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शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

बारुद के धमाकों के बीच संस्कृति को बनाए रखने का प्रयास : मुलमुला


मुलमुला! हां यही नाम लिया अनुज ने। मुलमुला चलना है भैया 21 दिसम्बर को वहां "अनुज नाईट" का आयोजन है। छत्तीसगढ़ी फ़िल्म स्टार अनुज शर्मा ने फ़ोन पर निमंत्रण दिया। मुलमुला गाँव का नाम मैने पहले भी सुना था। यह गाँव अकलतरा क्षेत्र में है। अनुज शर्मा ने बताया कि हमें जिस मुलमुला जाना है वह कोण्डागाँव (बस्तर अंचल) से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर है। मेरे घर से कोण्डागाँव तक का सफ़र लगभग 4 घंटे का है. कोण्डागाँव निवासी साहित्यकार एवं ब्लॉगर हरिहर वैष्णव जी से मिलने एवं चर्चा करने का लोभ भी मेरे मन में उत्पन्न हो रहा था। उन्हे फ़ोन लगा कर कोण्डागाँव आने की सूचना दी। उन्होने कहा कि वे भी हमारे साथ मुलमुला चलेगें। चलो ये भी सोने में सुहागा हो गया। अब काफ़ी समय मिलेगा चर्चा करने के लिए। 
बस के यात्री
दोपहर अनुज का फ़ोन आने के बाद मैं तैयार था अनुज शर्मा नाईट की टीम के साथ सफ़र करने को। सड़क पर आकर देखा तो बड़ी लक्जरी बस दिखाई दी। प्रवेश करने पर उसमें अनुज की सारी टीम अपने साज-ओ-समान के साथ मौजूद थी। अब मैं भी इनकी टीम का हिस्सा बन चुका था। अनुज को छोड़ कर बाकी चेहरे मेरे लिए अनजान थे। ऐसी स्थिति में मुझे पुस्तकों की  याद आई। होता तो यही है किसी से प्रथम मिलने के पहले वे अनजान ही होते हैं। मिलने पर जानपहचान के साथ स्वभावानुसार मित्रता होती है। सफ़र के दौरान समय काटने का सर्व प्रचलित साधन बावनपरी को माना जाता है। 
अनुज नाईट - मुलमुला
चाहे रेलगाड़ी के दैनिक यात्री  हों या फ़िर बस के लम्बे सफ़र के यात्री। जेब से ताश  की गड्डी निकालने के बाद खिलाड़ी मिल ही जाते हैं। चाहे वे किसी अन्य प्रांत के भी निवासी हों। हमारी बस में भी यही चल रहा था। ताश के कुछ खेल पूरे भारत में खेले जाते हैं भले ही उन्हे अन्य नामों से पुकारा जाता हो। एक दो बाजी देखने के बाद समझ में आ जाता है कि कैसे खेला जा रहा है और इस खेल के क्या नियम हैं। मुझे याद नहीं कि मैने कब ताश खेली होगी क्योंकि ताश के लिए समय नहीं मिल पाता और इतने निठल्ले लोग भी नहीं मिल पाते जिनके साथ ताश खेली जा सके। आज मैं कुछ घंटों के लिए निठल्ला ही था। मैं भी ताश युद्ध में सम्मिलित हो गया। दोपहर का भोजन गुरुर की पुलिया के दाएं तरफ़ बने ढाबे में था।
बोरियों पर जमे दर्शक
लगभग 25-30 लोगों को एक साथ भोजन कराने में ढाबे वाले को अच्छी कवायद करनी पड़ती है। साथ ही एक फ़ायदा भी रहता है कि पुराना-धुराना जितनी भी सब्जी-दाल इत्यादि सामग्री है वह भी खप जाती है। अगर दाल कम पड़ गयी तो थोड़ा पानी डालकर नमक मिर्च का तड़का लगा कर बढाई जा सकती  है। भोजनोपरांत हम आगे चल पड़े। केसकाल घाट पार करने के बाद मैंने हरिहर वैष्णव जी को फ़ोन लगाया तो उन्होंने सभी को चाय का निमंत्रण दिया। लेकिन साथ चलने के वादे से मुकर गए। यह एक झटका ही था मेरे लिए। कोण्डागाँव के आगे चलकर जगदलपुर मार्ग पर पर्यटन विभाग के रिसोर्ट में चाय नास्ते का इतंजाम था बस को रवाना कर दिया गया, उसमें सांउड लाईट का सारा सामान था। हमारे पहुंचने से पहले साऊंड लाईट सब तैयार हो जानी थी और हमें छोटी गाड़ियों से हमें मुलमुला जाना था।
अनुज शर्मा का गायन
हम 10 बजे मुलमुला के लिए चले। रास्ते में मोटर सायकिलों पर तीन-तीन, चार-चार सवारियाँ एवं जिसको जो भी साधन मिला वह उसी से अनुज शर्मा नाईट का आनंद लेने के लिए मुलमुला की ओर जा रहे थे। कार्यक्रम स्थल पर पहुचने पर देखा कि ठंड के मौसम में खुले आसमान के नीचे नर-नारियों की भीड़ देख कर आश्चर्य में पड़ गया। सभी बेसब्री से कार्यक्रम प्रारंभ होने का इंतजार कर रहे थे। जब दर्शक मनोयोग से कार्यक्रम देखना-सुनना चाहे तो कलाकार को प्रस्तुतीकरण में आनंद आता  है। अनुज शर्मा नाईट के मैनेजर एम के गुप्ता मुस्तैदी से कार्य में लगे हुए थे। इस उम्र में उनकी उर्जा देखते ही बनती है। लगभग 11 बजे हीरो की एन्ट्री के साथ दर्शकों  में कौतुहल जागता है। मंच पर आक्टोपेड पर नरेन्द्र, ढोलक पर डॉ एस के लाहोर एवं बिक्कु, आर्गन पर यदुनंदन एवं नवनीत के साथ साऊंड लाईट की व्यवस्था मनोज साऊंड द्वारा हो चुकी थी।
ज्ञानिता द्विवेदी का प्रस्तुतिकरण
मुझे जानकारी नहीं थी अनुज अभिनय के साथ गाते भी हैं। उन्होने दर्शकों को अपने गीतों से बांध लिया। सहयोगी गायकों के रुप में अनुराग शर्मा एवं ज्ञानिता द्विवेदी ने मनमोहक प्रदर्शन किया। महिला बाल विकास मंत्री लता उसेंडी ने कार्यक्रम में उपस्थित होकर सभी को दियारी तिहार की बधाई दी। कार्यक्रम स्थल पर प्रशासन द्वारा सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गयी थी। 11 बजे रात्रि से प्रारंभ हुआ कार्यक्रम विद्युत बाधा के साथ सतत 2 बजे तक चलता रहा। दर्शक रात भर सुनना चाहते थे। लेकिन वे क्या जाने कि अनुज शर्मा नाईट सिर्फ़ 3 घंटे की होती है। साजिदों ने सामान समेट लिए। लेकिन दर्शक अभी तक अपनी बोरियों पर जमें थे। इस कार्यक्रम में अनुज को सुनने के लिए 50-50 किलो मीटर से भी दर्शक आए थे।
दर्शकों की भीड़
दीवाली त्यौहार बीतने के एक माह के बाद मनाए जाने वाले दियारी तिहार के विषय में मेरी जानने की उत्सुकता थी। हरिहर वैष्णव जी ने बताया कि दियारी तिहार बस्तर अंचल का प्रसिद्ध तिहार है। जिस तरह हम दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा करते हैं उसी तरह बस्तर अंचल में पूष एवं माघ के महीने में कृषि कार्य से निवृत्त होने पर स्थानीय निवासी प्रत्यके ग्राम समूह में दियारी तिहार का उत्सव मनाते हैं। प्रत्येक गाँव में तिहार मनाने का दिन निश्चित होता है और निश्चित दिन ही मनाया जाता है।

