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सोमवार, 14 जनवरी 2013

कैसे उजड़ा श्रीपुर ? Sirpur ………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
सिरपुर भ्रमण करने के बाद सामन्यत: पर्यटक के मन में यह विचार आता है कि कोसल जैसे विशाल राज्य की समृद्ध एवं वैभवशाली राजधानी श्रीपुर का पतन कैसे हुआ? इस नगरी का वैभव कैसे उजड़ गया? ऐसा क्या हुआ होगा जो श्रीपुर को पतनोन्मुख होना पड़ा? मेरे भी मन में यह प्रश्न उठने लगे। एक तरफ़ जहाँ महाशिवगुप्त जैसे बलशाली राजा हुए, जिन्होने लगभग 60 वर्षों तक सिरपुर पर शासन किया। उनके शासन काल में सभी धर्मों एवं मतों  को समान आदर मिला। विद्वानों को उनके राज्य में संरक्षण मिला। महाशिवगुप्त बालार्जुन का शासन काल राज्य का स्वर्णिम युग था। उसने कभी न सोचा होगा कि इस वैभवशाली राजधानी का पतन भी हो सकता है। किसी शहर, नगर या राजधानी का पतन एकाएक नहीं होता। जब उसे उतकर्ष पर पहुंचने में शताब्दियाँ लग जाती हैं तो पतन होने भी समय लगता है। श्रीपुर के पतन के अनेक कारण हो सकते हैं। जिनमें से कुछ हमें प्रत्यक्ष रुप से वहां के स्मारकों में परिलक्षित होते हैं।
पतन के कारण - महानदी की बाढ
अगर हम सिरपुर की भौगौलिक स्थिति देखें तो नगर के पश्चिम दिशा में महानदी प्रवाहित होती  है। उनके प्रवाह के कारण किनारों का क्षरण होता है। निरंतर कटाव के कारण नदियाँ बरसात के दिनों में अपना रास्ता भी बदल लेती हैं। अब यह तय नहीं होता कि कौन से किनारे तरफ़ कटाव अधिक होगा। उत्खन से ज्ञात है कि सिरपुर व्यापार की बहुत बड़ी मंडी था। यहाँ उत्खन में कई एकड़ों में बाजार क्षेत्र प्राप्त हुआ है। यह बाजार क्षेत्र महानदी के किनारे पर स्थित है। जब राजधानी बसी होगी तब महानदी का किनारा इतना दूर रहा होगा कि राजधानी को बाढ आदि से हानि न पहुंच सके। क्योंकि महानदी के किनारे उत्खनन में राजमहल परिसर भी प्राप्त हुआ है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा ने अपना महल सुरक्षित क्षेत्र में बनवाया होगा।
सुरंग टीला का महामंड़प 
बाजार में उत्खन से प्राप्त भवनों में मरम्मत के चिन्ह मिलते हैं। प्रतीत होता है कि अत्यधिक वर्षा होने से महानदी का प्रवाह तटबंध तोड़कर बाजार क्षेत्र में प्रवेश कर जाता था। जिसके कारण भवनों को हानि पहुंचती थी। बाढ का पानी उतरने के बाद निवासी अपने भवनों की मरम्मत कराते थे। बाजार क्षेत्र के भवनों में मूल निर्माण सामग्री के अलावा उस समय उपलब्ध निर्माण सामग्री से मरम्मत कराने के स्पष्ट प्रमाण दिखाई देते हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सिरपुर के पतन में महानदी की बाढ की भूमिका को नजर अंदाज नहीं  किया जा सकता। वर्तमान सिरपुर में भी महानदी में बाढ आने पर नगर को हानि पहुंचने की आशंका बनी रहती होगी।
पतन के कारण -भुकम्प
हम देखते हैं कि भूकंप आने पर बड़े बड़े नगर और राजधानियां कुछ पलों में निर्जन हो जाती हैं। धरती का एक बार थरथराना ही हजारों लाखों लोगों को काल के आगोश में समा देता है। श्रीपुर  के पतन में भुकंप की भूमिका भी रही होगी। भुकंप के चिन्ह सुरंग टीला स्थित पंचायत मंदिर के अधिष्ठान में दिखाई देते हैं। देखा जाए तो सुरंग टीला मंदिर की जगती भारत के मंदिरों में सबसे अधिक ऊंचाई पर है। दूर से देखने पर लगता है कि मिश्र के किसी पिरामिड के समक्ष खड़े हैं। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 43 सीढियां चढनी पड़ती हैं। इसका तल विन्यास नदी के तल से 17 फ़ुट ऊंचा है। वर्तमान में मंदिर सीढियाँ दबी हुई हैं। इनके कोण बदले हुए  हैं। विशाल मंदिर की संरचना में परिवर्तन सिर्फ़ भुकंप से ही आ सकता है। इससे स्पष्ट होता है श्रीपुर में भुकंप भी आया होगा। जिसके कारण इस नगर का पतन हुआ होगा।
मनसर का राजमहल( दबी हुई पैड़ियाँ)
भूकंप द्वारा विनाश के प्रमाण हमें अन्य स्थानों पर भी मिलते हैं। महाराष्ट्र के नागपुर जिले स्थित मनसर (मणिसर) में स्थित वाकाटक राजाओं के भग्न राजमहल का ढहने का कारण भुंकप हैं। भुकंप के चिन्ह राजमहल के भग्न भवन पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। मनसर से सिरपुर की दूरी लगभग 300 किलो मीटर होगी। हो सकता है दोनो जगह एक ही समय भुकंप आया हो। संयुक्त राष्ट्र भूगर्भीय सर्वे के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष रिक्टर स्केल 3 से 3.9 के 49000 हल्के, 6 से 6.9 के 120 अधिक तीव्र, 7.9 से 8 के 18 बड़े तथा 8 से 9 पर एक बहुत भीषण भुकंप आते हैं, पंजाब के उत्तर पूर्व में उत्तरांचल, टिहरी व गढ़वाल, दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण में गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिण पूर्व में मध्य प्रदेश के क्षेत्र में भूकंप की दृष्टि से काफी संवेदनशील क्षेत्र माने जाते हैं।
पतन के कारण - बाह्य आक्रमण 
पाण्डुवंशियों में महाप्रतापी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन ने 60 वर्षों तक शासन किया। किसी भी राजा के द्वारा लम्बी अवधि तक शासन करना यह दर्शाता है कि उसका प्रभुत्व स्थापित था। उसके अड़ोसी-पड़ोसी राज्य या तो उसके मित्र थे या उससे भय खाकर आक्रमण नहीं करते थे। ऐसा ही महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में हुआ होगा।  लम्बा शासन काल अवश्य ही जनकल्याणकारी रहा होगा। इसके बाद के उसके उत्तराधिकारियों के नाकारा एवं निर्बल होने के कारण ताक में बैठे पड़ोसियों ने आक्रमण करके उन्हे परास्त कर दिया। जिससे महाशिवगुप्त बालार्जुन का विशाल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। साम्राज्यवादी चालुक्यों से ये बच नहीं सके।  इनकी निर्बल स्थिति का लाभ नलवंशी शासकों ने भी उठाया और दक्षिण कोसल एवं पश्चिम कोसल में अपनी प्रभुता स्थापित की। राजिम का राजीव लोचन मंदिर नल वंशी शासक विलासतुंग का बनवाया हुआ है। इससे जाहिर होता है कि नलवंशी महानदी के तीर तक पहुंच चुके थे।

पतन के अन्य कारण
नवमी शताब्दी के अंतिम चरण में कलचुरी शासक भी आ चुके थे। उस समय पाण्डुवंशियों ने उड़ीसा की तरफ़ पलायन कर लिया और विनीतपुर एवं ययातिपुर को राजधानी बनाई। कलचुरियों तुम्माण से राजधानी रतनपुर ले आए। श्रीपुर उपेक्षित रहा। इसके पश्चात कलचुरी शासकों में विभाजन के पश्चात रायपुर राजधानी बनी तब भी श्रीपुर उपेक्षित ही रहा। राजधानी के पतन के साथ व्यापारी भी उस स्थान पर चले गए जहाँ उन्हे व्यापार की संभावनाए  नजर आई। व्यापारियों को लाभ अर्जित करने से मतलब होता है। चाहे किसी का राज हो और कोई भी शासक हो। इस तरह श्रीपुर के लोग अन्य राजधानियों की ओर पलायन कर गए और श्रीपुर श्री विहीन हो गया।
राजमहल के पार्श्व में महानदी 
समय की मार से कोई नहीं बच पाया। विशाल साम्राज्यों को भी यह दिन देखने पड़े हैं। श्रीपुर में रह गए तो सिर्फ़ खंडहर और पीपल एवं बरगद के वे वृक्ष जिन्होने अपनी आँखों से सिरपुर को बसते एवं उजड़ते देखा। रह गया तो महानदी का वह किनारा जहाँ श्रीपुर जैसी राजधानी ने अपने वैभव का चर्मोत्कर्ष देखा। खंडहरों में बोलते उल्लू और उल्टे लटके चमगादड़ों का बसेरा रह गया। न जाने कितने वर्षों के बाद एक छोटा सा गाँव फ़िर बसा यहाँ के खंडहरों के अवशेषों को जोड़कर। एक बार फ़िर से गौरेया का बसेरा बना श्रीपुर, नया नाम सिरपुर धर कर। …… आगे पढें …

