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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

प्राचीन बंदरगाह ....................... ललित शर्मा

प्राचीन बंदरगाह
महर्षि महेश योगी की जन्म भूमि पाण्डुका से आगे सिरकट्टी आश्रम से पहले मगरलोड़ और मेघा की ओर जाने वाले पुल के किनारे नदी में लेट्राईट को तोड़ कर बनाई गयी कुछ संरचनाएं दिखाई देती हैं।   मैने कयास लगाया कि यह अवश्य ही बंदरगाह है। नदी में उतर कर बंदरगाह का निरीक्षण किया एवं कुछ चित्र लिए। बंदरगाह की गोदियों में घूमते हुए कई तरह के विचार आ रहे थे। कौन लोग यहाँ से व्यापार करते थे? यह बंदरगाह किस समय बना? किसने बनाया? आदि आदि। इन प्रश्नो के उत्तर बाद में ढूंढेगे, पहले सिरकट्टी आश्रम देख लें, नाम तो बहुत सुना था पर देखा नहीं था। पैरी नदी के तट पर कुटेना ग्राम का सिरकट्टी आश्रम स्थित है। आश्रम का नाम सिरकट्टी इसलिए पड़ा कि यहाँ मंदिर के अवशेष के रुप में सिर कटी मूर्तियाँ प्राप्त हुई, जिन्हे बरगद के वृक्ष के नीचे स्थापित कर दिया। तब से इसे सिरकट्टी आश्रम के नाम से जाना जाता है।

सिर कट्टी आश्रम 
यहाँ बैरागी पुनीतराम शरण से चर्चा हुई। उन्होने बताया कि महाराज भुनेश्वरीशरण दास ने 16 वर्ष की आयु में सन्यास ले लिया था। उन्हे ग्राम कुटेना स्थित चंडी मां ने स्वप्न में इस स्थान की जानकारी दी। तो ग्राम वासियों के सहयोग के वे इस स्थान पर बैठ गए और यज्ञ करने लगे। आश्रम में स्थित सिरकटी मूर्तियाँ एक दीमक की बांबी से प्राप्त हुई थी। उन्होने बताया कि भुनेश्वरीशरण दास को कुछ द्रव्य के साथ दो शिवलिंग भी यहाँ प्राप्त हुए, जिसमें से पेड़ के नीचे एक स्थापित है, दूसरा मंदिर में स्थापित है। इस स्थान पर सुदूर प्रांतों  से संत आते हैं, संतों का आगमन 1963 से हो रहा है, अब वे यहीं स्थायी रुप से बस कर आश्रम की सेवा कर रहे हैं। आश्रम में जाति समाज वालों ने अपने भवन बना रखे हैं। यहाँ लगभग सौ अधिक गाय भैस हैं एवं आश्रम के नाम से लगभग 40-50 एकड़ जमीन है। जो कुटेना, पाण्डुका, जटिया सोरा, पोंड, गाड़ा घाट एवं फ़िंगेश्वर आदि गांवों में है।

प्राचीन बंदरगाह
अब चर्चा करते हैं बंदरगाह की, मानव सभ्यता का उद्भव एवं विकास समुद्र तथा नदियों के किनारे हुआ। जलमार्ग ही आवागमन एवं परिवहन का प्रमुख साधन था। प्राचीन काल में थलमार्ग से परिवहन कम ही होता था। जितनी भी प्राचीन राजधानियाँ एवं शहर हैं, सभी नदियों के तट पर ही स्थित हैं। अन्य राष्ट्रों से व्यापार जल मार्ग से होता था तथा वर्तमान में भी हो रहा है। वास्कोडिगामा, कोलंबस इत्यादि यायावर भी जल मार्ग से ही भारत में प्रविष्ट हुए। जल परिवहन द्वारा व्यापार करना थल परिवहन से कम लागत में हो जाता है। नाव एवं बड़े जहाजों के माध्यम से माल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता है। ऋग्वेद में जहाज और समुद्रयात्रा के अनेक उल्लेख है (ऋक् 1/25/7, 1/48/3, 1/56/2, 7/88/3-4 इत्यादि)। प्रथम मंडल (1-116-3) की एक कथा में 100 डाँड़ोंवाले जहाज द्वारा समुद्र में गिरे कुछ लोगों की प्राणरक्षा का वर्णन है। इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ऋग्वेद काल, अर्थात् लगभग 2,000 - 1,500 वर्ष ईसा पूर्व, में यथेष्ट बड़े जहाज बनते थे और भारतवासी समुद्र द्वारा दूर देशों की यात्रा करते थे। इन जहाजों के द्वारा लाए गए माल को उतारने के लिए गोदी या बंदरगाहों का निर्माण किया जाता था। छत्तीसगढ की प्रमुख नदी चित्रोत्पला गंगा महानदी के जल मार्ग से व्यापार होता था। महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगर राजधानी सिरपुर के उत्खन में व्यापार से संबंधित वस्तुएं एवं प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं। 

