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सोमवार, 14 जनवरी 2013

कैसे उजड़ा श्रीपुर ? Sirpur ………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
सिरपुर भ्रमण करने के बाद सामन्यत: पर्यटक के मन में यह विचार आता है कि कोसल जैसे विशाल राज्य की समृद्ध एवं वैभवशाली राजधानी श्रीपुर का पतन कैसे हुआ? इस नगरी का वैभव कैसे उजड़ गया? ऐसा क्या हुआ होगा जो श्रीपुर को पतनोन्मुख होना पड़ा? मेरे भी मन में यह प्रश्न उठने लगे। एक तरफ़ जहाँ महाशिवगुप्त जैसे बलशाली राजा हुए, जिन्होने लगभग 60 वर्षों तक सिरपुर पर शासन किया। उनके शासन काल में सभी धर्मों एवं मतों  को समान आदर मिला। विद्वानों को उनके राज्य में संरक्षण मिला। महाशिवगुप्त बालार्जुन का शासन काल राज्य का स्वर्णिम युग था। उसने कभी न सोचा होगा कि इस वैभवशाली राजधानी का पतन भी हो सकता है। किसी शहर, नगर या राजधानी का पतन एकाएक नहीं होता। जब उसे उतकर्ष पर पहुंचने में शताब्दियाँ लग जाती हैं तो पतन होने भी समय लगता है। श्रीपुर के पतन के अनेक कारण हो सकते हैं। जिनमें से कुछ हमें प्रत्यक्ष रुप से वहां के स्मारकों में परिलक्षित होते हैं।
पतन के कारण - महानदी की बाढ
अगर हम सिरपुर की भौगौलिक स्थिति देखें तो नगर के पश्चिम दिशा में महानदी प्रवाहित होती  है। उनके प्रवाह के कारण किनारों का क्षरण होता है। निरंतर कटाव के कारण नदियाँ बरसात के दिनों में अपना रास्ता भी बदल लेती हैं। अब यह तय नहीं होता कि कौन से किनारे तरफ़ कटाव अधिक होगा। उत्खन से ज्ञात है कि सिरपुर व्यापार की बहुत बड़ी मंडी था। यहाँ उत्खन में कई एकड़ों में बाजार क्षेत्र प्राप्त हुआ है। यह बाजार क्षेत्र महानदी के किनारे पर स्थित है। जब राजधानी बसी होगी तब महानदी का किनारा इतना दूर रहा होगा कि राजधानी को बाढ आदि से हानि न पहुंच सके। क्योंकि महानदी के किनारे उत्खनन में राजमहल परिसर भी प्राप्त हुआ है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा ने अपना महल सुरक्षित क्षेत्र में बनवाया होगा।
सुरंग टीला का महामंड़प 
बाजार में उत्खन से प्राप्त भवनों में मरम्मत के चिन्ह मिलते हैं। प्रतीत होता है कि अत्यधिक वर्षा होने से महानदी का प्रवाह तटबंध तोड़कर बाजार क्षेत्र में प्रवेश कर जाता था। जिसके कारण भवनों को हानि पहुंचती थी। बाढ का पानी उतरने के बाद निवासी अपने भवनों की मरम्मत कराते थे। बाजार क्षेत्र के भवनों में मूल निर्माण सामग्री के अलावा उस समय उपलब्ध निर्माण सामग्री से मरम्मत कराने के स्पष्ट प्रमाण दिखाई देते हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सिरपुर के पतन में महानदी की बाढ की भूमिका को नजर अंदाज नहीं  किया जा सकता। वर्तमान सिरपुर में भी महानदी में बाढ आने पर नगर को हानि पहुंचने की आशंका बनी रहती होगी।
पतन के कारण -भुकम्प
हम देखते हैं कि भूकंप आने पर बड़े बड़े नगर और राजधानियां कुछ पलों में निर्जन हो जाती हैं। धरती का एक बार थरथराना ही हजारों लाखों लोगों को काल के आगोश में समा देता है। श्रीपुर  के पतन में भुकंप की भूमिका भी रही होगी। भुकंप के चिन्ह सुरंग टीला स्थित पंचायत मंदिर के अधिष्ठान में दिखाई देते हैं। देखा जाए तो सुरंग टीला मंदिर की जगती भारत के मंदिरों में सबसे अधिक ऊंचाई पर है। दूर से देखने पर लगता है कि मिश्र के किसी पिरामिड के समक्ष खड़े हैं। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 43 सीढियां चढनी पड़ती हैं। इसका तल विन्यास नदी के तल से 17 फ़ुट ऊंचा है। वर्तमान में मंदिर सीढियाँ दबी हुई हैं। इनके कोण बदले हुए  हैं। विशाल मंदिर की संरचना में परिवर्तन सिर्फ़ भुकंप से ही आ सकता है। इससे स्पष्ट होता है श्रीपुर में भुकंप भी आया होगा। जिसके कारण इस नगर का पतन हुआ होगा।
मनसर का राजमहल( दबी हुई पैड़ियाँ)
भूकंप द्वारा विनाश के प्रमाण हमें अन्य स्थानों पर भी मिलते हैं। महाराष्ट्र के नागपुर जिले स्थित मनसर (मणिसर) में स्थित वाकाटक राजाओं के भग्न राजमहल का ढहने का कारण भुंकप हैं। भुकंप के चिन्ह राजमहल के भग्न भवन पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। मनसर से सिरपुर की दूरी लगभग 300 किलो मीटर होगी। हो सकता है दोनो जगह एक ही समय भुकंप आया हो। संयुक्त राष्ट्र भूगर्भीय सर्वे के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष रिक्टर स्केल 3 से 3.9 के 49000 हल्के, 6 से 6.9 के 120 अधिक तीव्र, 7.9 से 8 के 18 बड़े तथा 8 से 9 पर एक बहुत भीषण भुकंप आते हैं, पंजाब के उत्तर पूर्व में उत्तरांचल, टिहरी व गढ़वाल, दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण पूर्व में मध्य प्रदेश के क्षेत्र में भूकंप की दृष्टि से काफी संवेदनशील क्षेत्र माने जाते हैं।
पतन के कारण - बाह्य आक्रमण 
पाण्डुवंशियों में महाप्रतापी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन ने 60 वर्षों तक शासन किया। किसी भी राजा के द्वारा लम्बी अवधि तक शासन करना यह दर्शाता है कि उसका प्रभुत्व स्थापित था। उसके अड़ोसी-पड़ोसी राज्य या तो उसके मित्र थे या उससे भय खाकर आक्रमण नहीं करते थे। ऐसा ही महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में हुआ होगा।  लम्बा शासन काल अवश्य ही जनकल्याणकारी रहा होगा। इसके बाद के उसके उत्तराधिकारियों के नाकारा एवं निर्बल होने के कारण ताक में बैठे पड़ोसियों ने आक्रमण करके उन्हे परास्त कर दिया। जिससे महाशिवगुप्त बालार्जुन का विशाल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। साम्राज्यवादी चालुक्यों से ये बच नहीं सके।  इनकी निर्बल स्थिति का लाभ नलवंशी शासकों ने भी उठाया और दक्षिण कोसल एवं पश्चिम कोसल में अपनी प्रभुता स्थापित की। राजिम का राजीव लोचन मंदिर नल वंशी शासक विलासतुंग का बनवाया हुआ है। इससे जाहिर होता है कि नलवंशी महानदी के तीर तक पहुंच चुके थे।