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

गंधर्वेश्‍वर मंदिर..... Sirpur Chhattisgarh ............ललित शर्मा

महानदी के किनारे सुबह 
प्रारंभ से पढ़ें  
प्रभात सिंह की आमद आहट से प्रभात हुई। वे चाय बनाकर ले आए थे। मैंने घड़ी की तरफ देखा, 6 बजा रही थी, मतलब प्रभात सिंह वादे के पक्के हैं, ये तो मानना पड़ेगा। एक रात और गुजर गई सिरपुर में, पर यह न पूछो कैसी गुजरी? रेस्ट हाउस विदेशी गोरों एवं देशी गोरों की ऐशगाह हुआ करते थे। राजीव रंजन "आमचो बस्तर" के पृष्ठ 243 में लिखते हैं ...... 
छोटा सा कॉटेज था। तीन कमरों के इस कॉटेज को अंग्रेज अफसरों के लिए विश्राम गृह बनाया गया था। बाहर कुर्सियां लगी हुई थी। जिस पर थानेदार और उसके चारों सिपाही पसरे हुए थे। आवाज ही बता रही थी कि उन सभी पर नशा हावी है।
"अन्दर अंग्रेज इंजिनियर साहब बैठे हैं। तेरा हिंगा उनके साथ ही काम कर रहा है। जा वो ही तुझे सब कुछ बताएँगे।" थानेदार ने एक कमरे की तरफ इशारा किया। नीरो हिचक गयी, उसने मासा की तरफ देखा, वह नजरें झुकाए खड़ा हुआ था।
'अरे जा ना! इस बार थानेदार ने डांट दिया था। 
नीरो की श्वांस ही रुक गई। उसके डरे हुए कदम कमरे की और बढे। धीरे से उसने कमरे का दरवाजा खोला। भीतर एक विलायती लालटेन जल रही थी, जो शाम के धुंधलेपन से लड़ रही थी। एक और कुर्सी पर अंग्रेज बैठा था। वह दरवाजे पर ही ठिठक गई।
'अन्दर आओ'  अंग्रेज इंजिनियर ने अपना हिंदी ज्ञान बघारा।
'हिंगा .......!' नीरो की आवाज हलक में ही अटक गई।
'अन्दर आओ, मैं जानता हिंगा किधर। अंग्रेज के स्वर में प्रलोभन था।
नीरो टस  से मस नहीं हुई। तभी किसी ने पीछे से उसे कमरे के भीतर ढकेल दिया।दरवाजा बाहर से बंद कर दिया गया।
'झांकता क्या है मिश्रा, इधर  आ जा।' थानेदार ने दरवाजे में आंख लगाये खड़े सिपाही को इशारा किया।
'साले गोरे होते तो जानवर ही हैं'. सिपाही मिश्रा एक कुर्सी पर आकर पसर गया।
नीरो के चीखने की आवाजें सन्नाटे को चीर रही थी। उसके स्वर में रह-रह कर उभर रहा दर्द और कराह यह बता रहे थे कि  अंग्रेज केवल .........को उतारू नहीं है। घंटे भर बाद कमरे का दरवाजा खुला और अंग्रेज ने नीरो को बाहर ढकेल कर दरवाजा बंद कर लिया।--------------------

महानदी के किनारे ब्लॉगर 
ऐसी है कहानी इन रेस्ट हाउसों की। कहाँ नींद आनी थी? पता नहीं कितनो की चमड़ी यहाँ बुलाकर हंटर से उधेडी गयी होगी। कितनो को फांसी पर टांगा गया होगा। कितनो की हड्डियाँ इस धरती के नीचे दफन होंगी जो आज भी कह रही हैं उनका क्या कसूर था। निरपराधों की आत्माएं आज भी चलो छोड़ो, सुबह-सुबह मैं भी क्या लेकर बैठ गया। बहुत काम बचा है, नहाने धोने के साथ नाश्ता पानी भी। लगभग 7 बजे हम तैयार होकर गंधर्वेश्‍वर मंदिर चल पड़े। गंधर्वेश्वर मंदिर महानदी के किनारे पर है। हमने उत्तर के दरवाजे से प्रवेश किया। प्रवेश द्वार के दांयी तरफ एक बड़ा बरामदा है, जिसमे पशुओं ने डेरा जमा रखा है। 

गंधर्वेश्वर मंदिर का स्तम्भ लेख 
परिसर में ढेर सारा गोबर और गंदगी फैली है। इस मंदिर का संचालन ट्रस्ट करता है, जिसमे कलेक्टर भी शामिल होते हैं। यह सतत पूजित मंदिर है। यहाँ से नदी का दृश्य सुहाना दिखाई देता है। किनारे पर नहाते लोग, जल किलोल करते बच्चे, नदी की रेत पर गायों का झुण्ड, नदी पार के जंगल और भी न जाने क्या क्या। प्रकृति का स्वर्गिक आनंद यही पर आकर मिलता है। कुछ देर हमने आम की छाँव में बैठ कर गुजारा। नदी किनारे बैठ कर प्रकृति का आनन्द लिया। हजारों बरसों से महानदी  प्रवाहमान है। प्राणदायिनी बनकर धरा को सिंचित करते हुए किसानो की कोठी को धन धान्य  से भर रही है।

गंधर्वेश्वर मंदिर एवं उर्ध्व लिंग नटराज
मंदिर में प्रवेश करते ही बांयी तरफ उर्ध्व लिंग नटराज की विलक्षण प्रतिमा लगी हुयी है। इसका निर्माण प्राचीन विहारों एवं मंदिरों से प्राप्त स्थापत्य सामग्री से किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। स्तम्भों पर कारीगरी की गयी है। दो स्तम्भों पर लेख भी मिलते हैं। ये अभिलेख महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल के हैं। यहाँ राजा ने मालियों को आदेश दिया है कि  वे कर के रूप में प्रतिदिन मानवाकर पुष्पाहार भगवान को अर्पित करें। मंदिर के स्थापत्य से पता चलता है कि यह मंदिर भी प्राचीन है। मंदिर के परिसर में बहुत सारी मूर्तियाँ रखी हुयी है, बरसों पहले जब यहाँ आया था तो मूर्तियों का संरक्षण देख कर इसे ही संग्रहालय मान बैठा था।

नास्तिकता और आस्तिकता के बीच उन्मुक्त ठहाका 
मंदिर के परिसर में एक स्थान पर बुद्ध के साथ शिवलिंग भी दिखाई दिया। दो विपरीत विचार धाराएँ एक साथ दिखाई दी। एक पूर्णत: नास्तिक एवं एक पूर्णत: आस्तिक। इस वृक्ष के नीचे बाद में किसी ने दोनों विग्रह एक साथ रख दी होंगे। राजीव इस स्थान पर एक चित्र चाहते थे। हमने चित्र को चित्रित कर लिया, मतलब कैमरे में कैद कर लिया। मंदिर का मुख्यद्वार पूर्वाभिमुख है। जिस पर आधुनिक निर्माण दिखाई देता है। मुख्यद्वार पर नंदी आरूढ़ शिव पार्वती विराजमान है। मंदिर परिसर में पुजारी परिवार भी निवास करता है। कहते है कि यहाँ नागा अखाड़े के कोई संत रहते थे, फिर उन्होंने गृहस्थी डाल ली। ये सभी उन्ही का परिवार है। नदी के किनारे पर पहुच कर चित्र ले रहे थे तभी आदित्य सिंह भी पहुच गए, इनकी गाड़ी 3 घंटे विलम्ब से चलने के कारण नदी प्लेटफार्म पर पहुची। हमे गंधर्वेश्वर मंदिर से अब विशेष क्षेत्र में जाना था। जहाँ जाने पर सिरपुर का वैभव दिखाई देता है। जारी है .... आगे पढ़ें ..................

