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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

नदियाँ, बाढ और भारत

भारतीय गणतंत्र एक विशाल भूभाग का स्वामी है। देश है जहाँ बारहों महीने सभी मौसम दिखाई देते हैं ऐसा विश्व में अन्य किसी देश में नहीं होता। एक तरफ़ सूखा पड़ता है तो दूसरी तरफ़ बाढ का विनाशकारी तांडव रहता है। आज यही तांडव तमिलनाडू के तटीय क्षेत्र में दिखाई दे रहा है, जिससे जनजीवन बूरी तरह प्रभावित हो गया और करोड़ों अरबों के संसाधनों की हानि के साथ जनहानि भी दिखाई दे रही है। इसका मुख्य कारण वर्षा जल के उचित निकासी के साधन न होना है। पहले छोटे नगर ग्राम होते थे इतनी समस्या नहीं होती थी, अब विशाल महानगर बन गए है। जनसंख्या विस्फ़ोट के साथ निवास के लिए कोई कहीं पर भी बस गया है। उस क्षेत्र का भूगोल का अध्ययन किए बिना ही बड़ी-बड़ी कालोनियों का विकास हो गया है जिससे नदियों का मार्ग अवरुद्ध होना त्रासदी कारक हो गया है।
नदियों का अपना एक तंत्र होता है, सहसा ही कहीं अत्यधिक वर्षा होने से नदियों का निर्माण नहीं होता है। उससे पहले वर्षाजल नालों, उपनदियों, सहायक नदियों से होते हुए मुख्य नदी तक पहुंचता है तब कहीं असंख्य धाराएं चलकर एक नदी का निर्माण करती हैं तथा ढलान पर कई धाराओं में बंट कर समुद्र में समाहित होती है। शहरों में लोगों ने इन नालों, उपनदियों के प्रवाह क्षेत्र को बंद कर उस पर निर्माण कार्य कर लिए हैं, जिसके कारण नदियों का मार्ग अवरुद्ध हो गया है और अत्यधिक वर्षा के कारण जल निकासी का मार्ग नहीं मिलने के कारण सारा पानी शहर में घुस जाता है। अगर जल निकासी का उचित साधन हो तो शहर या नगर डूबने जैसी घटना नहीं हो सकती।
प्रकृति ने सुरक्षा व्यवस्था स्वयं की है, परन्तु मानव ने उसके सुरक्षा तंत्र को तहस नहस कर डाला है। नदियों के अपवाह क्षेत्र को अवरुद्ध करने के साथ उनके प्रवाह क्षेत्र में भी कब्जा कर बसेरा कर लिया है। जल, अग्नि एवं वायु की शक्ति का  कोई पारावार नहीं है, वह एक झटके में ही बड़े से बड़े निर्माण का सफ़ाया कर देती है, जिससे मानवों के साथ अन्य प्राणी भी प्रभावित होते हैं और जान माल से हाथ धो बैठते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण केदारनाथ की त्रासदी है। लोगो नें नदी के प्रवाह क्षेत्र में कब्जा करके बड़े निर्माण कर लिए थे। काश्मीर में भी इसी कारण बाढ का तांडव जन धन के विनाश का कारण बना।
इस विनाश का एक महत्वपूर्ण कारण जलवायु परिवर्तन भी है। जलवायु परिवर्तन से होने वाली गर्मी के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र जल स्तर बढ़ रहा है। इसके लिए वैज्ञानिक दशको से चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ग्लेशियर इसी तरह पिघलते रहे तो कई देशों का नामोनिशान मिट जाएगा। बांग्ला देश के तटीय क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 20 से 30 भूमि को समुद्र प्रतिवर्ष निगल रहा है। एक जमाने में राजस्थान में कभी कोई बाढ के विषय में सोच नहीं सकता था। तीन चार वर्षों पूर्व भारी वर्षा ने जयपुर में बाढ के हालात पैदा कर दिए। अचानक बाढ आने पर पता चला कि वर्षा जल निकालने के लिए नदी नालों का साधन ही नहीं है।
तमिलनाडू के मद्रास शहर में भी यही कमियां विनाश का कारण बन रही हैं। अब समय आ गया है कि नगरों की बसाहट को दुरुस्त किया जाए। ट्रिब्यूटरियों की साफ़-सफ़ाई कर उन्हें जल प्रवाह ले जाने लायक बनाया जाए। इसके साथ ही नई बसाहटें इस तरह बने कि ट्रिब्यूटरियों का उल्लंघन न हों। प्रकृति के द्वारा बनाए गए जल प्रवाह मार्गों को बंद न कर उनको सम्मानपूर्वक यथा स्थिति में रखा जाए। नगरों में जलप्रवाह की निकासी हेतू समुचित साधनों का निर्माण एवं विकास होना चाहिए तभी बाढ इत्यादि से होने वाली त्रासदियों से बचा जा सकता है। अन्यथा प्रकृति के साथ खिलवाड़ मानव सभ्यता के विनाश का प्रमुख कारक बनेगा।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

