दलाई लामा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दलाई लामा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

तिब्बत से निर्वासन की टीस बाकी है आज तक ………

मैनपाट पर पहुचने पर एक स्थान पर दूर से ही हवा में लहराती हुई रंग बिरंगी पताकाएं दिखाई देने लगी। लगभग 12 बजने को थे। पताकाओं लिखे तिब्बती बौद्ध प्रार्थना मंत्र हवा के माध्यम से प्रसारित हो रहे थे। बस मुझे तो इस गाँव में पहुंचना है। साथियों को चेता दिया मैने। छत्तीसगढ अंचल में बनने वाले कवेलू और मिट्टी के घरों को चटक भड़कीले रंगो से पोता गया था। दूर से ही देखने से पता चल जाता है कि यह कोई तिब्बती बस्ती है। जब मैं धर्मशाला गया था तब वहाँ से लौटते हुए बस में एक तिब्बती सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर से मुलाकात हुई थी। रास्ते में धर्मशाला से खजियार तक मेरी उनसे तिब्बत के विषय पर चर्चा हुई। जिससे तिब्बतियों के विषय में भरपूर जानकारी मिली।
मोनेस्ट्री की दीवार पर तिब्बती भाषा
इस तिब्बतियों की बस्ती को कमलेश्वरपुर कह्ते हैं एवं शरणार्थियों की बसाहट के हिसाब से इसे कैम्प नम्बर 2 नाम दिया गया है। यहाँ प्रार्थना करने के लिए छोटा मठ भी है। मंदिर परिसर में मैने छोटे मनौती स्तूपों से लेकर एक दीवार पर निर्मित सहस्त्र बुद्ध प्रतिमाएं भी देखी। मैनपाट में तिब्बतियों के 7 कैम्प हैं। प्रत्येक कैम्प का एक मुखिया है और सभी 7 कैम्पों  का एक प्रधान मुखिया है। यहाँ से निर्वासित तिब्बती सरकार का एक सांसद चुना जाता है। शरणार्थी होने के कारण ये भारत के निर्वाचन में मतदान नहीं कर सकते। भारत में इनकी  कई पीढियाँ हो चुकी है फ़िर भी इन्होने बांग्लादेशियों  जैसे भारत की नागरिकता के लिए कोई आवेदन नहीं किया है। इनकी आशा अभी तक लगी हुई है कि चीन से तिब्बत को आजादी मिलने के बाद अपने वतन को वापस चले जाएगें।
तिब्बतियों के गाँव की सुनसान गली
इस कैम्प में मेरी मुलाकात तिब्बतियों के बुजुर्ग लोतेन से होती है। मैं गलियों में घुमते हुए उनके घर के पास पहुचता हूँ। टीन शेड का सुंदर मकान में बड़ा सा आंगन है। आँगन के भीतर एक मचान पर खाल में भुसा भरा हुआ बछड़ा रखा है। एक अरसे के बाद यह दृश्य देखने मिला। शावक की मौत होने पर भैंस या गाय दूध देना बंद कर देती  हैं। इसलिए उस शावक की खाल में भूसा भरवा कर उसके समक्ष रखने से भैंस और गाय दूध देने लगती हैं। इस बछड़े के पुतले का उपयोग इसी प्रयोजन से किया जाता है। एक मचान पर मक्का के भुट्टे सुखाने के लिए लटकाए हुए थे। आँगन में धान सुखाया हुआ था जिसे दो मजदूर बोरों में भरकर घर के भीतर रख रहे थे। इससे जाहिर होता है कि तिब्बती खेती करने में भी माहिर हैं।
सरसों की फ़सल एवं हवा में तैरती मंत्र पताकाएं
तिब्बतियों का यह गाँव सुनसान दिख रहा था। सिर्फ़ कुछ बुजुर्ग एवं कुछ बच्चे ही दिखाई दे रहे थे। मुझे देखकर लोतेन की  पत्नी कुर्सियाँ लेकर आती है और 1942 में तिब्बत के खम्नांचिन में जन्मे लोतेन मेरे पास आकर बैठ जाते हैं। उनसे चर्चा प्रारंभ होती है। वे बताते हैं कि तिब्बत 1961 में निर्वासित होने के बाद सबसे पहले वे नेपाल के मोनकोट में आए। उसके पश्चात 1963 में नेपाल से भारत में प्रवेश किया। इनके परिवार ने नेपाल से भारत में पैदल ही प्रवेश किया। तब भारत सरकार ने इन्हे शरणार्थी मान कर भारत में शरण दी। ठंडे प्रदेशों में रहने के कारण तिब्बतियों की भारत की गर्म जलवायु रास नहीं आई। जिससे कईयों की मृत्यु हो गयी। दलाई लामा के प्रयास से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भारत के प्रदेशों में ठंडे स्थान की खोज करवा कर वह स्थान इनके रहने के लिए आबंटित किए।
सहस्त्र बुद्ध 