बुधवार, 29 अगस्त 2012

लाफ़ागढ जमींदारी ---------- ललित शर्मा

लाफ़ागढ का सिंहद्वार
हम लाफ़ागढ पहुंच गए, कुछ लोगों ने बताया था कि यहाँ प्राचीन मंदिर है, हमारी कल्पना में पाली, जांजगीर, भोरमदेव, शिवरीनारायण जैसा ही मंदिर था। इसे भी देख लिया जाए। छत्तीसगढ के गढों में सम्मिलित लाफ़ागढ का नाम सुना था। आज देखने का अवसर भी आ गया। लाफ़ागढ वनस्थली में बसा हुआ गाँव हैं। गांव में प्रवेश करने पर हमने मंदिर की पड़ताल की तो बताया गया कि थोड़ा आगे बढने पर आपको मंदिर दिखाई देगा। कच्ची सड़क पर चल कर आगे बढने पर छोटा सा ग्रामीण बाजार दिखाई दिया, जहाँ दो चार दुकाने हैं। सामने लाफ़ागढ जमीदारी का विशाल सिंहद्वार बना हुआ है। जिसके दोनो तरफ़ संतरियों के लिए कमरे हैं और उपर दो सिंह खड़ी हुई मुद्रा में बने हुए हैं। वहीं पर हमने कार खड़ी की और मंदिर में प्रवेश किया। मंदिर कोई अधिक पुराना नहीं है।


श्रीमती दुलौरिन कुंवरि द्वारा निर्मित मंदिर
लगभग 90 साल पहले यहाँ की जमीदार दहराज सिंह की बेवा जमीदारिन दुलौरिन कुंवर ने बनवाया था। ईंटों के बने इस मंदिर पर पीले चूने से पुताई की हुई है। भीतर राम लक्ष्मण सीता की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहीं पर दहराजसिंह ने तेंदू के वृक्ष के समीप माँ काली का मंदिर बनवाया था। हमने मंदिर के चित्र लिए। गर्भगृह में अंधेरा होने के कारण वहां के चित्र नहीं ले सके। यह मंदिर जमीदार की संपत्ति है।सिंहद्वार से भीतर का हाल लाफ़ागढ जमीदारी का हाल बयान कर रहा था। चारों तरफ़ ढही हुई ईमारतें अपने स्वर्णिम काल को याद करके सिसकियाँ ले रही थी। कभी इस जमीदारी का रौब-दाब 84 गाँवों में हुआ करता था। उन गाँवों की जनता के भाग्य का फ़ैसला इसी गढ से होता था। चैतुरगढ भी लाफ़ागढ जमीदारी में ही शामिल है। लाफ़ागढ की जमीदारी काफ़ी दूर तक थी।

जमींदार का घर
वहाँ का कुल देवी महामाया मंदिर इनके पूर्वजों ने बनाया था। मंदिर से बाहर निकलते हुए मुझे एक पहटिया दिखाई दिया, उससे पूछने पर पता चला की लाफ़ागढ के जमीदार के वंशज यहीं रहते हैं और अभी मिल सकते हैं। भीतर प्रवेश करने पर कवेलू की छत वाला एक घर दिखाई दिया। वहाँ दो कुर्सियाँ थी, एक कुर्सी पर बनियान पहने और पंछा बांधे अधेड़ उम्र के सज्जन बैठे थे, हमने नमस्कार कर वर्तमान जमींदार के विषय में पूछा तो उन्होने हमे अपने पास बुलाया और बताया कि वहीं वर्तमान जमीदार हैं। खस्ता हाला लाफ़ागढ के जमींदार इस हाल में मिलेगें, मुझे आश्चर्य हुआ, हम तीन थे, तो उन्होने नौकर से और कुर्सियाँ मंगवाई और हमें बैठने कहा। उनसे चर्चा होने लगी। उनके पूछने पर हमने बताया कि चैतुरगढ घूमने आए थे, लेकिन वहाँ रास्ते की खराबी के कारण पहुंच नहीं पाए, इसलिए लाफ़ागढ का मंदिर देखते हुए लौटने का इरादा है। अब आपसे भेंट हो गयी तो और जानकारी मिल जाएगी।

चर्चारत- अरविंद झा, एरमशरण सिंह,  ललित शर्मा
उन्होने नौकर को पानी लाने के लिए आवाज दी, हमसे पूछा कि आप लोग पत्रकार हैं क्या? हमने कहा- इंटरनेटिहा पत्रकार हैं, नेट पर लिखते हैं। वे बोले-पहले भी बहुत पत्रकार आएं है, कुछ भी लिखते हैं, कई बार तो कहाँ लिखते हैं, इसका ही पता नहीं चला। मैने अपना कार्ड दिया और कहा कि मेरा लिखा आपको कार्ड में लिखे पते पर मिल जाएगा। मैने उनसे जमीदारी के विषय में पूछना शुरु किया। कहने लगे अब जमींदारी कहाँ रही? जमीन सीलिंग में निकल गयी। कुछ का हिस्सा बंटवारा हो गया, जैसे तैसे गुजर-बसर हो रहा है। तभी मुझे कुर्सी सरकाने को कहते हैं, दीवाल में ततैयों ने छत्ता बना रखा है। एक ततैये ने भी चुम्मा ले लिया तो एक दिन नाचना ही पड़ेगा खुशी में। कुर्सी सरका कर बैठने पर चर्चा आगे बढी। उन्होने बताया कि दुलौरिन कुंवर ने पर्वत दान किया था। मैने पर्वत दान का अर्थ पूछा तो पता चला कि एक बड़े पोले स्तम्भ में हजारों गाड़ी धान भर कर पूजा-पाठ के बाद लोगों को ले जाने की छूट दे दी। जिसके हिस्से जितना लगा वो ले गया।

90 वर्ष पुराना पर्वत दान का चित्र
ये अपने को तंवर कहते हैं। थोड़ी देर के बाद उठ कर एक किताब लेकर आए, जिसे हम स्मारिका कह सकते हैं, यह स्मारिका विक्रम संवत 2000 (1943 ईं) में रतनपुर में हुए विष्णु महायज्ञ के समय प्रकाशित की गयी थी। इसमें लाफ़ागढ जमीदारी का जिक्र करते हुए पृष्ठ क्रं 121 पर लिखा है- लाफ़ा- कुल रखबा 359 वर्गमील, मकान संख्या 16,357, जमींदार का पद - दीवान, ग्राम संख्या - 86 । आगे वर्णन है - यह जमीदारी रतनपुर के उत्तर दिशा में फ़ैली हुई है। लाफ़ा का गढ, पाली का मंदिर, तुमान के खंडहर ये सब इसके प्राचीन वैभव हैं। इसका प्राचीन इतिहास नहीं मिलता।

विष्णु महायज्ञ की स्मारिका का पृष्ठ 121
जमींदार परिवार का कहना है कि - हम असल क्षत्रिय हैं, हमारा आगमन 100 वर्ष (शायद यह छपाई की त्रुटि है 1000 वर्ष होगा) से भी अधिक हुए दिल्ली से हुआ था। सबूत के लिए ये एक ताम्रपत्र पेश करते हैं। इस ताम्रपत्र में लिखा है कि - राज पृथ्वीदेव लुंगाराव को 120 गाँव प्रदान करते हैं। ताम्रपत्र में 806 की मिती पड़ी है। इस प्रकार लाफ़ा जमींदारी इस परिवार के अधिकार में 1173 वर्षों से है। रायबहादुर हीरालाल इस ताम्रपत्र को सच्चा नहीं मानते। मृत जमींदार का कथन था कि यह जमींदारी उनके वंश में 21 पुश्तों से चली आ रही है। जबकि उनका पिता केवल 16 पुश्तों का दावा करता था। पर ये दोनो आँकड़े गलत हैं।

श्री हेरम्बशरण सिंह लाफ़ागढ जमींदार
यदि यह सच भी मान लिया जाए तो 1173 वर्षों की लम्बी अवधि को 16 या 21 पुश्तों में बांट कर अपनी बातों पर लोगों का विश्वास संपादन नहीं करा सकते। लाफ़ागढ जमींदारी में पहाड़ अधिक हैं, निवासी अधिकतर मांझी, महतो, बिंझवार एवं धनुहार जाति के हैं। लाफ़ागढ जमींदारी से होते हुए एक सड़क रतनपुर को चली गयी है। इसी रास्ते से प्राचीन समय में मिरजापुर तक व्यापार होता था। इस जमींदारी में लोहा बहुत मिलता है, जिससे बहुत से अघरियों का गुजर-बसर हो जाता है। यहाँ की मुख्य पहाड़ियाँ चित्तौरगढ (जिस पर लाफ़ा ग़ढ का किला है) पलमा और धितौरी हैं। काम काज श्रीमती दीवानिन दुलौरिन कुंवरि देखती हैं। सरवराकार दीवान रामशरण सिंह हमारे महायज्ञ के सभापतित्व का कार्य बड़ी योग्यतापूर्वक अपनी माता जी के प्रतिनिधि स्वरुप करते रहे। महायज्ञ को सानंद संपन्न करने में जो सहायता आप लोगों ने दी है वह बहुमूल्य है। हम लाफ़ागढ जमींदार के वंशज श्री हेरम्बशरण सिंह से बात कर रहे थे। ये पिछ्ली पंचवर्षी में कोरबा जिला के जिलापंचायत अध्यक्ष थे। इनके चाचा लाल कीर्तीकुमार सिंह यहाँ से 3 बार विधायक बने।

संवत 806 का विवादित ताम्रपत्र
बातचीत में रस आने लगा, हमारे युवा छायाचित्रकार पंकज सिंह जमीदारी के चित्र लेने लगे। हेरम्बशरण सिंह मुझे कुछ विशेष दिखाना चाहते हैं। वे उठकर भीतर गए और साथ कुछ लेकर आए। दो पट्टियों के बीच बंधा हुआ ताम्रपत्र उन्होने मुझे खोल कर दिखाया। मैने ताम्रपत्र को देखा और प्रथम दृष्टया ही मुझे इसके नकली होने का आभास हो गया। तब मैने स्मारिका में लाफ़ागढ के विषय में नहीं पढा था। इसकी भाषा देवनागरी है, प्राचीन भाषाओं का मुझे ज्ञान नहीं है पर प्रत्युत्पन्न मति से मैने खोपड़ी खुजाई। ताम्रपत्र में संवत 806 लिखा है वर्तमान में 2069 संवत चल रहा है अर्थात यह ताम्रपत्र 1263 वर्ष पूर्व टंकित किया गया था।

