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शनिवार, 28 जुलाई 2012

गड़ा खजाना मिला मुझे ------------------- ललित शर्मा

मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
धरती के कोने-कोने में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं,छत्तीसगढ भी इससे अछूता नहीं है। यहां पग-पग पर पुरावशेष मिल जाते हैं। धरती की कोख में खजाने गड़े हुए हैं, हम यह किस्से कहानियों में सुनते आए हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजाओं के खजाने सुरक्षित रखने की दृष्टि से धरती में या गिरि कंदराओं में छिपाए जाते थे। पृथ्वी में गड़े पुरावशेष भी किसी गड़े हुए खजाने से कम नहीं है। जब यह खजाना बाहर आता है तो अपने काल के सारे किस्से उगल देते हैं।

चौरस मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
ऐसा ही एक पुरातात्विक खजाना उगलने को तैयार है 21N05 81E46 अक्षांश-देशांश पर जिला रायपुर छत्तीसगढ के अभनपुर जनपद एवं नगर पंचायत का राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर बसा हुआ ग्राम बड़े उरला। इस गांव को लगभग200-250 वर्ष पूर्व बोधवा गौंटिया द्वारा बसाया था। इनके परिवार के 40-45 घर अभी भी यहाँ निवास करते हैं। इनके वंशज 60 वर्षिय हृदय लाल गिलहरे (गुरुजी) सेवानिवृत व्याख्याता है। ग्रामाधारित विषयों पर हमेशा इनसे चर्चा होते रहती है। उन्होने बताया कि उरला गाँव कुल रकबा (छोटे उरला एवं बड़े उरला) 1800 एकड़ का है। इनके पूर्वजों ने गाँव में ईशान कोण में दर्री तालब एवं पूर्व में बंधवा तालाब बनवाया था।


हृदयलाल गिलहरे(गुरुजी) पार्श्व में ठाकुर देव

शासकों द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से बनाए जाने वाले दुर्गों (किलों) में गिरि दुर्ग, जल दुर्ग एवं धूलि दुर्ग (मडफ़ोर्ट) प्रमुख हैं। 26 जुलाई 2012 को गुरुजी से हसदा के मडफ़ोर्ट के विषय में चर्चा हो रही थी, तो वे मुझे गाँव के पूर्व में स्थित डीह (टीला) दिखाने ले आए। शाम के समय मैंने यहाँ की संरचना देखी। देखते ही अहसास हो गया कि यह एक मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) है। मुझे गांव की पूर्व दिशा में मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) के अवशेष के साथ पुरातात्विक प्रमाणो की जानकारी मिली। इस स्थान पर मैं बचपन से जाता रहा हूँ। यहाँ पर सैकड़ों साल पुराना विशाल पीपल का वृक्ष हुआ करता था।

डीह पर स्थापित ठाकुर देव
जिसकी गोलाई लगभग 30 फ़ुट रही होगी। गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि यह वृक्ष कितना पुराना है यह किसी को नहीं पता। इस स्थान को देखने पर पता चलता है कि यहां चारों तरफ़ लगभग 15 फ़ुट चौड़ी एवं 20 फ़ुट गहरी खाई है। इस मडफ़ोर्ट के पूर्व एवं पश्चिम के द्वार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उत्तर-दक्षिण के द्वार गुगल इमेज से दिखाई देते हैं। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण ग्रामवासी इसे "डीह" ( टीला या ऊंचा स्थान) कहते हैं। डीह के आग्नेय कोण में पीपल के वृक्ष के नीचे सर्वमान्य प्रमुख ग्राम देवता ठाकुर देव का स्थान है। यहाँ सदियों से किसान अक्ति (अक्षय तृतीया) को दोना में धान चढाते हैं और पूजा अर्चना करके खेती-किसानी की शुरुआत करते हैं।

