कटघोरा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कटघोरा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

छत्तीसगढ़ का मॉरिशस बुका

राजधानी रायपुर से कटघोरा होते हुए 230 किलोमीटर की दूरी पर मड़ई गांव से 5 किलोमीटर की दूरी पर हसदेव बांगो बांध के डुबान क्षेत्र में विकसित पर्यटन केन्द्र बुका में नौका विहार का मजा ले सकते हैं। वन विभाग ने यहां पर्यटकों के लिए काटेज का निर्माण कराया है। जहां शुल्क जमा कर रूक सकते हैं। 

छत्तीसगढ़ में भले ही समुद्र नहीं है लेकिन ‘सी बीच’ की सैर करने और बोटिंग की तमन्ना रखने वालों को मायूस होने की जरूरत नहीं। शहरों की आपाधापी से दूर प्राकृतिक सौंदर्य से भरी यह ऐसी जगह है, जहाँ गर्मी में भी दिलोदिमाग को सुकून मिलता है। यहां मीलों तक 400-450 फीट की गहराई में पानी ही पानी है। हरे-भरे जंगल और पहाड़ों के बीच झीलनुमा इस जगह पर नीला जल दिल-ओ-दिमाग पर छा जाता है। 


झील के बीच में प्राकृतिक रूप से उभरे टापू और उस पर खड़े दरख्तों की हरियाली की वजह से इसे छत्तीसगढ़ का मॉरिशस कहा जाने लगा है। कटघोरा के पास स्थित जल विहार ‘बुका’ खूबसूरती अनूठी है। पहाड़ियों से घिरे बुका के गहरे पानी के बीच स्थित टिहरीसराई के मध्य निकली एक चट्टान में प्राकृतिक रुप से बने गणेश का स्वरूप दिखाई देता है।


सूर्योदय के समय ग्लास हाउस से आसमान में उगते सूरज का अप्रतिम होता है। मौसम के अनुसार दिन चढ़ने से शाम ढलने तक अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। गर्मियों में बुका में सुबह-शाम स्वीमिंग और बोटिंग का लुत्फ उठाने लोग दूर-दूर से आते हैं। बोट से 16 किमी के सफर में कई छोटे-छोटे टापू हैं तो साल, सागौन, साजा, सेन्हा आदि के पेड़ों की श्रृंखला मन को सुकून देती है। 

थकान मिटाने के लिए टेंट, रेस्ट हाउस और ग्लास हाउस हैं, जहां सौर ऊर्जा की रोशनी तो तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं। बुका प्रदेश का संभवत: पहला पर्यटक स्थल है, जहां कई टूरिस्ट प्लेस का सफर बोट से किया जाता है। बुका से बांगो डैम का फासला 25 किमी का है। बुका से बोट के जरिए दो घंटे में वहां पहुंचा जा सकता है। इसी तरह डेढ़ घंटे में सतरेंगा, घंटेभर में गोल्डन आईलैंड तथा केंदई जल प्रपात, मंजूरखोर आदि टूरिस्ट प्लेस तक जा सकते हैं।

सोमवार, 27 अगस्त 2012

चैतुरगढ: मैं कहता हौं आँखन की देखी -- ललित शर्मा

पंकज सिंह
पाली शिवमंदिर में चैतुरगढ जाने वाली सड़क की स्थिति की पूछताछ करने पर संतोष त्रिपाठी ने कहा कि सड़क की स्थिति तो खराब है। बरसात होने के कारण सड़क जगह-जगह से कट गयी है। चैतुरगढ में पहाड़ी पर चलभाष भी काम नहीं करता। वहां केन्द्रीय पुरातत्व विभाग का जो कर्मचारी है उसे जब भी बात करनी होती है तो नीचे आकर सम्पर्क करता है। अभी उससे सम्पर्क भी नहीं हो पाएगा, अन्यथा मार्ग की दशा का पता कर लेते। चैतुरगढ जाने की योजना पर पानी फ़िरते दिखाई दे रहा था। अगर रास्ता ही खराब है तो जाने से तेल फ़ूंकने के अलावा कुछ हासिल नहीं होने वाला। हम आपस में विमर्श करने लगे कि क्या करें, क्या न करें? जाएं की नहीं? तभी संतोष ने कहा कि जाईए, विलम्ब न करें। माता का नाम लेकर आगे बढिए, दर्शन होना लिखा है तो होकर ही रहेगा। उनकी बात हमें जंच गयी और हम अविलंब आगे बढ गए।

