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सोमवार, 17 जून 2013

पापा जादूगर ..........

जादूगर तरह तरह के खेल दिखा रहा था, बच्चे मंत्र मुग्ध होकर उसके हैरत अंगेज करतब देख रहे थे। कभी डिब्बे से कबूतर निकालता और उसे गायब कर देता तो कभी रंग बिरंगे फ़ूल निकाल कर दिखाता। कभी छोटी सी बॉल को फ़ुटबाल बना देता तो कभी रुमाल को हवा में गायब कर देता। उसकी छड़ी में गजब का जादू था, उसे घुमाते ही पलक झपकते जादू हो जाता। बच्चों के मन में कौतुहल था कि जादूगर ये सब कैसे करता है। सब बच्चों के बीच से उदय उठा और जादूगर के पास पहुंचा। उसे अपनी खिलौना कार दी और बोला - इसे बड़ा कर दो। जादूगर चकित होकर उदय की ओर देखकर बोला - "बेटा कार को बड़ा करने वाला जादू सिर्फ़ आपके पापा ही दिखा सकते हैं, वे ही इस कार को बड़ा कर सकते हैं, मैं नहीं। उस वक्त उदय तीन साल का था। अब वह मेरे से जिद करने लगा कि कार को बड़ा करो। मैने उससे कुछ दिनों का समय लिया और कार को बड़ा कर दिया।

जादूगर ने यह बात सहज ही कही थी लेकिन उसमें गुढार्थ था। पापा ही दुनिया के एकमात्र ऐसे जादूगर होते हैं जो परिवार की सभी मांगों को पूरा कर सकते हैं। बच्चा हो या बूढा हो, सभी की आशाएं उसके साथ लगी रहती हैं। दुनिया के महान जादूगर होते हैं पापा। मेरे पापा भी जादूगर थे, मैं सोचता था कि उनके पास जादू की असीमित शक्तियाँ हैं। उनके पास नाग मणि है, जो चाहो मांग लो। मनवांछित मिल जाएगा। लेकिन यह जादू क्या होता है और कैसे होता है, इसका रहस्य पापा बनने के बाद ही पता चलता है। जो चीजें पलक झपकते ही प्राप्त होने की कामना करने बाद प्राप्त हो जाती थी वे किस तरह से आती हैं और उस जादू को दिखाने के लिए कौन से मंत्र को सिद्ध करके उसका सफ़ल प्रयोग करना पड़ता है। यह सिर्फ़ पापा ही जानते हैं और कोई नहीं। उदय भी जान जाएगा कि पापा ने छोटी सी कार को बड़ा कैसे किया जब उसका बेटा उससे यह इच्छा जाहिर करेगा।

पापा को हमेशा कई मोर्चों पर लड़ना होता है, उसके लिए युद्ध के कई मोर्चे खुले होते हैं। इतने मोर्चों पर कोई बहादूर योद्धा ही लड़ कर विजय प्राप्त कर सकता है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते ही दो मोर्चे तो सभी के लिए खुल जाते हैं। अर्थ अर्जन करना और गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति करना। कुछ कम खट कर अधिक कमा लेते हैं तो कुछ अधिक भाग दौड़ करने के बाद भी गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाते हैं। लेकिन बच्चों को हमेशा पापा से जादू की ही उम्मीद होती है, उनके सपने अनंत होते हैं और सभी सपने मूर्त हो जाएं यह किसी भी जादूगर से संभव नहीं है। कल्पनाओं की  उड़ाने अनंत होती हैं। आज एक बच्चे की कल्पनाओं को साकार करने के लिए सारा परिवार तैयार रहता है। लेकिन कभी वह समय भी था जब कल्पनाएं और आकांक्षाए सारी जिन्दगी पूर्ण नहीं हो पाती थी।


जादूगर पापा तो प्रत्येक युग में हुए हैं, समय के परिवर्तन के साथ उनका जादू भी परिष्कृत होते गया। पहले होली और दीवाली ही नए कपड़े सिलाए जाते थे। घर में दर्जी अपनी मशीन लेकर आता था और महीने भर सभी के कपड़े सिलता था। उस जमाने में सिले सिलाए कपड़ों को अच्छा नहीं समझा जाता था। कहा जाता था कि - न जाने किस बीमार या मुर्दे के उतार कर सिले सिलाए कपड़े बेचे जाते हैं। इसलिए कपड़े सिलवा कर ही पहने जाते थे। आज वे बीमारों और मुर्दों के कपड़े घर घर में मौजूद हैं। जब भी मांग हुई और पापा को जादू से कपड़े उपलब्ध करवाने ही पड़ते हैं, वार-त्यौहार की बात क्या की जाए। एक पट्टी सिलेट में साल भर निकल जाता था। आज नर्सरी से ही कापियों और पुस्तकों का ढेर लगाना पड़ता है। एक गणवेश सारे साल चल जाती थी। लेकिन आज 5-5 गणवेशों का प्रबंध करना पड़ता है। वर्तमान में बढती हुई मंहगाई को देखते हुए घर-गृहस्थी के सामान का प्रबंध करना भी किसी जादू से कम नहीं है।


3 साल पहले उदय ने जिद पकड़ ली कि उसे छोटी सायकिल चाहिए। जबकि घर में 2 छोटी सायकिलें मौजूद थी। लेकिन उसे तो नई चाहिए थी। नई सायकिल आते ही कुछ दिन चलाई फ़िर उसके टायर आरी से काट कर देखे कि उसमें हवा कहाँ होती है। टायर शहीद हो गए लेकिन हवा की उपस्थिति का पता नहीं चला। थोड़े दिन छोटी सायकिल चला कर बड़ी सायकिल पर हाथ मारने लगा। छोटी सायकिल मुरचा खाई हुई पड़ी है। अब स्कूटी की मांग चल रही है। सायकिल को स्कूटी में बदलने का जादू सिर्फ़ पापा ही दिखा सकते हैं, दुनिया का अन्य कोई जादूगर नहीं दिखा सकता। हम 24 इंच की सायकिल से ही कैंची चलाना सीखे थे। छोटी सायकिल चलाने का सपना तो अधूरा ही रह गया। शायद मेरे पापा को सायकिल छोटी करने का जादू नहीं आता था। बदलते समय के साथ पापाओं को यह सब जादू आना जरुरी हो गया है। जिससे गृहस्थी की हर जरुरतें पूरी हो सकें और बच्चे कह सकें मेरे पापा बहुत बड़े जादूगर थे।