पूर्व दिशा में मड फ़ोर्ट की खाई
डीह की पूर्व दिशा में किसान के खेत में एक गड्ढा है जिसमें बरसात होने के कारण पानी भरा हुआ है। गुरुजी कहते हैं कि यह सुरंग हैं, जब कोई सगा मेहमान गाँव में आता था उनके दादा उसे यह सुरंग दिखाने के लिए लाते थे। सुरंग के पास लेट्राईट में खोदे हुए 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे हैं। ऐसे ही गड्ढे बावड़ी के पास भी बने हुए हैं। सुरंग से लगभग 700 फ़ुट की दूरी पर एक 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी है। जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। बड़े उरला के प्रवेश में 1942 में गिरधारी कहार (तत्कालीन गौंटिया) द्वारा बनाया गया पंचमुखी शिवालय भी है। गाँव के ईशान कोण में दर्री तालाब के किनारे शीतला मंदिर है और डीह के ईशान कोण में सतबहनिया देवी है। डीह के पश्चिम एवं गांव के पूर्व में सांहड़ा देव है। डीह के पूर्व में भैंसासुर है। किसानों के आधिपत्य में होने के कारण डीह की मिट्टी खुदाई कर किसान अपने खेतों में डालते थे। यहाँ की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण खेतों में दो-तीन वर्ष तक गोबर खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती। उपजाऊ भूरी मिट्टी होने के कारण किसानों ने डीह के आधे हिस्से की खुदाई करके अपने खेतों में पहुचा डाली। बताते हैं कि डीह को खोदने पर मानवोपयोगी घर-गृहस्थी के उपकरण प्राप्त होते हैं। जिनमें मिट्टी के पके लाल बर्तन, दीया, खाना पकाने के बर्तन, धान कूटने का मूसल, मसाला पीसने का सिल-लोढा इत्यादि प्राप्त हुए हैं।

सुरंग का मुहाना और पार्श्व में डीह
मडफ़ोर्ट के पूर्वी द्वार से लगभग 150 मीटर पर स्थित सुरंग का उपयोग सुरक्षा के लिए किया जाता रहा होगा। सुरंग का एक ही मुहाना दिखाई देता है। दुसरा मुहाना कहाँ पर है और कहाँ तक जाता है इसका कोई पता नहीं। डीह के आसपास की मिट्टी से बाहर निकले हुए कठोर लेट्राईट पत्थर दिखाई देते हैं तथा सुरंग भी लेट्राईट में खोद कर बनाई गयी है। अगर सुरंग की सफ़ाई की जाए तो पता चल सकता है कि इसका दूसरा मुहाना कहाँ पर है। या फ़िर यह सुरंग न होकर कोई खोह होगी जिसमें युद्ध के समय या आपातकाल में गढीदार या सैनिक छिपते रहे होगें। 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे सैनिकों के छिपने के लिए बनाए गए होगें। इन गड्ढों को तीन फ़ुट की तश्तरीनुमा प्लेट से ढका जा सकता है। इसके भीतर आराम से बैठकर एक व्यक्ति तीर इत्यादि जैसे अस्त्र चला सकता है। युद्ध की स्थिति में आस-पास का सघन वन भी सैनिकों के छिपने में सहायक होता होगा। उपर्युक्त संरचनाओं को देखने से प्रतीत होता है कि यह व्यवस्था सामरिक उपयोग को ध्यान में रख कर की गयी होगी।

कोल्हान नाला का उद्गम
यहाँ का निवासी होने के कारण इलाके की भौगौलिक स्थिति से मैं पूरी तरह परिचित हूँ। बड़े उरला में मात्र 3 तालाब हैं जिसमें बंधवा तरिया, दर्री तरिया का निर्माण बोधवा गौंटिया के परिजनों द्वारा एवं बोईर तरिया का निर्माण राहत कार्य के दौरान हुआ है। यहाँ मडफ़ोर्ट में रहने वालों के लिए पानी की क्या व्यवस्था रही होगी? क्योंकि जहाँ निस्तारी के लिए पानी का साधन न हो वहाँ कोई निवास नहीं करता। यह विचार करने पर मडफ़ोर्ट के पूर्व में स्थित कोल्हान नाला याद आता है। यहाँ से कोल्हान नाला एक फ़र्लांग ही होगा। बेलडीह, गिरोला, अभनपुर, नायकबांधा, बड़े उरला का बरसात का पानी एकत्र होकर नाले का निर्माण करता है। यह नाला खरोरा के पास जाकर छोटी नदी का रुप धारण कर लेता है। इसका पाट काफ़ी चौड़ा हो जाता है। अनुमान है कि कोल्हान नाला समीप होने के कारण यहां के निवासियों को निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध होता रहा होगा। सुरंग के समीप मिलने वाले 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे झरिया के काम आते होगें। साथ ही 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी भी निस्तारी के लिए मिलने वाले जल का प्रमाण है। कोल्हान नाला गिरोला और बड़े उरला के बीच से प्रवाहित होता है। वर्तमान में नाले पर किसानों नें अतिक्रमण करके खेत बना लिए गए हैं। नाला कहीं दिखाई नहीं देता। मैदानों का पानी खेतों के भीतर से ही प्रवाहित होता है।

