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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

नकटा मंदिर ---- ललित शर्मा


चाय आप अभी पीयेगें या स्नानाबाद? सुनकर आँख खुली तो बाबु साहब पूछ रहे थे। घड़ी साढे पांच बजा रही थी। मैने कहा - अभी ही, स्नान तो उसके बाद में ही होगा। बाबु साहब चाय बनाकर लाते हैं और अपनी सुबह हो जाती है। बाबु साहब तैयार हो गए हैं और हम भी थोड़ी देर में तैयार हो लेते हैं। घोड़ी भी दाना-पानी लेकर तैयार हो गयी यात्रा के लिए। आज हमारा पहला पड़ाव जांजगीर का विष्णु मंदिर है। बहुत दिनों से तमन्ना थी इसे देखने की। परन्तु सुअवसर आया ही नही था। आज मुहूर्त निकला इसे देखने का। हम 6 बजे जांजगीर के लिए चल पड़े। सूर्योदय हो चुका था। अधिक समय होने पर गर्मी झेलने को तैयार रहना था। विष्णु मंदिर देखते ही तबियत हरी-भरी हो गयी। भीतर से आवाज आई कि "इसे तो पहले ही देख लेना था।" लेकिन समय और अवसर भी कोई चीज होती है। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि समय से पहले और भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता। सामने दो मंदिर दिखाई दे रहे हैं, एक अधूरा और एक पूरा। अधुरा मंदिर लाल बलुआ पत्थरों का बना है तथा दूसरा मंदिर चूना पत्थरों का। चूना पत्थर छत्तीसगढ में बहुतायत में पाए जाते हैं। अधिकतर निर्माण इसी से होता है। 

जांजगीर जाज्वल्य देव की नगरी है। यह मंदिर कल्चुरी काल की मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। मंदिर में जड़े पत्थर शिल्प में पुरातनकालीन परंपरा को दर्शाया गया है। अधूरा निर्माण होने के कारण इसे "नकटा" मंदिर भी कहा जाता है। इतिहास के झरोखों में जाज्वल्य देव द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, जिसका निर्माण 12 वीं शताब्दी में होना बताया जाता है। विष्णु मंदिर कचहरी चौक से आधा किलोमीटर की दूरी पर जांजगीर की पुरानी बस्ती के समीप है। यह मंदिर कल्चुरी कालीन मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित इंस मंदिर की दीवारें भगवान विष्णु के अनेकों रूपों के अलावा अन्य देवताओं कुबेर, सूर्यदेव, ऋषि मुनियों, देवगणिकाओं की मूर्तियों से सुसज्जित किन्तु खंडित है। विष्णु मंदिर के पास ही कल्चुरी काल का एक शिव मंदिर भी है। मंदिर का अधिष्ठान पांच बंधनों में विभक्त है। नीचे के बंधन सादे किन्तु उपरी बंधनों में रत्न पुष्प अलंकरण है। अधिष्ठान के पार्श्व में गजधर दो भागों में विभक्त है। अंतराल और गर्भगृह के भद्ररथों पर देव कोष्ठ हैं। कर्णरथों पर दिपाल एवं अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उकेरी गई।

विष्णु मंदिर के बगल में ही विशाल भीमा तालाब है। सैकड़ों एकड़ क्षेत्रफल में फैल भीमा तालाब को भीम ने बनाया था, ऐसी मान्यता है। मंदिर के चारों ओर अत्यन्त सुंदर एवं अलंकरणयुक्त प्रतिमाओ का अंकन है जिससे तत्कालीन मूर्तिकला के विकास का पता चलता है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के दोनो ओर देवी गंगा और जमुना के साथ द्वारपाल जय-विजय स्थित हैं। इसके अतिरिक्त त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्ति है। ठीक इसके ऊपर गरुणासीन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थित है। मंदिर की जगती के दोनों फलक में अलग-अलग दृश्य अंकित हैं। एक फलक पर धनुर्धारी राम, सीता, लक्ष्मण तथा रावण और मृग अंकित हैं। दूसरे फलक पर रावण का भिक्षाटन और सीता हरण के दृश्य है।श्री राम द्वारा मृग वध और रावण द्वारा सीता हरण के दृश्य मंदिर के प्रवेशद्वार के दोनों पार्श्वों पर दो-दो के जोड़े में हैं जो दो मुख्य खंडों में बँटे हैं। 