खारुन ट्रैकिंग का साथी: बन्नु सिंह उकै

खारुन ट्रेकिंग के दौरान अनुभव अविस्मर्णीय रहे। खैर स्वास्थगत कारणों से सफ़र अधूरा रहा। परन्तु हमसफ़र एक से एक लोग मिले। रात मंदिर में सुतके गुजरी थी। सुबह हमारा साथी बना अनजान घुमक्कड़ "बन्नु राम उकै"। बीबी-बच्चे, खेती-किसानी सब हैं, पर घुमक्कड़ परिव्राजक का जीवन व्यतीत कर रहा है। भोजन बनाने के लिए जर्मन के दो बर्तन, एक लाल रिफ़िल का पेन और फ़ुल स्केप पेपर के साथ थैली में तम्बाखू पुड़िया एवं चूना की डिब्बी के साथ एक चिलम उसकी कुल सम्पत्ति। जिसे पन्नी में हमेशा साथ रखता है। 
बन्नु सिंह उकै
सुबह चाय की दरकार थी तो बन्नु राम ने नदी के किनारे चूल्हा बना कर जला लिए एवं गुड़ की लाल चाय पिलाई। चाय पीकर तबियत तर हो गई। लगा कि "बिगबॉस" का "लक्जरी आयटम" मिल गया। मेरे संभलते तक बन्नु राम नदी में नहाकर "राहेर" (अरहर) दाल चढा चुका था। मेरे हाथ मुंह धोते एवं आंवला की "मुखारी" घिसते तक उसका भोजन तैयार हो रहा था। पहले उसने बालों में तेल लगाया और नदी जल में देख कर उन्हें संवारा। फ़िर लहसुन, टमाटर और मर्चा का तड़का लगा कर दाल फ़्राई की। जिस सलीके उसने भोजन तैयार किया उसे देख कर लगा कि खाने का शौकीन आदमी है। 
नदी के तीरे तीर
जंगल होने के कारण सुबह अच्छी ठंड थी। जेब से बाहर हाथ निकालते ही ठिठुरन महसूस होती थी। आज मुझे नदी के सहारे-सहारे, किनारे-किनारे के साथ चलना था। रास्ता पथरीला एवं ऊबड़-खाबड़ था। बन्नु राम भोजन करके तैयार हो गया और हम जंगल में प्रवेश कर गए। रास्ते में बन्नु राम एक कुशल वक्ता की तरह कथा कहता है, परन्तु कथा में उसके निर्मल हृदय से निर्मल वाणी बाहर आती है। जंगल से पांच किमी की दूरी पर आधुनिक संसाधनों से दुकाने अंटी पड़ी हैं, पर वह स्वयं में मगन है। जंगल से अधिक सम्पन्न और सौंदर्यपूर्ण उसे कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। शायद इसे ही "द्वितीयोSस्ति" कहा गया है। 
कुकुर कोटना में अंगाकर रोटी और पाताल चटनी का भोजन
बन्नु सिंह कहता है - हजारों करोड़ों के घोटाले करने वालों को भी वहीं जाना है, जहाँ मुझे जाना है। दोनो के लिए जगह एक सी ही है, वहाँ किसी की सिफ़ारिश नहीं चलती और न ही पैरवी करने के लिए कोई वकील होता और न ही कोई रसूखदार जमानतदार। जानते हो! "मुझसे अधिक धनी कोई नहीं है, ये पत्थर देखो। एक-एक पत्थर कितना मंहगा है। ये पेड़ देखो, जिसे दीमक खा रही है, यह कितना मूल्यवान है। जंगल वाले ही सारा जंगल काट कर ले गए। अब तो जलाऊ के लायक भी लकड़ी नहीं दिखाई देती। फ़ालतू का काड़ी-कचरा उगा हुआ है। अगर इन पत्थरों को ही गाड़ी मोटर में भर के बाहर ले जाए तो लाखो-कड़ोरों रुपए के हैं। उधर देखो, पेड़ों पर चारों तरफ़ नोट ही नोट लटके हैं। एक-एक पत्ता सौ-सौ का नोट है। अब बताओं आप, मुझसे अमीर कौन है? ये सारा जंगल मेरा है और मैं इसका मालिक हूँ। मेरे ही धन को लोग चोरा कर ले जा रहे हैं।" 
साथीयों के साथ निरीक्षण
मैं बन्नु राम की बात सुनकर उससे सहमत होता हूँ तो वह मुझे मुक्त कंठ से एक रेलो गीत सुनाता है। जो जंगल में गूंजता है और मैं उसे रिकार्ड करता हूँ… "साय रेलो रे रेलो रे रेलो, नदी नादर निहिर निहिर ताघर ता, ओSS रोहुर झुहुर झुहुर बाजेर तिहिर तोर। गांवे रे गांवे रे घुमेर बाबू कहे नादर तोर। ओSS नादर लोहर लोहर लोघर तोर।" बन्नु राम के गीत मुझे जंगल के साथ जोड़ रहे थे। वनवासी के गीतों ने मेरे अंतरमन को वन के साथ एकाकार कर दिया था और कदम उबड़-खाबड़ पत्थरों पर पड़ते हुए सावधान थे। सफ़र चल रहा है बलखाती इठलाती कुंवारी नदी के साथ। जिसमें हम सफ़र बन्नु जैसा यायावर भी है। आज दिन भर टीवी पर नौंटकी देखकर बन्नु सिंह मुझे तुम्हारी याद आ रही है, मिलते हैं जल्द ही।