खोजकर्ता ब्लॉ. ललित शर्मा पार्श्व में मडफ़ोर्ट का पूर्वी द्वार
बचपन में रामगोपाल साहू के साथ सायकिल पर इसी रास्ते से उसके गाँव गिरोला जाता था। उरला एवं गिरोला के बीच कई सौ एकड़ का भाटा (उंचाई लिए बंजर भूमि) पड़ता था। तब रामगोपाल बताता था कि उसके सियान कहते थे कि पहले उनका गाँव यहीं भाटा में बसता था। गाँव में दैवीय प्रकोप के कारण धूकी(वर्षा जनित बीमारी) से कई लोग मर गए, तब इस स्थान को छोड़कर कुछ ग्रामवासी एक किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ़ छोटे उरला जाकर बस गए और कुछ पूर्व की ओर जाकर बस गए, उस बसाहटा को गिरोला नाम दिया। शायद बीमारी के थक हार कर गिरते पड़ते उस स्थान पर पहुंचने के कारण गाँव का नाम गिरोला प्रचलन में आया हो। जहाँ से ग्रामवासियों ने सपरिवार पलायन करके नया गाँव बसाया उस पुराने गाँव का नाम "बगबुड़ा" है। अभी यह गाँव राजस्व रिकार्ड में वीरान गाँव के नाम से दर्ज है। ऐसे वीरान गाँव छत्तीसगढ अंचल में बहुत हैं। गिरोला से लगा हुआ बड़ा तालाब है, जिससे ग्रामवासियों की निस्तारी होती है। वर्तमान में इस भाटा में नवभारत एक्सप्लोसिव कम्पनी की बारुद फ़ैक्टरी लगी हुई है। 

वन देवी कर्राबाघिन उरला एवं गातापार की सीमा में
गिरोला, बड़े उरला, बेलडीह के मैदानों में तेंदू पत्ता की भरमार है। ग्रामवासी बीड़ी बनाने के लिए गर्मी के दिनों में यहीं से तेंदू के पत्तों की तोड़ाई करते हैं। रायपुर-राजिम के  तीर्थ यात्रियों वाले पुराने रास्ते पर बड़े उरला से लगभग एक कोस पर वन देवी कर्राबाघिन का स्थान है तथा गांव के खार (खेतों) में भैंसासुर भी विराजमान है। भैंसासुर वन देवता है, त्यौहारों के विशेष अवसरों भैंसासुर का मान-दान किया जाता है। वनदेवी कर्राबाघिन वन के प्रवेश द्वार पर होती हैं। वन में प्रवेश करने के पूर्व उनकी पूजा अर्चना करके कुशलता की प्रार्थना की जाती है है। विशेष कर वीरान गाँव का "बगबुड़ा" नाम ध्यान आकृष्ट कराता है। बग=बाघ और बुड़ा=डूबना या दिखाई न देना। याने इतना सघन वन कि बाघ दिखाई न दे। साथ ही डीह पर खाद जैसी उपजाऊ मिट्टी का मिलने यह प्रतीत होता है कि यह स्थान वीरान होने पर यहाँ के वृक्ष सड़ कर कम्पोस्ट खाद में बदल गए। भैंसासुर, बगमुड़ा, वनदेवी कर्रा बाघिन, डीह से उपजाऊ मिट्टी का प्राप्त होना आदि सूत्रों को जोड़ने पर लगता है कि इस स्थान पर सैकड़ों वर्षों पूर्व सघन वन रहा होगा।

