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गुरुवार, 11 जनवरी 2018

जनमानस में राम - सारासोर सरगुजा

छत्तीसगढ़ अंचल की प्राकृतिक सुंदरता का कोई सानी नहीं है। नदी, पर्वत, झरने, गुफ़ाएं-कंदराएं, वन्य प्राणी आदि के हम स्वयं को प्रकृति के समीप पाते हैं। अंचल के सरगुजा क्षेत्र पर प्रकृति की विशेष अनुकम्पा है, चारों तरफ़ हरितिमा के बीच प्राचीन स्थलों के साथ रमणीय वातावरण मनुष्य को मोहित कर लेता है। 

ऐसा ही एक स्थान अम्बिकापुर-बनारस मार्ग पर 40 किलोमीटर भैंसामुड़ा से 15 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसे सारासोर कहा जाता है। इस स्थान का पौराणिक महत्व सदियों से है। यहाँ महान नदी की निर्मल जलधारा दो पहाड़ियों को चीरते हुए बहती है तथा इस स्थान पर हिन्दुओं का धामिक स्थल भी है। सारासोर जलकुण्ड है, यहाँ महान नदी खरात एवं बड़का पर्वत को चीरती हुई पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है। 

पौराणिक महत्व - किंवदन्ति है कि पूर्व काल में खरात एवं बड़का पर्वत दोनों आपस में जुड़े हुए थे। राम वन गमन के समय राम-लक्ष्मण एवं सीता जी यहाँ आये थे तब पर्वत के उस पार यहाँ ठहरे थे। पर्वत में एक गुफा है जिसे जोगी महाराज की गुफा कहा जाता है। सारासोर के पार सरा नामक राक्षस ने उत्पात मचाया था तब उनके संहार करने के लिये रामचंद्रजी के बाण के प्रहार से ये पर्वत अलग हो गए और उस पार जाकर उस सरा नामक राक्षस का संहार किया था। तब से इस स्थान का नाम सारासोर पड़ गया।

सारासोर में दो पर्वतों के मध्य से अलग होकर उनका हिस्सा स्वागत द्वार के रूप में विद्यमान है। नीचे के हिस्से में नदी कुण्डनुमा आकृति में काफी गहरी है इसे सीताकुण्ड कहा जाता है। सीताकुण्ड में सीताजी ने स्नान किया था और कुछ समय यहाँ व्यतीत कर नदी मार्ग से पहाड़ के उस पार गये थे। आगे महान नदी ग्राम ओडगी के पास रेण नदी से संगम करती है। दोनो पर्वतों की कटी हुई चट्टाने इस तरह से दिखाई देती हैं जैसे किसी ने नदी को इस दिशा में प्रवाहित करने के लिए श्रम पूर्वक पर्वत को काटा हो। 

वर्तमान में नदी बीच की छोटी पहाड़ी पर मंदिर बना हुआ है। यहाँ कुछ साधू पर्णकुटी बना कर निवास करते हैं और वे भी मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। इस स्थान पर श्रद्धालुओं का सतत प्रवास रहता है। इस सुरम्य स्थल पर पहुंचने के बाद यहाँ एक-दो दिन नदी के तीर पर ठहरने का मन करता है। यहाँ मंदिर समिति द्वारा निर्मित यात्री निवास भी हैं। जहाँ समिति की आज्ञा से रात्रि निवास किया जा सकता है।

कैसे पहुंचे? - अम्बिकापुर से बनारस मार्ग पर सतत वाहन सुविधा है तथा भैंसा मुड़ा पहुंच कर स्थानीय संसाधनों प्रयोग किया जा सकता है। स्वयं के साधन से जाना उत्तम रहेगा।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

सावधान: अब हाथियों ने राजधानी देख ली है।

हाथियों ने अब राजधानी का रास्ता देख लिया गजदल दो बार राजधानी रायपुर के समीप पहुंच चुका है, यह हाथियों एवं मानवों दोनों के लिए शुभ संकेत नहीं है। हालिया तौर पर हाथियों को वन विभाग ने जंगल की ओर खदेड़ दिया, परन्तु जो रास्ता हाथियों ने देख लिया है, उस पर वे फ़िर लौटेंगे। अभी तक तो सरगुजा अंचल, जशपुर, कोरबा एवं सिरपुर क्षेत्र के ग्रामीण हाथियों के उत्पात से परेशान हैं तथा हाथी एवं मानव संघर्ष में एक दूसरे को जान गंवानी पड़ रही है। अब यही स्थिति राजधानी रायपुर में भी बनने के आसार दिख रहे हैं।
 फ़ोटो सांकेतिक है, यह मेरे द्वारा राजा जी पार्क हरिद्वार के चिल्ला रेंज में ली गई थी
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात हाथियों की समस्या के निदान के लिए तत्कालीन अजीत जोगी सरकार ने असम से हाथी प्रशिक्षक पार्वती बरुआ को छत्तीसगढ बुलाया था, जिसके द्वारा हाथियों को साधकर हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष को कम किया जाता। परन्तु इस कार्य में एक हाथी मौत के कारण विधानसभा में प्रश्न उठने के बाद इस कार्य को बंद कर दिया गया। हाथियों के हमले से आम ग्रामीणों की जान लगातार जा रही तथा इस संघर्ष में कोई कमी नहीं आई है। फ़सलों का नुकसान को आम बात है, पर हाथियों के दल के सामने अचानक कोई मनुष्य पड़ जाता है तो उसे हाथी पटक कर मार डालते हैं।
ऐसा नहीं है कि हाथियों के दल कहीं दूसरे स्थान से अचानक छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर गए और उत्पात मचा रहे हैं। यहाँ इनकी बसाहट प्राचीनकाल से ही रही है। सरगुजा अंचल के हाथियों को ऐरावत के सदृश उत्तम माना गया है। पहले के राजा महाराजा इन्हें प्रशिक्षित करके अपने काम में लेते थे तथा अन्य राजाओं को भी भेंट करने के उल्लेख मिलते हैं। हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष तो तब भी आमना सामना होने पर रहा होगा, पर इस हद तक नहीं क्योंकि उनके पर्यावास क्षेत्र में मानव का कोई सीधा दखल नहीं था, वे स्वच्छंद विचरण करते थे। कालांतर में मानव द्वारा हाथियों के पर्यावास क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने के परिणाम को ही अब भुगतना पड़ रहा है।
अभी तक हाथी और मानव संघर्ष के कारण राजधानी से दूर सरगुजा, प्रतापपुर, सूरजपुर, जशपुर, कोरबा, बार नवापारा क्षेत्र से से ही धन-जन हानि के समाचार आते थे। तब राजधानी के लोगों को पता नहीं चलता था कि हाथियों की समस्या क्या है और हाथी प्रभावित अंचल के लोग किस तरह भय के वातावरण में अपनी राज गुजारते हैं, किस तरह उनकी फ़सल को हाथी नुकसान पहुंचाते हैं, किस तरह उनके घर फ़ोड़ कर बेघर कर डालते हैं। अब हाथियों ने राजधानी के समीप अपनी आमद दे दी तो उनके पहुंचने की धमक ही होश उड़ाने के लिए काफ़ी है।
हाथियों का शहरी क्षेत्र में पहुंचना अनायास नहीं है। इसके लिए मानव ही जिम्मेदार है। सरकारों की अदूरदर्शी नीतियों के कारण अंधाधुंध कटते जंगल एवं खनिज निकालने के लिए खदानें खुलने के कारण हाथियों के प्राकृतिक रहवास क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ जिम्मेदार है। जंगल कटने एवं जल के प्राकृतिक स्रोत सूखने के कारण हाथियों के सामने भोजन पानी की समस्या खड़ी हो गई है तथा हाथियों के रहवास क्षेत्र में मानवीय दखल बढ़ने एवं उसके नष्ट होने के कारण अब हाथियों को भोजन-पानी के लिए शहरी क्षेत्र की ओर रुख करना पड़ रहा था। जिससे हाथी एवं मानव के बीच संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है। 
राजधानी के आस पास हाथियों के पहुंचने की आशंका साल भर पहले से ही जताई जा रही थी। वन्य प्रेमी श्री प्राण चड्ढा ने गत वर्ष अपनी अप्रेल 2016 की ब्लॉग पोस्ट में संकेत दिया था कि "सरहदी इलाके से बढ़ते हुए एक हाथी रुद्री-[धमतरी] के इलाके की रेकी कर आया है।" इस एक वर्ष में ही हाथियों ने अपनी उपस्थिति राजधानी में दे दी। हाथियों के राजधानी में पहुंचने से सरकार की नींद खुलनी चाहिए, क्योंकि मामला अब सुदूर अंचल का नहीं रहा, जो राजधानी चैन की नींद ले सके। शीघ्र ही कोई योजना बनाकर हाथी संकट निदान करना आवश्यक है। खतरा अब सिर पर मंडरा रहा है, वो दिन दूर नहीं जब राजधानी के लोगों को अपनी जानमाल की सुरक्षा के लिए रतजगा करना पड़ेगा। इसलिए चैन से सोना है तो जाग जाइए वरना बहुत देर हो जाएगी।   

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

प्रकृति का अजूबा जलजली (दलदली) मैनपाट

राजधानी रायपुर से 352 किलोमीटर अम्बिकापुर एवं अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर छत्तीसगढ़ का शिमला एवं निर्वासित तिब्बतियों की शरण स्थली मैनपाट स्थित है। 

मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है। 

इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।

मैनपाट
मैनपाट जलजली

जलजली की इस विशेषता से बाहरी दुनिया के लोग अधिक परिचित नहीं है। फ़िर भी कुछ सैलानी प्रतिदिन कुदरत के इस अजूबे को देखने के लिए पहुंचते हैं। 

जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है। 

यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। 

इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
मैनपाट
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
मेरा मानना है कि यह स्थान देश में धरती बनने की प्रक्रिया का प्रथम उदाहरण है। जब धरती पर जल ही जल था और उसके बाद धीरे-धीरे जल में वनस्पति का जमाव होने लगा और जल दलदल में परिवर्तित होकर ठोस होते गया. 

करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया के पश्चात जल ठोस भूमि में परिवर्तित हो गया। यहाँ पर जल से भूमि बनने की यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। सैकड़ों वर्षों के पश्चात यह भूमि भी ठोस हो जाएगी। 
मैनपाट जलजली
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
दलदली की इस भूमि के नीचे नदी बहती है। वनस्पति ने इस भूमि को इतना अधिक जकड़ रखा है कि इसका क्षरण भी नहीं होता और कूदने पर हमेशा यह इसी तरह की प्रतिक्रिया करती है। 

नदी के जल के ऊपर मिट्टी और वनस्पति की लगभग 4-5 मीटर मोटी परत है, इस पर मैने पत्थर से भरी ट्राली लेकर ट्रेक्टर को भी जाते हुए देखा है, यह जमीन इतने वजन के बाद भी फ़टती नहीं है और न ट्रेक्टर के पहिए इसमें धंसते हैं। प्रकृति का यह अजूबा मैने मैनपाट में देखा और कहीं नहीं।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

हिंगलाज माता का बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र


सरगुजा भ्रमण के दौरान सुरजपुर जिले के प्रतापपुर के प्राचीन मंदिरों का छायांकन किया। यहाँ राजा के बनवाए हुए कई मंदिर हैं जो सतत पूजित हैं। साथी अजय चतुर्वेदी एक स्थान पर मुझे ले गए जो अम्बिकापुर रोड़ पर एक रिहायशी मकान के पीछे था। 

यहाँ चबूतरे पर गोल पाषाण की एक चट्टान रखी है। इसे उन्होनें "हिंगलाज" माता का स्थान बताया। जिसे देख कर मैं चकित रह गया। चकित होने का कारण भी था। जिस तरह ग्रामीण अंचल में देवगुड़ी होती है और ठाकुर देवता बिना किसी छत के चबूतरे विराजते हैं उसी तरह "हिंगलाज" माई भी यहां विराजमान थी। 

छत्तीसगढ़ में मैने अन्य किसी स्थान पर हिंगलाज माता की विराजित होना नहीं पाया। न हि कहीं उत्खनन में उनकी कोई प्रतिमा प्राप्त होने की जानकारी मुझे है। पूछने पर पता चला कि प्रतापपुर के सभी देवता रक्सेल राजाओं की रियासत के पूर्व से हैं। उस समय यहाँ गोंड़ राजाओं का शासन होता था।
हिंगलाज माता प्रतापपुर सरगुजा छत्तीसगढ़
मेरी जानकारी में हिंगलाज माता के 3 तीन स्थान, पहला पाकिस्तान के बलोचिस्तान में, दूसरा उड़ीसा के तालचर से 14 किमी की दूरी पर और तीसरा वाराणसी की एक गुफा क्रीं कुण्ड में बाबा कीनाराम द्वारा स्थापित हिंगलाज माता की प्रतिमूर्ति है। 

पाकिस्तान के बलोचिस्तान राज्य में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हिंगलाज माता मंदिर हिन्दू भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र और प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है। 

पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया. मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था. 

यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं।
गुफ़ा में बिराजी हिन्गलाज माता बलोचिस्तान पाकिस्तान

वैसे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में माता सेवा में गाए जाने वाली पारम्परिक सेवा गीतों (जस गीत) में माता हिंगलाज का उल्लेख आता है तथा देवी के मान्य रुपों के साथ हिंगलाज माता की आराधना भी की जाती है। महामाई की आरती में भी हिंगलाज माता का स्मरण किया जाता है। यथा -

गढ़ हिंगलाज में गड़े हिंडोला
लख आये लख जाए
लख आये लख जाए
माता लख आए लख जाए
एक नइ आवय लाल लगुंरवा
जियरा के परान अधार
महामाई ले लो आरती हो माय
गुफ़ा में बिराजी हिन्गलाज माता बलोचिस्तान पाकिस्तान में भक्तगण
सारंगढ बिलासपुर रोड पर भटगाँव के समीप देवसागर में हिंगलाज माता है, सुना है सारंगढ राजा कही से ला रहे थे तो वही विराजमान हो गई।छिन्दवाड़ा जिले में हिंगलाज का भव्य मंदिर है।यह आदि संस्कृति के मातृ पूजा का ही एक रूप है...

मातृ पूजा या शक्ति पूजा भारतीय संस्कृति की मुख्यधाराओं में से एक है और लोक संस्कृतियों में झलक मिलती है...नाम, स्थान और भाषा भिन्न हो सकती है..जैसे छत्तीसगढ़ में हिंगलाज माता को बंजारी, बूढीमाई, माई, महामाई, इत्यादि कहा जाता है। 

यह प्रायः अनगढ़ शिला खंड के रूप में पाई जाती है। सुतियापाठ (सहसपुर लोहारा से करीब 15 km दूर) पहाड़ ऊपर हिंगलाज माई बिराजी हैं यहाँ दुर्गम रास्ता तय करके पहुंचा जा सकता है। इसके समीप गहरी सुरंग हैं और नदी भी प्रवाहित होती है। 

अब किस तरह हिंगलाज माता बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र तय करते हुए लोकगीतों में समाहित हुई और अन्य देवी के साथ आराध्य हुई, यह शोध का विषय है। इसके साथ ही सरगुजा के प्रतापपुर के अलावा अन्य स्थानों पर मिलना भी कम रोचक नहीं है।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सरगुजा की कैलाश गुफ़ा


छत्तीसगढ़ प्रदेश का प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय होने के साथ यहाँ का इतिहास भी उतना ही समृद्ध है। प्रदेश के सरगुजा अंचल हरित वनों, पर्वतों, नदियों का सौंदर्य रमणीय है। प्रत्येक स्थान पौराणिक इतिहास से भरा पुरा है और यहाँ सुरम्यता रमणीय है। रायपुर से हम इस अंचल के कैलाश गुफ़ा क्षेत्र के पर्यटन के लिए चल पड़े। रायपुर से अम्बिकापुर 358 किलोमीटर की दूरी पर है। इस नगर की पूर्व दिशा में सामरबार नामक स्थान पर 80 किलोमीटर की दूरी पर कैलाश गुफ़ा स्थित है। हम अम्बिकापुर से बतौली होते हुए पठार पर पहुंचे, यहाँ से जंगल के रास्ते पर चलते हुए गायबुड़ा नामक ग्राम से बांए सड़क पर चलकर कैलाश गुफ़ा तक पहुंचे। गायबुड़ा से सड़क सीधी पंडरापाट होते हुए बगीचा एवं जशपुर चली जाती है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थान महत्वपूर्ण है। 

यहाँ आदिवासी समाज के संत रामेश्वर गहिरा गुरु जी ने प्राकृतिक गुफ़ा की चट्टानों को तराश कर वर्तमान रुप दिया है। कैलाश गुफ़ा के नीचे झरना बहता है, जहाँ स्थानीय लोग धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न करते हैं। इस स्थान पर आने के पश्चात मन को शांति मिलती है और मनुष्य के प्रकृति से जुड़ जाता है। 

इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य एवं महत्ता को देखते हुए गहिरा गुरु जी ने अपनी उपासना के लिए चयन किया। सघन वन के बीच आश्रम, गुफ़ाएं, कल-कल करता झरना एवं पक्षियों का मधुर स्वर में आगंतुकों का स्वागत मन को मोह लेता है। ऐसा लगता है कि शहरी भाग दौड़ के से थोड़ा अलग रह कर दो चार दिन इस प्राकृतिक स्थल पर व्यतीत किए जाएं।