महानदी उद्गम स्थान - भीतररास 
चित्रोत्पला गंगा महानदी का उद्गम सिहावा नगरी के भीतररास ग्राम से हुआ है। भीतररास में महानदी दक्षिण की ओर प्रवाहित होती प्रतीत हुई। महानदी के उद्गम स्थान पर मेरा दो बार जाना हुआ। महानदी धमतरी जिले के सिहावा नगरी स्थित भीतररास ग्राम से निकल कर 965 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है। इसकी सहायक नदियाँ हसदो, जोंक, शिवनाथ, पैरी एवं सोंढूर नदियाँ है। पैरी, सोंढूर एवं महानदी का त्रिवेणी संगम पद्मक्षेत्र राजिम मे होता है। इस संगम पर कुलेश्वर (उत्पलेश्वर) महादेव का मंदिर है। जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को मेला भरता है, जिसे अब राजिम कुंभ का नाम दिया गया है। पैरी नदी का उद्गम मैनपुर से लगे हुए ग्राम भाटीगढ से हुआ है। पहाड़ी पर स्थित पैरी उद्गम स्थल से जल निरंतर रिसता है। अब इस स्थान पर छोटा सा मंदिर भी बना दिया गया है। पैरी और सोंढूर नदी का मिलन रायपुर-गरियाबंद मार्ग पर स्थित मालगाँव के समीप मुहैरा ग्राम के समीप हुआ है। यहाँ से चल कर दोनो नदियाँ महानदी से जुड़ जाती है। राजिम पद्मक्षेत्र पैरी नदी के तट पर स्थित है। 

डॉ विष्णु सिंह ठाकुर एवं यायावर 
पैरी नदी के तट पर कुटेना में स्थित यह बंदरगाह (गोदी) पाण्डुका ग्राम से 3 किलोमीटर दूर स्थित है। अवलोकन करने प्रतीत होता है कि इस गोदी का निर्माण कुशल शिल्पियों ने किया है। इसकी संरचना में 90 अंश के कई कोण बने हैं। कठोर लेट्राईट को काटकर बनाई गयी गोदियाँ तीन भागों में निर्मित हैं, जो 5 मीटर से 6.60 मीटर चौड़ी तथा 5-6 मीटर गहरी हैं। साथ ही इन्हें समतल बनाया गया, जिससे नाव द्वारा लाया गया सामान रखा जा सके। वर्तमान में ये गोदियाँ नदी की रेत में पट चुकी हैं। रेत हटाने परगोदियाँ दिखाई देने लगी। प्रख्यात इतिहासकार एवं पुरात्वविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर से इस विषय मेरी चर्चा हुई। उन्होने इसे चौथी शताब्दी ईसा पूर्व माना। बताया कि इस स्थान पर महाभारत कालीन मृदा भांड के टुकटे भी मिलते हैं। नदी से "कोसला वज्र" (हीरा) प्राप्त होता था तथा जल परिवहन द्वारा आयात-निर्यात होता था।