इसमें लंबोदर तथा त्रिशीर्ष मुकुट युक्त कुबेर का अंकन है। मंदिर के शिखर में मृदंगवादिनी, पुरुष से आलिंगनबद्ध मोहिनी, खड्गधारी, नृत्यांगना मंजुघोषा, झांझर बजाती हंसावली आदि देवांगनाएँ अंकित हैं। मंदिर की उत्तरी जंघा में आंखों में अंजन लगाती अलसयुक्त लीलावती, चंवरधारी चामरा, बांसुरी बजाती वंशीवादिनी, मृदंगवादिनी, दर्पण लेकर बिंदी लगाती विधिवेत्ता आदि देवांगनाएं स्थित हैं। दक्षिण जंघा में वीणा वादिनी सरस्वती, केश गुम्फिणी, लीलावती, हंसावली, मानिनी, चामरा आदि देवांगनाएँ स्थित हैं।मंदिर के उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी जंघा में विभिन्न मुद्राओं में साधकों की मूर्तियाँ अंकित है। इसके अतिरिक्त उत्तरी जंघा के निचले छेद में स्थित मूर्ति तथा प्रवेशद्वार के दोनों पार्श्वों में अंकित संगीत समाज के दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 

मंदिर के पृष्ठ भाग में सूर्य देव विराजमान हैं। मूर्ति का एक हाथ भग्न है लेकिन रथ और उसमें जुते सात घोड़े स्पष्ट हैं। यहीं नीचे की ओर कृष्ण कथा से सम्बंधित एक रोचक अंकन मंदिर के है, जिसमें वासुदेव कृष्ण को दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठाए गतिमान दिखाये गये हैं। इसी प्रकार की अनेक मूर्तियाँ नीचे की दीवारों में खचित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी समय में बिजली गिरने से मंदिर ध्वस्त हो गया था जिससे मूर्तियां बिखर गयी। उन मूर्तियों को मंदिर की मरम्मत करते समय दीवारों पर जड़ दिया गया। मंदिर के चारो ओर अन्य कलात्मक मूर्तियों का भी अंकन है जिनमे से मुख्य रूप से भगवान विष्णु के दशावतारो में से वामन, नरसिह, कृष्ण और राम की प्रतिमाएँ है। छत्तीसगढ के किसी भी मंदिर मे रामायण से सम्बंधित इतने दृश्य कहीं नही मिलते जितने इस विष्णु मंदिर में हैं। यहाँ रामायण के 10 से 15 दृश्यो का भव्य एवं कलात्मक अंकन देखने को मिलता है। इतनी सजावट के बावजूद मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है, यह मंदिर सूना है।

किंवदंती है कि एक निश्चित समयावधि (कुछ लोग इस छैमासी रात कहते हैं) में शिवरीनारायण मंदिर और जांजगीर के इस मंदिर के निर्माण में प्रतियोगिता थी। भगवान नारायण ने घोषणा की थी कि जो मंदिर पहले पूरा होगा, वे उसी में प्रविष्ट होंगे। शिवरीनारायण का मंदिर पहले पूरा हो गया और भगवान नारायण उसमें प्रविष्ट हुए। जांजगीर का यह मंदिर सदा के लिए अधूरा छूट गया। एक अन्य दंत कथा के अनुसार इस मंदिर निर्माण की प्रतियोगिता में पाली के शिव मंदिर को भी सम्मिलित बताया गया है। इस कथा में पास में स्थित शिव मंदिर को इसका शीर्ष भाग बताया गया है। एक अन्य दंतकथा जो महाबली भीम से जुड़ी है, भी प्रचलित है। कहा जाता है कि मंदिर से लगे भीमा तालाब को भीम ने पांच बार फावड़ा चलाकर खोदा था। किंवदंती के अनुसार भीम को मंदिर का शिल्पी बताया गया है। 