पतन के अन्य कारण
नवमी शताब्दी के अंतिम चरण में कलचुरी शासक भी आ चुके थे। उस समय पाण्डुवंशियों ने उड़ीसा की तरफ़ पलायन कर लिया और विनीतपुर एवं ययातिपुर को राजधानी बनाई। कलचुरियों तुम्माण से राजधानी रतनपुर ले आए। श्रीपुर उपेक्षित रहा। इसके पश्चात कलचुरी शासकों में विभाजन के पश्चात रायपुर राजधानी बनी तब भी श्रीपुर उपेक्षित ही रहा। राजधानी के पतन के साथ व्यापारी भी उस स्थान पर चले गए जहाँ उन्हे व्यापार की संभावनाए  नजर आई। व्यापारियों को लाभ अर्जित करने से मतलब होता है। चाहे किसी का राज हो और कोई भी शासक हो। इस तरह श्रीपुर के लोग अन्य राजधानियों की ओर पलायन कर गए और श्रीपुर श्री विहीन हो गया।
राजमहल के पार्श्व में महानदी 
समय की मार से कोई नहीं बच पाया। विशाल साम्राज्यों को भी यह दिन देखने पड़े हैं। श्रीपुर में रह गए तो सिर्फ़ खंडहर और पीपल एवं बरगद के वे वृक्ष जिन्होने अपनी आँखों से सिरपुर को बसते एवं उजड़ते देखा। रह गया तो महानदी का वह किनारा जहाँ श्रीपुर जैसी राजधानी ने अपने वैभव का चर्मोत्कर्ष देखा। खंडहरों में बोलते उल्लू और उल्टे लटके चमगादड़ों का बसेरा रह गया। न जाने कितने वर्षों के बाद एक छोटा सा गाँव फ़िर बसा यहाँ के खंडहरों के अवशेषों को जोड़कर। एक बार फ़िर से गौरेया का बसेरा बना श्रीपुर, नया नाम सिरपुर धर कर। …… आगे पढें …

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

रामटेकरी (मनसर-महाराष्ट्र) ------------ ललित शर्मा

प्रारंभ से पढें
पृथ्वीसेन द्वितीय के बाद प्रवरपुर पर बौद्धों का कब्जा हो गया। पैलेस को बौद्ध विहार का रुप दे दिया गया। पैलेस के चारों ओर छोटी छोटी कुटिया बना दी गयी। जिसमें बौद्ध साधू निवास करने लगे। बौद्ध धर्म से संबंधित शिक्षाएं दी जाने लगी। बौद्ध धर्म की धार्मिक शिक्षाओं का केन्द्र बन गया। कहते हैं कि यहाँ बोधिसत्व नागार्जुन ने कुछ समय निवास किया था। इसी किंवदंती के सहारे बौद्धों ने जापान की सहायता से यहाँ पर उत्खनन करवाया। लेकिन उत्खनित इतिहास तो बहुत दूर तक जाता है। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। वाकटक राजाओं का इतिहास एवं उनका महल भी निकल आया।
प्रवरपुर पैलेस पर विध्वंस के चिन्ह, अग्निदाह एवं भूकम्प का प्रमाण

महल पर आज भी भूकंप के द्वारा विनाश के चिन्ह एवं नल राजाओं द्वारा जलाए जाने के चिन्ह दिखाई देते हैं। वीराने में प्रवरपुर का पैलेस अपने विध्वंस की गाथा स्वयं कहता है। बस इसे देखने एवं सुनने के लिए नजर होनी चाहिए। भग्नावेश से जाहिर होता है कि कभी यह स्थान भी अपनी बुलंदी पर रहा होगा। जहाँ बैठ कर राजा लोगों की किस्मत खरीदता होगा। प्रजा की किस्मत का लेखा-जोखा करता होगा। पर काल से आज तक कोई नहीं बच पाया। चाहे वह कितना ही बड़ा एवं कीर्तिवान क्यों न रहा हो। काल ने सबको धराशायी कर दिया। उससे बड़ा पहलवान ब्रह्माण्ड में दूसरा कोई नहीं। इसलिए कहते हैं "द्वितीयोनास्ति"।
प्रवरपुर पैलेस के  शिखर से दृश्यावलोकन

राजा प्रवरसेन की नगरी मनसर (प्रवरपुर) से जब हम रामटेक (रामटेकरी) की ओर बढे तो सूरज आग बरसा रहा था। प्यास बहुत जोरों से लग रही थी। मनसर पैलेस में हमारे अलावा कोई दूसरा पर्यटक नहीं था। मनसर देखने का आनंद अद्भुत था, इसी आनंद ने हमें भीषण गर्मी को झेलने लायक बना दिया। अन्यथा सड़क पर कोई दिखाई नहीं देता था। गर्मी में सब अपने एसी और कुलर चालु करके घरों के भीतर कैद थे। भूख भी जोरों की लग रही थी। सड़क के किनारे एक होटल देख कर गाड़ी रोकी गयी। पर वहाँ कोई त्यौहार होने के कारण रसोईया नहीं था। हम आगे बढ गए। महाराष्ट्र में लगभग हर होटल और ढाबे में परमिट बार है। गरमी के मौसम को देख कर पुराने दिनों  की याद आ गयी।
हिडिम्बा टेकरी पर श्री सत्येन्द्र शर्मा एवं संध्या शर्मा जी