अनुज नाईट की टीम
इस तिहार में ग्राम वासी अपने निकट संबंधियों एवं मित्रों को निमंत्रित करते हैं और सबकी उपस्थिति में उल्लासपूर्ण ढंग से पूजा पाठ कर दियारी उत्सव को मनाया जाता है। जिस दिन तिहार मनाना निश्चित होता है उसकी पूर्व रात्रि को चरवाहा (यहाँ पशु चराने का कार्य (गांदा) गाड़ा जाति करती है) ग्राम के प्रत्येक घर में जाकर पशुओं को "जेठा" (सोहाई) बांधता है। जेठा बांधने आए हुए चरवाहे का सम्मान द्वार पर आरती उतार कर किया जाता है।
जरा नच के दिखा
इसके पश्चात अगले दिन सभी पशुओं को नहला कर पूजा की जाती है तथा विभिन्न तरह की सब्जियों एवं अनाज से तैयार खिचड़ी खिलाई जाती है। तत्पश्चात इस खिचड़ी को तिहार के प्रसाद के रुप में गृह स्वामी एवं परिजन ग्रहण करते हैं। चावल के आटे से घर की दुआरी में पद चिन्ह बनाए जाते हैं। जो लक्ष्मी के आगमन का सूचक होता है। इसके बाद गोवर्धन भाटा में गांव का बुजुर्ग एक बैल पर सिंगोठा (सिंगबांधा) बांध कर दौड़ाता है  जिसे चरवाहे को पकड़ना होता है। अगर चरवाहा बैल  को पकड़ लेता है तो उसे पुरस्कार दिया जाता है यदि चरवाहा बैल को नहीं पकड़ पाता तो उसे दंड दिया जाता है। 
दियारी तिहार के गाड़ा गाड़ा बधई
मैदान में एक स्थान पर चरवाहे की पत्नी दीया जलाकर बैठती है, यहां पर ग्राम वासी उसे दक्षिणा स्वरुप अन्न-धन देते हैं। (बैल पकड़ने की प्रथा विवाद होने के कारण वर्तमान में कई गांवों में बंद करा दी गई है। सिर्फ़ परम्पराओं का ही निर्वहन किया जाता है। अत: दियारी तिहार को मैं कृषि से जुड़ा हुआ त्यौहार ही मानता हूं। रात तीन बजे रिसोर्ट में पहुंच कर भोजन किया। भोजनोपरांत अपने गंतव्य की ओर लौट चले दियारी तिहार मना कर…… बंदुक की गोलियों एवं बम के धमाकों के बीच परम्पराओं को निभाने की जद्दोजहद जारी है बस्तर अंचल में ………। 