इसके अनुसार एक बार भीम और विश्वकर्मा में एक रात में मंदिर बनाने की प्रतियोगिता हुई। तब भीम ने इस मंदिर का निर्माण कार्य आरम्भ किया। मंदिर निर्माण के दौरान जब भीम की छेनी-हथौड़ी नीचे गिर जाती तब उसका हाथी उसे वापस लाकर देता था। लेकिन एक बार भीम की छेनी पास के तालाब में चली गयी, जिसे हाथी वापस नहीं ला सका और सवेरा हो गया। भीम को प्रतियोगिता हारने का बहुत दुख हुआ और गुस्से में आकर उसने हाथी के दो टुकड़े कर दिया। इस प्रकार मंदिर अधूरा रह गया। आज भी मंदिर परिसर में भीम और हाथी की खंडित प्रतिमा है। खंडित हाथी की प्रतिमा सीढियों के उपर लगी है।

हम विष्णु मंदिर के कुछ चित्र लेते हैं फ़िर हमारी सवारी चाम्पा की तरफ़ बढ चलती है। मुझे मड़वारानी होते हुए पटियापाली जाना है, बाबु साहब ने चाम्पा में एक नया सारथी तैयार कर रखा था जो मुझे मंड़वा रानी दर्शन करवा कर पटियापाली स्कूल तक पहुंचाता और बाबु साहब कुछ आवश्यक कार्य निपटा कर पटियापाली में मुझसे मिलते। चाम्पा स्टेशन पर पहुंचने पर यादव जी स्टेशन पर मिल गए। जाते ही उन्होने प्रणाम कर नारियल का प्रसाद दिया और हम कुछ फ़ल लेकर मड़वा रानी की तरफ़ चल पड़े। रास्ते को पहचानने में कुछ समय लगा। हम चाम्पा-कोरबा मार्ग पर जा रहे थे और इस मार्ग पर मै पहले भी आ चुका हूँ। मड़वारानी पहुंच कर दर्शन किए, यादव ने बताया कि  मड़वा रानी का स्थान पहाड़ी पर है और एक मंदिर नीचे भी बना हुआ है। लोग यहीं दर्शन करते हैं। मड़वारानी के पास ही जगदीश पनिका का गांव कोठारी है, जहां मै दो साल पूर्व आया था।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

अकलतरा की ओर ------------ ललित शर्मा

बिलासपुर स्टेशन
सीटी बजाती हुई गाड़ी आगे बढती जा रही है। मैं स्लीपर कोच में बैठा अपनी मंजिल तक पहुंचने का इंतजार कर रहा हूं। तभी उपर वाली बर्थ खाली होती है और मैं उस पर चढ कर सोने का मन बनाता हूं। चलती गाड़ी के हिचकोलों में नींद आना भी मुश्किल है,ट्रेन को बिलासपुर से आगे नहीं जाना है। इसलिए आगे निकलने का खतरा नहीं है। सोचता हूँ, बाबु साहब से वादा किया था, 9 तारीख को अकलतरा पहुंचने का। 9 तारीख की सुबह चैट पर बाबु साहब ने याद दिलाया कि आज अकलतरा पहुंचना है मुझे, वे इंतजार कर रहे हैं। मेरा मन नहीं था जाने को। दोपहर की धूप के विषय में सोच कर। गर्मी बहुत बढ गयी है। घर पर ही रहा जाए तो ठीक है, लेकिन बाबु साहब ने फ़िर फ़ोन पर चर्चा कि और कहा कि चांपा का टिकिट ले लेना, मै आपको चांपा में मिलुंगा। मैने कहा कि - शाम को शताब्दी से आऊंगा और रात को आराम करके सुबह चलेगें घुमने। तो वे उस पर भी राजी हो गए। इतना कहने के बाद मैं अचानक उठ कर तैयार हो गया और घर से निकलते हुए बाबु साहब को फ़ोन लगा कर इत्तिला दी कि छत्तीसगढ एक्सप्रेस से पहुंच रहा हूं, यह गाड़ी बिलासपुर तक ही है। इसके बाद उत्कल से चांपा तक यात्रा करनी है।

