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सोमवार, 16 जुलाई 2012

हरेली अमावस: टोनही मंत्र शोधने का दिन

धरती हरियाली से मस्त
सावन का महीना प्रारंभ होते ही चारों तरफ़ हरियाली छा जाती है। नदी-नाले प्रवाहमान हो जाते हैं तो मेंढकों के टर्राने के लिए डबरा-खोचका भर जाते हैं। जहाँ तक नजर जाए वहाँ तक हरियाली रहती है। आँखों को सुकून मिलता है तो मन-तन भी हरिया जाता है। यही समय होता है श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में अमावश्या को "हरेली तिहार" मनाने का। नाम से ही प्रतीत होता है कि इस त्यौहार को मनाने का तात्पर्य भीषण गर्मी से उपजी तपन के बाद वर्षा होने से हरियाई हुई धरती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना ही होता है, तभी इसे हरेली नाम दिया गया। मूलत: हरेली कृषकों का त्यौहार है, यही समय धान की बियासी का भी होता है। किसान अपने हल बैलो के साथ भरपूर श्रम कृषि कार्य के लिए करते हैं, तब कहीं जाकर वर्षारानी की मेहरबानी से जीवनोपार्जन के लिए अनाज प्राप्त होता है। उत्सवधर्मी मानव आदि काल से ही हर्षित होने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता और खुशी प्रकट करने, रोजमर्रा से इतर पकवान खाने की योजना बना ही लेता है, यह अवसर हमारे त्यौहार प्रदान करते हैं।

चारागन में गायें
हरेली के दिन बिहान होते ही पहटिया (चरवाहा) गाय-बैल को कोठा से निकाल कर चारागन (गौठान) में पहुंचा देता है। गाय-बैल के मालिक अपने मवेशियों के लिए गेंहु के आटे को गुंथ कर लोंदी बनाते हैं। अंडा (अरंड) या खम्हार के पत्ते में खड़े नमक की पोटली के साथ थोड़ा सा चावल-दाल लेकर चारागन में आते हैं। जहाँ आटे की लोंदी एवं नमक की पोटली को गाय-बैल को खिलाते हैं तथा चावल-दाल का "सीधा" पहटिया (चरवाहा) को देते हैं। इसके बदले में राउत (चरवाहा) दसमूल कंद एवं बन गोंदली (जंगली प्याज) देता है। जिसे किसान अपने-अपने घर में ले जाकर सभी परिजनों को त्यौहार के प्रसाद के रुप में बांट कर खाते हैं। इसके बाद राऊत और बैगा नीम की डाली सभी के घर के दरवाजे पर टांगते हैं, भेलवा की पत्तियाँ भी भरपूर फ़सल होने की प्रार्थना स्वरुप लगाई जाती हैं। जिसके बदले में जिससे जो बन पड़ता है, दान-दक्षिणा करता है। इस तरह हरेली तिहार के दिन ग्रामीण अंचल में दिन की शुरुवात होती है।     

बन गोंदली - द्शमूल कांदा - फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
ग्रामीण अंचल में बैगाओं को जड़ी-बूटियों की पहचान होती है। परम्परा से पीढी-दर-पीढी मौसम के अनुसार पथ्य-कुपथ्य की जानकारी प्राप्त होते रहती है। कौन सी ॠतु में क्या खाया जाए और क्या न खाया जाए। कौन सी जड़ी-बूटी, कंद मूल बरसात से मौसम में खाई जाए जिससे पशुओं एवं मनुष्यों का बचाव वर्षा जनित बीमारियों से हो। सर्व उपलब्ध नीम जैसा गुणकारी विषाणु रोधी कोई दूसरा प्रतिजैविक नही है। इसका उपयोग सहस्त्राब्दियों से उपचार में होता है। वर्षा काल में नीम का उपयोग वर्षा जनित रोगों से बचाता है। दसमूल (शतावर) एवं  बन गोंदली (जंगली प्याज) का सेवन मनुष्यों को वर्ष भर बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है। साथ ही अंडापान (अरंड पत्ता) एवं खम्हार पान (खम्हार पत्ता) पशुओं का भी रोगों से वर्ष भर बचाव करता है। उनमें विषाणुओं से लड़ने की शक्ति बढाता है। पहली बरसात में जब चरोटा के पौधे धरती से बाहर आते हैं तब उसकी कोमल पत्तियों की भाजी का सेवन किया जाता है।  

