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सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

उसके बिन यात्रा अधूरी : काठमांडू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
परासी से हमें भूख लगनी शुरु हो गई। हमने दौन्ने में नदी किनारे कतार से बने होटल देख कर गाड़ी रोक ली। अब खाना खाकर ही आगे बढा जाए। 2 तो यहीं बज गए थे, गिरीश भैया व्यग्र हो रहे थे कि कब काठमाण्डौ पहुंचे और कार्यक्रम में सम्मिलित हों, खाना जाए भाड़ में पहले कार्यक्रम में पहुंचे, जिसके लिए इतनी दूर का सफ़र तय करके आए हैं लेकिन समय अपनी रफ़्तार से चलता है और गाड़ी अपनी रफ़्तार से। दोनों की रफ़्तार में सामंजस्य नहीं बैठता। यहाँ से होटलों की शुरुवात होती है जो काठमाण्डू तक नदी के किनारे किनारे बने हुए हैं। चाय पानी से लेकर दारु-बीयर तक की सहज उपलब्धता है। होटल में तीन महिलाएं दिखाई दे रही थी। 1 पुरुष था वो नींद भांज रहा था। टीवी पर हिन्दी फ़िल्म चल रही थी जिसका आनंद सारा परिवार उठा रहा था।

मैने सोचा कि खाना प्लेट के हिसाब से मिलता होगा। एक प्लेट सब्जी और रोटी चावल ले लेगें उससे काम चल जाएगा। लेकिन महिला ने बताया कि खाना थाली हिसाब से मिलेगा। रोटी सब्जी दाल चावल इत्यादि सभी थाली में शामिल है। हमारा मुड नानवेज खाने का था। तो उसने कहा कि मुर्गा का मासू है। हमने खाने का आर्डर दे दिया। पहली थाली आई, उसमें मुर्गा दिखाई नहीं दिया तो पाबला जी ने हुंकार भरी "मुर्गा किधर है?" उसने कहा कि वह अलग से दिया जाएगा। थाली में आलु-गोभी की सब्जी, आलु का चोखा, तिल की चटनी, एक कटोरी दाल और पतले-पतले पापड़ जैसे फ़लके थे। मैने वह थाली गिरीश भैया की ओर बढा दी। शाकाहारी थाली देख कर उनकी भूख जाग गयी और वे सहर्ष भोजन करने लगे।

थोड़ी देर में हमारी थाली भी आ गई। भोजन में जब मुर्गा हो तो 56 भोज की आवश्यकता नहीं रहती। सिर्फ़ एक ही सब्जी से काम चल जाता है। चटनी स्वादिष्ट थी, पूछने पर पता चला कि टमाटर, धनिया, मिर्च के साथ तिल पीसा गया है। मैने कहा कि इसमें लहसून डाल देते तो आनंद आ जाता। तो वह कहने लगी कि - तिल के साथ लहसून नहीं डाला। हम तिल में लहसून डालना पाप समझते हैं। चलो एक नया ज्ञान प्राप्त हुआ। चिकन एक दम घरेलू तरीके से बना हुआ था। उस पर तेल नहीं तैर रहा था। चावल भी अच्छी क्वालिटी का था। खाने में मजा आ गया। पेट भर खाने का हमने तीन आदमियों का 800 रुपए नेपाली मुद्रा में बिल चुकाया और आगे बढे।

नेपाल में नदियों पर जितने भी पुल पुलिया बने हैं उनमें लोहे का इस्तेमाल अधिक हुआ है। पहाड़ी नाले पर बने हुए पुलिया को नाम देकर उसके साथ खोल शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे अरुण खोल, प्रकाश खोल या अन्य। तराई से शुरु हुआ सफ़र निरंतर पहाड़ों की तरफ़ जाने लगा। आकाश में पहाड़ियों की धुंधली परछाईयाँ दिखाई देने लगी। इस घाटी को पार करने के बाद नारायणगढ शहर आता है। जब हम शहर के चौक पर पहुंचे तो वहाँ झंडे डंडे लिए रैली निकल रही थी। चौराहे पर खड़े यातायात पुलिस ने ट्रैफ़िक रोक रखा था। जब रैली आगे बढ गई तो हम आगे बढे। पता चला कि हम शहर में घुस रहे हैं और हमें बांए मुड़ना था। जी.पी.एस वाली बाई की कमी हमें यहीं पर महसूस हुई। जी.पी.एस तो काम कर रहा था पर उसमें नेपाल का मैप नहीं था। हमने वापस आकर काठमाण्डू वाली सड़क पकड़ी।