गरियाबंद मार्ग पर मालगाँव 
गरियाबंद 15 किलोमीटर पर पैरी नदी के तट पर स्थित एक ग्राम का नाम मालगाँव है। यहाँ नावों द्वारा लाया गया सामान (माल) रखा जाता था। इसलिए इस गांव का नाम मालगाँव पड़ा। मालगाँव में पैरी नदी के तट पर आज से लगभग 10-15 वर्ष पूर्व तक एक रपटा (छोटा पुल) था जो नदी में पानी आने के कारण वर्षाकाल में बंद हो जाता था। जिससे गरियाबंद से लेकर देवभोग एवं उड़ीसा तक जाने वाले यात्री प्रभावित होते थे। नाव द्वारा नदी पार कराई जाती थी और उस पार बस गाड़ी इत्यादि के साधन से लोग यात्रा करते थे। वर्तमान में इस नदी पर पुल बनने के कारण बरसात में भी मार्ग खुला रहता है। वर्षाकाल में रायपुर से देवभोग जाने वाले यात्री मालगाँव से भली भांति परिचित होते थे, क्योंकि यहीं से पैरी नदी को नाव द्वारा पार करना पड़ता था। यहाँ से महानदी के जल-मार्ग के माध्यम द्वारा कलकत्ता तथा अन्य स्थानों से वस्तुओं का आयात-निर्यात हुआ करता था। पू्र्वी समुद्र तट पर ‘कोसल बंदरगाह’ नामक एक विख्यात बन्दरगाह भी था। जहाँ से जल परिवहन के माध्यम से व्यापार होता था।  इससे ज्ञात होता है कि वन एवं खनिज संपदा से भरपूर छत्तीसगढ प्राचीन काल से ही समृद्ध रहा है। नदियाँ इसे धन धान्य से समृद्ध करते रही हैं।
प्राचीन बंदरगाह

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

महर्षि महेश योगी के जन्मस्थान पाण्डुका की सैर --- ललित शर्मा

छत्तीसगढ की पूण्य भूमि पर अनेक संतों एवं महापुरुषों ने जन्म लिया। महर्षि महेश योगी भी उनमें एक थे। कई बार पाण्डुका से गुजरते हुए आगे निकला, पर महर्षि जी के जन्मस्थान का दर्शन लाभ प्राप्त नही कर सका। आज वह समय आ ही गया, मैं उनकी संस्था द्वारा संचालित विद्यापीठ में पहुंच ही गया। 

मुख्यद्वार से आम के वृक्ष के नीचे बैठे हुए दो सज्जन नजर आए, चर्चा होने पर पता चला कि सज्जन (श्रीवास्तव जी) महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ के व्यवस्थापक हैं तथा दुसरे सह-व्यवस्थापक हैं। इन्होने महर्षि के विषय में हमें बहुत कुछ जानकारी दी। वेद विज्ञान पर चर्चा हुई, श्रीवास्तव जी ने बताया कि महेश प्रसाद वर्मा याने महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका गाँव में हुआ। इनके पिताजी रामप्रसाद वर्मा यहाँ राजस्व विभाग में कार्यरत थे। महर्षि के बड़े भाई जागेश्वर प्रसाद की प्राथमिक शिक्षा पाण्डुका में ही हुई थी। पाण्डुका इनका बर्थ प्लेस है, नेटिव प्लेस जबलपुर के पास गोटे गाँव है। महर्षि महेश योगी ने इलाहाबाद विवि से भौतिक शास्त्र में स्नातक और दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली थी। 

विद्यापीठ का मुख्य द्वार
दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि लेने के बाद वे 1941में स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के अनुयायी बन गए। स्वामी जी ने उन्हें बाल ब्रह्माचार्य महेश नाम दिया। 1953 तक ब्रह्मानंद सरस्वती के सानिध्य में रहने के बाद महर्षि योगी ने उत्तरकाशी की ओर रुख किया। एक जनवरी 1958को मद्रास के एक सम्मेलन में महर्षि ने ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन के माध्यम से पूरे विश्व में आध्यात्मिक ज्ञान फैलाने की घोषणा की। यही वह क्षण था जब वे वैश्विक होने की ओर उन्मुख हुए। इसके पश्चात समूचे विश्व में ध्यान योग का डंका बजाया। पश्चिम में दम मारो दम की हिप्पी संस्कृति जोर पकड़ रही थी, महर्षि ने इन्हे नशे से मुक्त होने की दिशा में उन्मुख किया। इसी क्रम में 1958 में महेश योगी ने विश्‍वस्‍तरीय आध्‍यात्‍मिक प्रसार अभियान का आरंभ किया। इस प्रसार कार्यक्रम का उद्देश्‍य मानवता के लिए ध्‍यान और साधना को प्रचारित करना था। अभियान के प्रसार के लिए उन्‍होंने विश्‍व के कई देशों वर्मा, मलाया, हाँगकाँग, होनुलूलु का भ्रमण किया। उन्‍होंने अपना सबसे ज्‍यादा वक्‍त अमेरिका में बिताया। 