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

भानगढ़ की रत्नावती और सिंधु शेवड़ा

बाजार से आगे बढने पर पीपल के वृक्ष के पत्ते सरसराहट की आवाज के साथ इस गढ के वैभव की गाथा कहते हैं।मुख्य मार्ग के सुनसान बाजार के खंडहर बेबस स्तब्ध खड़े थे। समय की मार से कुछ भी नहीं बचा। सारी रौनक और वैभवता नष्ट हो गई है। जो बसा है उसे एक दिन उजड़ना भी होता है ये संसार का नियम है। धरा पर कोई स्थायी नहीं रह सका। किसी को प्रतिद्वंदिता ने उजाड़ दिया तो किसी को प्रकृति के कोप का सामना करना पड़ा। पूरी धरती को मानव ने पग पग नाप कर अपनी उपस्थिति के चिन्ह छोड़ दिए। इनकी बातें सुनने के लिए ध्यान लगा कर उस काल खंड में जाना होगा जब यहाँ प्रतिहार, अनुचर, दंडधारी विचरण करते थे। खड्गधारी एक आवाज में ही किसी का प्राण हरण करने के लिए तत्पर रहते थे। समय गुजर गया लेकिन पीपल आज भी उन गाथाओं को सुनाता है। 
आरंभ से पढें
सुनसान भानगढ़ नगर
मैं पीपल की छांव में जाकर बैठ गया। मुझे बैठे देख कर उसने पत्ते फ़ड़फ़ड़ाए और कहने लगा। थक गए पथिक, चलते-चलते। तनिक विश्राम करो, तुम्हारी जिज्ञासा मुझ पर प्रगट है। तुम्हे वही कहानी सुनाता हूँ, जिसे सुनने की आकांक्षा लिए यहाँ आए हो। यह कहानी है, रानी रत्नावती की। हाँ! वही रानी रत्नावती, जिसके सौंदर्य के चर्चे वर्तमान में भी विद्यमान हैं। अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी वह। उसके पिता ने विवाह के लिए स्वयंवर रचाया था। इस स्वयंवर में दूर देशों के नरेश तथा राजा आए थे। एक से बढ कर एक पराक्रमी, धनुर्धारी बल पौरुष के धनी रत्नावती का वरण करने की आकांक्षा से पधारे थे। स्वयंवर समारोह की चमक - दमक देखते ही बनती थी। स्वयंवर के मध्य व्यवधान की आशंका से राजा ने अपने सुदृढ़ एवं उद्भट सैनिकों को सुरक्षार्थ तैनात कर रखा था।

चलते फ़िरते प्रेत
मैने जम्हाई ली, चेहरे पर थोड़ी थकान दिख रही थी। उसने बोलना जारी रखा … तुम सुन रहे हो न राहगीर, अगर तुम्हारा ध्यान भटका तो वंचित रह जाओगे इस कथा से। मैने सिर हिला कर सहमति दी……वह कहने लगा… इन राजाओं में सिंधू देश का राजा भी रत्नावती के वरण की आकांक्षा लेकर आया था। स्वयंवर प्रारंभ हुआ, सभी राजाओं के चेहरे पर यह गुमान का भाव था कि रत्नावती उसका ही वरण करेगी। रत्नावती ने स्वयंवर सभा का एक चक्कर लगाया, सभी राजाओं पर भरपूर दृष्टि डाली और भानगढ़ नरेश के गले में वरमाला डाल दी। दूदूंभि बज उठी, पुष्प वर्षा होने लगी, हर्ष मिश्रित ध्वनियाँ परदों के पीछे से सुनाई देने लगी। ब्राह्मणियाँ मंगल गान करने लगी। साक्षात राम एवं सीता के स्वयंवर का दृष्य सजीव हो उठा। सभी राजा विवाह की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानों को प्रस्थान कर गए। इधर दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया।

विश्राम के पल - सिंह त्रयी (भरत सिंह, प्रदीप सिंह, रतन सिंह)
स्वयंवर स्थल पर ही भानगढ के विनाश के बीज पड़ गए… समझ रहे हो न? उसने मुझसे प्रश्न किया। आगे बताओ कहानी रोचक होती जा रही है, मैने कहा। तो सुनो- सिंधु देश का राजा रत्नावती की  सुंदरता पर मोहित था, उसने रत्नावती के सौंदर्य के चर्चे पहले ही सुन रखे थे। लेकिन भानगढ़ के राजा जैसा सामरिक दृष्टि से सक्षम नहीं था। रत्नावती से विवाह करने की आकांक्षा को लेकर वह उससे युद्ध नहीं कर सकता था। क्योंकि युद्ध में उसकी हार निश्चित थी। वह मन मसोस कर रह गया। लेकिन रत्नावती को पाने की उसकी कामना प्रबल होती गई। वह सिंधु देश में जाकर सिर्फ़ यही चिंतन करने लगा कि रत्नावती को कैसे प्राप्त किया जाए। उसे अपने महल की शोभा कैसे बनाए? शारीरिक बल काम न आने पर व्यक्ति तंत्र बल-छल की ओर प्रयाण करता है। यही सिंधु राजा ने भी किया।

शिवालय एवं शेवड़ों का धूणा
कुछ इतिहास में घटी घटनाओं का जिक्र करना चाहुंगा। जो इस गाथा से जुड़ी हुई हैं। एक बार राजा भगवंत दास यहाँ शिकार खेलते हुए आए। उन्हे यह स्थान अपनी राजधानी बनाने लिए सुरक्षित और उपयुक्त लगा। इस स्थान पर एक प्राचीन शिवालय था जहाँ कुछ शेवड़े अपनी तांत्रिक साधना करते थे। यह स्थान शेवड़ों के धूणे के नाम से प्रसिद्ध था। राजा ने अपना विचार शेवड़ों के गुरु को बताया। उसने राजा से कहा कि - तुम यहाँ राजधानी बना सकते हो, हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तुम्हारा महल इतनी दूर होना चाहिए कि उसे धूणे की धुंवा छू न पाए। राजा ने सहमति दे दी एवं यहाँ गढ का निर्माण किया। राजा अपने राज काज में लग गया और शेवड़े अपने धूणे में मस्त हो गए। एक दिन खूब आँधी आई और धूणे की धुंवा राजमहल तक पहुंच गई। बस इसी दिन से भानगढ़ के विनाश की नींव पड़ गई।