गेड़ी का आनंद - फ़ोटो रुपेश यादव
हम बचपन से ही गाँव में रहे। हरेली तिहार की प्रतीक्षा बेसब्री से करते थे क्योंकि इस दिन चीला खाने के साथ "गेड़ी" चढने का भी भरपूर मजा लेते थे। जो ऊंची गेड़ी में चढता में उसे हम अच्छा मानते थे। हमारे लिए गेड़ी बुधराम कका तैयार करते थे। ध्यान यह रखा जाता था कि कहीं अधिक ऊंची न हो और गिरने के बाद चोट न लगे। गेड़ी के बांस के पायदान की धार से पैर का तलुवा कटने का भी डर रहता था। तब से ध्यान से ही गेड़ी चढते थे। गेड़ी पर चढकर अपना बैलेंस बनाए रखते हुए चलना भी किसी सर्कस के करतब से कम नहीं है। इसके लिए अपने को साधना पड़ता है, तभी कहीं जाकर गेड़ी चलाने का आनंद मिलता है। अबरा-डबरा को तो ऐसे ही कूदते-फ़ांदते पार कर लेते थे। बदलते समय के साथ अब गांव में भी गेड़ी का चलन कम हो गया। परन्तु पूजा के नेग के लिए गेड़ी अभी भी बनाई जाती है। छोटे बच्चे मैदान में गेड़ी चलाते हुए दिख जाते हैं।

फ़ुरसत में किसान
इस दिन किसान अपने हल, बैल और किसानी के औजारों को धो मांज कर एक जगह इकट्ठा करते हैं। फ़िर होम-धूप देकर पूजा करके चावल का चीला चढा कर जोड़ा नारियल फ़ोड़ा जाता है जिसे प्रसाद के रुप में सबको बांटा जाता है। नारियल की खुरहेरी (गिरी) की बच्चे लोग बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। टमाचर, लहसून, धनिया की चटनी के साथ गरम-गरम चीला रोटी के कहने ही क्या हैं, आनंद आ जाता है। पथ्य और कुपथ्य के हिसाब से हमारे पूर्वज त्यौहारों के लिए भोजन निर्धारित करते थे। सभी त्यौहारों में अलग-अलग तरह का खाना बनाने की परम्परा है। भोजनादि से निवृत होकर खेलकूद शुरु हो जाता है। इन ग्रामीण खेलों की प्रतीक्षा वर्ष भर होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि हरेली परम्परा में रचा बसा पूर्णत: किसानों का त्यौहार है।

दरवाजे पर नीम की डाली-फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
खेल कूद के लिए ग्रामीण मैदान में एकत्रित होते हैं और खेल कूद प्रारंभ होते हैं जिनमें नगद ईनाम की व्यवस्था ग्राम प्रमुखों द्वारा की जाती है। कबड्डी, गेड़ी दौड़, टिटंगी दौड़, आंख पर पट्टी बांध कर नारियल फ़ोड़ना इत्यादि खेल होते हैं। गाँव की बहू-बेटियां भी नए कपड़े पहन कर खेल देखने मैदान में आती हैं, तथा उनके भी खेल होते हैं, खेलों के साथ सभी का एक जगह मिलना होता है, लोग एक स्थान पर बैठकर सुख-दु:ख की भी बतिया लेते हैं। खेल-कूद की प्रथा ग्रामीण अंचल में अभी तक जारी है। खेती के कार्य के बाद मनोरंजन भी बहुत आवश्यक है। किसानों ने हरेली तिहार के रुप में परम्परा से चली आ रही अपनी सामुहिक मनोरंजन की प्रथा को वर्तमान में भी जीवित रखा है।

