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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

प्राचीन बंदरगाह ....................... ललित शर्मा

प्राचीन बंदरगाह
महर्षि महेश योगी की जन्म भूमि पाण्डुका से आगे सिरकट्टी आश्रम से पहले मगरलोड़ और मेघा की ओर जाने वाले पुल के किनारे नदी में लेट्राईट को तोड़ कर बनाई गयी कुछ संरचनाएं दिखाई देती हैं।   मैने कयास लगाया कि यह अवश्य ही बंदरगाह है। नदी में उतर कर बंदरगाह का निरीक्षण किया एवं कुछ चित्र लिए। बंदरगाह की गोदियों में घूमते हुए कई तरह के विचार आ रहे थे। कौन लोग यहाँ से व्यापार करते थे? यह बंदरगाह किस समय बना? किसने बनाया? आदि आदि। इन प्रश्नो के उत्तर बाद में ढूंढेगे, पहले सिरकट्टी आश्रम देख लें, नाम तो बहुत सुना था पर देखा नहीं था। पैरी नदी के तट पर कुटेना ग्राम का सिरकट्टी आश्रम स्थित है। आश्रम का नाम सिरकट्टी इसलिए पड़ा कि यहाँ मंदिर के अवशेष के रुप में सिर कटी मूर्तियाँ प्राप्त हुई, जिन्हे बरगद के वृक्ष के नीचे स्थापित कर दिया। तब से इसे सिरकट्टी आश्रम के नाम से जाना जाता है।

सिर कट्टी आश्रम 
यहाँ बैरागी पुनीतराम शरण से चर्चा हुई। उन्होने बताया कि महाराज भुनेश्वरीशरण दास ने 16 वर्ष की आयु में सन्यास ले लिया था। उन्हे ग्राम कुटेना स्थित चंडी मां ने स्वप्न में इस स्थान की जानकारी दी। तो ग्राम वासियों के सहयोग के वे इस स्थान पर बैठ गए और यज्ञ करने लगे। आश्रम में स्थित सिरकटी मूर्तियाँ एक दीमक की बांबी से प्राप्त हुई थी। उन्होने बताया कि भुनेश्वरीशरण दास को कुछ द्रव्य के साथ दो शिवलिंग भी यहाँ प्राप्त हुए, जिसमें से पेड़ के नीचे एक स्थापित है, दूसरा मंदिर में स्थापित है। इस स्थान पर सुदूर प्रांतों  से संत आते हैं, संतों का आगमन 1963 से हो रहा है, अब वे यहीं स्थायी रुप से बस कर आश्रम की सेवा कर रहे हैं। आश्रम में जाति समाज वालों ने अपने भवन बना रखे हैं। यहाँ लगभग सौ अधिक गाय भैस हैं एवं आश्रम के नाम से लगभग 40-50 एकड़ जमीन है। जो कुटेना, पाण्डुका, जटिया सोरा, पोंड, गाड़ा घाट एवं फ़िंगेश्वर आदि गांवों में है।

प्राचीन बंदरगाह
अब चर्चा करते हैं बंदरगाह की, मानव सभ्यता का उद्भव एवं विकास समुद्र तथा नदियों के किनारे हुआ। जलमार्ग ही आवागमन एवं परिवहन का प्रमुख साधन था। प्राचीन काल में थलमार्ग से परिवहन कम ही होता था। जितनी भी प्राचीन राजधानियाँ एवं शहर हैं, सभी नदियों के तट पर ही स्थित हैं। अन्य राष्ट्रों से व्यापार जल मार्ग से होता था तथा वर्तमान में भी हो रहा है। वास्कोडिगामा, कोलंबस इत्यादि यायावर भी जल मार्ग से ही भारत में प्रविष्ट हुए। जल परिवहन द्वारा व्यापार करना थल परिवहन से कम लागत में हो जाता है। नाव एवं बड़े जहाजों के माध्यम से माल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता है। ऋग्वेद में जहाज और समुद्रयात्रा के अनेक उल्लेख है (ऋक् 1/25/7, 1/48/3, 1/56/2, 7/88/3-4 इत्यादि)। प्रथम मंडल (1-116-3) की एक कथा में 100 डाँड़ोंवाले जहाज द्वारा समुद्र में गिरे कुछ लोगों की प्राणरक्षा का वर्णन है। इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ऋग्वेद काल, अर्थात् लगभग 2,000 - 1,500 वर्ष ईसा पूर्व, में यथेष्ट बड़े जहाज बनते थे और भारतवासी समुद्र द्वारा दूर देशों की यात्रा करते थे। इन जहाजों के द्वारा लाए गए माल को उतारने के लिए गोदी या बंदरगाहों का निर्माण किया जाता था। छत्तीसगढ की प्रमुख नदी चित्रोत्पला गंगा महानदी के जल मार्ग से व्यापार होता था। महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगर राजधानी सिरपुर के उत्खन में व्यापार से संबंधित वस्तुएं एवं प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं। 

महानदी उद्गम स्थान - भीतररास 
चित्रोत्पला गंगा महानदी का उद्गम सिहावा नगरी के भीतररास ग्राम से हुआ है। भीतररास में महानदी दक्षिण की ओर प्रवाहित होती प्रतीत हुई। महानदी के उद्गम स्थान पर मेरा दो बार जाना हुआ। महानदी धमतरी जिले के सिहावा नगरी स्थित भीतररास ग्राम से निकल कर 965 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है। इसकी सहायक नदियाँ हसदो, जोंक, शिवनाथ, पैरी एवं सोंढूर नदियाँ है। पैरी, सोंढूर एवं महानदी का त्रिवेणी संगम पद्मक्षेत्र राजिम मे होता है। इस संगम पर कुलेश्वर (उत्पलेश्वर) महादेव का मंदिर है। जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को मेला भरता है, जिसे अब राजिम कुंभ का नाम दिया गया है। पैरी नदी का उद्गम मैनपुर से लगे हुए ग्राम भाटीगढ से हुआ है। पहाड़ी पर स्थित पैरी उद्गम स्थल से जल निरंतर रिसता है। अब इस स्थान पर छोटा सा मंदिर भी बना दिया गया है। पैरी और सोंढूर नदी का मिलन रायपुर-गरियाबंद मार्ग पर स्थित मालगाँव के समीप मुहैरा ग्राम के समीप हुआ है। यहाँ से चल कर दोनो नदियाँ महानदी से जुड़ जाती है। राजिम पद्मक्षेत्र पैरी नदी के तट पर स्थित है। 