जब दो ठंडी बीयर उदरस्थ कर गर्मी कम कर ली जाती थी। शरीर लू के थपेड़े झेलने लायक हो जाता है। फ़िर तो आग में से भी निकला जा सकता था। लेकिन समय को देखते हुए अब हमें राजा बेटा बनना ही पड़ गया। ललक तो कभी-कभी जोर मार देती है। पर आत्मबल रोक लेता है। ललचाई नजरों से देखते रहे ठंडी बीयर लोगों को पीते हुए। हाय रे हमारी किस्मत! ये न थी हमारी किस्मत, विसाले बीयर होता…… :) जिल्ले इलाही ने सर पर शमशीर लटका रखी थी। जहाँ भी होटल के भीतर जाता था। शर्मा जी पीछे आ जाते थे। आखिर हमने ईरादा त्याग दिया और एक होटल में भोजन करने पहुंच गए। 
प्रवरपुर पैलेस में दो ब्लॉगर

सुबह से लगभग 10 लीटर पानी पी चुका था। एक लीटर पानी एक बार में अंदर हो जाता और आधे घंटे में भाप बनकर उड़ जाता है। गर्मी के मारे बुरा हाल था। भोजन करके हम रामटेक के मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। रामटेकरी में प्रवेश द्वार के पहले मोटरसायकिल एवं कार स्टैंड बना हुआ है। जहाँ गाड़ी खड़ी करने पर दस रुपए प्रति वाहन की दर से वसुला जाता है। हमने यहां अपनी बाईक खड़ी की। सामने ही ओ3म के आकार का कालीदास स्मारक बना हुआ है। मंदिर के मार्ग में यहाँ भी बंदरों की सेना से सामना हुआ। रास्ते के दोनो तरफ़ पूजा के सामान एवं चना चबेना की दुकानें लगी हुई हैं।
राम टेकरी के प्रवेश द्वार पर मजार

बेर को कूट कर बनाया गया "बोरकुट" बड़ी मात्रा में बिक रहा था। हमने 10 रुपए की एक थैली ली। जिसका स्वाद बढिया था। पहले जब घर में बेर सुखाते थे तो उनका मुठिया बनाया जाता था। जो खाई-खजानी के रुप में बच्चों का मन बहलाता था। अब वो दिन नहीं रहे। यहाँ बोरकुट देख कर उन दिनों की याद आ गयी। जब गाँव से दरोगा की डोकरी बोईर का मुठिया बनाकर लाती थी और हम उसका इंतजार करते थे। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप एक कब्र है जिसपर चादर चढाई हुई थी। यह कब्र किसकी थी और यहाँ क्यों मौजूद है? इसके विषय में कोई माकूल जानकारी नहीं मिली।
रामटेकरी के प्रवेश द्वार पर हेयर कटिंग सेलुन

मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नाई ने सिट डाउन ओपन हेयर कंटिंग सेलून खोल रखा है। जब हम पहुंचे तो वह एक व्यक्ति की दाढी मुड़ रहा था। मंदिर के प्रथम दरवाजे पर भैरव और शिरपुर दरवाजा लिखा है। इस मंदिर को यहाँ गढ मंदिर कहा जाता है। बलुआ पत्थर से निर्मित मंदिर में कोई विशेष कारीगरी एवं अलंकरण नहीं दिखाई दिया। जैसा भोरमदेव, नकटा मंदिर जांजगीर में दिखाई देता है। गढ मंदिर के चारों तरफ़ परकोटा बना हुआ है। मुख्यमंदिर बीच में बना है। जहां फ़ोटो खींचने की मनाही है, लिखा था। मैने एक कोशिश की, पर पुजारी ने रोक दिया।
गर्मी से बेहाल भगवान के लिए वाताकूलन की व्यवस्था

मंदिर के भीतर एसी लगा हुआ है। भगवान भी गर्मी से बेहाल थे, तभी गर्मी से राहत दिलाने के लिए एसी का प्रबंध किया गया था। दिन भर की घुमक्कड़ी के कारन थकान हो गयी थी। मैने वहीं मंदिर के फ़र्श पर एक नींद लेने का विचार बनाया और सो गया। भोजन के नशे ने साथ दिया और एक घंटे की अच्छी नींद आई। जब नींद को आना हो तो मखमल के गद्दे की जरुरत नहीं पड़ती। कठोर चट्टान पर भी आ जाती है। एक घंटे के बाद जब नींद खुली तो तबियत एकदम फ़्रेश हो चुकी थी। बैटरी रिचार्ज हो चुकी थी। 
भोंसला राजाओ द्वारा निर्मित प्रवेश द्वार

मंदिर से बाहर आने पर सामने विशालकाय वराह देव की मूर्ती दिखाई दी। वराह देव की इतनी बड़ी मूर्ति मैने और कहीं दूसरी जगह नहीं देखी। वाकटक राजा धर्माभिमानी एवं सहिष्णु वृत्ति के थे, रुद्रसेन द्वितीय की पट्टरानी प्रभावती सम्राट चंद्रगुप्त की बेटी थी। प्रभावती गुप्त वैष्णव पंथ की अनुयायी थी। इसके पुत्र और पौत्रों ने रामगिरि पर नृसिंह, त्रिविक्रम, वराह तथा गुप्तराम आदि मंदिरों का निर्माण कराया। देवगिरि के यादव राजाओं ने यहाँ राम-लक्ष्मण मंदिरों का निर्माण किया।
विष्णुअवतार वराह देव मंदिर

कहते हैं महानुभाव पंथ के निर्माता चक्रधर स्वामी  ने यहां धर्मोपदेश किया। एक नजर पुन: गढ मंदिर पर डाल कर हमने वराह एवं नृसिंह मंदिर देखा। संध्या जी ने कालीदास स्मारक देखने की इच्छा जाहिर की। कालिदास स्मारक का निर्माण महाराष्ट्र सरकार द्वारा पर्यटन को बढावा देने के उद्देश्य से किया गया है। इसके साथ कहीं कोई प्राचीन कथानक जुड़ा हुआ नहीं है। नव निर्माण सुंदर है लेकिन देख-रेख के अभाव में खंडहर होने की आशंका है। स्मारक के मैदान की दूब सूख चुकी है। जिसके कारण यह उजड़े हुए चमन के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने सोचा था कि कालिदास से संबंधिक कुछ जानकारियाँ यहाँ पर प्राप्त होगी पर ऐसा कुछ नहीं था।
राम लक्ष्मण मंदिर