शनिवार, 6 अगस्त 2011

मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन --- ललित शर्मा

छत्तीसगढी फ़िल्म उद्योग छालीवुड के नाम से पहचाना जाता है, छालीवुड नाम की पहचान बनाने में "मोर छंइया भुंईया" नामक फ़िल्म की महती भूमिका है। नए राज्य छत्तीसगढ के निर्माण के साथ ही इस फ़िल्म का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ और इसने सफ़लता के झंडे गाड़ दिए। इस फ़िल्म ने अनुज शर्मा की मुख्य अभिनेता के रुप में पहचान बनाई। फ़िल्म के निर्देशक सतीश जैन थे, फ़िल्म के गीत भी कर्णप्रिय थे। इस फ़िल्म की सफ़लता के पश्चात छालीवुड में फ़िल्म निर्माण का सिलसिला प्रारंभ हो गया। मनु नायक की "कहि देबे संदेश" जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म की असफ़लता के पश्चात छत्तीसगढी भाषा की फ़िल्मे एक लम्बे समय से बनना ही बंद हो गयी थी। मृतप्राय सी छत्तीसगढी फ़िल्मकारों की आशाओं को "मोर छंइया भुंईया" ने एकाएक जगा दिया। सन 2000 से लेकर 2010 तक छालीवुड ने एक लम्बा सफ़र तय किया। फ़िल्म निर्माण की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा एवं टाकीजों से मुंह मोड़ चुके दर्शक पुन: फ़िल्म देखने के लिए टाकीजों की तरफ़ चल पड़े।

फ़िल्म  का एक सीन
छालीवुड में बाक्स ऑफ़िस पर भीड़ जुटाने छत्तीसगढी फ़िल्में कामयाब रही। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का भरपुर मौका मिला। रंगमंच से जुड़े कलाकार भी सुनहले पर्दे पर दिखाई देने लगे। उनकी भी पूछ परख होने लगी। दस वर्ष के सफ़र के पश्चात छालीवुड में फ़्लाप फ़िल्में आने लगी। लगा कि गाड़ी पटरी से उतर रही है। इसी दौरान अनुज शर्मा ने अभिनय के साथ फ़िल्म निर्माण का फ़ैसला लिया और मनोज वर्मा के निर्देशन में महत्वाकांक्षी फ़िल्म मिस्टर टेटकूराम बना डाली। इस फ़िल्म के कुछ गानों की शुटिंग प्रदेश से बाहर जाकर हिमाचल की सुरम्य वादियों में की। शायद यह पहला मौका था जब छत्तीसगढी कलाकार प्रदेश के बाहर जाकर किसी  अन्य लोकेशन पर फ़िल्म की शुटिंग कर रहे थे। इसकी सूचना कुछ मित्रों से मिली थी। मिस्टर टेटकू राम का प्रीमियर शो 5 अगस्त को प्रभात टाकीज में हुआ। प्रीमियर शो देख कर निकले दर्शकों ने फ़िल्म की भूरि-भुरि प्रशंसा की।