डॉ विष्णु सिंह ठाकुर एवं यायावर 
पैरी नदी के तट पर कुटेना में स्थित यह बंदरगाह (गोदी) पाण्डुका ग्राम से 3 किलोमीटर दूर स्थित है। अवलोकन करने प्रतीत होता है कि इस गोदी का निर्माण कुशल शिल्पियों ने किया है। इसकी संरचना में 90 अंश के कई कोण बने हैं। कठोर लेट्राईट को काटकर बनाई गयी गोदियाँ तीन भागों में निर्मित हैं, जो 5 मीटर से 6.60 मीटर चौड़ी तथा 5-6 मीटर गहरी हैं। साथ ही इन्हें समतल बनाया गया, जिससे नाव द्वारा लाया गया सामान रखा जा सके। वर्तमान में ये गोदियाँ नदी की रेत में पट चुकी हैं। रेत हटाने परगोदियाँ दिखाई देने लगी। प्रख्यात इतिहासकार एवं पुरात्वविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर से इस विषय मेरी चर्चा हुई। उन्होने इसे चौथी शताब्दी ईसा पूर्व माना। बताया कि इस स्थान पर महाभारत कालीन मृदा भांड के टुकटे भी मिलते हैं। नदी से "कोसला वज्र" (हीरा) प्राप्त होता था तथा जल परिवहन द्वारा आयात-निर्यात होता था।

गरियाबंद मार्ग पर मालगाँव 
गरियाबंद 15 किलोमीटर पर पैरी नदी के तट पर स्थित एक ग्राम का नाम मालगाँव है। यहाँ नावों द्वारा लाया गया सामान (माल) रखा जाता था। इसलिए इस गांव का नाम मालगाँव पड़ा। मालगाँव में पैरी नदी के तट पर आज से लगभग 10-15 वर्ष पूर्व तक एक रपटा (छोटा पुल) था जो नदी में पानी आने के कारण वर्षाकाल में बंद हो जाता था। जिससे गरियाबंद से लेकर देवभोग एवं उड़ीसा तक जाने वाले यात्री प्रभावित होते थे। नाव द्वारा नदी पार कराई जाती थी और उस पार बस गाड़ी इत्यादि के साधन से लोग यात्रा करते थे। वर्तमान में इस नदी पर पुल बनने के कारण बरसात में भी मार्ग खुला रहता है। वर्षाकाल में रायपुर से देवभोग जाने वाले यात्री मालगाँव से भली भांति परिचित होते थे, क्योंकि यहीं से पैरी नदी को नाव द्वारा पार करना पड़ता था। यहाँ से महानदी के जल-मार्ग के माध्यम द्वारा कलकत्ता तथा अन्य स्थानों से वस्तुओं का आयात-निर्यात हुआ करता था। पू्र्वी समुद्र तट पर ‘कोसल बंदरगाह’ नामक एक विख्यात बन्दरगाह भी था। जहाँ से जल परिवहन के माध्यम से व्यापार होता था।  इससे ज्ञात होता है कि वन एवं खनिज संपदा से भरपूर छत्तीसगढ प्राचीन काल से ही समृद्ध रहा है। नदियाँ इसे धन धान्य से समृद्ध करते रही हैं।
प्राचीन बंदरगाह

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

आमचो बस्तर के साथ राजिम यात्रा ............. ललित शर्मा

राजीवलोचन मंदिर परिसर 
तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना ......... चलभाष गाने लगा, कोई बात करना चाहता है, चलभाष पर नया नम्बर दिखाई दिया। चलो बात कर लेते हैं, नम्बर नया हो या पुराना और कौन से हम किसी के कर्जदार हैं जो फोन पर नया नम्बर देख कर न उठाएं, हेलू.........सर! मैं राजीव रंजन बोल रहा हूँ, 14 अक्टुबर को रायपुर पहुँच रहा हूँ, आपके साथ राजिम और सिरपुर चलना है, साथ चलेगें तो अच्छा लगेगा।...... क्यों नहीं, जरुर चलेगें। फिर घरेलू बातचीत होते रही, कुछ चर्चा "आमचो बस्तर" भी हुई। हमने १६ तारीख का सुबह जल्दी चलकर जाने का कार्यक्रम बना लिया। इधर 15 तारीख को पितृमोक्ष अमावस्या थी और भाई अशोक बजाज की माता जी का बारहवां और पगड़ी रस्म भी। 14 को राजीव रायपुर पहुँच गए और हमारा कार्यक्रम पहले ही बन गया। १५ तारीख को राजीव रंजन "आमचो बस्तर" के साथ दोपहर मे अभनपुर पहुँच गए। इनके पहुँचने से पहले विवेक विश्वकर्मा डीजीएम बीएसएनएल पहुँचे हुए थे। हम सभी चाय पीकर अशोक भाई के यहाँ कार्यक्रम में पंहुचे। वहाँ प्रसादी का कार्यक्रम चल रहा था। अशोक भाई से मिलकर हम राजिम चल पड़े।

राजेश्वर-दानेश्वर मंदिर 
राजिम नगर सोंढूर-पैरी-महानदी के त्रिवेणी संगम पर रायपुर से 45 कि मी एवं अभनपुर से 18 कि मी  पर देवभोग जाने वाले मार्ग पर स्थित है। रास्ते  में हसदा के मोड़ पर साहू चाट वाला अपनी दुकान लगाए तैयार था, मन तो ललचाया, पर समय की कमी होने से आगे बढ़ गए। नयापारा पहुँच कर पहला काम खाने का किया। महानदी पार करके राजीव लोचन मंदिर पहुँचे। पहले राजीव लोचन मंदिर के ईर्द गिर्द लोगों ने कब्जा कर रखा था। दुकानों के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश करना पड़ता था। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। एतिहासिक मंदिर परिसर से अवैध कब्जा हटाने का एतिहासिक कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल के तत्कालीन अधीक्षण डॉ प्रवीणकुमार मिश्रा ने किया। आज राजीव लोचन मंदिर अपने पुराने रूप के करीब पहुँच चुका है। राजीव लोचन मंदिर महानदी (चित्रोत्पला गंगा) के पूर्वी तट  पर स्थित है। लोक मान्यता है कि  महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से मनुष्य के सारे कष्ट मिट जाते हैं और वह मृत्युपरांत विष्णु लोक को प्राप्त करता है। यहाँ का कुम्भ मेला जग प्रसिद्ध हो चुका है, यह मेला माघ मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि  जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक राजिम की यात्रा न कर ली जाए।

महामंडप, मुख्य द्वार एवं मूर्ति शिल्प 
महाशिव तीवरदेव के ताम्रपत्र एवं राजीव लोचन मंदिर से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि  राजिम के विष्णु मंदिर (राजीव लोचन) का निर्माण 8 वीं सदी में नलवंशी राजा विलासतुंग ने कराया था। शिलालेख में रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की कुछ विजयों का उल्लेख है। उनके सामंत (सेनापति) जगतपालदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। हम मंदिर के पश्चिमी द्वार पर पहुच गए। द्वार पर ही नारियल एवं पूजा सामग्री वालों ने अपनी दुकाने सजा रखी हैं। कार के रुकते ही पूजा सामग्री वाले झपट पड़े, मुझे देखते ही पहचान गए कि यह पण्डा कुछ नहीं देने-लेने वाला। मंदिर प्रांगण में निर्माण कार्य चल रहा है। आगामी नवम्बर की 19 तारीख से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल रायपुर, विश्व दाय सप्ताह का आयोजन कर रहा है। पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सबसे पहले राजेश्वर एवं दानेश्वर मंदिर दिखाई देते हैं। इन मंदिरों के सामने राजीवलोचन का भव्य प्रवेश द्वार महामंडप है। इसकी चौखट के शीर्ष भाग में शेषशैया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं लतावल्लरियों के मध्य विहाररत यक्षों की विभिन्न भाव भंगिमाओं एवं मुद्राओं में प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गयी हैं। बायीं दीवाल के स्तम्भ पर एक पुरुष की खड़ी प्रतिमा है, जिसका एक हाथ ऊपर है तथा दूसरा हाथ ह्रदय को स्पर्श कर रहा है। कमर पर कटार एवं यज्ञोपवित धारण किए हुए है। 

रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका
पुरुष मूर्ति के दोनों तरफ नारियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक मूर्ति स्त्री और पुरुष की युगल है। इसमें पुरुष स्त्री से छोटा दिखाया गया है, वह हाथ में सर्प धारण किये हुए है। लोग इसे सीता की प्रतिमा मानते हैं पर सर्प के साथ पुरुष काम का प्रतीक है, इसलिए इसे रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका की प्रतिमा माना जा सकता है। इसके साथ ही यहाँ पर आकर्षक मिथुन मूर्तियाँ भी दिखाई देती है। इनके वस्त्र अलंकरण भी नयनाभिराम हैं। अंतराल में ललाट बिम्ब पर गरुडासीन विष्णु की प्रतिमा है। यहाँ पर राजीव अपनी नायिका की तलाश में आये हैं, उसका वस्त्र अलंकरण देख रहे हैं। हमने यहाँ के चित्र लिए और मुख्य मंदिर की तरफ चल पड़े। मंडप एवं मुख्य मंदिर के बीच अन्तराल है। पिछली बार गए थे तो यहाँ भागवत महापुराण का पाठ हो रहा था और भगवताचार्य अपने प्रवचन में से क्विज पूछ रहे थे श्रोताओं से, सही उत्तर देने वाले को इनाम भी दिया जा रहा था। यह तरीका मुझे पसंद आया, इनाम के लालच में श्रोता भागवत का श्रवण ध्यान लगा कर करते हैं और अंत में प्रश्नों का उत्तर देकर इनाम भी पाते है।

राजा जगतपालदेव के रूप में बुद्ध 
मुख्य मंदिर आयताकार प्रकोष्ट के बीच में निर्मित है। भू विन्यास योजना में राजिम का मंदिर महामंडप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा मार्ग में बंटा हुआ है। गर्भ गृह में प्रवेश करने के लिए पैड़ियों पर चढ़ना पड़ता है। सामने ही एक स्तम्भ पर पूर्वाभिमुख गरुड़ विराजमान है। सामने काले पत्थर की बनी चतुर्भुजी विष्णु की मूर्ति है। जिसके हाथो में शंख, गदा, चक्र एवं पद्म दिखाई देते है। इसे ही भगवान राजीवलोचन के नाम से जाना जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। बायीं भीत पर दो शिलालेख लगे है, इनसे ही इस मंदिर के निर्माताओं एवं जीर्णोद्धारकर्ताओं की जानकारी मिलती है। राजीव लोचन की नित्य पूजा क्षत्रिय करते है, विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है। इस मंदिर के उत्तर में जगन्नाथ मंदिर है। इसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के वामन अवतार की प्रतिमा लगी है। जिसमें तीसरा पग राजा बलि पर के शीश पर रखते हुए विष्णु को दिखाया है। मैंने पुजारी से पूछा कि लोगों से सुना है कि यहाँ पर राजा जगतपाल की प्रतिमा भी है। तो उसने महामंडप में बायीं तरफ लगी एक प्रतिमा की तरफ संकेत किया। यह प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की दिखाई पड़ी। राजीव ने कहा कि कोंडागांव में जिस तरह बुद्ध आदिवासी देवता भोंगापाल बन गए उसी तरह यहाँ भी बुद्ध जगतपाल हो गए। परन्तु राजीवलोचन मंदिर में अकेली बुद्ध की प्रतिमा का मिलना समझ से परे है।

राम मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ 
पुजारी जी से प्रसाद ग्रहण कर हम राम मंदिर के दर्शनों को चल पड़े। यहाँ से बस्ती के बीच 50 कदम की दूरी पर राम मंदिर है। यह मंदिर भी ईंटों का बना है, इसके स्तम्भ पत्थरों के हैं।अधिलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इस पूर्वाभिमुख मंदिर का निर्माण भी कलचुरी नरेशों के सामंत जगतपालदेव ने कराया था। मंदिर के महामंडप में प्रस्तर स्तंभों पर प्राचीन मूर्तिकला के श्रेष्ठतम उदहारण है। इन स्तंभों पर आलिंगनबद्ध मिथुन मूर्तियों के साथ शालभंजिका, बन्दर परिवार, माँ और बच्चा तथा संगीत समाज का भावमय अंकन है। मकरवाहिनी गंगा,  राजपुरुष, अष्टभुजी गणेश, अष्टभुजी नृवाराह की मूर्ति है। मिथुन मूर्तियाँ का शिल्प उत्तम नहीं है। जैसे नौसिखिये मूर्तिकार ने इसे बनाया हो। हमने चित्र लिए, दो सज्जन वहां पर थे, राममंदिर के केयर टेकर के विषय में पूछने पर पता चला की वह कहीं गया है। वे दोनों भी यहीं के केयर टेकर थे। एक ने बताया की वह मलार से स्थानांतरित होकर यहाँ आया है। 

प्राचीन यंत्र
राम मंदिर के प्रदक्षिणापथ से सम्बंधित प्रवेश द्वार शाखाओं से युक्त है, इनके अधिभाग पर गंगा-यमुना नदी देवियों की मूर्तियाँ हैं, राजिम के किसी भी मंदिर के प्रवेश द्वार में नदी देवियों की मूर्तियाँ नहीं है। राजीव ने टिप्पणी दी कि राजिम के मंदिरों का शिल्प सर्वोत्तम भव्य एवं बहुत ही सुन्दर है। मंदिर से बाहर निकलते हुए मुझे एक प्राचीन यंत्र दिखाई दिया। जिसका प्रयोग निर्माण के दौरान होता था, पता नहीं किसने उस भारी भरकम यंत्र को भी तोड़ कर रख दिया। दुनिया में उत्पाती लोगों की कमी नहीं है। बेमतलब ही नुकसान करने में इन्हें मजा आता है। सीमेंट आने के कारण अब यह काम में नहीं आता। वर्ना इसके बिना निर्माण कार्य संभव नहीं था। कभी इस यन्त्र के विषय में विस्तार से लिखूंगा। 