पश्चिम दिशा में मडफ़ोर्ट की खाई
बुजुर्ग ग्रामवासी बताते थे कि राष्ट्रीय राजमार्ग 30 बनने के पूर्व रायपुर से राजिम जाने वाले तीर्थ यात्री इस मार्ग से ही राजिम जाते थे तथा यह मार्ग राजिम से आगे जाने वाले यात्रियों के काम भी आता होगा। प्राचीन काल में शासक और श्रेष्ठिजन पथिकों के विश्राम एवं जल की आवश्यकता को देखते हुए मार्ग पर कुंए और सराय बनवाते थे। जहाँ यात्री जल ग्रहण कर अपनी प्यास बुझा सकें और आवश्यकता पडने पर कुछ देर विश्राम कर सकें। इस मार्ग पर कुंआ भी है जिसका अवशेष मात्र ही दिखाई देता है। इस मार्ग का सर्वे किया जाए तो अन्य स्थानों पर भी कुंए के अवशेष मिल सकते हैं, जिससे इस प्राचीन मार्ग की प्रमाणिकता सिद्ध होगी। अभी तक मैने जितने भी मडफ़ोर्ट देखे हैं वे सभी गोलाई लिए हुए हैं। बड़े उरला में प्राप्त मडफ़ोर्ट चौरस (स्क्वेयर) होना इसे विशिष्ट बनाता है, चौरस मडफ़ोर्ट मुझे पहली बार देखने मिला। इस मडफ़ोर्ट को किसने बनाया? इसमें कौन और किस काल में निवास करता था? किस राजा की यह गढी थी? इसका इतिहास क्या है? आदि प्रश्न मेरे जेहन में घुम रहे हैं। बड़े उरला के इस मडफ़ोर्ट के प्राप्त होने के बाद इन सब प्रश्नों के उत्तर ढूढना पुरातत्ववेत्ताओं एवं इतिहास के अध्येताओं का कार्य है। जिससे देश-दुनिया को यहाँ के इतिहास की जानकारी मिलेगी तथा इतिहास में नवीन कड़ियाँ जुड़ेगीं।


शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

सावधान, सावधान, सावधान ---------- ललित शर्मा

जिस बीमारी का ईलाज नहीं, उसकी हजारों दवाएं हैं। लाईलाज बीमारियाँ लोगों को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करती हैं। ऐलोपैथी के प्रति अभी तक ग्रामीण अंचल में पूरी तरह लोगों को विश्वास नहीं है। थोड़ी सी भी सर्दी जुकाम या हरारत होने पर देव स्थान में जाकर बैगा से झाड़ फ़ूंक करवा लेते हैं। जिससे उन्हे लगता है कि स्वस्थ हो जाएगें।  मुफ़्त की सलाह देने वाले बहुत मिल जाएगें, साथ ही दवाई देने वाले बैगा-गुनिया एवं नीम-हकीम का पता बताना भी नहीं भूलते। जब इंसान ऐलोपैथी से हार जाता है तब वैकल्पिक चिकित्सा बैगा-गुनिया तथा झाड़ फ़ूंक का सहारा लेता है। बस इसी समय का फ़ायदा उठाने के लिए बैगा-गुनिया और झाड़-फ़ूकिया मुस्तैद रहते हैं। आया हुआ मुर्गा हाथ से नहीं जाने देते। दुनिया चाँद से होकर मंगल पर पहुंच रही है, पर समाज अंधविश्वास के शिकंजे से बाहर नहीं निकला है। इसकी जड़े बहुत गहरी हैं। लाख जागरुकता  अभियान सरकार और सामाजिक संस्थाएं करें, पर लोग रुढियों की जंजीरे नहीं तोड़ना चाहते। बीमार होने की अवस्था में चमत्कार की आस लगाए दर-दर पर माथा घिसते-फ़िरते हैं और अंधविश्वास के कारण जान से हाथ गंवाते हैं। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो चुकता है। पीछे बचते हैं रोते-धोते परिजन। नीम-हकीमों पर कोई प्रशासनिक कार्यवाही न होने से इनका धंधा बदस्तूर जारी रहता है। 
5 जुलाई 2012 नई दुनिया