रफ़्तार में जंगल
पाली से चैतुरगढ लगभग 30 किलोमीटर है। 22 किलोमीटर कोलतार की सड़क पर चलने के बाद 8 किलोमीटर कच्ची सड़क पर चलना पड़ता है। अब हमने तय ही कर लिया जाने का तो जो होगा वह देखा जाएगा। झा जी की खुमारी अभी तक उतरी नहीं थी। सुबह से ही अलसाए पड़े थे, दोपहर के भोजन के बाद खुमारी द्विगुणित हो गयी। कार चल रही थी और मैने कैमरा साध लिया, जंगल का रास्ता है कब क्या दृश्य देखने मिल जाए और उसे कैद करने का अरमान अधूरा रह जाए। इसलिए हथियार हमेशा हाथ में लेकर सजग रहने की आवश्यकता थी। जंगल के रास्ते पर चलना सुखदायी रहता है। अधिक ट्रैफ़िक भी नहीं रहता और प्राकृतिक छटाएं मन को शांति देती हैं। शहरवासी प्रकृति के निकट आकर सुकून पाता है। प्रकृति से जुड़ाव महसूस करता है। हमारे साथ चलते साल के वृक्षों के बीच से लहराती बलखाती सड़क इठला रही थी। नालों में बहता बरसाती जल अपने जीवित होने को प्रमाणित कर रहा था। वातावरण में ठंडक देख कर पंकज एसी बंद कर देता है।

जंगल में रफ़्तार
FM रेडियो की तरंगे यहाँ पर मिल रही थी, चैनल बदल-बदल कर हम पुराने गीत ढूंढ रहे थे। तभी एक चैनल ने बजाया, सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया होतो हर कोई बांचे, भाग न बांचै कोय। सजनवा बैरी हो गए हमार। वाह! प्रकृति के साथ संगीत की ताल और लय मिल जाना रोमांचित कर जाता है। कहाँ सजनवा और कहाँ सजनी? कोयलिया की कूक भी सुनाई देने लगी। सोचने लगा कि अभी कौन से आम बौराए हैं जो कोयलिया कूक रही है। विहंग को कौन बांध पाया है? वे कोई मानव नहीं? किसी प्रांत के एपीएल, बीपीएल कार्डधारी लाभार्थी नागरिक नहीं। जो किसी के बंधन में बंध कर परतंत्र हो जाएगें। इनका तो जीवन स्वतंत्र है। स्वतंत्र जन्मे और स्वतंत्र मरें। परतंत्रता तो इन्हे पल की नहीं सुहाती। न ही सीमा पार करने के लिए किसी सरकार के अनुज्ञा-पत्र की दरकार होती है। जब चाहें तब पंख फ़ड़फ़ड़ाए और उड़ जाते हैं। जब मन में आए तो गाने लगते हैं। काश! विहंग सा जीवन ही क्षण भर को मिल जाए तो मन करता है पूरा एक जीवन ही जी लूं।

जा रे मेरा संदे्शा ले जारे
नदी-नाले, पहाड़, वन, समुद्र में ऐसा आकर्षण है कि जो मुझे हमेशा अपनी ओर खींचते हैं। मन गोह बनकर यहां चिपक जाता है, छोड़ना ही नहीं चाहता इन्हें। बस यहीं एक कुटिया हो जाए और रम जाएं। भौतिकता से उबने पर आध्यात्म जागृत होता है। चिंतन चलते रहता और हाथ में कैमरा धरे-धरे ही भीतर उतर जाता हूँ। न सड़क दिखाई देती है और न सहयात्री। सहसा तंद्रा टूटती है, रेड़ियो पर गाना बजते-बजते प्रहसन सुनाई देने लगता है। पंकज एसी को फ़िर से चालु कर देता है। हल्की सी उमस होने लगी। पहाड़ों पर घटांए उमड़ने-घुमड़ने लगी। घटाटोप अंधकार छाने लगा। वृक्षों के तनों पर, जंगल में पड़ी हुई सूखी लकड़ियों पर हरी काई जमी हुई है। यहाँ तक की मील के पत्थरों को भी काई ने ढक लिया है। मील के पत्थर अब मंजिल का पता नहीं देते। इससे अहसास होता है कि जंगल में बारिश लगातार हो रही है और महीनों से धूप नहीं निकली है। अन्यथा मील के पत्थरों पर काई नहीं जमती।