 गरमा गरम चर्चा
मैने ताम्रपत्र का भली भांति निरीक्षण किया। यह मशीन से निर्मित तांबे की प्लेट पर टंकित है। मशीन से निर्मित होने का अनुमान इसलिए है कि इसकी मोटाई सब तरफ़ एकसार है। 1263 वर्ष पूर्व ऐसी कोई मशीन नहीं थी जिससे तांबे की एकसार प्लेट बनाई जा सके। उस समय हथौड़े से पीट कर तांबे को फ़ैलाया जाता था। जिससे वह प्लेट कहीं मोटी और कहीं पतली होती थी। तथा हथौड़े की चोट के निशान उस पर स्पष्ट दिखाई देते थे। मैने कहा कि यह ताम्रपत्र मशीन से बना हुआ है। उन्होने भी स्वीकार किया कि कुछ लोग कहते हैं यह ताम्रपत्र असली नहीं है। पर मेरे पूर्वजों से मुझे यही प्राप्त हुआ है।

 एरमशरण सिंह जी का निवास
हेरम्बशरण सिंह सरल स्वभाव के गंभीर व्यक्ति हैं। उन्होने बताया कि कोरबा पुरातत्व संग्रहालय को उन्होने बहुत सामान दिया है। मैने सोचा कि बहुत का अर्थ बहुत होता है, शायद ट्रक भर के। उनका कहना था कि दो तलवार, एक कालीन, 2 फ़ोटो, 5 मूर्तियाँ उन्होने पुरातत्व संग्रहालय को दी। ये भी अच्छा रहा कम से कम कुछ तो पुरातत्व संग्रहालय के पास पहुंचा। जिससे लाफ़ागढ का नाम भी वहाँ प्रदर्शित हो गया। लाफ़ागढ का सरपंच इनके परिवार का ही कोई सदस्य है। घर के सामने जंग लगा हुआ एक ट्रेक्टर भी खड़ा है। हम लोगों की चर्चा को अरविंद झा डायरी में लिखते जा रहे हैं।

जमींदारी के खंडहर
हम लोगों को यहाँ लगभग एक घंटा हो गया था अगर एक अदद चाय मिल जाती तो बातचीत का आनंद आ जाता। शायद जमींदार साहब ही पिला दें। लेकिन जितनी देर हम रहे अंत:पुर से किसी के चाय लाने की आहट सुनाई नहीं दी। पंकज अब हमारे फ़ालतु झमेले से ऊब गया है लगता है। उसके चेहरे से ऊब झलकने लगी, अगर हम उठ कर नहीं चलते तो शायद देशी तमंचे की तरह फ़ट पड़ती। हमने हेरम्बशरण सिंह से विदा ली। उन्हे अपना पता ठिकाना दिया और उनसे मोबाईल नम्बर लिया। उन्होने मोबाईल के दो नम्बर लिखाए।

मंदिर का शिखर
हम पुन: पाली की ओर चल पड़े। लाफ़ागढ से बाहर निकलने पर दोराहा आता है, दायीं तरफ़ का रास्ता पोंडी जाता है और बांए तरफ़ का पाली। यहीं पर हमारी भेंट कोटवार लक्षमण दास से हुई। हमारे गाड़ी रोकने पर कोटवार लक्ष्मण दास ने कोटवारी सलाम बजाया। मैने सोचा कि लाफ़ागढ के बारे में कोटवार से अधिक कोई नहीं जान सकता। इसकी कई पीढियों से कोटवारी का काम चला आ रहा है। लेकिन इलाके की जानकारी के विषय में बोदा ही निकला। हाँ इससे गाँव के किसी भी व्यक्ति की जानकारी ली जा सकती थी।

 लक्ष्मणदास कोटवार
इनकी नजर तो लोगों पर ही रहती है जिसकी सूचना सप्ताह में एक बार थाने में जाकर देनी पड़ती है। मैने पूछा कि तुम्हारे गांव में लाफ़ा के मंदिर के अतिरिक्त और कौन-कौन से देवी-देवता हैं तो उसने बताया, रक्सा, बुड़हर, महामाया, ठाकुरदेवता, चूल्हादेव, अगिनदेव इत्यादि हैं। बाकी के विषय में बैगा से जानकारी मिल सकती है। अब इतना समय नहीं था कि हम बैगा से जानकारी लेने जाएं। लक्ष्मण दास को राम-राम करके हमने पाली का रास्ता पकड़ा। अरविंद के चेहरे पर अब राहत के भाव दिख रहे थे क्योंकि चल पड़े तो अब बिलासपुर पहुंच कर ही दम लेगें। आगे पढें……

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें .......ललित शर्मा

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें........ वर्ष २०१२ आप सभी के लिए मंगलकारी हो.


गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

बंदरों की ब्लॉगरी मौज -- ललित शर्मा

पहले भी अयोध्या आया था, तब भी देखा था, अभी भी देखा है, बदला कुछ भी नहीं है, वही विक्रम की सवारी, पहले दो-दो रुपए लेते थे अब 5-5 और 10-10 लेने लगे हैं, लिट्टी चोखा का ठेला, बिड़ला धर्मशाला के समीप होमियोपैथी के डॉक्टर की दुकान, पुलिस चौकी, जलेबी और इमरती की दुकान, सड़क पर घूमते हुए आवारा पशु, गंदगी से बजबजाती हुई नालियाँ। सरयु के तट पर फ़ैली हुई गंदगी, छतरी लगाए पाटे पर बैठे पंडे। हवा के साथ उड़ती हुई पालीथिन की खाली थैलियाँ। चिलम फ़ूंकते साधु वेषधारी असाधु। चेले-चेली मुंडते संत महंत। नगो-पत्थरों की दुकानें, सुग्गा ज्योतिषियों का पसरा, सुरमा बेचते लोग, हरी काई रची पुरानी इमारतें। लोगों का सामान लूटते बंदर। कुछ नहीं बदला है। बदलने की बजाए कुछ जुड़ा है तो एक सायबर कैफ़े,बिड़ला धर्मशाला के समीप। सायबर कैफ़े का मिलना एक ब्लॉगर के लिए सुखद रहा।
यहाँ के बंदरों की तो बात ही मत पूछिए। आँखों से काजल चुराने जैसी बात है। अगर आपका ध्यान कहीं भटका और तनिक असावधान हुए तो आपकी आँखों पर लगा चश्मा भी गायब हो सकता है। आप मुंह फ़ाड़े देखते रह जाएगें।पिछली बार जब हम राम लला के दर्शन करने जा रहे थे, तब जाली वाले गेट के पास एक बंदर ने कमलेश का एक हाथ पकड़ लिया और अपना एक हाथ उसकी पैंट की जेब में डाल दिया। मैं आगे चल रहा था, पीछे से कमलेश आवाज दे रहा था, अंकल-अंकल! मैने पीछे मुड़ कर देखा तो नजारा देखने लायक था। कमलेश के चेहरे से हवाईयाँ उड़ रही थी। बंदर ने उसे काबू में कर रखा था। मैने बंदर को घुड़की थी, मतलब उसकी बोली में समझाया तो उसने कमलेश की जेब में रखी टिकिट की फ़ोटो स्टेट कापी निकाल ली और भाग गया। एक आदमी ने प्रसाद चढाने के लिए हाथ में रखा था, उसे लेकर भाग गए। वह आदमी हड़बड़ा गया। राम लला की सुरक्षा करने के लिए सुरक्षा बल तैनात हैं। एक-एक आदमी की खाना तलाशी लेते हैं। मैटल डिटेक्टर से लेकर मैनुअली भी चेक करते हैं, साथ ही बंदर भी सुरक्षा जांच में अपनी भूमिका निभाते हैं। बची-खुची जाँच ये पूरी कर लेते हैं।

एक व्यक्ति ने कहा कि सुरक्षा बलों की ड्यूटी सरकार ने फ़ालतू ही लगा रखी है। सारी जाँच तो बंदर ही पुरी कर लेते हैं। मजाल है कोई कुछ लेकर भीतर चला जाए। एक बार कोई सायकिल पर टिफ़िन लेकर जा रहा था, बंदर ने उसका टिफ़िन छीन लिया। बंदर द्वारा टिफ़िन छीनते ही वह व्यक्ति सायकिल छोड़कर भाग गया। टिफ़िन खोलने पर उसमें से विस्फ़ोटक पदार्थ निकला। जो सुरक्षा बल नहीं पकड़ पाए, उसे बंदरों ने पकड़ लिया। रामलला का एक अघोषित अदृश्य सुरक्षा घेरा बंदरों का भी है, लगता है जिसे तोड़ पाना किसे के बस की बात नहीं। मेरे सामने ही एक महिला का पर्स ले भागे, पेड़ पर चढ कर उसे फ़ाड़ दिया और उसका सामान एक-एक करके उड़ाते रहे वह महिला सामान बिनती रही। उसके पर्स में रुपए भी थे उसे भी फ़ाड़ कर फ़ेंकते रहे। एक व्यक्ति ने भजनों की सीडी खरीदी थी, वह थोड़ा असावधान हुआ और उसके हाथ की सीडी ले उड़े। चाहे सामान उनके काम का हो या न हो व्यक्ति के असावधान होते ही हाथ मार देते हैं।