उनमें से एक स्थान छत्तीसगढ का मैनपाट भी था। मैनपाट में तिब्बतियों की बसाहट 1965 में हुई। एक परिवार के 7 सदस्यों के हिसाब से इन्हे जीवन यापन के लिए 5 एकड़ भूमि दी गयी। मकान बनाकर देने के साथ 3 साल तक फ़्री राशन दिया गया। लोतेन भारत सरकार का आभार व्यक्त करते हैं। वे बताते हैं कि इन्होने ने यहाँ आलू, मक्का, टाऊ आदि की कम पानी की खपत वाली फ़सलें लगाना प्रारंभ किया। जिससे जीवन यापन होने लगा। साथ ही कालीन एवं स्वेटर का निर्माण का परम्परागत व्यवसाय भी प्रारंभ किया गया। महिलाएं हाथ से स्वेटर बनाकर अम्बिकापुर में बेचकर आती थी। अब हाथ की बनी मोटी स्वेटर को कोई पहनता नहीं है। इसलिए लुधियाना से मशीन की बनी हुई स्वेटर लाई जाती है। अभी गाँव के सारे जवान स्त्री पुरुष स्वेटर बेचने के लिए छत्तीसगढ एवं मध्य प्रदेश के अन्य शहरों में गए हुए हैं।
बौद्ध मठ  की पीठिका
लोतेन की उत्त्मार्ध चाय बनाकर ले आती हैं। चीनी बड़े-बड़े मग चाय के भरे हुए थे। एक कप चाय पीना कठिन था। लेकिन उनके आग्रह को देखते हुए चाय पीनी पड़ी। उन्होने बताया कि सारे कैम्पों मे। लगभग ढाई हजार तिब्बती निवास करते हैं। यहाँ पर परम्परागत तिब्बती औषधियों से युक्त अस्पताल भी है। जिसमें धर्मशाला से तिब्बती डॉक्टर आकर ईलाज करते  हैं। कैम्प नम्बर 1 में मुख्य मठ है जहाँ लामा निवास करते हैं। मुख्य धार्मिक कर्मकांड वहीं सम्पन्न कराए जाते हैं। उन्होने मुझे अपना और पत्नी का पासपोर्ट दिखाया जिसमें उनका  नाम पता एवं उम्र के साथ नेपाल के रास्ते पैदल भारत आने का विवरण दर्ज है। यह भारतीय पासपोर्ट इन्हे भारत का शरणार्थी होने का जिक्र करते हुए जारी किया गया।
लोतेन के साथ यायावर 
मै लोतेन से चर्चा कर रहा था और राहुल, पंकज एवं विष्णु वहाँ से गायब हो चुके थे। शायद मेरी और लोतेन की चर्चा उन्हे निरर्थक लगी होगी। क्योंकि यह चर्चा उनके कोई काम की नहीं थी। ये निर्वासित लोग बड़ी मेहनत के बाद परदेश में अपने जीवन की गाड़ी को पटरी पर लेकर आए हैं। एक बात गौर करने योग्य है। 50 बरस बाद भी इन लोगों ने अपनी भाषा, कर्मकांड, संस्कृति को नहीं छोड़ा है। मैनपाट में तिब्बतियों के लिए केन्द्रीय स्कुल है, जहाँ पढाई 8 वीं तक होती है इसके पश्चात आगे की कक्षाओं की पढाई के लिए हिमाचल प्रदेश स्थित धर्मशाला जाना पड़ता है। मैनपाट स्थित तिब्बतियों का संबंध इनकी निर्वासित सरकार के साथ सतत बना रहता है। उनके निर्देशों के अलावा भारत सरकार के कानूनों का पालन करते हैं। अपनी मिट्टी से उजड़ने का दर्द इनके मन को कचोटता है। दर्द इनकी आँखों में स्पष्ट झलकता है। भले ही यहाँ जन्म लेने वाली इनकी अगली पीढी ने तिब्बत नहीं देखा पर जंतर मंतर तक तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए इनकी आवाज गुंजती  है।
इहै है सिक्छा कर्मी परतापपुर के
लोतेन से विदा लेकर बाहर गली में निकला तो ये चारों गायब थे। गलियों में दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिए। मै पैदल ही पैदल मोनेस्ट्री तक आ गया। वहाँ लगी मूर्तियों को निहारने लगा। थोड़ा समय व्यतीत होने पर आगे बढा तो एक चौराहा दिखाई दिया। जहाँ सायकिल की दुकान पर कुछ तिब्बती युवा महफ़िल जमाए हुए थे। समीप ही आदिमजाति कल्याण विभाग का छात्रावास था। छात्रावास के मैदान में बड़ी बड़ी घास उगी हुई थी। वातावरण में ठंडक होने के कारण शिक्षक ने अपनी कुर्सी मैदान में ही डाल रखी थी। बच्चे सब खेल रहे थे। मैंने आश्रम परिसर में प्रवेश किया और शिक्षक के पास पहुंचा। उसने मेरे आगमन पर कोई ध्यान नहीं दिया। टेबल पर रखे रजिस्टर में कुछ लिखता रहा। चर्चा करने पर पता चला कि एक शिक्षा कर्मी है और प्रतापपुर से यहाँ पढाने के लिए आता है। इतनी देर में पंकज का फ़ोन आ गया कि वे गरम समोसे बनवा कर ला रहे हैं। थोड़ी देर में आ पहुंचे और हम टाईगर प्वांईट की ओर चल पड़े।

