवान ने घुमक्कड़ों की पीठ पर ऐसा ही घर बना दिया होता तो सारी समस्याओं का समाधान हो जाता। यह तो तय हो गया कि घोंघा बसंत भी बड़े काम की चीज है। हो सकता है इंसान ने इससे ही प्रेरणा लेकर घुमक्कड़ों के लिए पिट्ठु बैग का निर्माण किया हो। अपना सामान खुद उठाओ और रास्ते लगो। इसलिए घोंघा बसंत की उपाधि धारण करने में कोई उपहास या बुराई नहीं है। अब तो मानना ही पड़ेगा कि गुरुजी सही कहते थे। जारी है …… आगे पढें

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

सिरपुर में एलियन्स ......Sirpur Chhattisgarh........ ललित शर्मा

उडनतश्तरी
प्राम्भ से पढ़ें 
मानव मन अज्ञात के प्रति प्रत्येक काल में ज्ञात होने के लिए दीवानगी की हद तक उत्सुक रहा है। फंतासियाँ गढ़ना, मनोरंजनार्थ उन्हें रोचक बनाकर प्रस्तुत करना आदिम काल से चला आ रहा है। जिनमे भूत-प्रेत, मानव के अमानवीय चमत्कारों, अन्तरिक्ष में चमक रहे तारों-सितारों एवं ग्रहों में निवास करने वाले परग्रहियों, देव एवं दानवों की शक्तियों की कथाओं का वर्णन प्रमुखत: सम्मिलित होता है।19 वीं सदी से वर्तमान तक समग्र विश्व एलियन नामक परग्रही की उपस्थिति को सिद्ध करने में लगा हुआ है। गाहे बगाहे एलियन का जिक्र होते रहता है। कभी कोई धरती पर या फिर अन्तरिक्ष में एलियन देखने का दावा करके रोमांचित करने का  प्रयास करता है।

फ़िल्मी जादू 
किसी-किसी ने एलियन के चित्र के लेने के भी दावे किये हैं। लेकिन वे चित्र इतने स्पष्ट नहीं हैं, जिससे एलियन की पहचान हो सके। एलियन के चरित्र को गढ़ने में फिल्मो का महत्वपूर्ण स्थान है। अधिकांश विदेशी फिल्मो में काल्पनिक कथाएँ गढ़ कर एलियन को मुख्य किरदार बना कर प्रस्तुत किया गया है। ऐसी ही एक फिल्म "कोई मिल गया" का हिंदी में मनोरंजनार्थ निर्माण हुआ। एलियन जैसी आकृति प्रागैतिहासिक काल के भित्ति चित्रों एवं प्राचीन शिल्पाकृतियों में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान पाई गयी। इनमे एलियन की वर्तमान में प्रचलित होकर रूढ़ हुई आकृति से मिलान करने पर अत्यधिक समानता पाने के कारण  परग्रहियों के पृथ्वी पर आने का अनुमान लगाया जाता है।

फ़िल्मी जादू
भारत भी उड़नतश्तरियों की कहानियों एवं दावों से अछूता नहीं है।  आजादी से पहले ओडिशा में एलियन को देखा गया था और बाकायदा इसका विवरण पारंपरिक ताम्रपत्र पर खुदाई कर दर्ज करवाया गया। 1947 में आजादी से कुछ ही महीने पहले ओडिशा के नवागढ़ जिले में एक उड़ने वाली अज्ञात वस्तु उतरी थी। स्थानीय कलाकार पचानन महाराणा ने इस घटना को ताम्रपत्र पर दर्ज किया था। एलियन्‍स की इसी तरह की पुरानी कहानियों को दर्ज करने वाले ऎसे पत्रों को अब 'दी ऑब्लिट्रेरी जर्नल' में कॉमिक्स और दृष्टांतों के साथ प्रकाशित किया गया है। पुरी में कार्यशाला चलाने वाले सम्मानित "पट्टचित्र" कलाकार पचानन ने एलियन व उनके विमान के रेखाचित्र बनाए थे। ये एलियन 31 मई 1947 को पहाड़ी इलाके नयागढ़ में उतरे थे। इससे एक महीने बाद ही न्यू मेक्सिको के पास रोसवेल में एक संदिग्ध दुर्घटना हुई थी। अमरीकी वायुसेना ने दुर्घटनास्थल पर एक उड़नतश्तरी को बरामद करने का दावा किया।