पहाड़ी पर सिंधु शेवड़े की छतरी (चित्र पर क्लिक करके देखें)
प्यास लगने लगी थी, मैने एक घूंट पानी की ली और आगे सुनने लगा। सुन रहे हो न … सिंधु राजा रत्नावती को भूल नहीं पा रहा था। अब उसने तांत्रिकों का सहारा लेना शुरु किया। उसने सोचा कि रत्नावती को प्राप्त करने का सिर्फ़ तंत्र मंत्र का ही एक रास्ता बचा है। उसने भानगढ़ की पहाड़ी पर डेरा जमा लिया। वो देखो उपर छतरी … दिखाई दे रही है न। वहीं सिंधु राजा रहने लगा। उसने डेरे के शेवड़ों से तंत्र मंत्र सीखे और उन्हे सोधने में लगा रहा। मनुष्य की कामना प्रबल होती है, वह उसका उत्कर्ष भी कर सकती है तो पतन भी। बस यही कुछ भानगढ़ पर भी मंडरा रहा था। मंत्र सोधते सोधते एक दिन सिंधु राजा सिद्ध हो गया और सिंधु शेवड़ा कहलाने लगा। बस अब समय आ गया था रत्नावती पर तंत्र मंत्र का प्रयोग करने का। 
कभी इन गलियारों में रौनक थी
उपर पहाड़ी पर बैठा सिंधु शेवड़ा गढ की भीतर हो रही सारी गतिविधियों को जानता था। रत्नावती की एक दासी सुंगधित तेल लेने बाजार तक आती थी जिसे उसके बालों में लगाती थी। सिंधु शेवड़ा नगर में प्रवेश कर गया और दासी कटोरे में तेल लेकर महल की ओर जा रही थी। उसने तेल देखने लिए अपने हाथ में लेकर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया और पहाड़ी पर पुन: चढ गया। इधर दासी को विलंब होने का कारण रत्नावती ने पूछा। तो उसने रास्ते में एक शेवड़े के मिलने का कारण बताया। रानी ने दासी के हाथ से कटोरा लेकर देखा तो उसमें तेल घूम रहा था। उसे कुछ भान हुआ और उसने तेल का कटोरा एक बड़ी शिला पर फ़ेंक दिया। शिला पर तेल गिरते ही वह शिला उड़ने लगी। रानी समझ गई कि तेल में शेवड़े ने तंत्र का प्रयोग किया है।

गढ के झरोखे से
जैसे ही तेल शिला पर गिरा, उधर शेवड़े को मंत्र शक्ति से पता चला कि तेल का प्रयोग हो गया है। उसने आदेश दिया कि उपर आ जाओ, आदेश मिलते ही शिला पहाड़ की ओर उड़ चली। सिंधु शेवड़ा शयन मुद्रा में था, शिला देख कर उसने सोचा कि रानी शिला पर बैठी है, उसने आदेश दिया कि मेरी वक्ष पर ही बैठो। शिला जब नीचे उतरने लगी तो उसे रानी दिखाई नहीं दी और सिंधु शेवड़ा समझ गया कि शिला उसकी छाती पर गिरेगी और उसकी मृत्यु निश्चित है। तो उसने मंत्र से शिला के दो टुकड़े कर दिए और श्राप दिया कि रात दूसरे पहर तक यह नगर नष्ट हो जाएगा यहाँ कुछ भी नहीं बचेगा। इस नगर में आज के बाद कोई भी आबाद नहीं पाएगा। आधी शिला सिंधु शेवड़े के वक्ष पर गिरी और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। आधी शिला नगर के उपर भ्रमण करने लगी। रत्नावती को अनिष्ट का अहसास हो गया और उसने नगर वासियों को अर्ध रात्रि तक नगर खाली करने का आदेश दे दिया।

खंडहर हुआ रानी रत्नावती का महल
नगर खाली हो गया सिंधु शेवड़े के श्राप से। कथा कहते हुए पीपल ने एक लम्बी सांस ली, तब से लेकर आज तक यह नगर फ़िर कभी आबाद नहीं हुआ। कईयों ने कोशिश की लेकिन श्राप के भय से कोई भी इस नगर में पुन: बसने को तैयार नहीं हुआ। खजाने के चोरों ने पूरा गढ़ खोद डाला। जो कुछ मिला सब उठा ले गए। घरों एवं महल के दरवाजों को भी नहीं छोड़ा। सब उखाड़ ले गए। वीरान पड़ा है यह नगर। इसे देख देख मैं खून के आँसू रोता हूँ। कितना वैभव था इस नगर का। कभी यह स्वर्ण नगरी से कम नही था। आज जंगली जानवरों का बसेरा हो गया। मैं ही बूढा बच गया हूँ इसकी गाथा कहने को, मेरे बाद शायद कोई और गाथा कहने वाला न मिले। इस नगर का इतिहास समय की गर्त में दफ़न हो जाए। तुम सुन रहे हो न…  मैने हुंकारु भरी, आँसूओं की दो बूंदे मेरी पेशानी पर टपकी। पीपल सुबक रहा था……… आगे पढें