पहाटिया (चरवाहा)-फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
हरेली तिहार के दिन का समय तो देवताओं के पूजा पाठ और खेल कूद में व्यतीत हो जाता है फ़िर संध्या वेला के साथ गाँव में मौजूद आसुरी शक्तियां जागृत हो जाती हैं। अमावश की काली रात टोनहियों की सिद्धी के लिए तय मानी जाती है। यह सदियों से चली आ रही मान्यता है कि हरेली अमावश को टोनही अपना मंत्र सिद्ध करती हैं, सावन माह मंत्र सिद्ध करने के लिए आसूरी शक्तियों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। शहरों के आस-पास के गाँवों में अब टोनही का प्रभाव कम दिखाई देता है लेकिन ग्रामीण अंचल में अब भी टोनही का भय कायम है। हरियाली की रात को कोई भी घर से बाहर नहीं निकलता, यह रात सिर्फ़ बैगा और टोनहियों के लिए ही होती है। टोनही  को लेकर ग्रामीणों के मानस में कई तरह की मान्यताएं एवं किंवदंतियां स्थाई रुप से पैठ गयी हैं। विद्युतिकरण के बाद भूत-प्रेत और टोनही दिखाई देने की चर्चाएं कम ही सुनाई देती हैं। टोनही के अज्ञात भय से मुक्ति पाने में अभी भी समय लगेगा।    

शनिवार, 30 जुलाई 2011

हरेली अमावस और जादू-टोना की रात

पंजा जोड़ी- बैगा ने पत्थर से निकालना बताया, जीवाश्म हो सकता है
छत्तीसगढ अंचल में सावन माह को तन्त्र-मंत्र और जादू टोने के साथ जोड़ा जाता है एवं सावन माह को ग्रामांचल में काफ़ी महत्व दिया जाता है। प्रत्येक ग्राम में एक बैगा होता है, जो गाँव के देवी-देवताओं की पूजा करके उन्हे परम्परागत ढंग से मनाता है। सावन में प्रत्येक ग्राम वासी से चंदा करके गाँव बांधने एवं देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।  इसे सावनाही बरोना कहते हैं, सावन के प्रथम सोमवार की रात को पूजा का सामान लेकर अपने चेलों के साथ बैगा गाँव की चौहद्दी सीमा (सरहद-सियारा-मुनारा) में अपने चेलों के साथ जाता है, तथा जिस स्थान पर देवी-देवता का स्थान नियत है, उस स्थान पर होम-धूप देकर पूजा करता है। ग्राम के बाहर खार (खेत) में भैंसासुर, सतबहनिया, शीतला, ग्राम देवता, आदि का निवास माना जाता है तथा ग्राम की भीतर सांहड़ा देव, महादेव, हनुमान जी, दुर्गा देवी एवं अन्य देवताओं का निवास मानते हैं।

सावनाही रेंगाना - ग्राम सीमा में टोटका
बैगा खार (खेतों) के नियत स्थानों पर पर देवी-देवताओं की पूजा करके गाँव की सीमा में एक स्थान पर विशेष पूजा करता है, जिसे गांव बांधना कहते हैं। सावन सोमवार को गाँव बांधने की पूजा के कारण ही सभी स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी रहती है, जब हम स्कूल में पढते थे तब भी होती थी और आज भी होती है। इस दिन गाँव के सभी लोग छुट्टी करते हैं काम से और किसी दुसरे गाँव भी नहीं जाते। गाँव बांधने की तांत्रिक पूजा में लाल, काले, सफ़ेद छोटे छोटे झंडे, नींबु, काली हंडी, बांस की टोकनी (चरिहा) खुमरी (बांस की बनी टोपी) नारियल होम-धूप, लकड़ी की बैलगाड़ी का प्रतीक, दारु, मुर्गी इत्यादि का प्रयोग होता है। इस पूजा में बैगा सभी देवी-देवताओं का आह्वान करके उनसे गाँव की रक्षा का निवेदन करता है कि गाँव में धूकी (हैजा-कालरा) भूत-प्रेत, टोना-टोटका एवं अन्य दैविय प्रकोप न हो। इसके बाद एक मुर्गी को जिंदा छोड़ा जाता है और फ़िर उस पूजा स्थल को दुबारा पीछे मुड़ के नहीं देखा जाता। बीमारियों को दैविय प्रकोप से जोड़ कर देखा जाता है। गाँव बांधने बाद सभी लोग घर नहीं जाते, गाँव के बाहर स्थित स्कूल, मंदिर या ग्राम पंचायत भवन में रात गुजार देते हैं। मान्यता है कि इनके साथ कहीं भूत-प्रेत गांव में प्रवेश न कर जाए। फ़ोड़े गए नारियलों का प्रसाद ये ही लोग खाते है, घर लेकर नहीं जाते।