हमारे साथ की महिलाएं इन बंदरों से बहुत परेशान थी, काकी के ने आधा किलो सेव लिए थे, उसकी थैली हाथ में धरे थी कि कहीं बैठ कर खाई जाएगी। मंदिर कार्यशाला से आते हुए हम मणिराम दास की छावनी की ओर जाने वाले गली में जैसे ही मुड़े वहां 100 से अधिक बंदरों ने रास्ता घेर रखा था। महिलाएं उस रास्ते पर जाने से डर रही थी, मैने बंदरो को घुड़की दी, हाथ में ले रखी छड़ी से डराया तो पेड़ की डाल पर चढ गए, कोई मुंडेर पर बैठ गया, हम चौकन्ने होकर गली पार करने लगे। काकी ने सेव की थैली पीछे हाथ करके साड़ी में छिपा ली। पता नहीं कहां से एक छोटी सी बंदरिया आई और थैली पर झपट्टा मार कर भाग गयी। काकी देखते ही रह गयी। उसका ध्यान बड़े बंदर पर था पर कमाल छुटकी बंदरिया कर गयी। इनका गिरोह अपने इलाके में रहकर ही वारदात करता है। दुसरे के इलाके में जाने पर इनमें युद्ध भी होता है। कई बंदर तो हाथ-पैर भी गंवा चुके है। पर खाने के लिए उद्यम तो करना ही पड़ता है।

पान ठेले वाले ने बताया कि बंदरों की टोलियाँ पूरे नगर में घूमते रहती हैं। जिसका घर खुला दिखा तो पूरी सेना ही भीतर घुस कर उसे तहस नहस कर देती है। कपड़े भी बाहर सुखाना मुश्किल है। पता नहीं दुबारा मिलेगें कि नहीं। हड़काने पर काट लेते हैं, नोच लेते हैं। बंदरों ने बड़ा आतंक मचा रखा है। यही हाल फ़ैजाबाद नगर का भी है। वहाँ भी बंदरों के आतंक से लोग त्रस्त हैं। बताते हैं कि बंदरों के विरुद्ध 10 हजार शिकायत पत्र फ़ैजाबाद के डीएम के दफ़्तर में जमा हैं, इन शिकायत पत्रों से डीएम का दफ़्तर अटा पड़ा है। जिला अस्पताल में एक महीने में बंदरों द्वारा काटे जाने के सौ-दो सौ मामले आ जाते हैं। लगभग इतने ही मामले प्राईवेट अस्पतालों में जाते हैं। मंदिर-मस्जिद मुद्दे से अधिक बड़ा अयोध्या वासियों के लिए बंदरों से मुक्ति का मुद्दा है। इसके लिए जन अभियान चलाने जैसी योजना भी सामने आ रही है। बताते हैं कि इस इलाके में 20 हजार से अधिक बंदर हैं। इन्हे शहर से अलग बसाने के लिए अभ्यारण्य तैयार करने की मांग उठने लगी है।

भारत में बंदरों के साथ धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है, इसलिए बंदरों को मारा नहीं जाता, कोई भी इन्हे हानि नहीं पंहुचाता, तभी बजरंग बली की यह सेना बेखौफ़ होकर नगर में लूट-पाट करते फ़िरती है। शहर के बीच-बाजार में कहीं पर भी फ़ल फ़्रूट की दुकान के पास आपको देख कर दांत किटकिटाते मिल जाएगें। स्टेशन पर लगी हुई टीन की चद्दरों पर धमाचौकड़ी करते हुए इनका दल यात्रियों को डराते-सहमाते रहता है। चलती गाड़ी के डिब्बों पर चढ कर करतब दिखाते हैं। यहाँ के निवासियों को तो बंदरों के कारनामे झेलने की आदत पड़ गयी है, पर बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों से इनका मिलना त्रासदी पूर्ण ही है। कुछ लोगों की पेट रोजी ये बंदर ही चला रहे हैं। लोगो ने बंदरों का दाना बेचने की दुकाने खोल रखी हैं जहाँ से खरीद कर श्रद्धालु इन्हे भक्ति भाव से खिलाते हैं। पर बंदर आखिर बंदर ठहरे, अपनी आदतों से बाज नहीं आते। बंदरों को भी ब्लॉगरी मौज लेने की आदत पड़ गयी है। पहले तो चलते आदमी को छेड़ते हैं,फ़िर उसके खिसियाने पर पेड़ की डाल पर बैठ कर दांत निपोरते हुए मौज लेते हैं। यही सलाह है कि  बंदरों बच के रहें तभी सही है अन्यथा बंदर तो ...........।

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

पिशाच मोचन इमरती लिट्टी-चोखा और गुगल सर्च ईंजन--- ललित शर्मा

हमें जो ऑटो वाला मिला था वह बहुत अच्छा आदमी था, उसने हमें भरत कुंड पहुंचाया, मैने उसे सबके लिए चाय बनवाने कहा और हम मंदिर दर्शन के लिए चल पड़े। मंदिर में पहुचने पर एक जगह लिखा था "भरत गुफ़ा" । बताया गया कि यहाँ भरत जी ने गुफ़ा में रहते थे। कहते हैं कि राम-भरत मिलाप के पश्चात भरत खड़ाऊं लेकर फैजाबाद मुख्यालय से 15 कि. मी. दक्षिण स्थित भरतकुंड नामक स्थान पर चौदह साल तक रहे। भरत कुंड एक ग्राम है जिसे नंदीग्राम कहा जाता है। इस मंदिर से लगा हुआ एक मंदिर और भी वहां भी भरत गुफ़ा बनी हुई  है। हमारे एक साथी ने दोनों गुफ़ाओं के विषय में पूछा तो पुजारी ने कहा कि कुछ नगद दिखाओगे तभी जानकारी बाहर निकलेगी। मुफ़त मे कुछु नही मिलेगा। पूछने वाला भी तेली था, न उसने नगद दिए और न पुजारी ने जानकारी उगली। तभी एक बोलेरो वाला मंदिर के गेट को ठोक कर सपाटे से भाग निकला। उसकी स्पीड इतनी थी कि वह कहीं भी दुर्घटना कर सकता था। उसके साथ बालाघाट के दर्शनार्थी थे, उनकी बोली से लग रहा था। 

भरत कुंड
यहां से लगा हुआ ही एक कुंड हैं जहाँ  हर साल चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को मेला लगता है। मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। कुंड कई एकड़ में फ़ैला हुआ है, जलकुंभी ने कुंड पर कब्जा कर रखा है, और बंदरों ने आतंक फ़ैला रखा है,  किसी के भी हाथ में जो कुछ दिखा उसे झपट्टा मार कर ले ही जाना है। हमारा इरादा पाप नष्ट करने का नहीं था, अभी कल ही तो सरयू स्नान कर सारे पाप धो लिए थे। पाप नाशक स्नान को मैं कम्पयुटर के एन्टीवायरस प्रोग्राम से ही जोड़ कर देखता हूं, एक बार स्केन याने स्नान कर लो फ़िर सारे पापरुपी वायरस का सफ़ाया हो जाता है। "न सौ काशी न एक पिचाशी।" इन्हीं किंवदंतियों के बीच नंदीग्राम का एतिहासिक पिशाची मेला चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को बदस्तूर जारी है। कुंड से वापस आकर हमने होटल में चाय पी, चाय पीने वाले कम थे और चाय अधिक हो गयी थी, होटल वाले ने 3 चाय वापस लेने से मना कर दिया, प्रताप ने दो चाय ली और मैने भी, मामला फ़िट हो गया।चाय वापस नहीं करनी पड़ी।

भरत कुंड के यात्री
नंदीग्राम भरतकुंड पिशाची के बारे में दो तरह की किंवदंतिया हैं पहली यह कि लंका में युद्ध के दौरान जब मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे तो हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने भेजा गया था। बूटी की पहचान न होने के कारण वह पहाड़ उठाकर ही लंका की ओर चल पड़े। जब वे अयोध्या के ऊपर से जा रहे थे तो कुछ देर के लिए समूचे क्षेत्र में अंधकार छा गया। आसमान की ओर देखने पर किसी दानव शक्ति द्वारा अयोध्या पर आक्रमण किए जाने की आशंका में भरत जी ने बाण चला दिया। बाण लगने के कारण हनुमान जी पर्वत समेत गिर गए थे। पुजारी हनुमान दास कहते हैं कि जिस स्थान पर हनुमान जी गिरे थे वहां कुंड बन गया था। उसी को पिशाच मोचन कुंड के नाम से जाना जाता है। दूसरी किंवदंती है कि लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ब्रह्मा हत्या के पाप से मुक्त होने से लिए पिशाच मोचन कुंड में स्नान किया। इस कारण पिशाच मोचन कुंड की मान्यता है कि न सौ काशी न एक पिशाची।