आगे पढ़ें 

बुधवार, 25 मई 2011

दलाई लामा का घर मैक्लोडगंज और अमेरिकी डालर --- ललित शर्मा

आरम्भ से पढ़ें आज ४ मई २०११ है, हमने मैक्लोडगंज घुमने का कार्यक्रम बनाया. दाड़ी से बस से धर्मशाला बस स्टैंड पहुचे.  फिर हमने धर्मशाला के लिए जीप टैक्सी पकड़ी. अब धर्मशाला से मैक्लोडगंज की दुरी १० रूपये की हो गयी है. केवल ने मैक्लोडगंज में अपने एक मित्र को फोन कर दिया था. हमने तय किया थी कि दोपहर का खाना मैक्लोडगंज में ही खायेंगे. रास्ते में एक जगह पर आर्मी कैम्प भी है. मैक्लोडगंज पहुच कर केवल ने मित्र को फोन किया तो वह आ गया. वह एक अच्छे होटल में भोजन करने के लिए ले गया. हमने वहां रूफ टॉप पर ही डेरा जमाया. हमारे पहुचने से पहले एक एंग्लोइन्डियन जोड़ा पहले से मौजूद था. जो हमारे पहुचने पर थोडा असहज महसूस कर रहा था. अब उनके चक्कर में हम अपना टाइम क्यों ख़राब करें? हम भी वहीँ जम गए.खाने का आर्डर दिया गया. सबने आखिर तय किया कि बिरयानी का मजा लिया जाये.