हमारे पड़ोसी मित्र को को किसी ने बताया कि मुझे डायबीटिज हो गयी है। तो वे संध्या काल में मेरे पास आए। वो भी डायबीटिज के शिकार हैं। इस राज रोग के अपने अनुभव बताने लगे। साथ जो दवाईयाँ ले रहे थे उसके बारे में भी जानकारी देने लगे, मैं सुनता रहा। नीम, मेथी, जामुन, गुड़मार इत्यादि मिश्रित नुश्खा भी बताया। अपोलो के डॉक्टर मित्र ने मुझे कहा था कि डायबीटिज के रोग में आप जिस पैथी से ईलाज कराते हैं उसे कभी बंद मत करना। अधिंकाश मरीज बार-बार चिकित्सा पद्धति एवं दवाई बदलने के चक्कर में जान गंवा बैठते हैं और कोई चिकित्सा पद्धति पूर्णत: कारगर सिद्ध होकर सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाती। मैने डॉक्टर का मंत्र गाँठ बांध लिया तथा दवाईयों के साथ ही व्यायाम और 5-6 किलोमीटर की सैर जारी थी। एक दिन वही मित्र फ़िर आए और कहने लगे कि दुर्ग में एक ऐसा हकीम है जो एक बार दवाई देता है और खूब मीठा खाने कहता है। एक बार की दवाई से ही डायबीटिज का ईलाज हो जाता है। फ़लाना भी वहीं से दवाई लेकर आया है, उसके बताने पर मैं भी वहाँ गया था। आपको भी जाना चाहिए। वैसे भी मै किसी के दावे को बिना अपने परीक्षण के सही नहीं मानता और न ही इन नीम-हकीमों पर विश्वास करता। फ़िर भी सोचना पड़ा कि एक बार की दवाई लेने से अगर बीमारी ठीक हो जाती है तो रोज-रोज मंहगी चिकित्सा से मुक्ति मिलेगी। यह भी पता चल जाएगा कि दवाई के नाम पर वह वैद्य क्या खिला रहा है। यही सोच कर दवाई लेने दुर्ग जाने का मन बना लिया।

सुबह जल्दी तैयार होकर दुर्ग के लिए चल पड़ा। मुझे मित्र ने बताया था कि बस स्टैंड के पास मस्जिद के निकट जाकर हकीम का पता पूछ लेना, कोइ भी बता देगा। मैने रास्ते में चलते-चलते सोचा कि भिलाई से विश्वनाथन जी को भी साथ ले लिया जाए। जब मेरा ईलाज हकीम की दवाई से हो जाएगा तो वे भी ईलाज से क्यों वंचित रहें? एक से भले दो। रास्ते से ही उन्हे फ़ोन कर दिया कि वे तैयार रहें। भिलाई से हम दोनो साथ ही दुर्ग चले, वहाँ जाकर हकीम का पता पूछा। लोगों ने ठिकाना बता दिया। वहाँ पर हकीम मिले, बोले कि - शक्कर वाला एक लीटर दूध लाए हो? हमने कहा -  नहीं। तो बोले यहीं सामने मिलता है उस दुकान में, ले आओ। हम दोनो एक-एक लीटर शक्कर वाला दूध लेकर आए। उनके घर पर काफ़ी लोग थे। जो दवा लेने आए थे। पूछने पर पता चला कि बहुत दूर दूर से आए हैं। केरल से लेकर हरियाणा तक के मरीज मिले। इससे अंदाजा लगा कि डायबीटिज के ईलाज के लिए यह भारत में प्रसिद्ध हो चुके हैं। हकीम ने धमेले (बड़ा बर्तन) में रखी दवाई की दो मुट्ठी दूध में डाली और पी जाने कहा। एक लीटर दूध, वो भी गर्म और खाली पेट पीना बड़ा कष्ट दायी लगा। दूध को पीने पर उसमें मुझे चिरपरिचित गंध एवं स्वाद आया। दवाई को जानने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ गयी। मेरे पूछने पर हकीम ने अपना गुप्त फ़ार्मुला नहीं बताया, लेकिन मैं जान गया। सामने ही दान पेटी रखी थी, हमसे 200-200 रुपए उसमें डालने कहे और वहां पर जिस लड़की ने पानी लाकर दिया था उसे 50-50 रुपए दिलाए। साथ ही बताया कि हम अब जी भर मीठा खा सकते हैं। सिर्फ़ ईमली और बैंगन का परहेज करना पड़ेगा। अन्यथा दवाई काम नहीं करेगी। हम ईलाज करा कर खुशी-खुशी घर आ गए।