लकड़ी की घंटी
पहले वनों में जंगली जानवर दिन में ही दिखाई दे जाते थे। अब रात में भी नहीं दिखते। मानव ने वनों का बेतहाशा नुकसान किया। वनों की समाप्ति पर जानवरों का प्राकृतिक रहवास खत्म हो गया। इससे साथ-साथ जानवर भी खत्म होने के कगार पर हैं। जंगली वृक्षों एवं वनस्पतियों की एवं वनचरों की कई प्रजातियाँ तो विलुप्त ही हो गयी। एक दिन ऐसा आएगा जब वन भी दिखाई नहीं देगें। फ़िर कभी अगले जन्म में मेरे जैसा कोई यायावर यहाँ आएगा तो जो कुछ मैने यहाँ देखा है उसे वह दिखाई नहीं देने वाला। गोधूलि वेला होने को है, वनों में चरने गए पालतु पशु लौट रहे हैं। गायों के गले में बंधी काठ की घंटियों से मधुर स्वर लहरियां निकल रही हैं। साथ में चरवाहा भी कमर में बांसुरी खोंसे हुए सिर पर खुमरी ओढे पीछे-पीछे चला आ रहा है। न चरवाहे के पास घड़ी है न गायों के पास। समय की जानकारी देने के लिए सिर पर सूरज भी नहीं। इनकी जैविक घड़ी ही घर लौटने का समय बताती है और ये सब घर को लौट चलते हैं।

चैतुरगढ का मार्ग
हमें पक्की सड़क पर चलते हुए एक तिराहा दिखाई दिया। जहाँ से दांए तरफ़ कच्चा रास्ता जाता है। वहीं पर एक सूचना फ़लक लगा है जिस पर लिखा है, चैतुरगढ दूरी 8 किलोमीटर। हम सही रास्ते पर थे। तिराहे पर एक किराने की दुकान है, जहाँ युवा दुकानदार अपनी मोटर सायकिल में पैट्रोल डाल रहा था। वहीं पर एक बाबा अपनी पोती के साथ खड़े थे। मैने उनसे आगे के रास्ते की दशा पूछी तो कहने लगे की गाड़ी जा सकती है। रास्ता को खराब दिख रहा था, परन्तु हमें चैतुरगढ जाने की जिद थी। आगे बढने पर सड़क पर बड़े-बड़े बोल्डर पड़े दिखे और साथ में गड्ढे भी।

बाबा और नातिन
कमांडर जीप दिखाई दी। ड्रायवर ने बताया कि उनकी जीप ही बड़ी कठिनाई से निकल कर आ रही है। आपकी वेरना तो नहीं जा सकती। हाँ जहाँ तक कार जाए वहां तक आप चले जाईए और वहाँ से आप पैदल जा सकते हैं। कई लोग गाड़ी खड़ी करके पैदल जा रहे हैं। अधिक रात होने पर भालुओं का खतरा है। हमने ठान लिया कि जहाँ तक कार जाएगी वहाँ तक जाएगें, फ़िर आगे पैदल जा सकते हैं। लेकिन चैतुरगढ आज जाना ही है।हम उबड़-खाबड़ रास्ते पर नयी-नवेली कमसिन नाजुक वेरना के साथ जोर-जबरदस्ती करते हुए अपनी जिद में आगे बढ गए। दो किलोमीटर चलने के बाद आसमान में एक बार फ़िर से अंधेरा छा गया। लगने लगा कि जम कर बरसात होगी।