रायसेन जिले से प्राप्त शैलचित्र 
नर्मदा घाटी के प्रागैतिहासिक शोध के दौरान सिड्रा अर्किओलोजिकल एनवायरमेंट रिसर्च ट्राइब वेलफेयर सोसायटी के अनुसार रायसेन जिले से 70 किलोमीटर दूर भरतीपुर के घने जंगलों के शैलाश्रयों में मिले प्राचीन शैल चित्रों के आधार पर अनुमान लगाया है कि यहाँ दूसरे ग्रह के प्राणी आए होंगे। यहाँ उड़न तश्तरी की भी तश्वीर उकेरी गयी है। इस चित्र में उकेरी गयी एलियन जैसी खड़ी आकृति का सिर बड़ा है। प्रागैतिहासिक मानव अपने आस पास नजर आने वाली चीजों को पहाड़ों की कंदराओं में उकेरते थे। संभव है कि उन्होंने किसी उड़नतश्तरी जैसी आकृति एवं एलियन को पृथ्वी पर देखा होगा तभी इनके चित्र गुफाओं में उकेरे। रायसेन से मिले शैलचित्र आदि मानव की तत्कालीन जीवन शैली से मेल नहीं खाते। कुछ इसी तरह के चित्र भीम बैठका एवं रायसेन जिले के फुलतरी गाँव की घाटी में भी मिले हैं।

सिरपुर से प्राप्त एलियन्स की प्रतिमा 
वर्तमान में प्रचलित परग्रहियों की आकृति से समानता लिए कुछ प्रस्तर एवं मिटटी की आकृतियाँ छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के सिरपुर में स्थित दक्षिण कोसल की राजधानी श्रीपुर के उत्खनन के दौरान प्राप्त हुयी हैं। उत्खनन में प्राप्त आकृतियों में से एक तो हुबहू एलियन की शक्ल से मिलती है। काले रंग की इस शिल्पाकृति की आँखे तिरछी हैं। सिर गंजा, छोटा सा मुंह, एवं नासिका से लेकर गुद्दी तक दो रेखाएं खिंची हुयी हैं। नर्मदा घाटी से प्राप्त शैलचित्रों में चित्रित आकृति को देख कर तो मात्र अनुमान लगाया जा रहा है, लेकिन सिरपुर से प्राप्त शिल्पाकृतियों को देखने के पश्चात् माना भी जा सकता है कि आज से ढाई हजार पूर्व के लोगों ने एलियन्स को देखा था। सिरपुर के उत्खनन निर्देशक अरुण कुमार शर्मा का मान्यता है कि सिरपुर में परग्रही प्राणियों (एलियन्स) का आना-जाना था।

अरुण कुमार शर्मा 
अन आइडेंटिफाई ऑब्जेक्ट्स याने उड़नतश्तरी पर शोध तो सैकड़ों वर्षों से चल रहा है। लेकिन इनके अस्तित्व को लेकर किसी निर्णय पर नहीं पंहुचा जा सका है। एलियन की सत्यता की खोज में विश्व की कई संस्थाएं अध्ययन में लगी है एलियन की खोज में आम आदमी को शामिल करने के लिए एक वेबसाइट सेटीलाइव डॉट ओआरजी को लॉंच की गई है. अमेरिका के शोधकर्ता डॉक्टर टार्टर ने अपना पूरा करियर एलियन की खोज में लगा दिया है. मंगल पर भी एलियन होने के चिन्ह प्राप्त होने का दावा किया जा रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि आगामी 40 वर्षों के दौरान एलियन की प्रमाणिक खोज हो जाएगी। हमें उस दिन की प्रतीक्षा है  जब सिरपुर में प्राप्त एलियन की शिल्पाकृतियाँ दक्षिण कोसल में परग्रहियों  के आगमन के प्रमाण के रूप में सिद्ध होंगी। उत्खनन निर्देशक अरुण कुमार शर्मा का अनुमान सत्य साबित होगा। .......... जारी है  ...... आगे पढ़ें 

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

एलियन से फोन पर बात चीत : सत्य घटना

आज तो हमारे साथ गजब ही हो गया. एलियन से बात  गई, लोग सोचते हैं कि  एलियन परग्रही हैं, उनसे बात नहीं हो सकती, परन्तु मेरी एलियन से बात हुई, यह सत्य घटना है. सुबह योगेन्द्र मौदगिल जी से फोन पर बतिया रहे थे. बड़ा मजा आ रहा था. एक से एक किस्से निकलते जा रहे थे और हंसी के ठहाके फोन पर ही लग रहे थे.  

सुबह सुबह हास्य टानिक एवं विटामिन का सेवन हो रहा रहा. मुझे ऐसा लगा कि बचपन में मेले के बिछड़े हुए किसी भाई से मुलाकात हो गई है. बड़ा आनंद का समा बंधा हुआ था. इस मुलाकात का जिक्र तो फिर करेंगे.