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

पैमाने में व्यग्र होते सोडे के बुलबुले ---- ललित शर्मा

शब-ए-रोज यह वाकया घटता है मेरे साथ, तेरे घर के सामने लगे नियोन ब्लब की नीली रोशनी दूर से ही दिखाई देती है,जब तेरे घर से सामने से गुजरता हूँ तो वह खींचता है मुझे। कदम ठिठकते हैं एकाएक गाड़ी के ब्रेक पर पैर टिक जाता है, मैं कहता हूँ चला जाए अंदर, मन कहता है, रुकना नहीं है जाना है। मन जीत जाता है, मैं रुकता नहीं, चलते जाता हूँ। कहता हूँ कि फ़िर कभी आऊंगा। कांच के पैमाने में तेरा अक्स देखने।

कुछ मील चलने के बाद एकबारगी तेरी याद फ़िर आती है, रास्ते में एकांत ढूंढता हूँ जहाँ आराम से बैठ कर उन गलियों के चक्कर काट आऊँ जहाँ कभी मैं गुजरा करता था। अलियों से खेला करता था। लेकिन मन कहता है कि रुकना नहीं है चलते जाना है। मन व्यर्थ ही दुश्मन बना हुआ है, कहीं रुकने ही नहीं देता। उसके कहने से फ़िर मैं चल पड़ता हूँ और चलता ही जाता हूँ।

रास्ते में यमदूतों से भेंट होती है, सड़क  के बीच जुगाली करते हुए, निश्चिंत होकर बैठे हैं। जैसे संसद में किए गए प्रश्न का जवाब मिलने के बाद तन्मयता से निरीक्षण कर रहे हों। या फ़िर उपर की कमाई को गिनते हुए कोई सिपहिया और बाबू। एक संतोष का भाव दिखता है इनके चेहरे पर। अब कोई भिड़ जाए तो उसकी आई थी। बच जाए तो भी राम राम है। बात तो तब है जब तु रहे साथ और ये यमदूत आ जाएं। लेकिन तुझे देख कर आते नहीं हैं। अरे जान का डर सबको है। चाहे दूत हो या यम दूत।

गाना बज रहा है एफ़ एम पर रात 12 बजे। मैं कार में रिकार्ड नहीं सुनता इस समय। एफ़ एम स्टेशन वालों को शायद मेरी पसंद का अंदाजा है और  रात के 12 बजे के बाद शायद मेरे जैसे ही कुछ श्रोता होगें जो सुनते होगें। “एक  दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल लल्ला ल ल ल ला” फ़िर एक और गीत बजता है “ चांदी की दिवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया’ फ़िर रेड़ियो कहता है “घुंघट के पट खोल,तोहे पिया मिलेंगे” बस सुन कर गहरे उतर जाता हूँ, पट नहीं दिखते।