नाले से लौटते हुए
सुबह के झगड़े और शाम की बारिश का पता नहीं कब तक चले? 4 किलोमीटर जाने पर एक छोटा नाला दिखाई दिया, वहीं पर कार रोकनी पड़ी। पंकज और अरविंद गाड़ी निकालने का रास्ता देखने लगे और मैं फ़ोटो लेने लगा। वहीं पास के साल वृक्ष पर सुंदर आर्किड लगे थे। दोनो अभियंताओं नें आकर निर्णय दिया कि कार वहाँ से आगे नहीं निकल सकती। फ़ावड़ा होता तो एक बार रास्ता बनाया जा सकता था। बरसात होने लगी थी, हमने भारी मन से लौटने का फ़ैसला किया। इतनी दूर आने के बाद भी चैतुरगढ के एतिहासिक स्थल को न देख पाने हमें खेद रहेगा। लेकिन हिम्मत नहीं हारी थी। तिराहे पर वापस आकर दुकानदार से उसकी बाईक मांगने का इरादा बनाकर हम तिराहे की तरफ़ लौट गए। आगे पढें……

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अन्ना हजारे-शत्रुकीट-धीमा नेट एवं बरसाती यात्रा ---- ललित शर्मा

रक्षाबंधन के दो दिन पहले से ही बरसात हो रही थी। इसके साथ नेट भी जवाब दे गया। धीमें-धीमें सांस लेने लगा। मेल बाक्स भी नहीं खुलता था। कम्पयुटर भी इसका साथ देने लगा। सोचा कि पीसी में कोई शत्रुकीट षड़यंत्र पूर्वक प्रवेश कर गया है। इसने यहाँ तक बाधित कर दिया कि चैट बाक्स भी जवाब दे गया। रक्षाबंधन पर मित्रों को शुभकामना संदेश भी नहीं दे सका।  कम्पयुटर को कई बार स्केन किया, सभी फ़ालतु फ़ाईलों को डी लिट की उपाधि बख्शी। सिस्टम रजिस्ट्री क्लीन एवं फ़िक्स की। एक फ़ाईल में छिपे तीन शत्रुकीट मिले, जिनकी छित्तर परेड की। लेकिन हासिल कुछ नहीं आया। समस्या ज्यों की त्यों खड़ी रही। नेट और कम्पयुटर में ताल-मेल नहीं बैठा। अब हारकर इसकी धुलाई सफ़ाई का विचार बनाया और छोड़ दिया।

हमारी छोटी रेल
राखी के दिन सुबह ही ट्रेन पकड़ कर बहन के यहाँ जाने का कार्यक्रम बना लिया। श्रीमती जी ने भी काम पकड़ा दिया, उनकी राखियाँ भी भाटापारा स्टेशन में पहुंचानी थी, रायपुर स्टेशन पर यात्रियों की भीड़ देख कर लगा कि ट्रेन में खड़े होने की जगह भी नहीं मिलने वाली। रक्षाबंधन को यात्रियों की भीड़ बढ जाती है। छत्तीसगढ एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर देखते ही लोग पटरियों के उस पार भी खड़े हो गए, बैक डोर से एन्ट्री करने के लिए। बैक डोर से एन्ट्री करने वालों  को सीट मिल ही जाती है। लेकिन हम सही रास्ते से ही ट्रेन में चढने के लिए कमर कस चुके थे। संसद में बैक डोर (राज्य सभा) से एन्ट्री करने वाले प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाते हैं और फ़्रंट डोर (लोक सभा) से एन्ट्री करने वालों का नम्बर ही नहीं लगता। 