पुष्पेन्द्र सिंह (फ़त्ते) और ललित शर्मा
इस फ़िल्म की प्यार एवं हास्य मिश्रित पटकथा अच्छी बन पड़ी है। फ़िल्म में अनुज शर्मा ने टेटकू राम, पुष्पेंद्र सिंह ने मकान मालिक फ़त्ते, पूजा साहू ने टुनकी, शिवकुमार दीपक ने दादा, हेमलाल कौशल ने टॉमी, संजय महानंद ने गुग्गी, आशीष शेंद्रे ने टेटकू राम के पिता की भूमिका निभाई है। फ़िल्म की कहानी मकान, मकान मालिक एवं किराएदारों के ईर्द-गिर्द ही घूमती है। फ़त्ते के मकान में कुछ किराएदार रहते हैं, जिसमें टेट्कूराम नगर निगम में अधिकारी के पद पर कार्यरत है, इसे एक रेड़ियो जॉकी की आवाज इतनी मधूर लगती है कि आवाज सुनकर उससे प्यार पींगे बढाने लगता है, फ़त्ते की लड़की अपने बाप से छिपकर रेड़ियो जॉकी का काम करती है। गाजा बजाना फ़त्ते को पसंद नहीं है, इसकी बड़ी लड़की ने एक तबला वादक से विवाह कर लिया, तब से फ़त्ते उससे नाराज होकर संबंध तोड़ चुका है। टुनकी अपने पिता के सगीत विरोधी होने के कारण उसे स्कूल में काम करना बताती है। घर में रहने वाले किसी किराएदार को टुनकी के कार्य के विषय में जानकारी नहीं होती।

संजय महानंद (गुघ्गी)
फ़िल्म में छत्तीसगढ में किसानों की जमीन बिल्डरों द्वारा खरीदे जाने पर भी गहरा कटाक्ष किया है। गुघ्गी एक जमीन दलाल है और वह फ़त्ते के मकान की जमीन पर नजर गड़ाए रहता है। उसका एकमात्र ध्येय किसी तरह फ़त्ते की जमीन खरीदना रहता है, वह उसे रुपए का लालच देता है, लेकिन फ़त्ते मकान बेचना स्वीकार नहीं करता और उसे घर से भगा देता है। इसी बीच टेटकू राम की मोबाईल बातचीत रेड़ियो जॉकी से होती है। जब वह उससे नाम पूछती है तो उसे अपना नाम टेटकू राम बताने में शर्म आती है। वह नाम नहीं बताता, टॉमी की सलाह से टेटकू राम से शार्ट नेम लगा कर टी.आर.साहू हो जाता है। अपने माँ-बाप से नाम के विषय में पूछता है तो उसकी माँ बताती है कि उसके बच्चे जन्म लेने के बाद नहीं रहते थे इसलिए इस बच्चे का नाम टोटका स्वरुप टेटकू राम रख दिया। फ़त्ते और टेटकू राम का बाप टुनकी और टेटकू का रिश्ता आपस में तय कर देते हैं। जिससे टेटकू राम एवं टुनकी दोनो नकार देते हैं। क्योंकि टेट्कू नहीं जानता था कि टुनकी ही रेड़ियो जॉकी है और टुनकी नहीं जानती थी कि जिस मोबाईल कॉल वाले लड़के से प्यार की पींगे बढा रही है वह और कोई नहीं टेटकूराम ही है।