प्रकृति से एकाकार होने के लिए यह बहुत ही आदर्श स्थान है। यहाँ श्रद्धालुओं, दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों का बारहों मास आना लगा रहता है। यह खुबसूरत स्थान अपने साथ अनेक पौराणिक कथाओं को भी समेटे हुए है। वर्षा काल में इस स्थान की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। झरना अपने पूरे यौवन पर होता है, वनांचल में छोटे-मोटे वन्य प्राणी भी दिखाई देते हैं। हमें इस सुंदर स्थान का भ्रमण कर अपूर्व आनंद की अनुभूति हुई। सांझ तक यहाँ रहने के पश्चात हम पंड्रापाट से बगीचा होते हुए मैनपाट के अपने अस्थाई डेरे सैला रिजोर्ट में लौट आए।

रविवार, 28 अगस्त 2016

जंगल, हाथी और किसान

प्राचीन काल से छत्तीसगढ के वन हाथियों की आदर्श शरण स्थली रहे हैं। विशेषकर सरगुजा अंचल हाथियों के लिए प्रसिद्ध रहा है। मान्यता है कि इंद्र के एरावत जैसे सुंदर गजों के स्वर यहां के वनों में गूंजने के कारण इस अंचल का नाम सरगजा (surgaja) लोक प्रसिद्ध हुआ। यहां के हाथियों का दर्शन लाभ मुझे भी हुए। अबकि बार की सरगुजा बाईक यात्रा के दौरान प्रतापपुर के घाटपेंडारी में 32 हाथियों के दल की उपस्थिति मिली।

उड़ीसा एव॔ झारखंड से हाथियों के आने-जाने का कारीडोर बना हुआ है । इन तीनो राज्यों मे हाथी स्वच्छन्द विचरण करते हैं। बार नवापारा के जंगल में उड़ीसा से आए हुए एक गजदल ने कुछ वर्षों से स्थाई निवास बना लिया है। जंगल कटने के कारण इनका रहवास क्षेत्र निरंतर छोटा होते जा रहा है। नित्य ही हाथियों और मनुष्यों की आपसी मुड़भेड़ के समाचार मिलते रहते हैं। जिनमें कभी हाथियों के हमले से मनुष्य मारे जाते है तो कभी मनुष्यों के हमले से हाथी। दोनो में आपसी मुड़भेड़ सतत जारी है।

खबर है कि जशपुर क्षेत्र के ठाकुरटोली ग्राम में एक हाथी खेत की सुरक्षा के लिए खींचे गये विद्यूत तारों की चपेट में आकर मारा गया। आज आदमी जीत गया, एक खेत की फसल बचाने में कामयाब रहा और एक हाथी की पुन: बलि हो गयी। विडम्बना है कि दोनों को ही वनवास करना है पर दोनो को ही एक दूसरे की उपस्थिति फूटी आंख भी नहीं सुहा रही। जिसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। ग्रामीण मानते हैं कि हाथी उनके क्षेत्र का अतिक्रमण कर रहे हैं और जंगल हाथियों की बपौती है। निर्वहन करने कहां जाएगें?

झारखंड राज्य के प्रमुख सचिव सतपथी का कहना था कि वे छत्तीसगढ की सीमा पर हाथियों के आवा गमन के लिए उनके रास्ते मे प्राकृतिक जैसे दिखाई देने वाले सेतू का निर्माण कर रहे हैं जिससे हाथियों को रहवास एवं विचरण के लिए बड़ा क्षेत्र मिल जाएगा तथा आदमी और हाथियों की मुड़भेड़ कम हो जाएगी। छत्तीसगढ सरकार ने भी भी असम से हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूवा को बुलाया था। करोड़ों खर्च हुए पर वह भी कुछ विशेष नहीं कर पाई।

इस आपसी मुड़भेड़ में प्रतिवर्ष कईयों के प्राण हरण होते हैं। ऐसी स्थिति में वनांचल निवासियों को हाथियों को स्वीकार करना होगा तथा सह अस्तित्व मानकर निर्वहन करना होगा। तुम उनके रास्ते मे न आओ वे तुम्हारे रास्ते हे नहीं है। जब तक दोनो एक दूसरे की उपस्थिति स्वीकार नहीं करेगें तब तक दोनो का ही जीना कठिन है। अब हाथी मेरे साथी बनाकर ही जीने से समस्या का हल निकल सकता है।
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सोमवार, 18 अगस्त 2014