रामगिरि की पहाड़ियों बीच एक झील है। जो सड़क से बहुत ही सुंदर दिखाई देती है। इसे अबांळा तालाब कहा जाता है। इस तालाब की गणना स्थानीय प्रवित्र तीर्थ के रुप में की जाती है। इस तालाब का जीर्णोद्धार एवं इसके किनारे मंदिरों का निर्माण भोसलें राजाओं ने किया था। तालाब के चारों तरफ़ बने हुए मंदिर माला में गुंथे हुए मनकों की तरह सुंदर दिखाई देते हैं। तालाब के चारों तरफ़ बस्ती बसी हुई है। यहाँ पंडों के स्थाई निवास है। विभिन्न जातियों ने अपने समाज की सुविधा की दृष्टि से धर्मशालाएं एवं ठहरने का स्थान बना रखा है।
कालिदास स्मारक पर सूर्यास्त का विहंगम दृश्य

मृत्योपरांत यहाँ कर्मकांड एवं पिंडदान किए जाते हैं। भोजन भट्ट पंडे यहीं  मिल जाते हैं, बस उन्हे नगद दे दीजिए फ़िर सारी व्यवस्था यहीं हो जाती है। इस तालाब में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा प्रवेश द्वार है। मेरे कैमरे की बैटरी चुक गयी थी। आज दिन भर में बहुत अधिक चित्र ले लिए थे। इसलिए इस स्थान के सीमित ही चित्र मिले। अबांळा तालाब से जब हम वापस हो रहे थे तो सूर्यास्त हो रहा था। पहाड़ियों के बीच से अस्ताचल की ओर जाता सूरज कह रहा था कि - मैने तुम्हे बहुत तपा दिया। पता नहीं तुम किस मिट्टी के बने हो जो अभी तक घुमक्कड़ी कर रहे है। मै तो थक गया, अब चलता हूँ आराम करने। तुम जो चाहे करो तुम्हारी मर्जी, पर आज की लड़ाई तुम जीत चुके हो।    
अंबाळा तालब के घाट पर ब्लॉगर

हमने रामगिरि तीर्थ से विदा ली और चल पड़े नागपुर की ओर सपाटे से। क्योंकि जितनी दूर आ गए, उतनी दूर हमें लौटना भी था। मनसर एवं रामटेक की यात्रा शर्मा दंपत्ति के साथ आनंदायी रही। वापसी में कामठी की रेल्वे क्रांसिग के पास से मैं साथियों से आगे निकल गया। तभी मेरा मोबाईल बजा, शर्मा जी कह रहे थे कि वापस लौट आओ। उनकी गाड़ी बंद हो गयी थी। वापस लौटने पर देखा कि उनकी गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही है। वे पास ही मिस्त्री ढूंढने गए, हम वहीं खड़े रहे।
पहाड़ी से अंबाळा तालब का दृश्य

बाईक में पिस्टन प्रेसर ही नहीं बना रहा था। जिससे किक लगे और वह स्टार्ट हो। मिस्त्री ने मगजमारी कर ली। अब लगा कि बाईक यहीं मिस्त्री के पास ही छोड़ कर जाना पड़ेगा। चलो एक बार धक्का मारकर चालु करने का प्रयास कर लिया जाए। धक्का मारने पर बाईक स्टार्ट हो गयी। एक बारगी चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। रात के नौ बज रहे थे। घर पहुंचने की भी जल्दी थी। बाईक ने फ़िर साथ नहीं छोड़ा। घर पहुचा कर ही दम लिया। इस तरह महाराष्ट्र के मनसर एवं रामटेक के प्राचीन स्थल की सैर निर्विघ्न सम्पन्न हुई।    ( यात्रा-सम्पन्न)

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

प्रवरसेन की नगरी प्रवरपुर की कथा -------- ललित शर्मा

नसर (मणिसर) की ऊंचाई समुद्र तल से  280 मीटर है, यह स्थान 21.24' N एवं 79.1' E अक्षांश देशांश पर स्थित है। हमें पहाड़ी के रास्ते में पाषाण कालीन उपकरण दिख रहे थे। यहाँ प्राचीनतम अवशेष, प्रचुर पानी, जंगल एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की सुगम उपलब्धता के आधार पर निश्चय किया जा सकता है कि यह स्थान पाषाण युगीन मानव की शरण स्थली रहा होगा। इस स्थल पर प्राप्त अनेक चट्टानीय शरण स्थलों पर मानवीय प्रवास के प्रमाण प्राप्त होते हैं। डॉ एस एन राजगुरु ने  पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली नदी के प्रमाण प्रस्तुत किए हैं जो कि पेंच नदी में मिल जाती रही होगी। ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी में इस नदी के पानी का प्रयोग मनसर झील के लिए किया जाता रहा होगा। इस स्थान से विभिन्न प्रकार के पाषाण के पाषाणयुगीन शस्त्र एवं औजार उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए हैं। पाषाण काल के पश्चात "पूजा के लिए" पूजा स्थल एवं प्रतिमा के प्रमाण भी इस स्थल से प्राप्त हुए हैं।
हिडिम्बा टेकरी पर लेखक (यहाँ वाजपेय यज्ञ के प्रमाण प्राप्त हुए हैं)

इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है, मौर्य एवं शुंग काल (ईसा पूर्व 300-200 ईं पश्चात) विदर्भ भी अशोक के साम्राज्य का अंग था। इसके प्रमाण चंद्रपुर के देवटेक के शिलालेख से प्राप्त होते हैं। मौर्यकाल में यहाँ स्तूप निर्माण के भी संकेत मिले हैं। सातवाहान काल (200 ईसा पूर्व से 250 ई पश्चात) मौर्य काल के पतन के बाद यह स्थान शुंगों के आधिपत्य से होकर सातवाहन के अधीन चला गया। इस काल में एक पश्चिमी द्वार वाले बड़े महल का निर्माण किया गया। इस महल में हवन कुंड, महल के उपर पश्चिमी दिशा में निर्मित पाया गया है। इस महल को गढनुमा बनाकर सुरक्षा प्रदान की गयी थी।
प्रवरपुर का महल जिसे बौद्ध काल  में विहार का रुप दे दिया गया था