कुलेश्वर महादेवमंदिर में संध्या जी 
राजिम दर्शन कर अब हमें सिरपुर की और चलना था, लेकिन कुलेश्वर महादेव की चर्चा न हो तो राजिम यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। पुराविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार कुलेश्वर महादेव का प्राचीन नाम उत्पलेश्वर महादेव था जो कि अपभ्रंश के रूप में कुलेश्वर महादेव कहलाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर नदियों के संगम पर स्थित है। यह अष्टभुजाकार जगती पर निर्मित है। नदी के प्रवाह को ध्यान में रखते हुए वास्तुविदों ने इसे अष्टभुजाकार बनाया। इसकी जगती नदी के तल से 17 फुट की ऊंचाई पर है। कुल 31 सीढियों से चढ़ कर मंदिर तक पंहुचा जाता  है। कहते हैं कि मंदिर के शिवलिंग को माता सीता ने बनाया था। मंदिर में कार्तिकेय एवं अन्य देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। किंवदंती है की नदी के किनारे पर स्थित संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम से कुलेश्वर मंदिर तक सुरंग जाती है। सुरंग का प्रवेश द्वार संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम में है, जिसमे प्रवेश करके मैंने स्वयं देखा है। प्रवेश द्वार छोटा है। सीढियों से नीचे उतरने पर दो कमरे हैं जिसमे काली माई की प्रतिमा रखी है एवं आगे का रास्ता बंद कर दिया गया है।

राजीव रंजन "आमचो बस्तर"
राजिम दर्शन करने के बाद हम चम्पारण से आरंग होते हुए सिरपुर चल पड़े। राजिम से आरंग लगभग 28 किलोमीटर है। रास्ते में हमने प्रभात सिंह को फोन लगाया तो उनके फोन से कोई उत्तर नहीं आया। क्योंकि हम तय कार्यक्रम से एक दिन पहले चल रहे थे। फिर आदित्य सिंह को फोन लगाने पर पता चला की वे महासमुंद में हैं। इस दिन पितृमोक्ष अमावश्या भी थी, इसलिए आदित्य सिंह महासमुंद पहुँच गए थे। उन्होंने कहा कि आप सिरपुर पहुचे मै  तत्काल निकल रहा हूँ। नदी मोड़, तुमगांव निकल चुका था। अब भूख लगने लगी तो रास्ते में कोई ढाबा भी दिखाई नही दे रहा था। हम सिरपुर के मोड़ से आगे निकल गए ढाबे की खोज में 5 किलोमीटर आगे जाने पर नवागांव में जंगल-मंगल ढाबा मिला। वहां तो सिर्फ जंगल मंगल ही था। चावल ख़त्म हो चुके थे, सब्जी नहीं थी, हमने रोटी बनवाई और काले उड़द चने की दाल ली। प्रभात सिंह का फोन भी आ गया, उन्होंने रेस्ट हाउस बुक कर दिया था। प्रभात सिंह रायपुर में थे, उन्हें सुबह आना था। 

"आमचो भारत" वाले यायावर 
नवागांव से चलने पर मैंने राजीव से कहा कि  सिरपुर का रेस्ट हाउस बहुत बढ़िया है और महानदी के किनारे पर स्थित है, सुबह उठने पर पुण्य सलिला महानदी के दर्शन होंगे, पर रेस्ट हाउस पहुचने पर चौकीदार ने पुराना रेस्ट हाउस खोला, जिसके कमरे को महानदी नाम दिया गया था। नए रेस्ट हाउस के बारे में कहने पर उसने बताया की वह मंत्री के लिए बुक है। बस यही खाली है, मरते क्या न करते, केयर टेकर को बुलाने कहा तो उसने आकर कहा कि उसकी तबियत ख़राब है वह नहीं आ रहा। आस-पास खेत होने के कारण कमरे में लाइट जलाते ही कीड़े भर गए। वैसे मैंने देखा है कि जितने भी रेस्ट हाउस है वे अघोषित रूप से मंत्रियों और अधिकारियों के लिए पूर्णकालिक बुक रहते हैं, रेस्ट हाउस के केयर टेकर नहीं चाहते कि कोई वहां आकर रुके। मुझे बताया गया कि रेस्ट हाउस कि बुकिंग महासमुंद के अधिकारी करते हैं, हमने अपने आप को धन्य समझा, कम से कम पुराना रेस्ट हाउस तो खुल गया, रात गुजारने के लिए। अब मंत्री जी ही जाने इन हालातों में सिरपुर को किस तरह विश्व धरोहर का दर्जा दिलाएंगे, जबकि रेस्ट हाउस के ये हाल हैं। रात्रि कालीन भोजन  में आदित्य सिंह ने कम्पनी दी, हमने सुबह के कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार की और सुबह के इंतजार में लोट-पोट हो गए। .......जारी है,  आगे पढ़ें .........

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

महर्षि महेश योगी के जन्मस्थान पाण्डुका की सैर --- ललित शर्मा

त्तीसगढ की पूण्य भूमि पर अनेक संतों एवं महापुरुषों ने जन्म लिया। महर्षि महेश योगी भी उनमें एक थे। कई बार पाण्डुका से गुजरते हुए आगे निकला, पर महर्षि जी के जन्मस्थान का दर्शन लाभ प्राप्त नही कर सका। आज वह समय आ ही गया, मैं उनकी संस्था द्वारा संचालित विद्यापीठ में पहुंच ही गया। 

मुख्यद्वार से आम के वृक्ष के नीचे बैठे हुए दो सज्जन नजर आए, चर्चा होने पर पता चला कि सज्जन (श्रीवास्तव जी) महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ के व्यवस्थापक हैं तथा दुसरे सह-व्यवस्थापक हैं। इन्होने महर्षि के विषय में हमें बहुत कुछ जानकारी दी। वेद विज्ञान पर चर्चा हुई, श्रीवास्तव जी ने बताया कि महेश प्रसाद वर्मा याने महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका गाँव में हुआ। इनके पिताजी रामप्रसाद वर्मा यहाँ राजस्व विभाग में कार्यरत थे। महर्षि के बड़े भाई जागेश्वर प्रसाद की प्राथमिक शिक्षा पाण्डुका में ही हुई थी। पाण्डुका इनका बर्थ प्लेस है, नेटिव प्लेस जबलपुर के पास गोटे गाँव है। महर्षि महेश योगी ने इलाहाबाद विवि से भौतिक शास्त्र में स्नातक और दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली थी। 

विद्यापीठ का मुख्य द्वार
दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि लेने के बाद वे 1941में स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के अनुयायी बन गए। स्वामी जी ने उन्हें बाल ब्रह्माचार्य महेश नाम दिया। 1953 तक ब्रह्मानंद सरस्वती के सानिध्य में रहने के बाद महर्षि योगी ने उत्तरकाशी की ओर रुख किया। एक जनवरी 1958को मद्रास के एक सम्मेलन में महर्षि ने ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन के माध्यम से पूरे विश्व में आध्यात्मिक ज्ञान फैलाने की घोषणा की। यही वह क्षण था जब वे वैश्विक होने की ओर उन्मुख हुए। इसके पश्चात समूचे विश्व में ध्यान योग का डंका बजाया। पश्चिम में दम मारो दम की हिप्पी संस्कृति जोर पकड़ रही थी, महर्षि ने इन्हे नशे से मुक्त होने की दिशा में उन्मुख किया। इसी क्रम में 1958 में महेश योगी ने विश्‍वस्‍तरीय आध्‍यात्‍मिक प्रसार अभियान का आरंभ किया। इस प्रसार कार्यक्रम का उद्देश्‍य मानवता के लिए ध्‍यान और साधना को प्रचारित करना था। अभियान के प्रसार के लिए उन्‍होंने विश्‍व के कई देशों वर्मा, मलाया, हाँगकाँग, होनुलूलु का भ्रमण किया। उन्‍होंने अपना सबसे ज्‍यादा वक्‍त अमेरिका में बिताया। 