दो ब्लॉगर - ललित शर्मा  और रमाकांत सिंह (बाबु साहब)
स्टेशन पहुंचने पर बाबु साहब ने मुझे नैला उतरने कहा, फ़िर थोड़ी देर बाद अकलतरा पहुचने। इतनी देर में ही तीन बार कार्यक्रम बदल चुका था। बिलासपुर पहुंचने पर पता चला कि उत्कल तो कब की छूट चुकी है। अब अकलतरा के लिए गोंदिया-झारसुगड़ा पैसेंजर ट्रेन का ही सहारा है। इस बीच एक घंटा मुझे बिलासपुर स्टेशन पर ही बिताना पड़ेगा। अब अरविंद झा याद आए, उन्हे फ़ोन लगाया, तो आधे घंटे में पहुचने का कह रहे थे। भूख भी लगने लगी थी, कुछ हल्का फ़ुल्का चटर-पटर खाया। तब तक अरविंद झा भी पहुंच गए। पैसेंजर ट्रेन प्लेट फ़ार्म पर लग चुकी थी। अरविंद झा एकदम चकाचक दिख रहे थे, कुछ बदलाव नजर आया मुझे उनमें, फ़िर ध्यान दिया तो मुंछों का फ़र्क था, उनकी नयी मुछें कहर ढा रही थी। हमारी बिरादरी में मिलने की तैयारी लगी। अगले माह दरभंगा जाने का प्रोग्राम बन गया। फ़िर वहीं से जनकपुर इत्यादि। ट्रेन ने सीटी बजाई, गार्ड ने झंडी दिखाई और गाड़ी चल पड़ी। अरविंद स्टेशन पर छूट गए। वापसी में मिलने का वादा रहा। रात को मिल बैठेगें दीवाने तीन, मै, अरविंद और श्याम कोरी "उदय", फ़िर जम जाएगी महफ़िल।

जयराम नगर स्टेशन में संगमरमर का बोर्ड
बिलासपुर से चलकर गतौरा स्टेशन में ट्रेन रुकी। ट्रेन की खिड़कियों में हुक लगा कर दूध के डिब्बे और सब्जियों की गठरियाँ भी टांग रखी थी। ट्रेन रुकते ही वे अपना सामान फ़टाफ़ट उतारने लगे। मेरी खिड़की पर भी यही हाल था। बड़ी बड़ी गठरियां लदी हुई थी। पैसेंजर ट्रेन है, आवश्यकता पड़ने पर बकरियाँ भी लाद ली जाती हैं बिना टिकिट। टिकिट बाबु को 10-20 देने से काम चल जाता है। हम तो सुपरफ़ास्ट की टिकिट लेकर पैसेंजर की सवारी कर रहे थे। अरपा नदी का पुल पार करने के बाद जयरामनगर स्टेशन आता है पहले इसे पाराघाट कहा जाता है। जयराम नगर एकमात्र स्टेशन है जहाँ संगमरमर का बोर्ड लगा है स्टेशन के नाम का। इसके बाद पैसेंजर हाल्ट कोटमी सोनार आता है। दाएं तरफ़ देखने से वाच टावर जैसी संरचना दिखाई देती है साथ ही तारों की बाड़ की घेरे बंदी भी। मै इस स्थान के बारे में कयास लगा रहा था तभी बाबु साहब का फ़ोन आता है और वे बताते हैं कि यही क्रोकोडायल पार्क है। इसे कहते हैं टेलीपैथी। मै ट्रेन में क्या सोच रहा हूं यह जानकारी बाबु साहब को हो जाती है और वे मुझे फ़ोन पर उस स्थान के बारे में बता देते हैं। सिद्ध पुरुषों के यही चमत्कार होते हैं।