वाकटक काल (ईसवीं 275 से 550) इस साम्राज्य की स्थापना विंध्यशक्ति-1 नामक ब्राह्मण ने की थी। विंध्यशक्ति के पुत्र प्रवरसेन-1 उर्फ़ प्रोविरा ने 275 -335 ईसवीं सन तक इस क्षेत्र में राज्य किया। पुराणों के अनुसार उसकी राजधानी "पुरिका" थी। इस काल के दो राज्यों यथा वाकटक एवं गुप्त के मध्य युद्ध एवं तनाव की स्थिति बनी रहती थी। जिसे पांचवी शताब्दी में प्रभावती एवं प्रवरसेन के पुत्र रुद्रसेन के विवाह से कम किया गया। प्रवरसेन ने वैदिक अनुष्ठान भी वृहद स्तर पर किए। जिसमें 4 अश्वमेघ यज्ञ शामिल हैं। साथ ही हिडिम्बा टेकरी के पूर्वी भाग में वाजपेय यज्ञ के प्रमाण मिलते हैं। प्रवरसेन की मृत्यु के बाद राज्य को उसके 4 पुत्रों में विभक्त कर दिया गया। प्रवरसेन के पुत्र गौतमपुत्र की मृत्यु के बाद उसके पुत्र रुद्रसेन-1 ने नंदीवर्धन (नगर धन, नंदपुरी) का राज्य संभाल। रुद्रसेन के बाद उसके पुत्र पृथ्वीसेन ने 360-395 ईसवीं तक शासन किया।
प्रवरपुर के महल का 16 फ़ुट चौड़ा परकोटा

पृथ्वीसेन के कार्यकाल में वाकटकों का वैवाहिक संबंध विक्रमादित्य के परिवार से हुआ। चंद्रगुप्त द्वितीय अर्थात विक्रमादित्य की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह पृथ्वीसेन  के पुत्र रुद्रसेन के साथ सम्पन्न हुआ। रुद्रसेन की असमय मृत्यु के बाद प्रभावती गुप्त ने अपने ज्येष्ठ पुत्र द्वारकसेन के माध्यम से 14 वर्षों तक राज्य किया। परन्तु द्वारकसेन भी असमय काल के गाल में समा गए। इसके बाद प्रभावती गुप्त के द्वितीय पुत्र दामोदर सेन सिंहासनारुढ हुए। दामोदर सेन ने अपने प्रभावशाली पूर्वज प्रवरसेन का नाम धारण किया तथा लम्बे समय तक शासन किया। 419-490 त प्रवरसेन द्वितीय अपने ज्ञान एवं स्वतंत्रता के लिए काफ़ी प्रसिद्ध हुआ। प्रवरसेन के शासन काल की ताम्र पट्टिकाएं उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। प्रवरसेन के शासन काल नंदीवर्धन में एक मंदिर था, जिसका नाम प्रवरेश्वर था। यह एक शैव मंदिर था यहां शिव प्रतिमा के प्रमाण पाप्त हुए हैं।
प्रवरपुर महल पर विध्वंस के चिन्ह (भुकंप द्वारा)

प्रवरसेन द्वितीय के पश्चात उसके पुत्र नरेन्द्र सेन ने शासन किया। पृथ्वीसेन द्वितीय ने अपने पिता नरेन्द्रसेन की मृत्यु के बाद शासन संभाला और उसने वैष्णव संप्रदाय का प्रचार किया। लगभग 493 ई सन में बस्तर के नल राजा भवदत्त वर्मन ने पृत्वीसेन द्वितीय पर आक्रमण किया। तो भवदत्त वर्मन के साले माधव वर्मन द्वितीय ने पृथ्वीसेन द्वितीय की मदद की, फ़लस्वरुप नल राजा को हार का मुंह देखना पड़ा। परन्तु इस हार के पूर्व नल राजा ने प्रवरपुर महल को लूटा एवं जला डाला। माधववर्मन द्वितीय की मदद के बाद प्रवरसेन द्वितीय की संतान प्रवरपुर राज नहीं कर सकी। क्योंकि माधववर्मन ने राज्य को अपने आधिपत्य में ले लिया। इसके पश्चात ही इस राज्य में बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ।
प्रवरपुर पैलेस से दिखाई देती मनसर झील एवं हिडिम्बा टेकरी
 …आगे पढें