महषि जी का जन्म इसी घर में हुआ था
महर्षि महेश योगी ने 1963 में अपनी पहली पुस्‍तक अस्‍तित्‍व का विज्ञान और जीने की कला लिखी। 1965 में भगवद गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया। अपने योग के प्रसार के दौरान इस बात का दावा किया कि ट्रांसडेंटल मेडिटेशन से तनाव और निराशा दूर हो सकती है, जिससे लोगों का जीवन भी सुखमय होता है। हालाँकि उनके ध्‍यान के दौरान हवा में तैरने जैसे बातों की काफी आलोचना हुई, लेकिन ध्‍यान के चमत्‍कारिक प्रभाव को सभी ने स्‍वीकार किया। महेश योगी का मानना था कि सिद्ध लोगों के सामूहिक ध्‍यान करने से एक विशेष वातावरण का निर्माण होता है, जो कि आध्‍यात्‍मिक प्रभाव क्षेत्र का निर्माण करता है। इस क्षेत्र के विस्‍तार के अपराध और बुराइयों पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है। महर्षि महेश योगी का यह भी दावा था कि इसका असर स्‍टॉक मार्केट पर भी होता है।  

व्यावस्थापक श्रीवास्तव जी एवं तुलेन्द्र तिवारी जी
महर्षि को अपने सिद्धांतों पर अटूट विश्‍वास था और वह उसके विस्‍तार से पूरे विश्‍व को लाभ पहुँचाना चाहते थे। 1971 में उन्‍होंने लॉस एंजिल्‍स में महर्षि अंतरराष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की। इसके साथ ही कई करोड़ों का अपना साम्राज्‍य स्‍थापित किया। वैदिक सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए महर्षि विद्या मंदिर की स्‍थापना की गई। भारत में इसके करीब 200 शाखाएँ हैं। इसके अलावा महर्षि इंस्‍टीट्युट का एमबीए, एमसीए, वैदिक विश्‍वविद्यालय, महर्षि गंधर्ववेद विश्‍व विद्यापीठ, महर्षि आयुर्वेद विश्‍वविद्यालय, महर्षि इंफार्मेशन टेक्‍नोलॉजी और महर्षि वेद-विज्ञान विश्‍वविद्यापीठ हैं। इनके साथ उन्होने अत्युत्‍म ध्‍यान (ट्रांसडेंटल मेडिटेशन), महर्षि वेदिक टेक्‍नोलॉजी ऑफ कांशियसनेस, महर्षि स्‍थापत्‍य वेद, सिद्धी कार्यक्रम, महर्षि ग्‍लोबल एडमिनिस्‍ट्रेशन थ्रू नेचुरल लॉ, महर्षि ज्‍योतिष और योग कार्यक्रम, महर्षि वाणिज्‍य विकास कार्यक्रम भी चलाए।

महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन की मुद्रा "राम"
महर्षि चैनल भी चला करता था, अब बंद हो गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि महर्षि ने अपनी राम नामक मुद्रा भी चलाई, जिसे नीदर लैंड में मान्यता है। राम नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस ने अक्टूबर २००२ में जारी किया था। अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी राम का प्रचलन है। वैसे 35 अमरीकी राज्यों में राम पर आधारित बॉन्डस चलते हैं। नीदरलैंड की डच दुकानों में एक राम के बदले दस यूरो मिल सकते हैं। राम नाम की मुद्रा विदेशों में चल रही है, पर राम के देश में नहीं चला पाए। महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन द्वारा राम मुद्रा जारी की गयी  है। जिस पर सुंदर कल्प वृक्ष का चित्र अंकित हैं।

ब्रह्मचारियों के साथ एक गृहस्थ
ग्राम पाण्डुका में महर्षि के पिताजी रामप्रसाद वर्मा किराए के घर में रहते थे, महर्षि के जन्म स्थान की जानकारी होने पर संस्था द्वारा इस मकान को खरीदा गया। महर्षि ने कहा कि इस घर को उसी अवस्था में रखा जाए जैसा पहले था। कोई अतिरिक्त निर्माण नहीं किया जाए। इसके साथ ही पाण्डुका ग्राम में 51 एकड़ जमीन खरीद कर विद्यापीठ की स्थापना की गयी। महर्षि इस गांव को योजनाबद्ध रुप से संवारना चाहते थे। लेकिन गांव के गौंटिया लोगों की आपत्ति एवं विरोध के पश्चात उन्होने इरादा त्याग दिया। मुझे याद है। कुछ वर्षों पूर्व विद्यापीठ में असामाजिक तत्वों ने आगजनी भी थी। महर्षि विद्यापीठ के कर्ता-धर्ताओं के साथ गांव वालों का विवाद भी हुआ था। इस विद्यापीठ में ब्राह्मणों के बच्चों को कर्मकांड सिखाए जाते हैं। वेद पाठ कंठस्थ कराया जाता है।

आवासीय विद्यापीठ के भवन
विद्यापीठ में जाकर मैने विद्यार्थियों से चारों वेदों का पाठ सुना और रिकार्ड भी किया। इस आवासीय विद्यापीठ में 132 विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। रहने के भवन की व्यवस्था अच्छी लगी। भवन पक्के बनाए हुए हैं। साथ-साथ धान की खेती भी की जा रही है। कुछ पेड़ पौधे भी लगाए गए हैं। मुझे हड़जोड़ का पौधा मिला, जिसकी एक कलम लेकर आया और लगाई। हड़जोड़ सूखी और हरी हाथ पैर के दर्द में काम आती है। इसका सेवन करने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है, जो इसके नाम (हड़जोड़) से ही प्रतीत होता है। विद्यापीठ में घूमने के बाद हमने आगे बढने का कार्यक्रम बनाया। जाना तो चाहते थे जतमई एवं घटारानी, पर तिवारी जी ने कहा कि सिरकट्टी से मेघा, कुरुद होते हुए अभनपुर पहुंचा जाए। हमने श्रीवास्तव जी से विदा ली और आगे बढ लिए सिरकट्टी की ओर।