टोटका का सामान-  श्वेत-लाल-काले ध्वज
गाँव में किसी के बीमार होने पर लोग सबसे पहले बैगा के पास ही इलाज के लिए जाते हैं, बैगा झाड़-फ़ूंक एवं परम्परागत जड़ी-बूटियों से इलाज करता है। बैगा के इलाज से स्वस्थ न होने पर ही लोग कस्बों एवं शहरों की तरफ़ इलाज के लिए उन्मुख होते हैं। इन्हे अपनी परम्परागत चिकित्सा एवं टोने-टोटके में अत्यधिक विश्वास है। इनका पारम्परिक मान्यताओं पर विश्वास ही पढे लिखे लोगों को अंधविश्वास दिखाई देता है। जबकि पारम्परिक जड़ी-बूटियों से भी कारगर इलाज होता है। विद्याअध्यन काल में मीठा खाकर घर से बाहर निकलने पर मुझे बुखार जैसा लग कर हाथ पैरों में दर्द के साथ ठंड लगने लगती थी। तब चुल्हे के पास बैठ कर उसकी गर्मी से बदन को सेकता था। एक बैगा हमारे यहाँ काम करता था, उसके एक बार झाड़ने फ़ुंकने से ही मैं ठीक हो जाता था। अब तो बरसों से ऐसी स्थिति नहीं बनी है। लगता है कि बैगा की विद्या भी काम करती थी।

बैलगाड़ी के प्रतीक का उपयोग
सावन की अमावस को हरेली का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बैगा और उसके चेले मंत्र सिद्ध करते हैं। गुरु नए चेलों को मंत्र दीक्षा भी देते हैं। गाँव के एकांत में नियत स्थान पर एकत्र होकर सभी तांत्रिक क्रियाओं को अंजाम देकर बैगा चेलों को जड़ी-बूटियों की पहचान भी बताते हैं। मेरी भेंट सिलोंधा निवासी दल्लु बैगा से हुई, ये साँप भी पकड़ते हैं एवं बैगाई-गुनियाई भी करते है। इनके पास मैने एक से एक सांप देखे जिसमें लगभग 9 फ़िट का किंग कोबरा भी था। जब उसकी फ़ोटो लेने लगा तो वह सिर उठाकर फ़ोटोशेसन करवाने लगा। सिर घुमाकर चारों तरफ़ देखता था। मैने दल्लु बैगा से टोनही देखाने को कहा। तो बैगा ने कहा कि टोनही तीन प्रकार की होती है,श्वेत, लाल और काली। आपको टोनही देखना है तो दैइहान (चारागन-जहां पशु एकत्र होते हैं) में अमावस की रात 12-1 बजे को एक नारियल लेकर खड़े हो जाओ, सब दिख जाएगा। एक से एक टोनही मिलेगी झुपते हुए, लेकिन उसके लिए तंत्र-मंत्र का इंतजाम करना पड़ेगा।

दल्लु बैगा - सिलोंधा वाले
मैने उसे अपने साथ चलकर टोनही दिखाने का आग्रह किया। उसने अनजान आदमी के लिए खतरा बताया। मैने कहा कि अपनी गारंटी मैं लेता हूँ और तुम्हे लिखित में देता हूँ कि अनहोनी होने पर मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। उसे मेरा प्रस्ताव पसंद नहीं आया। उसने कहा कि-"मैं आपको जड़ी दे सकता हूँ, उसके प्रभाव से आपको कुछ नहीं होगा, लेकिन मैं आपके साथ नहीं जाऊंगा, आपको अकेले ही जाना पड़ेगा।" इसका तात्पर्य यह था कि वह पल्ला झाड़ना चाहता था। परन्तु मैं भी जिद्दी आदमी हूँ, समय मिलने पर उसके गाँव तक जाऊंगा और सत्यान्वेषण करुंगा, छोड़ुंगा नहीं। उसने सांपों का जहर सेवन की भी बात बताई। उसका कहना था कि वे सांपों का जहर निकाल कर खाते भी हैं और बेचेते भी हैं। मैं जहर निकाल कर खाते हुए फ़िल्माना भी चाहता हूँ। देखते हैं यह अवसर कब आता है?