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सीकर से भानगढ़ की ओर यायावर

सिरपुर की यात्रा में रात्रि विश्राम के दौरान जी टीवी पर फ़ीयर फ़ाईल कार्यक्रम चल रहा था जिसमें शुटिंग के लिए भानगढ़ गई हुई झांसी की रानी धारावाहिक की प्रोडक्शन टीम एवं कलाकारों के साथ बीती घटनाओं की कहानी बताई जा रही थी। वहाँ इनके साथ भूतिया वारदातें हुई, जिसके कारण इनकी टीम को वहाँ से शुटिंग छोड़ कर भागना पड़ा। इससे पहले भी मैने एक दो बार इस जगह के विषय में सुना था,  जिसने इसे डरावना बना रखा है। बस यहीं से भानगढ़ जाने की प्रबल इच्छा हो गई। जैसे तैसे सिरपुर की यात्रा सम्पन्न होने की प्रतीक्षा थी और भानगढ़ की ओर जाना था। इस दौरान रतनसिंह जी से मेरी चर्चा हुई। उन्होने भी भानगढ़ जाने का वादा कर लिया। बस 11 दिसम्बर का यह कार्यक्रम बन गया।
सीकर से जयपुर
10 दिसम्बर 2012 की रात मैं सीकर में था। वहीं से मुझे जयपुर आना था और उधर से रतनसिंह जी दिल्ली से सुबह जयपुर पहुंचने वाले थे। दोनों को सुबह 6-7 बजे जयपुर में मिलना था फ़िर वहाँ से भानगढ़ जाना था। रात को सीकर में मैने लोगों को जयपुर जाने के साधन के विषय में पूछो तो उन्होने बताया कि जहाँ पर मैं ठहरा था उसी बायपास से हर आधे घंटे में जयपुर के लिए बसें मिल जाती है। उनकी कहे अनुसार मैं 3 बजे बायपास पर आ गया। सुबह बहुत अधिक ठंड थी और मैने ठंड का कोई अधिक इंतजाम नहीं किया था। सिर्फ़ एक पतला सा स्वेटर ही ठंड से बचाने का साधन था क्योंकि इस समय भी छत्तीसगढ़ में कोई अधिक ठंड नहीं थी और स्वेटर पहनने की भी आवश्यकता नहीं थी। लेकिन राजस्थान में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बायपास पर प्रतीक्षा करते एक घंटा हो गया लेकिन बस कहीं दिखाई नहीं दी, दूसरा घंटा भी बीत गया, लेकिन बस नहीं आई। अभी भी अंधेरा ही था, कोई चहल पहल नहीं थी। लोग अपने गुदड़ों से बाहर नहीं निकले थे। 
रामगढ़ बांध का हवाई चित्र
6 बजे मुझे एक बस आते हुए दिखाई दी। हाथ देने पर बस वाले ने दूर जाकर रोका और बैठा लिया, कंडेक्टर ने 70 रुपए की टिकिट काटी, जबकि सरकारी बस से सीकर आते हुए मुझे 80 रुपए की टिकिट लेनी पड़ी थी। मैं गाड़ी के बोनट पर बैठ गया क्योंकि सीटें खाली नहीं थी। ड्रायवर की पीछे की लम्बी सीट खाली थी जिसे उसने अन्य सवारियों के लिए खाली रखा था। थोड़ी देर बाद बस रुकी और स्कूल की कुछ मेडमें चढी। तब पता चला कि ड्रायवर ने यह सीट उनके लिए रिजर्व कर रखी थी। हमारे यहाँ भी ड्रायवर सामने वाली लम्बी सीटें मेडमों के लिए ही रिजर्व रखते हैं। उन पर मेडमों का ही अधिकार होता है। छत्तीसगढ़ की यह बीमारी राजस्थान में भी जारी थी, पता नहीं कि यह रोग राजस्थान से छत्तीसगढ़ आया या छत्तीसगढ़ से राजस्थान के ड्रायवर कंडेक्टरों को लगा।   
सूखा पड़ा बांध
बस शनै शनै बढती जा रही थी, रास्ते में तूड़े के भरे ट्रेक्टरों की लाईन लगी थी। आधी सड़क घेर कर ये जयपुर की ओर जा रहे थे। रास्ते में सड़क निर्माण का काम भी चालु था। इससे बस की स्पीड में बाधा आ रही थी। पलसाणा पहुंचने पर रतन सिंह जी शेखावत का फ़ोन आया। मैने उन्हे विलंब होने की जानकारी दी। पलसाना पहुंचते तक थोड़ा प्रकाश हुआ, लगा कि सूर्योदय हो जाएगा। जयपुर में काम करने वाले कुछ लड़के यहाँ से चढ़े, थैली में चाय और डिस्पोजल गिलास साथ लेकर आए थे। इससे यह जाहिर हुआ कि ये दैनिक यात्री हैं और ड्रायवर कंडेक्टर के लिए रोज चाय लेकर आते हैं। रींगस पहुच कर ड्रायवर ने ब्रेक लगाए, "जाओ भई जिसको पाणी पेशाब जाणा हो तो कर लो। बस 5 मिनट रुकेगी।" पाँच मिनट में हाजत वाले सभी निपट लिए। बस अब चौमू की तरफ़ बढ़ रही थी। रतनसिंह जी ने मुझे जयपुर पहुंच कर चौमू पूलिए पर उतरने कहा था। 
कछवाहों की कुलदेवी "जमवाय माता"
चौमू का पत्थर देखते ही पुरानी कहावत याद आ गई। "चौमू का चूतिया, घी बेच 'र तेल खाए"। कही गई होगी किसी वक्त में किसी कहानी को लेकर चौमू के विषय में ये कहावत। लेकिन अब ऐसा नहीं है, चौमू के लोग बहुत होशियार हो गए हैं। अब घी और तेल दोनो बेच देते हैं और मौज लेते हैं। चौमू बायपास से बस निकल गई। यहाँ पर तूड़े वाले ट्रेक्टरों की लाईन लगी हुई थी। जयपुर में प्रवेश करते ही ट्रैफ़िक पुलिस वालों ने बस रोक ली। ड्रायवर ने कंडेक्टर को कहा " ले इब भुगत इस फ़ूफ़्फ़े नै, परसों इसका प्लाई बोर्ड नहीं चढाया बस में, उसी की कसर लिकाड़ेगा"। सिपाही सड़क के बीचों बीच खड़ा रहा। न ड्रायवर उतरा बस से न कंडेक्टर। तीनों एक दूसरे को देखते रहे। सिपाही बोला - आज नही छोड़ूंगा तुम्हें, जीप में बैठा हुआ उसका अफ़सर बोला - छोड़ दे। तब भी उसने नहीं छोड़ा। गाड़ी खड़ी रही। मैने कहा- छोड़ने और न छोड़ने के चक्कर में सवारियों को क्यों फ़ंसा रखा है। छोड़ या पकड़ इसे। थोड़ी देर बाद उसने बस छोड़ दी।
बांध का सूचना पट्ट
रतनसिंह जी चौमू पुलिया पे इंतजार कर रहे थे, उन्होने फ़ोन किया। थोड़ी देर बाद मैं चौमू पुलिया पर पहुंच चुका था। अब बाईक पर उनके साथ घर चले। वहाँ स्नान ध्यान किया। फ़िर गर्मा गरम रोटी खाई। तब तक जयपुर के युवा पत्रकार प्रदीप सिंह जी अपनी कार से आ गए अब हमें भानगढ़ जाना था। हमारे साथ रतन सिंह जी का इटली रिटर्न जिज्ञासु भतीजा भरत सिंह भी साथ था। हम भानगढ़ के लिए जमवा रामगढ़ होते हुए चल पड़े। सबसे पहले हम बांध पर पहुंचे, इस बांध को आमेर के राजाओं ने जयपुर में जलापूर्ति के लिए बनवाया था। बांध का जल संग्रहण क्षेत्र काफ़ी विस्तार लिए हुए है। लेकिन दुर्भाग्य यह स्थान अभी सूखे की चपेट में है। जिस बांध से आस-पास के सैकड़ों गाँवों की प्यास बुझाई जाती थी, वह आज स्वयं प्यासा है। सरकार का इस बांध के संरक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं है। वहीं स्थानीय नेता इस बांध के जल संग्रहण क्षेत्र पर कब्जा करने का मंसूबा पाल रहे हैं।
जमवाय माता का मंदिर
बांध पर जगह जगह चेतावनी लिखी हुई है - शाम 7 बजे के बाद बाँध में नहाना, तैरना और घुमना दंडनीय अपराध है। कितना हास्यास्पद लगता है। जिस बाँध में एक बूंद पानी नहीं वहाँ ऐसी चेतावनी पढकर। खैर हमारा कोई ईरादा नहीं था इस बाँध में तैरकर गोडे फ़ुड़वाने का, इसलिए हम आगे बढ़ गए। कुछ दूर चलने पर कछवाहा शासकों की कुल देवी जमवाय माता का मंदिर है। इसका निर्माण राजा सोढ़देव के पुत्र दुल्हे राय ने करवाया था। कछवाहा वंशजों की कुलदेवी होने के कारण इनकी बहुत मान्यता है। हम मंदिर में पहुंच कर पुजारी से मिलते हैं। उनका कहना है कि इस मंदिर पर हम बोर्ड लगाते हैं तो वन विभाग के अधिकारी उखाड़ देते हैं और कहते हैं कि यह स्थान अभ्यारण में आता है इसलिए यहाँ कोई भी निर्माण नहीं कर सकते। तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल के आर्थिक सहयोग से यहाँ एक छोटी सी धर्मशाला का निर्माण भी हुआ है। राजस्थान सरकार की अकर्मण्यता के चलते इस मंदिर की भूमि को अभ्यारण से ट्रस्ट को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जिससे यहाँ पर श्रद्धालू कुछ निर्माण कर सकें। यहाँ से दर्शन करके हम भानगढ़ की ओर चल पड़े।  आगे पढ़ें .........