रूफ टॉप से मैक्लोडगंज का नजारा देख रहे थे. सामने धौलाधार की पहाड़ियों पर जमी हुयी चमकदार बर्फ के बीच त्रिउंड भी दिख रहा था. वहां तक बहुत सारे यात्री जाते हैं. केवल के मित्र का पेशा ही ट्रेकिंग करना है. वह त्रिउंड तक यात्रियों के दल को लेकर जाता है. जब मैंने वहां तक जाने का इरादा जताया तो उसने कहा कि अभी मौसम ठीक नहीं है. पहाड़ों पर जमी हुयी बर्फ मनमोहक होती है. पहाड़ हमेशा मनुष्यों को चुनौती देकर आकर्षित करते हैं. लेकिन होते बड़े क्रूर हैं. थोड़ी ही गफलत में जान ले लेते हैं. कभी कोई यात्री दल फंस गया तो बर्फीला तूफान उन्हें निगल जाता है. लाश भी मिलना कठिन हो जाता है. इसलिए पहाड़ों पर ट्रेकिंग करने के लिए उत्साह और जोश के साथ सावधानियां भी बरतनी आवश्यक हो जाती हैं.

आस पास तिब्बती मन्त्र लिखे ध्वज लहरा रहे थे. इसके पीछे मान्यता है कि हवा में मन्त्रों का प्रसार होते रहे और वे कल्याणकारी हों. पास में ही एक व्यक्ति छत पर  कपडे रंग कर सुखा रहा था. यहाँ तिब्बतियों ने अपने धंधे खोल रखे हैं, आने वाले पर्यटकों से इन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. केवल का कहना था कि खाने का खर्च इन्हें भारत सरकार है और कपडे अमेरिका से आ जाते हैं. कुल मिला कर मौज है. लेकिन वतन से बिछुड़ने का इनका दर्द भी इसके साथ जुड़ा है. यही विश्वविख्यात दलाई लामा भी रहते हैं. हमने संपर्क किया था तो पता चला कि वे अमेरिका गए  हैं. इसलिए मुलाकात नहीं हो सकती थी. फिर कभी मुलाकात करने की कोशिश करेंगे.

खाना आ चूका था. खाने के साथ-साथ चर्चा भी हो रही थी. केवल ने बताया कि जाट जी भी आने वाले हैं. वे झरना देखना चाहते हैं. मैंने कहा कि अगर अभी आ लेते तो झरना दिखा ही देते. हमारे आस-पास बहुत से झरने हैं. वैसे भी सभी के अपने-अपने झरने होते हैं. जरा सा दुःख आया नही की झरने शुरू हो जाते हैं, दुःख के झरने एवं सुख के झरने के जल का स्वाद एक जैसा ही होता है. दुःख के झरने का जल आदमी पी जाता है और सुख के झरने का जल छलक जाता है. छलकता हुआ जल दिख ही जाता है. चाहे लाख कोशिश करो रुकता ही नहीं है. जाट जी थे नहीं. अन्यथा एक झरना तो बह ही जाता खली वाला. उसके फोटो-शोटो लग जाते ब्लॉग पर. नीरज भी सयाना बंदा है. खली का नाम सुनते ही डर गया. बोला कि खली के जाने के बाद ही आऊंगा.

भोजन के बाद हम पहुच गए बुद्ध मंदिर में. वहां एक पुस्तकालय भी है. मैंने उस पुस्तकालय में कुछ तिब्बती साहित्य देखना चाहा. क्योंकि तिब्बती तंत्र विद्या की काफी चर्चा होती है. लेकिन वहा पर हिंदी में कुछ भी नहीं था. तिब्बती या अंग्रेजी में पुस्तकें थी. मैंने उनसे पूछा कि और कहाँ मिल सकती हैं तो उसने कोई माकूल जवाब नहीं दिया. हम मंदिर में ऊपर की तरफ बढ़ गए. तिब्बती लोग मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे. बीचों बीच स्वर्ण मंडित बुद्ध की प्रतिमा लगी है और उसके सामने ही दलाई लामा की गद्दी भी है. उसे अभी ढक कर रखा गया था. शायद दलाई लामा के आने के बाद उसकी चादर हटाते होंगे. एक बूढ़ा लामा सर पर विचित्र सी टोपी लगाये हुए था. जो उलटे सूप या छाज जैसी थी. मैंने पूछा तो पता चला कि सामने की और बढ़ी हुयी टोपी से चहरे पर बरसात का पानी नहीं गिरता. इसलिए टोपी का डिज़ाइन इस तरह का बना है.