नारायणगढ़ से मुग्लिंग की दूरी 35 किलोमीटर है, यहीं से रामपुर का जंगल पार करने के बाद एक तरफ़ पहाड़ियाँ और दूसरी तरफ़ नदी का खड्ड प्रारंभ हो जाता है। नदी के किनारे पर टीन शेड के होटल बने हुए हैं और प्रत्येक होटल में 4-5 महिलाएं अवश्य दिखाई दे रही थी। कुछ वृद्ध पुरुष भी उनकी सहायता के लिए दिखाई दे रहे थे। रास्ते में नदी पार करने के लिए कुछ रस्सी के पुल भी दिखाई दिए। काठमाण्डू मार्ग पर कुछ स्थानों पर कांक्रीट सड़क का निर्माण हो रहा है जिसके कारण गाड़ियों की लाईन लग जाती है। एक तरफ़ गाड़ी रोक कर दूसरी तरफ़ की गाड़ियों के मार्ग खोला जाता है। इसमें समय लग जाता है। हम काठमाण्डू जल्दी पहुंचना चाहते थे लेकिन सड़क और उंचाई साथ दे तो संभव था।

रास्ते में पाबला जी को चाय की दरकार हुई, गाड़ी चलाते हुए आगे बढ़ते गए, होटल में गाड़ियाँ रोकी नहीं। बीच में एक स्थान पर चाय पी थी। अभी शाम होने को थी और धुंधलका छाने लग रहा था। एक स्थान पर मुत्रालय एवं होटल देख कर गाड़ी को विश्राम दिया। एक होटल में चाय पूछने पर उसने बगल वाले होटल की तरफ़ इशारा कर दिया कि चाय वहाँ मिलेगी। यहाँ सिर्फ़ दारु और खाना मिलता है। मैने दूसरे होटल में पूछा तो उसने कहा कि दूध नहीं है। हमने काली चाय ही पीने की ठानी। सामने बने चुल्हे पर एक महिला भोजन बना रही थी। कड़ाही में सब्जी चढा रखी थी। मेरे पूछने पर उसने बताया कि मासू बना रही है। किसका पूछने पर उसने कहा कि बड़ा बकरा। ये बड़ा बकरा क्या होता है, तो वह बोली बफ़ेलो। ओह बफ़ेलों। मैने सुना था कि नेपाली दैनिक भोजन में पाड़े के मांस का प्रयोग करते हैं तथा किसी उत्सव में सामुहिक रुप से पाड़े काटे जाते हैं।

चाय दूसरी औरत ने गैस चूल्हे पर बनाई। सभी होटलों एक-एक सीएफ़एल जल रहा था। बिजली के खम्बे दिखाई दे रहे थे लेकिन उनमें करेंट नहीं था। यहाँ सोलर पैनल का प्रयोग हो रहा था। चाय पीकर हम आगे बढ़े। एक स्थान पर जाम दिखाई देने लगा। एक तरफ़ सड़क का निर्माण हो रहा था दूसरी तरफ़ एक ट्रक चढाई पर बंद हो गया था। यातायात कर्मी ट्रैफ़िक नियंत्रण कर रहे थे। हमारी गाड़ी रिवर्स करवा कर उसने एक स्थान से कांक्रीट सड़क पर चढाने के लिए कहा। पाबला जी ने उचित स्थान देखकर गाड़ी चढा दी लेकिन उतारने के लिए स्थान दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क से कांक्रीट रोट लगभग 1 फ़ुट की ऊंचाई पर था। मैने उतर कर टायर निकलने के स्थान पर 2 पत्थर रखे तब हमारी गाड़ी सड़क पर आई।

इस रुकावट से निकलने के बाद हम आगे बढते रहे। नेपाली ड्रायवर बहुत ही रफ़ गाड़ी चलाते हैं। हार्न बजाते हुए सीधे ही घुस जाते हैं। उन्हे जबरिया साईड देनी पड़ती है। वे इस सड़क के नित्य चलने वाले है और हम पहली बार चल रहे थे इसलिए सोच रखा था कि दुर्घटना से देर भली। सही सलामत पहुंच जाए वही सबसे बड़ा पुरस्कार है। लगभग साढ़े 10 बजे हमने काठमांडू की सीमा में प्रवेश किया। लगभग 1300 मीटर की ऊंचाई पर आ चुके थे। थोड़ी सीढी चढाई होने पर गाड़ी का इंजन भी हांफ़ रहा था। एक स्थान पर गाड़ी रोक कर हमने इंजन को भरपूर सांस लेने का मौका दिया। काठमाण्डू के लिए एक ही सड़क होने के कारण यहाँ जाम बहुत जल्दी लगता है। 