बुधवार, 18 जुलाई 2012

जादू-टोने रहस्यमय संसार : छत्तीसगढ़

जादू-टोना-टोनही शब्द ही भय उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होता है। बचपन से सुनते आए हैं कि तंत्र-मंत्र से प्राप्त शक्ति द्वारा किसी का भी अहित किया जा सकता है। अहित करने वाला टोनहा-टोनही कहलाता है। इन तंत्र मंत्र की शक्ति के दुष्प्रभाव से बचाने या उसे निष्प्रभावी करने कार्य बैगा या तांत्रिक के जिम्मे होता है। गॉड पार्टिकल ढूंढने का दावा करने वाला समाज भी इन गैबी ताकतों के होने से इनकार नहीं करता। तंत्र मंत्र समाज के मानस में इतने गहरे बैठ चुका है कि अंधेरा होते ही अज्ञात भय के कारण रस्सी भी सांप दिखाई देने लगती है। ग्रामीण अंचल में आज भी किसी को बुखार हो जाए तो वह डॉक्टर के पास जाने की बजाए सबसे पहले बैगा-गुनिया या तांत्रिक से ही सम्पर्क करता है और उसी के ईलाज पर विश्वास करता है। फ़िर चाहे प्राण ही क्यों न निकल जाएं, अंतिम समय में उसके परिजन ही उसे डॉक्टर के पास ईलाज के लिए पहुंचाते हैं या सीधे श्मशान जाता है।

बचपन में सुनी गई टोनही जनित घटनाएं और कहानियाँ कोमल मन मस्तिष्क पर स्थाई असर डालती हैं, जिससे व्यक्ति जीवन भर नहीं उबर पाता। लोग कहते हैं कि अनपढ ही गैबी ताकतों पर विश्वास करते हैं, लेकिन मैने पढे लिखे उच्चपदों पर बैठे व्यक्तियों को भी तंत्र-मंत्र-तांत्रिकों, बैगा गुनियों के चंगुल फ़ंसे देखा है। तंत्र मंत्र का असर होता है कि नहीं? टोनही-टोनहा होता है कि नहीं? इस सत्यता को जानने का मैने बहुत प्रयास किया। लेकिन जानकार लोग इसे गुप्त ही रखना चाहते हैं। गोपनीयता की शपथ या गुरु बनाए बिना बताना नहीं चाहते। अगर किसी प्रक्रिया से आप जान भी गए या सीख भी गए तो आपको भी इसे गुप्त रखने की शर्तों का पालन करना होगा, अन्यथा मंत्रों की शक्तियाँ निष्प्रभावी होने का भय बताया जाता है। दीक्षा के वक्त शपथ दिलाते हुए गुरु यह बात अपने शिष्य के कान में अवश्य डालते हैं। 

गाँव में बिजली नहीं थी, घर के सामने तालाब में कोई रोशनी जलती थी तो बुजुर्ग कहते कि "वो दे, रक्सा बरत हे। (वह देख रक्सा [कुंवारा भूत] जल रहा है) हम भी मान लेते थे और रात के वक्त बोईर तरिया की तरफ़ नहीं जाते थे। तालाब के पार पर बहुत सारे बेर के वृक्ष थे जिसके कारण उसे बोईर तरिया कहते हैं। बेर के वृक्ष में परेतिन का वास बताया जाता है और ईमली में प्रेत का। रामगोपाल बैगाई करता है और मैं उसके साथ इन विषयों पर चर्चा करता था। वह टोनहीं के एक से एक किस्से बताता और किस्सा सुनते और चर्चा करते सुकवा (भोर के समय दिखने वाला चमकीला तारा) उग जाता था। तब कहीं जाकर हमारी बातें खत्म होती थी। नागपंचमी के दिन वह दक्षिणा लेकर अपने गुरु से भेंट करने अवश्य जाता था। तंत्र मंत्र सीखने के लिए गुरु बनाने एवं शिष्यों द्वारा अपने गुरु का मानदान करने एवं गुरु द्वारा पाठ-पीढा (उत्तराधिकार) सौंपने का ग्रामीण अंचल में यही दिन माना जाता है।