मंदिर के सामने लाइन से बड़े-बड़े पट रखे हुए थे. जिस पर एक लामा और एक लड़की दंडवत कर  रहे थे लगातार. मैं खड़े होकर देखता रहा. तब तक उन्होंने ५० दंडवत तो कर ली होगी. इस विषय पर कोई ठोस जानकारी देने वाला नहीं मिला. शायद इनकी उपासना का एक अंग होगा. जिसमे शरीर सौष्ठव बना रहे. पहाड़ी लोग वैसे भी मजबूत होते हैं. पहाड़ की जिन्दगी बड़ी कठिन होती है. दिनचर्या मेहनत भरी होती है. लकड़ी काटने से लेकर पानी भरने तक सिर्फ चढ़ना और उतरना ही है. मैदानी इलाके के लोगों को पहाड़ों में थकान हो जाती है तो पहाड़ी इलाके के लोगों को मैदानों में. दोनों ही एक दुसरे के वातावरण में कठिनाई से ही चल पाते हैं. इसलिए शारीरिक रूप से मजबूत होना भी आवश्यक है.

बुद्ध मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बोर्ड लगा है. जिसमे पेंछन लामा के विषय में लिखा है और बताया गया है कि पंछेन लामा चीन की कैद में विश्व का सबसे कम उम्र का बंदी है. पेंछन लामा का जन्म २५ अप्रेल १९८९ को हुआ था.१८ मई १९९५ को दलाई लामा ने गेंधुन छोयकी नीमा को १० वें पेंछन लामा के स्थान पर पेंछन लामा घोषित किया. २८ मई १९९६ को चीनी अधिकारियों  ने स्वीकार किया कि पेंछन लामा उनके पास है, चीन सरकार ने एक बार उसकी फोटो जारी की थी उसके बाद उसकी कोई खोज-खबर नहीं है. तिब्बती उन्हें कैद से छुड़ाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं. उन्हें पेंछन लामा की जान की चिंता सता रही है.

आज से ५० वर्ष पूर्व तिब्बती शरणार्थी असम के रस्ते भारत में आये थे. ठन्डे प्रदेशों में रहने वालों को भारत की गर्म आब-ओ-हवा रास नहीं आई. जिसके कारण कईयों की मृत्यु भी हो गयी. तब भारत सरकार ने इन्हें ठन्डे प्रदेशो एवं उनके अनुकूल वातारवरण में रहने की इजाजत दे दी, इसके पश्चात् तिब्बतियों ने कर्णाटक, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, छत्तीसगढ़ के मैनपाट, एवं अन्य ठन्डे स्थानों में बसेरा किया. धर्मशाला को मुख्यालय बनाया गया. यहाँ इनकी निर्वासित सरकार भी निवास करती है. जिसके प्रधानमंत्री लोबसंग सांगये हैं. इनका मंत्री मंडल भी है जो तिब्बत की आजादी को लेकर ५० वर्षों से गाँधीवादी तरीके आन्दोलन कर रहा है.

तिब्बत से आये हुए अधिकांश शरणार्थी अब मर-खप गए. उनकी संताने भारत में बसी हुयी हैं. एक तिब्बती प्रोफ़ेसर से मेरी मुलाकात हुयी, वे अब केंद्रीय विश्वविध्यालय से सेवानिवृत हो चुके हैं. उन्होंने बताया कि वे भारत आये थे तब माँ के पेट में थे, उन्होंने भारत आकर ही जन्म लिया. ल्हासा के बारे में सुना है. देखा कभी नहीं. अब तो हम भारत के ही होकर रह गए हैं. तिब्बत की स्वतंत्रता की आस लगाये एक पीढ़ी तो ख़त्म ही हो गयी.दलाई लामा बुद्ध की 2500 वीं जयंती के अवसर पर 1956 में जब वे भारत आये थे. तब २४ बरस के थे. अब वे ७४ बरस के हो गए हैं. अर्ध शताब्दी बीत गयी भारत में.    