महषि जी का जन्म इसी घर में हुआ था
महर्षि महेश योगी ने 1963 में अपनी पहली पुस्‍तक अस्‍तित्‍व का विज्ञान और जीने की कला लिखी। 1965 में भगवद गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया। अपने योग के प्रसार के दौरान इस बात का दावा किया कि ट्रांसडेंटल मेडिटेशन से तनाव और निराशा दूर हो सकती है, जिससे लोगों का जीवन भी सुखमय होता है। हालाँकि उनके ध्‍यान के दौरान हवा में तैरने जैसे बातों की काफी आलोचना हुई, लेकिन ध्‍यान के चमत्‍कारिक प्रभाव को सभी ने स्‍वीकार किया। महेश योगी का मानना था कि सिद्ध लोगों के सामूहिक ध्‍यान करने से एक विशेष वातावरण का निर्माण होता है, जो कि आध्‍यात्‍मिक प्रभाव क्षेत्र का निर्माण करता है। इस क्षेत्र के विस्‍तार के अपराध और बुराइयों पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है। महर्षि महेश योगी का यह भी दावा था कि इसका असर स्‍टॉक मार्केट पर भी होता है।  

व्यावस्थापक श्रीवास्तव जी एवं तुलेन्द्र तिवारी जी
महर्षि को अपने सिद्धांतों पर अटूट विश्‍वास था और वह उसके विस्‍तार से पूरे विश्‍व को लाभ पहुँचाना चाहते थे। 1971 में उन्‍होंने लॉस एंजिल्‍स में महर्षि अंतरराष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की। इसके साथ ही कई करोड़ों का अपना साम्राज्‍य स्‍थापित किया। वैदिक सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए महर्षि विद्या मंदिर की स्‍थापना की गई। भारत में इसके करीब 200 शाखाएँ हैं। इसके अलावा महर्षि इंस्‍टीट्युट का एमबीए, एमसीए, वैदिक विश्‍वविद्यालय, महर्षि गंधर्ववेद विश्‍व विद्यापीठ, महर्षि आयुर्वेद विश्‍वविद्यालय, महर्षि इंफार्मेशन टेक्‍नोलॉजी और महर्षि वेद-विज्ञान विश्‍वविद्यापीठ हैं। इनके साथ उन्होने अत्युत्‍म ध्‍यान (ट्रांसडेंटल मेडिटेशन), महर्षि वेदिक टेक्‍नोलॉजी ऑफ कांशियसनेस, महर्षि स्‍थापत्‍य वेद, सिद्धी कार्यक्रम, महर्षि ग्‍लोबल एडमिनिस्‍ट्रेशन थ्रू नेचुरल लॉ, महर्षि ज्‍योतिष और योग कार्यक्रम, महर्षि वाणिज्‍य विकास कार्यक्रम भी चलाए।

महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन की मुद्रा "राम"
महर्षि चैनल भी चला करता था, अब बंद हो गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि महर्षि ने अपनी राम नामक मुद्रा भी चलाई, जिसे नीदर लैंड में मान्यता है। राम नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस ने अक्टूबर २००२ में जारी किया था। अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी राम का प्रचलन है। वैसे 35 अमरीकी राज्यों में राम पर आधारित बॉन्डस चलते हैं। नीदरलैंड की डच दुकानों में एक राम के बदले दस यूरो मिल सकते हैं। राम नाम की मुद्रा विदेशों में चल रही है, पर राम के देश में नहीं चला पाए। महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन द्वारा राम मुद्रा जारी की गयी  है। जिस पर सुंदर कल्प वृक्ष का चित्र अंकित हैं।