सरगुजा के व्याध : कुकूर असन घुमबो त खाबो साहेब

'हमर कोनो सुनई नईए, कोन ल गोहार पारबो, आत्मा नई माढ़य त दिन भर गली-गली कुकूर असन घुमबो त खाबो साहेब, नई त लांघन रहेला परही। अइसन जिनगी बना दे हे भगवान हमर।' (हमारी कोई सुनवाई नहीं है, किसको आवाज लगाएगें, आत्मा नहीं मानती तो दिन भर गली-गली कुत्ते की तरह घूमेंगें तो खाने को मिलेगा, नहीं तो भूखा ही रहना पड़ेगा, ऐसी जिन्दगी बना दी है भगवान ने हमारी) मेरे एक सवाल का उत्तर देते हुए रामप्रताप की आँखों में सदियों का दर्द झलकने लगा था। रामप्रताप व्याध जाति के लोगों का मुखिया है। जब मैं इनके मोहल्ले में पहुंचा तो वह कांधे पर खंदेरु लटकाए फ़ांदा खेलकर सांझ को घर लौटा था। उसकी झोली खाली थी, आज दिन भर की मेहनत के बाद भी उसे पेट भरने के लिए कुछ भी शिकार नहीं मिला था।
बेलदगी के शिकारी पारा में पत्रकार त्रिपुरारी पान्डे के साथ
लखनपुर (जिला सरगुजा) से 6 किलोमीटर की दूरी पर बेलदगी ग्राम के शिकारी पारा में कीचड़ से लथपथ कच्ची पगडंडी पर चलकर हम पहुंचे। सरकारी जमीन पर बसे इस पारा में लगभग 60 छानी (छत) हैं जिसमें व्याधा जाति के परम्परागत शिकारी परिवार निवास करते हैं। हमारे पहुंचते ही  बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएँ सारा मोहल्ला एकत्रित हो गया। उन्हें लगा कि कोई सरकारी आदमी उनके लिए खुशखबरी लेकर आया है। हमारे बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की और सभी लोग हमें घेर कर  बैठ गए। उनके फ़टे-मैले कपड़ों के बीच गरीबी एवं दरिद्रता झांक कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही थी।
व्याधा (शिकारी) परिवार
कोलाहल के बीचे शिवकुमार कहता है "हमारा खानदानी काम फ़ांदा खेलकर शिकार करना एवं जड़ी बूटी बेचना है। पुरुष जड़ी-बूटी बेचने  एवं फ़ांदा खेलने जाते हैं तथा महिलाएँ भीख मांगने के लिए।" इस तरह इनकी गृहस्थी चलती है। प्रत्येक घर में चिड़िया आदि पकड़ने के लिए फ़ांदे हैं। कहने पर शिवकुमार फ़ांदे मंगवाता है "फ़ांदा 2 तरह का होता है। पहला मंगरी एवं दूसरा खंदेरु। मंगरी फ़ांदा बांस की खपच्चियों को अंडाकार शक्ल देकर उसमें जाल एवं दरवाजा लगा कर बनाया जाता है तथा खंदेरु फ़ांदा भी बांस का ही बनता है, यह जिग-जैग शक्ल आयताकार होता है, इसे लम्बाई में फ़ैला कर चिड़िया फ़ंसाई जाती है।अब चिड़िया पकड़ना भी जुर्म हो गया है। इसलिए हमारा यह परम्परागत धंधा भी ख़त्म हो गया. खाने के लाले पड़े रहते हैं।
चिड़िया फ़ांसने का मंगरी फ़ंदा और आड़ में शिकारी
घुमंतु होने का खामियाजा इस जाति को भुगतना पड़ रहा है। रामप्रताप कहता है "20-25 साल पहले हम लोग अम्बिकापुर राजा की लुचकी स्थित बाड़ी में अपना डेरा डाले थे। उसके बाद बेलदगी आ गए। सारी जिन्दगी पेड़ के नीचे खुंदरा बांध कर रहने में गुजर गई। फ़िर इस स्थान पर अनुप राजवाड़े से बसा दिया तो डेरा स्थायी हो गया। अब हम लोग यहाँ झोंपड़ी बना कर रहते हैं, सरकारी सुविधा के नाम पर कुछ लोगों का राशन कार्ड बना है और घरों के लिए एक बत्ती कनेक्शन भी। कुछ लोगों को रोजगार गारंटी कार्ड भी मिला है। जाति एवं निवास प्रमाण पत्र बनाने के लिए 50 साल का जमीन रिकार्ड होना चाहिए। हम लोग सदा घुमंतु रहे हैं, इसलिए जाति प्रमाण पत्र एवं निवास प्रमाण पत्र की अहर्ताएँ पूर्ण नहीं करते। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए जाति एवं निवास प्रमाण पत्र अनिवार्य है।"
शिवकुमार अपनी बात कहता हूआ
इनके कबीले की भाषा मेवाड़ी बोली से मिलती जुलती है। धमना बाई कहती है "बड़े बूढे बताते हैं कि हमारे पुरखे उज्जैन से यहाँ आए थे। उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर कोरगल शिकारी द्वारा निर्मित पैदामी शिकारी देवी नौकोड़ का मंदिर है, मैने उस मंदिर के दर्शन किए हैं। हम जब आपस में बात करते हैं तो कबीले की बोली का प्रयोग करते हैं और बाहर जाते हैं तो छत्तीसगढ़ी, सरगुजिया तथा हिन्दी भाषा में बात करते हैं। मैं माला-मुंदरी के साथ जड़ी बूटी बेचने का काम करती हूँ। मेरे पास भंवरी फ़ल एवं रीठा की 2 तरह की माला है। भंवरी फ़ल की माला पहनने से चक्कर आने की बीमारी खत्म हो जाती है तथा रीठा की माला बच्चों को टोना-टोटका एवं नजर से बचाने के लिए पहनाते हैं। हम एक माला 20-30 रुपए में बेचते हैं।" प्रमाण के तौर पर धमना बाई अपने घर से माला लाकर दिखाती है।
उपर भंवरी माला तथा नीचे रीठा माला
इस कबीले में शिक्षा का प्रकाश फ़ैलने लगा है, जब से ये स्थायी रुप से बसेरा करने लगे हैं। इनके कबीले का सबसे अधिक पढा-लिखा  नौजवान उमरसाय है, जो लखनपुर के बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 11 वीं कक्षा की पढाई जीव विज्ञान की पढाई कर रहा है तथा 10 वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा उसने 57 प्रतिशत अंको से उत्तीर्ण की है। 8 वीं की पढाई कर रहा रुपेश मूक बधिर है। वह स्थानीय पाठशाला में ही पढ़ता है। शिक्षक द्वारा ब्लेक बोर्ड में लिखने पर वह समझता है और लिखता है। विडम्बना है कि इस कबीले में 5 लोग मूक बधिर हैं। रामप्रताप के 4 बेटे कुल्पा 30 वर्ष, जानु 27 वर्ष, आनु 20 वर्ष एवं रुपेश 16 वर्ष मूक बधिर हैं। किसी व्यक्ति की चारों संतान मूक बधिर हो जाएं तो उसके परिवार पर क्या गुजरती होगी ये तो वह स्वयं ही जान सकता है। वर्तमान में इस कबीले के 4 बच्चे पढाई कर रहे हैं, परन्तु निवास एवं जाति प्रमाण पत्र में अभाव में इनको आरक्षण की कोई सुविधा नहीं मिलने वाली।
व्याध जाति के लोगों के आवास
अंग्रेजों ने इस घुमंतु जनजाति को जरायम पेशा श्रेणी में सूचीबद्ध कर रखा था। जिसे आजादी के बाद भारत सरकार ने विमुक्त जनजाति घोषित किया। लखनपुर के वरिष्ठ पत्रकार त्रिपुरारी पाण्डे कहते हैं "भरण पोषण के लिए उपलब्धता निश्चित न होने एवं गरीबी होने के बावजूद भी ये चोरी-चकारी नहीं करते। भले ही भीख मांग कर, हाथ पैर जोड़ कर गुजारा कर लेते हैं। न ही आपसी लड़ाई झगड़े की रिपोर्ट थाने में होती है। शराब आदि पीकर विवाद होने पर ये अपने कबीले में ही उसकी सुनवाई कर निपटारा करते हैं तथा कबीले द्वारा निर्धारित सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत जो भी कुछ दंड निर्धारित होता है वह दिया जाता है ताकि भविष्य में फ़िर कोई गलती न करे।"
शिकारी पारा का चौक
आजादी की हम 68 वीं वर्षगांठ मना चुके हैं, परन्तु इन घुमंतु जातियों तक उसका उजाला नहीं पहुंचा है। शासन इनके लिए शिक्षा, आवास, रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं जुटा पाई है। जहाँ एक तरफ़ मलाईदार लोग आरक्षण की सुविधा लिए गलत आंकड़े देकर लाभ उठाने की जुगत में रहते हैं वहीं दूसरी ओर वास्तविक हकदारों की आवाज सरकार के कानों तक नहीं पहुंची है।
सरकार चाहती तो इनके हुनर का लाभ उठा सकती थी। भले ही शैक्षणिक दृष्टि से अनपढ़ है तो क्या हुआ, पर अपने परम्परागत कार्य में कुशल हैं, इन्हें जड़ी-बूटियों, पक्षियों, जंगली वनस्पतियों की जातियों की वृहद जानकारी है, जो इन्होंने अपने पूर्वजों से पाई है। उसके संरक्षण एवं संवर्धन में इनका सहयोग लिया जा सकता है। जंगल में वन संरक्षी के रुप में इनकी नियुक्ति हो सकती थी जिससे वन संरक्षण कार्य किया जा सकता है। 
उर्दू शायर मुजफ़्फ़र रजमी की पंक्तियाँ प्रासंगिक हो रही हैं " लम्हों ने खता की थी और सदियों ने सजा पाई।" परन्तु इस व्याधा जाति ने ऐसी कोई खता भी नहीं की है जिसकी सजा पीढी-दर-पीढी भीख मांग कर पा रहे हैं। चलते-चलते शिवकुमार करुण पुकार सुनाई देती है "साहब! हमारे लिए जो भी मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था कर देगा, उसकी पूजा हम अपने पारम्परिक देवताओं के साथ जीवन भर करेगें।" न जाने कब सरकार इनकी सुध लेगी और बनजारों को दर-दर भटकने के अभिशाप से मुक्ति से मिलेगी।