मंदिर की हमने भी परिक्रमा की, वहां पर बड़े-बड़े घुमने वाले डोलों में मंत्र भरे थे. उन्हें एक बार घुमाने से लाखों मन्त्रों के जाप का फल मिलता है."ॐ मणि पद्मे हूँ " बीज मंत्र है. इसी का जप सारे तिब्बती करते हैं. वैसे तो मैं पूर्ण आस्तिक हूँ, लेकिन मूर्ति पूजा के प्रति मेरी आस्था कम ही है. कर्मकांड भी नहीं झेलता...."दिल के आईने में है तश्वीरे यार, जब जरा गर्दन झुकाई देख ली." बस यही स्थिति है अपनी. हमने भी घुमा लिए डोले, जब घुमाने से ही फल मिल जाता है कौन करे फालतू मेहनत. मामला आस्था का ही है. केवल ने लिए चित्र और फिर हम मंदिर से चल पड़े. हमारे सामने दो गोरियां थी. लेकिन इन लोगों ने सलवार कुरते पहन रखे थे. भारतीय परिधानों का कोई जवाब नहीं है.

यहाँ मंदिर में भी मुझे छत्तीसगढ़िया परिवार काम करते मिला. मेरे यहाँ आने से पहले अगर ये मिल जाते और बताते कि दलाई लामा के घर में काम करके आये हैं तो मैं विश्वास नहीं करता और उनको लबरा घोषित कर देता. लेकिन अब मानना पड़ेगा कि छत्तीसगढ़िहा की पहचान दूर-दूर तक है. दलाई लामा के घर से चल कर हम बाज़ार में आ गए. जिसे जोगीवारा सडक कहते हैं. इस सड़क पर दोनों तरफ दुकाने हैं. तिब्बती दुकानदार ग्राहकों से मोल भाव करते नजर आ रहे थे. तो कुछ विदेशी गोरे मौज मस्ती में थे. उन्हें यहाँ पर मौज मस्ती के सारे साधन उपलब्ध हो जाते हैं. दम मरो दम कुसंस्कृति के लोग धार्मिक स्थलों को ख़राब कर रहे हैं. हमने तो अधिक अन्दर तक झाँकने की कोशिश नहीं कि वरना सारा भेद पता लगा लेते और उतना समय भी नहीं था मेरे पास..

बाज़ार में एक गोरी तो अधनंगी ही घूम रही थी. पता नहीं उसके कपडे किसी ने चुरा लिए या उसे गर्मी अधिक लग रही थी. आखिर वह मेरे गुप्त कैमरे की जद में आ ही गयी. लोग मुंह फाड़े देख रहे थे बिना टिकिट का तमाशा. भले ही गोरों की संस्कृति वैसी ही हो पर भारत में आकर उपहास का हेतु तो बन ही जाते हैं. फिर इनकी देखा देखि हमारे काले भी गोरे होने की राह पर चल पड़ते है. धोती से तो कच्छे में आ ही गए. एक गोरी दुकान के सामने उदास बैठी थी. शायद किसी आने वाले ने वादा करके धोखा दे दिया था. मुंह उतरा हुआ था. बार-बार सड़क की तरफ देख रही थी. अब परदेश में कोन सहाय हो. अगर कोई हो गया तो उसके ही गले पड़ सकती है. हमने तो राम राम की और आगे बढ़ लिए.

बस स्टैंड के चौराहे पर एक बौद्ध मंदिर है.यहाँ भी दर्शनार्थी पहुचते हैं.  बुद्ध का दर्शन था कि शरीर को इतना कष्ट मत दो कि साधन ही ख़त्म हो जाये और इतना भी इस पर आश्रित न होवो कि गुलाम ही हो जाओ. उन्होंने माध्यम मार्ग सिखाया. धम्म की शरण में ले गए. बाज़ार से निकलते हुए हमने दुकानों में बिकते सामान देखे. ये सामान सभी टूरिस्ट प्लेस पर मिल जाते हैं. सभी जगह एक जैसे ही सामान मिलते हैं. हिन्दुस्तानी ग्राहकों पर दूकानदार कम ही निगाह डालते हैं. उन्हें तो गोरों की जेब खली करवानी रहती है और फिर उन्हें तो गोरों से डालर मिलते हैं. सारा मामला डालर का ही है.