NH-30 सड़क गंगा की सैर

बुधवार, 27 जुलाई 2011

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे ---- ललित शर्मा

सप्ताहांत के दिन की सुबह चमकीली नहीं थी, आसमाने में काले-काले बादलों की घटा छाई हुई थी, कोई पता नहीं कब बरस जाएं? 5 दिनों सर्दी बुखार का मजा लेते-लेते खोपड़ी खराब हो गयी, दवाईयाँ लो और सो जाओ, बस यही चल रहा था। तबियत जब कूछ ठीक हुई तो दिमाग ने भी काम करना शुरु किया, वह सोचने लगा कि घर में बैठे-बैठे भी क्या करें? आज कहीं घूम ही लिया जाए। बाईक पर लांग ड्राईव का मजा इसी मौसम में आता है, अगर रिमझिम फ़ुहारें बरस रही हों तो क्या कहने, आनंद ही आनंद। तिवारी जी फ़ोन लगाया तो पता चला कि वे साप्ताहिक धुलाई के कार्यक्रम में व्यस्त हैं। उन्होने एक घंटे बाद साथ चलने की हामी भरी। मैं नियत समय पर उनके घर पहुंच गया। सुबह का नास्ता हो गया था, पर समय देखते हुए श्रीमती जी ने भोजन करके ही जाने को कहा। लेकिन भोजन के कारण विलंब हो सकता था। इसलिए ऐसे ही चल पड़े। रास्ते में कहीं भोजन कर लिया जाएगा। तिवारी जी को घर से लेकर आगे बढ लिए। हमारी योजना में महानदी की बाढ, महर्षि महेशयोगी की जन्मस्थान की सैर शामिल था।

गाड़ी हाइवे पर चली जा रही थी, तिवारी ने हमें ही हांकने की आज्ञा दे दी। आसमान की तरफ़ देखकर लगता था कि बरस जाएगा, मानिकचौरी रेल्वे क्रांसिग पार करते ही भूख लगने लगी। घर से निकले तो 15 मिनट ही हुआ था। ग्राम हसदा चौक पर एक चाट का ठेला दिखाई दे गया। बस गोलगप्पे खाने के इरादे से वहीं टिक गए, हसदा आना-जान बचपन से लगा हुआ है, तिवारी जी भी हसदा में अध्यापन कर चुके हैं। जान पहचाने के लोग वहां मिल गए। स्टूल और बेंच पर जम गए, देवा चाट भंडार, प्रोप्राईटर साहू जी को गोलगप्पे का आडर दिया, तभी मन बदल गया, चाट बनाने के लिए कहा। तिवारी जी ने गोलगप्पे थामें और मैने चाट। वाह! स्वाद के क्या कहने थे, मजा आ गया। ऐसी चाट शहर की भी किसी बड़े होटल में नहीं खाई। एक प्लेट उदरस्थ करने के पहले ही दुसरी का भी आडर दे दिया। फ़िर गोल गप्पे का, गोल गप्पे में तेल की महक थी, थोड़ा उसे गरियाया। पता किया कि एस पी (सरपंच पति) कहाँ है? गाँव में नहीं थे, परन्तु याद करते ही वे भी पहुंच गए। बड़ी लम्बी उमर है यार, शैतान का नाम लेते ही हाजिर।

चाट भक्षण चालु था, तभी एक नवयुवक गले में हेडफ़ोन डाले, हाथ में मोबाईल लिए पहुंचा। मुझसे बोला -"अंकल जी थोड़ा सरकिए"। हम सरक लिए, वह बेंच पर आकर बैठ गया। मोबाईल में गाना सुना रहा था। मैने जब उसे नीचे से पर तक देखा तो उसकी हरकत पर गौर करके अन्य लोग भी हँसने लगे। तिवारी गुरुजी ठहाके लगाने लगे। तभी उसके मोबाईल में घंटी आई और बंद हो गई, बोला -" साले मन मिस काल करथे।" मैने कहा - "ओखर मोबाईल मे तैंहा रिचार्ज कराथस का?" करातेस त फ़ुल काल करतिस।" उसने क्या सोचा पता नहीं, तभी उसका एक साथी पहुंच गया - "चल बे, जाना हे त, मैं जात हंव।" मैने कहा-" हेडफ़ोन ला कान में लगा, बने दिखथे।" वहां बैठे लोग उसका मजा लिए जा रहे थे। चाट के आनंद के साथ आनंद दुगना हो गया। सामने मुझे सप्तपर्णी का वृक्ष दिखाई दिया। परसों ही मल्हार पर मेडागास्कर पाम का जिक्र सुब्रमनियन जी ने किया था। मैने उसके कुछ चित्र लिए और सुब्रमनियन जी के चित्रों से मिलान किया। यह वृक्ष भी उसी जाति का लगा पर, इसमें फ़ूल नहीं आए थे, मैने फ़ूल भी देखे हैं। जो सुब्रमनियम जी के चित्रों में दिखाए फ़ूलों जैसे ही होते हैं। 

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे अंदर करने के बाद हमने सेवा शुल्क पूछा तो उसने हमारे 30 रुपए लिए। सस्ते में मामला निपट गया। शुल्क जमा करके हम आगे बढ लिए, क्योंकि आगे जाने में विलंब होने की आशंका थी, नवापारा पहुचकर गंज रोड़ की प्रदक्षिणा करके हम महानदी के घाट पर पहुंचे। वहां कोई भी कावंडिया दिखाई नहीं दिया। हमारी फ़ोटो इच्छा पूर्ति नहीं हुई। जब नदी के पुल पर पहुंचे तो बाढ देखने की इच्छा भी अधुरी रह गयी। नदी में पानी ही नहीं था। कुलेश्वर मंदिर के आस-पास रेत दिख रही थी। अर्थात वर्षा कम ही हुई है, नदी में भरपूर जल नहीं आ सका। 

मैने सोचा था कि नदी में पानी होगा तो नाव वाले भी मिलेंगे। उनसे चर्चा करेगें कि - "नाव में मामा-भानजा एवं पहिलावत (ज्येष्ठ पुत्र-पुत्री) क्यों नहीं बैठते? मान्यता है कि इनके बैठने से नाव उलट जाती है। नाव वाले नहीं मिले, रामभरोसा जी ने बताया था कि एक बार जानकारी के अभाव में वे मामा-भांजा एक साथ नाव में बैठ गए। जब नाव डगमगाने लगी तो नाव ने कहा कि -" कोई मामा भांजा बैठे हो तो बता दो, नहीं तो नाव उलट जाएगी।" इनका पता चलने पर एक को नाव से नदी में कूद जाने कहा। मामा तो बैठे रहे, नदी में रामभरोसा जी को कूदना पड़ा। थोड़ी देर नजारे देखने के बाद आगे बढ लिए।

गरियाबंद मार्ग पर आगे बढे, रास्ते में बोल बम कावंड़िए मिले, सावन में शिव भक्ति सैलाब उफ़ान पर होता है। कौन कहां से जल लेकर कहां चढाने जा रहा है पता ही नहीं चलता। पर कावंड़िए हर सड़क पर मिल जाते हैं। एक महिला कांवड़िया दल भी मिला और नौजवान भी, चलते-चलते इनकी चाल बदल चुकी थी। मुझे भी अनुभव है इसका। जांघे छिलने के कारण पैदल चलना कठिन हो जाता है। मैने तो इसका तोड़ निकाल लिया था, नारियल तेल की एक शीशी साथ लेकर चलता था और जांघों में लगा लेता था। जिससे जांघे छिलती नहीं थी और यात्रा भी मजे से हो जाती थी। अब समय नहीं था कि इन्हे यात्रा टिप्स देते चलुं। नहीं तो अवश्य ही बता देता। धान के खेतों में फ़सल लहलहा रही है, जिन्होने पहले बोनी कर ली वे चलाई, निंदाई और बियासी कर रहे हैं। महिलाओं का दल रोपा लगा रहा है, जिस खेत में पानी अधिक था और समय पर बोनी नहीं हुई उसमें लाई-चोपी बोनी पद्धति (खेत को मता कर उसमें उपर ही बीज छिड़कना) का प्रयोग किया गया था।