हत्था  जोड़ी
आज हरेली त्यौहार है, कुछ और बैगाओं को पकड़ते है, जिससे हमें भी ज्ञान मिले। अज्ञात से ज्ञात होना तो सभी चाहते हैं, लेकिन जो जानकार होने का दावा करते हैं वे सामने आने पर बहाना बनाकर भाग जाते हैं।हरेली त्यौहार मूलत: किसानों का त्यौहार है जिसमें बोआई के पश्चात किसान अपने कृषि यंत्रों को धो मांज कर उनकी पूजा करते हैं। घर में पकवान बनाकर भगवान को होम जग देते हैं। सावन में जल-जनित बीमारियाँ की रोकथाम के लिए गाँव के देवताओं से निवेदन करते हैं। गेंडी चलाकर उत्सव मनाते हैं। पता नहीं कैसे हरेली त्यौहार को लोगों ने टोना-टोटका एवं तंत्र-मंत्र से जोड़ दिया। मुझे भूत-प्रेत एवं जादू टोने पर विश्वास नहीं है। ऐसे अवसर ढूंढते रहता हूँ कि भूत-प्रेत से भेंट हो, पर नहीं होती तो क्या करें। आज जंगल के गावों में जाकर जादु-टोना देखने का विचार है, रात को बैगाओं के तंत्र-मंत्र के प्रयोग भी देखना है। सभी को हरेली त्यौहार की शुभकामनाएं।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

बुधवार, 22 जून 2011

एक रहस्यमयी सांप से पाला -- ललित शर्मा

धरती शायद ही कोई ऐसा स्थान हो जहाँ सांप न रहते हों। जल और थल दोनो स्थानों पर सांप पाए जाते हैं। मनुष्य के निवास करने से पहले धरती के उस भू-भाग पर सांपों का ही निवास रहता है। मनुष्य उनके नैसर्गिक निवास स्थान पर अतिक्रमण कर अपना आश्रय बनाते आया है और सांप एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकता रहा। गाँवों में वर्षा काल में विभिन्न तरह के सांप दिखाई देते हैं। खेतों से लेकर घरों तक इनकी पहुंच रहती है। जब ये घर में घुस जाते हैं तब घर मालिक भयभीत होकर इसे भगाना या मारना चाहता है। 
फ़ोटो-डॉ पंकज अवधिया से साभार
मेरा सांपों से पाला बचपन से पड़ता रहा है। आज तक सैकड़ों को निपटाया होगा। बाड़े में तरह-तरह सांप देखने मिलते हैं। जिसमें कोबरा (नाग, इसे स्थानीय भाषा में डोमी(गंहुआ डोमी और काला डोमी) भी कहते हैं), ढोड़िया (नाग जैसा ही फ़ुंफ़कारने वाला पनियर सांप, कहते हैं इसमें जहर नहीं होता) मुंढेरी (पशुओं के थन से दूध पीने वाला और रेत पर चलने वाले सांप जैसी चाल) पिटपिटी या सिरपिटी (गाढे हरे रंग का सफ़ेद  धारियों वाला छोटा सांप, कहते हैं इसमें भी जहर नहीं होता) अहिराज (इसे देवता सांप कहते हैं,काले रंग पर पीली धारियाँ होती हैं) करैत (जहरीला सांप) घोड़ा करैत (स्थानीय भाषा में खड़दंगिया कहते हैं),अंधा सांप (यह काले रंग का केंचुए जैसा होता है और इसमें भी जहर की मात्रा आदमी को मारने के इतनी होती है) और जिस सांप ने मुझे चक्कर में डाल रखा है और पोस्ट लिखने को मजबूर किया वह है असोढिया या असड़िया।

अस्पष्ट छवि मेरे द्वारा
दो दिन पहले मुझे यह सांप बाड़े में फ़िर दिखाई दिया। इसकी लम्बाई 6 से 8 फ़ीट तक हो सकती है और रंग गेंहुआ और काला। आसाढ का महीना शुरु होते ही एकम के दिन यह सांप दिखाई दे गया। बच्चों ने आकर बताया कि एक बड़ा सारा सांप बाड़े के किनारे वाले घर में घुसा हुआ है। मैने जाकर देखा तो यह असोढिया सांप था, बच्चों को कहा कि डरने की जरुरत नहीं है, कहते हैं इसमें जहर नहीं होता। लगभग  8 फ़ीट लम्बा होगा और एक किनारे पर रखे ड्राम के पीछे छिपने का प्रयास कर रहा था, मैने मोबाईल से फ़ोटो लेनी चाही तो प्रकाश विपरीत दिशा से आने के कारण फ़ोटो स्पष्ट नहीं आई। 