अब हमने बस स्टैंड से टैक्सी पकड़ी और वापस नीचे धर्मशाला की ओर चल पड़े.टैक्सी में पीछे सीट पर कुछ महानुभाव थे. वे भारतीय राजनीती पर गरमा गरम चर्चा कर रहे थे. मैंने भी अपने कान उनकी तरफ लगा दिए. एक ने कहा कि भ्रष्ट्राचार ने देश का बेडा गर्क कर दिया. दुसरे कहा कि बाबा रामदेव अच्छा काम कर रहे हैं. वो आन्दोलन चला रहे हैं, विदेशी बैंकों से धन वापस लाने के लिए. अच्छा काम कर रहे हैं. देश में बिना घूस दिए तो जायज काम भी नहीं होता. साले सभी चोर हैं. लाखों करोड़ रुपया राजा खा गया. मनमोहन सिंह कुछ कर नहीं रहे हैं. एक ने कहा कि वह तो रबर स्टेम्प है, क्या कर सकते हैं? मैं भी सोच रहा था कि भ्रष्ट्राचार की चर्चा अब आम आदमी के द्वारा भी होने लगी है. इसका अर्थ यही है कि आने वाले दिनों में देश कि जनता कुछ माकूल कदम उठाएगी. हम मैक्लोडगंज की यात्रा सम्पन्न करके डेरे पर आ रहे थे.......दक्षिण के मैक्लोडगंज बायालकूपे की सैर यहाँ करेंआगे पढें

मंगलवार, 3 मई 2011

चक्करदार रास्तों ने चक्कर में डाल दिया --- ललित शर्मा

दिल्ली का कार्यक्रम बढ़िया रहा, सभी ब्लॉगर मित्रों से मुलाकात हुयी, बात हुयी. इस कार्यक्रम के साथ मैंने हिमाचल यात्रा का कार्यक्रम भी जोड़ रखा था. इसलिए केवल राम के साथ धर्मशाला आ गया. शाम ६ बजे राजीव तनेजा जी ने ISBT छोड़ा और हम हिमाचल प्रदेश रोड वेज की डीलक्स बस से धमर्शाला के लिए ६.५० को चल पड़े. 2x2 की बस में 33-34 नंबर की सीट मिली. सीट देखते  हे मुड उखड गया. लेकिन किया भी कुछ नहीं जा सकता था. इन्ही सीटों से संतोष करना पड़ा. चंडीगढ़ तक तो ठीक-ठाक पहुचे, उना के बाद चक्करदार रास्तों ने चक्कर में डाल दिया. बस का यह सफ़र लगभग १२ घंटे का है. इतनी लम्बी दूरी  तक पहली बार बस में जाना हुआ. 

सुबह हम धर्मशाला पहुचे तो खासी ठण्ड थी. मैंने गर्म कपडे निकाल लिए. केवल ने चाय बना कर पिलाई और मैं सो गया. दिन भर सोया रहा. शाम को शहर में घुमने गए तो तबियत ठीक नहीं लग रही थी. हरारत सी बदन में थी. थोड़ी देर बाद बुखार सा चढ़ गया. सुबह तक तबियत वैसी ही थी. डॉ. को फोन करके टेबलेट लिखाइ और सुबह टेबलेट ले कर फिर सो गया. बस के सफ़र ने तोड़ कर धर दिया. दो दिनों से खाट छोड़ी ही नहीं है. आस-पास घुमने का सारा उत्साह ठन्डे बस्ते में चला गया. देखते हैं कल तक तबियत कुछ ठीक हो गयी तो आगे की यात्रा की जाएगी. घर के सामने से धौलाधार के शिखर पर बर्फ जमी हुयी है. नजारा बहुत ही अच्छा है. अभी तो इसे ही देख रहा हूँ. हालत देख कर त्रिउंड जाने का इरादा स्थगित कर दिया. इसे नीरज जाट जी के लिए छोड़ दिया.हो सका तो शाम को करमापा से मिला जायेगा. दलाई लामा के यहाँ से सन्देश मिला कि वे धर्मशाला में नहीं है. मेरे यहाँ रुकने तक आ गए तो उनसे भी मुलाकात करने का इरादा है. मिलते हैं ब्रेक के बाद....