शुक्रवार, 22 जून 2012

हिडिम्बा टेकरी और गंजों के लिए खुशखबरी ………… ललित शर्मा

हम बोधिसत्व नागार्जुन संस्थान के पिछले गेट से पहाड़ी पर चढने के लिए चल पड़े। इस पहाड़ी को स्थानीय लोग हिडिम्बा टेकरी कहते हैं। धूप बहुत तेज थी,  पहाड़ी के किनारे बहुत बड़ी झील है, जिसके नाम पर ही इस गाँव का नाम मनसर पड़ा। मनसर नाम मणिसर का अपभ्रंस है। इसे देखने से आभास होता है कि पहाड़ियों के बीच यह एक प्राकृतिक झील है। जिसमें बारहों महीने पानी रहता है। पहाड़ी की तरफ़ झील का उलट है, अर्थात झील लबालब भरने पर पानी की निकासी का मार्ग बना है। इसमें लोहे का गेट भी लगा है। पहाड़ी छोटी है पर चढाई खड़ी है। रास्ते में हमें रुक कर कुछ जलपान लेना पड़ा। उस दिन की गर्मी का अहसास करता हूँ तो आज भी उबल उठता हूँ। 
हिडिम्बा टेकरी से मनसर झील का नजारा
पहाड़ी पर चढते समय ही धरती पर पाषाण काल के मानव के रहने चिन्ह प्राप्त होते हैं। मिट्टी के बर्तनों की ठेकरियाँ और चकमक पत्थर के पाषाण कालीन औजार बिखरे पड़े हैं। कौन कितना उठाए और सहेजे। गर्मी से संध्या जी तो लाल हो गयी थी, पुरातात्विक धरोहरें देखने के मजे के साथ कष्ट भी था, लेकिन इस कष्ट का भी हर हाल में आनंद लेना था। पैट्रोल के बढे हुए रेट ने रोते-गाते भी मजा लेने को मजबूर कर दिया। पहाड़ी पर चढते ही एक चार दीवारी दिखाई दी। इसके भीतर एक बड़ी शिला पर लिखे हुए अभिलेख है, जो समय की मार से धुंधले हो गए, पढने मे  ही नहीं आया क्या लिखा है? वैसे भी हम कोई प्राचीन भाषा के विशेषज्ञ तो हैं नहीं जो पढ लेगें, पर आडी टेढी लाईने तो समझते हैं। 
समय की मार से धुंधले होते शिलालेख
इस स्थान से उपर पहाड़ी पर ईंटो की अंडाकार कलात्मक इमारत अभी भग्नावस्था में है। हम ईमारत पर चढते हैं, पर वैसा कुछ दिखाई नहीं देता जैसा भंते रामचंद्र ने बताया था। उनका कहना था कि यह एक बौद्ध मठ था, इसके आचार्य नागार्जुन थे। ईमारत में त्रिआयामी त्रिभुजों का निर्माण हुआ है। पूरी ईमारत पक्की ईंटो की बनी है। उपर जाने के लिए त्रिकोणी घुमावदार सीढियाँ बनी हैं। पहाड़ी के शिखर पर बनी हुई यह सुंदर संरचना है। ईमारत के चारों तरफ़ लाल पत्थर के शिवलिंग स्थापित हैं। जिन्हे अभी भी देखा जा सकता है। इससे पता चलता है कि यह एक शिवालय था। 
हिडिम्बा टेकरी के द्वादश शिवलिंगों मे से एक
पूर्व दिशा में एक टीन शेड बना हुआ है जिसके दरवाजे पर ताला लगा है। वहां पर पुरातत्व विभाग का कोई व्यक्ति नहीं मिला। अगर कोई पर्यटक ईमारत को नुकसान पहुंचा दे तो कोई देखने वाला नहीं है। पहाड़ी से मनसर कस्बे का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। साथ ही मणिसर झील भी खूबसूरत दिखाई देती है। पूर्व दिशा में एक पहाड़ी पर भी ईमारत के चिन्ह दिखाई दिए। वहां जाने के लिए किसी दूसरे रास्ते का उपयोग होता है। इस पहाड़ी से उसका कोई संबंध नहीं है। हम मंदिर की उत्कृष्ट  कलाकारी को देखते रहे। समय कम था और हमें आगे भी जाना था। एक पेड़ के नीचे बैठ कर आराम किया। संग में लाए छाछ और फ़लों को उदरस्थ किया।
लू लग जाएगी, कुछ तो खा लीजिए
लौटते हुए मुझे ईमारत में एक दरवाजा दिखाई दिया, बाहर तो ईंटों की दीवाल है पर भीतर जाने पर पत्थरों को खोद कर बनाई गयी एक सुरंग दिखाई देती है। सुरंग का मुहाना भी ईटों से बनाया हुआ है। मै उसके भीतर उतरता हूं तो घुप्प अंधरा था। मोबाईल के टार्च की रोशनी में दीवाल से चिपकी हुई एक गोह (गोईहा) दिखाई दी। मैने आगे बढने का ईरादा त्याग दिया। क्योंकि शुरुवात में ही कुछ ऐसे चिन्ह दिखाई दे दिए कि आगे बढना जान जोखिम में ही डालना नजर आया। जैसे कभी अनजान गाँव के तालाब में गहरे नहीं जाना चाहिए वैसे ही अनजान जगह में सुरंग या पहाड़ी खोह को पूरी देख भाल कर जाना चाहिए। 
सुरंग का मुहाना
अनजान जगह पर भीतर जाने का विचार त्याग देना चाहिए। क्योंकि भालू जैसा प्राणी ऐसे स्थानों पर पाया जाता है। जो कि बड़ा खतरनाक होता है। साथ ही पहाड़ी पर तेंदुए भी विचरण करते हैं जो रहने के लिए ऐसे ही मुफ़ीद स्थानों की तलाश करते हैं। सुरंग में जाने पर सड़ांध आई, जिससे अहसास हो गया कि यह किसी मांसाहारी प्राणी का ठिकाना बन चुकी है। इससे दूर ही रहना सही होगा। भंते रामचंद्र ने बताया कि यह सुरंग 25-30 फ़ुट आगे तक जाती है, फ़िर बंद है। ऐसी ही एक सुरंग और भी है। उसका दरवाजा बंद है।
हिडिम्बा टेकरी का शीर्ष
दो लड़के भी चश्मा लगाए हमारे पीछे पीछे यहाँ आए थे। वे तो थोड़ी देर में ही कूद फ़ांद कर नीचे जाने लगे। मैने उन्हे रोक कर पूछा कि उन्होने यहाँ क्या देखा और समझा? दोनो यूवक महाविद्यालय के छात्र थे। उनका कहना था कि कुछ समय होने के कारण इसे देखने चले आए। अब यह क्या है और किसने बनाया है? इसके विषय में उन्हे जानकारी नहीं है। सरासर सच कहा दोनों ने, उनकी बातें सुनकर अच्छा लगा। पुरातात्विक पर्यटन स्थलों पर अधिकतर यही होता है। गाईड की व्यवस्था न होने पर पर्यटक को कुछ समझ ही नहीं आता कि वह क्या देख रहा है और क्यों देख रहा है? 
शिल्पियों द्वारा कलात्मक निर्माण
बिना गाईड के किसी भी स्थान के विषय में जानकारी नहीं मिल पाती। पर्यटक आता है और मुंह फ़ाड़े देखकर चला जाता है।थोड़े से पैसे खर्च करके किसी स्थान के विषय में सार्थ जानकारी मिल जाए तो घुमने का उद्देश्य पूरा हो जाता है।  हम भी सिर्फ़ देखकर यहाँ की जानकारी लिए बिना ही वापस चल पड़ते हैं। खड़ी चढाई से उतरते समय सावधानी रखने की जरुरत है। थोड़ा सा पैर फ़िसला नहीं कि एकाध हड्डी टूटने की गारंटी मानिए। हड्डी टूटने पर धरती पर यमराज के एजेटों का चक्कर पड़ सकता है। इसलिए हम संभल कर नीचे उतरे और नागार्जुन स्मारक संस्था में पहुचे। जहाँ हमारी मोटरसायकिलें खड़ी थी।
हिडिम्बा टेकरी पर यायावर- पुख्ता सबूत
संस्थान में एक स्थान पर लिखा था कि यहाँ गंजों के सिर में 10 दिन में शर्तिया बाल उगाए जाते हैं। इसे पढकर जानने की इच्छा हुई तो केयर टेकर प्रो रामचंद्र से ही हमने पूछा। उन्होने बताया कि बाल उगाने वाली दवाई वे ही देते हैं और शर्तिया 10 दिनों में बाल उग आते हैं। उनके पास आने वाले बहुत से लोगों का वे ईलाज कर चुके हैं। मैने मजाक में कहा कि शर्मा जी सिर के बगल के कुछ बाल उड़े हुए हैं उन्हे उगा दीजिए। इसका अनुभव हम भी ले लेते हैं। तो उनका कहना था कि हम सिर्फ़ 30 साल से कम उम्र वाले व्यक्ति के ही बालों का ईलाज करते हैं। इससे अधिक उम्र वालों के सिर पर पूरे बाल नहीं आते तथा यह ईलाज गर्मी के दिनों में नहीं करते। क्योंकि गर्मी में दवाई से सिर पर फ़ोड़े फ़ुंसी निकलने का डर रहता है। 
प्रो रामचंद्र उके (केयर टेकर)
इसलिए बरसात का मौसम सबसे अच्छा होता है बाल की फ़सल उगाने के लिए। साथ ही उन्होने अपनी फ़ीस 10,000/- अक्षरी दस हजार रुपए भी बता दी। लेकिन बाल उगाने का मजबूत दावा पेश किया। हमने उनका पता लिया। उन्होने बताया कि इस स्थान से दो किलोमीटर पर नालंदा जैसी एक सरंचना भी उत्खनन में प्राप्त हुई है। उसे आपको अवश्य देखना चाहिए। पहाड़ी पर उत्खनन में प्राप्त सामग्री को यहाँ स्थित एक भवन में रखा गया है। पर उसकी चाबी अरुण कु्मार शर्मा जी के पास ही है। इसलिए उसे खोला नहीं जा सकता। प्रो रामचंद्र से हम विदा लेकर अगले स्थान की ओर चल पडे। 
शिल्पियों द्वारा ईंटो से निर्मित त्रिआयामी भवन विन्यास
गंजे सर पर बाल उगाने वाले का पता है - प्रो रामचंद्र उके, केयर टेकर, बोधिसत्व नागार्जुन स्मारक संस्था व अनुसंधान केन्द्र, मनसर, तहसील रामटेक जिला नागपुर (महाराष्ट्र) मो. 09823214196, 08055397715। इनसे सम्पर्क कर अपने रिस्क से सिर पर बाल उगाएं। (मनसर के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक पहलू पर मैने नागपुर से आने के बाद सिरपुर जाकर अरुण कुमार शर्मा जी से चर्चा की वह विवरण आपको आगामी पोस्ट में मिलगा।) आगे पढें