ब्रह्मचारियों के साथ एक गृहस्थ
ग्राम पाण्डुका में महर्षि के पिताजी रामप्रसाद वर्मा किराए के घर में रहते थे, महर्षि के जन्म स्थान की जानकारी होने पर संस्था द्वारा इस मकान को खरीदा गया। महर्षि ने कहा कि इस घर को उसी अवस्था में रखा जाए जैसा पहले था। कोई अतिरिक्त निर्माण नहीं किया जाए। इसके साथ ही पाण्डुका ग्राम में 51 एकड़ जमीन खरीद कर विद्यापीठ की स्थापना की गयी। महर्षि इस गांव को योजनाबद्ध रुप से संवारना चाहते थे। लेकिन गांव के गौंटिया लोगों की आपत्ति एवं विरोध के पश्चात उन्होने इरादा त्याग दिया। मुझे याद है। कुछ वर्षों पूर्व विद्यापीठ में असामाजिक तत्वों ने आगजनी भी थी। महर्षि विद्यापीठ के कर्ता-धर्ताओं के साथ गांव वालों का विवाद भी हुआ था। इस विद्यापीठ में ब्राह्मणों के बच्चों को कर्मकांड सिखाए जाते हैं। वेद पाठ कंठस्थ कराया जाता है।

आवासीय विद्यापीठ के भवन
विद्यापीठ में जाकर मैने विद्यार्थियों से चारों वेदों का पाठ सुना और रिकार्ड भी किया। इस आवासीय विद्यापीठ में 132 विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। रहने के भवन की व्यवस्था अच्छी लगी। भवन पक्के बनाए हुए हैं। साथ-साथ धान की खेती भी की जा रही है। कुछ पेड़ पौधे भी लगाए गए हैं। मुझे हड़जोड़ का पौधा मिला, जिसकी एक कलम लेकर आया और लगाई। हड़जोड़ सूखी और हरी हाथ पैर के दर्द में काम आती है। इसका सेवन करने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है, जो इसके नाम (हड़जोड़) से ही प्रतीत होता है। विद्यापीठ में घूमने के बाद हमने आगे बढने का कार्यक्रम बनाया। जाना तो चाहते थे जतमई एवं घटारानी, पर तिवारी जी ने कहा कि सिरकट्टी से मेघा, कुरुद होते हुए अभनपुर पहुंचा जाए। हमने श्रीवास्तव जी से विदा ली और आगे बढ लिए सिरकट्टी की ओर।


NH-30 सड़क गंगा की सैर

बुधवार, 27 जुलाई 2011

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे ---- ललित शर्मा

सप्ताहांत के दिन की सुबह चमकीली नहीं थी, आसमाने में काले-काले बादलों की घटा छाई हुई थी, कोई पता नहीं कब बरस जाएं? 5 दिनों सर्दी बुखार का मजा लेते-लेते खोपड़ी खराब हो गयी, दवाईयाँ लो और सो जाओ, बस यही चल रहा था। तबियत जब कूछ ठीक हुई तो दिमाग ने भी काम करना शुरु किया, वह सोचने लगा कि घर में बैठे-बैठे भी क्या करें? आज कहीं घूम ही लिया जाए। बाईक पर लांग ड्राईव का मजा इसी मौसम में आता है, अगर रिमझिम फ़ुहारें बरस रही हों तो क्या कहने, आनंद ही आनंद। तिवारी जी फ़ोन लगाया तो पता चला कि वे साप्ताहिक धुलाई के कार्यक्रम में व्यस्त हैं। उन्होने एक घंटे बाद साथ चलने की हामी भरी। मैं नियत समय पर उनके घर पहुंच गया। सुबह का नास्ता हो गया था, पर समय देखते हुए श्रीमती जी ने भोजन करके ही जाने को कहा। लेकिन भोजन के कारण विलंब हो सकता था। इसलिए ऐसे ही चल पड़े। रास्ते में कहीं भोजन कर लिया जाएगा। तिवारी जी को घर से लेकर आगे बढ लिए। हमारी योजना में महानदी की बाढ, महर्षि महेशयोगी की जन्मस्थान की सैर शामिल था।