रास्ते में एक नंगरिहा बैलों को खोलकर सड़क पर बैठकर चोंगी सिपचा (बीड़ी जलाना) रहा था, थोड़ी देर आराम करने के बाद फ़िर बैला नांगर में फ़ांदने की तैयारी कर रहा था, मतलब बैटरी रिचार्ज कर रहा था। 300 एकड़ के खार में बोवाई हो चुकी है, निंदाई चलाई चल रही है किसान पुरानिक पटेल ने बताया। तीन-चार दिनों की बारिश ने किसानों के चेहरे पर रौनक ला दी। पौधों के भरी हुई बैलगाड़ियाँ खड़ी हैं, रोपा लगाने वाले थरहा ले जा रहे हैं। रोपा कतार में लगाया हुआ सुंदर दिखाई दे रहा था। ढंग से रोपा लगाने से फ़सल अच्छी होती है। गांव में रोपा का काम ठेके पर होता है। अगर खेत का मालिक स्वयं सामने न रहे तो मजदुर एक पौधे से दुसरे पौधे की दुरी बढा कर जल्दी से काम निपटाने की कोशिश करते हैं। जिससे फ़सल कम होने की संभावना रहती है। इसलिए खेत मालिक को भी उनके साथ काम में जुटना पड़ता है। तभी तो कहते हैं "खेती अपन सेती"। कांवरिए लगातार चल रहे हैं अपनी मंजिल की ओर तथा हम भी बढ रहे हैं आगे।  

NH-30 सड़क गंगा की सैर

गुरुवार, 3 मार्च 2011

प्राचीन पद्म तीर्थ राजिम कुंभ की एक दिन की सैर

माघ की पूर्णिमा और छत्तीसगढ का प्राचीन राजिम मेला। दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। त्रिवेणी संगम  का स्थान प्रयाग जैसा ही महत्व रखता है।

बचपन में जब माघ की पूर्णिमा आती थी तो दो दिन पहले से ही बैल गाड़ियों का रेला लग जाता था। 20-20 बैल गाड़ियों की कतारें चलती थी। बैलों के गले में बधी घंटियों की सुरम्य ध्वनि मन को प्रफ़ुल्लित कर  देती  थी।

बसंत का मौसम आल्हादित करता था। बैल गाड़ियों के नीचे बंधी लालटेन अहसास कराती थी कि बैल गाड़ियों का काफ़िला यात्रा पर है। आगे वाली बैल गाड़ी के पीछे सभी बैल गाड़ियाँ कतार में चली जाती थी।

महिला, पुरुष, बच्चे सब अपने घर गृहस्थी का सामान लाद कर चलते थे। माघ पुर्णिमा की  सुबह बैल गाड़ियाँ चित्रोत्पला गंगा यानी महानदी के किनारे अपना डेरा डाल देती थी।

बैलों के लिए चारे पानी एवं आराम की व्यवस्था की जाती थी। दो गाड़ियाँ मुझे दिख ही गयी। एक परिवार हंसता हुआ बैलगाड़ी के मजे लेते हुए जा रहा था।

इसके बाद पहट को सभी  महिलाएं नदी स्नान कर राजीव लोचन भगवान एवं कुलेश्वर महादेव के दर्शन करने जाती थी।

तब तक पुरुष खाना बना कर रखते थे। जब महिलाएं स्नान एवं दर्शन करके आती थी तब पुरुष एवं बच्चे मेला घुमने एवं दर्शन करने जाते थे।

जब 3-4 बजे पुरुष मेला घूम कर आ जाते थे तब महिलाएं अपनी दैनिक उपयोग की वस्तुए खरीदने जाती थी।

इस तरह मेला शिव रात्रि त्तक चलता था। नदी की ठंडी-ठंडी रेत पर रात को ढोलक और झांझ-मंजीरे के साथ भजन और रामायण की चौपाईयों का आनंद लिया जाता था, नौजवान सर्कस एवं टूरिंग टॉकिज की तरफ़ चल पड़ते थे।

एक से एक धार्मिक फ़िल्में मेले का आकर्षण बढा देती थी। हम भी अपनी सायकिल से मेले का आनंद लेते थे। माघ पुर्णिमा से शिवरात्रि तक आज भी मेला चलता है, लेकिन वह बात नहीं रही अब।

रात को मेला तो देख लिया था, अब दिन में भी देखना था। सो तीन बजे हम फ़टफ़टिया से चल पड़े मेले की ओर।

रास्ते में एक भी बैलगाड़ी नजर नहीं आई। मुंह पर स्कार्फ़ बांधे सैकड़ों लांग ड्राईव वाले जोड़े दिखे। जोड़ा तो हमारा भी था बुढउ माट साब के साथ, 3 महीने में रिटायर होने  वाले हैं। सोचा कि इन्हे भी कुलेश्वर महादेव के दर्शन करा दें।

पहले मेला नदी के उस पार राजिम में भरता था। अब नदी में उत्सव स्थल बन जाने के कारण कुलेश्वर महादेव एवं लोमश ॠषि आश्रम तक भीड़ आ जाती है।

साधु संतों के लिए विशाल डोम बना कर आवास व्यवस्था की गयी थी। कुछ लाल बत्ती वाले हाई प्रोफ़ाईल साधु दिखे तो कुछ सिर्फ़ दाल-भात वाले भी। कोई काहू में मगन कोई काहू में मगन।

लोमश ॠषि आश्रम के परकोटे के अंदर नागा साधुओं ने कब्जा जमा रखा था। नगं-धड़ंग-दबंग भभूति रमाए, मोर पंखी  से आशीष बांट रहे थे।

कुंभ मेला शुरु होते ही दूसरे दिन देशी साधु एवं परदेशी साधुओं में खुले आम चिमटे चले थे। जिसमें से कुछ घायल हुए, कुछ बच गए। पुलिस केस भी हुआ। लेकिन नागा लोगों का कौन क्या बिगाड़ सकता है?