कहते हैं टोनही का मंत्र ढाई अक्षर का होता है। टोनही जब सभी मंत्र सिद्ध कर लेती है वह सोधे हो जाती है अर्थात टोनही से बड़ा पद प्राप्त कर लेती है। टोनही नकारात्मक शक्तियों की स्वामिनी होती है, मान्यता है कि वह जो चाहे वह कर सकती है। जन मानस में प्रचलित है कि टोनही अपनी शक्तियों से किसी को मार सकती है, अपंग कर सकती है, बीमार कर सकती है। शरीर को कमजोर कर सकती है, घर से वस्तुएं गायब कर सकती है, गाय भैंस से लेकर लईकोरी स्त्री के स्तनों का दूध सुखा सकती है, पागल कर सकती है, फ़सल को उजाड़ सकती है, शारीरिक नुकसान कर सकती है। इसलिए आदमी अपने अनिष्ट की आशंका से भयभीत रहता है और हमेशा ही इससे बचना चाहता है। रामगोपाल बताता है कि तंत्र मंत्र सीखने के लिए हरेली अमावस एवं दीवाली की रात महत्वपूर्ण होती हैं। 

अमावस की रात जादू-टोना सीखने वाले महिलाएं मध्य रात्रि को गाँव या नगर के बाहर सुनसान स्थान मरघट में एकत्र होती हैं, मुख्य टोनही के मार्गदर्शन में नग्न होकर शौच करती हैं, अपने-अपने मल से दीपक बनाती हैं। उसके बाद सोधे (मुख्य टोनहीं) उन्हे एक जड़ी देती है जिसे मुंह में रखने से लार बनती हैं, फ़िर इस लार को दीपक में डालते हैं जिससे आग निकलती है, दीपक से आग निरंतर निकलते रहती है और टोनही सीखने वाली महिला बाल खुले करके अपने सिर को उपर नीचे झुकाती है (सिर उपर नीचे झुकाने को झूपना कहते हैं)। बलि के रुप में नींबू काटा जाता है, सोधे यहीं पर सीखने वालियों को मंत्र याद करवाती है तथा उन्हे ईष्ट देव को निर्धारित जीवों की बलि देने का संकल्प दिलाती है। जिन साधिकाओं को मंत्र याद हो जाता है उन्हे गुरुपूर्णिमा को "चलानी पाठ" दिया जाता है। उन्हे शिक्षा दी जाती है कि किस मंत्र का प्रयोग कैसे करना है।   

सवाल पर गंभीर मुद्रा
तारक बैगा से भी टोनही के विषय में चर्चा हुई, वे कहते हैं कि सोधे होने के बाद टोनही के पास ऐसी शक्तियाँ आ जाती हैं जिससे वह इच्छित प्राप्ति कर सकती है। इन कार्यों के लिए उसके पास गण होते हैं जिन्हे बीर कहते हैं। इन बीरों को मटिया और मसान कहा जाता है। चटिया बीर को टोनही मारण कर्म के लिए उपयोग में लाती है। चटपट काम करके लौटने के कारण इसे चटिया कहा जाता है। जब टोनही इसे भेजती है तो यह चिन्हित को मार कर ही वापस आता है। इस पर किसी बैगा, गुनिया, तांत्रिक के मंत्रों का कोई असर नहीं होता। टोनही का मटिया बीर चिन्हित को शारीरिक और आर्थिक नुकसान पहुंचाता है। गांवों में मान्यता है कि यह जहाँ भी जाता है वहां की वस्तुएं स्वत: ही गायब होने लगती हैं। घर में खाने-रांधने का सामान भी नहीं छोड़ता। पूरा घर ही खाली कर देता है। चटिया-मटिया के रहने का स्थान जानवरों का कोठा बताया जाता है तथा ये कद में छोटे होते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं सिर्फ़ उन्हे ही दिखाई देते हैं अन्य किसी को दिखाई नहीं देते। इनके द्वारा गायब की हुई वस्तुओं का पता नहीं चलता।

मेरे सवाल पर मुस्काते हुए बैगा
कहते हैं कि टोनही आत्माओं से भी बात करती है। उनका आह्वान कर उनसे जानकारी भी ले सकती है। टोनही अपनी शक्ति बढाने के लिए मसान भी साधती है, मसान दो तरह के होते हैं, तेलिया मसान और मरी मसान। टोनही मसान की सवारी करती है। किसी इंसान पर सवार होने के बाद बैगा की झाड़-फ़ूंक के दौरान मसान ही प्रभावित के मुख से बैगा को जवाब देता है। टोनही अपनी नजर से किसी के जीवन को प्रभावित कर सकती है। टोनही का बीर मटिया काले रंग, उल्टे पैर का बौना भूत होता है, यह अपने साथ सदा कांवड़ और टोकरी रखता है। मटिया अपनी कांवड़ से दुनिया भर की चीजें ढो सकता है। चटिया-मटिया जोड़े में रहते हैं। जिसके घर में मटिया रहता है उसे मालामाल कर देता है, अगर उस घर में इसका सम्मान नहीं होता तो उसका सर्वनाश भी कर देता है। मैने एक सम्पन्न व्यक्ति के घर में मटिया का असर देखा था। वे अपने घर में खाने-पीने का सामान, रुपया पैसा, धन धान्य नहीं रखते थे। खाना पकाने का सामान रोज खरीदते थे। अधिक सामान रखने पर मटिया उसे गायब कर देता था। 

बैगा कहते हैं कि मसान की आँखें अंधेरे में लाल बल्ब जैसे चमकती हैं यह कुत्ते के रुप में मसान निर्जन इलाके में या घर पर भी रहता है। एक बार रक्सा ने इनकी भैंसा गाड़ी को पलटा दिया था। यह रक्सा आग के गोले की तरह दिखाई देता है और यह गोला उपर उठते दिखाई देता है जिसमें विस्फ़ोट होता है। कहते हैं कि जो कुंवारा मरता है वह रक्सा बनता है। अकाल मृत्यु वाले लोग परेत-परेतिन बनते हैं तथा अपनी आयु पूर्ण होने तक भटकते रहते हैं, टोनही इन्हे साध लेती है। जनश्रुति है कि परेत बेर के पेड़ में रहता है। जिस स्त्री की प्रसव के दौरान मृत्यु हो जाती है वह परेतिन बनती है। इसलिए परेतिन अपने बच्चे के साथ ही दिखाई देती है। कहते हैं कि हाट-बाजार में परेत-परेतिन अपना सामान खरीदने आते हैं। लेकिन लोग उन्हे पहचान नहीं पाते। कहते हैं कि परेतिन किसी भी रुप में आकर संबंध बना लेती है, बैगा कहते हैं रास्ते में कहीं परेतिन नजर आ जाए तो डरकर अपनी राह नहीं छोड़नी चाहिए, प्ररेतिन अपना भयानक रुप दिखा कर रास्ते से हटाने की कोशिश करती है, राहगीर के रास्ता छोड़ते ही वह परेतिन का शिकार हो जाता है। कहते हैं कि परेतिन के बाल पकड़ लिए जाएं और उसकी साड़ी बांस के खोल में भर कर रखने से जब तक उसे साड़ी नहीं मिलती वह मानव रुप में ही रहती है।