बुधवार, 20 जून 2012

मनसर की ओर यायावर ------------- ललित शर्मा

 अयोध्या का ददुवा राजा महल
जीवन चलने का नाम, चलते रहो जब तक हो प्राण। चलना ही जीवित रहने का परिचायक है, ठहरना मुर्दा होने के समान। रमता जोगी और बहता दरया, दोनो ही उत्तम होते हैं। साधू रमता रहे तो दाग लगे न कोय। साधू तो हूँ पर जोगी नहीं हूँ। साधना मुझे आता है, जोग गृहस्थ का लिया है। गृहस्थी जीवन में समय निकाल कर यायावरी करना बहुत कठिन कार्य है। फ़िर भी कुछ समय चुरा ही लिया जाता है। गत फ़रवरी माह में पारिवारिक कार्यों से नागपुर गया था, फ़िर वहाँ से उमरेड से शंकरपुर होते हुए हीरापुर गया। जो कि नागपुर से लगभग सौ किलोमीटर है। वहाँ एक मैगालिथिक पुरातात्विक साईट की खोज की है डेक्कन विश्वविद्यालय के कांति कुमार ने। तब से इस साईट को जाकर देखने की इच्छा थी। हम साईट पर बाईक से गए, बहुत सारे फ़ोटो लिए। लेकिन उसके बारे में लिखने से पहले ही मेरा मोबाईल गुम हो गया और सारी मेहनत पर पानी फ़िर गया। हीरापुर की साईट का एक भी चित्र  नहीं था मेरे पास। इसलिए उस पर लिख भी न सका। वहां पर किसी ने बताया था कि आस-पास की पहाड़ियों में आदिम मानव निर्मित शैल चित्र भी हैं। साथ यह भी चेताया था कि उस पहाड़ी पर शेर और भालु भी हैं। इसलिए दिन रहते ही जाना और आना पड़ता है। देखते हैं दुबारा कब समय मिलता है जाने का?

कवियत्री संध्या जी और सत्येन्द्र जी
तीन चार किलोमीटर पहाड़ी पर चल कर गुफ़ाएं देखना और वहाँ शैल चित्रों का अवलोकन करना, कष्टप्रद कार्य है। पर मुझे पसंद है, इसलिए फ़िर कभी जाना चाहुंगा। दुबारा महात्मा फ़ूले टैलेंट अकादमी के कार्यक्रम में 14 अप्रेल को अंजु चौधरी के निमंत्रण पर जाना हुआ। पहुंचने के पहले ही संध्या जी और सत्येन्द्र जी ने कार्यक्रम बना लिया था कि 15 अप्रेल को रामटेक जाएगें। रामटेक का नाम मैने बहुत सुना था। कुछ मराठी भाई रामटेके सरनेम भी लगाते हैं। इसलिए यह नाम जाना पहचाना लगा और रामटेक जाने का मन भी बना लिया। नागपुर से रामटेक 56 किलोमीटर है और वर्धारोड़ सोमलवाड़ा से 70 किलोमीटर है। अप्रेल की भीषण गर्मी में वहाँ जाना मूर्खता से कम नहीं था, परन्तु पहले से कार्यक्रम बन गया था,हमने बाईक से जाना तय कर लिया। पारा 45-46 डिग्री पर चल रहा था। सुबह 8 बजे से ही धूप चमकने लगती थी। सुबह की सैर से लौटने में ही पसीने की धार बह निकलती थी। बाईक से लम्बा सफ़र करना तकलीफ़देह तो है, पर बाईक से ही चल कर आस पास के सभी स्थान आसानी से देखे जा सकते हैं। सड़क पर जाम लगने की स्थिति में थोड़ी सी ही जगह मिलने पर आसानी से निकला जा सकता है। इस तरह समय की बचत के साथ सफ़र चलता रहता है।