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

टप्पा रामपुर महरी जमीदारी में एक दिन

पृथ्वी पर सुरम्य सरगुजा अंचल निर्मित कर प्रकृति ने मानव को अनुपम उपहार दिया है यहाँ कोयल की कूक से लेकर इन्द्र के एरावत की चिंघाड़ आज भी सुनाई देती है। अपने मनभावन आवास सरगुजा के सघन वनों में हाथी आज भी स्वच्छंद विचरण करते हैं। मेहनतकश सरल एवं सहज निवासियों की धरती सरगुजा रियासत के अंतर्गत टप्पा रामपुर महरी जमीदारी थी, जिसका मुख्यालय गढ़ लखनपुर नामक स्थान था। रियासतें खत्म हो गई पर उनके अवशेष और रियासतकालीन परम्पराएं आज भी कायम हैं। गढ़ लखनपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 111 पर 23अंश 00’46.93” उत्तरी अक्षांश एवं 83अंश03’94.32” पूर्वी देशांश पर स्थित है। 
लखनपुर पैलेस
रामपुर के 170 एवं महरी 80 गाँव मिलाकर कुल 250 गाँव लखनपुर जमींदारी द्वारा शासित होते थे। संयोग से इस जमीदारी में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर नामक गाँव भी हैं जो राजस्थान की रियासतों की याद दिलाते हैं। रामगढ़ की शोध यात्रा के दौरान मेरा गढ़ लखनपुर जाना हुआ। कभी रामगढ़ भी लखनपुर जमीदारी का एक हिस्सा था। हम राष्ट्रीय राजमार्ग से बांए तरफ़ पैलेस मार्ग पर चलकर गढ़ लखनपुर पहुंचते हैं। सुबह की गुनगुनी धूप में वर्तमान अर्कसेल राजवंश के जमींदार लाल बहादुर अजीत सिंह बगीचे में कुर्सी डाले बैठे थे ( इन्हे स्थानीय लोग लाल जी बाबा के नाम से संबोधित करते हैं) । आस-पास के गांवों से 8-10 ग्रामीण उनके समक्ष अपनी समस्या लेकर आए हुए थे। वे उनकी समस्या सुनकर समाधान के लिए अपने ज्येष्ठ पुत्र कुमार अमित सिंह देव को आवश्यक निर्देश दे रहे थे। इससे जाहिर है कि आज भी वे अपनी रियाया के दु:ख दर्द को बांटते हैं और हर संभव सहायता करते हैं।
पुराने कारागार के खंडहर - स्टेट लखनपुर
उनसे अभिवादन के बाद मैं समीप में रखी हुई कुर्सी पर बैठ जाता हूँ और उनसे चर्चा प्रारंभ होती है। उन्होने कहा - "मैं आपके लेख पढता रहता हूँ, अच्छा लिखते हैं आप।" तभी मुझे याद आता है कि " सिरपुर एक सैलानी की नजर से" मेरी नई पुस्तक मेरे बैग मे हैं, वह पुस्तक उन्हें भेंट करता हूँ। उनका पुस्तकीय प्रेम मुझे बहुत भाता है। वे लगभग सभी साहित्यकारों की पुस्तकें पढते हैं, पुस्तकों से उन्हें बहुत लगाव है। कुछ देर बाद इसका मूल कारण भी समझ आ गया, उन्होने कहा - "मेरी उच्चशिक्षा सन् 1965 से 70 तक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई।" सहस्त्राब्दियों से बनारस साहित्य और संस्कृति की राजधानी रहा है, ऐसे महत्वपूर्ण शिक्षा के केन्द्र में शिक्षा ग्रहण करने से अवश्य ही साहित्य के प्रति रुझान हो जाता है।
वर्तमान राजा लाल बहादुर अजीत सिंह देव- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नात्कोत्तर उपाधि प्राप्त
चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा चलते रहती है। लखनपुर के विषय में एक कहावत है कि "लखनपुर के लाख तरिया"। इस कहावत में लखनपुर में लाख तालाब होने की बात कही जाती है। लाल जी बाबा कहते हैं - लाख तालाब तो नहीं है परन्तु हमारे पूर्वजों ने अकाल के समय जनता को काम देने और जल संसाधन विकसित करने की दृष्टि से यहां कई तालाब खुदवाए थे। जिससे उन्हें अकाल से राहत मिले।" तालाब के विषय में एक जनश्रुति भी सुनाई देती है कि बनारस के राजा लाखन सिंह के कोई पुत्र नहीं था। उन्होने पुत्र प्राप्ति हेतु संकल्प किया कि प्रतिदिन एक तालाब खुदवा कर जल ग्रहण करेगें। इस तरह उन्होने लखनपुर क्षेत्र में 360 तालाब खुदवाए थे।
लाल बहादुर अमरेश प्रताप सिंह देव
टप्पा रामपुर महरी जमींदारी गढ़ लखनपुर के विषय में स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार त्रिपुरारी पाण्डे कहते है - "टप्पा रामपुर महरी जमींदारी का 600 वर्षों का इतिहास मिलता है। सरगुजा महाराजा अमर सिंह देव ने अपने अनुज विशेश्वर बखश सिंह देव को यह जमींदारी दी, ये सरगुजा राज के खरपोशदार थे। उन्होने यहां पैलेस एवं कुलदेवी कात्यायनी के मंदिर का निर्माण कराया था। परम्परा अनुसार ज्येष्ठ पुत्र को ही गद्दी दी जाती है। इसी परम्परा में क्रमश महेश्वरी प्रसाद, रामप्रताप सिंह, हरप्रसाद सिंह अवधेन्द्र प्रसाद सिंह ने गद्दी संभाली। इसके पश्चात अमरेश प्रसाद सिंह देव ने कुछ दिनों तक गद्दी संभाली फ़िर स्टेट का विलय भारत संघ में हो गया। अमरेश प्रसाद सिंह देव के पश्चात लाल बहादुर अजीत सिंह देव वर्तमान में राजपरिवार के मुखिया का दायित्व निर्वहन कर रहे हैं।"
लाल बहादुर अवधेन्द्र प्रताप सिंह देव
पूर्ववर्ती राजाओं ने यहां शासन करते हुए अपने पूर्वजों की आज्ञानुसार महामाया मंदिर का जीर्णोद्धार, ठाकुर बाड़ी, शिवालय के निर्माण के साथ ही महेशपुर, देवगढ़ के मंदिरों की देख-रेख एवं पूजा अर्चना इनके सहयोग से अनवरत जारी है। लाल जी बाबा के ज्येष्ठ पुत्र तथा गढ़ लखनपुर के आठवीं पीढी के कुमार अमित सिंह देव मिलनसार व्यक्तित्व के धनी एवं स्थानीय राजनीति में सक्रीय है। वे पूर्व में नगरपंचायत के निर्दलीय पार्षद एवं वर्तमान में जनपद सदस्य हैं। ग्रामीण क्षेत्र में इनके सदव्यवहार की चर्चा होती है। 
स्टेट लखनपुर की आठवीं पीढी कुमार अमित सिंह देव
टप्पा रामपुर महरी के जमींदार को द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट के रुप में प्रजा को न्याय देने एवं अपराधियों को दंड देने का अधिकार था। इन्हें 4-5 माह की सजा देने का अधिकार सरगुजा रियासत के महाराजा की ओर से प्रदत्त था। और कैदी यहां पैलेस के बगल में बनी जेल में रखे जाते थे। बड़े संगीन अपराधी सरगुजा के बड़े जज की अदालत में भेजे जाते थे। पूरे क्षेत्र में कोरवा-पंडो आदिवासी राजा द्वारा प्रदत्त सुरक्षा कर्मियों की वर्दी पहनकर पहरेदारी करते थे। राजा न्यायप्रिय थे और चोर-बदमाशों की कोड़ों से पिटाई की जाती थी, जिससे डरकर यहां अपराध नहीं होते थे।

चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा सम्पन्न होती है, लाल जी बाबा मुझे पुन: पधारने के लिए कहते हैं। मैं उनसे आगे की यात्रा के लिए आज्ञा लेता हूँ और चल पड़ता हूँ रामगढ़ की ओर……। 