काठमांडू प्रवेश करने पर फ़िर जीपीएस वाली बाई याद आई। अगर उसका साथ रहता तो हम बिना किसी से पता पूछे ही वांछित स्थान पर पहुंच जाते। आगे बढ़ने पर बाईक सवार दो युवकों ने हमें रोका। पता चला कि वे होटल वाले हैं और यहीं से होटलों के लिए ग्राहक पकड़ रहे हैं। हमने उन्हे बताया कि होटर रिव्यु हमारे लिए बुक है। तो उन्होने होटल रिवर व्यू का पता बताया। हमें थमेल जाना था, थमेल में ही बहुत सारे होटल हैं और सारे पर्यटक यहीं पर आकर ठहरते हैं। होटल बुक होने की बात सुनकर उन्होने हमसे किनारा कर लिया। आगे बढने पर थमेल का पता एक टुरिस्टर वाले ड्रायवर से पूछा तो उसने अपने पीछे आने के लिए कहा। वह भी टुरिस्ट लेकर थमेल जा रहा था।

काठमांडू के एक चौक पर पहुंचने के बाद दो मोटर सायकिल सवारों ने हमें फ़िर रोक लिया। वो अपने होटल का गुणगान करने लगे। वह भी थमेल में था। हमने मंत्रणा की कि इनके साथ ही चलते हैं, कम से कम थमेल तो पहुंच जाएगें। फ़िर वहाँ जाकर होटल का पता भी पूछ लेगें। 11 बज रहे थे और सारा काठमाण्डू सो रहा था। सड़क पर इक्का दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे। वे दोनो हमें अपने होटल में ले गए। पाबला जी ने पीछा छुड़ाने की दृष्टि से उनका होटल देख कर आने कहा। इस सब में समय तो खराब हो रहा था, लेकिन हमारे सामने भी होटल रिव्यू तक पहुंचने की मजबूरी थी। मैं उनके होटल में गया तो उन्होने 1 कमरे का किराया 6500 भारतीय मुद्रा बताया और कहा कि 24 घंटे सुविधा मिलेगी। मैं मना करके लौट आया। हमने मनोज पांडे जी के नम्बर पर फ़ोन लगा कर पता पूछा। लेकिन नई जगह होने पर नाम और पता समझ नहीं आया।

उन दोनो बाईक सवारों ने बताया कि होटल का नाम रिव्यू नहीं रिवर व्यू है। आप गलत पता ढूंढ रहे हैं। तो पाबला जी ने कहा कि पहले हमारे साथियों के पास पहुंचाईए फ़िर आपके होटल के विषय में कुछ सोचेगें। वे दोनो हमें होटल रिवर व्यू में ले गए। जहाँ रेस्टोरेंट में  सबसे पहले शैलेष भारतवासी दिखाई दिए। फ़िर अंतर सोहिल, मनोज पांडे इत्यादि भी पहुंच गए। इनका भोजन चल रहा था। मनोज भावुक एवं सरोज सुमन भी संग थे। हमने खाने के बारे में पूछा तो पता चला कि खाना सम्पन्न हो गया है और किचन भी बंद हो गया है। कुछ भी नहीं मिलने वाला। सभी ब्लॉगर खाए अघाए सो रहे थे। रविंद्र प्रभात जी को पता चला तो वे नींद से उठ कर आ गए। रेस्टोरेंट में उनसे मुलाकात हुई। हमें कमरा नंबर 20 की ताली थमा दी गई तथा ताकिद दी गई कि सुबह 8 बजे तैयार हो जाईएगा। दही पराठे का नाश्ता मिलेगा और उसके बाद काठमांडू भ्रमण पर चलना है। रास्ता बताने वाले दोनो बाईक सवार वहीं होटल में जमें हुए थे, पाबला जी ने 150 रुपए दक्षिणा देकर उनसे पीछा छुड़वाया और हमने अपने कमरे की राह ली, लेकिन भूखे नींद कैसे आएगी? आगे की किश्त पढ़ें……