गाड़ी हाइवे पर चली जा रही थी, तिवारी ने हमें ही हांकने की आज्ञा दे दी। आसमान की तरफ़ देखकर लगता था कि बरस जाएगा, मानिकचौरी रेल्वे क्रांसिग पार करते ही भूख लगने लगी। घर से निकले तो 15 मिनट ही हुआ था। ग्राम हसदा चौक पर एक चाट का ठेला दिखाई दे गया। बस गोलगप्पे खाने के इरादे से वहीं टिक गए, हसदा आना-जान बचपन से लगा हुआ है, तिवारी जी भी हसदा में अध्यापन कर चुके हैं। जान पहचाने के लोग वहां मिल गए। स्टूल और बेंच पर जम गए, देवा चाट भंडार, प्रोप्राईटर साहू जी को गोलगप्पे का आडर दिया, तभी मन बदल गया, चाट बनाने के लिए कहा। तिवारी जी ने गोलगप्पे थामें और मैने चाट। वाह! स्वाद के क्या कहने थे, मजा आ गया। ऐसी चाट शहर की भी किसी बड़े होटल में नहीं खाई। एक प्लेट उदरस्थ करने के पहले ही दुसरी का भी आडर दे दिया। फ़िर गोल गप्पे का, गोल गप्पे में तेल की महक थी, थोड़ा उसे गरियाया। पता किया कि एस पी (सरपंच पति) कहाँ है? गाँव में नहीं थे, परन्तु याद करते ही वे भी पहुंच गए। बड़ी लम्बी उमर है यार, शैतान का नाम लेते ही हाजिर।

चाट भक्षण चालु था, तभी एक नवयुवक गले में हेडफ़ोन डाले, हाथ में मोबाईल लिए पहुंचा। मुझसे बोला -"अंकल जी थोड़ा सरकिए"। हम सरक लिए, वह बेंच पर आकर बैठ गया। मोबाईल में गाना सुना रहा था। मैने जब उसे नीचे से पर तक देखा तो उसकी हरकत पर गौर करके अन्य लोग भी हँसने लगे। तिवारी गुरुजी ठहाके लगाने लगे। तभी उसके मोबाईल में घंटी आई और बंद हो गई, बोला -" साले मन मिस काल करथे।" मैने कहा - "ओखर मोबाईल मे तैंहा रिचार्ज कराथस का?" करातेस त फ़ुल काल करतिस।" उसने क्या सोचा पता नहीं, तभी उसका एक साथी पहुंच गया - "चल बे, जाना हे त, मैं जात हंव।" मैने कहा-" हेडफ़ोन ला कान में लगा, बने दिखथे।" वहां बैठे लोग उसका मजा लिए जा रहे थे। चाट के आनंद के साथ आनंद दुगना हो गया। सामने मुझे सप्तपर्णी का वृक्ष दिखाई दिया। परसों ही मल्हार पर मेडागास्कर पाम का जिक्र सुब्रमनियन जी ने किया था। मैने उसके कुछ चित्र लिए और सुब्रमनियन जी के चित्रों से मिलान किया। यह वृक्ष भी उसी जाति का लगा पर, इसमें फ़ूल नहीं आए थे, मैने फ़ूल भी देखे हैं। जो सुब्रमनियम जी के चित्रों में दिखाए फ़ूलों जैसे ही होते हैं। 

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे अंदर करने के बाद हमने सेवा शुल्क पूछा तो उसने हमारे 30 रुपए लिए। सस्ते में मामला निपट गया। शुल्क जमा करके हम आगे बढ लिए, क्योंकि आगे जाने में विलंब होने की आशंका थी, नवापारा पहुचकर गंज रोड़ की प्रदक्षिणा करके हम महानदी के घाट पर पहुंचे। वहां कोई भी कावंडिया दिखाई नहीं दिया। हमारी फ़ोटो इच्छा पूर्ति नहीं हुई। जब नदी के पुल पर पहुंचे तो बाढ देखने की इच्छा भी अधुरी रह गयी। नदी में पानी ही नहीं था। कुलेश्वर मंदिर के आस-पास रेत दिख रही थी। अर्थात वर्षा कम ही हुई है, नदी में भरपूर जल नहीं आ सका। 