घर आने पर साथ में ऐलोपैथी दवाई चलती रही। कुछ दिनों के बाद हाथ की उंगलियाँ सुन्न रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया, शुगर लेवल चेक करने पर 478 निकला, डॉक्टर ने एक टेबलेट की जगह तीन टेबलेट लिख दी। हकीम के ईलाज का दुष्परिणाम सामने था। समय पर चिकित्सा मिलने पर किसी बड़े नुकसान से बच गया। कुछ दिनों के बाद गोरखपुर से एक मित्र ने फ़ोन करके इस हकीम के विषय में जानकारी ली। राउरकेला से फ़ोन पर एक परिजन ने पूछा। भारत से कई जगहों से फ़ोन आए। हकीम का इतना वाचिक प्रचार हो गया था कि लोग दूर-दूर से आकर ईलाज कराना चाहते थे। मैने उनको हकीकत बताई, लेकिन लोग मानते कहाँ है? कुछ लोग आखिर आकर ही गए और भुगते भी। कुछ दिनों के बाद हकीम की दवाई के कारण बाहर से आए एक व्यक्ति की दुर्ग में ही तबियत खराब हो गयी। जिसे जान बचाने के लिए भिलाई के सेक्टर-9 दाखिल होना पड़ा। फ़िर सुनने में आया कि हकीम की दवाई से शुगर लेवल बढने के कारण किसी की जान चली गयी। जब यह खबर अखबारों में आई तो प्रशासनिक अमला जागा और जवाहर चौक दुर्ग जामा मस्जिद बाड़ा में रहने वाले शेख इस्माईल वल्द स्व: शेख बहादूर 70 वर्ष के विरुद्ध 5-7 चमत्कारिक उपचार अधिनियम 1954 के अधीन मामला दर्ज किया। उसके पास औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940 के तहत दवाई बनाने की अनुज्ञा भी नहीं थी। दवाई को परीक्षण के लिए प्रयोग शाला भेजा। जिसकी रिपोर्ट का पता नहीं चला। यह घटना 3 जनवरी 2012 की है। मामला कलेक्टर के पास कार्यवाही के लिए 5 माह से लंबित है।

4 जनवरी 2012
अपराध दर्ज होने के बाद भी हकीम का दवाई देना निर्बाध जारी है। इसके दुष्परिणाम स्वरुप एक व्यक्ति की जान और चली गयी। अनुपपुर मध्यप्रदेश के रामप्रसाद यादव पिता लाभसिह यादव 25 वर्ष की मंगलवार 3 जुलाई 12 को दवाई पीने के बाद रात को तबियत बिगड़ गयी। उसे जिला चिकित्सालय में भर्ती गया, जहां उपचार के दौरान बुधवार को उसकी मृत्यु हो गयी। दुर्ग पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया। अंधविश्वास ने एक युवक की जान ले ली। शेख इस्माईल द्वारा शुगर की दवाई दी जा रही है। कई मौते होने के बाद भी प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की। न ही लोगों तक दवाई से होने वाली मौतों की सूचना पहुंची। मैने अनुभव किया कि - यहाँ शक्कर वाला दूध पीने से मरीज की शुगर खतरनाक स्तर तक पहुच जाती है। जिसका दुष्परिणाम उसे भोगना पड़ता है। दवाई के सेवन के बाद मुझे नीम की गुठली, मेथी, जामुन की गुठली का स्वाद आया। नीम के तेल की खुश्बू और मेथी का लसलसापन कोई भी जान सकता है। शुगर के मरीजों में भ्रम है कि कड़ूवा खाने पर खून में मीठे का स्तर कम हो जाता है। इसलिए कहीं भी किसी अनजान नीम-हकीम की दवा खाने से पहले सौ बार सोचें, तब निर्णय लें। नीम-हकीम खतरे जान से जहाँ तक संभव हो बचें।  अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें, अन्यथा शुगर बढने से प्राण गंवाना पड़ेगा।