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

निठल्लाई: साधो सहज समाधि भली

घुमक्कड़ी और लेखन का सिलसिला ही टूट गया, 4 महीने हो गए, जब से दिल्ली में चोट खाई तब दना-दन चोटें जारी हैं, एक ठीक होती है दूसरी लग जाती है। इनसे उबरने की कोशिश जारी है फ़िल्में देख-देख कर साधो सहज समाधि भली। जितनी फ़िल्में सारे जीवन में नहीं देखी, उतनी एक महीने में देखी। नेट और यू ट्यूब का अच्छे से दोहन किया। थोड़ा बहुत समय फ़िल्मों के बीच मिलता है वह फ़ेसबुक की भेंट चढ जाता है। घुमक्कड़ी से हासिल उर्जा जीवन की गाड़ी को आगे बढाती है। घुमक्कड़ी रुक जाती है तो लगता है कि दुनिया ठहर गई, सांसों का स्पन्दन भी सुनाई नहीं देता। चलती है धीरे-धीरे जीवित होने का अहसास कराते हुए। 

बरसात की झड़ी जारी है। बरसती बूंदों के बीच फ़सल हरिया रही है तो रुपया पीला पड़ते हुए मरणासन्न है, औंधे मुंह गिर रहा है धरा पर। जिसके पास धरा है वह भी धरे-धरे धराशाई हो रहा है और जिसके पास नहीं धरा वह तो नंगा ही खड़ा है, क्या खाए और क्या खिलाए। देश की अर्थ व्यवस्था धराशाई हो रही है और नेताओं के खजाने में अकूत संपत्ति जमा होती जा रही है। जिसे गिनने वाला कोई नहीं। बोरों में भरे हुए नोट गिनने का समय इनके पास कहाँ है? भरे के भरे बोरों का इस्तेमाल ही जाता है। 

रायपुर से घर लौटते हुए रास्ते में डूमरतराई के समीप गोलगप्पे का ठेला लगा देखा तो कंट्रोल नहीं हुआ। चलो गोल गप्पे खा लिए जाएं। गोल गप्पे में भरने के लिए मुझे अपनी पसंद का मसाला चाहिए। जिसमें प्याज होना जरुरी है। गोलगप्पे वाले कहा कि - महाराज प्याज नहीं है। मैने एक लड़के को 10 रुपए देकर प्याज लेने भेजा। वह 10 रुपए में एक ही प्याज लेकर आया। देख माथा खराब हो गया। प्याज की एक-एक परत एक-एक रुपए हो गई। जिसके पास हराम का धन है उसे क्या फ़र्क पड़ने वाला है। एक बार कुर्सी पर बैठते ही सात पुश्तों का जमा कर लेते हैं और गोवा में जाकर आयटम सांग करते हैं। यहाँ जांगर तोड़ कमाने के बाद भी कुछ नहीं बचता।

सबसे अधिक त्रासदी तो अब मध्यमवर्ग भुगतने वाला है। अभी तक किसानों के द्वारा ही आत्महत्या करने की खबरें मिलती थी। अब अर्थ व्यवस्था का यही हाल रहा तो मध्यमवर्ग से भी समाचार आने प्रारंभ हो जाएगें। खाद्य सुरक्षा बिल लोकसभा में पास हो गया। वोटों की राजनीति के कारण मुफ़्त बांटने की परम्परा शुरु हो गई। सत्तारुढ पार्टियाँ वोट बैंक बनाने के उद्देश्य से जनता की गाढी कमाई को दोनों हाथों से मुफ़्त बांट रही है। जिसका भार मध्यम वर्ग को झेलना है। उच्च वर्ग को टैक्स चुरा कर काला धन बनाने में लगा हुआ है। मध्यम वर्ग को ही प्रत्येक स्थान पर अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष कर देना पड़ता है। मुफ़्त का माल मिलने से कामचोरी बढते जाएगी। अगर खाना मुफ़्त में मिल जाएगा तो कमाने कौन जाएगा?