सड़क दि्खाई देनी बंद हो जाती है। कार हवा में तैरते जाती है। बस तैरते जाती है हाईवे पर, जैसे बिना ड्रायवर के चल रही हो। मैं पुतले की तरह स्टेयरिंग पर हाथ धरे गीतों में मुग्ध हो जाता हूं। किसी वाहन से टकराने का खतरा उठा कर। वैसे टकराना तो मेरी फ़ितरत में शामिल हो गया है। कभी टकरा जाता हूं तो कभी सलामत घर तक पहुंच जाता हूँ। सोचता हूँ कि यह कातिल तो कभी जान लेकर ही छोड़ेगा। लेकिन जान निकलती नहीं है। जीवटता रग-रग में भरी है। दुश्मनों की छाती पर मुंग दलने के लिए फ़िर बच जाता हूँ।

यही सोचते सोचते फ़िर तेरा घर आ जाता है जहाँ तू मिलती है। ब्रेक पर पैर पहुंच जाते हैं, मन कहता है रुकना मना, लेकिन अबकि बार मन पर मैं विजय पा लेता हूँ और ब्रेक लग जाता है। राम लाल सैल्युट दागता है, बरसों का सेवक है। मेरी पसंद और नापसंद का ख्याल रखता है और यह भी जानता है कि मुझे कब क्या चाहिए। कोठरी में तिपाई सजा देता है पानी, सोडा गिलास और चखना के साथ तेरे दीदार होते हैं। बेसब्री से होठों से लगाता हूँ, एक कड़वाहट पूरे वजूद में भर जाती है। आज के बाद तुझसे फ़िर कभी नहीं मिलुंगा। सच कह रहा हूँ।

कमरे में जलती मोमबत्ती रो रही है, लौ थरथरा रही है,आंसू पिघल कर तिपाई पर गिर रहे हैं। जैसे कहती हो कैसे हो पाएगा तुमसे बिछोह, ये तो तुम रोज कहते हो। साक्षी हूँ मैं पल पल की।

तभी एक मच्छर गुनगुनाता हुआ अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाता है। “तुम अगर मुझको न चाहो तो कोइ बात नहीं” शायद उसकी गुनगुनाहट की धुन कुछ ऐसी ही थी। बस अब वो भी मस्त है और मैं भी मस्त हूँ। कड़ुवाहट कुछ क्षण की थी अब आनंद का सागर हिलोरें लेने लगा। मोबाईल पर निगाहें चली जाती हैं। नम्बरों पर सरसरी निगाह दौड़ाता हूँ। धीरे धीरे नम्बर भी आकार लेने लगे। अरे कितने दिन हो गए इस नम्बर से बात किए, लेकिन रात के एक बज रहे होगें, कोई तुम्हारी तरह येड़ा तो नहीं है। चलो आगे बढते हैं किसी और नम्बर की तरफ़ जो मुझ जैसा होगा।

प्याले में मोमबत्ती की लौ का प्रतिबिंब झिलमिलाता है। जैसे हिलते हुए नदी किनारे के घाट के पत्थर पर बैठने पर नदी हिलती हुई दिखती है। आज मोमबत्ती की लौ थिरक रही है। शायद तुम्हारा चेहरा स्पष्ट दिखाना चाहती है जो अंधकार में छुपा हुआ है। फ़ोन के नम्बर चलते ही रहते हैं, सहसा एक जगह रुकते हैं नम्बर, डायल करने पर कहती है कि “ इस रूट की सभी लाईने व्यस्त हैं, कृपया थोड़ी देर बाद कोशिश करें।“ कोशिश करने के लिए समय कहाँ है अपने पास। अधीरता बढ जाती है। पैमाने में बुदबुदाते सोडे के बुलबुले व्यग्र हो उठते हैं। शायद कहते हों महाराज बहुत झेलाता है भाई, कह दो आगे पानी से ही काम चला लिया करे। कुछ तो तमीज होनी चाहिए मयखाने की। ऐसे कैसे पट खुलेगें?