फ़ोटो-डॉ पंकज अवधिया के वीडियो से साभार
गाँव में इस सांप से गाहे-बगाहे सबका पाला पड़ जाता है। मैने उसे वहीं छोड़ दिया और वापस अपने काम पर लग गया। कई बार तो यह कवेलु वाले मकान में घुस जाता था यह भी रहता और मैं भी रहता। इसने मुझे नुकसान नहीं पहुंचाया और मैने इसे। वैसे भी मैं सैकड़ों जहरीले सांप अपने हाथों से मार चुका हूँ। वह भी तब, जब ये घर से बाहर नहीं निकले। क्योंकि जहरीले सांप के साथ घर पर रहना मुर्खता ही है। बच्चे असोढिया सांप की लम्बाई और रंग रुप से बहुत डरते हैं। यह इंसानो को देख कर गजब की फ़ुर्ती से भागता है। पलक झपकते ही रफ़ुचक्कर हो जाता है। एक बार तो मैने छत में चल रहे चूहे को इसे जम्प करके पकड़ते देखा। थोड़ी देर में उसे जिंदा ही अंदर कर गया।

श्रीराम सिन्हा जी ग्राम केन्द्री
मैने सुना है कि असोढिया सांप जहां रहता है उसके साथ-साथ डोमी सांप (कोबरा-नाग) जरुर रहता है और असाढ से लेकर हरेली त्यौहार तक दिखाई देता है। इस समय इसका मेटिंग का समय होता है। असोढिया के साथ कोबरा की मेटिंग सुनकर मुझे सोचने पर मजबूर होना पड़ा। एक जहरीला और दूसरा बिना जहर के। फ़िर इस विषय पर किसी से चर्चा हुई तो उसने बताया कि इसमें जहर होता है। सोचा कि गाँव के बुजुर्गों से ही चर्चा करके देखा जाए। मैने केन्द्री गाँव के 85 वर्षीय बुजुर्ग श्रीराम सिन्हा से चर्चा की। उसने बताया कि असोढिया सांप असाढ से लेकर हरेली अमावस तक ही दिखाई देता है। अगर किसी को काट लेता है तो गांजे की एक चिलम के इतना नशा होता है, आदमी मरता नहीं है बच जाता है। यह सांप आदमी पर अपनी पूंछ से प्रहार करता है। इसकी पूंछ में कांटे रहते हैं, जिसके कारण प्रहार से चोट खाए हुए आदमी के उस स्थान से मवाद निकलना शुरु हो जाता है। हमेशा पानी जैसा पदार्थ रिसता है। इस सांप को कुछ (कमार आदिवासी) लोग खाते भी हैं। 

फ़ोटो-डॉ पंकज अवधिया के वीडियो से साभार
हृदय लाल जी की उम्र 60 वर्ष है, उनसे पूछ्ने पर बताया कि-यह सांप खेत की मेंड को बिल बनाकर फ़ोड़ देता है। जिससे एक खेत का पानी दुसरे खेत में घुस जाता है। बिल बनाने वाली बात पर मुझे विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि सांप हमेशा चूहे के बिल में ही रहते हैं। होता यह होगा कि चूहा मेंड में बिल बनाता होगा और बदनाम यह सांप होता होगा। हृदय लाल जी का कहना था कि इस सांप के बिल में घुसने के बाद पूंछ पकड़ कर निकालना बहुत कठिन है। इन्होने भी इस सांप के पूंछ के द्वारा मारने की बात कही। देवार जाति के सांप पकड़ने वाले लोग इसे मछली जैसे पका कर भी खाते हैं। किसी को अगर गठिया-वात या लकवे की शिकायत है तो इस सांप को उसे भी खिलाया जाता है। यह बात मैने पहले भी सुनी थी। कई लोग इस सांप को मारने के बाद नींबु के पेड़ की जड़ में गाड़ते हैं, जिससे नींबु की फ़सल अच्छी होती है और नींबु भी बड़े-बड़े फ़लते हैं। नींबु के पेड़ में तो मेरे यहां भी इस सांप को डालते मैने देखा है। 