तारक बैगा
मिरचुक झालर के बल्ब जैसा जलता बुझता है, टोनही तीया (तीज नहावन) के दिन परेत जगाती है। जागने पर परेत टोनही का गुलाम हो जाता है और उसी के लिए काम करता है। टोनही के लिए हरेली अमावस एवं दीवाली की अमावस की रात महत्वपूर्ण होती है। इन दोनों रातों की साधना में इन्हे सम्मिलित होना अत्यावश्यक है। बैगा कहते हैं कि तीन साल तक लगातार अमावस साधना में न आने पर वह सभी मंत्र स्वत; ही भूल जाती है। शनिचरहा से भी लोग भय खाते हैं, जिस व्यक्ति का जन्म शनिवार को होता है उसकी नजर बिना तंत्र मंत्र सीखे ही लग जाती है। पुरुष टोनहा हो्ता है, टोनही एवं टोनहा मंत्र सीखने की प्रक्रिया एक जैसी ही है। रामगोपाल कहता था कि अगर कहीं टोनही-टोनहा या भूत परेत नजर आए तो पेशाब से गोल बना कर उसमें बैठ जाएं और बाहर न निकलें। हानि पहुचाने वाली शक्तियां उस गोले के भीतर प्रवेश नहीं करती। इससे बचाव हो जाता है। कहते हैं जिस घर की औरत टोनही बन जाती है उसके घर वालों को ही पता नहीं चलता कि वह टोनही या सोधे हो गई है। आधी रात को अपने घर वालों को जड़ी सुंघाकर बेहोश कर देती है और अपना मंत्र सिद्ध करने के लिए चली जाती है।

डिस्क्लैमर: पोस्ट लिखने उद्देश्य टोना-टोटका एवं टोनही के रहस्यमयी गुप्त दुनिया से परिचय कराना है। समाज में इस विषय को लेकर बहुत सारी बातें चलती रहती हैं। लोग मनोरंजन की दृष्टि से भी भूत-प्रेत की कहानियाँ गढते हैं और चौक-चौराहों पर बैठ कर समय व्यतीत करने की दृष्टि से चर्चा करते हैं। जब सदियों से ये मान्यताएं चली आ रही हैं तो इसके पीछे अवश्य ही कोई सच भी होगा। जिज्ञासु होने के बाद भी मुझे अभी तक टोनही इत्यादि का साक्षात्कार नहीं हुआ है। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसे घट चुकी हैं जिन्हे नकारने या स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूँ। उन घटनाओं को सिर्फ़ अपने मन का भ्रम या संयोग मानकर  दरकिनार करते आया हूं। 

सोमवार, 16 जुलाई 2012

हरेली अमावस: टोनही मंत्र शोधने का दिन

धरती हरियाली से मस्त
सावन का महीना प्रारंभ होते ही चारों तरफ़ हरियाली छा जाती है। नदी-नाले प्रवाहमान हो जाते हैं तो मेंढकों के टर्राने के लिए डबरा-खोचका भर जाते हैं। जहाँ तक नजर जाए वहाँ तक हरियाली रहती है। आँखों को सुकून मिलता है तो मन-तन भी हरिया जाता है। यही समय होता है श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में अमावश्या को "हरेली तिहार" मनाने का। नाम से ही प्रतीत होता है कि इस त्यौहार को मनाने का तात्पर्य भीषण गर्मी से उपजी तपन के बाद वर्षा होने से हरियाई हुई धरती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना ही होता है, तभी इसे हरेली नाम दिया गया। मूलत: हरेली कृषकों का त्यौहार है, यही समय धान की बियासी का भी होता है। किसान अपने हल बैलो के साथ भरपूर श्रम कृषि कार्य के लिए करते हैं, तब कहीं जाकर वर्षारानी की मेहरबानी से जीवनोपार्जन के लिए अनाज प्राप्त होता है। उत्सवधर्मी मानव आदि काल से ही हर्षित होने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता और खुशी प्रकट करने, रोजमर्रा से इतर पकवान खाने की योजना बना ही लेता है, यह अवसर हमारे त्यौहार प्रदान करते हैं।

चारागन में गायें
हरेली के दिन बिहान होते ही पहटिया (चरवाहा) गाय-बैल को कोठा से निकाल कर चारागन (गौठान) में पहुंचा देता है। गाय-बैल के मालिक अपने मवेशियों के लिए गेंहु के आटे को गुंथ कर लोंदी बनाते हैं। अंडा (अरंड) या खम्हार के पत्ते में खड़े नमक की पोटली के साथ थोड़ा सा चावल-दाल लेकर चारागन में आते हैं। जहाँ आटे की लोंदी एवं नमक की पोटली को गाय-बैल को खिलाते हैं तथा चावल-दाल का "सीधा" पहटिया (चरवाहा) को देते हैं। इसके बदले में राउत (चरवाहा) दसमूल कंद एवं बन गोंदली (जंगली प्याज) देता है। जिसे किसान अपने-अपने घर में ले जाकर सभी परिजनों को त्यौहार के प्रसाद के रुप में बांट कर खाते हैं। इसके बाद राऊत और बैगा नीम की डाली सभी के घर के दरवाजे पर टांगते हैं, भेलवा की पत्तियाँ भी भरपूर फ़सल होने की प्रार्थना स्वरुप लगाई जाती हैं। जिसके बदले में जिससे जो बन पड़ता है, दान-दक्षिणा करता है। इस तरह हरेली तिहार के दिन ग्रामीण अंचल में दिन की शुरुवात होती है।     