मैने सोचा था कि नदी में पानी होगा तो नाव वाले भी मिलेंगे। उनसे चर्चा करेगें कि - "नाव में मामा-भानजा एवं पहिलावत (ज्येष्ठ पुत्र-पुत्री) क्यों नहीं बैठते? मान्यता है कि इनके बैठने से नाव उलट जाती है। नाव वाले नहीं मिले, रामभरोसा जी ने बताया था कि एक बार जानकारी के अभाव में वे मामा-भांजा एक साथ नाव में बैठ गए। जब नाव डगमगाने लगी तो नाव ने कहा कि -" कोई मामा भांजा बैठे हो तो बता दो, नहीं तो नाव उलट जाएगी।" इनका पता चलने पर एक को नाव से नदी में कूद जाने कहा। मामा तो बैठे रहे, नदी में रामभरोसा जी को कूदना पड़ा। थोड़ी देर नजारे देखने के बाद आगे बढ लिए।

गरियाबंद मार्ग पर आगे बढे, रास्ते में बोल बम कावंड़िए मिले, सावन में शिव भक्ति सैलाब उफ़ान पर होता है। कौन कहां से जल लेकर कहां चढाने जा रहा है पता ही नहीं चलता। पर कावंड़िए हर सड़क पर मिल जाते हैं। एक महिला कांवड़िया दल भी मिला और नौजवान भी, चलते-चलते इनकी चाल बदल चुकी थी। मुझे भी अनुभव है इसका। जांघे छिलने के कारण पैदल चलना कठिन हो जाता है। मैने तो इसका तोड़ निकाल लिया था, नारियल तेल की एक शीशी साथ लेकर चलता था और जांघों में लगा लेता था। जिससे जांघे छिलती नहीं थी और यात्रा भी मजे से हो जाती थी। अब समय नहीं था कि इन्हे यात्रा टिप्स देते चलुं। नहीं तो अवश्य ही बता देता। धान के खेतों में फ़सल लहलहा रही है, जिन्होने पहले बोनी कर ली वे चलाई, निंदाई और बियासी कर रहे हैं। महिलाओं का दल रोपा लगा रहा है, जिस खेत में पानी अधिक था और समय पर बोनी नहीं हुई उसमें लाई-चोपी बोनी पद्धति (खेत को मता कर उसमें उपर ही बीज छिड़कना) का प्रयोग किया गया था।

रास्ते में एक नंगरिहा बैलों को खोलकर सड़क पर बैठकर चोंगी सिपचा (बीड़ी जलाना) रहा था, थोड़ी देर आराम करने के बाद फ़िर बैला नांगर में फ़ांदने की तैयारी कर रहा था, मतलब बैटरी रिचार्ज कर रहा था। 300 एकड़ के खार में बोवाई हो चुकी है, निंदाई चलाई चल रही है किसान पुरानिक पटेल ने बताया। तीन-चार दिनों की बारिश ने किसानों के चेहरे पर रौनक ला दी। पौधों के भरी हुई बैलगाड़ियाँ खड़ी हैं, रोपा लगाने वाले थरहा ले जा रहे हैं। रोपा कतार में लगाया हुआ सुंदर दिखाई दे रहा था। ढंग से रोपा लगाने से फ़सल अच्छी होती है। गांव में रोपा का काम ठेके पर होता है। अगर खेत का मालिक स्वयं सामने न रहे तो मजदुर एक पौधे से दुसरे पौधे की दुरी बढा कर जल्दी से काम निपटाने की कोशिश करते हैं। जिससे फ़सल कम होने की संभावना रहती है। इसलिए खेत मालिक को भी उनके साथ काम में जुटना पड़ता है। तभी तो कहते हैं "खेती अपन सेती"। कांवरिए लगातार चल रहे हैं अपनी मंजिल की ओर तथा हम भी बढ रहे हैं आगे।  

NH-30 सड़क गंगा की सैर