मणि पर्वत का शिलालेख
अब यहाँ से हम वापस चल पड़े अयोध्या की ओर, ऑटो चालक से पूछ कि बीच में और कुछ दर्शनीय स्थल हो तो वह भी दिखा दे। तो उसने बताया की रास्ते में मणिपर्वत मिलेगा। मैने कहा कि - मणिपर्वत चलो, वहीं तुम्हारा भाड़ा भी सकेल कर दे देगें। वह तैयार हो गया। हम मणिपर्वत पहुंचे। एक ऊंचा सा टीला है जिसपर मंदिर बना है, यहां के पुजारी ने बताया कि जब सीता जी जनकपुरी से वापस आई थी तब यहीं पर मणियों का पर्वत बना कर सीता जी झूले में झुलाया गया था। यहाँ प्रतिवर्ष सावन मेला लगता है, जिसमें अयोध्या के साते देवी देवता झूला झूलने आते हैं यह उत्सव 12 दिन चलता है। इस उत्सव के लिए प्रशासन सारी व्यवस्था करता है। मेले में लाखों श्रद्धालु सावन झूला पर्व मनाने  आते हैं। यह स्थान भारतीय पुरातत्त्व के संरक्षण में है। इस मंदिर में कई शंख रखे हैं, जिनमें एक शंख को पांच्जन्य शंख भी बताया गया है।

दीवारों पर वाल्मीकि रामायण
मणि पर्वत के दर्शन कर के हम मणिराम की छावनी पहचें। वाल्मीकी रामायण मंदिर भी खुल चुका था।  वाल्मीकी रामायण भवन का निर्माण मंहत नृत्यगोपाल दास जी ने कराया था। 1956 में प्रारंभ होकर दस वर्षों में इसका निर्माण 1966 में पूर्ण हुआ, यहां दुनिया का अनोखा रामायण बैंक है, यहां अभी तक 164 अरब से अधिक राम नाम जमा हो चुके हैं।इस बैंक का नाम है 'अंतरराष्ट्रीय श्री राम नाम बैंक।' इस बैंक में राम नाम जमा कराने पर ब्याज भले ही न मिलता हो मगर सच्चा आनंद अवश्य मिलता है। अंतरराष्ट्रीय श्री राम नाम बैंक की स्थापना वर्ष 1963 में अयोध्या में नृत्य गोपालदास महाराज द्वारा की गई थी। गाजियाबाद में इसकी शाखा की स्थापना प्रख्यात संत व कथावाचक डोंगरे जी महाराज ने घंटाघर स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद्‍भागवत कथा के दौरान की थी। आज इस बैंक की देश-विदेश में मिलाकर 125 से अधिक शाखाएँ हैं। गाजियाबाद के हनुमान मंदिर में इसकी 42वीं शाखा है।

पाञ्चजन्य शंख
बैंक में खाता खोलने के लिए किसी कागजात की नहीं बल्कि राम नाम की जरूरत है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिला या पुरुष कोई भी, किसी भी भाषा में सवा लाख सीताराम या राम नाम लिखकर बैंक में अपना खाता खोल सकता है। इतना ही नहीं, जो भक्त नियमित रूप से राम नाम लिखता है, वह बैंक का स्थायी सदस्य बन जाता है और उसे बैंक की तरफ से पास बुक व सदस्यता प्रमाण पत्र भी दिया जाता है। एक करोड़ राम नाम लिखने वाले भक्त को स्वर्ण पदक, पचास लाख राम नाम लिखने वाले को रजत पदक व 25 लाख राम नाम लिखने वाले को काँस्य पदक से सम्मानित किया जाता है। 25 वर्ष की आयु में ही 15 लाख नाम लिखने पर भी काँस्य पदक मिलता है। राम नाम लिखने के लिए वैसे तो बैंक से ही कॉपी मिलती है मगर निजी कापी या डायरी आदि में भी राम नाम लिखकर बैंक में जमा कराया जा सकता है। राम नाम लिखी कॉपियों को अयोध्या स्थित 'श्री वाल्मीकि रामायण भवन' में सुरक्षित रखा गया है। 

गरमा गरम इमरती
रामायण भवन से दर्शन करके हम पुन: उसी रास्ते पर निकल पड़े, रास्ते में एक दर्जी अंगरखा सील रहा था, एक साधु अंखरखे का ट्रायल ले रहा था, मेरे भी मन में एक अंगरखा डोरी वाला सिलाने की आई, लेकिन देर हो चुकी थी। अगर यह दर्जी सुबह दिख जाता तो शाम तक अंगरखा तैयार हो सकता था। अब समय नहीं था, अंगरखा सिलाने की अधुरी इच्छा को फ़िर कभी पर टाल कर आगे बढे, मुख्य मार्ग पर आने तब जोर की भूख लग चुकी थी। एक होटल में गर्मागरम इमरती बन रही थी। लालच आ ही गया, क्या करुं कंट्रोल ही नहीं होता। साथियों से पूछ कि नास्ता करना है क्या? सभी ने न में जवाब दिया, मैं होटल में पहुंचा, इमरती सौ रुपए किलो थी, होटल का नाम सौरभ होटल, एक पाव इमरती ली, एक पाव में 10-12 इमरतियाँ तो चढ गयी। तीना चार इमरतियाँ होटल में  ही खड़े-खड़े उदरस्थ की, बाकियों को थैली में बंद करके आगे बढे, मुझे इमरतियाँ लेते देख कर दो चार साथियों ने भी खरीदी। मैने सभी से खाने के विषय में पूछा तो उन्होने सभी का खाना गायत्री मंदिर में बनना बताया। सबको लेकर जब गायत्री मंदिर पहुंचा तो देखा कि वहां कुछ लोगों का ही खाना बन रहा है। अब मेरी बात न मानने की सजा भुगतो। कह कर मैं बिरला धर्मशाला की ओर बढ लिया।

गुगल सर्च इंजन पर ललित शर्मा
रास्ते में दो जगह लिट्टी चोखा मिल रहा था। एक जगह तली हुई बाटी थी, आलू के साग के साथ, दूसरी जगह भुनी हुई बाटी दिखाई दी। मैने दोनो ले ली। अब खाने की जरुरत नहीं थी इनसे ही काम चल जाएगा। रास्ते में सुबह वाला सायबर कैफ़े दिखाई दिया। फ़िर क्या था? घुस गए सायबर कैफ़े में। सायबर कैफ़े के संचालक ने आईडी मांगी। आई डी कार्ड सब मेरे बैग में पड़े थे, मैने कहा कि गुगल पर मेरा नाम सर्च के देखिए। जब उसने हिन्दी में "ललित शर्मा" सर्च किया तो 3 सेकंड में ढाई लाख से उपर लिंक दिखाई दिए और जैसे ही इमेज सर्च की तो सैकड़ो फ़ोटो मेरी सर्च इंजन ने निकाल कर धर दी। उसे देखकर संचालक ने कहा कि "अब आपकी आई डी की जरुरत नहीं है, आप तो गुगल में सर्वत्र व्यापक हैं। चलाईए इंटरनेट, ब्लॉगिंग का यह फ़ायदा हुआ। अब पहचान पत्र रखने की आवश्यकता नहीं है। हमारी पहचान गुगल पर स्थापित हो चुकी है। कैफ़े से मेल आदि चेक किए और ब्लॉग पर दो फ़ोटो लगा कर अपने रुम में पहुचा। पंकज का चेतन भगत से पीछा नहीं छूटा था, कह रहा था कि बड़ा बोरिंग उपन्यास है, उपन्यास का नाम मैं भूल रहा हूँ। दोनो ने लिटी चोखा खाया इमरती के साथ और मैं आम्रपाली के सपनों में खो गया।-- आगे पढें

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

मिलते हैं ब्रेक के बाद ------------- ललित शर्मा

अयोध्या से


फिर मिलते हैं घर पहुँच कर ............. 

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

मृत्यु का उत्सव -- पंछी उड़ जाना ---- ललित शर्मा,


कफ़न बढा तो किसलिए नजर तू डबडबा गई, सिंगार क्यों सहम गया बहार क्यूँ लजा गई.
न जन्म न मृत्यु बस इतनी सी बात है, किसी की आँख खुल गई किसी को नींद आ गई


मृत्यु पर किसी का बस नहीं चलता, होश संभालने के बाद यही सुना पढ़ा और समझा है. दुनिया इसे ही शास्वत सत्य बताती है. एक दिन इसका आना तय है. किस दिन आएगी यह तय नहीं है. लेकिन आएगी जरुर ये मानते है. मृत्यु ही एक ऐसी शै है जिसका भय ही मनुष्य और पशु को अलग करता है, ग़ालिब ने कहा है - मौत ने कर दिया लाचार वगर्ना इंसा, है वो खुदबी के खुदा का भी कायल न होता. मनुष्य और पशु के जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया एक जैसी है. मनु स्मृति कहती है- जन्मने जायेते शुद्र: संस्कारात द्विज उच्यते.... संस्कार मिलने के पश्चात ही मनुष्य कहलाया है. जिसे मृत्यु का बोध हो गया. मृत्यु क्यों और कैसे होती है? विभिन्न धर्म दर्शनों में स्वमतानुसार उल्लेख है. पर मृत्यु आती है यह सभी मानते हैं. देह का अवसान होता है. कहते हैं जरा के पश्चात मृत्यु आती है और कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी घट जाती है. इसलिए राजकुमार सिद्धार्थ को जरा एवं मृत्यु के दर्शन नहीं कराए. एक दिन उन्होंने ने जरा एवं मृतक दोनों को देख लिया और बुद्ध हो गए. वैराग आ गया. सिद्धार्थ का वैराग स्थायी था. पर श्मशानी का वैराग अस्थायी होता है.. 