बन गोंदली - द्शमूल कांदा - फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
ग्रामीण अंचल में बैगाओं को जड़ी-बूटियों की पहचान होती है। परम्परा से पीढी-दर-पीढी मौसम के अनुसार पथ्य-कुपथ्य की जानकारी प्राप्त होते रहती है। कौन सी ॠतु में क्या खाया जाए और क्या न खाया जाए। कौन सी जड़ी-बूटी, कंद मूल बरसात से मौसम में खाई जाए जिससे पशुओं एवं मनुष्यों का बचाव वर्षा जनित बीमारियों से हो। सर्व उपलब्ध नीम जैसा गुणकारी विषाणु रोधी कोई दूसरा प्रतिजैविक नही है। इसका उपयोग सहस्त्राब्दियों से उपचार में होता है। वर्षा काल में नीम का उपयोग वर्षा जनित रोगों से बचाता है। दसमूल (शतावर) एवं  बन गोंदली (जंगली प्याज) का सेवन मनुष्यों को वर्ष भर बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है। साथ ही अंडापान (अरंड पत्ता) एवं खम्हार पान (खम्हार पत्ता) पशुओं का भी रोगों से वर्ष भर बचाव करता है। उनमें विषाणुओं से लड़ने की शक्ति बढाता है। पहली बरसात में जब चरोटा के पौधे धरती से बाहर आते हैं तब उसकी कोमल पत्तियों की भाजी का सेवन किया जाता है।  

गेड़ी का आनंद - फ़ोटो रुपेश यादव
हम बचपन से ही गाँव में रहे। हरेली तिहार की प्रतीक्षा बेसब्री से करते थे क्योंकि इस दिन चीला खाने के साथ "गेड़ी" चढने का भी भरपूर मजा लेते थे। जो ऊंची गेड़ी में चढता में उसे हम अच्छा मानते थे। हमारे लिए गेड़ी बुधराम कका तैयार करते थे। ध्यान यह रखा जाता था कि कहीं अधिक ऊंची न हो और गिरने के बाद चोट न लगे। गेड़ी के बांस के पायदान की धार से पैर का तलुवा कटने का भी डर रहता था। तब से ध्यान से ही गेड़ी चढते थे। गेड़ी पर चढकर अपना बैलेंस बनाए रखते हुए चलना भी किसी सर्कस के करतब से कम नहीं है। इसके लिए अपने को साधना पड़ता है, तभी कहीं जाकर गेड़ी चलाने का आनंद मिलता है। अबरा-डबरा को तो ऐसे ही कूदते-फ़ांदते पार कर लेते थे। बदलते समय के साथ अब गांव में भी गेड़ी का चलन कम हो गया। परन्तु पूजा के नेग के लिए गेड़ी अभी भी बनाई जाती है। छोटे बच्चे मैदान में गेड़ी चलाते हुए दिख जाते हैं।

फ़ुरसत में किसान
इस दिन किसान अपने हल, बैल और किसानी के औजारों को धो मांज कर एक जगह इकट्ठा करते हैं। फ़िर होम-धूप देकर पूजा करके चावल का चीला चढा कर जोड़ा नारियल फ़ोड़ा जाता है जिसे प्रसाद के रुप में सबको बांटा जाता है। नारियल की खुरहेरी (गिरी) की बच्चे लोग बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। टमाचर, लहसून, धनिया की चटनी के साथ गरम-गरम चीला रोटी के कहने ही क्या हैं, आनंद आ जाता है। पथ्य और कुपथ्य के हिसाब से हमारे पूर्वज त्यौहारों के लिए भोजन निर्धारित करते थे। सभी त्यौहारों में अलग-अलग तरह का खाना बनाने की परम्परा है। भोजनादि से निवृत होकर खेलकूद शुरु हो जाता है। इन ग्रामीण खेलों की प्रतीक्षा वर्ष भर होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि हरेली परम्परा में रचा बसा पूर्णत: किसानों का त्यौहार है।

दरवाजे पर नीम की डाली-फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
खेल कूद के लिए ग्रामीण मैदान में एकत्रित होते हैं और खेल कूद प्रारंभ होते हैं जिनमें नगद ईनाम की व्यवस्था ग्राम प्रमुखों द्वारा की जाती है। कबड्डी, गेड़ी दौड़, टिटंगी दौड़, आंख पर पट्टी बांध कर नारियल फ़ोड़ना इत्यादि खेल होते हैं। गाँव की बहू-बेटियां भी नए कपड़े पहन कर खेल देखने मैदान में आती हैं, तथा उनके भी खेल होते हैं, खेलों के साथ सभी का एक जगह मिलना होता है, लोग एक स्थान पर बैठकर सुख-दु:ख की भी बतिया लेते हैं। खेल-कूद की प्रथा ग्रामीण अंचल में अभी तक जारी है। खेती के कार्य के बाद मनोरंजन भी बहुत आवश्यक है। किसानों ने हरेली तिहार के रुप में परम्परा से चली आ रही अपनी सामुहिक मनोरंजन की प्रथा को वर्तमान में भी जीवित रखा है।

पहाटिया (चरवाहा)-फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
हरेली तिहार के दिन का समय तो देवताओं के पूजा पाठ और खेल कूद में व्यतीत हो जाता है फ़िर संध्या वेला के साथ गाँव में मौजूद आसुरी शक्तियां जागृत हो जाती हैं। अमावश की काली रात टोनहियों की सिद्धी के लिए तय मानी जाती है। यह सदियों से चली आ रही मान्यता है कि हरेली अमावश को टोनही अपना मंत्र सिद्ध करती हैं, सावन माह मंत्र सिद्ध करने के लिए आसूरी शक्तियों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। शहरों के आस-पास के गाँवों में अब टोनही का प्रभाव कम दिखाई देता है लेकिन ग्रामीण अंचल में अब भी टोनही का भय कायम है। हरियाली की रात को कोई भी घर से बाहर नहीं निकलता, यह रात सिर्फ़ बैगा और टोनहियों के लिए ही होती है। टोनही  को लेकर ग्रामीणों के मानस में कई तरह की मान्यताएं एवं किंवदंतियां स्थाई रुप से पैठ गयी हैं। विद्युतिकरण के बाद भूत-प्रेत और टोनही दिखाई देने की चर्चाएं कम ही सुनाई देती हैं। टोनही के अज्ञात भय से मुक्ति पाने में अभी भी समय लगेगा।