जिन्हे अपने वस्त्रों का भी मोह नहीं है। गांजा  की धुआं उड़ रही  थी, चिलम की धोंकनी जारी है, गुट बना कर बम बम भोले का उद्घोष हो रहा है,

चिलम को प्रणाम करते ही एक साधु ने कहा - "जय जय भोले शंकर, कांटा गड़े न कंकर, बैरी दुश्मन को तंग कर। जिसने नहीं पी गांजे की कली, उस लड़के से लड़की है भली। तोड़ दुश्मन की नली,  बम बम कहकर एक गहरा सुट्टा लगाया और ढेर सारा धुंआ उगला, जो हवा में फ़ैल गया। इनकी चेलियाँ भी इर्द-गिर्द घूम रही थी।

मैं किसी नागा साधू से चर्चा करना चाहता था, फ़ोटो लेना चाह रहा था। अब इनके मुंह कौन लगे? कब भड़क जाए क्या भरोसा। लेने के देने पड़ जाएं।

आश्रम में इनकी थाह लेने लगा। वापसी में गेट के पास तख्त पर आसन लगाए एक नागा साधु अपने 10-15 चेलों के साथ टिके हुए थे।

उसके सामने ही एक युवा नागा बाबा जमे हुए थे। उसकी आँखों में चमक एवं सम्मोहकता थी। मैं उसकी ओर ही बढ लिया। उन्होने अपना नाम सनतपुरी बताया और पास ही बिठा लिया।

भभूत लगाई, हम भी कवचित हो गए, मतलब अदृश्य बख्तरबंद धारण कर लिया। बाबा से पूछ कर एक दो फ़ोटो ली। एक सिपाही डंडा लिए खड़ा था। मैने उससे फ़ोटो खींचने कहा तो वह बोला-कमांडर साहब देख रहे हैं। देखते रहे कमांडर हमने माट साब से फ़ोटो ले्ने कहा।

उन्होने भी फ़ोटो की वाट लगा दी। जैसे तैसे काम के लायक एक दो फ़ोटो खींच ही गयी। बाबा जी  को 10 का एक नोट चढाया और हम बाहर खिसक लिए।

कुंभ में सरकारी सेवकों द्वारा साधुओं की डटकर सेवा हो रही थी। सुरक्षा व्यवस्था भी तगड़ी थी। धरम मंत्री के दूत तैनात थे। प्रदेश की किरकिरी नहीं होनी चाहिए।

कोई साधु नाराज न हो, क्योंकि प्रायोजित कार्यक्रम में सबका ध्यान रखना आवश्यक है, स्व स्फ़ूर्त कार्यक्रम में तो स्वयं की व्यवस्था से आना होता है। 

मुझे लगा की मेले का आनंद नहीं  रहा। सिर्फ़ व्यवसायिकता रह गयी, राजिम मेले ने कुंभ का स्वरुप लेते ही प्राण त्याग दिए, मेला तो मिलता है लेकिन आत्मा नहीं मिलती।

एक चाय वाले की दुकान में चाय पी्ने का  मन हुआ तो उसका पता मैने पूछा। उसने धर्म नगरी दामा खेड़ा से आना बताया। सूरत से अखंड बेवड़ा नजर आ रहा था।

मैने पू्छा-धर्म नगरी में दारु मिलती है क्या? नहीं मिलती- उसने कहा। तो तुम कहां से पीते हो? घर में छुप कर पी लेते हैं जिससे साहेब को पता मत चले। उससे चाय पी  कर आगे बढ लिए।

एक स्थान पर विभिन्न मंत्रालयों की प्रदर्शनी लगी हुई थी। अवलोकन करते हुए भंडार ग़ृह के टैंट में पहुंचे, वहाँ मु्ख्यमंत्री एवं अशोक बजाज के आदमकद फ़्ले्क्स लगे थे।

चित्रावलियाँ सजी थी, लेकिन किसी भी फ़्लेक्स में हमारी फ़ोटो नहीं मिली। मिलती भी कैसे? इतना समय तो हम देते ही नहीं है कि अध्यक्ष महोदय के गोदाम  निरीक्षण-परीक्षण के दौरे पर फ़ोटो लेने के वक्त साथ रहें।

कभी रहे भी हैं तो सक्रीय कार्यकर्ता सामने आ जाते हैं, जिससे उनकी सक्रीयता दिखे। चलो कोई बात नहीं, फ़िर कभी। आगे भी कुंभ होते रहेगें। लगते रहेगें जिन्दगी के मेले। वन विभाग के टेंट में धान से भूसे को प्रेस करके ठोस इंधन बनाया गया था तथा उसके उपयोग की सिगड़ी भी रखी थी।प्रयास अच्छा है।

स्वास्थ्य विभाग के टेंट में डॉक्टर तो मिले नहीं, सिर्फ़ कर्मचारी ही थे। कौन इनसे मगजमारी करे? आगे बढ गए। बाहर आते ही एक बहु चर्चित फ़ारेस्ट गार्ड मिल गया। यह हमेशा ही अपने कारनामों से निलंबित रहा है, इसे एक स्टार लगाए देख कर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन मैं जल्दी ही सभंल गया क्योंकि ऐसे ही महान लोगों की जरुरत वि्भाग को होती है।

नदी के किनारे एक लुंगी कुरते में मूसल सा लेकर बैठा था। नजदीक जाने पर पता चला की रामकंद है। अक्सर हमने मेले में इसके पतले-पतले स्लाईस खाए हैं।

रामकंद उड़ीसा के नरसिंह नाथ में पाया जाता है। इसे बरसों रखा जा सकता है। सुब्रमणियम राव ने इसके फ़ायदे भी बताए, इसका सेवन करने से बवासीर भगंदर, गैस अफ़ारा आदि रोगों में फ़ायदा मिलता है।

उसकी फ़ोटो लेने लगा तो कहने लगा - ले लीजिए फ़ोटो, सबकी अपनी-अपनी दुकानदारी है, पेट लगा ही है। फ़िर उसने दैनिक भास्कर के एक समाचार की कटिंग निकाल कर दिखाई, जिसमें उसके एवं रामकंद के वि्षय में जानकारी छापी थी किसी संवाददाता ने।

आजकल कोई फ़ोटो भी मुफ़्त में नहीं देता, उसके लिए भी कुछ दे्ने पड़ते हैं, इसलिए अपना मोबाईल कैमरा सही है। चुपके से काम कर जाता है। हवा भी नहीं लगती।

घर लौटते हुए, धान की लाई (खील) के गुड़ चढे उखरा लेने नहीं भूले, यही मेले की मिठाई होती है। पहले मेले में गन्ने (कुसियार) आते थे। लेकिन अब नहीं दिखे, जलेबी शक्कर पारा भी कम ही दिखे।

हाँ  5 रुपए में भोजन देने वाले दाल-भात सेंटर भरपुर थे, इनकी संख्या 50 से उपर बताई जा रही थी। लेकिन मुझे तो खाली ही नजर आए।

शायद ही कोई जाता होगा खाने। फ़िर भी व्यस्था चोखी समझी जाए। महाशिवरात्रि पर्व पर कुंभ मेले का समापन है।

सभी देवता निज धाम को प्रस्थान करेंगे। छोड़ जाएगें पावन नदी में अपना कुड़ा करकट मल-मुत्र। जिसे झेलेंगे हम ही और हमारी आने वाली पीढी।

पुराने पुल के पास नया पुल बन रहा है। शायद अगले साल 10 किलो मीटर का फ़ालतु चक्कर नहीं काटना पड़ेगा। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने बड़े ही सरल शब्दों में अपने उद्गार प्रगट किए।