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

सरगुजा का सतमहला

प्रारंभ से पढ़े 
लखनपुर फ़ोन लगाने पर पता चला कि अमित सिंह देव को अम्बिकापुर आना है। इसलिए हम अम्बिकापुर के रायपुर आने वाले चौक पर ही रुक गए। उनके साथ कलेक्टर दफ़्तर तक जाकर वापस लखनपुर आए। अमित लखनपुर के जमीदार परिवार से हैं। लखनपुर में इनकी जमीदार कोठी है, जिसे अंचल वासी महल कहते थे। अब वह पुराना महल हो चुका है। महल के सामने ही इनका नया घर और बगीचा है। जिसमें आम आदि के वृक्ष लगे हैं। महल अब खंडहर हो चुका है। सामने का परकोटा बस बचा है। बाकी धराशायी हो चुका है। पुराने जमाने की ईंटों, सुरखी एवं चूने से निर्मित यह महल कभी स्थानीय सत्ता का केन्द्र हुआ करता था। लोकशाही की स्थापना के साथ-साथ जिस तरह राजशाही, जमीदारियां नेपथ्य में चली गयी, उसी तरह महलों की ड्योढी का महत्व भी घटता चला गया। जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन हो गया। राजा और प्रजा सब एक बराबर हो गए। मजदूर एवं बेगार को भी एक वोट देने का हक मिला और राजा को भी एक वोट का ही अधिकार मिला। 
लखनपुर का महल 
हम इनके निवास पर चाय पीने के लिए पहुंचे, जहाँ बाबूजी अजीत प्रताप सिंह देव से मुलाकात हुई। चाय के साथ चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि उनकी उच्च शिक्षा बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में हुई। उसके साथ ही बनारस के संस्मरणों का खजाना खुल गया। उनसे मिल कर ज्ञान रंजन हुआ। कभी समय मिला तो अवश्य ही उनके अनुभव की पिटारी से कुछ चुराना चाहुंगा। इस उम्र में भी लगातर पढते हैं। स्वाध्यायाम  न प्रमदति की सुक्ति को चरितार्थ करते हुए उनका स्वाध्याय का सफ़र जारी है। यहीं स्थानीय प्रत्रकार मुन्ना पाण्डे से भेंट होती है। उन्हे क्षेत्र की भौगौलिक स्थिति की अच्छी जानकारी है। अमित सिंह देव की रुचि भी अपने इतिहास एवं संस्कृति में है। जो व्यक्ति अपने इतिहास और संस्कृति को संजोने का प्रयास करता है वही सही  मायने त्रिॠणों के उॠण होने का अभ्यासी होता है। 
लखनपुर के मंदिर 
कहावत है कि लखनपुर में लाख पोखरा। कभी लखनपुर जमीदारी में लाख तालाब थे। लेकिन वर्तमान में 360 तालाबों मे    लखनपुर बस्ती के आस-पास बैगाई डबरी, मटकोरना डबरी, ढोड़िहा डबरी, सेमर मुड़ा, सिंवार तलवा, भावा ढोड़हा, देव तालाब, केसरुवा डबरी, दलदली तालाब इत्यादि हैं। राजमहल के रास्ते में ही प्राचीन शिवालय है, जिसकी रेख देख ट्रस्ट करता है। इसकी स्थापना स्थानीय जमीदारों ने ही कराई थी। परिसर में बजरंग बली भी विराजमान हैं। यहां जलकुंड है, कहते हैं कि इस स्थान के समस्त तालाब एक दुसरे से भूमिगत जल मार्ग से जुड़े हुए हैं। महल के दायीं तरफ़ महामाया मंदिर है। महामाया रकसेल राजवंश की कुल देवी हैं। इसके समीप  ही ठाकुर बाड़ी है।
श्री अजीत प्रताप सिंह देव
कोरिया राज्य के दीवान रघुबीर प्रसाद द्वारा लिखित झारखंड झंकार में सरगुजा की पाँच रियासतों सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगभखार का वर्णन किया है। ये रियासतें 1905 तक बंगाल प्रांत के अतंर्गत थी फ़िर इन्हे मध्यप्रदेश में शामिल किया गया। उपरोक्त पांचो रियासतों के नरेश क्षत्रिय थे। सरगुजा नरेश को "महाराजा" की एवं उदयपुर नरेश  को "भैया" की उपाधि वंशानुगत है। 1905 मे उदयपुर राज्य की एक सड़क के अलावा किसी भी राज्य में सड़क नहीं थी। आज हम उसी सड़क से चाय के उपरांत हम सतमहला की ओर चल पड़े। लौटकर उदयपुर के रेस्ट हाऊस में पंकज एवं राहुल से भेंट होनी थी।
देवगढ़ 
लखनपुर से थोड़ा आगे चलकर हम बायी तरफ़ नहर के कच्चे रास्ते पर चल पड़े। मुन्ना पांडे हमें छोटे रास्ते से सतमहला ले जा रहे थे। सतमहला से पूर्व हम देवगढ पहुंचे। यह स्थान रेंड नदी के किनारे पर स्थित हैं। दूर से देखने पर नवीन निर्माण दिखाई दे रहा था। समीप पहुंचने पर वट वृक्ष की जड़ो में फ़ंसे हुए मंदिर के अवशेष दिखाई दिए। यहाँ पर बलुई पत्थरों  से निर्मित शिव मंदिर समूह दिखाई दिया।। निर्माण में प्रयुक्त हुए पत्थरों रेत के मोटे दानों से बने हैं। जिसके कारण भुरभुरे एवं घिसे हुए दिखाई दे रहे थे। भग्न मंदिरों के अवशेष यत्र-तत्र बिखरे हुए पड़े हैं। मंदिर विनष्ट होने के कारण स्थानीय निवासियों ने एक मुखी शिवलिंग पर नवीन मंदिर का  निर्माण करवा दिया। यहाँ प्रतिवर्ष शिवरात्रि को तीन दिवसीय मेला भरता है। पास ही एक मंदिर के गर्भगृह में हनुमान की प्रतिमा स्थापित है। भग्न मंदिरों के आमलक भूमि पर पड़े हुए हैं।
सतमहला का शिवालय 
हम यहां से सतमहला की ओर चल पड़े। गांव के कच्चे रास्ते से चलकर सतमहला मंदिर समूह पहुंचे। कलचा-भदवाही ग्राम स्थित इस स्थान को सतमहला नाम दिया गया है। इससे प्रतीत होता है कि कभी यहाँ पर सप्त प्रांगण का महल रहा होगा। लेकिन वर्तमान में जो मंदिरों के समुह दिखाई देते हैं उनसे लगता है कि सप्त मंदिरों के समुह होने के कारण इस स्थान का नाम सतमहला रुढ हुआ होगा। यहाँ पर तालाबों की भरमार हैं। तालाबों में कमल खिले हुए दिखाई दे रहे थे। मंदिर समूह के समीप ही ईंटों से निर्मित एक षटकोणिय प्राचीन बावड़ी दिखाई देती है। एक ग्रामीण ने बताया कि इस स्थान पर संरक्षित करने का कार्य जी एल रायकवार तत्कालीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के द्वारा हुआ है। मैने रायकवार जी को फ़ोन लगा कर उनसे इस स्थान के विषय में जानकारी ली। यहाँ उत्खनन का कार्य ताला डीपाडीह वाली जोड़ी रायकवार जी एवं राहुल सिंह जी ने किया। 
अष्टकोणिय प्राचीन बावड़ी
ग्राम सतमहला में सन् 1964-65 में बैजनाथ गिरी गोस्वामी के द्वारा स्थानीय लोगों की मदद से टीलों की खुदाई कराई गयी। इस स्थान पर देवबोरा तालाब, पखना तालाब, मांझी तालाब, मंझियाईन तालाब, डोकरा डबरी, आदि तालाबों के नाम गिनाए जाते हैं। इस स्थान पर पंचायतन शिव मंदिर दिखाई देता है जिसके स्तंभ खड़े हैं और अधिष्ठान सलामत हैं। द्वार पर नदी देवियाँ बनी हुई हैं। देखने से लगता है कि यह मंदिर भव्य रहा होगा। इस मंदिर समूह के अवशेष पूरे टीले में बिखरे हुए हैं। साथ ही आवासीय संरचना भी दिखाई देती है। इसके साथ ही पंचायतन शिवालय के सामने दाईं तरफ़ वृक्ष के नीचे बड़े पत्थरों से निर्मित एक संरचना में छत बनी हुई  है जिसमें शिवलिंग के साथ त्रिशुल इत्यादि भी रखे हुए हैं। कुछ पत्र पुष्प भी अर्पित किए हुए दिखाई दिए।
ताराकृति मंदिर 
इस स्थान से थोड़ा आगे चलने पर प्रस्तर के अधिष्ठान पर निर्मित भग्न ताराकृति मंदिर दिखाई देते हैं। एक मंदिर पूर्वाभिमुख है तथा दूसरा मंदिर पश्चिमाभिमुख। इस मंदिर के खंडित अवशेषों से कोई जानकारी नहीं मिलती कि यह किस देवता को अर्पित था और यहां कौन देवी देवता विराजते थे। हम लोग यहाँ कयास लगाते रहे लेकिन जानकारी नहीं मिल पाई। देवगढ़, सतमहला एवं ताराकृति मंदिर 8-9वीं शताब्दी के कलचुरी कालीन माने जाते हैं। अब यहाँ दोपहर हो चुकी थी और हमें वापसी की यात्रा के लिए काफ़ी मार्ग तय करना था। अब पक्की सड़क से हम उदयपुर विश्राम गृह पहुंचे जहाँ पर पंकज एवं राहुल प्रतीक्षा में थे। दोपहर का नाश्ता करके मित्रों से विदा लेते हुए हम अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए। अभी सरगुजा का भ्रमण सम्पन्न नहीं हुआ है। मिलते हैं अगले दौरे के बाद कुछ ही दिनों में।

बुधवार, 23 जनवरी 2013

तिब्बतियों का टाउ……

सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी। सूरज भी रजाई ओढे गुड़ की लाल चाय की ताक में था। चाय आई तभी वह रजाई से बाहर निकला और सूर्योदय हुआ, इसके बाद मैने आंवला की दातौन का प्रयोग दांत मांजने के लिए करते हुए विश्राम गृह के लॉन के दो तीन चक्कर लगाए। राहुल और पंकज भी सोकर उठ गए। कमरे में यत्र-तत्र गुजरी हुई रात को बजे माउथ आर्गन के ब्लंडर की निशानियाँ मौजूद थीं। राहुल मोबाईल उठा कर दूर एक कोने में बतियाने लगा।  हम मार्निंग वाक करते हुए उसके समीप से गुजरे तो उसकी धीमी-धीमी आवाज सुनाई दी लेकिन समझ में नहीं आया क्या बतिया रहा था। समझ में नहीं आया कि उसकी कौन सी गर्लफ़्रेंड एक दम फ़ुरसत में थी जो अल सुबह ही इसे फ़ुसफ़ुसाने का मौका दे रही थी। चलो छोड़ा जाए इन बातों को, क्या रखा है, अगर हमारे जमाने में ऐसे फ़ोनवा होता तो ………:)
उदयपुर  का  विश्राम गृह 
स्नानाबाद अमित सिंह देव का फ़ोन आया और उन्होने जानकारी दी कि किसी विशेष कार्य से आज उपस्थित नहीं रहेगें। हमारे साथ विष्णु सिंह देव जाएगें मैनपाट के लिए। नाश्ता करने का मन नहीं था। रात का खाया ही हजम नहीं हुआ था। विरेन्द्र प्रभा होटल का कमाल था एक बार खाओ तो कई दिन तक भूख न लगे। शायद कोई नया फ़ार्मुला विकसित किया है।  अम्बिकापुर पहुंचने पर विष्णु सिंह देव मिल गए, साथ ही उनका एक साथी भी था। ये कांग्रेस की छात्र राजनीति में सक्रीय हैं और राजनीति को ही कैरियर बनाने के पक्ष में अधिक दिखाई दिए। थोड़ी जिज्ञासु प्रवृति होना इनके लिए लाभदायक है। जिज्ञासु होने से ही ज्ञान बढता है और उचित मार्ग दिखाई देता है।
मैनपाट का रास्ता  
हमने रास्ते के नाश्ते के लिए केले लिए और दरिमा होते हुए मैन पाट की ओर चल पड़े। मैनपाट को छत्तीसगढ का शिमला या धर्मशाला मान सकते हैं। शिमला इसलिए कि यहाँ का मौसम ठंडा है और धर्मशाला इसलिए कि यहाँ शरणार्थी तिब्बतियों का बसेरा है। अम्बिकापुर से मैनपाट जाने के लिए 2 रास्ते हैं। पहला अम्बिकापुर व्हाया सीतापुर होते हुए दूसरा अम्बिकापुर व्हाया दरिमा होते हुए। अम्बिकापुर से मैनपाट की दूरी 75 किलोमीटर है। पाट से तात्पर्य है पठार, मैनपाट विंध्य पर्वतमाला पर समुद्र तल से 3781 फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी लम्बाई 28 किलो मीटर एवं चौड़ाई लगभग 13 किलोमीटर है। मैनपाट से रिहन्द एवं मांड नदी का उद्गम हुआ है।
टाऊ  के खेत में भविष्य  का ताऊ 
दरिमा के बाद मैनपाट की चढाई प्रारंभ हो जाती है। वन क्षेत्र से होते हुए हम मैनपाट की ओर बढ रहे थे। रास्ते में बड़े ट्रक मिलने लगे। पता चला कि यहां पर बाक्साईट की खदाने हैं जिनसे कच्चा माल निकाला जा रहा है। 1993 से बाक्साईट की  खदाने खुलने के कारण अंधाधुंध वनों को काटा गया जिससे यहाँ के प्राकृतिक परिवेश को नुकसान पहुंचा है। इन भारी ट्रकों के कारण सड़क का भी सत्यानाश हो गया है। बीच में सड़क निर्माण का कार्य भी चालु है। पठार पर पहुंचने के बाद गुलाबी सफ़ेद फ़ूलों से भरे हुए खेत दिखाई देने लगे। ये खेत टाऊ के थे। टाऊ का आटा बनता है जिसका उपयोग व्रत उपवास में फ़लाहार के लिए किया जाता है। 
टाऊ 
टाऊ को कुट्टु कहा जाता है। उत्तर भारत में इसके आटे का उपयोग नवरात्रि इत्यादि व्रत उपवास के समय फ़लाहारी के रुप में प्रयोग में लाया जाता है।  2011 की नवरात्रियों के दौरान  दिल्ली, बुलंदशहर और मुजफ्फरनगर, नोयडा आदि शहरों में कुट्टु  के मिलावटी आटे का कहर बरपा, जिसके कारण नोयडा में एक व्यक्ति की मौत हो गयी एवं लगभग 600 अस्पताल में भरती कराया  गया। कुट्टु  चावल की एक प्रजाति मानी जाती है जिसका बाटनिकल नाम फ़ैगोपायरम-एफ़क्युलैंटम है। यह एक हाई प्रोटीन फ़ुड है और इसे संग्रहित करने पर इसमें फ़ंगस लग जाती है और यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है। इसके आटे को घर में ही तैयार करना चाहिए। हमने कुट्टु की फ़ोटो ली और आगे बढे।
देवानंद ने 3 किलो सोना ख़रीदा 
मैनपाट में वनों से हवा के साथ आने वाली प्राकृतिक फ़ूलों की खुशबू मन और आत्मा को तरंगित कर देती है। पक्षियाँ का कलरव एवं झरनों की कल-कल स्वर्गिक वातावरण का निर्माण  करती है। लगता है कि यही आकर धूनी रमाई जाए। सोचना तो ठीक है लेकिन निर्वहन करना कठिन वातावरण में ठंडक बनी हुई है और लगता है शाम तक अच्छी ठंड होने वाली है। रात का तापमान तो लगभग मायनस डिग्री में पहुंच जाता है जिससे पाला भी पड़ जाता है। तिब्बतियों के निवास के लिए यह मौसम आदर्श है। सड़क के किनारे साल के बड़े-बड़े वृक्ष आसमान से होड़ यहीं लेते हैं। रात को इस पठार में भालुओं का भ्रमण भी होता है। यदा कदा निवासियों से उनकी मुड़भेड़ होने के समाचार मिलते रहते हैं।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