फ़ोटो-गुगल से साभार
असाढ के महीने में खेतो में ये सांप आपस में अठखेलियां करते लोगों को दिखाई दे जाते हैं। मैने भी देखा है, लेकिन असोढिया सांप और कोबरा सांप की मेंटिग की बात अभी तक पचा नहीं पा रहा हूँ, इस सांप के जैविक नाम का भी मुझे पता नहीं है। डॉ पंकज अवधिया से सम्पर्क करने पर उन्हे भी इस सांप के नाम का पता नहीं। छत्तीसगढ में पाए जाने वाले सांपों का दस्तावेजीकरण भी नहीं हुआ है। अगर होता तो मुझे असोढिया के विषय में जानकारी मिल जाती। एक सांप घोड़ा करैत (खड़दंगिया) है। यहां सांप 2 से 4 फ़ीट तक का होता है। इसमें फ़ुर्ती असोढिया सांप जैसे होती है और जहर कोबरा के जैसा। बड़ा होने पर यह भी गेंहुए से काले रंग का हो जाते है और इसके शरीर पर सफ़ेद पट्टियां पाई जाती हैं। यह मुरम वाली जमीन में अधिक मिलते हैं। जहर इतना कि इसका काटा पानी भी नहीं मांगता। शाम के समय अक्सर दिखाई दे जाते हैं। कहते हैं इस सांप का जन्म नर करैत और नागिन की मेटिंग से होता है। यह शंकर प्रजाति का होता है इसलिए इसे स्थानीय भाषा में खड़दंगिया याने आधा कोबरा और आधा करैत कहते हैं। गाँव में विजातिय संबंध से जन्मे बच्चे को अक्सर लोग खड़दगिंया कह देते हैं। असोढिया सांप की मेटिंग की तश्वीर अभी दो चार दिन पहले ही मैने अखबार में देखी थी। लेकिन सेव नहीं कर पाया।

फ़ोटो-डॉ पंकज अवधिया से साभार
असोढिया सांप मेरे लिए रहस्य होता जा रहा है, बचपन से देखने और सुनने के बाद भी। जितने मुंह उतनी बातें। कोई जहरीला बताता है तो कोई बिना जहर का। हमारे खेतों में एवं घर के बाड़े में बनी बांबियों में भी कई तरह सांप है, जो अक्सर मुझे दिखाई देते रहते हैं। घास-फ़ूस में कब निकल आए पता नहीं। पर आज तक किसी सांप या बिच्छु ने नुकसान नहीं पहुंचाया है। एक दिन सुबह मैने दूर पेड़ के नीचे कुछ चमकता हुआ देखा। जब नजदीक गया तो एक नाग सांप ने मुंढेरी सांप को दबोच रखा था और मुंढेरी सांप ने नाग सांप के मुंह पर कुंडली लपेट रखी थी। दोनो टस से मस नहीं हो रहे थे। दोनो की जान अटकी पड़ी थी। दो-तीन घंटे तक पड़े रहे। जब दोनो पस्त हो गए तो एक दूसरे को छोड़ दिया और खिसकते-खिसकते अपने रास्ते चले गए। असोढिया सांप अब रोज दिखाई दे रहा है। नुकसान तो नहीं करता लेकिन कोई नया आदमी देख ले तो उसके हौसले पस्त करने लायक इसका रंग रुप और लंबाई जरुर है। इस सांप के विषय में अधिक जानने का प्रयास जारी है। अब हरेली अमावस तक इस पर ही निगाह रखना है और जानकारी एकत्रित करना है।

पोस्ट अपडेट दिनांक-23/6/2011

छत्तीसगढ में स्नेकपार्क बनाया जा रहा है, इसकी सूचना यहाँ पर है। अब इससे लोगों को सर्प की पहचान करने का अवसर मिलेगा।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

गेड़ी चलाने का हरेली त्यौहार

छत्तीसगढ में सावन मास की अमावश को हरेली (हरियाली) अमावश कहते हैं, यह त्यौहार मूलत: हरियाली के साथ जुड़ा हुआ है। इस दिन को हम त्यौहारों की शुरुवात मानते हैं जो कि होली पर जाकर अंतिम त्योहार आता है।
नांगरिहा-हल चलाता

हरेली त्यौहार के साथ कई किंवदत्तियां जुड़ी है। मुख्यत: किसान इस त्यौहार को हर्षो-उल्लास के साथ मनाते हैं।