जैसे ही मैंने फोन बंद किया और वैसे ही एक काल और आई, 

फोन नंबर मुझे तो कहीं बाहर का लगा, 

उठाया तो आवाज आई "ललित भाई नम्बर देख रहे हैं क्या? 
कहाँ का है? 

आवाज मेरी समझ में नहीं आई. मुझे लगा कि हमारे एक मित्र विनोद गुप्ता जी का है, जो अभी सचिवालय में विशेष सचिव है. 

योगेन्द्र जी से बात होने के बाद मैं भी बड़े हलके मजाक के मूड में था, सोचा कि विनोद गुप्ता जी किसी नई कंपनी के नंबर से मजे ले रहे है. 

तो मैंने कहा कि "लगता है अन्तरिक्ष का नंबर है किसी का."

तो फोन में आवाज आई, "अन्तरिक्ष में किसको किसको जानते हैं?"

मैंने कहा "अन्तरिक्ष क्या पूरा ब्रह्माण्ड हमको जानता है."

बस फोन पे आवाज आई "अन्तरिक्ष से ही बोल रहा हूं."

अब मैं चक्कर में पड़ गया और मेरी तो पुतली घूम गई के आज तो भाई एलियन का फोन आ गया, और अब इनकी निगाह मेरे गांव पर पड़ गई, एकाध दिन में यु ऍफ़ ओ (उड़न तश्तरी)यहीं उतरने वाला. अब क्या होगा? बस अब तो वाट लग गई. 

दिसम्बर 2012 का महाप्रलय तो मेरे लिए 16 दिसंबर 2009 में ही आ गया. कुछ दिन और जी लेते दोस्तों के साथ खा पी के मौज मना लेते, भले ही फिर चाहे कुछ भी हो जाये. ऐसे सोच रहा था. 

तभी फोन में आवाज आई "पहचाना"? 

अब मैं पहचानने की कोशिश करने लगा कि "ये तो भाई कोई जानकर आदमी है. जो मौज ले रहा है. ऐसी स्थिति में कह भी नहीं सकता था कि नहीं पहचान पाया यार जरा नाम तो बताओ? 

फिर उधर से आवाज आई "ललित भाई मैं समीर लाल बोल रहा हूँ." 

क्या बताऊँ ? जिस कुर्सी पे मैं बैठा वो ही उछलने वाली थी. बच गया, 

"हाँ कहिये समीर भाई क्या हाल चाल है?"

ऐसा लगा कि कहीं लाखों चिराग लाल उठे हैं. एक रौशनी का सैलाब सा आ गया. 

समीर भाई ने कहा कि "मैं मार्च अप्रेल में आ रहा हूँ. अगर हो सका तो फरवरी में भी पहुँच सकता हूँ." 

फिर कुछ बातें और हुई, उन्होंने राजकुमार ग्वालानी जी का नंबर लिया मेरे से और उनसे बात करने निकल पड़े. 

हम तो बहुत खुश हैं कि अब हमारे गांव में भी उड़न तश्तरी लैंड करेगी और गांव के लोग भी देख पाएंगे. उड़न तश्तरी कैसी होती है? अब तक तो सिर्फ नाम ही सुना था. "समीर भाई शुक्रिया" समझाना कि ये कविता आपको  बुलाने के  लिए पुकार है. 

इसी ख़ुशी में हमारे ब्लॉग ने भी नया चोला पहन लिया पुराना उतार कर, कैसा लगा बताएं?
 ओ!!!! मेरे परदेशी सजना
लौट के आ घर दूर नही
बाट जोह रही राह है तेरी
आ जा अब तू जरुर यहीं

बालकपन का भोला बचपन
रह-रह याद दिलाता है
गांव पार का बुढा बरगद
तुझको रोज बुलाता है

खेलकूद कर जिस पर तुने
यौवन पाया जरुर यहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना.....

पनघट की जिस राह चला तू
उसकी याद सताएगी
चंदा की पायल की छम-छम
प्रीत के गीत सुनाएगी

पंख फैलाये नाचेंगे तेरे
चारों ओर मोर वही
ओ!!!मेरे परदेशी सजना........

आए बसंत तो सुमन खिलेंगे
पवन झकोरे खूब चलेंगे
महकाए जो तुझे हमेशा
मधुर सुवासित समीर बहेंगे

खेतों की विकल क्यारी की 
तुझे याद आएगी जरुर कहीं
ओ!!!! मेरे परदेशी सजना........

वह माँ के आँचल की छाया
जिसमे छिपकर सो जाता था
वही पुराना टुटा छप्पर
जहाँ सपनों में खो जाता था

मधुर सुरीली माँ की लोरी
तुझे तडफाएगी जरुर कहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना
लौट के आ घर दूर नही..