जो पैसा संसाधनों के विकास में लगना चाहिए वह मुफ़्तखोरी की भेंट चढता जा रहा है। लगाए जाओ तुम्हारे बाप का है, तुमने तो कमाया नहीं है जो खर्च करने में जान निकलेगी। इधर चीन बार बार सीमाएं लांघ जाता है। भारतीय सैनिकों के खाना-पानी मांगता है। मांगने की बीमारी प्रत्येक जगह है। अब तो म्यांमार के सैनिक भी मांगने भारतीय सीमा में घुसे चले आ रहे हैं। सोचता हूँ खाद्य सुरक्षा लागु होने के बाद देश में कहीं पर भी भिखारी नहीं दिखाई देगें। क्योंकि जब सरकार भरपेट में मुफ़्त में भोजन देगी और निराश्रित पेंशन इत्यादि मिल रही होती तो भीख मांगने की आवश्यकता ही खत्म हो जाएगी। हर हाथ को काम की जगह नारा होना चाहिए "हर पेट को खाना"। 

कई स्थानों से संगोष्ठियों के निमंत्रण आ रहे हैं। कई तो एक ही दिन पड़ रहे हैं, ऐसे में अलग-अलग स्थानों पर एक ही तारीख को उपलब्ध हो पाना असंभव है। रविन्द्र प्रभात जी भी काठमांडू में कार्यक्रम कर रहे हैं। परिकल्पना की टीम ने नेपाल में सम्मान देने की घोषणा की है। उन्हें समारोह की सफ़लता के लिए मेरी शुभकामनाएं। बरसात खत्म हो तो कुछ यात्राएं की जाएं। भोपाल में "मीडिया चौपाल" का इस वर्ष पुन: आयोजन हो रहा है। अनिल सौमित्र जी का निमंत्रण आया हुआ है। उम्मीद है कि नेपाल नहीं सही तो भोपाल जाना हो सकता है तथा उसके साथ ही आस-पास के स्थानों की घुमक्कड़ी करने का इरादा है।

दो बरस हो गए, पांडीचेरी गए। वहाँ काफ़ी मित्र हैं जो इंतजार करते हैं। भाषा अवश्य समस्या बनती है पर भावों से काम चल जाता है। नागमणि दूभाषिए की भूमिका निभा लेती हैं। एक बार पुन: पांडीचेरी जाने का मन बन रहा है। मित्र वी तंगम का फ़ोन आया था कि दो बरस हो गए पांडीचेरी आए। वैसे अभी पांडीचेरी का मौसम अच्छा होगा। समुद्र ठाठें मार रहा होगा और लहरें सिंहगर्जना कर रही होगी। रात के समय समुद्र किनारे आँख बंद कर बैठने पर लहरों का स्वर किसी दूसरी दुनिया में ले जाता है तथा बड़ा ही अलौकिक एवं अद्भुत अनुभव होता है। इसके साथ किनारे पर स्थित "ली कैफ़े" की काफ़ी और "शंकरा" के चखने का तो कोई तोड़ ही नहीं है। अभी तो जयपुर की दाल-बाटी-चूरमा का योग बन रहा है। फ़िर जोधपुर के मिर्ची भजिए का। बाकी बाद में देखा जाएगा।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

धूर्त लोगों की चाल‍-विज्ञापनों का जंजाल ................. ललित शर्मा

जो दिखता है वह बिकता है, पुरानी कहावत है। कहावतें कभी व्यर्थ नहीं होती, अनुभव और तजुर्बों का निचोड़ होती है। हम बाज़ार जाते हैं तो दुकानों के सामने कुछ सैम्पल लटके या रखे दिख जायेगें, जिसे वर्तमान में डिस्प्ले का नाम दिया गया है। डिस्प्ले करना ही प्रथमत: अपनी वस्तु की बिक्री के लिए विज्ञापन करना है। विज्ञापन करने के लिए विभिन्न माध्यमों का सहारा लिया जाता है। जब कस्बे में टूरिंग टाकिज की कम्पनी आती थी तो सजधज कर कम्पनी का कर्मचारी अमीन सयानी की आवाज में फिल्म का धुंवाधार प्रचार करता था और भी इस अंदाज में कि दूर-दूर तक गाँव के फिल्मों के शौक़ीन खिंचे आते थे। चार आना, आठ आना की टिकिट लेकर फिल्म का भरपूर आनंद उठाते थे। इसी तरह का विज्ञापन थियेटर, सर्कस, ड्रामा, नौटंकी, लीलाओं आदि का होता था। विज्ञापन के तौर पर बांटे गए पर्चों को लोग संभाल कर रखते थे। सर्कस आता था तो खेल शुरू होने से एक घंटे पहले से उसकी सर्च लाइट जल जाती थी। इस लाइट के जलते ही आस-पास के 20-25 गाँवों के लोगों को पता चल जाता था कि सर्कस चालू होने वाला है, खा पी कर चला जाए। 