सामत सरना एवं टांगीनाथ ……… ललित शर्मा

बिजली विभाग का चीफ़ इंजीनियर
प्रारंभ से पढें
अम्बिकापुर से 73 किलोमीटर शंकरगढ से आगे जाने पर डीपाडीह का सामत सरना टीला आता है। हमारी गाड़ी गेट पर रुकती है। राहुल और पंकज मुझसे पहले प्रवेश करते हैं और मै थोड़ी देर पश्चात रास्ते में लगी हुई  मूर्तियों को देखते हुए आगे बढता हूँ। यहीं पर मेरी मुलाकात सामत सरना मंदिर समुह के चौकीदार जगदीश से होती  है। हँसमुख व्यकित्व का धनी जगदीश मुझे मूर्तियों के विषय में जानकारी देता है। मैं कुछ चित्र लेता हूँ। मुख्य मंदिर के समक्ष राहुल एक पंडित नुमा व्यक्ति को अपनी हस्त रेखाएं दिखा रहा था और उससे सवाल कर रहा था। राहुल की शादी के विषय में उसने बताया कि अब  के फ़ागुन में हो जाएगी। राहुल प्रसन्न भए और दस रुपया दक्षिणा किए। इनके संवादों से मेरा ध्यान भी उनकी तरफ़ चला गया।

सामत सरना मे अमित सिंह देव
खल्वाट खोपड़ी, माथे एवं गले में रोळी चंदन, हाथ में कुछ कागज-कापी, पेन के साथ दो फ़िल्मी नायिकाओं के चित्र के साथ अगरबत्ती रखे हुए था। शर्ट के साथ कटिवस्त्र धारित उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली लगा। मेरे चर्चा होने पर उसने बताया कि वह बिजली विभाग का चीफ़ इंजीनियर था, बिजली के खंभे पर चढने दौरान उसे बिजली का झटका लग गया। तब से नौकरी छोड़ दिया है। हाथ  में रखी नायिका की फ़ोटो दिखाकर कहता है कि - यह मेरी पत्नी है और यह बेटी है। दूसरी फ़ोटो को इंदिरा गांधी कह रहा था। इससे जाहिर हो गया कि उसका दिमाग फ़िरा हुआ है। फ़िरे हुए दिमागी से इस सिरफ़िरे को और भी चर्चा करने की इच्छा हो रही थी। लेकिन हमारे पास समय कम था। इसलिए अपने उद्धेश्य की ओर मुड़ गए।

गज लक्ष्मी अंकन
डीपाडीह का यह सामत सरना मंदिर समूह है। मुख्य मंदिर का द्वार अलंकरण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सिरदल के ललाट पर पद्मासन में बैठी हुई गजलक्ष्मी के साथ दोनो तरफ़ शिव का अंकन है। द्वार शाखाओं पर नदी देवी गंगा एवं यमुना का अंकन है। बांयी द्वार शाखा पर नदी देवी यमुना के साथ ही चैत्य गवाक्ष के उपर मिथुन अंकन भी दिखाई देता है। दायीं द्वार शाखा में इस स्थान पर वीणावादिका दिखाई देती है। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग एवं जलहरी खंडित है। इस मंदिर में अन्य मूर्तियां भी स्थापित हैं जिनमें नृवराह, भैरव, गौरी, ब्रह्मा, नृत्य गणेश, कार्तिकेय, महाविष्णु, महिषासुर मर्दनी प्रमुख हैं। भग्नवशेषों से प्रतीत होता है कि इन मंदिरों के अनुपम शिल्प सौंदर्य को देख कर मुसाफ़िर अपनी धड़कन भूल जाया करता होगा।

परशुधारी शिव- सामत राजा
मुख्य मंदिर के सामने बहुत सारे छोटे-छोटे शिवमंदिर हैं।  संख्या में ये लगभग 40 होगें।  मंदिर समूह के निकट ही दो नदियों (गलफ़ुल्ला एवं कन्हर) दो नदियों का संगम है। गलफ़ुल्ला नामकरण पर राहुल सिंह का कहना है कि इस नदी के जल के उपयोग से गला फ़ूलने जैसी कोई बीमारी मानव एवं पशुओं में हो जाती होगी। इसलिए गलफ़ुल्ला नाम प्रचलन में आया होगा। सामत सरना समूह परिसर में  परशुधर शिव की सबसे ऊंची प्रतिमा रखी हुई है। इसे स्थानीय जन सामत सरना राजा रहते हैं। यह प्रतिमा चतुर्भुजी है। अलंकरणो के साथ बांया पैर घुटने से टूटा हुआ है तथा दायां पैर जंघा से खंडित है। बाएं पैर के नीचे परशु दिखाई देता  है। प्रतीत होता है कि यह पैर परशु पर रखा होगा।

मुख्य मंदिर का दृश्य
किंवदंतियों से ज्ञात होता है कि सामत सरना एवं झारखंड राज्य में स्थित टांगीनाथ के मध्य युद्ध हुआ था। जिसमें सामत सरना राजा वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद सामत सरना की सभी रानियों ने परिसर में स्थित बावड़ी में डूब कर प्राण त्याग दिए। परिसर में स्थित परशुधारी शिव की प्रतिमा को स्थानीय जन सामत सरना मान कर पूजा करते हैं। सरगुजा के आदिवासी अंचल में सामत सरना एवं टांगीनाथ के विषय में जनश्रुतियाँ बिखरी पड़ी हैं। ये दोनो स्थानीय निवासियों की श्रद्धा के केन्द्र बन गए हैं। सामत सरना मंदिर के समक्ष शत लिंग स्थापित है। इसके समीप ही एक आमलक भी पड़ा है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल नंदी स्थापित है। शिल्पकार ने नंदी प्रतिमा का बहुत सुंदर निर्माण किया है।