कभी कभी ऐसे वाकये घटते हैं कि कठिन प्रश्नों के जवाब सरलता से मिल जाते हैं. मित्र  के पिताजी गुजर गए थे और मुझे सुबह समाचार मिला. अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने पंहुचा. वे अपने कार्य से सेवानिवृत हो चुके थे. कैंसर से उनकी मृत्यु हुयी. सारे नाते रिश्तेदार जार-जार रो रहे थे. कोई दहाड़ें मार कर छाती कूट रहा था. हम उन्हें सभालने में लगे थे. मित्रों का काम यही होता है, जो सुना सुनाया, रटा रटाया था, वही उनको कह कर दिलासा दे रहे थे. पंडित जी के आने के बाद कार्यवाही प्रारंभ हुयी. अर्थी उठा कर श्मशान में पहुचे. सभी गंभीर मुद्रा में मृतक के परिजनों से सहानुभूति रख रहे थे. तभी राम नाम सत्य की जोरदार आवाजें आने लगी. देखा तो एक और अर्थी पहुच रही है. वे कह रहे थे-- "राम नाम सत्य है, खाया पीया मस्त है." मैंने इस तरह का उद्घोष पहली बार सुना था जीवन में. न जाने कितनो की अंतिम यात्रा में शामिल हुआ. लेकिन इस तरह नाद नहीं सुना था. पता चला कि किसी जवान की ही अर्थी थी. आश्चर्य चकित रह गया. एक तरफ लोग वृद्ध की अर्थी पर अभी तक रोये जा रहे हैं. दूसरी तरफ जवान की मृत्यु पर उत्सव जैसा माहौल है.

देखने से लग रहा था कि छोटे तबके के लोग हैं. सभी खा पीकर दारू की बोतले साथ में लेकर साथी के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. मै बैठे बैठे सोचने लगा कि इन्होने ही मृत्यु के रहस्य को पाया है. जीवन अगर उत्सव है तो मृत्यु भी उत्सव होना चाहिए. जिसकी जितनी साँस थी इस दुनिया में उसने अपनी सांसे पूरी कर ली. फिर किस चीज का शोक मनाना? उसकी जीवन यात्रा का उत्सव मनाना चाहिए. जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना. सभी का अपना अपना दृष्टिकोण है. कोई डूबते सूरज को देख कर रोता है और कोई हँसता है. रोने वाला सोचता है कि जिंदगी का एक दिन कम हो गया. हंसने वाला सोचता है कि जिन्दगी का एक दिन और अच्छे से जी लिया, ईश्वर तुम्हे धन्यवाद है, तुम्हारा आभार है. यही मृत्यु के शोक पर प्रगट होता है. कुछ लोग सोचते हैं कि कुछ दिन जीवन का उपभोग और कर लेते. जल्दी चले गए दुनिया से. कुछ लोग सोचते हैं कि सांसारिक जीवन का उपभोग अच्छे से कर लिया. अब चला भी जाये तो कोई अफ़सोस नहीं है. साथियों को उत्सव मनाना चाहिए. 

"नवानि देहानि जीर्णानि विहाय" जब भगवान ने गीता में उपदेश दिया है कि "नैनम छिदंति शास्त्राणि नैनम दहति पावक: न क्लैदयन्ति राप: न शोषयति मारुत:" आत्मा अजर अमर अविनाशी है. उसे शरीर बदल कर फिर आना है. जब फिर आना है तो शोक किस चीज का मनाते हैं. नवीन देह को प्राप्त करने का उत्सव होना चाहिए. रो कर विदा करने की बजाये  हंस कर विदा करने. हम नए कपडे धारण करते हैं तो उत्साह और उत्सव होता है. जीर्ण देह को छोड़ कर नवीन देह को प्राप्त करने का उत्सव होना चाहिए. यह भी वैसी ही प्रक्रिया है जैसे हम अपने ब्लॉग का टेम्पलेट बदलते हैं. हमारा शरीर भी ब्लॉग जैसा ही है. जिसमे बहुत सारे गजट और विगेट लगे हैं. जब कोई विगेट काम करना बंद कर देता है तो उसे हम हटा देते हैं, नया लगा लेते हैं या उस विगेट के बिना ही काम चला लेते हैं. अगर टेम्पलेट में कोई समस्या आती है तो हम तुरंत टेम्पलेट बदल लेते हैं. पुराने टेम्पलेट का कोई शोक नहीं करते. नया टेम्पलेट लगा कर मित्रों को दिखाते हैं उसकी सुन्दरता के विषय में पूछते हैं. 

जीवन और मृत्यु के साथ भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए. जितने दिन जीये, रज्ज के जीये. मस्ती से जीये, मित्रों से, परिवार से मिलजुल के जीयें. ईश्वर की बनायीं सुन्दर सृष्टि के कण-कण का आनन्द लें. फूलों की महक से लेकर चिड़ियों की चहक तक. झरनों की कल-कल से लेकर मस्त पवन के झकोरों तक, बछड़े की उछल कूद से लेकर बाल गोपालों की लीला तक प्रकृति का सौंदर्य बिखरा पड़ा है. इतना अद्भुत सौदर्य है कि आंखों में भी नहीं समाता. अपलक देखते रहते हैं उस अद्भुत कारीगर की कारीगरी को, चित्रकारी को. बड़े-बड़े राजपाट धराशायी हो गए. अपने को चक्रवर्ती राजा साबित करने वाले नहीं रहे. जो अच्छा था उसे अभी सहस्त्राब्दियों बाद भी याद किया जाता है, जो बुरा था उसे भुला दिया जाता है, वैसे भी हमारी संस्कृति में मरने के सारे अवगुण माफ़ कर दिये जाते हैं. अगर कोई कीड़े पड़ के भी मरता है तो उसके नाम के साथ स्वर्गवासी ही लिखा जाता है. भले ही उसके सारे कार्य नरकगामी हों. जाने के बाद भी यादें मधुर हों. कटुता न हो, उत्सव हो. धन, पद, प्रतिष्ठा सब धरी रह जाती है. कौन कितना मिलनसार और जिंदादिल था यही सभी को याद रहता है. यदि कभी किसी को याद कर दिल में हूक उठे. तो समझो उसका जीवन सार्थक रहा और मृत्यु भी उत्सव.... 

कुछ विचारों की तरंगे उठी और उन्हें लिखता गया. इस पोस्ट को लिखने का कोई विशेष प्रयोजन नहीं है. खालिस खाली खोपड़ी की मगजमारी है. दिल पे मत लो यारों, वैसे भी मैं बड़ा सेंटी हूँ, बस मौजा ही मौजां  जीवन के दिन चार पंछी उड़ जाना, कर ले जतन हजार पंछी उड़ जाना. अरे भाई उड़ने के लिए उड़नतश्तरी भी चाहिए...........       
(फोटो-गूगल से साभार )  

सोमवार, 29 अगस्त 2011

अभी तो यह अंगडाई है, आगे और लडाई है............. ललित शर्मा

किसी को ना हो सका इसके कद का अंदाजा
आसमान है यह सर झुकाए बैठा है.........

रात को बादल गरज रहे थे, बिजलियाँ चमक रही थी. बादलों की गड़गड़ाहट कुछ अधिक शोर कर रही थी, जैसे बादलों में युद्ध हो रहा हो अपनी-अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए. बादलों के बीच नहीं, लेकिन संसद में अवश्य जन विश्वास कायम रखने की लडाई चल रही थी. भारत का नया इतिहास लिखा जा रहा था. एक फक्कड़ फकीर के ललकार से कानून बनाने पर सहमति हो रही थी. मुसलाधार बरसात होने लगी. तभी समाचार मिला कि फकीर की बात मान ली गई. सत्य कभी पराजित नहीं होता यह एक बार फिर सिद्ध हो गया. सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, का उपदेश भारतीय दर्शन ने दिया है और यह प्रत्येक काल में कसौटी पर खरा उतरा है. अगर इतिहास के पन्ने पलटे जाएँ तो दृष्टिगोचर होता है कि किसी भी क्रांति का नेतृत्व जमीन से जुड़े आदमी ने ही किया है और उसे सफल बनाया है. सत्य हलाकान परेशान होता है पर पराजित नहीं होता. असत्य कभी विजयी नहीं होता. दमन की उमर कम होती है. एक दिन उसे आत्म समर्पण करना ही पड़ता है. अन्ना के नेतृत्व में देश का आत्मबल परीक्षा में खरा उतरा. दूसरी आजादी की लडाई में एक कदम आगे बढे हैं. 16 अगस्त से प्रारंभ हुयी लडाई अभी ख़त्म नहीं हुयी है. अभी इसे आगे भी चलना है. जब तक देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग ना हो जाये, तब तक आजादी की दूसरी लडाई जारी रहेगी.