समय के साथ विज्ञापन के माध्यम बदले, टीवी, फिल्मो के टेलर, वीडियो, पत्र-पत्रिकाएँ, वाल रायटिंग, होर्डिंग्स, वस्तु मुफ्त देने का वादा, एक के साथ एक फ्री, दो फ्री और भी बहुत कुछ फ्री। बदलने को बहुत कुछ बदला, नहीं बदला तो वाचिक प्रचार (माउथ पब्लिसिटी) का तरीका नहीं बदला। आज भी हम किसी के मुंह से किसी चीज की बड़ाई सुन कर खरीद लाते हैं। भले ही वह वस्तु घटिया ही क्यों न हो। खरीदने के बाद चाहे गले की हड्डी क्यों न बन जाए। वाचिक प्रचार करने वाले बहुत दूर के नहीं होते, अपने करीबी यार, दोस्त, रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी ही होते हैं। जिनकी बातों पर हम सहज ही विश्वास कर लेते हैं। अविश्वास करने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके साथ एक सोच यह भी रहती है कि "चलो यार अपने ही करीबी ने कहा है, अगर कुछ नुकसान भी हो गया तो सहन कर लेंगे।

वाचिक प्रचार प्रसार सबसे अधिक तन्त्र-मन्त्र एवं असाध्य रोगों की चिकित्सा का होता है। मुफ्त की राय देने वालों को आपकी कोई घरेलु या स्वास्थ्य की समस्या बस दिखाई या सुनाई देनी चाहिए। वे फटाफट आपको पचीसों नुस्खे और इलाज करने वालों के नाम बता देंगे। कैंसर, पीलिया, दमा, एड्स, क्षय रोग, गुप्त रोग, नपुंसकता, बाँझपन, लड़का होना इत्यादि के इलाज के लिए गाँव-गाँव में नीम हकीम बैठे हैं। जबकि इन असाध्य रोगों की चिकित्सा आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं के पास नहीं है। वे असाध्य रोगों की चिकित्सा का दावा खुले आम करते हैं। साथ ही यह प्रचार होता है कि ये शर्तिया इलाज करते हैं। इनके इलाज से मरीज को कोई फर्क नहीं पड़े,  इनकी भेंट दक्षिणा करते करते स्वर्ग सिधार जाये, घर वाले भले ही कंगाल हो जाएँ, परन्तु इनके चेलों का विश्वास कभी नहीं डिगता। वे और ग्राहक पकड़ लाते हैं। बाबाओं में धंधे भी इसी तरह वाचिक प्रचार के आधार पर चलते हैं। अब कुछ हाई टेक बाबा टीवी पर प्रचार करके माला-मोती रुद्राक्ष बेच लेते हैं।
 
विज्ञापन का सकारात्मक पहलू यह है कि बाजार में उपलब्ध वस्तुओं की जानकारी मिल जाती है। बस उनकी गुणवत्ता को परखने की जिम्मेदारी खरीददार की होती है, सावधानी हटी दुर्घटना घटी। दुकानदार का कुछ नहीं बिगड़ना, कटना तो खरबूजे को ही है। पहले अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं में VPP से रेडियो, कैमरा, टेपरिकार्डर, धमाके करने वाली पिस्तौल, आत्मरक्षा करने के उपकरणों के विज्ञापन खूब छपते थे। ऑर्डर देने पर VPP से भेजे जाते थे, पोस्ट आफिस से छुड़ाने पर सिर्फ खोखा ही मिलता था या दो चार बार इस्तेमाल करने के बाद कूड़े के हवाले किया जाता था। ठग अपना उल्लू सीधा कर लेते थे। वर्तमान में यह तरीका थोडा हाई टेक हो गया है। नेट के जरिए ठगी के मामले प्रकाश में आते हैं, लाखों करोड़ों की लाटरी के चक्कर में लोग अपनी जमा पूंजी भी गँवा बैठते है।  बाद में लुटे-पिटे छाती पीटते मिल जाते हैं।