अनुज शर्मा और हेमलाल यादव
एक दिन टुनकी और टेटकू मिलकर एक दुसरे के विषय में जान जाते हैं। इसी बीच किराएदारों में शामिल दादा के पोते की तबियत खराब होने के कारण उसे अस्पताल में दाखिल कराया जाता है, तब टेटकू अपने पिता से कहके गाँव चला जाता है और फ़त्ते अपना घर गुग्गी को बेच देता है। इससे सारे किराएदार उसे लानत-मलानत भेजते हैं, भला-बुरा कहते हैं। तभी टेटकू सबको आकर बताता है कि दादा के पोते की किडनी खराब हो गयी है और उसके इलाज के लिए ही फ़त्ते ने अपना मकान बेच दिया है। वह कहता है कि उसने डाक्टर को रुपए चुका दिए हैं अब मकान बेचने की आवश्यकता नहीं है। टेटकू गाँव का मकान बेचकर बच्चे की जान बचाने का संवेदनात्मक मानवीय पक्ष उजागर करता है। गुग्गी को रुपए वापस कर देते हैं तो उसे यह नागवार गुजरता है। इसके बाद फ़िल्म बंबईया मसाला फ़िल्मों जैसे क्लाईमैक्स की ओर बढ जाती है। अंत में ढिसुम-ढिसुम के पश्चात फ़त्ते अपनी लड़की टुनकी का हाथ टेटकू राम के हाथ में दे देता है। फ़िल्म अपनी गति की ओर बढ जाती है।

पूजा साहू
जहाँ अनुज शर्मा के अभिनय में परिपक्वता है, वहाँ फ़त्ते के रुप में पुष्पेंद्र सिंह का सशक्त अभिनय है, संवाद के साथ चेहरे के हाव-भाव मेल खाते हैं, इनके अभिनय में रंगमंच के मंजे हुए कलाकार की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। नायिका की दोहरी भूमिका में पूजा साहू का अभिनय ठीक रहा। टामी का पात्र निभाने वाले हेमलाल कौशल का प्ले मैने देखा था, उस दिन लगा था कि इसका चेहरा-मोहरा राजपाल यादव से मिलता जुलता है। वैसी भूमिका इसने फ़िल्म में भी निभाई है।  गुग्गी के रुप में संजय महानंद ने पंजाबी भाषा का छत्तीसगढी के साथ मिश्रण करके उम्दा हास्य संवाद प्रस्तुत किया। शिव कुमार दीपक ने वृद्ध दादा की भूमिका अच्छे से निभाई। उपासना वैष्णव एवं बाल कलाकर आयुष का भी प्रदर्शन बेहतरीन रहा। आशीष शेंद्रे ने भी टेटकूराम के पिता की भूमिका में कोई कसर नहीं छोड़ी। फ़िल्म निर्देशन भी अच्छा है।फ़िल्म में टायटिल सांग प्रयोग किया गया है।

पुष्पेन्द्र सिंह फ़त्ते की भू्मिका में
सुनील सोनी के संगीत के साथ मशहूर छत्तीसगढी गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया एवं कुबेर गीतपरिहा ने.गीत लिखे हैं, गीतों को स्वर सुनील सोनी, अलका चंद्राकर, विजया राऊत एवं अनुज शर्मा ने दिया तथा फ़िल्मांकन दिनेश ठक्कर ने किया है। कुछ गीत धूम मचा सकते हैं। कुल मिलाकर फ़िल्म में वह सब मसाला है जिससे फ़िल्म चला करती है। चुटीले हास्य के साथ प्रेम कहानी का उम्दा प्रयोग किया है। स्वस्थ मनोरंजन से भरपुर परिवार के साथ बैठकर देखने लायक फ़िल्म है। आशा है मिस्टर टेटकूराम एक सफ़ल फ़िल्म साबित होगी तथा 2011 में मील का पत्थर बनकर छालीवुड को फ़्लाप फ़िल्मों के दौर से बाहर लेकर आएगी।  भरपुर हास्य का मजा लेना है तो एक फ़िल्म देखें। अभ्युदय इंटरटेनमेंट एवं शर्मा एवं वर्मा की समस्त टीम की हार्दिक शुभकामनाएं। फ़िल्म का प्रोमो यहाँ पर देखें


NH-30 सड़क गंगा की सैर

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

मि. टेटकू राम

छत्तीसगढी फ़िल्मों के सुपर स्टार अनुज शर्मा की नई फ़िल्म मि. टेटकू राम का प्रीमियर कल सुबह 5 अगस्त 2011 को प्रात: 9 बजे प्रभात टाकीज रायपुर में होने जा रहा है। छइयां भूईयाँ से लेकर मि. टेटकू राम का सफ़र तय करने वाले अनुज शर्मा इस फ़िल्म के प्रोडयुसर एवं हीरो हैं। आप सभी प्रीमियर में सादर आमंत्रित हैं। अब प्रभात टाकीज में आपसे 9 बजे भेंट होगी।



ललित शर्मा, अनुज शर्मा (मि. टेटकू राम) एवं राहुल सिंह जी



आपका इंतजार है



NH-30 सड़क गंगा की सैर