आजादी के बाद से लेकर आज तक हम अपने वोट से सरकार चुनते आये हैं. अपनी बात कहने के लिए प्रतिनिधि विधानसभा एवं लोकसभा में भेजते हैं. प्रतिनिधि चयनित होते ही ये व्यवहार बदलकर जनता के सेवक से जनता के मालिक बन जाते हैं. आम आदमी इसे ही अपनी नियति समझ कर  अपने भाग्य को कोसता रहता है. राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के समय ऐसे उम्मीदवारों की तलाश करती हैं जो धन से मजबूत हो. चुनाव में अधिक से अधिक धन खर्च कर सके. वोट खरीदने के बाद जन-धन को लूटना इनका अधिकार बन जाता है. साम-दाम-दंड-भेद सब लगा दिए जाते हैं चुनाव जीतने के लिए. व्यवस्था भी इन्होने अपने हिसाब से बदल ली, अगर किसी मतदाता के पास 10,000 रूपये नहीं है तो वह प्रत्याशी नहीं बन सकता. कुल मिलाकर धनवानों का ही पक्ष मजबूत है. भ्रष्ट्राचार इतना अधिक बढ़ गया कि आम आदमी का जीना मुहाल हो गया है. आम जन अगले ५ बरस का चुनाव का इंतजार करता है, जिससे वह प्रतिनिधि एवं सरकार बदल सके. अब देश में बदलाव की बयार आ गई, जनता अपने अधिकारों के प्रति अन्ना के सार्थक प्रयास से जागरूक हो रही है.

सेवक जब मालिक का व्यवहार करने लगे, आम मुख्तियार ही मालिक बन जाये तब असली मालिक को जागना ही पड़ता है. बाड़ ही खेत खाने लगी. ऊँचे स्तर पर हो रहे भ्रष्ट्राचार की खबर आम आदमी तक नहीं पहुचती. पर निचले स्तर पर छोटे-छोटे कार्यों के लिए पैसे देना उसे नागवार गुजरता है. आज जनता के दबाव ने दिल्ली को भ्रष्ट्राचार के खिलाफ कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया. सभी जानते हैं कि एक बिल पास कर संस्था के गठन से भ्रष्ट्राचार समाप्त नहीं हो जायेगा. इसके लिए नागरिकों को भी अपने कर्तव्यों ध्यान रखना पड़ेगा. संकल्प लेना पड़ेगा कि स्वयं भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा नहीं देंगे, न किसी से रिश्वत लेंगे न किसी को रिश्वत देंगे.भ्रष्ट्राचरण के विरुद्ध सतत आन्दोलन जारी रखना पड़ेगा. तभी भ्रष्ट्राचार रूपी दानव से पार पाया जा सकता है. भ्रष्ट्राचार से अमीरी और गरीबी के बीच गहरी खाई का निर्माण हो चूका है. अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और भी गरीब.  एक तरफ अन्न गोदामों में सड़ रहा है, दूसरी तरफ गरीब दाने - दाने को मोहताज है. उड़ीसा के कोरापुट में गरीबी से त्रस्त होकर एक आदमी ने २० हजार में अपने बच्चे को बेच दिया. इस युग में भी ऐसे समाचार सामने आते हैं तो पीड़ा होती है.

अन्ना के आन्दोलन में सरकार ने रोड़े तो खूब अटकाए पर जन समर्थन साथ होने के कारण मुंह की खानी पड़ी. आन्दोलन के दौरान अन्ना को भगोड़ा तथा भ्रष्ट्राचारी तक कहा गया. लेकिन कहने वालों ने अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखा, जब देखा तो उसे अपने पर शर्म आई और माफ़ी मांगने लगा. हमने भी देखा बुद्ध के समक्ष अन्गुलिकमाल का ह्रदय परिवर्तन कैसे होता है. अन्ना को धराशायी करने के लिए उसके फ़ौज तक के रिकार्ड निकाल लिए. कहीं कोई कमजोरी तो मिले, जिसकी ढाल बना कर अन्ना का अनशन तुडवाया जा सके. इनका बस चलता तो चलता तो चित्रगुप्त से अन्ना के पूर्व जन्म के भी रिकार्ड मंगवा लेते. वाह अन्ना! आपने इनके लिए कुछ भी नहीं छोड़ा. जीवन की पवित्रता, सुचिता और पारदर्शिता काम आ गई. संसार में चरित्रवान ही सबसे उंचा स्थान ग्रहण करता है. कहा गया है कि निर्धन, धनवान से डरता है, मुरख, विद्वान से डरता है, निर्बल बलवान से डरता है, लेकिन धनवान, विद्वान्, बलवान ये तीनो चरित्रवान से डरते हैं. अन्ना ने इसे सिद्ध करके दिखा दिया. निष्कलंक जीवन जी कर विश्व के समक्ष एक आदर्श कायम कर दिया.

मंहगाई की चक्की में पिसता आम भारतीय कभी सोच भी नहीं सकता था कि कोई ऐसा नेतृत्त्व भी उसके लिए आएगा जो गरीबी-गरीबों एवं मंध्यम वर्ग के लिए सर्वाधिकार प्राप्त सत्ता से टकरा जायेगा. सत्ता भी सोच बैठी थी कि बाबा का हश्र देख कर तो कोई दूसरा दिल्ली को आँख दिखाने की हिम्मत कर बैठेगा. दिल्ली ने भी अन्ना के साथ बाबा जैसा ही व्यवहार किया. यहीं गलती हो गई. कहते हैं ना..... जात भी दी और जगात भी दी. जन आक्रोश के सामने कुछ नहीं टिकता. जेल से भी सादर छोड़ना पड़ा और रामलीला मैदान भी देना पड़ा. सत्ता पोषित कुछ लोग आग उगलते रहे. कुछ जयचंदों ने भी आन्दोलन में सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सके. देश के कोने-कोने से भ्रष्ट्राचार और मंहगाई के विरोध में उठे जनज्वार ने अपनी उपस्थिती मजबूती से दर्ज कर दी. इन्हें औकात दिखा दी. संसद में बिल पर बहस करनी पड़ी, अन्ना की तीन मांगों पर सहमती जतानी पड़ी. यह भारत के गणतंत्र के स्वर्णिम दिन था.


नक्कार खाने में तूती की आवाज कौन सुनता है? यह कहावत सदियों से कही जाती है, लेकिन अब वक्त आ गया, तूती की आवाज भी बुलंद हो चुकी है और उसे सुनना ही पड़ेगा. ये वही सांसद और विधायक हैं जो अपने वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव पर बहस नहीं करते और उसे सर्व सहमती पारित कर दिया जाता है. लेकिन जब आम आदमी के अधिकारों के से जुड़े प्रस्ताव आते हैं तो उन्हें या तो पेश नहीं किया जाता या उसके मुद्दे पर संसद में कई फाड़ दिखाई देने लगते हैं. आम जन से जुड़े हुए कई प्रस्ताव संसद में धूल खा रहे हैं. जिसमे महिला आरक्षण जैसा महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी है. जन लोकपाल पास करने पर दबाव बनते ही संसद में बैठे कई नेताओं को अभी से अपने जेल जाने डर सताने लगा है.  देश की जनता जाग चुकी है, वह दिन भी शीघ्र आएगा जब भ्रष्ट्राचारियों को जेल में बाकी जीवन बिताना पड़ेगा. जनता अपने खून-पसीने की कमाई की पाई-पाई का हिसाब लेगी. अपने चुने हुए जन प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार जिस दिन जनता को प्राप्त हो जायेगा उस दिन आम आदमी को इनके दरबार में हाजिरी नहीं लगानी पड़ेगी, ये स्वयं चलकर उसके पास आयेंगे. 

अन्ना के आन्दोलन का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि इस आन्दोलन ने समस्त भारत को पुन: एक सूत्र में बाँध दिया. जे.पी. आन्दोलन के पश्चात् जन लोकपाल बिल के समर्थन में एक ऐसा आन्दोलन हुआ कि देश की जनता सड़कों पर आ गई. जिसमे बच्चे-बूढे-जवान, सभी धर्म, पंथों, एवं आधी आबादी महिलाon  ने भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई. एक दो छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ कर कहीं से भी हिंसा का समाचार नहीं मिला. जबकि कुछ लोगों ने उत्पात करने की भरपूर कोशिश की. यह हमारी सामाजिक समरसता और लोकतंत्र की जीत है, आम आदमी की जीत है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत है. बाहर खड़े किसी आदमी ने आवाज लगायी और उसकी आवाज संसद के भीतर सुनी गयी. ये जनता की जीत है. इस आन्दोलन पर समूचे विश्व की निगाहें लगी हुयी थी. उन्हें भी इस सफल अहिंसात्मक आन्दोलन से सीख मिली कि भूखा रह कर बिना हथियार उठाये अपनी मांगे मनवाई जा सकती है. अब देश के नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए सतत जागना पड़ेगा. तभी हमारे कामयाब लोकतंत्र का लोहा समूचा विश्व मानेगा. अभी तो यह अंगडाई है, आगे और लडाई है.