पहले वैवाहिक विज्ञापन नहीं छपते थे, लोग सगे सम्बन्धियों के माध्यम से ही वर-वधु की तलाश करते थे। आवागमन के साधनों एवं फोन इंटरनेट ने दूरियों को नजदीकियों में बदल दिया। रविवारीय अख़बारों के तो दो-तीन पृष्ठ वैवाहिक विज्ञापनों से भरे रहते हैं। विज्ञापन के लिए अख़बार आज भी उपयुक्त साधन हैं, इनकी पहुच गाँव गाँव तक है। इनमे छपे कुछ विज्ञापन तो बहुत ही मजेदार होते हैं। कुछ अख़बारों में देखा कि अपने काम  के प्रभाव को लेकर ज्योतिषियों और तांत्रिकों के बीच प्रतियोगिता जारी है। बानगी देखिए ... फ्री सेवा, फ्री समाधान 15 मिनटों में, स्पेस्लिस्ट- मनचाहा वशीकरण, लव मैरिज, प्यार में धोखा, सौतन-दुश्मन से छुटकारा, मुठकरणी, गडाधन। नोट- मनचाही स्त्री-पुरुष प्राप्त करवाने की 100% गारंटी। साथ ही यह भी दावा है कि - मुझसे पहले काम करने वाले को 25 लाख का इनाम। (नाम-पता कुछ नहीं लिखा है सिर्फ मोबाईल नंबर छपा है।

अगला विज्ञापन है A 2 Z समस्या का समाधान। 17 वर्षों से स्थायी पता, पति-पत्नी में अनबन, मनचाहा वशीकरण, प्यार एवं विवाह, सौतन-दुश्मन से छुटकारा, लक्ष्मी प्राप्ति, कोर्ट कचहरी में सफलता, धोखा, शारीरिक पीड़ा, कर्ज मुक्ति, व्यापार में हानि, गृह क्लेश आदि A 2 Z समस्या का समाधान। अगले विज्ञापन दाता इनके भी बाप हैं .... पं.......शास्त्री (गोल्ड मेडलिस्ट) खुला चैलेन्ज, मेरे से पहले काम करने वाले को मुंह मांगा इनाम। गृह क्लेश,सौतन-दुश्मन से छुटकारा, पति-पत्नी में अनबन, लव मैरिज का गारंटेड 2 घंटे में समाधान। सभी समस्या का समाधान मात्र-700/- में। बिछड़ा प्यार दुबारा वापस लाने में स्पेस्लिस्ट। अगला विज्ञापन दाता इनका भी दादा निकला। (कोई फीस नहीं) पहले काम फिर इनाम, समस्या कैसी भी हो जड़ से खत्म घर बैठे। स्पेस्लिस्ट - मनचाही शादी, किया कराया, जादू टोना, संतान सुख, गृह क्लेश, मांगलिक/ काल सर्प पूजा, लाटरी सट्टा, सौतन-दुश्मन खात्मा, गड़ाधन। नोट- मुझसे पहले काम करने वाले को 51 लाख रुपए इनाम।100% गारंटेड समाधान। नकली लोगों से बच के रहें।

यह है विज्ञापनों का जंजाल, धूर्त लोग जाल फैलाये मुर्गा फंसने का इंतजार करते हैं और जिस दिन मुर्गा फंस जाये उस दिन त्यौहार मना लेते हैं। ये तो छोटे-मोटे लोग है जो लघु विज्ञापनों पर काबिज हैं। 5 सप्ताह में गोरा बनाने वाली बड़ी कम्पनियों के के करोड़ों अरबों के विज्ञापन छपते हैं। किसी को गोरा होते मैंने आज तक नहीं देखा। उत्तर भारत में गोरा करने वाली इन क्रीमों का अधिक असर नहीं पड़ता, पर दक्षिण भारत में लोगों का क्रीम पावडर का खर्च अधिक है। बेचारे बरसों से गोरा होने के लिए क्रीम लगा रहे हैं। पर गोरे एक भी नहीं दिखाई देते। गोरे होने की आदिम मानसिकता का फायदा बड़ी कम्पनियां उठा रही हैं। एक कम्पनी है हाईट बढ़ाने की दवाई के विज्ञापन करके अच्छी बिक्री कर रही है और लाभ कमा रही है। ऐसे ही हजारों विज्ञापन  ग्राहक को उल्लू बनाने के लिए ताक रहे हैं, इनके गोरख धंधे से जो बच जाये वही बुद्धिमान है।