विष्णु सिंह देव, शत लिंग एवं केयर टेकर जगदीश
जगदीश कहता है कि पहले यहाँ बहुत सारे पोखर-तालाब इत्यादि थे। अब थोड़े ही बचे हैं। ब्रह्मा की प्रतिमा पगड़ीधारी है साथ ही लिंग भी दिखाई देता है। शिल्पकार ने इस प्रतिमा को अंतिम रुप नहीं दिया है। पत्थर पर छेनी की मार के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। स्तम्भों पर मिथुन अलंकरण भी दिखाई देता है। साथ ही इस स्थान पर शतलिंग भी दिखाई देता है। खंडहरों से अनुमान होता है कि कभी यह मंदिर समूह भव्यता लिए होगा। सामत सरना समूह का अवलोकन कर हम शंकर गढ की ओर लौट चले। हमारा दोपहर का भोजन शंकर गढ के विश्राम गृह में था। शंकर गढ का विश्राम गृह अधिक पुराना नहीं है। लगभग 30 साल हुए होगें इसका निर्माण हुए। इसके केयर टेकर ने बताया कि विश्राम गृह के आरंभ से ही वह यहाँ पर पदस्थ है। भोजन करने के पश्चात हम आगे की यात्रा पूर्ण करने के लिए चल पड़े। ……… आगे पढें … जारी है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

सामत सरना डीपाडीह की ओर यायावर


बिलासपुर टेसन
यात्राएं चलते रहती हैं जीवन के साथ। जीवन भी एक यात्रा कहा जाता है। मैने देखा कि यात्राओं का कोई कारण होता है। कोई निमित्त होता है, अकारण यात्राएं भी अकारथ नहीं होती। इस यात्रा का कारण पंकज का 27 नवम्बर 2012 की रात का फ़ोन संदेश बना। शाम को पंकज का फ़ोन आता है और वह कहता है कि आज रात को नेपाल चलते हैं कार से। बहुत दिन हो गए कहीं गए। रात को और सीधे नेपाल हीं, नहीं मुझे नहीं जाना है। फ़िर कहीं भी चलिए लेकिन आज ही चलना है। कल सुबह आता हूँ उसके बाद सरगुजा चलते हैं। वहीं के स्मारकों एवं जंगल की सैर करते हैं। कई दिनों से वहां के मित्र बुला भी रहे हैं। सही मौका है उधर ही चला जाए। सरगुजा भ्रमण तय हो जाता है। अगले दिन हमें सरगुजा जाना है। यहाँ जाने का कार्यक्रम बाईक से क्वांर नवरात्रि के समय भी बन गया था। लेकिन पंकज की तरफ़ से ढिलाई होने के कारण रह गए।

सुंदरवन
सरगुजा जाना पहले भी हुआ है। लेकिन जी भर के नहीं देखा था। घने जंगलों के बीच सुरम्य वादियाँ और उतने ही स्नेही निवासी मुझे हमेशा आकृष्ट करते रहे हैं। बिलासपुर पहुंच कर पता चला कि शाम को 4 बजे चलना है। तो मुड खराब हो गया। बना बनाया प्लान चौपट। मुझे रास्ते में चैतुरगढ और कलचुरियों की प्राचीन राजधानी तुम्माण भी देखना था। वैसे नवम्बर-दिसम्बर के माह में दिन छोटे हो जाते हैं। अब 4 बजे निकलने के बाद पाली पहुंचते तक ही शाम हो जाएगी। इसके बाद तुम्माण देखना तो संभव ही नहीं है। दोनो जगहों को देखते हुए हमें रात 8 बजे तक कटघोरा के विश्रामगृह में पहुंचना था। कटघोरा पहुंचते तक अंधेरा हो चुका था। अब हमें उदयपुर तक जाना था तथा हमारा रात्रि विश्राम उदयपुर के विश्रामगृह में तय हुआ। लखनपुर के अमित सिंहदेव ने वहाँ व्यवस्था कर दी थी।

दूरियाँ बताता सूचना फ़लक

अमित सिंह देव लखनपुर ने बताया कि कटघोरा से उदयपुर की दूरी लगभग 70 किलो मीटर होगी। कटघोरा से अम्बिकापुर वाली सड़क पर पहुंच कर यह लगा कि हमने सड़क मार्ग द्वारा अम्बिकापुर जाने की बहुत बड़ी भूल कर दी। सड़क की हालत देखकर लगा कि 70 किलो मीटर का रास्ता अगर रात भर में तय हो जाए तो बहुत बड़ी बात है। सड़क कहीं है ही नहीं, सिर्फ़ गड्ढे ही गड्ढे। कहना चाहिए गड्ढों में सड़क ढूंढना भी बहुत कठिन कार्य है। छत्तीसगढ में इतनी गंदी सड़क पहली बार देखी है। ऐसा लग रहा था किसी अन्य राज्य की सीमा में प्रवेश कर गए। पता नहीं सरगुजा की इस सड़क के प्रति सरकार सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है। जब ओंखली में सिर दे ही दिया तो अब मुसल का प्रहार भी सहना पड़ेगा। मै पिछली सीट पर लेट गया, पंकज और राहुल दोनो पायलेट और नेवीगेटर की भूमिका में थे।


उदयपुर विश्राम गृह
रास्ते में भूख लगने लगी। एक ढाबा देख कर गाड़ी को किनारे लगाया और ढाबे में पहुंच गए। ढाबा छोटा ही था, लोग हिलते डुलते नजर आ रहे थे। रात का समय हो और जंगल के निवासी हिलते डुलते नजर न आएं तो समझना चाहिए कि हम वन क्षेत्र में नहीं है। आज कुछ स्पाईसी खाने का मन था। हमने भी जंगली खाने का आडर दिया। उसने कुक्कड़ बहुत बढिया बनाया।  मनवांछित भोजन मिलने के बाद आत्मा तृप्त हो गयी। अन्य सहयात्रियों ने भी खाने की तारीफ़ की। भोजन जैसा महाआयोजन सफ़ल हो गया। इससे हम भी धन्य हो गए। गाड़ी फ़िर सड़क पर आ गयी। मै पिछली सीट पर लेट गया। क्योंकि इस सड़क पर सोते हुए चलना ही ठीक है। जागते हुए तो रास्ता भी नहीं कटता। मेरी आँख 11 बजे उदयपुर रेस्ट हाऊस के मुख्यद्वार पर पहुंच कर खुली। रेस्ट हाऊस के गृह मंत्री ने गेट खोला। ठंड अच्छी थी मै बिस्तर के हवाले हो गया।

सामत सरना शिवमंदिर एवं विष्णु सिंह देव
सुबह चौकीदार लाल चाय बनवा कर ले आया। सुबह की चाय के बाद थोड़ी नींद की खुमारी उतरी। चाय के बाद रेस्ट हाऊस का एक चक्कर लगाया तो आस पास के शहरों दी दूरियाँ बताता हुअ एक सूचना फ़लक दिखाई दिया। जिसमें कटघोरा से उदयपुर की दूरी 112 किलो मीटर लिखी थी। चौकीदार गरम पानी ले आया और हम स्नानाबाद से लौटकर आगे की यात्रा के लिए तैयार हो गए। सुबह से दो बार अमित सिंह देव का फ़ोन आ गया था। हम रेस्ट हाऊस से बिना नाश्ता किए ही लखनपुर चल पड़े। अमित सिंह देव लखनपुर में रहते हैं। इनके विषय में चर्चा बाद में की  जाएगी। इन्होने अम्बिकापुर के युवा नेता विष्णु सिंह देव को साथ लिया। जायसवाल होटल में नाश्ता करके डीपा डीह की ओर चल पड़े। अम्बिकापुर से शंकरगढ 60 किलोमीटर पर एवं शंकरगढ से डीपाडीह 15 किलोमीटर पर स्थित है। डीपाडीह पुरातात्विक स्थल है, जहाँ उत्खनन कार्य राहुल सिंह के द्वारा हुआ॥

विष्णु सिंह देव, अमित सिंह देव, ललित शर्मा
लगभग 10 बजे हम डीपाडीह के लिए चले, अम्बिकापुर से डीपाडीह की सड़क अच्छी है। सड़क को देख कर हम कटघोरा से अम्बिकापुर आने का दर्द भूल चुके थे। विष्णु सिंह देव शंकरगढ जमीदारी से हैं। उन्हे इस इलाके की अच्छी जानकारी होने के कारण उनका साथ हमारे जैसे जिज्ञासु के लिए अच्छा रहा। यह सुरम्य वन आच्छादित इलाका है। डीपाडीह के सामत सरना समूह को देखने इच्छा कर दिनों से थी। कई बार जाने का प्रयास हुआ लेकिन समयाभाव के कारण सफ़लता नहीं  मिली। आज समय आ गया हमारे डीपाडीह पहुचने का। कुछ वर्षों पूर्व इस इलाके में नक्सलियों की आमद हो चुकी है। यह इलाका नक्सल प्रभावित माना जाता है। चर्चा के दौरान हम 12 बजे शंकर गढ पहुंच कर विष्णुसिंह देव के चाचा जी से मिले। उसके बाद हम डीपाडीह के सामत सरना समूह पुरातत्विक स्थल पर पहुंचे।

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