कुलेश्वर दर्शन
सुबह 10 बजे हम तीनों (मैं, संध्या जी, सत्येन्द्र जी) दो मोटर सायकिलों पर प्रात:रास के प्रश्चात चल पड़े। वर्धा रोड़ सोमलवाड़ा से हम सीधे ही नेशनल हाईवे 7 पर सवार पर हो गए। यह हाईवे कामठी के बाद कन्हान पार करके मनसर जाता है, यही से आगे रामटेक के लिए राज्य मार्ग है। सत्येन्द्र जी ने गर्मी से बचने के लिए टोपी लगा ली और संध्या जी ने स्कार्फ़ बांध लिया। मुझे आदत नहीं सिर ढक कर चलने की, चाहे कितनी भी लू चले। एक गॉगल आँखों पर चढा लिया वही बहुत है। हेलमेट लगाने में भी समस्या होती है। पहली बार जब हेलमेट लगाया था, तब एक बार में जी भर के पान थूक लिया और हेलमेट की नमस्ते हो गयी। हमने भी उससे पीछा छुड़ा लिया। हाईवे नम्बर 7 पर चलते हुए हम कामठी पहुंचे। शहर के भीतर से चल कर पुन: हाईवे पर आ गए। तिराहे पर मुझे मनपसंद सामान मिल गया। मतलब बर्फ़ की चुस्की (गोला भी कहते हैं) मिल गयी। तुंरत गाडी किनारे लगाई और तीन चुस्की बनवाई। जलती बरसती गर्मी में चुस्की से कुछ राहत मिली। पर एक चुस्की से क्या होना था। दूसरी भी बनवा ली, पहली खत्म होते ही। यहां से रिचार्ज होकर आगे बढे, 4 लाईन हाईवे पर फ़ुल स्पीड में बाईक ड्राईव करने का मजा आ रहा था। सड़के के किनारे पेड़ों पर तोरी (तोरई) की सूखी बेलें लटकी हुई थी। उनमें सूखी तोरई भी लटक रही थी। एक बार तो मन किया कि रुक कर इसे तोड़ा जाए। (ग्रामीण जानते हैं सूखी हुई तोरई किस काम आती है) समय की कमी को देखते हुए रुकना ठीक न समझा।

मनसर से रामटेक की ओर
कन्हान से लगभग 25 किलोमीटर चलने पर मनसर कस्बा है यहाँ से एक रास्ता  दाहिनी तरफ़ रामटेक के लिए जाता है। इस रास्ते पर स्वागत द्वार बना हुआ है। मनसर नाम देखते ही मेरे मन में बिजली सी कौंधी। लगा कि यह नाम कहीं सुना है, क्यों सुना, किस लिए सुना, किसने सुनाया?  कुछ याद नहीं, बस नाम कुछ जाना पहचाना सा लगा। मैने सत्येन्द्र जी को बाईक रोकने के लिए इशारा किया और किसी दुकान वाले से इस गाँव की विशेषता के बारे में पूछने कहा। पूछने पर पता चला कि यहाँ से 4 किलो मीटर पर खुदाई में कोई प्राचीन स्थल मिला है। तब दीमाग की घंटी बज गयी, एक दिन रायपुर पुरातत्व परिमंडल के तात्कालीन अधीक्षण प्रवीण मिश्रा जी ने इसके विषय में बताया था और यहाँ जाकर एक बार देखने कहा था, साथ किसी भी जानकारी के लिए नागपुर पुरातत्व मंडल में कार्यरत नंदिनी साहू जी का मोबाईल नम्बर भी दिया था। अब तो सोने में सुहागा हो गया, मन चाही जगह रास्ते में ही मिल गयी। दीदे खोल कर हम आगे बढे। 4 किलों मीटर पर बाएं हाथ की तरफ़ बहुत सी बुद्ध की मूर्तियाँ लगी है तथा बहुत बड़ा इलाका चार दीवारी से घेरा हुआ है। हमने यहीं पूछना उपयुक्त समझा। संस्थान के भीतर प्रवेश करने पर पेड़ की छांव में दो लोग बैठे दिखाई दिए। बाईक स्टैंड पर लगा कर हमने उत्खनित स्थल के विषय में पूछा तो एक व्यक्ति ने पीछे की तरफ़ की पहाड़ी की ओर ईशारा कर दिया। परिचय पूछने पर उसने अपना नाम प्रो रामचंद्र उके एवं संस्थान का केयर टेकर होना बताया।

नागार्जुन स्मारक संस्था एवं अनुसंधान केंद्र
उन्होने कुर्सियाँ मंगवाई, बैठने के बाद उस स्थान के विषय में चर्चा होने लगी। उन्होने बताया कि पहाड़ी पर नागार्जुन से संबंधित पुरावशेष उत्खनन में प्राप्त हुए हैं तथा जापान के आर्थिक सहयोग से यहाँ उत्खनन हुआ है। यहां से एक किलोमीटर की दूरी पर नालंदा के विश्वविद्यालय जैसी संरचना भी प्राप्त हुई है। यह सुनने के पश्चात मेरी जिज्ञासा और बढ गयी। यहाँ उत्खनन करने वाले विद्वान का नाम पूछने पर उन्होने अरुण कुमार शर्मा जी नाम लिया। बताया कि शर्मा जी ने 1998 से 2008 तक यहाँ अपने निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया। अरुण कुमार शर्मा जी से मेरी भेंट होते रहती है। लेकिन नालंदा जैसे विश्वविद्यालय की बात मेरे गले से नहीं उतरी। मैने बैठे-बैठे सोच लिया कि इस स्थल के चित्र लिए जाएं और वास्तविक जानकारी शर्मा जी से सिरपुर जाकर प्राप्त कर लेगें। यही उत्तम रहेगा। हम नागपुर से ही अपने साथ खाने का सामान लेकर चले थे और साथ में पानी भी। 12 बज गए थे और सूरज सिर पर पहुंच कर भीषण आग बरसा रहा था। इतनी गर्मी झेलना बहुत ही कठिन है। संध्या जी गर्मी से हलाकान हो रही थी। पहाड़ी पर चढने पर तो इससे भी अधिक गर्मी झेलनी पड़ेगी। खैर हमने अपनी बाईक वहीं खड़ी की और संस्थान के पिछले दरवाजे से पहाड़ी की ओर चल पड़े……… जारी है मनसर कथा…… आगे पढें