अकलतरा का स्कूल
छुक छुक गाड़ी अकलतरा स्टेशन पर पहुंचती है। इस स्टेशन से कई बार होकर गुजरा लेकिन यहां उतरा एक बार भी नहीं। डिब्बे से बाहर आता हूँ तो लू की लपट लगती है, टेम्परेचर 42 के पार लगता है। 22N01 82E26 अक्षांश देशांश पर अकलतरा स्थित है, डिब्बे से बाहर आते ही बाबु साहब नजर आते हैं, राम राम होने के बाद हम उनके घर चल पड़ते हैं। 2 बज रहे हैं, मंझनियाँ का समय और सूरज अपने पराक्रम पर। घर पहुंच कर सबसे पहले हस्त-मुख प्रक्षालन होता है। बाबु साहब कहते हैं - भोजन करके थोड़ा आराम कर लेते हैं फ़िर घुमने चलेगें। उन्होने कई जगह जाने का कार्यक्रम पहले से ही बना रखा है। उनकी माता जी एवं बहने बढिया खाना खिलाती हैं, बड़ी बिजौरी के साथ परम्परागत भोजन का आनंद ही कुछ और है। अंत में एक कटोरी गोरस भोजन पचाने के लिए काफ़ी होता है। थोड़ा आराम करने के बाद हम अकलतरा के कोट गढ के मड फ़ोर्ट को देखने निकलते है तो बाबु साहब कहते हैं, तनि स्कूल और बैंक देखते हुए चलते हैं। इस स्कूल के सांस्कृतिक मंच की गरिमा है कि इस पर देश की नामी हस्तियों ने अपनी बात कही है।

सहकारी भवन
हम स्कूल की ओर चलते हैं। बाबू साहब मुझे स्कूल और सहकारी बैंक दिखाना चाहते हैं। सहकारी बैंक की पुरानी बिल्डिंग खंडहर हो चुकी है। उसमें जड़े तालों में जंग लग चुकी है। सहकारी बैंक की स्थापना डॉ इंद्रजीत सिंह  (अकलतरा के मालगुजार और राहुल भैया के दादा जी) ने की थी, वे सहकारी आंदोलन से जुड़े थे और   भूमि दान की थी बैंक की स्‍थापना के लिए, वे ट्रस्‍टीशिप और सहकारिता के प्रबल पक्षधर थे। उन्‍हीं की प्रेरणा मानी जा सकती है कि अकलतरा का उ मा शाला का संचालन आज भी सफलता और कुशलतापूर्वक निजी संस्‍था द्वारा किया जा रहा है। स्कूल, अस्पताल, थाना, सहकारी बैंक एवं अन्य संस्थानों के लिए डॉ इंद्रजीत सिंह ने मुक्त हस्त से भूमि दान की। हम सहकारी बैंक में लगे उद्धाटन शिला की फ़ोटो लेना चाहते थे। परन्तु तालों में जंग लगने के कारण वे खुले नहीं। बाबु साहब ने बहुत कोशिश की।

सहकारी बैंक के बड़े बकायादार
आखरी इलाज इन्हे तोड़कर ही खोलने का था, जो हमने स्थगित कर दिया। सहकारी बैंक नए भवन में चला गया है, पुराना भवन खंडहर होकर ढह रहा है। इस भवन में कालातीत ॠणियों (बकायादारों) की सूची लगी है। कुछ लोगों के लिए खुशी की बात होती थी कि बैंक के ॠणियों की सूची में नाम होना। अगर जिसका नाम सूची में नहीं है उसकी इज्जत ही क्या है। बैंक का चुनाव भी लड़ने की पात्रता उसे ही है जो बैंक का कर्जदार होता है। इसलिए सहकारी बैंक से कर्ज लेना अनिवार्य मजबूरी है समझिए। एक ऐसी ही लिस्ट मुझे यहाँ देखने मिली। स्कूल के सामने ग्राऊंड में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं और साथ ही चुस्की वाले का ठेला भी लगा है। गर्मी में ठंडक का अहसास लेना है तो चुस्की का आनंद लेना ही पड़ेगा। अब चुस्की का आनंद लेते हुए हम चल पड़ते हैं कोट गढ की ओर… … ……  आगे पढें