इस दिन किसान अपने कृषि के उपकरणो नांगर(हल) रांपा, कुदाल, इत्यादि की पूजा करते हैं और खेतों में भेलवा के पौधे का रोपण करके अच्छी फ़सल की कामना करते हैं। बढिया रोटी-पीठा (पकवान) बनाया-खाया जाता है।

ललित शर्मा द्वारा निर्मित गेड़ी चित्र
बचपन में हमारे लिए यह त्यौहार बहुत महत्व रखता था। हम इस त्यौहार का बेसब्री से इंतजार करते थे क्योंकि इस दिन हमें गेंड़ी चढने मिलती थी। गेंडी एक बांस का बना हुआ उपकरण होता है जिस पर चढकर हम चलते है जिससे हमारी उंचाई बढ जाती थी।

इसे चलाने के लिए संतुलन की कला आना जरुरी है। नहीं तो गिरकर हाथ पैर भी तुड़वा सकते हैं। इसे मजबूत बांस से बनाया जाता है। गांव के बच्चों के साथ हम गेंडी दौड़ लगाते थे। एक बार बांस की खप्पची में फ़ंस कर मेरे पैर का तलुवा भी कट चुका है। चीरे हुए बांस में बहुत धार होती है, कांच जैसे। मैने पिछली हरेली पर एक चित्र भी बनाया था। गेंडी चलाते हुए बच्चों का।

ललित शर्मा द्वारा निर्मित चित्र
"हरेली" त्यौहार को प्रत्येक ग्रामवासी नियम से मानते हैं. इस दिन गांव को तंत्र मंत्र से बैगा(ग्राम के तांत्रिक) द्वारा बांधा (तंत्र-मंत्र से कवचित) किया जाता है.किसी भी दैवीय या प्राकृतिक महामारी या आपदा से बचाने के लिए ग्राम देवता की पूजा अर्चना की जाती है.

जिसके लिए प्रत्येक ग्राम वासी से तंत्र-मंत्र एवं पूजा करने के लिए एक निश्चित सहयोग राशि ली जाती है और महिलाएं गोबर से घरों के चारों तरफ विभिन आदिम आकृतियाँ बनाकर उसे एक लाइन से जोड़ती है, उसके बाद बैगा सभी के घरों में जाकर नीम की एक छोटी डाली को जाकर दरवाजे में टांगता है, मान्यता है कि इससे अनिष्टकारी शक्तियां घरों में प्रवेश नहीं करती.

इसके बाद किसी भी व्यक्ति को गांव से बाहर निकलकर किसी दूसरी जगह जाने आज्ञा नहीं होती. इस दिन सब अपना काम बंद कर गांव में  रहते हैं, और शाम होते ही लोग घरों से बाहर नहीं निकलते. ऐसी मान्यता है कि अँधेरे में तंत्र मंत्र की सिद्धि करने वाले बैगा और टोनही अपनी शक्तियों को जागृत करते हैं. एवं उसका परीक्षण करते हैं. जिससे जो कोई व्यक्ति बाहर निकलेगा उसका अनिष्ट हो सकता है.बैगा (ग्राम तांत्रिक) को गांव में रक्षा करने वाला और टोनही को अनिष्ट करने वाला माना जाता है.

 मुझे भी बचपन में मेरी दादी के द्वारा घर से बाहर नही निकलने दिया जाता था. "बाहर मत निकल,आज हरेली कोई टोनही की नजर पड़ गयी तो कुछकर देगी. इस मानसिकता से ग्रसित थे लोग-टोनही नाम का एक अज्ञात भय उनमे समाया हुआ था.बाल-बच्चे -नर-नारी कोई भी रात को बाहर नहीं निकलता था.सिर्फ बैगा और उसके सहयोगी ही रात को बाहर घूम सकते थे.

जैसे जैसे लोग पढ लिख रहे हैं वैसे वैसे जागरुक भी हो रहे हैं,अब इतना भय नहीं रहता हरेली की काली अमावश की रात का। हम रात को भी उठकर घूमते हैं, लेकिन अंदर के गावों में अभी भी ऐसा ही माहौल होता है। जागरुकता आते जा रही है। लेकिन टोनही का अज्ञात भय लोगों को अभी भी सताता रहता है। वर्षों से चली आ रही परम्परा को तो लोग इतनी जल्दी भूलते नहीं है। हरेली त्यौहार से जुड़ी हुई इस टोनही और बैगा की गाथा को लोगों को भूलने में अभी और समय लगेगा।