बिलासपुर में अंग्रजी पढने-लिखने वाली पगली
ट्रेन आते ही थोड़ी मशक्कत के बाद प्रवेश मिल गया, बालकनी की सीट मिल गयी, रौब काम आ गया। ट्रेन सरकने लगी, मुझे बिलासपुर तक ही जाना था। वहाँ से आगे की यात्रा कार से करनी थी। सभी जगह फ़ोन लगा कर अपने आने की सूचना दे दी। भाटापारा में सालिगराम जी स्टेशन आ चुके थे, उन्हे खिड़की से ही राखियाँ दी, आगे चल पड़े। बिलासपुर पहुंचते साढे बारह बज चुके थे। मैने चीफ़ लेबर कमिश्नर मीणा साहब को फ़ोन पर आने की सूचना दी। थोड़ी देर बाद बहनोई साहब पहुंच चुके थे। मीणा साहब से मिले कई दिन हो गए थे। उनसे मिल कर हम कटघोरा चल पड़े। अरविंद झा जी गाँव गए थे और श्याम कोरी जी का नम्बर घर पर भूल आया था, अन्यथा राम राम तो हो ही जाती।

उमड़-घुमड़ बरसे बदरा
रतनपुर के पास बरसात शुरु हो चुकी थी। इस मार्ग पर कोयला और स्लेग के भारी वाहन (कैप्शुल) चलते हैं। पाली के पास तो सड़क ही गायब हो चुकी  है। पता चला की भारी बरसात का परिणाम है। पाली से कभी चतुरगढ जाने का मन है, अबकी बार नवरात्रि में जाने का प्लान बनाया है। पाली का प्राचीन शिवमंदिर प्रसिद्ध है। बरसों के बाद रास्ते में फ़ुट दिखाई दिए, इन्हे हरियाणा में "हैजा" नाम से संबोधित किया जाता है। क्योंकि गंदे नाले या नाली में उगे फ़ुट खाने से टट्टी-उल्टी होती है और हैजा हो जाता है। इसकी खुश्बु खरबूजे जैसी ही होती है, पर मीठे होने की बजाए थोड़ी सी खंटास लिए होते हैं। हमने "हैजा" खरीद लिया, घर पहुंचने पर इसका ही इस्तेमाल पहले करने की सोची। हैजा खाने के बाद भी हमें हैजा नहीं हुआ। कटघोरा पहुंचने पर देखा कि वहाँ  गड्ढों में सड़क ही नहीं दिखाई दे रही। बरसात का असर कुछ अधिक ही हुआ।

करील-बास्टा
इस इलाके में बांस की करील चोरी छुपे मिलती हैं, करील की सब्जी खाने का इरादा बनाया। लेकिन बहन को करील की सब्जी बनानी नहीं आती, उसने करील मंगा दिया, अब समस्या हो गयी सब्जी बनाने की। बस्तर में इसे बास्टा नाम से जानते हैं। अली सा को फ़ोन लगाया, रैसिपी के लिए, उन्होने अपने एक सहायक का नम्बर दिया और उनसे मैने सब्जी की रैसिपी पूछी। उसने दाल के साथ बनाना बताया। मैने करील की सब्जी खाने का इरादा बदल दिया। तभी संगीता जी का ध्यान आया, तो उन्हे फ़ोन लगा कर पूछा। संगीता जी से सही रैपिसी मिली मन माफ़िक। तब तक करील किसी और को दे दिया गया था। मेरी करील की सब्जी खाने की इच्छा धरी की धरी रह गयी। अब फ़िर किसी दिन आजमा कर देखेगें, जायका इंडिया का।

कोरबा से वापसी
रात भर बरसात होते रही, वापसी कोरबा से करने का विचार बनाया। 11 बजे कोरबा से छत्तीसगढ एक्सप्रेस बिलासपुर तक पैसेंजर बनकर चलती  है। इसका बिलासपुर पहुंचने का समय 1/35 बजे का है, फ़िर वहाँ से 1/45 को झारसुगड़ा-गोंदिया पैसेंजर चलती है जो रायपुर पहुंचाती है। बिलासपुर पहुंच कर दुसरे प्लेटफ़ार्म पर पहुंचा तो ट्रेन खड़ी थी। डिब्बे में सीट मिल गयी, लेकिन ट्रेन एक घंटे खड़ी रही, जिस ट्रेन से आया था पहले वही गयी। इंटरनेट से टाईम देख कर जाने के चक्कर में खड़ी गाड़ी में बैठे रहे। अब विचार बनाया कि बिल्हा स्टेशन में उतरा जाए। बिल्हा स्टेशन बिलासपुर से 3 रुपए की दुरी पर है। बिल्हा में भाई साहब के पास दो घंटे बिता कर रात 10 बजे घर पहुंचा। पुरे दो दिन की बरसाती यात्रा रही। अम्बिकापुर तक जाने का इरादा था लेकिन अगले दिन 15 अगस्त होने के कारण वापस आना पड़ा।
15 अगस्त के कार्यक्रम में
15 अगस्त को सुबह स्कूल में झंडा फ़हराने के बाद अन्य कई जगहों के कार्यक्रमों में भी शरीक होना पड़ता है। कन्या शाला के कार्यक्रम में झंडा उत्तोलन करने के लिए अशोक भैया पहुंच चुके थे। समाचार मिला कि मुख्यमंत्री ने 9 नए जिलों की घोषणा कर दी है। हमारे रायपुर जिले के कई टुकड़े हो गए, महासमुंद, गरियाबंद, बलौदाबाजार, तीन जिले बन गए। अब रायपुर जिला 4 ब्लाकों में ही सिमट कर रह गया। समाचार बढिया था, छोटे जिलों में प्रशासनिक चुस्ती बनी रहती है। विकास के काम भी तेजी से होते हैं। यहाँ के कार्यक्रम को निपटाने के बाद घर पहुंच कर कम्पयुटर की तरफ़ ध्यान दिया। 4 दिनों से आराम कर रहा था। प्रयास के पश्चात भी हालात वही बने रहे। थक हार कर छोड दिया।

मोटे होने का ईलाज
16 तारीख को सुबह उठने के बाद दिमाग में ये ख्याल आते रहा कि आज कोई महत्वपूर्ण दिन है, सोचते रहा कि क्या है आज, कलेंडर देखा तो कोई छुट्टी नहीं थी। (हमारे देश में महत्वपूर्ण दिन छुट्टी रहती है) कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या महत्वपूर्ण है आज। फ़िर याद आया कि आज अन्ना हजारे अनशन पर जाने वाले हैं। सुबह 8 बजे अन्न हजारे की गिरफ़्तारी का समाचार मिला। यह तो होना ही था, जब भ्रष्ट्राचारियों को अपनी खाल बचानी है तो ईमानदारों को ही जेल भेजेगें। मै भी कुछ लिखना चाहता था फ़ेसबुक, ब्लॉग या गुगल प्ल्स पर। लेकिन कम्पयुटर साथ नहीं दे रहा था। तभी मुझे ध्यान आया नेट स्लो होने के पीछे षड़यंत्रकारी ताकतों का तो हाथ नही है। एक्सचेंज में फ़ोन करके अपनी शिकायत दर्ज कराई। 5 बजे सो कर उठने के बाद देखा तो नेट चालु हो गया था।

नेट पर आने के पश्चात पता चला कि कई ब्लागरों के नेट कनेक्शन धीमे चल रहा है, दो दिनों से वे भी परेशान हैं। तब लगा कि नेट धीमे होने के पीछे सरकार की भी कोई चाल हो सकती है। भ्रष्ट्राचार के विरोध एवं अन्ना के समर्थन में ब्लॉगर और फ़ेसबुकिए ही अधिक रहते हैं। अगर नेट धीमा हो जाए  या बंद हो जाए तो ये हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेगें। हल्ला बोल बंद हो जाएगा। समर्थन का नारा सुनाई नहीं देगा। जिनकी सरकार है, जिनके हाथ में पावर है वह कुछ भी कर सकता है। नेट शुरु हुआ तो अन्ना हजारे की रिहाई का समाचार भी समाचार मिला। एक तरफ़ कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी का अन्ना को तू एवं तुम कहने वाला सम्बोधन सुनने मिला तो दुसरी तरफ़ चिदम्बरम का श्री अन्ना हजारे सुनने मिला। भारत की सड़कों पर अन्ना के समर्थन में युवाओं का हुजूम देख कर दिल्ली का सुर बदला-बदला लगा। आगे देखते हैं क्या होता है।

NH-30 सड़क गंगा की सैर